ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही

dhyam meditation” ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही ,,
ध्यान की विधि के लिए अक्सर लोग पूछते है की ध्यान की क्या विधि होती ध्यान क्या होता है ! ध्यान कैसे करे ?
जिस क्रत्यो से कुछ पाया जाता है उसकी विधि होती है या विज्ञानं के लिए विधि होती है! कुछ पकड़ना है उसकी विधि होती है ! और कुछ भी नहीकरने की और देखने की कोई विधि नही होती है वह किसी और को नही स्वयम को ही देखना है!

लेकिन देखने भाषा ठीकभी नही है क्योकि लोग जो अपने कोसमझते वाहीदेखने लगते है ,जो शरीर के तल पर खड़ा है वह अपने शरीर को देखना ध्यान समझ लेता है , हमारा स्वयम की मन कीउर्जा की सूक्ष्म हलचल को देखना ध्यान है! ध्यान की कोई प्रमाणिक विधि नही है! जिस कृत्य से कुछ मिलता नही वह ध्यान है ! ध्यान का कृत्य कृष्ण की गीता का निष्काम कर्म समझो ! ध्यान मे नाचना ,कूदना रोना ,हसना दोड़ना , चिलाना,पागल जैसी हरकते करना और जिसकी कोई विधि नही होती है इन क्रत्यो में आनन्द भी नही मिलेगा यह तुम्हारी मनोस्थ्ती पर निर्भर है ! इन क्रत्यो से न धन मिलता नही प्रसिध्ही मिलती है और नही कोई पद मिलता है न कोई पुन्य मिलता है ! जो जरूरत से जायदा है वह खो जाता है जो नही है वह प्रकट हो जाता है ! ध्यान समय के साथ होने की मनोस्थ्ती है आनन्द मिलता है लेकिन वह भी आपका उस के लिए अपने भाव पर निर्भर है! उसकी भी कोई गारंटी नही है ! और सामान्य व्यक्ति की सोच ही यही होती है की जिसे कृत्य से कुछ भी नही मिलता हो वे कृत्य क्यों करे ?

सामान्य लोग बिना फल की प्राप्ति बिना कुछ भी करने को तेयार नही होते है ! सामान्य हमेशा कर्म का मूल्याकन करता है ! इसलिए सामान्य लोगो के लिए ध्यान का कोई मूल्य नही है ! सामान्य व्यक्ति को धर्मकर्मकांड करवाने केलिए बड़े बड़े पुन्य सर्वग के सपने दिखाने पड़ते है लोभ देना होता है, तब वे जा कर धार्मिक कर्म कांड करेंगे ! तब बिना सपने बिना लोध केलिए सामान्य लोगो को कहा जाय की कुछ भी नही मिलेगा लेकिन तुम तीर्थ यात्रा करो हवन करो भजन पूजा पाठ करो तब वे बिना सपने, बिना फल के लिए कुछ भी नही करेगे !


धार्मिक कर्म कांड और ध्यान के लिए किये गए कृत्य में यही बड़ा अंतर होता है ,धर्मकर्म कांड में फल लोभ का लक्ष्य मुख्य होता है!
ध्यान की विज्ञानंमें यहा मन और उर्जा की दिशा को मोड़ने एवं परिवर्तन करने का सबसे बड़ा माध्यम है धयन !यह उर्जा को नई दिशा देने की आधुनिक साधना है और जिसको अपने मन और उर्जा को नई दिशा देने की कला मिल जाती है ध्यान से धन्य हो जाता है धनवान नही!

कल मैंने एक बौद्ध धम्म से हुई शादी अटेंड की, वहां पर भंते दर्शनदीप ने जिस तरह जिस मिशनरी ज्ञान से शादी करवाई वो वाकई कबीले तारीफ थी. मैंने उनका नंबर लिया वो दिल्ली, आगरा बेल्ट, और एटा इटावा मैनपुरी बेल्ट में सक्रिय हैं| जरूरत पड़े तो बुलाना, उनके नंबर हैं: 8375002872, 8979968939

कल मैंने एक बौद्ध धम्म से हुई शादी अटेंड की, वहां पर भंते दर्शनदीप ने जिस तरह जिस मिशनरी ज्ञान से शादी करवाई वो वाकई  कबीले तारीफ थी. मैंने उनका नंबर लिया वो दिल्ली, आगरा बेल्ट, और एटा इटावा मैनपुरी बेल्ट में सक्रिय हैं| जरूरत पड़े तो बुलाना, उनके नंबर हैं: 8375002872, 8979968939

सन्त गाडगे महाराज को उनके जन्मदिवस 23 फरवरी पर शत-शत नमन। वे कहते थे ”शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिये कम दाम के कपड़े खरीदो। टूटे-फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिये बिना न रहो।”….LALA BAUDH

बुधवार, 23 फरवरी, 1876 को सन्त गाडगे महाराज का जन्म हुआ था। gagde maharaj



सन्त गाडगे महाराज

आज 23 फरवरी है. बुधवार, 23 फरवरी, 1876 को सन्त गाडगे महाराज का जन्म हुआ था। सन्त गाडगे महाराज को उनके जन्मदिवस पर शत-शत नमन।

आधुनिक भारत को जिन महापुरूषों पर गर्व होना चाहिए, उनमें राष्ट्रीय सन्त गाडगे बाबा का नाम सर्वोपरि है। मानवता के सच्चे हितैषी, सामाजिक समरसता के द्योतक यदि किसी को माना जाए तो वे थे संत गाडगे। वास्तव में गाडगे बाबा के जीवन, उनके कार्यों तथा उनके विचारों से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं। हम समाज और राष्ट्र को काफी कुछ दे सकते हैं। गाडगे बाबा ने अपने जीवन, विचार एवं कार्यों के माध्यम से समाज और राष्ट्र के सम्मुख एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया, जिसकी आधुनिक भारत को वास्तव में महती आवश्यकता है।

महाराष्ट्र सहित समग्र भारत में सामाजिक समरता, राष्ट्रीय एकता, जन जागरण एवं सामाजिक क्राँति के अविरत स्रोत के वाहक संत गाडगे बाबा का जन्म महाराष्ट्र के अकोला जिले के खासपुर गाँव में धोबी परिवार में हुआ था। बाद में खासपुर गाँव का नाम बदल कर शेणगाव कर दिया गया। गाडगे बाबा का बचपन का नाम डेबूजी था। इस प्रकार उनका पूरा नाम डेबूजी झिंगराजी जाणोरकर था। उनके पिता का नाम झिंगरजी माता का नाम साखूबारई और कुल का नाम जाणोरकर था। गौतम बुद्व की भाति पीड़ित मानवता की सहायता तथा समाज सेवा के लिये उन्होनें सन 1905 को गृहत्याग किया। एक लकड़ी तथा मिटटी का बर्तन जिसे महाराष्ट्र में गाडगा (लोटा) कहा जाता है, लेकर आधी रात को घर से निकल गये। दया, करूणा, भ्रातृभाव, सम-मैत्री, मानव कल्याण, परोपकार, दीनहीनों की सहायता आदि गुणों के भण्डार बुद्व के आधुनिक अवतार डेबूजी सन 1905 मे गृहत्याग से लेकर सन 1917 तक साधक अवस्था में रहे।

महाराष्ट्र सहित सम्पूर्ण भारत उनका सेवा-क्षेत्र था। गरीब उपेक्षित एवं शोषित मानवता की सेवा ही उनका धर्म था।ambedkar with gadge

गाडगे बाबा शिक्षा को मनुष्य की अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में प्रतिपादित करते थे। अपने कीर्तन के माध्यम से शिक्षा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये वे कहते थे ”शिक्षा बड़ी चीज है. पैसे की तंगी हो तो खाने के बर्तन बेच दो, औरत के लिये कम दाम के कपड़े खरीदो। टूटे-फूटे मकान में रहो पर बच्चों को शिक्षा दिये बिना न रहो।”

बाबा ने अपने जीवनकाल में लगभग 60 संस्थाओं की स्थापना की और उनके बाद उनके अनुयायियों ने लगभग 42 संस्थाओं का निर्माण कराया। उन्होनें कभी कहीं मन्दिर निर्माण नहीं कराया अपितु दीनहीन, उपेक्षित एवं साधनहीन मानवता के लिये स्कूल, धर्मशाला, गौशाला, छात्रावास, अस्पताल, परिश्रमालय, वृद्धाश्रम आदि का निर्माण कराया। उन्होंने अपने हाथ में कभी किसी से दान का पैसा नहीं लिया। दानदाता से कहते थे दान देना है तो अमुक स्थान पर संस्था में दे आओ।

बाबा अपने अनुयायिययों से सदैव यही कहते थे कि मेरी जहां मृत्यु हो जाय, वहीं पर मेरा अंतिम संस्कार कर देना, मेरी मूर्ति, मेरी समाधि, मेरा स्मारक मन्दिर नहीं बनाना। मैने जो कार्य किया है, वही मेरा सच्चा स्मारक है। जब बाबा की तबियत खराब हुई तो चिकित्सकों ने उन्हें अमरावती ले जाने की सलाह दी किन्तु वहां पहुचने से पहले बलगाव के पास पिढ़ी नदी के पुल पर 20 दिसम्बर 1956 को रात्रि 12 बजकर 20 मिनट पर बाबा की जीवन ज्योति समाप्त हो गयी। जहां बाबा का अन्तिम संस्कार किया गया। आज वह स्थान गाडगे नगर के नाम से जाना जाता है।

वस्तुस्थिति तो यह है कि महाराष्ट्र की धरती पर समाज सेवक संत महात्मा, जन सेवक, साहित्यकार एवं मनीषी जन्म लेंगे परन्तु मानव मात्र को अपना परिजन समझकर उनके दु:खदर्द को दूर करने में अनवरत रूप से तत्पर गाडगे बाबा जैसा नि:स्पृह एवं समाजवादी सन्त बड़ी मुशिकल से मिलेगा क्योंकि रूखी-सूखी रोटी खाकर दिन-रात जनता जनार्दन के कष्टों को दूर करने वाला गाडगे सदृश जनसेवी सन्त कम ही पैदा होते हैं।

