ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही

dhyam meditation” ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही ,,
ध्यान की विधि के लिए अक्सर लोग पूछते है की ध्यान की क्या विधि होती ध्यान क्या होता है ! ध्यान कैसे करे ?
जिस क्रत्यो से कुछ पाया जाता है उसकी विधि होती है या विज्ञानं के लिए विधि होती है! कुछ पकड़ना है उसकी विधि होती है ! और कुछ भी नहीकरने की और देखने की कोई विधि नही होती है वह किसी और को नही स्वयम को ही देखना है!

लेकिन देखने भाषा ठीकभी नही है क्योकि लोग जो अपने कोसमझते वाहीदेखने लगते है ,जो शरीर के तल पर खड़ा है वह अपने शरीर को देखना ध्यान समझ लेता है , हमारा स्वयम की मन कीउर्जा की सूक्ष्म हलचल को देखना ध्यान है! ध्यान की कोई प्रमाणिक विधि नही है! जिस कृत्य से कुछ मिलता नही वह ध्यान है ! ध्यान का कृत्य कृष्ण की गीता का निष्काम कर्म समझो ! ध्यान मे नाचना ,कूदना रोना ,हसना दोड़ना , चिलाना,पागल जैसी हरकते करना और जिसकी कोई विधि नही होती है इन क्रत्यो में आनन्द भी नही मिलेगा यह तुम्हारी मनोस्थ्ती पर निर्भर है ! इन क्रत्यो से न धन मिलता नही प्रसिध्ही मिलती है और नही कोई पद मिलता है न कोई पुन्य मिलता है ! जो जरूरत से जायदा है वह खो जाता है जो नही है वह प्रकट हो जाता है ! ध्यान समय के साथ होने की मनोस्थ्ती है आनन्द मिलता है लेकिन वह भी आपका उस के लिए अपने भाव पर निर्भर है! उसकी भी कोई गारंटी नही है ! और सामान्य व्यक्ति की सोच ही यही होती है की जिसे कृत्य से कुछ भी नही मिलता हो वे कृत्य क्यों करे ?

सामान्य लोग बिना फल की प्राप्ति बिना कुछ भी करने को तेयार नही होते है ! सामान्य हमेशा कर्म का मूल्याकन करता है ! इसलिए सामान्य लोगो के लिए ध्यान का कोई मूल्य नही है ! सामान्य व्यक्ति को धर्मकर्मकांड करवाने केलिए बड़े बड़े पुन्य सर्वग के सपने दिखाने पड़ते है लोभ देना होता है, तब वे जा कर धार्मिक कर्म कांड करेंगे ! तब बिना सपने बिना लोध केलिए सामान्य लोगो को कहा जाय की कुछ भी नही मिलेगा लेकिन तुम तीर्थ यात्रा करो हवन करो भजन पूजा पाठ करो तब वे बिना सपने, बिना फल के लिए कुछ भी नही करेगे !


धार्मिक कर्म कांड और ध्यान के लिए किये गए कृत्य में यही बड़ा अंतर होता है ,धर्मकर्म कांड में फल लोभ का लक्ष्य मुख्य होता है!
ध्यान की विज्ञानंमें यहा मन और उर्जा की दिशा को मोड़ने एवं परिवर्तन करने का सबसे बड़ा माध्यम है धयन !यह उर्जा को नई दिशा देने की आधुनिक साधना है और जिसको अपने मन और उर्जा को नई दिशा देने की कला मिल जाती है ध्यान से धन्य हो जाता है धनवान नही!

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कल मैंने एक बौद्ध धम्म से हुई शादी अटेंड की, वहां पर भंते दर्शनदीप ने जिस तरह जिस मिशनरी ज्ञान से शादी करवाई वो वाकई कबीले तारीफ थी. मैंने उनका नंबर लिया वो दिल्ली, आगरा बेल्ट, और एटा इटावा मैनपुरी बेल्ट में सक्रिय हैं| जरूरत पड़े तो बुलाना, उनके नंबर हैं: 8375002872, 8979968939

कल मैंने एक बौद्ध धम्म से हुई शादी अटेंड की, वहां पर भंते दर्शनदीप ने जिस तरह जिस मिशनरी ज्ञान से शादी करवाई वो वाकई  कबीले तारीफ थी. मैंने उनका नंबर लिया वो दिल्ली, आगरा बेल्ट, और एटा इटावा मैनपुरी बेल्ट में सक्रिय हैं| जरूरत पड़े तो बुलाना, उनके नंबर हैं: 8375002872, 8979968939

सन्त गाडगे महाराज को उनके जन्मदिवस 23 फरवरी पर शत-शत नमन। वे कहते थे ”शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिये कम दाम के कपड़े खरीदो। टूटे-फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिये बिना न रहो।”….LALA BAUDH

बुधवार, 23 फरवरी, 1876 को सन्त गाडगे महाराज का जन्म हुआ था। gagde maharaj



सन्त गाडगे महाराज

आज 23 फरवरी है. बुधवार, 23 फरवरी, 1876 को सन्त गाडगे महाराज का जन्म हुआ था। सन्त गाडगे महाराज को उनके जन्मदिवस पर शत-शत नमन।

आधुनिक भारत को जिन महापुरूषों पर गर्व होना चाहिए, उनमें राष्ट्रीय सन्त गाडगे बाबा का नाम सर्वोपरि है। मानवता के सच्चे हितैषी, सामाजिक समरसता के द्योतक यदि किसी को माना जाए तो वे थे संत गाडगे। वास्तव में गाडगे बाबा के जीवन, उनके कार्यों तथा उनके विचारों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। हम समाज और राष्ट्र को काफी कुछ दे सकते हैं। गाडगे बाबा ने अपने जीवन, विचार एवं कार्यों के माध्यम से समाज और राष्ट्र के सम्मुख एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया, जिसकी आधुनिक भारत को वास्तव में महती आवश्यकता है।

