टाइम्स ऑफ़ इंडिया की आज 17 january 2016 की खबर के अनुसार मुंबई बोरीवली के संजय गांधी नेशनल पार्क के जंगलों में प्राचीन बौद्ध काल की सात बौद्ध गुफाएं खोजी गयीं पूरी खबर के लिए लिंक इस प्रकार है http://timesofindia.indiatimes.com/city/mumbai/Seven-ancient-Buddhist-caves-found-in-Mumbai/articleshow/50609347.cms

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की आज 17 janvary 2016 की खबर के अनुसार मुंबई बोरीवली के संजय गांधी नेशनल पार्क के जंगलों में प्राचीन बौद्ध काल की सात बौद्ध गुफाएं खोजी गयीं पूरी खबर के लिए लिंक इस प्रकार है

 

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mumbai borivli buddhist cavemumbai borivli buddhist cave (2)

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बुद्ध और ईश्वर का अस्तित्व……..आर.पी.एस.हरित, बामसेफ


buddha and GOD concept
शरद पूर्णिमा का समय था..बुद्ध एक गाँव से अपने शिष्य आनंद और स्वास्ति के साथ निकल रहे थे..अचानक एक व्यक्ति आया और बुद्ध से पूछ दिया..”तथागत..क्या ईश्वर है”?
बुद्ध ने पूछा “तुम्हें क्या लगता है?
आदमी सर झुकाया और धीरे से कहा” तथागत मुझे तो लगता है.. ईश्वर है” बुद्ध आनंद कि तरफ देखकर मुस्कराये और धीरे से कहा…”बिलकुल गलत लगता है तुम्हें”..इस अस्तित्व में ईश्वर जैसी कोई चीज नहीं”
आदमी हाथ जोड़ा और चला गया…
बुद्ध गाँव की पगडंडी पर आगे बढ़े.आह वही दिव्य स्वरूप..तेजोमयी शरीर.जो देखता अपलक देखता रह जाता…गाँव गाँव शोर हो जाता..बुद्ध आ रहे हैं…..
गाँव से निकलते ही एक और आदमी आया…और पूछा..”तथागत.मैं कई दिन से परेशान हूँ..मुझे लगता है कि ईश्वर और भगवान की बातें महज बकवास हैं”
बुद्ध हंसे.. आनंद स्वास्ति कि तरफ देखकर मुस्कराया..बुद्ध ने बड़े प्रेम से कहा…”मूर्ख तुम्हें बिल्कुल गलत लगता है..इस अस्तित्व में सिर्फ ईश्वर ही है और कुछ नहीं”
जरा देखो तो..आँख बन्द करो तो..खोजो तो एक बार”
इस जबाब को सुनकर आनंद और स्वस्ति आश्चर्य में पड़ गए…एक ही सवाल और दो जबाब..
दूसरे दिन कि बात है…. एक गाँव के बाहर रात्रि विश्राम हेतु बुद्ध रुके हुए हैं…आज तो स्वास्ति और आनंद भी थक गए…कितना पैदल चलना पड़ता है रोज….भोजन के लिए भिक्षा मांगनी पड़ती है..
तभी अचानक एक घबराये हुए आदमी का प्रवेश हुआ..वो बुद्ध के पास आया और जोर से कहा…”तथागत..क्या ईश्वर है? या नही है?..मैं परेशान हूँ.मैं खोज रहा हूँ…मार्गदर्शन करें”?
कहतें हैं इस तीसरे आदमी के सवाल पर बुद्ध चुप हो गए कुछ न बोले…. देर तक चुप रहे..मौन हो गए..आँख बन्द कर लिए..
लेकिन आनंद और स्वास्ति के आश्वर्य का ठिकाना न रहा….एक जैसे तीन सवाल और अलग अलग जबाब.. बुद्ध की ये चुप्पी हैरान कर गयी…
व्यक्ति के जाते ही..आनंद से रहा न गया..वो पूछ बैठा ” तथागत..कल से लेकर आज तक तीन व्यक्ति एक ही तरह के सवाल लेकर मिले…लेकिन मैं हैरान हूँ कि आपने तीनों का अलग अलग जबाब दिया.मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा…
बुद्ध मुस्कराये..और स्वास्ति कि तरफ देखकर कहा..”आनंद..जो पहला व्यक्ति आया था..उसने मान लिया था कि ईश्वर है…मैं उसकी मान्यता को मिटा देना चाहता था…कि वो खोजना शुरू करे..ईश्वर है ये मानकर बैठ न जाय..वो सत्य तक पहुंचे..”
दूसरे व्यक्ति ने भी मान लिया था कि ईश्वर कि बातें कोरी हैं..मैंने उसके धारणा को भी मिटा दिया..ताकि वो भी खोजे कि ईश्वर है या नहीं…और तीसरा व्यक्ति अभी संशय में था..खोज रहा था..मैं मौन रह गया..वहां मौन रह जाना उचित था…
देखो आनंद इस संसार में कुछ भी मानने वाले लोग जानने से चूक जातें हैं. उनका विकास रुक जाता है जिनका स्वयं का कोई बोध नहीं होता….वो सत्य क्या है कभी नही जान पाते…
जान वही पाता है वो निरंतर खोज रहा..आनंद जानने कि यात्रा मुश्किल है.मानना आसान है….मानने में कोई खर्च नही. कोई परिश्रम।नही…कोई कह दिया..समझा दिया..मान लिया…लेकिन मानकर रुक जाने वाले लोग इस संसार के सबसे अभागे प्राणी हैं…आनंद..बोध के बिना ज्ञान व्यर्थ है”।
(आर.पी.एस.हरित,बामसेफ)

बुद्ध ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। ..बुद्धकथाएँ


making and requirement of GOD
बुद्ध का धम्मं !!बुद्ध ने ऐसे धम्मं को जन्म दिया, जिसमे ईश्वर की कोई जगह नहीं है। जिसमे परमात्मा को कोई स्थान नहीं है। बुध्द ने संदेह से शुरू की यात्रा और शून्य पर पूर्ण की। संदेह और शून्य के बीच में बुद्ध का सारा बोध है। संदेह को धम्मं का आधार बनाया और शून्य को धम्मं की उपलब्धि। बाकी सब धर्म विश्वास को आधार बनाते है और पूर्ण को उपलब्धि। बुद्ध धम्मं को समझने के लिए जिज्ञासा चाहिए।

बुद्ध कहते है, मानने से नहीं चलेगा। गहरी खोज करनी पड़ेगी। दूसरे धर्म कहते है की, पहला कदम बस तुम्हारे भरोसे की बात है, उठा लो, इससे ज्यादा आपको कुछ करने की जरुरत नहीं है। लेकिन बुद्ध का धम्मं तो तुमसे पहले कदम पर पहुचने के लिए भी बड़ी लंबी यात्रा की मांग करता है। वह कहता है, संदेह की प्रगाढ़ अग्नि में जलना होगा, क्योकि तुम जो भरोसा करोगे. वह तुम्हारे बुद्धी पर का भरोसा होगा। अगर बुद्धी में ही रोग है तो उस रोग से जन्मा हुवा विश्वास भी बिमार होगा।

🌐मंदिर अंधेरेमे ही नहीं पड़े है वे अँधेरे के सुरक्षा स्थल है। आस्था के नाम सब तरह के पाप वहां चलते है। विश्वास के नीचे सब तरह का झूठ चलता है। धर्म पाखण्ड है क्योकि शुरुवात में ही चूक हो जाती है। क्योकि पहले कदम पर ही तुम कमजोर पड जाते हो। तुम्हारा विश्वास तुम्हे पार न ले जा सकेगा. इसीलिए बुद्ध ने कहा,तोडो विश्वास, छोडो विश्वास. सब धारणाए गिरा देनी है। संदेह की अग्नि में उतरना है। दुस्साहसी चाहिए, खोजी चाहिए, अन्वेषक चाहिए, चुनौती स्वीकार करने का साहस निर्माण होना चाहिए.