मानवता के पुजारी दीनहीनों के सहायक संत गाडगे बाबा में उन सभी सन्त्तोचित महान गुणों एवं विशेषताओं का समावेश था, जो एक मानवसेवी राष्ट्रीय सन्त की कसौटी के लिये अनिवार्य है।

आज भी सन्त गाडगे अपने कार्यों के कारण अमर हैं.lala baudh

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ब्राह्मणवाद से बचाने वाले व जीवन सुधारने वाले सूत्र देने वाले बोधिसत्व गुरु रैदास बौद्ध परम्परा के ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं ….बुद्धप्रिय

कहे रविदास सुनो भई सन्तो ब्राह्मण के गुण तीन मान हरे , धन हरे और मति ले छीन

बोधिसत्व गुरु  रैदास बौद्ध परम्परा के ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं Written by : बुद्धप्रिय Date : 2016-02-22sant ravidas
रायबरेली। चौदह सौ तैंतीस की माघ सुदी प्रदास।

दुखियों के कल्याण हित प्रकटे श्री रैदास।

माघी पूर्णिमा के दिन वाराणसी के सिर गोवर्धन नामक बस्ती में श्री रघुजी व मां करमाबाई की कोख से भारतभूमि पर संत रैदास का आविर्भाव हुआ. तुकाराम, नरसी-दादू, मेहता, गुरूनानक, कबीर, चोखा मेला, पीपादास, इन सभी मध्यकालीन सन्तों में प्रवर सदगुरू रैदास का स्थान श्रेष्ठ है.

भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम संस्कृतियों में से एक है. इस संस्कृति को जीवन्त रखने में भक्तिकाल या सन्त परम्परा का विशेष योगदान है. चेतना, जन आन्दोलन, समतामूलक समाज की परिकल्पना, मानव सेवा आदि क्रान्तिकारी परिवर्तन के लिए सन्त शिरोमणि रैदास का नाम बड़े आदर तथा सम्मान के साथ लिया जाता है. बोधिसत्व रैदास सामाजिक सुधार के लिए जीवन पर्यन्त जूझते तथा रचनात्मक प्रयत्न करते रहे. सामाजिक समानता, समरसता लाने के लिए वो अपनी वाणियों के माध्यम से तत्कालीन शासकों को भी सचेत करते रहे. घृणा और सामाजिक प्रताड़नाओं के बीच सन्त रैदास ने टकराहट और भेदभाव मिटाकर प्रेम तथा एकता का संदेश दिया. उन्होंने जो उपदेश दिये दूसरों के कल्याण व भलाई के लिए दिये और उनकी चाहत एक ऐसा समाज की थी जिसमें राग, द्वेष, ईर्ष्या, दुख, कुटिलता का समावेश न हो. संत शिरोमणि रैदास कहते हैं:-

ऐसा चाहूं राज्य मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।

छोट, बड़ों सभ सम बसै, रैदास रहे प्रसन्न।।

वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता सदगुरू रैदास की एक वैज्ञानिक सोच हैं, जो सभी की प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता देखते हैं। स्वराज ऐसा होना चाहिए कि किसी को किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो, एक साम्यवादी, समाजवादी व्यवस्था का निर्धारण हो इसके प्रबल समर्थक संत रैदास जी माने जाते हैं. उनका मानना था कि देश, समाज और व्यक्ति की पराधीनता से उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है. पराधीनता से व्यक्ति की सोच संकुचित हो जाती है. संकुचित विजन रखने वाला व्यक्ति बहुजन हिताय- बहुजन सुखाय की यथार्थ को व्यवहारिक रूप प्रदान नहीं कर सकता है. वह पराधीनता को हेय दृष्टि से देखते थे और उनका मानना था कि तत्कालीन समाज व लोगों को पराधीनता से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए.

सन्त रैदास के मन में समाज में व्याप्त कुरीतियों के प्रति आक्रोश था. वह सामाजिक कुरीतियों, वाह्य आडम्बर एवं रूढ़ियों के खिलाफ एक क्रान्तिकारी परिवर्तन की मांग करते थे. उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा नहीं होगी, वैचारिक विमर्श नहीं होगा. और जब तक यथार्थ की व्यवहारिक पहल नहीं होगी, तब तक इंसान पराधीनता से मुक्ति नहीं पा सकता है.

भारत की सरजमीं पर सदियों से जातिवादी व्यवस्था का प्राचीन इतिहास रहा है. जातिवादी व्यवस्था में मनुष्य एवं मनुष्य के बीच झूठा अलगाव उत्पन्न करके मानवता की हत्या कर दी गयी थी. जातिवादी व्यवस्था के पोषकों द्वारा देश या समाज हित में कोई भी क्रान्तिकारी कार्यक्रम ही नहीं दिये गये. इस कुटिल व्यवस्था के रोग को सदगुरू रैदास ने पहचाना. उन्होंने मानव एकता की स्थापना पर बल दिया. उनका मानना था कि जातिवादी व्यवस्था को बगैर दूर किये देश व समाज की उन्नति सम्भव नहीं है. ओछा कर्म और परम्परागत जाति व्यवस्था को रैदास ने धिक्कारा है. वह कहते थे कि मानव एक जाति है. सभी मनुष्य एक ही तरह से पैदा होते हैं. मानव को पशुवत जीवन जीने के लिए बाध्य करना कुकर्म की श्रेणी में आता है. कुकर्म से मनुष्य बुरा बनता है औक सत्कर्म से मनुष्य श्रेष्ठ बनता है. जन्म आधारित वर्ण व्यवस्था को रैदास ने नकार दिया. उन्होंने कर्म प्रधान संविधान को अपने जीवन में सार्थक किया. सन्त रैदास ने सामाजिक परम्परागत ढांचे को ध्वस्त करने का प्रयास किया. रैदास कहते हैं:-

रविदास ब्राह्मण मत पूजिए, जेऊ होवे गुणहीन।

पूजहिं चरण चंडाल के जेऊ होवें गुण परवीन।।

इस वैज्ञानिक विचारधारा से तत्कालीन प्रभाव से समाज को मुक्ति मिली और आज भी इस विचारधारा का लाभ समाज को मिलता दिखाई दे रहा है. बल्कि 21वीं सदी में इसकी सार्थकता और भी बढ़ गयी है. समाज सुधार की आधारशिला व्यक्ति का सुधार है. सबसे पहले व्यक्ति को नैतिक दृष्टि से सीमाओं से ऊपर उठकर विवेक, बुद्धि आदि इस्तेमाल करना चाहिए, तभी समाज उन्नत हो सकेगा. व्यक्तिगत सद्चरित्रता, स्वच्छता तथा सरलता पर ध्यान देना चाहिए.

अपनी क्रान्तिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युग बोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण उनका धम्म दर्शन लगभग 600 वर्ष बाद आज भी प्रासंगिक है. सन्त रैदास अपने समय से बहुत आगे थे. लोग उन्हें समझ नहीं पाये और न ही उनके कथनानुसार योजनाबद्ध तरीके से कोई कार्य कर पाये, जिससे सामाजिक या राजनैतिक क्रान्ति हो सके. वह समतामूलक समाज की कल्पना करते थे और मानते ते कि यह तभी संभव है जब सभी के सुख-दुःख का ख्याल रखा जाए. अज्ञानता के कारण प्रभाव स्थापित करने में लोग विभेद करते हैं. रैदास कहते हैं कि सभी जन एक ही मिट्टी के बने हैं और सभी के लिए ज्ञान का मार्ग खुला हुआ है.

अज्ञानता के आकाश को छूता समाज निजी स्वार्थ की पूर्ति में लीन था. एक-दूसरे में बैर भाव पैदा करके उसकी धन सम्पत्ति छीन ली जाती थी. अन्याय, अत्याचार, शोषण का चारों तरफ बोलबाला था. इन विषम परिस्थितियों में भी रैदास ने कभी किसी धन का अतिक्रमण नहीं किया. उन्होंने निःस्वार्थ रूप से जनता की भलाई की और धन संचय की प्रवृत्ति को कष्ट का कारण भी बताया रैदास कहते हैं:-

धन संचय दुःख देत है, धन मति तिआगे सुख होई।

रविदास सीख गुरूदेव की धन मति जौर कोइ।।

उपरोक्त दोहे के जरिए रविदास जी ने धन लोलुपता, संचय और असंतोष आदि अवगुणों को दूर करने का मार्ग प्रशस्त किया. उन्होंने श्रम की महत्ता को बताया. उन्होंने आडम्बर पर भी करारा प्रहार किया. समाज को पथभ्रष्ट करने वाले पोंगापंथियों से सावधान रहने का सन्देश दिया और वाह्य आडम्बर, ढ़कोसला, परम्परा, रूढ़ियों, मूर्ति पूजा आदि का खण्डन किया. केवल दिखावा करके समाज को गुमराह करना, धोखा के अलावा कुछ नहीं है. इस प्रकार के बहुरूपीयेपन को दूर करके ही एक वैज्ञानिक मार्ग की दिशा व दशा का निर्धारण सम्भव हो सकता है. इसी सोच के कारण उन्होंने परम्परा, कट्टरता, हठधर्मिता और रूढ़ियों का परित्याग कर एक समन्वय विचारधारा का निर्धारण किया, जिससे हिन्दू मुस्लिम संस्कृति की विशाल खाई को पाटने में सहायता मिली. उन्होंने भारत जैसे धर्म निरपेक्ष देश को भावनात्मक एकता का संदेश दिया.