महाराष्ट्र सहित समग्र भारत में सामाजिक समरता, राष्ट्रीय एकता, जन जागरण एवं सामाजिक क्राँति के अविरत स्रोत के वाहक संत गाडगे बाबा का जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के खासपुर गाँव में धोबी परिवार में हुआ था। बाद में खासपुर गाँव का नाम बदल कर शेणगाव कर दिया गया। गाडगे बाबा का बचपन का नाम डेबूजी था। इस प्रकार उनका पूरा नाम डेबूजी झिंगराजी जाणोरकर था। उनके पिता का नाम झिंगरजी माता का नाम साखूबारई और कुल का नाम जाणोरकर था। गौतम बुद्व की भाति पीड़ित मानवता की सहायता तथा समाज सेवा के लिये उन्होनें सन 1905 को गृहत्याग किया। एक लकड़ी तथा मिटटी का बर्तन जिसे महाराष्ट्र में गाडगा (लोटा) कहा जाता है, लेकर आधी रात को घर से निकल गये। दया, करूणा, भ्रातृभाव, सम-मैत्री, मानव कल्याण, परोपकार, दीनहीनों की सहायता आदि गुणों के भण्डार बुद्व के आधुनिक अवतार डेबूजी सन 1905 मे गृहत्याग से लेकर सन 1917 तक साधक अवस्था में रहे।

महाराष्ट्र सहित सम्पूर्ण भारत उनका सेवा-क्षेत्र था। गरीब उपेक्षित एवं शोषित मानवता की सेवा ही उनका धर्म था।ambedkar with gadge

गाडगे बाबा शिक्षा को मनुष्य की अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित करते थे। अपने कीर्तन के माध्यम से शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये वे कहते थे ”शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिये कम दाम के कपड़े खरीदो। टूटे-फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिये बिना न रहो।”

बाबा ने अपने जीवनकाल में लगभग 60 संस्थाओं की स्थापना की और उनके बाद उनके अनुयायियों ने लगभग 42 संस्थाओं का निर्माण कराया। उन्होनें कभी कहीं मन्दिर निर्माण नहीं कराया अपितु दीनहीन, उपेक्षित एवं साधनहीन मानवता के लिये स्कूल, धर्मशाला, गौशाला, छात्रावास, अस्पताल, परिश्रमालय, वृद्धाश्रम आदि का निर्माण कराया। उन्होंने अपने हाथ में कभी किसी से दान का पैसा नहीं लिया। दानदाता से कहते थे दान देना है तो अमुक स्थान पर संस्था में दे आओ।

बाबा अपने अनुयायिययों से सदैव यही कहते थे कि मेरी जहां मृत्यु हो जाय, वहीं पर मेरा अंतिम संस्कार कर देना, मेरी मूर्ति, मेरी समाधि, मेरा स्मारक मन्दिर नहीं बनाना। मैने जो कार्य किया है, वही मेरा सच्चा स्मारक है। जब बाबा की तबियत खराब हुई तो चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी किन्तु वहां पहुचने से पहले बलगाव के पास पिढ़ी नदी के पुल पर 20 दिसम्बर 1956 को रात्रि 12 बजकर 20 मिनट पर बाबा की जीवन ज्योति समाप्त हो गयी। जहां बाबा का अन्तिम संस्कार किया गया। आज वह स्थान गाडगे नगर के नाम से जाना जाता है।

वस्तुस्थिति तो यह है कि महाराष्ट्र की धरती पर समाज सेवक संत महात्मा, जन सेवक, साहित्यकार एवं मनीषी जन्म लेंगे परन्तु मानव मात्र को अपना परिजन समझकर उनके दु:खदर्द को दूर करने में अनवरत रूप से तत्पर गाडगे बाबा जैसा नि:स्पृह एवं समाजवादी सन्त बड़ी मुशिकल से मिलेगा क्योंकि रूखी-सूखी रोटी खाकर दिन-रात जनता जनार्दन के कष्टों को दूर करने वाला गाडगे सदृश जनसेवी सन्त कम ही पैदा होते हैं।

मानवता के पुजारी दीनहीनों के सहायक संत गाडगे बाबा में उन सभी सन्त्तोचित महान गुणों एवं विशेषताओं का समावेश था, जो एक मानवसेवी राष्ट्रीय सन्त की कसौटी के लिये अनिवार्य है।

आज भी सन्त गाडगे अपने कार्यों के कारण अमर हैं.lala baudh

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ब्राह्मणवाद से बचाने वाले व जीवन सुधारने वाले सूत्र देने वाले बोधिसत्व गुरु रैदास बौद्ध परम्परा के ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं ….बुद्धप्रिय

कहे रविदास सुनो भई सन्तो ब्राह्मण के गुण तीन मान हरे , धन हरे और मति ले छीन

बोधिसत्व गुरु  रैदास बौद्ध परम्परा के ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं Written by : बुद्धप्रिय Date : 2016-02-22sant ravidas
रायबरेली। चौदह सौ तैंतीस की माघ सुदी प्रदास।

दुखियों के कल्याण हित प्रकटे श्री रैदास।

माघी पूर्णिमा के दिन वाराणसी के सिर गोवर्धन नामक बस्ती में श्री रघुजी व मां करमाबाई की कोख से भारतभूमि पर संत रैदास का आविर्भाव हुआ. तुकाराम, नरसी-दादू, मेहता, गुरूनानक, कबीर, चोखा मेला, पीपादास, इन सभी मध्यकालीन सन्तों में प्रवर सदगुरू रैदास का स्थान श्रेष्ठ है.