🌐बुद्ध कहते है, आश्वासन कोई भी नहीं है । क्योकि कोण तुम्हे आश्वासन देगा? यहाँ कोई भी नहीं है जो तुम्हारा हाथ पकडे। अकेले ही जाना है मरते वक्त तक। बुध्द ने कहा ‘अत्त दीप भव’ ! अपने ही दीए बनो। मै मरा तो रोना मत। मै कोण हू? मै आपको ज्यादा से ज्यादा दिशा दे सकता हू। चलना तुम्हे है। मै रहू तो भी चलना तुम्हे है, अगर न रहू तो भी चलना तुम्हे है। झुको मत, सहारा लेना मत, क्योकि सब सहारे अंत:ता लंगड़ा बना देते है। सब सहारे तुम्हे अंधा बना देते है। सहारे धीर धीरे तुम्हे कमजोर कर देते है। बैसाखिया धीर धीरे तुम्हारे पैरों की परिपूर्ति कर देती है। फिरतुम पैरों की फ़िक्र ही छोड़ देते हो।

🌐बुद्ध कहते है, संदेह करो, बुद्ध का धम्मं वैज्ञानिक है। संदेह विज्ञान प्राथमिक चरण है। इसीलिए भविष्य में जैसे जैसे लोक मानस वैज्ञानिक होता जाएगा, वैसे वैसे समय बुद्ध के अनुकूल होता जाएगा। जैसे जैसे लोग सोचने और विचार करने की गहनता में उतरेंगे और उधार और बासे विश्वास न करेंगे, हर किसी बात को मान लेने को राजी न होंगे, बगावत बढ़ेगी, लोग हिम्मती होंगे, विद्रोही होंगे, वैसे वैसे बुद्ध की बात लोगो के करीब आने लगेगी।

🌐जगत में बुध्द का आदर बढ़ रहा है। जो भी विचारक है, चिन्तक है, वैज्ञानिक है, उनके मन में बुद्ध का आदर रोज बढ़ रहा है। बुद्ध बिना लड़े जित रहे है। क्योकि बुद्ध कहते है, हम तुमसे मानने को नहीं कहते, खोजने को कहते है। जब खोज लोंगे तो मानेंगे, बिना खोजे कैसे मान लोंगे. यहविज्ञान का सूत्र है।

🌐सत्य इतना सस्ता नहीं है, की वह बिना खोजे मिल जाए। सत्य कोई संपति नहीं है, जैसे पिता की वसीयत मरने के बाद पुत्र को मिल जाती है। बुद्ध कहते है, सत्य को खोजना पड़ेगा. भ्रम जाल तथा माया को भुलाकर उसे ढूंढना होगा और तुम्हारे भीतर भी कमजोरिया बहुत है। थक जाते तो कही भी भरोसा करके रुक सकते हो, किसी भी मंदिर के सामने, थके हारे सर झुका सकते हो, बस इसीलिए नहीं की तुम्हे कोई जगह मिल गयी, जहा सर झुकाने का मुकाम आ गया था, बस सिर्फ इसीलिए की अब तुम थक गए, अब और नहीं खोजा जाता. बुद्ध तुम्हे कोई जगह नहीं देते, तुम्हारे कमजोरी के लिए वहा कोई जगह नहीं होती। बुद्ध कहते है, ज्ञान तो मिलता है, आत्म परिष्कार से, शास्त्र से नहीं, सत्य कोई धारना नहीं है। सत्य कोई सिध्दांत नहीं है। सत्य तो जीवन का निखार है। सत्य तो ऐसा है, जैसे सोने को कोई आग में डालता है तो निखरता है, जलता है, पिघलता है, तड़पता है। जो व्यर्थ है जल जाता है, सार्थक बचता है। सत्य तो तुममे है, कूड़े करकट में दबा है और जबतक तुम आग से न गुजरो,तुम उस सत्य को कैसे खोज पाओगे.?

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🌐बुद्ध कहते है, जल्दी मत करना भरोसे करने की, भरोसा तभी करना जब संदेह करने की जगह ही न रह जाए, लेकिन दूसरे धर्म संदेह के विपरीत केवल भरोसा करनेकी सलाह देते है। संदेह के विपरीत श्रध्दा करनेकी सलाह देते है। लेकिन बुद्ध संदेह करने की पूरी छूट देते है। इतना संदेह करो की,आखिर में तुम्हारा संदेह नष्ट हो जाए और केवल परिणाम बच जाए, जिसे तुम ढूढ रहे हो। बुद्ध कहते है, दबे हुए सड़े को बाहर निकालो, उससे छुटकारा पाने का एक ही उपाय है, उसे रोशनी में लाओ।

🌐बुद्ध ने संदेह को जन्म दिया है। बुद्ध का युग कभी भी बुद्धिवादी नहीं था। केवल बुद्ध ही बुध्दिवादी थे। उन्होंने लंबे और कठिन मार्ग से यात्रा की थी। शार्टकट मार्ग की कोइ गुंजाइश नहीं थी। तुम जिसे श्रध्दा मानते हो, वह शार्टकट का रास्ता है। तुम बिना गए, बिना कही पहुचे, बिना कुछ किये श्रध्दा कर लेते हो। ऐसी श्रध्दा नपुंसकता के सिवा कुछ नहीं है। तुम्हारे शास्त्र लिखते है, नास्तिकोकी बाते मत सुनना, नास्तिक कुछ कहे तो कान में उंगलिया डाल देना। यह तो भयभितता है। डरपोकता के सिवा कुछ नहीं है। ऐसे धर्म के शास्त्र कमजोरी सिखाते है, जो आस्था इतनी डरपोक है की नास्तिक की बात सुनाने से कांपती हो। इससे तो नास्तिक बेहतर है, कम से कम उनके शास्त्र में कही नहीं लिखा की आस्तिक की बात सुनने से डरना है। नास्तिक कभी डरता नहीं है,लेकिन आस्तिक हमेशा डरते है।

🌐बुद्ध ने संदेह को जन्म दिया है, संदेह करते करते तूम संदेह से मुक्ति पा लेते हो। जहॉ संदेह खत्म होता है वहा सूरज उगता है। परमात्मा असहाय्य अवस्था है, इसकी पुकार होती है। जिसको तुमने झुकना समझा है, वह कही तुम्हारे कांपते और भयभीत पैरों की कमजोरी तो नहीं है। जिसको तुमने समर्पण समझा है, वह तुम्हारी कायरता तो नहीं?