संत रैदास कर्म तथा स्वभाव दोनों से मानवतावादी थे. वह आज कल के समाज सुधारकों जैसे नहीं थे. उनको अपने प्रचार-प्रसार की लालसा नहीं थी. उन्होंने करुणा, मैत्री, प्रज्ञा, चेतना एवं वैचारिकता द्वारा देश के दीन-हीन अवस्था और भेदभाव को समूल समाप्त करने का सदैव प्रयास किया. उनका समदर्शी भाव, समाज उत्थान, निरीह प्राणियों की सेवा ही उत्कृष्ट मानवता थी. संत रैदास जी बचपन से ही सुधारात्मक प्रवृत्ति के थे. मानवतावादी विचारों का प्रचार-प्रसार जीवनपर्यन्त किया. रैदास जी कहते हैं कि जिस समाज में अविद्या है अज्ञानता है, उस समाज का उत्थान सम्भव नहीं है. मानव का स्वाभिमान सुरक्षित नहीं रह सकता है. वास्तविक ज्ञान का प्रकाश विद्या से ही प्राप्त किया जा सकता है, इसलिए सभी मानव को विद्या अर्जन करनी चाहिए.

उनका कहना है कि बुद्धि, विचार, विवेक के बिना सभी अन्धे के समान हैं. रैदास कई बार बुद्ध की बात को बढ़ाते दिखते हैं. तथागत ने भी तर्क की कसौटी पर परखने की बात कही है. वैचारिक क्रान्ति के प्रणेता रैदास ने कहा मन ही सेऊं सहज स्वरूप तथागत बुद्ध ने धम्मपद की दो गाथाओं में भी यही बात कही, जिसका चित राग द्वेष आदि से निरपेक्ष विरत व स्थिर है, पाप-पुण्य निहित है उस पुरुष के लिए भय नहीं है. सन्तों की सुमिरिनी बौद्धों की स्मृति का ही दूसरा रूप है. क्रान्तिकारी रैदास ने बताया कि सिर मुड़ाने, पूजा करने, कठिन तपस्या करने, योग एवं वैराग्य से इच्छाओं का दमन नहीं होता है. यही बात तथागत बुद्ध ने भी अपने धम्मदेशना में बताई कि माया मोह व तृष्णा में लिप्त मनुष्य की शुद्धि न नंगे रहने से, न जटा रखने से, न कीचड़ लपेटने से, न उपवास करने से, न तपती धूप में सोने से, न धूल लपेटने से और न उकड़ूं बैठने से होती है. कई बार दिखता है कि रैदास ने तथागत बुद्ध से भी जबरदस्त प्रहार किया और वेद को नरक का द्वार बताया है. सन्त शिरोमणि रैदास कहते हैं कि ‘अरे मन तू अब अमृत देश को चल जहां न मौत है न शौक है और न कोई क्लेश. हे निरंजन निर्विकार मैं आपका जन हूं. लोक और वेद का खण्डन करके आपकी शरण में आया हूं. मज्झिम निकाय में भी इसी प्रकार की व्याख्या दी है जहां प्राणों का आयतन केवल अनन्त आकाश है. जहां प्राणी का आयतन केवल विज्ञान है, जहां प्राणी का आयतन अकिन्चन मात्र कुछ भी नहीं है और जहां न संज्ञा है, न आयतन और न नाम रूप.

महाकारुणिक शान्तिदूत तथागत बुद्ध से लगभग दो हजार वर्ष बाद पैदा हुए क्रान्तिकारी रैदास का जीवन ऊंच-नीच के भेदभाव, अन्धविश्वासों, कुप्रथाओं तथा आडम्बरों के विरोध में ही बीता था. उनकी वाणी एवं उपदेश, ब्राह्मण धर्म के खण्डन के पक्ष में और बुद्ध वचनों के समर्थन पक्ष में हैं. वस्तुतः रैदास बुद्ध वचनों से इतने प्रभावित थे कि कहीं न कहीं उन्होंने अपने पदों में बुद्ध वचनों को ही समाहित किया. वर्ण और जाति के भेदभाव को समाप्त करने के लिए महामानव बुद्ध के मानवीय एकता के सिद्धान्त को प्रतिपादित किया और कहा कि मनुष्य मात्र की एक ही जाति है इसमें किसी प्रकार की भिन्नता नहीं है.

बहुं वे सरणं यन्ति, पब्बातानि बनानि च।

आराम रुक्ख चेत्यानि, मनुस्सा भय ताज्जिता।।

तथागत बुद्ध ने कहा- अन्धविश्वासों को त्यागो और प्रज्ञा पर आधारित मध्यम मार्ग अपनाओ. इसी तरह क्रान्तिकारी रैदास ने अन्धविश्वासों को त्यागने का आवाह्न किया.

कहा भयोनाचे अरू गाये, का भयो तय कीन्हें।

कहा भयो ये चरण पाखारे, जौ लौ परम तत्व नहि चीन्हें।।

तथागत बुद्ध ने सभी दुःखों का और अन्धविश्वासों का कारण अविद्या बताया. उन्होंने कहा कि अविद्या से प्रज्ञा या सद्भाव का प्रकाश रुक जाता है तभी दुःखों का जन्म होता है. तथागत ने कहा ‘अविद्या परमं मल्’. क्रान्तिकारी रैदास ने तथागत बुद्ध के उसी वचन को अपने शब्दों में ढ़ाल कर कहा –

अविद्या अहित की न, ताते विवेक दीप मलीन।

तथागत बुद्ध ने कहा है कि काम, क्रोध, मद, लोभ और मोह ऐसे तत्व हैं जो अविद्या को बढ़ाते हैं. ये मनुष्य के प्रज्ञा में बाधक हैं. क्रान्तिकारी रैदास ने भी इसी बात को आगे बढ़ाया है और इन पांचों को लुटेरा कहा है- काम, क्रोध, मद, लोभ, मत्सर, इन पांचों मिल लूटै.

तथागत बुद्ध ने मृगदाव वन में पंचवर्गीय भिक्खुओं को धम्म देशना देकर धम्म चक्र प्रवर्तनाय किया. उसी काशी में संत शिरोमणि रैदास ने राजा वीरसेन के दरबार में पोगापंथियों को पराजित किया. क्रान्तिकारी रैदास यदि बौद्ध परम्परा के नहीं होते तो उन्हें धार्मिक चुनौती नहीं स्वीकारनी पड़ती. सदगुरु रैदास साहेब बौद्ध परम्परा का ही एक बोधिसत्व स्वरूप हैं.

भारत का इतिहास बताता है कि श्रमण संस्कृति के पुरोधा श्री महावीर स्वामी और तथागत बुद्ध के सामने सभी ब्राह्मण संस्कृति के अनुयायी तुच्छ थे. तथागत बुद्ध के उदय से पहले वैदिक धर्म को ब्राह्मण संस्कृति कहा जाता है तथा संत धर्म, जैन धर्म एवं बौद्धों की संस्कृति को श्रमण संस्कृति कहा जाता है. लेखक चन्द्रिका प्रसाद जिज्ञासु ने लिखा है कि “दोनों संस्कृतियों की मान्यता में धरती आकाश अथवा पूरब पश्चिम का अन्तर है. श्रमण संस्कृति अन्तर्मुख है और ब्राह्मण संस्कृति बहिर्मुखी है. श्रमण संस्कृति निवृत्ति प्रधान है, ब्राह्मण संस्कृति प्रवृत्ति प्रधान है. श्रमण संस्कृति संसार को दुःखपूर्ण समझकर इससे विमुक्त होने के लिए प्रयत्नशील है जबकि ब्राह्मण संस्कृति ‘भोगैश्वर्य’ परायण अर्थात संसार में भोग चाहती है, और मरने के बाद स्वर्गसुख. श्रमण संस्कृति जन्म मरण को भव बन्धन कहती हुई निर्वाण की कामना करती है, ब्राह्मण संस्कृति हजार साल की आयु और सुख भोग चाहती हैं और मरने पर अमर लोक में वास. क्रान्तिकारी रैदास साहब इसी श्रमण संस्कृति के हिमायती हैं और उन्होंने जीवन पर्यन्त इसी संस्कृति का प्रचार-प्रसार किया तथा बोधिसत्व के रूप में ज्ञात हुए. रैदास साहेब के मानवतावादी सन्देश जन-जन तक पहुंचाने की आवश्यकता है.

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/tribute-to-sant-ravidas-/

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कहे रविदास सुनो भई सन्तो ब्राह्मण के गुण तीन मान हरे , धन हरे और मति ले छीन…संघप्रिय गौतम
कुछ लोग है जिन्होंने गुरु रविदास को ईश्वर बना डाला और खुद भक्त बन बैठे, नुक्सान ये हुआ की गुरु रविदास वाणी को पढ़ने की बजाय वो अपना पूरा समय गुरु रविदास के आगे ज्योति जलाने और प्रसाद बांटने में निकाल रहे है.
कुछ लोग है जिन्होंने गुरु रविदास को पढ़ा तो पाया की वो कोई ईश्वर या चमत्कारी पुरुष नहीं वरन एक क्रांतिकारी व्यक्ति थे जिन्होंने भारत में सामाजिक आंदोलन की ज्योति जलाई. इसलिए वो गुरु रविदास के अनुयायी बने.
उदाहरण देखिये, आज गुरु रविदास जयंती पर काफी साथियो ने गुरु रविदास की तस्वीर पोस्ट की है, उनमे ज्यादातर तस्वीरें वो है जो गुरु रविदास की दिखती है, किन्तु है नहीं.. माला और तिलक से सुसज्जित ये तस्वीरें गुरु रविदास के अनुसार किसी ठग की है.
गुरु रविदास की वाणी पढ़िए :-
“माथे तिलक, हथ जप माला, जग ठगने कुं स्वांग रचाया.”
मतलब “कोई व्यक्ति जिसने माथे पर तिलक लगाया है और हाथ में माला जप रहा है उसने समाज को ठगने के लिए ढोंग रचाया है, वह ठग है.”
और आप सब ऐसी ही तस्वीरें पोस्ट कर रहे हो इसका मतलब क्या है,
यही तो मतलब हुआ की आप भक्त है, अनुयायी नहीं है.
बौद्धिसत्व गुरु रविदास जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं… SANJAY BAUDHI DASFI
एक विनती है, अगर आप आज गुरु रविदास जयंती की बधाई दे तो कृपा गुरु रविदास की तस्वीर ऐसी लगाये जिसमे माला या फिर तिलक ना हो, अन्यथा आप बधाई ही ना दे.
गुरु रविदास की वाणी पढ़िए :-
“माथे तिलक, हथ जप माला, जग ठगने कुं स्वांग रचाया.”……. SANJAY BAUDHI DASFI