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है. इस संस्कृति को जीवन्त रखने में भक्तिकाल या सन्त परम्परा का विशेष योगदान है. चेतना, जन आन्दोलन, समतामूलक समाज की परिकल्पना, मानव सेवा आदि क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए सन्त शिरोमणि रैदास का नाम बड़े आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता है. बोधिसत्व रैदास सामाजिक सुधार के लिए जीवन पर्यन्त जूझते तथा रचनात्मक प्रयत्न करते रहे. सामाजिक समानता, समरसता लाने के लिए वो अपनी वाणियों के माध्यम से तत्कालीन शासकों को भी सचेत करते रहे. घृणा और सामाजिक प्रताड़नाओं के बीच सन्त रैदास ने टकराहट और भेदभाव मिटाकर प्रेम तथा एकता का संदेश दिया. उन्होंने जो उपदेश दिये दूसरों के कल्याण व भलाई के लिए दिये और उनकी चाहत एक ऐसा समाज की थी जिसमें राग, द्वेष, ईर्ष्या, दुख, कुटिलता का समावेश न हो. संत शिरोमणि रैदास कहते हैं:-

ऐसा चाहूं राज्य मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।

छोट, बड़ों सभ सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।

वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता सदगुरू रैदास की एक वैज्ञानिक सोच हैं, जो सभी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता देखते हैं। स्वराज ऐसा होना चाहिए कि किसी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो, एक साम्यवादी, समाजवादी व्यवस्था का निर्धारण हो इसके प्रबल समर्थक संत रैदास जी माने जाते हैं. उनका मानना था कि देश, समाज और व्यक्ति की पराधीनता से उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है. पराधीनता से व्यक्ति की सोच संकुचित हो जाती है. संकुचित विजन रखने वाला व्यक्ति बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय की यथार्थ को व्यवहारिक रूप प्रदान नहीं कर सकता है. वह पराधीनता को हेय दृष्टि से देखते थे और उनका मानना था कि तत्कालीन समाज व लोगों को पराधीनता से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए.

सन्त रैदास के मन में समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति आक्रोश था. वह सामाजिक कुरीतियों, वाह्य आडम्बर एवं रूढ़ियों के खिलाफ एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की मांग करते थे. उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा नहीं होगी, वैचारिक विमर्श नहीं होगा. और जब तक यथार्थ की व्यवहारिक पहल नहीं होगी, तब तक इंसान पराधीनता से मुक्ति नहीं पा सकता है.

भारत की सरजमीं पर सदियों से जातिवादी व्यवस्था का प्राचीन इतिहास रहा है. जातिवादी व्यवस्था में मनुष्य एवं मनुष्य के बीच झूठा अलगाव उत्पन्न करके मानवता की हत्या कर दी गयी थी. जातिवादी व्यवस्था के पोषकों द्वारा देश या समाज हित में कोई भी क्रान्तिकारी कार्यक्रम ही नहीं दिये गये. इस कुटिल व्यवस्था के रोग को सदगुरू रैदास ने पहचाना. उन्होंने मानव एकता की स्थापना पर बल दिया. उनका मानना था कि जातिवादी व्यवस्था को बगैर दूर किये देश व समाज की उन्नति सम्भव नहीं है. ओछा कर्म और परम्परागत जाति व्यवस्था को रैदास ने धिक्कारा है. वह कहते थे कि मानव एक जाति है. सभी मनुष्य एक ही तरह से पैदा होते हैं. मानव को पशुवत जीवन जीने के लिए बाध्य करना कुकर्म की श्रेणी में आता है. कुकर्म से मनुष्य बुरा बनता है औक सत्कर्म से मनुष्य श्रेष्ठ बनता है. जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को रैदास ने नकार दिया. उन्होंने कर्म प्रधान संविधान को अपने जीवन में सार्थक किया. सन्त रैदास ने सामाजिक परम्परागत ढांचे को ध्वस्त करने का प्रयास किया. रैदास कहते हैं:-

रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जेऊ होवे गुणहीन।

पूजहिं चरण चंडाल के जेऊ होवें गुण परवीन।।

इस वैज्ञानिक विचारधारा से तत्कालीन प्रभाव से समाज को मुक्ति मिली और आज भी इस विचारधारा का लाभ समाज को मिलता दिखाई दे रहा है. बल्कि 21वीं सदी में इसकी सार्थकता और भी बढ़ गयी है. समाज सुधार की आधारशिला व्यक्ति का सुधार है. सबसे पहले व्यक्ति को नैतिक दृष्टि से सीमाओं से ऊपर उठकर विवेक, बुद्धि आदि इस्तेमाल करना चाहिए, तभी समाज उन्नत हो सकेगा. व्यक्तिगत सद्चरित्रता, स्वच्छता तथा सरलता पर ध्यान देना चाहिए.

अपनी क्रान्तिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युग बोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण उनका धम्म दर्शन लगभग 600 वर्ष बाद आज भी प्रासंगिक है. सन्त रैदास अपने समय से बहुत आगे थे. लोग उन्हें समझ नहीं पाये और न ही उनके कथनानुसार योजनाबद्ध तरीके से कोई कार्य कर पाये, जिससे सामाजिक या राजनैतिक क्रान्ति हो सके. वह समतामूलक समाज की कल्पना करते थे और मानते ते कि यह तभी संभव है जब सभी के सुख-दुःख का ख्याल रखा जाए. अज्ञानता के कारण प्रभाव स्थापित करने में लोग विभेद करते हैं. रैदास कहते हैं कि सभी जन एक ही मिट्टी के बने हैं और सभी के लिए ज्ञान का मार्ग खुला हुआ है.

अज्ञानता के आकाश को छूता समाज निजी स्वार्थ की पूर्ति में लीन था. एक-दूसरे में बैर भाव पैदा करके उसकी धन सम्पत्ति छीन ली जाती थी. अन्याय, अत्याचार, शोषण का चारों तरफ बोलबाला था. इन विषम परिस्थितियों में भी रैदास ने कभी किसी धन का अतिक्रमण नहीं किया. उन्होंने निःस्वार्थ रूप से जनता की भलाई की और धन संचय की प्रवृत्ति को कष्ट का कारण भी बताया रैदास कहते हैं:-

धन संचय दुःख देत है, धन मति तिआगे सुख होई।

रविदास सीख गुरूदेव की धन मति जौर कोइ।।

उपरोक्त दोहे के जरिए रविदास जी ने धन लोलुपता, संचय और असंतोष आदि अवगुणों को दूर करने का मार्ग प्रशस्त किया. उन्होंने श्रम की महत्ता को बताया. उन्होंने आडम्बर पर भी करारा प्रहार किया. समाज को पथभ्रष्ट करने वाले पोंगापंथियों से सावधान रहने का सन्देश दिया और वाह्य आडम्बर, ढ़कोसला, परम्परा, रूढ़ियों, मूर्ति पूजा आदि का खण्डन किया. केवल दिखावा करके समाज को गुमराह करना, धोखा के अलावा कुछ नहीं है. इस प्रकार के बहुरूपीयेपन को दूर करके ही एक वैज्ञानिक मार्ग की दिशा व दशा का निर्धारण सम्भव हो सकता है. इसी सोच के कारण उन्होंने परम्परा, कट्टरता, हठधर्मिता और रूढ़ियों का परित्याग कर एक समन्वय विचारधारा का निर्धारण किया, जिससे हिन्दू मुस्लिम संस्कृति की विशाल खाई को पाटने में सहायता मिली. उन्होंने भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश को भावनात्मक एकता का संदेश दिया.