🌐बुद्ध ने तुमसे परमात्मा नहीं छिना, उन्होंने तुमसे तुम्हारी बेचारगी छिनी है। बुद्ध ने तुमसे मंदिर नहीं छीने, तुम्हारे कमजोरी के शरणस्थल छीने है। बुद्ध ने कहा, तुम्हे खुद ही चलना है, बुद्ध ने तुम्हारे पैरों को सदियों सदियों के बाद फिर से खून दिया है। तुम्हे अपने पैरों पर खड़े होने की हिम्मत दी है। बुद्ध उसी को सदधर्म कहते है, जो तुम्हे तुम्हारे भीतर छिपे हुए सत्य से परिचित कराए। झूठी आस्थाओं में नहीं, धारणाओं में नहीं, शास्त्रों में नहीं, व्यर्थ के शब्दजालों में नहीं।

🌐बुद्ध ने आत्मा के स्वरूप को शून्य कहा है। उन्होंने आत्मा शब्द में खतरा देखा. क्योकि उन्हें लगा तुम किसी चीज के तलाश में हो, जो भीतर रखी है। जब तुम कहते हो तुम्हारे भीतर आत्मा है, जैसे की तुम्हारे घर में कुर्सी रखी हो, तुम्हारे भीतर आत्मा रखी है, आत्मा कोई वस्तु है की गए भीतर और पा गए। बुद्ध ने आत्मा शब्द का शब्दप्रयोग नहीं किया क्योकि आत्मा से जडता का पता लगताहै। आत्मा शब्द का मतलब यह हुआ की कुछ तुम्हारे भीतर ठहरा हुआ है, रुका हुआ है, कुछ तुम्हारे भीतर मौजूद है। तो जो मौजूद ही ही है, वह वस्तुतः जड है।

🌐बुद्ध ने कहा था, तुम ही तुम्हारे शास्ता हो, तूम ही तुम्हारे गुरु हो, तुम ही तुम्हारे शास्त्र हो और तुम्हारे चैतन्य के सिवाय तुम मे और कोई नहीं है।

 

सद्धर्म का लोप होने के कारण स्वयं भगवान् बुद्ध के अनुसार…डॉ० जयवंत खंडारे

सद्धर्म का लोप होने के कारण स्वयं भगवान् बुद्ध के अनुसार  ……डॉ० जयवंत खंडारे

प्राचीन भारत एवं मध्य एशिया के इतिहास में सर्वाधिक गौरवशाली समय बौद्ध काल का था। इस के बाद का इतिहास अन्धकार मय और बौद्ध धर्म की आवश्यता दर्शाता रहा है। बौद्ध धर्म के बिना क्या क्या होता है, यह  दर्शाता रहा है। भारत और उसके पड़ोसी देश यथा- पाकिस्तान, अफगानीस्तान, नेपाल की स्थिति देख कर यही कहा जा सकता है कि यहाँ से बौद्ध धर्म का लोप होना ही इनके दुर्भाग्य का प्रमुख कारण है। यही कारण इरान, इराक, तुर्किस्थान, सीरिया, मालदीव इन्डोनेशिया एवं मलेशिया पर लागू होता है।  बौद्ध धर्म के लोप के अनेक विद्वानों ने अनेक कारण बताए हैं। जिनमें प्रमुखता से बुद्ध, धम्म और संघ को ही कारण बताया गया है, इन्हीं की कमियाँ गिनाई जाती है। केवल डॉ० अम्बेडकर जी ने इस बाबत  सही कारण गिनाए है। यथा वैष्णव, शैव आदि भक्ति पंथों के माध्यम से, सूफीमत के माध्यम से बौद्ध लोगों को धर्मांतरित किया गया, बचे हुए बौद्धों पर इन्हीं धर्मांतरितों के माध्यम से आक्रमण करा कर खत्म करने की कोशिश की गई, जो अन्त तक लडते रहे उन्हें अछूत घोषित किया गया।

लेकिन महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि स्वयं भगवान् बुद्ध का अपने धम्म के भविष्य के बारे में क्या अनुमान था? उन्होंने लोप के बारे में क्या चेतावनी दी थी?यहाँ इसी मुद्दे पर विचार किया गया है।

एक दिन आयुष्मान महाकाश्यप भगवान् से बोले- भन्ते! क्या हेतु है, क्या कारण है कि पहले अल्प ही शिक्षापद थे और (उन पर भी) बहुतों ने अर्हत् पद पा लिया था? भन्ते! क्या हेतु है, क्या कारण है कि इस समय बहुत शिक्षापद हैं और कम लोग अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित हैं?

‘‘एवञ्‍चेतं, कस्सप, होति सत्तेसु हायमानेसु सद्धम्मे अन्तरधायमाने, बहुतरानि चेव सिक्खापदानि होन्ति अप्पतरा च भिक्खू अञ्‍ञाय सण्ठहन्ति।

उन्हें उत्तर देते हुए भगवान् बोले–

न ताव, कस्सप, सद्धम्मस्स अन्तरधानं होति याव न सद्धम्मप्पतिरूपकं लोके उप्पज्‍जति। यतो च खो, कस्सप, सद्धम्मप्पतिरूपकं लोके उप्पज्‍जति,अथ सद्धम्मस्स अन्तरधानं होति’’[1]

काश्यप! ऐसा ही होता है- सत्त्वों के हीन होने, और सद्धर्म के क्षय होने पर बहुत शिक्षापद होते हैं, और अल्प भिक्षु अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित होते हैं। काश्यप! तब तक सद्धर्म का लोप नहीं होता है जब तक कोई दूसरा नकली धर्म उठ खड़ा नहीं होता। जब कोई नकली धर्म उठ खड़ा होता है तो सद्धर्म का लोप हो जाता है।… काश्यप! जैसे, तब तक सच्चे सोने का लोप नहीं होता जब तक नकली तैयार होने नहीं लगता…. वैसे ही। काश्यप! पृथ्वीधातु, सद्धर्म को लुप्त नहीं करता; न आपोधातु, न तेजोधातु, और न वायुधातु। किंतु, यहीं वे मूर्ख लोग उत्पन्न होते हैं जो सद्धर्म को लुप्त कर देते हैं। काश्यप! जैसे अधिक भार से नाव डूब जाती है वैसे धर्म डूब नहीं जाता।