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01-Feb-2016 पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना::मेरा सभी साथियों से निवेदन है कि अगर आपको समता चाहिए और जाति आधारित भेद भाव, ऊंच नीच, छुआ छूत, हींन भाव को ख़त्म करना है तो आज से ही जाति आधारित सम्बोधन ना करने का संकल्प लो, जैसे पंडित जी, ठाकुर जी, लाला जी, चौधरी साहब आदि

world knowledge day 14 aprilमेरा सभी साथियों से निवेदन है कि अगर आपको समता चाहिए और जाति आधारित भेद भाव, ऊंच नीच, छुआ छूत, हींन भाव को ख़त्म करना है तो आज से ही जाति आधारित सम्बोधन ना करने का संकल्प लो, जैसे पंडित जी, ठाकुर जी, लाला जी, चौधरी साहब आदि। व्यक्ति को उसके नाम से ही सम्बोधित किया जाना चाहिऐ, उसकी जाति के नाम से कभी भी सम्बोधित नहीं करना चाहिए । जहां तक सम्मान की बात है, तो नाम के साथ ‘जी’ का प्रयोग किया जाये, अन्यथा जिस जातिवाद के आप बुरी तरह शिकार हैं उसको स्वयं बढ़ावा दे रहे हैं। जब आप उपरोक्तानुसार सम्बोधन करते हैं तो आप स्वयं को हेय दृष्टि और हींन भावना का शिकार बना रहे हैं। विचार करें। मैंने असंख्य बार अपने ही लोगो को ऐसा करते देखा है। अगर आप समझते हैं क़ि मेरी बात सही है, तो टाइप करने का समय मेने बचा दिया है I

ग्वालियर में जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार की सभा पर कट्टरपंथियों का हमला,जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार जो उस समय मंच पर मौजूद थे फायरिंग में बाल-बाल बच गए।…National Dastak

prof vivek kumarग्वालियर में जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार की सभा पर हमला…2016-02-22

ग्वालियर। जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार पर ग्वालियर में जानलेवा हमला हुआ। रविवार को अंबेडकर विचार मंच के कार्यक्रम में विवेक कुमार शिरकत कर रहे थे। इसी दौरान बीजेपी युवा मोर्चे के सदस्यों ने हमला कर दिया और फायरिंग की। जेएनयू के प्रोफेसर विवेक कुमार जो उस समय मंच पर मौजूद थे फायरिंग में बाल-बाल बच गए।

घटना रविवार की है जब शाम के करीब चार बजे नगर निगम के बाल भवन सभागार में अंबेडकर फोरम का कार्यक्रम चल रहा था। उसी समय बीजेपी युवा मोर्चा के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया और प्रोफेसर विवेक कुमार को बोलने से रोकने की कोशिश करने लगे। करीब 4 घंटे तक चले हंगामे में बाहर खड़ी गाड़ियों में तोड़फोड़ की गई और फायरिंग भी हुई।

उपद्रवियों के खिलाफ केस दर्ज

बीजेपी युवा मोर्चा ने सेमिनार के मुख्य वक्ता JNU के प्रोफेसर विवेक कुमार के खिलाफ नारे लगाए और नफरत फैलाने का आरोप लगाया। उनकी पिटाई की भी कोशिश की गई। अंबेडकर विचार मंच के नेता दिनेश मौर्या की शिकायत के आधार पर पुलिस ने बीजेपी युवा मोर्चा के जिला अध्यक्ष विवेक शर्मा और 100 अन्य लोगों के खिलाफ SC-ST एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। पुलिस का कहना है कि पूरे मामले की जांच चल रही है। ऑडिटोरियम में लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज भी निकाली जा रही है। उसके आधार पर दोषियों की पहचान की जाएगी और जो भी दोषी होगा उसे बख्शा नहीं जाएगा।

दरअसल JNU पिछले दिनों देश विरोधी नारों के आरोपों की वजह से चर्चा में रहा है मीडिया में आये एक विडियो जिसकी सत्यता की जांच होनी अभी बाकी है, की वजह से काफी हंगामा हुआ और JNU छात्र संघ के अध्यक्ष को भी गिरफ्तार किया गया है।

मीडिया और सोशल साइट्स पर हमले की निंदा

जेएनयू प्रोफेसर विवेक कुमार पर हुए हमले की खबर सोशल साइट्स पर ट्रेंड कर रही है। देश के नामी समाज वैज्ञानिकों ने इस हमले की निंदा की है। पत्रकारों ने भी इस घटना को बोलने की आजादी पर हमला बताया है। इंडिया टूडे (हिंदी) के पूर्व कार्यकारी संपादक दिलीप मंडल ने फेसबुक पर इस घटना की निंदा की है। दिलीप मंडल ने इस हमले के लिए आरएसएस और उसकी कट्टरता को जिम्मेदार ठहराया है। वहीं दलित दस्तक के संपादक ने भी प्रोफेसर विवेक कुमार पर हुए हमले की निंदा करते हुए कहा है कि उनपर हुआ ये हमला लोकतंत्र, संविधान और अंबेडकरवाद पर हमला है। प्रोफेसर विवेक कुमार दलित दस्तक संपादक मंडल के सदस्य भी हैं।

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/attack-on-jnu-prof-vivek-kumar-in-gwalior/

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क्या है राष्ट्रवाद…रवीश की कलम से

ravish-kumarक्या है राष्ट्रवाद…रवीश की कलम से …

किसने दी इस गुंडागर्दी की छूट?

राष्ट्रवाद के साथ सबसे बड़ी खूबी यह है कि कोई भी बिना जाने इसे जानने का दावा कर सकता है। 19वीं सदी से पहले तो इसके बारे में कोई जानता ही नहीं था लेकिन पिछले 200 सालों में राष्ट्र और राष्ट्रवाद का स्वरूप उभरता चला गया। इन 200 सालों में राष्ट्रवाद के नाम पर फासीवाद भी आया जब लाखों लोगों को गैस चैंबर में डाल कर मार दिया गया। हमारे ही देश में राष्ट्रवाद का नाम जपते जपते आपात काल भी आया और दुनिया के कई देशों में एकाधिकारवाद जिसे अंग्रेजी में टोटेलिटेरियन स्टेट कहते हैं। जिसमें आप वो नहीं करते जो राज्य और उसके मुखिया को पसंद नहीं।

सत्ता पर जिस पार्टी का कब्ज़ा होता है वो पुलिस के दम पर आपके नाक में दम कर देती है। मेरी राय में राजनीतिक दलों के पास राष्ट्रवाद की अंतिम परिभाषा नहीं होती है न होनी चाहिए। मैंने कहा कि राजनीतिक दलों के पास राष्ट्रवाद की अंतिम परिभाषा तब होती है जब उनका इरादा लोकतंत्र को खत्म कर देना होता है।

क्या कभी आपने देखा है कि राजनीतिक दल के कार्यकर्ता किसी नीति, घटना और घोटाले के वक्त अपने ही दल के खिलाफ नारे लगा रहे हों कि उनके लिए दल नहीं देश महत्वपूर्ण है। ऐसा होता तो बीजेपी से पहले कांग्रेस के कार्यकर्ता 2जी घोटाले के खिलाफ़ सड़कों पर आ गए होते। ऐसा होता तो बीजेपी के कार्यकर्ता, नेता व्यापम घोटाले पर पार्टी से इस्तीफा दे देते। देश जब 200 रुपये किलो दाल खा रहा था तो अपनी ही सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करते। केरल में आरएसएस कार्यकर्ता पी.वी. सुजीत की हत्या कर दी गई। क्या आप उम्मीद करेंगे कि कांग्रेस, सीपीएम के नेता इस हत्या कांड के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे। क्या आप उम्मीद करेंगे कि बीजेपी के सभी नेता अपने ही नेता ओ.पी. शर्मा के खिलाफ सड़क पर उतरेंगे। निंदा परनिंदा छोड़ दीजिए। इसलिए दलों की राजनीति दलों के हित के लिए होती है। हिंसा का इतिहास आपको हर राजनीतिक दल की सरकार में मिलेगा। आप हर घटना को राष्ट्रवाद के चश्मे से नहीं देख सकते। दंगे किस दल की सरकार में नहीं हुए और किस दल का नाम नहीं आया है, तो क्या आप उन्हें गद्दार या राष्ट्रविरोधी कहेंगे।

मैं यह नहीं कह रहा है कि राजनीतिक दल के लोग देशभक्त नहीं होते। बिल्कुल होते हैं। हर दल अपनी सोच के हिसाब से देश को सजाने संवारे की कल्पना करता है। लेकिन जब धर्म, नस्ल, रंग, भाषा और यहां तक कि टैक्स के नाम पर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का प्रयास किया जाता है तो उसका इरादा राष्ट्रवाद नहीं होता। उसका इरादा कुछ और होता है। राष्ट्रवाद के नाम पर अपना एकाधिकार काम करना। हर दलील को चुप करा देना। जहां दल और नेता की चलती है। बाकी सब उसके इशारे पर चलते हैं।

जेएनयू में भारत को तोड़ने और बर्बादी के नारे लगाने वालों की अभी तक पहचान क्यों नहीं हुई है। क्यों सूत्रों के हवाले से खबरें आ रही हैं। सभी ने इनका विरोध किया है। जेएनयू के तमाम छात्रों और शिक्षकों ने भी। उनका विरोध कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी को लेकर है जिसके खिलाफ अभी तक देशद्रोह के कोई सबूत नहीं मिले हैं। दिल्ली पुलिस कहती है कि अब अगर वो ज़मानत के लिए अप्लाई करेगा तो विरोध नहीं करेंगे। वो नौजवान है, उसे दूसरा मौका दिया जा सकता है। इस हृदय परिवर्तन से पहले गली गली में रैली कर जेएनयू को बदनाम किया गया कि वहां राष्ट्रविरोधी तत्व पढ़ते हैं। पटियाला हाउस कोर्ट में दूसरे दिन भी जो हुआ वो क्या है।