संत रैदास कर्म तथा स्वभाव दोनों से मानवतावादी थे. वह आज कल के समाज सुधारकों जैसे नहीं थे. उनको अपने प्रचार-प्रसार की लालसा नहीं थी. उन्होंने करुणा, मैत्री, प्रज्ञा, चेतना एवं वैचारिकता द्वारा देश के दीन-हीन अवस्था और भेदभाव को समूल समाप्त करने का सदैव प्रयास किया. उनका समदर्शी भाव, समाज उत्थान, निरीह प्राणियों की सेवा ही उत्कृष्ट मानवता थी. संत रैदास जी बचपन से ही सुधारात्मक प्रवृत्ति के थे. मानवतावादी विचारों का प्रचार-प्रसार जीवनपर्यन्त किया. रैदास जी कहते हैं कि जिस समाज में अविद्या है अज्ञानता है, उस समाज का उत्थान सम्भव नहीं है. मानव का स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रह सकता है. वास्तविक ज्ञान का प्रकाश विद्या से ही प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए सभी मानव को विद्या अर्जन करनी चाहिए.

उनका कहना है कि बुद्धि, विचार, विवेक के बिना सभी अन्धे के समान हैं. रैदास कई बार बुद्ध की बात को बढ़ाते दिखते हैं. तथागत ने भी तर्क की कसौटी पर परखने की बात कही है. वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता रैदास ने कहा मन ही सेऊं सहज स्वरूप तथागत बुद्ध ने धम्मपद की दो गाथाओं में भी यही बात कही, जिसका चित राग द्वेष आदि से निरपेक्ष विरत व स्थिर है, पाप-पुण्य निहित है उस पुरुष के लिए भय नहीं है. सन्तों की सुमिरिनी बौद्धों की स्मृति का ही दूसरा रूप है. क्रान्तिकारी रैदास ने बताया कि सिर मुड़ाने, पूजा करने, कठिन तपस्या करने, योग एवं वैराग्य से इच्छाओं का दमन नहीं होता है. यही बात तथागत बुद्ध ने भी अपने धम्मदेशना में बताई कि माया मोह व तृष्णा में लिप्त मनुष्य की शुद्धि न नंगे रहने से, न जटा रखने से, न कीचड़ लपेटने से, न उपवास करने से, न तपती धूप में सोने से, न धूल लपेटने से और न उकड़ूं बैठने से होती है. कई बार दिखता है कि रैदास ने तथागत बुद्ध से भी जबरदस्त प्रहार किया और वेद को नरक का द्वार बताया है. सन्त शिरोमणि रैदास कहते हैं कि ‘अरे मन तू अब अमृत देश को चल जहां न मौत है न शौक है और न कोई क्लेश. हे निरंजन निर्विकार मैं आपका जन हूं. लोक और वेद का खण्डन करके आपकी शरण में आया हूं. मज्झिम निकाय में भी इसी प्रकार की व्याख्या दी है जहां प्राणों का आयतन केवल अनन्त आकाश है. जहां प्राणी का आयतन केवल विज्ञान है, जहां प्राणी का आयतन अकिन्चन मात्र कुछ भी नहीं है और जहां न संज्ञा है, न आयतन और न नाम रूप.

महाकारुणिक शान्तिदूत तथागत बुद्ध से लगभग दो हजार वर्ष बाद पैदा हुए क्रान्तिकारी रैदास का जीवन ऊंच-नीच के भेदभाव, अन्धविश्वासों, कुप्रथाओं तथा आडम्बरों के विरोध में ही बीता था. उनकी वाणी एवं उपदेश, ब्राह्मण धर्म के खण्डन के पक्ष में और बुद्ध वचनों के समर्थन पक्ष में हैं. वस्तुतः रैदास बुद्ध वचनों से इतने प्रभावित थे कि कहीं न कहीं उन्होंने अपने पदों में बुद्ध वचनों को ही समाहित किया. वर्ण और जाति के भेदभाव को समाप्त करने के लिए महामानव बुद्ध के मानवीय एकता के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया और कहा कि मनुष्य मात्र की एक ही जाति है इसमें किसी प्रकार की भिन्नता नहीं है.

बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बातानि बनानि च।

आराम रुक्ख चेत्यानि, मनुस्सा भय ताज्जिता।।

तथागत बुद्ध ने कहा- अन्धविश्वासों को त्यागो और प्रज्ञा पर आधारित मध्यम मार्ग अपनाओ. इसी तरह क्रान्तिकारी रैदास ने अन्धविश्वासों को त्यागने का आवाह्न किया.

कहा भयोनाचे अरू गाये, का भयो तय कीन्हें।

कहा भयो ये चरण पाखारे, जौ लौ परम तत्व नहि चीन्हें।।

तथागत बुद्ध ने सभी दुःखों का और अन्धविश्वासों का कारण अविद्या बताया. उन्होंने कहा कि अविद्या से प्रज्ञा या सद्भाव का प्रकाश रुक जाता है तभी दुःखों का जन्म होता है. तथागत ने कहा ‘अविद्या परमं मल्’. क्रान्तिकारी रैदास ने तथागत बुद्ध के उसी वचन को अपने शब्दों में ढ़ाल कर कहा –

अविद्या अहित की न, ताते विवेक दीप मलीन।

तथागत बुद्ध ने कहा है कि काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह ऐसे तत्व हैं जो अविद्या को बढ़ाते हैं. ये मनुष्य के प्रज्ञा में बाधक हैं. क्रान्तिकारी रैदास ने भी इसी बात को आगे बढ़ाया है और इन पांचों को लुटेरा कहा है- काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर, इन पांचों मिल लूटै.