भगवान् का साफ-साफ संकेत उन विरोधी पंथों की ओर था जो मानवतावादी धम्म को नष्ट करना चाहते थे ताकि उनके धर्म टिके रहे। वे इस काम में सफल भी हुए हैं। ऐसा लगता है कि बुद्ध के वचनों को आम जनता लम्बे समय तक सम्भाल नहीं पायी। इसका भी कारण स्वयं बताके गए हैं, यह कारण बुद्ध वचनों को लम्बे समय तक ठीक ठीक नहीं समझा पाए। बुद्ध इसे भी एक कारण गिनाते हुए बोले- ‘‘पञ्‍च खोमे, कस्सप, ओक्‍कमनिया ……. इमे खो, कस्सप,पञ्‍च ओक्‍कमनिया धम्मा सद्धम्मस्स सम्मोसाय अन्तरधानाय संवत्तन्ति।

काश्यप! ऐसे पाँच कारण हैं जिससे सद्धर्म नष्ट होकर लुप्त हो जाता है। कौन से पाँच? 1. काश्यप! भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक, उपासिकायें बुद्ध के प्रति गौरव नहीं करतीं, उनका ख्याल नहीं करती हैं। धर्म के प्रति….. पूर्ववत्……। 3. संघ के प्रति….. । 4. शिक्षा के प्रति……..। 5. समाधि के प्रति……।

‘‘पञ्‍च खोमे, कस्सप, धम्मा सद्धम्मस्स ……. इमे खो, कस्सप, पञ्‍च धम्मा सद्धम्मस्स ठितिया असम्मोसाय अनन्तरधानाय संवत्तन्ती’’ति।

… काश्यप! यही पाँच कारण है, जिनसे सद्धर्म नष्ट हो लुप्त हो जाता है। काश्यप! ऐसे पाँच कारण हैं, जिनसे सद्धर्म ठहरा रहता है, क्षीण और लुप्त नहीं होता।1. ….बुद्ध के प्रति गौरव…। 2. धर्म के प्रति….। 3. संघ के प्रति… । 4. शिक्षा के प्रति…। 5. समाधि के प्रति…। काश्यप! यही पाँच कारण है, जिनसे सद्धर्म ठहरा रहता है, क्षीण और लुप्त नहीं होता।

श्रावस्ती….।भिक्षुओ! पूर्वकाल में दसारह नामक लोगों के पास आनक नाम का एक मृदंग था। उस आनक मृदंग में जब-जब कोई छेद हो जाता था तब-तब दसारह लोग उसमें एक खूँटी ठोंक देते थे। धीरे-धीरे, एक ऐसा समय आया कि सारे मृदंग की अपनी पुरानी कड़ी कुछ भी नहीं रही; वह  सारा खूटियों का एक ढच्चर बन गया। [2]

बुद्ध वचनों में इसी प्रकार से परिवर्तन परिवर्धन करने से मूल बुद्धवचन खो जाएंगे, यह चेतावनी बाद में सही सिद्ध हुई है। वे कहते है– भिक्षुओ! भविष्यकाल में भिक्षु ऐसे ही बन जायेंगे। बुद्ध ने जो गम्भीर, गम्भीर अर्थ वाले, लोकोत्तर, शून्यता आदि पर संयुक्त सूत्र कहे हैं उनपर ध्यान न देंगे, सुनने की इच्छा न करेंगे, समझने की कोशिश नहीं करेंगे। धर्म को वे सीखने और अभ्यास करने के योग्य नहीं समझेंगे।

जो बाहर के श्रावकों से कहे कविता, सुन्दर अक्षर और सुन्दर व्यञ्जन वाले जो सूत्र बनेंगे उन्हीं के कहे जाने पर कान देंगे, सुनने की इच्छा करेंगे, समझने की कोशिश करेंगे। उन्हीं धर्मों को वे सीखने और अभ्यास करने के योग्य समझेंगे। भिक्षुओ! इस तरह, बुद्ध ने जिन गम्भीर… सूत्रों को कहा है उनका लोप हो जायेगा। भिक्षुओ! इसलीये, तुम्हें ऐसा सीखना चाहिये- बुद्ध ने जो गम्भीर…. सूत्र कहे हैं, उनके कहे जाने पर कान दूँगा, सुनने की इच्छा करूँगा, समझने की कोशिश करूँगा। उसी धर्म को सीखने और अभ्यास करने के योग्य समझूँगा। [3]

सद्धर्म के लोप एवं स्थिरता पर संघ के चारों सदस्यों यथा भिक्षु, भिक्षुणी, उपासक एवं उपासिकओं को मार्गदर्शन करते हुए वे कुछ कारण बताते है–

सद्धर्मलोप में कारण :  “भिक्षुओ! ये दो धर्म सद्धर्म के लोप एवं अन्तर्धान के साधक हैं। एक, शब्द  या वाक्य के पद या वर्ण अशुद्ध लिखे जायँ या पढ़े जायँ, तथा दो उनका वास्तविक अर्थ, दुरूहता या भ्रामकता के कारण कठिनता से समझ में आवे । ऐसे अशुद्ध लिखे गये पद एवं वर्णों का वास्तविक अर्थ भी कठिनता से समझ में आता है। अत: मेरा मानना है कि ये दो धर्म सद्धर्म के लोप एवं अन्तर्धान के लिये उत्तरदायी हैं”।

सद्धर्मस्थिति (स्थिरता) में कारण :   “भिक्षुओ! ये दो धर्म सद्धर्म की स्थिति (स्थिरता), सत्ता एवं निरन्तरता में सहायक हैं। कौन से दो? एक, शुद्ध लिखे या  बोले गये पद एवं वर्ण तथा दो, उन पदों का अर्थ भी सुबोध, सरल एवं अनायास समझ में आनेवाला हो। भिक्षुओ! इस प्रकार शुद्ध लिखे गये पद एवं वर्णों का वास्तविक अर्थ भी सरल एवं अनायास समझ में आनेवाला होता है। इस तरह, भिक्षुओ! ये दो धर्म सद्धर्म की स्थिति सत्ता एवं, निरन्तरता में सहायक हैं”।

“भिक्षुओ! जो भिक्षु अधर्म को धर्म कहकर उपदेश करते हैं, वे भिक्षु ऐसा करके बहुत लोगों का अहित करने में, बहुत लोगों को दु:ख पहुँचाने में ही लगे हुए हैं, वे नहीं समझते कि ऐसा करके वे कितने ही देवताओं और मनुष्यों को अनर्थ, अहित एवं दु:ख की ओर ढकेल रहे हैं, भिक्षुओ, ऐसे भिक्षु अपने लिये तो अपुण्य का सञ्चय करते ही हैं, साथ ही वे अपने इस अपुण्य कार्य से धर्म का लोप भी निश्चित रूप से करेंगे”। [4]

सद्धर्म के लोप एवं स्थिरता भिक्षु, भिक्षुणियों के मार्गदर्शन पद्धति एवं नैतिकता पर भी निर्भर होती है, इस संन्दर्भ में मार्गदर्शन करते हुए वे कहते हैं–

“भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म के नाश एवं लोप के कारक  होते हैं। कौन से चार? यहाँ, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु उनके द्वारा उपदिष्ट सूत्रान्त के अर्थ एवं व्यञ्जन को मिथ्यारूप से ग्रहण करते हैं। तब इस प्रकार मिथ्यारूप से गृहीत सूत्र का अर्थ भी दुर्गृहीत ही होगा। इस प्रकार यह प्रथम धर्म  सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु दुर्वच होते हैं, तथा दौर्वचस्यकारक धर्मों से सम्पन्न होकर धर्मानुशासन से बाहर चले जाते हैं। इस प्रकार यह द्वितीय धर्म  सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु बहुश्रुत, आगमज्ञ, धर्मधर, विनयधर एवं मातृकाधर होते हैं, वे सावधानतया सूत्रान्तों का वाचन नहीं करते। उनके मरने के बाद ये सूत्रान्त छिन्नमूल एवं असहाय हो जाते हैं। इस प्रकार यह तृतीय धर्म सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु स्थविर भिक्षु परिगृही, कर्तव्य में शिथिल, लाभार्थ कहीं भी प्रवेश में आगे रहने वाले, एकान्तवास की उपेक्षा करने वाले अप्राप्त की प्राप्ति हेतु या अज्ञात के ज्ञान हेतु या असाक्षात्कार के साक्षात्कार हेतु प्रयास न करने वाले होते हैं। उनके पीछे आनेवाली जनता भी उनका  ही अनुगमन करती है तथा वह इन उपर्युक्त दुर्गुणों से युक्त हो जाती है। भिक्षुओ! चतुर्थ धर्म सद्धर्म के नाश एवं लोप का कारक होता है।

“भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म के लोपक एवं नाशक होते हैं।

“भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होते हैं। कौन से चार? यहाँ, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु सुगृहीत सूत्रान्तों का,  सुव्यवस्थित पदों एवं व्यञ्जनों के साथ, प्रवचन करते हैं। किये गये इस प्रवचन से इन सूत्रान्तों का अर्थ भी सुगृहीत होता है। यह, भिक्षुओ! प्रथम धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु सौवचस्यकारक धर्मों से युक्त कर्णमधुर शब्दों से धर्म प्रवचन करते हैं। इस प्रकार वे धर्मानुशासन को भी दृढता प्रदान करतें हैं।भिक्षुओ! यह द्वितीय धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु बहुश्रुत, आगमज्ञ, धर्मधर, विनयधर एवं मातृकाधर होते हैं, वे सावधानी से सूत्रान्तों का प्रवचन करते हैं। इस कारण, उनभिक्षुओ के देहपात के बाद भी इस सद्धर्म का मूल उछिन्न नहीं होता तथा इसको आधार मिला रहता हैं। इस प्रकार यह तृतीय धर्म  भी सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं।

फिर, भिक्षुओ! कुछ भिक्षु स्थविर भिक्षु अपरिगृही, कर्तव्य में सावधान, कहीं भी लौकिक लाभार्थ में प्रवेश न करने वाले, एकान्तवास में उत्साही, अप्राप्त की प्राप्ति हेतु, अज्ञात के ज्ञान हेतु, तथा असाक्षात्कार के साक्षात्कार हेतु सतत प्रयास करने वाले होते हैं। उनके पीछे आनेवाली जनता भी उनका  ही अनुगमन करती है तथा वह इन उपर्युक्त सद्गुणों से युक्त रहती है। भिक्षुओ! यह चतुर्थ धर्म भी सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये कार्यकर होता हैं। “भिक्षुओ! ये चार धर्म  सद्धर्म की स्थिति, सत्ता एवं विद्यमानता के लिये अति आवश्यक हैं।[5]

सद्धर्म के लोप एवं स्थिरता के लिए केवल भिक्षु, भिक्षुणियाँ ही जिम्मेदार नहीं होते अपितु उपासक  उपासिकाएँ भी होते है,  इस संन्दर्भ में आयुष्मान् किमिल को मार्गदर्शन करते है–

एक समय भगवान् बुद्ध को आयुष्मान् किमिल ने प्रश्न पूछा कि- “भन्ते! क्या हेतु है, क्या प्रत्यय है कि तथागत के परिनिर्वाण प्राप्त करने पर सद्धर्म स्थिर नहीं हो पाता है?”

“क्योंकि, किमिल, तथागत के परिनिर्वृत होने पर भिक्षु भिक्षुणियाँ, उपासक उपासिकाएँ शास्ता के प्रति, धर्म के प्रति, संघ के प्रति, धर्मशिक्षा के प्रति, यहाँ तक कि परस्पर भी गौरवपूर्ण सम्मानजनक व्यवहार नहीं करते, उनके प्रति विद्रोह कर देते हैं। किमिल, यही कारण एवं यही प्रत्यय है कि तथागत के परिनिर्वृत होने पर सद्धर्म स्थिर नहीं हो पाता है”।

“पुन:, भन्ते! कौन हेतु या कौन प्रत्यय है कि तथागत के परिनिर्वृत होने पर सद्धर्म स्थिर रह सके?” “यहाँ किमिल, शास्ता के परिनिर्वृत होने पर भी भिक्षु भिक्षुणी, उपासक उपासिकाएँ शास्ता के प्रति, धर्म के प्रति, संघ के प्रति, धर्मशिक्षा के प्रति, यहाँ तक कि परस्पर भी गौरवपूर्ण व्यवहार करते हैं, उनके प्रति विद्रोह नहीं करते। किमिल, यही हेतु तथा प्रत्यय है कि शास्ता के परिनिर्वृत होने पर सद्धर्म बहुत काल तक स्थिर रह सकता है”। [6]

इन सूत्रों को यदि हम एकमात्र चेतावनी जान कर ध्यान दें तो न तो सद्धर्म का लोप होगा, अपितु वह स्थिरता रहेगा और उसके साये में भिक्षु, भिक्षुणियाँ, उपासक  एवं उपासिकायें भी सुख शांति से जियेंगें साथ बुद्ध का बहुजन हिताय बहुजन सुखाय का उद्देश्य भी सिद्ध होगा। jaywant khandare

 

सन्दर्भ

[1] (16.कस्सपसंयुत्तं 13. सद्धम्मप्पतिरूपकसुत्तं)

[2] (20. ओपम्मसंयुत्तं. 7. आणिसुत्तं)

[3] (अं. नि. दुकनिपात, 2. अधिकरणवर्ग, करणीय अकरणीय धर्म, पृ.85, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

[4] (अं. नि. 1. एककनिपात 10. द्वितीय प्रमादादिवर्ग, पृ.29, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

[5] (अं.नि. 2., 4.चतुक्कनिपात  16. इन्द्रियवग्गो, 10. सुगतविनयसुत्तं, पृ. 203, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

[6] (अं.नि. 2., 5. पञ्चक्कनिपात 21. किमिलवग्गो, 1. किमिलसुत्तं, पृ. 619, स्वामी द्वारिकादासशास्त्री)

(डॉ० जयवंत खंडारे) SRF, पालि,

रा० सं० सं०,  लखनऊ परिसर।

dhamm vs dharm

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for indepth reading please refer boks:

http://www.brill.com/buddhism-shadow-brahmanism

 

10,000 moolnivasi (called Dalits by MEDIA) in MP join Megh Sena to fight against ‘atrocities’…Hindustan Times,

megh-senaThousands of Dalit people have come together across Madhya Pradesh to become part of a group called the Megh Sena to fight against rising instances of caste violence and discrimination in the state.