क्या कोई भीड़ हाथ में तिरंगा लेकर खड़ी हो जाएगी तो वो हमसे आपसे ज़्यादा देशभक्त हो जाएगी। क्या अब तिरंगा लेकर लोगों को डराया जाएगा और इंसाफ के हक से वंचित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट की नाराज़गी के बाद भी दूसरे दिन कन्हैया कुमार के साथ मारपीट की कोशिश हुई। सुप्रीम कोर्ट ने जिन वकीलों को कोर्ट के भीतर जाने की अनुमति दी थी उन्होंने बताया कि गालियां दी गई हैं। भय का माहौल है। सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर सुनवाई रोक दी और कोर्ट रूम को खाली कराया। कन्हैया कुमार को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। तीस हज़ारी कोर्ट के वकीलों ने कहा है कि पटियाला कोर्ट मामले में यदि किसी वकील को गिरफ्तार किया गया तो दिल्ली पुलिस का विरोध किया जाएगा। दिल्ली के तमाम बार संघ हड़ताल पर जाने का विचार कर रहे हैं। सुनवाई हुई नहीं, फैसला आया नहीं लेकिन चैनलों और वकीलों और संगठनों ने आतंकवादी घोषित कर दिया। अगर ऐसी ही भीड़ आपको उठा ले जाए और हाथ में तिरंगा लेकर घोषित कर दे कि आतंकवादी हैं और मार दे तो आप इंसाफ के लिए कहां जाएंगे।

इतिहास में यह सब हुआ है। राष्ट्रविरोधी बताकर राजनीतिक विरोधियों की हत्याएं हुई हैं। जर्मनी में साठ लाख यहूदियों को गैस की भट्टी में झोंक दिया गया। ये राष्ट्रवाद के अपने ख़तरे हैं। इन ख़तरों पर हमेशा बात होनी चाहिए तब तो और जब लोग राष्ट्रवाद की खूबियां बघारने में जुटे हों।

कोलकाता की जाधवपुर युनिवर्सिटी में भी कुछ छात्रों ने आज़ादी के नारे लगाए और अफज़ल गुरु का समर्थन किया। इन्हें रेडिकल ग्रुप का बताया जा रहा है। एक छात्र ने सफाई दी कि हमने अभिव्यक्ति की आज़ादी के संदर्भ में आज़ादी का नारा लगाया तो एक छात्रा ने कहा कि उसने कश्मीर की आज़ादी और अफज़ल गुरु के लिए नारे लगाए हैं। मेरे नारे राष्ट्रविरोधी कैसे हो सकते हैं क्योंकि बीजेपी ने तो पीडीपी से मिलकर सरकार बनाई है और पीडीपी के लिए अफज़ल गुरु शहीद है। कई छात्रों ने ऐसी सोच का विरोध किया है और तमाम संगठनों ने निंदा की है। जाधवपुर यूनिवर्सिटी के वीसी ने कहा है कि जिन लोगों ने नारे लगाए वो विश्वविद्यालय के छात्र नहीं थे, बाहर के असामाजिक तत्व थे। वाइस चांसलर ने कहा है कि असमाजिक तत्वों की हरकत की वजह से छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकार को नहीं छीनना चाहिए।

कानून के पन्ने पर देशद्रोह की अलग समझ है और जनता के दिलो दिमाग में अलग। इतिहास की किताबों में राष्ट्रवाद को लेकर अनंत व्याख्याएं हैं। अव्वल तो राष्ट्रवाद और देशभक्ति दोनों में ही मीलों का अंतर है। एक जटिल मसले का अगर हम बात-बात में राजनीतिक इस्तमाल करेंगे तो आप दर्शकों को राष्ट्रवादी होने से पहले इतिहास की दस बीस किताबें पढ़ लेनी चाहिए। राष्ट्रगान लिखने वाले टगौर ने राष्ट्रवाद को अजगर सापों की एकता नीति कहा था। इस तरह के उदाहरणों से भी हमारी समझ साफ नहीं होती है। मगर राष्ट्रवाद को उचक्कों की शरणस्थली भी कहा गया है और राष्ट्रवाद के लिए लोगों ने सर्वोच्च बलिदान भी दिये हैं।

जेएनयू में प्रोफेसरों ने राष्ट्रवाद पर अगले एक हफ्ते तक सार्वजनिक क्लास लगाने का फैसला किया है। पांच बजे से ये क्लास लगेगी। बुधवार को प्रोफेसर गोपाल गुरु ने हज़ारों छात्रों के बीच पहली क्लास ली। टॉपिक था राष्ट्र क्या है। इसके बाद प्रोफेसर जी अरुणिमा, तनिका सरकार, निवेदिता मेनन, आयशा किदवई, अचिन विनायक का राष्ट्रवाद पर लेक्चर होगा। ये खूबी आपको सिर्फ जेएनयू में मिलेगी। मेरी तरफ से दो गुज़ारिश है। एक कि यह ओपन क्लास हो सके तो हिन्दी में भी हो और दूसरा इसमें आरएसएस से जुड़े प्रोफेसरों को भी राष्ट्रवाद पर लेक्चर देने के लिए बुलाया जाए।

राष्ट्रवाद 19वीं सदी की सबसे ताकतवर विचारधारा रही है जिसने हम इंसानों को हमेशा हमेशा के लिए बदल दिया। एक राष्ट्र एक भाषा एक संस्कृति जैसी सोच ने तमाम तरह की विविधताओं को कुचल दिया तो कहीं इन विविधताओं ने इस विचारधारा के खिलाफ संघर्ष करते हुए खुद को बचाए भी रखा। कई लोग कहते हैं कि सियाचिन में जान देने वाले सैनिक को क्या यह छूट है कि वो अफजल गुरु के लिए नारे लगाए। लेकिन क्या इसी देश में जंतर मंतर पर वन रैंक वन पेंशन की मांग कर रहे सैनिकों के कुर्ते नहीं फाड़े गए। मेडल नहीं खींचे गए। सैनिकों की चिन्ता है तो जंतर मंतर पर सैनिक महीनों बाद भी क्यों बैठे हैं। क्या वे देशद्रोही हैं। कुछ ने कहा कि टैक्सपेयर के पैसे से जेएनयू क्यों चले। इस तरह की बेतुकी दलील देने वाले यह भी कहते हैं कि आईआईटी, एम्स और आईआईएम के छात्र टैक्स पेयर के पैसे पर पढ़ते हैं और देश सेवा छोड़ विदेश नौकरी करने चले जाते हैं। टैक्स राष्ट्रवाद ने क्यों नहीं आवाज़ उठाई कि बैंक और उद्योंगों के लाखों करोड़ रुपये के कर्ज क्यों माफ हो रहे हैं और गरीब किसानों के क्यों नहीं। ज़ाहिर है टैक्स राष्ट्रवाद की दलील ग़रीब विरोधी है।

इकोनोमिक टाइम्स में आज स्वामिनाथन एस अंकलेसरिया अय्यर ने एक लेख लिखा है। लेख का उन्वान है कि राष्ट्रवाद विरोधी महज़ एक गाली है, एक मुक्त समाज में इसकी कोई जगह नहीं। उन्होंने एक मिसाल दी है। 1933 का साल था जब ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र संघ में इस बात पर बहस हुई कि यह सदन किसी भी परिस्थिति में राजा या देश के लिए नहीं लड़ेगा। प्रस्ताव पास हो गया और पूरे ब्रिटेन में खलबली मच गई। छात्रों की जमकर आलोचना हुई लेकिन किसी को देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार नहीं किया गया। स्कॉटिश नेशनल पार्टी ब्रिटेन से अलग होना चाहती है। अपना स्काटिश राष्ट्र बनाना चाहती है तो क्या उनके नेताओं को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाए। ऐसा तो हुआ नहीं। अय्यर ने इस तरह के कई उदाहरण दिये हैं।
दुनिया के नक्शे में राष्ट्र के बनने की प्रक्रिया अभी भी मुकम्मल नहीं हुई है। कहीं राष्ट्र तबाह हो रहे हैं तो कहीं बिखर भी रहे हैं। हर साल कहीं नया झंडा बनता है तो कहीं पुराना गायब हो जा रहा है। जेएनयू की घटना के बाद बीजेपी और संघ इस बात को लोगों को तक पहुंचाने में सफल रहे कि राष्ट्रविरोधी नारों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जो भारत को तोड़ने की बात करेगा उसे गोली मार देने की बात तक कही गई। कानून अदालत का कोई लिहाज़ नहीं। राष्ट्रवाद कानून हाथ में लेने का लाइसेंस नहीं है। असम में ही बोडो अलग राज्य की मांग करते रहे हैं लेकिन उनके एक गुट के साथ कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इसी देश में अगल खालिस्तान की मांग को लेकर ख़ून खराबा हो चुका है। क्या राम जेठमलानी ने इंदिरा गांधी की हत्या से जुड़े लोगों का मुकदमा नहीं लड़ा था। क्या जेठमलानी को बीजेपी ने राज्य सभा का सदस्य नहीं बनाया। पार्टी में शामिल नहीं किया। पीडीपी की अफज़ल गुरु के बारे में क्या राय है कौन नहीं जानता। उनके साथ किसने सरकार बनाई कौन नहीं जानता।

दिक्कत ये है कि जब इतिहास पढ़ने की बारी आती है तो आप और हम इतिहास का मज़ाक उड़ाते हैं। फिर जब राजनीति करनी होती है तो इतिहास की अनाप शनाप व्याख्याएं करने लगते हैं। मौजूदा समय में राष्ट्रवाद का राजनीतिक इस्तेमाल राष्ट्रवाद की कोई नई समझ पैदा कर रहा है या जो पहले कई बार हो चुका है उसी का बेतुका संस्करण है। यह ख़तरनाक प्रवृत्ति है या लोग ऐसे ख़तरों से निपटने में सक्षम हैं।