तथागत बुद्ध ने मृगदाव वन में पंचवर्गीय भिक्खुओं को धम्म देशना देकर धम्म चक्र प्रवर्तनाय किया. उसी काशी में संत शिरोमणि रैदास ने राजा वीरसेन के दरबार में पोगापंथियों को पराजित किया. क्रान्तिकारी रैदास यदि बौद्ध परम्परा के नहीं होते तो उन्हें धार्मिक चुनौती नहीं स्वीकारनी पड़ती. सदगुरु रैदास साहेब बौद्ध परम्परा का ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं.

भारत का इतिहास बताता है कि श्रमण संस्कृति के पुरोधा श्री महावीर स्वामी और तथागत बुद्ध के सामने सभी ब्राह्मण संस्कृति के अनुयायी तुच्छ थे. तथागत बुद्ध के उदय से पहले वैदिक धर्म को ब्राह्मण संस्कृति कहा जाता है तथा संत धर्म, जैन धर्म एवं बौद्धों की संस्कृति को श्रमण संस्कृति कहा जाता है. लेखक चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने लिखा है कि “दोनों संस्कृतियों की मान्यता में धरती आकाश अथवा पूरब पश्चिम का अन्तर है. श्रमण संस्कृति अन्तर्मुख है और ब्राह्मण संस्कृति बहिर्मुखी है. श्रमण संस्कृति निवृत्ति प्रधान है, ब्राह्मण संस्कृति प्रवृत्ति प्रधान है. श्रमण संस्कृति संसार को दुःखपूर्ण समझकर इससे विमुक्त होने के लिए प्रयत्नशील है जबकि ब्राह्मण संस्कृति ‘भोगैश्वर्य’ परायण अर्थात संसार में भोग चाहती है, और मरने के बाद स्वर्गसुख. श्रमण संस्कृति जन्म मरण को भव बन्धन कहती हुई निर्वाण की कामना करती है, ब्राह्मण संस्कृति हजार साल की आयु और सुख भोग चाहती हैं और मरने पर अमर लोक में वास. क्रान्तिकारी रैदास साहब इसी श्रमण संस्कृति के हिमायती हैं और उन्होंने जीवन पर्यन्त इसी संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया तथा बोधिसत्व के रूप में ज्ञात हुए. रैदास साहेब के मानवतावादी सन्देश जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है.

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/tribute-to-sant-ravidas-/

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कहे रविदास सुनो भई सन्तो ब्राह्मण के गुण तीन मान हरे , धन हरे और मति ले छीन…संघप्रिय गौतम
कुछ लोग है जिन्होंने गुरु रविदास को ईश्वर बना डाला और खुद भक्त बन बैठे, नुक्सान ये हुआ की गुरु रविदास वाणी को पढ़ने की बजाय वो अपना पूरा समय गुरु रविदास के आगे ज्योति जलाने और प्रसाद बांटने में निकाल रहे है.
कुछ लोग है जिन्होंने गुरु रविदास को पढ़ा तो पाया की वो कोई ईश्वर या चमत्कारी पुरुष नहीं वरन एक क्रांतिकारी व्यक्ति थे जिन्होंने भारत में सामाजिक आंदोलन की ज्योति जलाई. इसलिए वो गुरु रविदास के अनुयायी बने.
उदाहरण देखिये, आज गुरु रविदास जयंती पर काफी साथियो ने गुरु रविदास की तस्वीर पोस्ट की है, उनमे ज्यादातर तस्वीरें वो है जो गुरु रविदास की दिखती है, किन्तु है नहीं.. माला और तिलक से सुसज्जित ये तस्वीरें गुरु रविदास के अनुसार किसी ठग की है.
गुरु रविदास की वाणी पढ़िए :-
“माथे तिलक, हथ जप माला, जग ठगने कुं स्वांग रचाया.”
मतलब “कोई व्यक्ति जिसने माथे पर तिलक लगाया है और हाथ में माला जप रहा है उसने समाज को ठगने के लिए ढोंग रचाया है, वह ठग है.”
और आप सब ऐसी ही तस्वीरें पोस्ट कर रहे हो इसका मतलब क्या है,
यही तो मतलब हुआ की आप भक्त है, अनुयायी नहीं है.
बौद्धिसत्व गुरु रविदास जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं… SANJAY BAUDHI DASFI
एक विनती है, अगर आप आज गुरु रविदास जयंती की बधाई दे तो कृपा गुरु रविदास की तस्वीर ऐसी लगाये जिसमे माला या फिर तिलक ना हो, अन्यथा आप बधाई ही ना दे.
गुरु रविदास की वाणी पढ़िए :-
“माथे तिलक, हथ जप माला, जग ठगने कुं स्वांग रचाया.”……. SANJAY BAUDHI DASFI

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01-Feb-2016 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना::मेरा सभी साथियों से निवेदन है कि अगर आपको समता चाहिए और जाति आधारित भेद भाव, ऊंच नीच, छुआ छूत, हींन भाव को ख़त्म करना है तो आज से ही जाति आधारित सम्बोधन ना करने का संकल्प लो, जैसे पंडित जी, ठाकुर जी, लाला जी, चौधरी साहब आदि

world knowledge day 14 aprilमेरा सभी साथियों से निवेदन है कि अगर आपको समता चाहिए और जाति आधारित भेद भाव, ऊंच नीच, छुआ छूत, हींन भाव को ख़त्म करना है तो आज से ही जाति आधारित सम्बोधन ना करने का संकल्प लो, जैसे पंडित जी, ठाकुर जी, लाला जी, चौधरी साहब आदि। व्यक्ति को उसके नाम से ही सम्बोधित किया जाना चाहिऐ, उसकी जाति के नाम से कभी भी सम्बोधित नहीं करना चाहिए । जहां तक सम्मान की बात है, तो नाम के साथ ‘जी’ का प्रयोग किया जाये, अन्यथा जिस जातिवाद के आप बुरी तरह शिकार हैं उसको स्वयं बढ़ावा दे रहे हैं। जब आप उपरोक्तानुसार सम्बोधन करते हैं तो आप स्वयं को हेय दृष्टि और हींन भावना का शिकार बना रहे हैं। विचार करें। मैंने असंख्य बार अपने ही लोगो को ऐसा करते देखा है। अगर आप समझते हैं क़ि मेरी बात सही है, तो टाइप करने का समय मेने बचा दिया है I