 Officials said 10,000 Dalit persons have joined the state chapter of the Megh Sena this month to fight against upper caste oppressors legally and socially, and work for the uplift of the community through providing education in a state that has seen 4,151 cases of crime against scheduled castes in 2014.

The Megh Sena’s state chapter was launched on January 3, over nine years after it was conceived by the Rashtriya Sarv Meghvansh Mahasabha (India) in Jaipur to work for the welfare of Dalit communities.

“Till now, we have formed the Sena in some parts of Nimar region, including Neemuch , Rajgarh, Ratlam and Shajapur districts but in next one year every district of Madhya Pradesh will have our Megh Sena unit,” said Gopal Denwal , president of the Rashtriya Sarv Meghvansh Mahasabha.

Workers have united under the slogan “Apna Danda, Apni Topi and Apna Jhanda” to counter any cases of caste atrocities or discrimination.

“If any Dalit atrocity takes in place in any village of MP, we are informed within hours and we inform the local police and administration about the incident. Ours local representative reaches the spot along with others and then provides help legally and socially to the family. If the matter is grave they live with the family till the situation gets normal,” he said.

Every member of the Sena was called as “commando” and the respective heads as “commandant” in a district.

“We also orgainsed a road show just like “Path Sanchalan, to show our unity and power in many parts of Rajasthan and now we will do it in MP,” he added. The Sena has already attracted over 100,000 people across India, including Madhya Pradesh, Harayana, Rajasthan, Punjab and Gujarat.

“The aim is to help community members who face atrocity through law and police,” said Babu Lal Thawalia, Ujjain resident and president of the Madhya Pradesh chapter of the Megh Sena.

The Sena also has other wings such as the Mahila Wing, Youth Wing, Abhav Abhiyog Wing, Students’ Wing, Media Wing and Panch Patidar Wing. Each Sena member processes a directory of all senior police and administrative officers of the state.

http://www.hindustantimes.com/indore/10-000-dalits-in-mp-join-megh-sena-to-fight-against-atrocities/story-qkm0Dt0zT9mzzxF8Uzo3YJ.html

मेघ सेना राजस्थान (भारत ) megh sena rajasthan (india)

हमारे उद्देश्य: – मेघवाल समुदाय समृद्ध सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, मानसिक और सांस्कृतिक. मृत्यु भोज, शराब दुरुपयोग, बाल विवाह, बहुविवाह, दहेज, विदेशी शोषण, अत्याचार और समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं पर अपराधों को रोकने के लिए और समाज के कमजोर लोगों का समर्थन की तरह प्रगति में बाधा कार्यों से छुटकारा पाने की कोशिश करो. Meghwal Be educated society; stay organized; do progress;

भारत में कई सामाजिक और धार्मिक सेनाएँ बनी हैं. इन्हीं में एक नाम और जुड़ा है ‘मेघ सेना’ का. मेघवाल समाज का संगठन रजिस्टर्ड है और इसकी उपविधि भी है. मेघ सेना इसी की एक इकाई है. 07-02-2009 को राजस्थान में मेघ सेना का गठन हुआ. इसके लिए मेघवाल समाज की एक बैठक की गई जिसमें प्रदेश कार्यकारिणी और ज़िला केंद्र बनाए गए. इसी बैठक में मेघ सेना का ड्रेस कोड और वर्दी निर्धारित की गई. 04-07-2009 को प्रदेश कार्यकारिणी की प्रथम बैठक हुई जिसमें सभी ज़िलों के मेघ सैनिक आमंत्रित किए गए. तारीख़ 31-10-2009 को जयपुर में मेघ सेना का प्रथम फ्लैग मार्च किया गया. फ्लैग मार्च के बाद एक बैठक की गई जिसमें यह संकल्प पास किया गया कि विभिन्न नामों से जानी जाने वाली सभी मेघवंशी जातियों का आपसी संपर्क बढ़ाया जाए और उन्हें एक सूत्र में बाँधा जाए.

इसी सिलसिले में दिनाँक 01-11-2009 को राष्ट्रीय सर्वमेघवंश महासभा का गठन किया गया. इसमें भारत के विभिन्न राज्यों से आए प्रतिनिधियों ने भाग लिया. यह बैठक होटल इंडियाना क्लासिक, जयपुर में की गई. इसमें तय किया गया कि मेघवंशी जातियों के विभिन्न संगठनों को एक मंच पर लाने का कार्य शीघ्र निष्पादित किया जाए. कार्यकारिणी बनाई गई. प्रदेश अध्यक्षों के चयन का निर्णय लिया गया. संकल्प पास किया गया कि मेघवंश समाज की विभिन्न जातियों के संगठनों से संपर्क बढ़ा कर उन्हें राष्ट्रीय मेघवंश मंच से जोड़ा जाए और साथ ही मेघ सेना को राष्ट्रीय स्तर पर संगठित किया जाए.

इसी दिन महिला विंग का गठन किया गया जिसकी अध्यक्षा श्रीमती प्रमिला कुमार (हाईकोर्ट की रिटायर्ड जज और कंज़्यूमर स्टेट फोरम की चेयरपर्सन) हैं. यूथ विंग भी गठित किया गया और श्री नरेंद्र पाल मेघवाल को इसके अध्यक्ष बनाया गया.

21-03-2010 को राष्ट्रीय सर्वमेघवंश महासभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई जिसमें एक फिल्म के निर्माण का फैसला लिया गया ताकि मेघवंशीय संगठनों में एकता की प्रक्रिया तेज़ की जा सके. इसकी पटकथा और गीत लिखे जा चुके हैं. निर्माण की कार्रवाई चल रही है.

दिनाँक 04-07-2010 को कार्यकारिणी और प्रदेशाध्यक्षों की बैठक हुई. तय हुआ कि प्रत्येक प्रांत में सम्मेलन आयोजित किए जाएँ. उक्त योजना के तहत नवंबर और दिसंबर 2010 में पंजाब, राजस्थान (श्रीगंगानगर), हरियाणा (हिसार) और मध्य प्रदेश में उज्जैन या मंदसौर में सम्मेलन आयोजित किए जाएँगे.