 

http://khabar.ndtv.com/video/show/news/prime-time-intro-who-will-define-nationalism-404170

rastra desh country

 

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निरंतर मीडिया प्रचार से भेड़ को भेड़िया और भेड़िया को भेड़ साबित किया जाता है ,निरंतर मीडिया प्रचार से जनता को गलत के चुनाव के लिए राजी किया जाता है

मीडिया मनेजमेंट नीति

-मसालेदार खबर को ज्यादा कवरेज से जनहित की खबर को दबाया जाता है
-पहले पन्ने पर अपने हित की और जनहित की छोटी से पिछले पन्नों पर दी जाती है
-निरंतर मीडिया प्रचार से भेड़ को भेड़िया और भेड़िया को भेड़ साबित किया जाता है
-प्रोपगंडा के मकसद से एक घंटे की न्यूज़ को चौबीस घंटे का चैनल बनाया जाता है
-प्रोपेगंडा से जनता को गलत के चुनाव के लिए राजी किया जाता है

उदाहरण हिटलर का मीडिया प्रयोग और राष्ट्रवाद के नाम पर मानवता का कत्लेआम

एक मुलाक़ात डाक्टर अंबेडकर के साथ…..कोलंबिया यूनिवर्सिटी से माननिये श्री रवीश कुमार जी February 13, 2016.. उनके ब्लॉग http://naisadak.org/dr-ambedkar-in-columbia/ से साभार

image-36 (1)दिलो दिमाग़ पर जिसका असर हो उसके क़दमों के निशान छू लेना किसी सपने से कम नहीं । कोलंबिया यूनिवर्सिटी जाने  के लिए हाँ शायद इसी वजह से किया था । न्यूयार्क घूमते वक्त हर वक्त दिमाग़ में यह बात नाचती रही कि कब डाक्टर भीमराव अंबेडकर के विश्वविद्यालय में उनके नाम की पट्टी देखूँगा । 1913-16 के बीच डाक्टर अंबेडकर यहाँ पढ़े थे । उनके यहाँ से जाने के ठीक सौ साल बाद मुझे आने का मौका मिला है । कोलंबिया लॉ स्कूल के दरवाज़े पर पहुँचते ही ठिठक गया । बहुत कम ऐसा होता है जब मैं अपनी तस्वीर के लिए उत्सुक रहता हूँ । प्रवेश करते ही फोटो खींचाने लगा । लगा कि शायद इसके आगे देखने का मौका ही न मिले ।

अंदर जाते ही सबसे पहले यही पूछा कि डाक्टर अंबेडकर का नाम कहाँ लिखा है । जिस सम्मेलन के लिए आया था वहाँ जाने का ख़्याल ही न रहा । दीवार पर बहुत से नाम देखकर पढ़ने में वक्त चला गया, पता चला कि ये उनके नाम हैं जिन्होंने सेंटर की इमारत बनाने में योगदान किया । काफी देर हो गई । सम्मेलन कक्ष में जाना ही पड़ गया । लंच ब्रेक होते ही प्रोफेसर सुदीप्ता कविराज और वत्सल से यही सवाल किया कि मुझे खाना नहीं खाना है । पहले वहाँ जाना है जहाँ डाक्टर अंबेडकर का नाम लिखा है ।

प्रोफेसर कविराज ने कहा कि मैं लेकर चलूँगा । प्रोफेसर कविराज आगे आगे चलने लगे और मैं पीछे पीछे । हर्बर्ट लेमन लाइब्रेरी के दरवाज़े पर हमें रोक लिया गया । यहाँ आने के लिए पास कहीं से बनना था । प्रोफेसर ने अपना कार्डनिकाला और कहा कि हमें बस उस मूर्ति तक जाना है । रिसेप्शन पर महिला ने ताक़ीद किया कि पहली बार है तो जाने दे रही हूँ । प्रोफेसर कविराज ने शराफ़त से उनका दिल जीत लिया था ।

रिसेप्शन पर एक नोटबुक दिया गया जिसमें मैंने आने का मक़सद लिख दिया । मुझसे पहले प्रोफेसर कविराज ने लिखा । उनसे पहले बहुतों ने लिखा था । उसके बाद हमें बताया गया कि आप उस तरफ जा सकते हैं । सोच रहा था कि कोलंबिया पढ़ने के लिए भारत से कितने छात्र आते होंगे । क्या उनमें ये जानने की दिलचस्पी नहीं जगी होगी कि एक छात्र के रूप में यहाँ अंबेडकर का जीवन कैसा रहा होगा उसके बारे में पता करे, लिखे । जवाब जानता हूँ पर अभी सवाल महत्वपूर्ण है ।

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अब मैं यहाँ पहुँच गया था । मेरा आना सफल हो चुका था । उनकी मूर्ति के पास माला रखी हुई थी । यूनिवर्सिटी ने अपनी लाइब्रेरी में इतनी छूट दी है ये कम बड़ी बात नहीं । शायद उसे अपने इस छात्र पर विशेष नाज़ होगा । हमने भी माला चढ़ा दी । बस माला चढ़ाने की तस्वीर यहाँ नहीं लगा रहा । एक बेहतरीन छात्र के प्रति छोटा सा सम्मान था जिसने धर्म की सत्ता से लोहा लिया था । जो भारत के इतिहास में संपूर्ण रूप से पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता और विचारक थे ।

उसके बाद वहाँ रखे कुछ दस्तावेज़ पढ़ने लगा । जिसे पढ़ कर लगा कि एक छात्र के रूप में अंबेडकर के बारे में चर्चा ही नहीं हुई । एक छात्र के रूप में अंबेडकर की भूख और लगन की कहानियाँ लाखों छात्रों की प्रेरित कर सकती थी । एक नोट में लिखा है कि अंबेडकर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में तरह तरह के कोर्स लिये । अमरीका के इतिहास से लेकर रेलवे तक के बारे में पढ़ा। उस समय के कई महान प्रोफ़ेसरों से संगत किया और विषयों को जानने का प्रयास किया । सिर्फ तीन साल के प्रवास में अंबेडकर ने कितना पढ़ा होगा । उन महान प्रोफ़ेसरों के संगत में आना क्या मामूली बात रही होगी ? क्या उन प्रोफ़ेसरों ने यूँ ही किसी छात्र को इतना वक्त दिया होगा ?

उसी नोट में लिखा है कि 1930 में डाक्टर अंबेडकर ने अलुमनी पत्रिका में लिखा है कि मेरी जिंदगी के सबसे बेहतरीन दोस्त कोलंबिया में मेरे क्लासमेट और प्रोफेसर जॉन डीवे, प्रोफेसर जेम्स शॉटवेल, एडविन सेलिगमन, प्रोफेसर जेम्स हर्वे रोबिनसन रहे हैं ।

अंबेडकर 1923 में भारत वापस आ गए । आप सब जानते हैं कि उनका आगमन नहीं होता तो भारत की आज़ादी की लड़ाई का वैचारिक सामाजिक पक्ष कमज़ोर हो जाता । अंबेडकर एक दूसरे छोर पर खड़े होकर उसी दौर में सामाजिक इंसाफ़ की बात कर रहे थे । उन्होंने आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर किये बिना इन सवालों को आगे किया । वे अंग्रेज़ों के हाथ का खिलौना नहीं बने । अंबेडकर ने आज़ादी की लड़ाई को समृद्ध कर दिया ।

अंबेडकर बीसवीं सदी के बड़े विचारकों में एक थे । उन्होंने अपनी तार्किकता के लिए धर्म के प्रतीकों का सहारा नहीं लिया । दुख की बात है कि हमारी राजनीति ने उन्हें सिर्फ एक मूर्ति बनाकर छोड़ दिया है । उनके लिए अंबेडकर का मतलब इतना ही है । जयंती पुण्यतिथि याद रखो फिर भूल जाओ । आधुनिक भारतीय राजनीतिक परंपरा में नायक पूजा का विरोध करना अगर कोई सीखाता है तो वो अंबेडकर हैं । जिस दौर में लोग लंदन जाते थे अंबेडकर अमरीका आए । आज देश में अंबेडकर की अनगिनत मूर्तियाँ हैं पर एक भी क़द्दावर दलित नेता नहीं है । इसलिए इनमें से कोई भी अंबेडकर जैसा छात्र नहीं बन सका । कांशीराम आख़िरी व्यक्ति थे जिन्होंने जाति की सत्ता को चुनौती दी । उनके बाद दलित नेता अपने अपने दल में एडजस्ट होने की राजनीति करने लगे । डाक्टर अंबेडकर एडजस्ट होने नहीं आए थे । वो तोड़ने आए थे ।

उस विश्वविद्यालय की दरो दीवार को सलाम जिसने एक छात्र को भावी विचारक और राजनेता के रूप में ढलने का हर मौका उपलब्ध कराया । भारत की जनता को कोलंबिया यूनिवर्सिटी का शुक्रगुज़ार होना चाहिए । दलितों को विशेष रूप से। कोलंबिया यूनिवर्सिटी को आधुनिकता और तार्किकता के केंद्र के रूप में ही याद रखा जाना चाहिए । सीखना चाहिए उस जगह से जहाँ अंबेडकर ने कितना कुछ सीखा । हमारे मुल्क में विश्विद्यालय बंद करने के नारे लग रहे हैं । भारतीय विश्वविद्यालयों का जो हाल है वहाँ मूर्ति पूजने वाला तो पैदा हो सकता है अंबेडकर नहीं । आप कभी कोलंबिया आएं तो हर्बर्ट लेमन लाइब्रेरी आइयेगा । अपने संविधान निर्माता के बारे में नहीं जानना चाहेंगे !