ग्वालियर में जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार की सभा पर कट्टरपंथियों का हमला,जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार जो उस समय मंच पर मौजूद थे फायरिंग में बाल-बाल बच गए।…National Dastak

prof vivek kumarग्वालियर में जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार की सभा पर हमला…2016-02-22

ग्वालियर। जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार पर ग्वालियर में जानलेवा हमला हुआ। रविवार को अंबेडकर विचार मंच के कार्यक्रम में विवेक कुमार शिरकत कर रहे थे। इसी दौरान बीजेपी युवा मोर्चे के सदस्यों ने हमला कर दिया और फायरिंग की। जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार जो उस समय मंच पर मौजूद थे फायरिंग में बाल-बाल बच गए।

घटना रविवार की है जब शाम के करीब चार बजे नगर निगम के बाल भवन सभागार में अंबेडकर फोरम का कार्यक्रम चल रहा था। उसी समय बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया और प्रोफेसर विवेक कुमार को बोलने से रोकने की कोशिश करने लगे। करीब 4 घंटे तक चले हंगामे में बाहर खड़ी गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई और फायरिंग भी हुई।

उपद्रवियों के खिलाफ केस दर्ज

बीजेपी युवा मोर्चा ने सेमिनार के मुख्य वक्ता JNU के प्रोफेसर विवेक कुमार के खिलाफ नारे लगाए और नफरत फैलाने का आरोप लगाया। उनकी पिटाई की भी कोशिश की गई। अंबेडकर विचार मंच के नेता दिनेश मौर्या की शिकायत के आधार पर पुलिस ने बीजेपी युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष विवेक शर्मा और 100 अन्य लोगों के खिलाफ SC-ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि पूरे मामले की जांच चल रही है। ऑडिटोरियम में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी निकाली जा रही है। उसके आधार पर दोषियों की पहचान की जाएगी और जो भी दोषी होगा उसे बख्शा नहीं जाएगा।

दरअसल JNU पिछले दिनों देश विरोधी नारों के आरोपों की वजह से चर्चा में रहा है मीडिया में आये एक विडियो जिसकी सत्यता की जांच होनी अभी बाकी है, की वजह से काफी हंगामा हुआ और JNU छात्र संघ के अध्यक्ष को भी गिरफ्तार किया गया है।

मीडिया और सोशल साइट्स पर हमले की निंदा

जेएनयू प्रोफेसर विवेक कुमार पर हुए हमले की खबर सोशल साइट्स पर ट्रेंड कर रही है। देश के नामी समाज वैज्ञानिकों ने इस हमले की निंदा की है। पत्रकारों ने भी इस घटना को बोलने की आजादी पर हमला बताया है। इंडिया टूडे (हिंदी) के पूर्व कार्यकारी संपादक दिलीप मंडल ने फेसबुक पर इस घटना की निंदा की है। दिलीप मंडल ने इस हमले के लिए आरएसएस और उसकी कट्टरता को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं दलित दस्तक के संपादक ने भी प्रोफेसर विवेक कुमार पर हुए हमले की निंदा करते हुए कहा है कि उनपर हुआ ये हमला लोकतंत्र, संविधान और अंबेडकरवाद पर हमला है। प्रोफेसर विवेक कुमार दलित दस्तक संपादक मंडल के सदस्य भी हैं।

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/attack-on-jnu-prof-vivek-kumar-in-gwalior/

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क्या है राष्ट्रवाद…रवीश की कलम से

ravish-kumarक्या है राष्ट्रवाद…रवीश की कलम से …

किसने दी इस गुंडागर्दी की छूट?

राष्ट्रवाद के साथ सबसे बड़ी खूबी यह है कि कोई भी बिना जाने इसे जानने का दावा कर सकता है। 19वीं सदी से पहले तो इसके बारे में कोई जानता ही नहीं था लेकिन पिछले 200 सालों में राष्ट्र और राष्ट्रवाद का स्वरूप उभरता चला गया। इन 200 सालों में राष्ट्रवाद के नाम पर फासीवाद भी आया जब लाखों लोगों को गैस चैंबर में डाल कर मार दिया गया। हमारे ही देश में राष्ट्रवाद का नाम जपते जपते आपात काल भी आया और दुनिया के कई देशों में एकाधिकारवाद जिसे अंग्रेजी में टोटेलिटेरियन स्टेट कहते हैं। जिसमें आप वो नहीं करते जो राज्य और उसके मुखिया को पसंद नहीं।

सत्ता पर जिस पार्टी का कब्ज़ा होता है वो पुलिस के दम पर आपके नाक में दम कर देती है। मेरी राय में राजनीतिक दलों के पास राष्ट्रवाद की अंतिम परिभाषा नहीं होती है न होनी चाहिए। मैंने कहा कि राजनीतिक दलों के पास राष्ट्रवाद की अंतिम परिभाषा तब होती है जब उनका इरादा लोकतंत्र को खत्म कर देना होता है।