विशेष टिप्पणी: भारत में कई सेनाओं का गठन हुआ है. कुछ ने सामाजिक कार्य किया और कुछ हिंसात्मक गतिविधियों का पर्याय बन गईं और कुछ राजनीतिक पार्टियों का महत्वपूर्ण अंग बनीं. मेघ सेना अभी स्वरूप ले रही है. इसकी भूमिका का मूल्यांकन अभी कुछ वर्ष बाद ही हो पाएगा. जहाँ तक मेघवाल समाज का प्रश्न है मेरी जानकारी में है कि इस समाज के लोगों को बारात के मौके पर घोड़ी या कार का प्रयोग नहीं करने दिया जाता. यह गाँवों में होता है. दूल्हे को घोड़ी से उतार कर पीटने या बारात पर पत्थर फेंकने की कई घटनाएँ रपोर्ट हो चुकी हैं. मीडिया ऐसा करने वालों को ‘दबंग’ जैसे शब्दों से महिमा मंडित करने का कार्य अनजाने में कर डालता है. शिक्षित वर्ग इस विषय में एक मत होगा कि किसी की बारात पर पत्थर फेंकना वास्तव में संवेदनहीन और अनपढ़ लोगों का कार्य होता है.

http://mandusiya.blogspot.jp/2011/07/megh-sena-rajasthan-india.html

मेघ सेना का पथ संचलन

  • Matrix News Dec 22, 2012, 06:02 AM IST

आहोर -!- राजस्थान प्रदेश मेघ सेना के तत्वावधान में २३ दिसंबर को जयपुर में होने वाली मेघवाल समाज की महापंचायत एवं मेघ सेना पथ संचलन में भाग लेने को लेकर मेघ सेना के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं ने गांव गांव व घर घर जाकर ग्रामीणों से आह्वान किया। मेघ सेना के जिलाध्यक्ष भंवरलाल लखावत ने बताया कि आहोर ब्लॉक के चांदराई, भूती, कवराड़ा, वलदरा व रोडला सहित दर्जनों गांवो में जाकर मेघवाल समाज के लोगों से जन संपर्क किया। इस दौरान राजेन्द्र, मंगलाराम, मोहनलाल, जगदीश, भूपेंद्र नारवणा व मांगीलाल सहित कई जने मौजूद थे।

http://www.bhaskar.com/news/RAJ-OTH-c-97-64658-NOR.htmlmeghsena6

एक पंडित/ब्राह्मण: के धर्म, आत्मा, ईश्वर और धम्म पर सवाल और तथागत गौतम बुद्ध के जवाब|धम्म मार्ग के परिचय के लिए इस वार्तालाप को पढ़ना बहुत उपयोगी होगा

brahman vs buddhaगौतम बुद्ध से ज्ञान पाने या ज्ञान का मुकाबला करने की नियत से बहुत से ब्राह्मण आते रहते थे| ऐसे ही एक ब्राह्मण/पंडित का गौतम बुद्ध से निम्न वार्तालाप धम्म मार्ग के परिचय के लिए  पढ़ना बहुत उपयोगी होगा

 

एक बार तथागत गौतम से  एक  ब्राह्मण  ने पूछा

ब्राह्मण:   – “आप सब लोगो को ये बताते है के आत्मा  नहीं, स्वर्ग नहीं, पुनर्जन्म नहीं। क्या यह सत्य है?”

गौतम बुद्ध:-   – “आपको ये किसने बताया के मैंने ऐसा कहा?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं ऐसा किसी ने बताया नहीं।”

गौतम बुद्ध:-   — “फिर मैंने ऐसे कहा ये बताने वाले व्यक्ति को आप जानते हो??

ब्राह्मण:-   – “नहीं।”

गौतम बुद्ध:-   — “मुझे ऐसा कहते हुए आपने कभी सुना है?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत, पर लोगो की चर्चा सुनके ऐसा लगा। अगर ऐसा नहीं है तो आप क्या कहते है?”

गौतम बुद्ध:-   — “मैं कहता हु के मनुष्य ने वास्तविक सत्य स्वीकारना चाहिए।”

ब्राह्मण:-   – “मैं समज़ा नहीं तथागत, कृपया सरलता में बताइये।”

गौतम बुद्ध:-   — “मनुष्य को पांच बाह्यज्ञानेंद्रिय है। जिसकी मदत से वह सत्य को समाज सकता है।”

1)आँखे- मनुष्य आँखों से देखता है।

2)कान- मनुष्य कानो से सुनता है।

3)नाक- मनुष्य नाक से श्वास लेता है।

4)जिव्हा- मनुष्य जिव्हा से स्वाद लेता है।

5)त्वचा- मनुष्य त्वचा से स्पर्श महसूस करता है।

इन पांच ज्ञानेन्द्रियों में से दो या तिन ज्ञानेन्द्रियों की मदत से मनुष्य सत्य जान सकता है।

 

ब्राह्मण:-   – “कैसे तथागत?”

गौतम बुद्ध:-   — “आँखों से पानी देख सकते है, पर वह ठण्डा है या गर्म है ये जानने के लिए त्वचा की मदत लेनी पड़ती है, वह मीठा है या नमकीन ये जानने के लिए जिव्हा की मदत लेनी पड़ती है।

ब्राह्मण:-   – “फिर भगवान है या नहीं इस सत्य को कैसे जानेंगे तथागत?”

गौतम बुद्ध:-   — “आप वायु को देख सकते है?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “इसका मतलब वायु नहीं है ऐसा होता है क्या?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “वायु दिखती नहीं फिर भी हम उसका अस्तित्व नकार नहीं सकते, क्यू की हम वायु को ही हम साँस के द्वारा अंदर लेते है और बाहर निकलते है। जब वायु का ज़ोक़ा आता है तब पेड़-पत्ते हिलते है, ये हम देखते है और महसूस

करते है।अब आप बताओ भगवान हमें पांच ज्ञानेन्द्रियों से महसूस होता है?

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “आपके माता पिता ने देखा है, ऐसे उन्होंने आपको बताया है?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “फिर परिवार के किसी पुर्वज ने देखा है, ऐसा आपने सुना है?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “मैं यही कहता हु, के जिसे आजतक किसी ने देखा नहीं, जिसे हमारी ज्ञानेन्द्रियों से जान नहीं सकते, वह सत्य नहीं है इसलिए उसके बारे में सोचना व्यर्थ है।”

ब्राह्मण:-   – “वह ठीक है तथागत, पर हम जिन्दा है इसका मतलब हमारे अंदर आत्मा है, ये आप मानते है या नहीं?”

गौतम बुद्ध:-   – “मुझे बताइये, मनुष्य मरता है, मतलब क्या होता है?”

ब्राह्मण:-   – “आत्मा शारीर के बाहर निकल जाती है, तब मनुष्य मर जाता है।”

गौतम बुद्ध:-   – “मतलब आत्मा नहीं मरती है?”

ब्राह्मण:-   – “नहीं तथागत, आत्मा अमर है।”

गौतम बुद्ध:-   – “आप कहते है आत्मा कभी मरती नहीं, आत्मा अमर है। तो ये बताइये आत्मा शारीर छोड़ती है या शारीर आत्मा को??”