Source:

http: // naisadak.org/ dr-ambedkar-in- columbia/

 

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बुद्ध की शिक्षाओं से एशिया ही नहीं विश्व भर में पहले की तरह अगुवा बन सकता है भारत देश …Written by आनंद श्रीकृष्ण

buddhist flagबोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सन् 1956 में विजयदशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली थी. यह वह तारीख थी, जब भारत में धम्म कारवां को नयी गति और दिशा मिली थी. असल में डॉ. आंबेडकर ने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि भारत में प्रचलित जातिगत असमानता दलितों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है. 9 मई, 1916 को कोलम्बिया विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में अपने रिसर्च पेपर ‘भारत में जातियाः उनकी संरचना, उद्भव एवं विकास’ के जरिए डॉ. आंबेडकर ने यह साबित कर दिया था कि कुछ स्वार्थी लोगों ने जातिगत असमानता की व्यवस्था को शास्त्र सम्मत दिखाने की कोशिश की है और ये धारणा फैलाई है कि शास्त्र गलत नहीं हो सकते. भारत लौटने के बाद उन्होंने दलितों के मानवाधिकारों के लिए अलग-अलग मोर्चे पर प्रयास करना शुरू कर दिया. महाड सत्याग्रह द्वारा सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने के अधिकार, कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश का अधिकार, अंग्रेजी सरकार के सामने दलितों के लिए वयस्क मताधिकार का अधिकार, गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के अधिकार की लड़ाई ऐसी ही कोशिश थी. इस संघर्ष के दौरान डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि हिन्दू धर्म में रहकर दलितों को राजनैतिक आजादी का अधिकार भले ही मिल जाए लेकिन उनको आर्थिक और सामाजिक बराबरी का हक नहीं मिल सकता. इसलिए 1935 में येवला (नाशिक) में डॉ. आंबेडकर ने घोषणा की थी कि वह हिन्दू धर्म में पैदा हुए थे यह उनके वश की बात नहीं थी लेकिन हिन्दू रहकर वह मरेंगे नहीं, यह उनके वश में है.

 

धर्म परिवर्तन पर विचार करने के लिए 30 एवं 31 मई 1936 को बंबई में आयोजित महार परिषद को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा थाः -‘धर्म परिवर्तन कोई बच्चों का खेल नहीं है. यह ‘मनुष्य के जीवन को सफल कैसे बनाया जाय’ इस सरोकार से जुड़ा प्रश्न है… इसको समझे बिना आप धर्म परिवर्तन के संबंध में मेरी घोषणा के वास्तविक निहितार्थ का अहसास कर पाने में समर्थ नहीं होंगे. छुआछूत की स्पष्ट समझ और वास्तविक जीवन में इसके अमल का अहसास कराने के लिए मैं आप लोगों के खिलाफ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचारों की दास्तान का स्मरण कराना चाहता हूं. सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने का हक जताने पर या सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने का अधिकार जताने पर या घोड़ी पर दूल्हे को बैठाकर बारात को जुलूस की शक्ल में सार्वजनिक रास्तों से घुमाने के अधिकार आदि का इस्तेमाल करने पर आप लोगों को सवर्ण हिन्दुओं द्वारा मारे-पीटे जाने के उदाहरण तो बहुत आम हैं. लेकिन ऐसी और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण दलितों पर सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न का कहर ढाया जाता है… खरी बात पूछूं तो बताइये कि इस समय हिन्दुओं और आप लोगों के बीच क्या किसी प्रकार के समाजिक संबंध हैं?’

बाबासाहेब ने आगे कहा, ‘जिस तरह मुसलमान हिन्दुओं से भिन्न हैं; उसी तरह दलित लोग भी हिन्दुओं से नितान्त भिन्न हैं. जिस तरह मुसलमानों और ईसाइयों के साथ हिन्दुओं का रोटी-बेटी का कोई सम्बन्ध नहीं होता है उसी तरह आप लोगों के साथ भी हिन्दुओं का किसी भी प्रकार का रोटी-बेटी का कोई संबंध नहीं है… आपका समाज और उनका समाज दो बिल्कुल अलग-अलग समूह हैं… एक अनजान आदमी तो दलित और सवर्ण के बीच कोई अन्तर कर ही नहीं सकता. सवर्ण हिन्दुओं को जब तक साथ यात्रा कर रहे दलितों की जातियों की जानकारी नहीं होती है तब तक तो यात्रा के दौरान वे बड़े दोस्ताना अंदाज में व्यवहार करते हैं, लेकिन जैसे ही किसी हिन्दू को यह पता चलता है कि वह जिस व्यक्ति से बातचीत कर रहा है वह दलित है; तो उसका मुंह और मन तुरंत कसैला हो जाता है.’ बाबासाहेब ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ऐसा क्यों होता है?

बाबासाहेब ने कहा, ‘अपने को एक मुसलमान, एक ईसाई, एक बौद्ध या एक सिक्ख कहना एक धर्म का परिवर्तन मात्र नहीं है बल्कि एक नाम का भी परिवर्तन है. यही सच्चा नाम परिवर्तन है… जब तक आप हिन्दू धर्म में बने रहेंगे तब तक आपको अपने जाति नाम को छिपा कर नाम-परिवर्तन करते रहने पर निरन्तर मजबूर होना पड़ेगा… इसलिए मैं आप लोगों से यह पूछता हूं कि बजाय इसके कि आप आज एक नाम बदलें, कल दूसरा नाम बदलें और पेंडुलम की तरह लगातार ढुलमुल हालत में बने रहें, आप लोगों को धर्म परिवर्तन करके अपना नाम स्थाई रूप से क्यों नहीं बदल लेना चाहिये?’ डॉ. आंबेडकर द्वारा कही गई उपरोक्त बातें कमोबेश आज भी उतनी ही सत्य हैं जितनी कि सन् 1935 में थी.

एक सवाल यह भी उठता है कि बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म ही क्यों अपनाया? असल में 20 वर्षों तक सभी धर्मों का गहन अध्ययन करने के बाद डॉ. आंबेडकर इस निश्चय पर पहुंचे कि बौद्ध धर्म सबसे उपयुक्त है, क्योंकि बौद्ध धर्म का जन्म भारत में ही हुआ है और बौद्ध धर्म समानता, करूणा, मैत्री, अहिंसा और भाई-चारे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है. इसमें ऊंच-नीच और छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं है. जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करने के पश्चात डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर, 1956 को बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर बौद्धधम्म के प्रचार-प्रसार को नई गति प्रदान की. उन्होंने 22 प्रतिज्ञाओं का एक नया फार्मूला दिया. भगवान बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले अषाढ़ पूर्णिमा के दिन धम्म चक्र प्रवर्तन करके धम्म कारवां की शुरूआत की थी. डॉ. आंबेडकर ने सन 1956 में विजयदशमी के दिन अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा लेकर धम्म चक्र का अनुपर्वतन किया था. धम्म कारवां आज काफी फल-फूल चुका है. 1956 में पांच लाख लोगों की संख्या आज करोड़ों में पहुंच गई है. अंग्रेजी अखबार द टाईम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली संस्करण,10 नवंबर 2006) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में सन 2006 में 30 लाख लोगों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. 2001 की जनगणना के वक्त बढ़कर यह लगभग 81 लाख हो चुकी थी. जो कि 2011 की आखिरी जनगणना के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 97 लाख पहुंच गई हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ भारत में बौद्धों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख से भी अधिक मानते हैं. उनका मानना है कि जनगणना में वास्तविक संख्या इसलिए सामने नहीं आ पाती हैं क्योंकि काफी लोग बौद्ध होते हुए भी अपने को आधिकारिक दस्तावेजों में बौद्ध नहीं घोषित करते. अमेरिका और यूरोप में भी बौद्ध धम्म बहुत तेजी से बढ़ती हुई जीवनशैली बनता जा रहा है. जिनेवा आधारित ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक व आध्यात्मिक संगठन’ ने 2009 का ‘विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म का सम्मान’ बौद्ध धम्म को प्रदान किया.

बौद्ध धम्म को गतिमान रखने की सीख भगवान बुद्ध से ली जा सकती है. गौतम बुद्ध ने छः वर्षों तक ध्यान साधना किया और विपस्सना का आविष्कार किया. विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व को प्राप्त किया. बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात 45 वर्षो तक शहरों, गांवों, कस्बों में जा-जाकर धम्म का प्रसार किया. भगवान बुद्ध बोधगया से चलकर सारनाथ आए थे और धम्मचक्र प्रवर्तन किया था. वह इस भरोसे में नहीं बैठे रहे कि लोग बोधगया आए और तब वो उनको धम्म सिखाएं. इसीलिए डॉं. आंबेडकर ने ‘इंगेज्ड बुद्धिज्म’ की परिकल्पना की थी. इस परिकल्पना को पूरी दुनिया में मान्यता मिली है. वियतनाम में भिक्खु संघ ने अमेरिका के आक्रमण के खिलाफ पूरी ताकत से विरोध किया और लोगों के बीच जाकर धर्म का प्रचार-प्रसार किया. ताईवान में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में वहां के भिक्खुनी संघ ने अहम भूमिका अदा की है. ताईवान में भिक्खुनी संघ स्कूल भी चलाता है, अस्पताल भी चलाता है और लोगों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं का निदान भी करता है. ताईवान के उदाहरण को भारत वर्ष में भी दोहराने की आवश्यकता है. यहां भी भिक्खुओं को लोगों से संपर्क करना होगा. लोगों के बीच जाना होगा. उन्हें यह विचार त्यागना होगा कि लोग उनके पास आएंगे तब वो उन्हें धम्म की शिक्षा और दीक्षा देंगे.