क्या कभी आपने देखा है कि राजनीतिक दल के कार्यकर्ता किसी नीति, घटना और घोटाले के वक्त अपने ही दल के खिलाफ नारे लगा रहे हों कि उनके लिए दल नहीं देश महत्वपूर्ण है। ऐसा होता तो बीजेपी से पहले कांग्रेस के कार्यकर्ता 2जी घोटाले के खिलाफ़ सड़कों पर आ गए होते। ऐसा होता तो बीजेपी के कार्यकर्ता, नेता व्यापम घोटाले पर पार्टी से इस्तीफा दे देते। देश जब 200 रुपये किलो दाल खा रहा था तो अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते। केरल में आरएसएस कार्यकर्ता पी.वी. सुजीत की हत्या कर दी गई। क्या आप उम्मीद करेंगे कि कांग्रेस, सीपीएम के नेता इस हत्या कांड के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे। क्या आप उम्मीद करेंगे कि बीजेपी के सभी नेता अपने ही नेता ओ.पी. शर्मा के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे। निंदा परनिंदा छोड़ दीजिए। इसलिए दलों की राजनीति दलों के हित के लिए होती है। हिंसा का इतिहास आपको हर राजनीतिक दल की सरकार में मिलेगा। आप हर घटना को राष्ट्रवाद के चश्मे से नहीं देख सकते। दंगे किस दल की सरकार में नहीं हुए और किस दल का नाम नहीं आया है, तो क्या आप उन्हें गद्दार या राष्ट्रविरोधी कहेंगे।

मैं यह नहीं कह रहा है कि राजनीतिक दल के लोग देशभक्त नहीं होते। बिल्कुल होते हैं। हर दल अपनी सोच के हिसाब से देश को सजाने संवारे की कल्पना करता है। लेकिन जब धर्म, नस्ल, रंग, भाषा और यहां तक कि टैक्स के नाम पर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है तो उसका इरादा राष्ट्रवाद नहीं होता। उसका इरादा कुछ और होता है। राष्ट्रवाद के नाम पर अपना एकाधिकार काम करना। हर दलील को चुप करा देना। जहां दल और नेता की चलती है। बाकी सब उसके इशारे पर चलते हैं।

जेएनयू में भारत को तोड़ने और बर्बादी के नारे लगाने वालों की अभी तक पहचान क्यों नहीं हुई है। क्यों सूत्रों के हवाले से खबरें आ रही हैं। सभी ने इनका विरोध किया है। जेएनयू के तमाम छात्रों और शिक्षकों ने भी। उनका विरोध कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को लेकर है जिसके खिलाफ अभी तक देशद्रोह के कोई सबूत नहीं मिले हैं। दिल्ली पुलिस कहती है कि अब अगर वो ज़मानत के लिए अप्लाई करेगा तो विरोध नहीं करेंगे। वो नौजवान है, उसे दूसरा मौका दिया जा सकता है। इस हृदय परिवर्तन से पहले गली गली में रैली कर जेएनयू को बदनाम किया गया कि वहां राष्ट्रविरोधी तत्व पढ़ते हैं। पटियाला हाउस कोर्ट में दूसरे दिन भी जो हुआ वो क्या है।

क्या कोई भीड़ हाथ में तिरंगा लेकर खड़ी हो जाएगी तो वो हमसे आपसे ज़्यादा देशभक्त हो जाएगी। क्या अब तिरंगा लेकर लोगों को डराया जाएगा और इंसाफ के हक से वंचित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी के बाद भी दूसरे दिन कन्हैया कुमार के साथ मारपीट की कोशिश हुई। सुप्रीम कोर्ट ने जिन वकीलों को कोर्ट के भीतर जाने की अनुमति दी थी उन्होंने बताया कि गालियां दी गई हैं। भय का माहौल है। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर सुनवाई रोक दी और कोर्ट रूम को खाली कराया। कन्हैया कुमार को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तीस हज़ारी कोर्ट के वकीलों ने कहा है कि पटियाला कोर्ट मामले में यदि किसी वकील को गिरफ्तार किया गया तो दिल्ली पुलिस का विरोध किया जाएगा। दिल्ली के तमाम बार संघ हड़ताल पर जाने का विचार कर रहे हैं। सुनवाई हुई नहीं, फैसला आया नहीं लेकिन चैनलों और वकीलों और संगठनों ने आतंकवादी घोषित कर दिया। अगर ऐसी ही भीड़ आपको उठा ले जाए और हाथ में तिरंगा लेकर घोषित कर दे कि आतंकवादी हैं और मार दे तो आप इंसाफ के लिए कहां जाएंगे।

इतिहास में यह सब हुआ है। राष्ट्रविरोधी बताकर राजनीतिक विरोधियों की हत्याएं हुई हैं। जर्मनी में साठ लाख यहूदियों को गैस की भट्टी में झोंक दिया गया। ये राष्ट्रवाद के अपने ख़तरे हैं। इन ख़तरों पर हमेशा बात होनी चाहिए तब तो और जब लोग राष्ट्रवाद की खूबियां बघारने में जुटे हों।

कोलकाता की जाधवपुर युनिवर्सिटी में भी कुछ छात्रों ने आज़ादी के नारे लगाए और अफज़ल गुरु का समर्थन किया। इन्हें रेडिकल ग्रुप का बताया जा रहा है। एक छात्र ने सफाई दी कि हमने अभिव्यक्ति की आज़ादी के संदर्भ में आज़ादी का नारा लगाया तो एक छात्रा ने कहा कि उसने कश्मीर की आज़ादी और अफज़ल गुरु के लिए नारे लगाए हैं। मेरे नारे राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकते हैं क्योंकि बीजेपी ने तो पीडीपी से मिलकर सरकार बनाई है और पीडीपी के लिए अफज़ल गुरु शहीद है। कई छात्रों ने ऐसी सोच का विरोध किया है और तमाम संगठनों ने निंदा की है। जाधवपुर यूनिवर्सिटी के वीसी ने कहा है कि जिन लोगों ने नारे लगाए वो विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे, बाहर के असामाजिक तत्व थे। वाइस चांसलर ने कहा है कि असमाजिक तत्वों की हरकत की वजह से छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार को नहीं छीनना चाहिए।

कानून के पन्ने पर देशद्रोह की अलग समझ है और जनता के दिलो दिमाग में अलग। इतिहास की किताबों में राष्ट्रवाद को लेकर अनंत व्याख्याएं हैं। अव्वल तो राष्ट्रवाद और देशभक्ति दोनों में ही मीलों का अंतर है। एक जटिल मसले का अगर हम बात-बात में राजनीतिक इस्तमाल करेंगे तो आप दर्शकों को राष्ट्रवादी होने से पहले इतिहास की दस बीस किताबें पढ़ लेनी चाहिए। राष्ट्रगान लिखने वाले टगौर ने राष्ट्रवाद को अजगर सापों की एकता नीति कहा था। इस तरह के उदाहरणों से भी हमारी समझ साफ नहीं होती है। मगर राष्ट्रवाद को उचक्कों की शरणस्थली भी कहा गया है और राष्ट्रवाद के लिए लोगों ने सर्वोच्च बलिदान भी दिये हैं।