ब्राह्मण:-   – “आत्मा शारीर को छोड़ती है तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “आत्मा शारीर क्यू छोड़ती है?”

ब्राह्मण:-   – “जीवन ख़त्म होने के बाद छोड़ती है।”

गौतम बुद्ध:-   – “अगर ऐसा है तो मनुष्य कभी मरना नहीं चाहिए। दुर्घटना, बीमारी, घाव लगने के बाद भी बिना उपचार के जीना चाहिए। बिना आत्मा के मर्ज़ी के मनुष्य नहीं मर सकता।”

ब्राह्मण:-   – “आप सही कह रहे है तथागत। पर मनुष्य में प्राण है, उसे आप क्या कहेंगे?”

गौतम बुद्ध:-   – “आप दीपक जलाते है?”

ब्राह्मण:-   – “हा तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “दीपक याने एक छोटा दिया, उसमे तेल, तेल में बाती और उसे जलाने के लिए अग्नि चाहिए, बराबर?”

ब्राह्मण:-   – “हा तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “फिर मुझे बताइये बाती कब बुज़ती है?”

ब्राह्मण:-   – “तेल ख़त्म होने के बाद दीपक बुज़ता है तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “और?”

ब्राह्मण:-   – “तेल है पर बाती ख़त्म हो जाती है तब दीपक बुज़ता है तथागत।”

गौतम बुद्ध:-   – “इसके साथ तेज वायु के प्रवाह से, बाती पर पानी डालने से, या दिया टूट जाने पर भी दीपक बुज़ सकता है।अब मनुष्य शारीर भी एक दीपक समज़ लेते है, और प्राण मतलब अग्नि यानि ऊर्जा। सजीवों का देह चार तत्वों से बना है।

1) पृथ्वी- घनरूप पदार्थ यानि मिटटी

2) आप- द्रवरूप पदार्थ यानि पानी, स्निग्ध और तेल

3) वायु- अनेक प्रकार की हवा का मिश्रण

4) तेज- ऊर्जा, ताप, उष्णता

इसमें से एक पदार्थ अलग कर देंगे ऊर्जा और ताप का निर्माण होना रुक जायेगा,मनुष्य निष्क्रिय हो जायेगा। इसे ही मनुष्य की मृत्यु कहा जाता है।इसलिये आत्मा भी भगवान की तरह अस्तित्वहीन है।यह सब चर्चा व्यर्थ है। इससे धम्म का समय व्यर्थ हो जाता है।”

ब्राह्मण:-   – “जी तथागत, फिर धम्म क्या है और इसका उद्देश्य क्या है?”

गौतम बुद्ध:-   – “धम्म का मतलब अँधेरे से प्रकाश की और ले जाने वाला मार्ग है।

धम्म का उद्देश्य मनुष्य के जन्म के बाद मृत्यु तक कैसे जीवन जीना है इसका मार्गदर्शन करना है।

जीवन के सूत्रों को समझना और उनके उपयोग से जीवन से दुःख दूर करने का मार्ग है धम्म|

प्रकृति के नियमों की समझ और उसके हिसाब से जीवन के दुखों का समाधान का मार्ग है धम्म, प्रकृति की पूजा से धम्म नहीं|

धम्म जिज्ञासाओं को काल्पनिक धार्मिक कहानियों द्वारा मारना नहीं, धम्म जानने का खोजने का नाम है विज्ञानं है|

धम्म का आधार अनुभव है आस्था या अंधभक्ति नहीं,धम्म जानने के बाद मानने में है आस्था में नहीं|

धम्म मानव को मानव और जीवों का सहारा बनाने में है, धम्म अपना सहारा खुद बनने में है न ही किसी देवकृपा के इंतज़ार में बैठे रहने में है|

दुःख दो प्रकार के होते हैं एक प्राकृतिक दूसरा मानव निर्मित, प्राकृतिक दुःख का इलाज तो आपके तथाकथित ईश्वर के पास भी नहीं वो भी रोकने में असमर्थ है तो  फिर ईश्वर भक्ति क्यों? धम्म मानव निर्मित दुखों का समाधान है क्यों हमारे जीवन में प्राकृतिक दुःख एक तालाब के सामान हैं पर मानव निर्मित दुःख समुन्द्र के सामान | मतलब दुखों का सबसे बड़ा हिस्सा मानव निर्मित है जैसे सामाजिक जातिगत बटवारा, असमान आर्थिक बटवारा, गलत राजनीती, गलत व्तक्तिगत आदतें, बीमारियां, धार्मिक सोच,चलन और दमन आदि|

 

धम्म का  प्रथम सूत्र है हर चीज़ से बड़ा है न्याय, तथाकथित ईशर से भी बड़ा, न्याय व्यस्था ही धम्म है| क्या गुलामी और शोषण के बदले आप ईश्वर लेना चाहोगे?

जन्म से मृत्यु के बीच सभी जीवों का जीवन सुखमय बनाना ही धम्म का अंतिम लक्ष्य है|

 

ब्राह्मण:-   – मैं धन्य हुआ आपने मेरी आँखे खोल दीं, आपसे बात करके मेरा धार्मिक ज्ञान का, श्रेस्टता का अहंकार जाने कहाँ गायब हो गया, बड़ा मुक्त और हल्का महसूस कर रहा हूँ, अपना परया का भ्रम दूर हुआ, सब आपने से लगने लगे| आपसे ज्ञान पा मेरा जीवन धन्य हुआ

 

Ravish Kumar News Anchor Speech On National Dastak Launching Ceromeny

 

Published on 29 Dec 2015

National Dastak“Launching Ceremony” FICCI Auditorium,December 20th

Ravish Kumar (born 5 December 1974) is an Indian TV anchor,writer and journalist who covers topics pertaining to Indian politics and society.[3] He is the senior executive editor at NDTV India,[4] the Hindi news channel of the NDTV news network and hosts a number of programmes including the channel’s flagship weekday show Prime Time,[5] Hum Log[6] and Ravish Ki Report.
During the 2014 Lok Sabha elections, he did extensive field interviews in several north-Indian states about the opinions and needs of the people on the ground highlighting aspects of rural and sub-urban life which do not receive much attention in television-based network news .

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  • यदि आप जागरूक नहीं हो अयोग्य व्यक्ति आपपर शाशन करेंगे, जैसी जनता की विचारधारा होती है उसे वैसे शाशक मिल जाते हैं और जैसे शाशक होते हैं वैसी विचारधारा समाज में फ़ैल जाती है| आज ऐसा माहौल है की अगर आप सही बात भी बोलते हो पर वो दबंगों को सही नहीं लगती तो आपको देश द्रोही का सर्टिफिकेट देते देर नहीं करेंगे, गली देंगे, बहिष्कार करेंगे, मार पीट, करेंगे दादरी जैसी हालत की धमकी देंगे और शायद कर भी सकते यहीं| मतलब हिंसक भीड़ को जनता कैसे मान्यता दे रही है समझ में नहीं आ रहा|