इस कड़ी में बौद्ध संस्कृति विकसित करना भी जरूरी है. हर सिक्ख रविवार को अनिवार्य रूप से गुरूद्वारा जाता है, ईसाई चर्च जाते है. हर मुसलमान शुक्रवार की नमाज मस्जिद जाकर अता करता है. बौद्ध समाज के लोगों को भी ऐसी परंपरा डालनी होगी. डॉ. आंबेडकर ने स्वयं बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने आवास को सजाना आरंभ किया और उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की. डॉ. आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1956 को सारनाथ के मृगदाय वन में 150 भिक्खुओं के समक्ष भाषण दिया था कि प्रत्येक बौद्ध के लिए अनिवार्य है कि वह हर रविवार को बौद्ध विहार में जाए और वहां उपदेश सुने. यदि ऐसा नहीं होगा तो नव दीक्षित बौद्ध को धम्म की जानकारी नहीं हो सकेगी. प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाए जिसमें सभा करने के लिए काफी स्थान रहे. बौद्ध विहारों को सभामंदिर होना चाहिए.

बौद्ध धम्म के अनुयायियों को उपजातिवाद से भी बचने की जरूरत है. डॉ. आंबेडकर का निष्कर्ष था कि जाति की प्रकृति ही विखण्डन और विभाजन करना है. जातीय भावनाओं से आर्थिक विकास रूकता है. इसलिए डॉ. अंबेडकर का लगातार यह प्रयत्न रहा कि भारत में एक ऐसी सांझी संस्कृति का निर्माण हो जिसमें जात-पात के आधार पर लोगों के साथ अन्याय और शोषण न हो और हर नागरिक अपनी क्षमताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सके. आपस में उपजातिवाद छोड़कर एक साझा पहचान जो बौद्ध पहचान है उसको अपनाना चाहिए और आपस में रोटी-बेटी का संबंध कायम करना चाहिए, जिससे कि राष्ट्रीय एकता के विकास में सहायता मिले. डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि समाज के सभी वर्गों में खान-पान का संबंध विकसित हो. जो लोग धम्म दीक्षा लेने के बाद भी जाति और उप-जाति बनाए रखना चाहते हैं या जात-पात में विश्वास करते हैं वो बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि इससे बौद्ध धर्म में भी जाति का जहर फैल जाएगा.

धम्म कारवां की लोकप्रियता से डरे कुछ लोगों और संगठनों द्वारा अनेकों दुष्प्रचार करने की घटना भी सामने आई हैं. इसमें एक दुष्प्रचार यह किया जा रहा है कि बौद्धधर्म केवल दलित अपना रहे हैं. जबकि हकीकत इससे अलग है. भगवान बुद्ध दलित नहीं थे. उनके प्रथम पांचों शिष्य ब्राह्मण थे. उसके बाद यश और उसके 54 साथी व्यापारी वर्ग से थे. उसके बाद धम्मदीक्षा लेने वाले उरूवेला कश्यप, नदी कश्यप, गया कश्यप और उनके 1000 शिष्य सभी ब्राह्मण थे. राजा बिबिंसार और राजा प्रसेनजित तथा शाक्य संघ के लोग सभी के सभी क्षत्रिय थे. वर्तमान समय में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मानंद कौशाम्बी, डी डी कौशाम्बी पूर्व में ब्राह्मण थे. इसी तरह भदन्त आनंद कौशलायन, आचार्य सत्यनारायण गोयनका (परिनिर्वाण प्राप्त), भन्तेसुरई सशई, अमेरिका के मशहूर फिल्म अभिनेता रिचर्ड गेरे, फिल्म प्रोड्यूसर टीना टर्नर कोई भी दलित वर्ग से नहीं है. इसलिए बौद्ध धर्म के विरोधियों के इस मिथ्या प्रचार को कि बौद्ध धर्म दलितों का धर्म होता जा रहा रोका जाना चाहिए.

इसी तरह एक प्रचार और किया जा रहा है कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. ऐसा प्रचार पहले भी होता रहा है. बुद्ध को अवतार मानने की बात सबसे पहले संभवतः छठी सदी के दौरान मत्स्यपुराण में की गई, मत्स्य पुराण का एक चरण 700 ईसवीं में महाबलीपुरम में, जहां मध्यकालीन ब्राह्मण पुस्तकों में 10 अवतारों की संकल्पना की गई है, पल्लव स्मारकों में उत्कीर्ण हैं. इस बिषय में नॉरमन कौसिन्स लिखते हैं कि बौद्ध धर्म का निर्माण होने पर हिन्दू धर्म ने उसके साथ होड़ नहीं लगाई, बल्कि उसे सोख लिया. बुद्ध को अवतार के रूप में शामिल करने का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धम्म को अवशोषित (सोख) कर उसका ब्राह्मणीकरण करना था, जिसे ब्राह्मण विरोध करके भी दबा नहीं पाए. इस प्रक्रिया में उन्होंने पशु-हिंसा छोड़कर, शाकाहार के आदर्श को अपना लिया. इस प्रक्रिया की अत्यंत चतुर चाल यह थी कि भगवान बुद्ध को वैदिक साहित्य में विष्णु के नवें अवतार के रूप में जबरन शामिल करना. हालांकि कई विद्वानों ने इस दुष्प्रचार का खंडन किया है.

डॉ. एम. एल. जोशी के मुताबिक ‘बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में प्रचारित करने का सटीक कारण यह है कि बुद्ध का व्यक्तित्व इतना महान था कि उसे नजरअंदाज करना किसी भी सूरत में संभव नहीं था. बुद्ध की भारतीय जनमानस में इतनी गहरी पैठ है कि पूरे देश में असंख्य विहारों के हजारों स्तंभों, दीवारों और दरवाजों पर उत्कीर्ण की गई. उनकी शिक्षाएं लगभग न समाप्त होने वाले पालि और संस्कृत साहित्य के अकूत खजाने के माध्यम से फैलाकर लोकप्रिय की गईं. अनेकों राजाओं और महान चिंतकों ने उनके युक्तिवादी व मानवतावादी मिशन को अत्यधिक ससम्मान से अपनाया. असंख्य भारतीय सदियों से उनकी प्रशंसा का गुणगान करते आ रहे हैं.’ सवाल यह भी उठता है कि अगर बुद्ध को श्रद्धावश विष्णु का अवतार माना गया होता तो यह कैसे संभव है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और बंगाल से लेकर गुजरात तक हजारों हिन्दू मंदिरों में किसी में भी भगवान बुद्ध की मूर्ति नहीं होती? एक और तथ्य जानने योग्य है. बुद्ध का अर्थ ही होता है कि जन्म-मरण के संसार चक्र से पूरी तरह मुक्त हो जाना. अगर कोई दुबारा जन्म लेता है, तो फिर बुद्ध कैसे हुआ? इसलिए बुद्ध को अवतार बताना उनके बुद्धत्व को नकारना है. 19 नबवंर, 1999 को सारनाथ में विपस्सना के प्रधानाचार्य सत्यनारायण गोयन्का और कांचीकामकोटि पीठम के तत्कालीन शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने संयुक्त रूप से प्रेस विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की थी कि बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं थे. भगवान बुद्ध ने स्वयं ही अवतार के सिद्धांत को नकारा था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद उन्होंने यह उल्हास भरी घोषणा की थी-

‘अयं अन्तिमा जाति’   (अर्थातः यह मेरा अंतिम जन्म है),

‘नत्थिदानि पुनब्भवोति’ (अर्थात अब मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा)

धम्म के आम आदमी के जीवन में पड़ते प्रभाव और इसकी वैज्ञानिक जीवन पद्धति को देखकर यह कहा जा सकता है कि धम्म कारवां का भविष्य अत्यंत उज्जवल है. धम्म दीक्षा लेने वालों के जीवन में बहुत परिवर्तन आया है और उनका चहुमुंखी विकास हुआ है.मशहूर समाजशास्त्री डी.एस. जनबन्धू और गौतम गवली द्वारा महाराष्ट्र में किए गए समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण के अनुसार जिन लोगों ने धम्म दीक्षा ली उनमें एक नई पहचान और आत्मसम्मान की भावना विकसित हुई, जिससे उनके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर में काफी सुधार आया. एक सर्वे के अनुसार ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या सन् 1980 में 8 लाख थी जो 2001 में बढ़कर 55 लाख और 2006 में बढ़कर 80 लाख हो गई. इस तरह 26 सालों में ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या दस गुणा बढ़ी है. इसी अवधि में ताईवान में बुद्ध विहारों की संख्या 1157 से बढ़कर 4500 और बौद्ध भिक्षुओं की संख्या 3470 से बढ़कर 10 हजार पहुंच गई. ताईवान में भिक्षु और भिक्षुनियां अनेक प्रकार के समाजिक कार्य, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा जैसे व्यक्ति विकास के काम कर रहे हैं. इसी तरह चीन में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक हो गई है. थाईलैंड में 90 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या बौद्ध धर्म मानने वालों की है. यही स्थिति श्रीलंका, म्यामांर और भूटान जैसे देशों की है. भगवान बुद्ध के कारण एशिया के अधिकतर देश भारत को बहुत पवित्र मानते हैं और भारत की यात्रा करना अपना धर्म समझते हैं. जापान, कोरिया, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, श्रीलंका, ताईवान सहित अनेकों देशों के करोड़ों लोगों के मन में एक लालसा रहती है कि जीवन में कम से कम एक बार बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, संकिशा और सांची के दर्शन कर पाएं. इसलिए भारतवर्ष के लिए बुद्ध और उनकी शिक्षाओं द्वारा पूरे एशिया का अगुवा बनने का सुनहरा अवसर है. बौद्ध धम्म के अनुयायियों को चाहिए कि जहां-जहां भी संभव हो, बौद्ध विहारों का निर्माण कराया जाए और उसमें गांव और कस्बों के सभी लोगों को शामिल किया जाए क्योंकि बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत सिर्फ दलितों को ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर उस व्यक्ति को है, जो अपना कल्याण चाहते हैं और जो दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.

लेखक एक बौद्ध विचारक, साहित्यकार और सामाजिक चिंतक हैं.

Source

http://www.dalitmat.com/index.php/hamare-nayak1/1408-india-can-lead-asia-with-budhh-thought

 

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