जेएनयू में प्रोफेसरों ने राष्ट्रवाद पर अगले एक हफ्ते तक सार्वजनिक क्लास लगाने का फैसला किया है। पांच बजे से ये क्लास लगेगी। बुधवार को प्रोफेसर गोपाल गुरु ने हज़ारों छात्रों के बीच पहली क्लास ली। टॉपिक था राष्ट्र क्या है। इसके बाद प्रोफेसर जी अरुणिमा, तनिका सरकार, निवेदिता मेनन, आयशा किदवई, अचिन विनायक का राष्ट्रवाद पर लेक्चर होगा। ये खूबी आपको सिर्फ जेएनयू में मिलेगी। मेरी तरफ से दो गुज़ारिश है। एक कि यह ओपन क्लास हो सके तो हिन्दी में भी हो और दूसरा इसमें आरएसएस से जुड़े प्रोफेसरों को भी राष्ट्रवाद पर लेक्चर देने के लिए बुलाया जाए।

राष्ट्रवाद 19वीं सदी की सबसे ताकतवर विचारधारा रही है जिसने हम इंसानों को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया। एक राष्ट्र एक भाषा एक संस्कृति जैसी सोच ने तमाम तरह की विविधताओं को कुचल दिया तो कहीं इन विविधताओं ने इस विचारधारा के खिलाफ संघर्ष करते हुए खुद को बचाए भी रखा। कई लोग कहते हैं कि सियाचिन में जान देने वाले सैनिक को क्या यह छूट है कि वो अफजल गुरु के लिए नारे लगाए। लेकिन क्या इसी देश में जंतर मंतर पर वन रैंक वन पेंशन की मांग कर रहे सैनिकों के कुर्ते नहीं फाड़े गए। मेडल नहीं खींचे गए। सैनिकों की चिन्ता है तो जंतर मंतर पर सैनिक महीनों बाद भी क्यों बैठे हैं। क्या वे देशद्रोही हैं। कुछ ने कहा कि टैक्सपेयर के पैसे से जेएनयू क्यों चले। इस तरह की बेतुकी दलील देने वाले यह भी कहते हैं कि आईआईटी, एम्स और आईआईएम के छात्र टैक्स पेयर के पैसे पर पढ़ते हैं और देश सेवा छोड़ विदेश नौकरी करने चले जाते हैं। टैक्स राष्ट्रवाद ने क्यों नहीं आवाज़ उठाई कि बैंक और उद्योंगों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज क्यों माफ हो रहे हैं और गरीब किसानों के क्यों नहीं। ज़ाहिर है टैक्स राष्ट्रवाद की दलील ग़रीब विरोधी है।

इकोनोमिक टाइम्स में आज स्वामिनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर ने एक लेख लिखा है। लेख का उन्वान है कि राष्ट्रवाद विरोधी महज़ एक गाली है, एक मुक्त समाज में इसकी कोई जगह नहीं। उन्होंने एक मिसाल दी है। 1933 का साल था जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र संघ में इस बात पर बहस हुई कि यह सदन किसी भी परिस्थिति में राजा या देश के लिए नहीं लड़ेगा। प्रस्ताव पास हो गया और पूरे ब्रिटेन में खलबली मच गई। छात्रों की जमकर आलोचना हुई लेकिन किसी को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया। स्कॉटिश नेशनल पार्टी ब्रिटेन से अलग होना चाहती है। अपना स्काटिश राष्ट्र बनाना चाहती है तो क्या उनके नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाए। ऐसा तो हुआ नहीं। अय्यर ने इस तरह के कई उदाहरण दिये हैं।
दुनिया के नक्शे में राष्ट्र के बनने की प्रक्रिया अभी भी मुकम्मल नहीं हुई है। कहीं राष्ट्र तबाह हो रहे हैं तो कहीं बिखर भी रहे हैं। हर साल कहीं नया झंडा बनता है तो कहीं पुराना गायब हो जा रहा है। जेएनयू की घटना के बाद बीजेपी और संघ इस बात को लोगों को तक पहुंचाने में सफल रहे कि राष्ट्रविरोधी नारों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जो भारत को तोड़ने की बात करेगा उसे गोली मार देने की बात तक कही गई। कानून अदालत का कोई लिहाज़ नहीं। राष्ट्रवाद कानून हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं है। असम में ही बोडो अलग राज्य की मांग करते रहे हैं लेकिन उनके एक गुट के साथ कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इसी देश में अगल खालिस्तान की मांग को लेकर ख़ून खराबा हो चुका है। क्या राम जेठमलानी ने इंदिरा गांधी की हत्या से जुड़े लोगों का मुकदमा नहीं लड़ा था। क्या जेठमलानी को बीजेपी ने राज्य सभा का सदस्य नहीं बनाया। पार्टी में शामिल नहीं किया। पीडीपी की अफज़ल गुरु के बारे में क्या राय है कौन नहीं जानता। उनके साथ किसने सरकार बनाई कौन नहीं जानता।

दिक्कत ये है कि जब इतिहास पढ़ने की बारी आती है तो आप और हम इतिहास का मज़ाक उड़ाते हैं। फिर जब राजनीति करनी होती है तो इतिहास की अनाप शनाप व्याख्याएं करने लगते हैं। मौजूदा समय में राष्ट्रवाद का राजनीतिक इस्तेमाल राष्ट्रवाद की कोई नई समझ पैदा कर रहा है या जो पहले कई बार हो चुका है उसी का बेतुका संस्करण है। यह ख़तरनाक प्रवृत्ति है या लोग ऐसे ख़तरों से निपटने में सक्षम हैं।

 

http://khabar.ndtv.com/video/show/news/prime-time-intro-who-will-define-nationalism-404170

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