ग़नीमत है कि वे केवल आरक्षण मांग रहे हैं… http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/ आरक्षण के खिलाफ सवर्णों का दुस्प्रचार से बचाव हेतु जानिए तथ्यों को , आरक्षण देश निर्माण की प्रक्रिया है, जो विरोधी हैं वो देश का निर्माण नहीं सिर्फ स्वहित चाहते हैं। आरक्षण की मजबूती से ही देश मजबूत होगा।




यदि आपको
किसी रोज़ अचानक पता चले कि आप जिस घर में रहते हैं, वह घर किसी और का था और आपके पिता ने छल करके वह अपने नाम लिखवाया है तो आपको कैसा लगेगा? कैसा लगेगा अगर आपको पता चले कि जिस व्यक्ति को आपके पिता ने छला था, उसका क़त्ल भी आपके पिता ने ही करवाया था? और कैसा लगेगा यह जानकर कि जिस व्यक्ति का क़त्ल आपके पिता ने किया था, क़त्ल वाली रात उसकी पत्नी की इज़्ज़त …………. और उस महिला ने बाद में आत्महत्या कर ली थी? और कैसा लगेगा अगर उस मारे गए दंपती का बेटा एक दिन आपके सामने आ जाए और बोले, ‘मुझे मेरा घर वापस दो, मुझे मेरी माता के अपमान और पिता की हत्या का मुआवज़ा दो!’?

आप क्या करेंगे और आप क्या कहेंगे, यह निर्भर करता है इस बात पर कि आप कैसे व्यक्ति हैं। यदि आप अपने बाप की ही तरह के होंगे तो आप उसे अपने नौकरों के हाथों पिटवा देंगे और मां-बहन की गाली देकर कहेंगे, ‘क्या बकवास करता है? यह घर मेरा है और मेरे पिता ने अपनी मेहनत से कमाया है। अपनी गंदी मां का नाम मेरे शरीफ़ पिता के साथ जोड़कर तू उनको बदनाम करना चाहता है! साले, तू जानता नहीं, मैं कौन हूं। फिर कभी ऐसी गंदी बात कही ना मेरे पिता के बारे में तो सीधे जेल भिजवा दूंगा। सारी उमर चक्की पीसता रहेगा। ’ यह कहकर आप अपने आलीशान ड्रॉइंग रूम में चले जाएंगे मन में बड़बड़ाते हुए, ‘कुत्ता साला… पूरा मूड ख़राब कर दिया सुबह-सुबह!’

और अगर आप सेंसिटिव होंगे, आपके भीतर इंसानियत होगी, आप न्याय-अन्याय में विश्वास करते होंगे तो आप उस लड़के से बात करेंगे, सच्चाई जानने की कोशिश करेंगे और जब सच पता चलेगा कि आपके पिता वाक़ई वैसे ही थे तो आपको अपने पिता से घृणा हो जाएगी, घर की एक-एक ईंट से आपको ख़ून टपकता दिखाई देगा। वहां आपको लड़के के मृत माता-पिता की आत्माएं घूमती नज़र आएंगी। आप उस घर में एक पल भी नहीं रह पाएंगे। आप उस लड़के से माफ़ी मांगेंगे और कहेंगे, ‘मैं अपने पिता के पापों को अनहुआ तो नहीं कर सकता। मैं तुम्हारे माता-पिता को जीवित भी नहीं कर सकता। मगर यह घर जो तुम्हारा है, मैं तुमको सौंपता हूं।’ यह कहकर आप निकल जाएंगे।

सोच में पड़ गए आप? आप सोच रहे होंगे कि आपके पिता तो ऐसे हैं ही नहीं इसलिए आपके सामने ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी। चलिए, पिता को छोड़ देते हैं। वे शायद ऐसे न हों (हालांकि क्या गारंटी है)। लेकिन आपके दादा या परदादा या उससे भी पहले के पूर्वज – वे कैसे थे? कभी जानने का प्रयास किया है, आपके बाप-दादों और पूर्वजों ने क्या-क्या कुकर्म किए हैं।

शूद्रों को आज भी मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता।

शूद्रों को आज भी मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता।

आपके पूर्वजों ने समाज के एक वर्ग को सदियों तक शिक्षा-दीक्षा से वंचित रखा, संपत्ति से वंचित रखा, उनको बस्ती से बाहर नारकीय जीवन जीने को मजबूर किया, उनकी छाया से दूर रहे लेकिन उनकी औरतों के साथ बलात्कार किया, और प्रतिरोध करने पर उनको लठैतों से पिटवा दिया, उनकी झोपड़ियां जला दीं। और यह सब करते हुए उन्होंने ज़मीनें क़ब्जाईं, हवामहल बनाए, पत्नियों के लिए गहने गढ़वाए और अय्याशी की। अपने उन आततायी पूर्वजों की उस पाप की कमाई के बल पर ही आप आज उस जगह पर है जहां आप हैं। अच्छा पक्का घर है, गांव में ज़मीन है, पढ़ाई भी अच्छे स्कूल या कॉलेज से की है, और प्राइवेट या सरकारी नौकरी करते हैं या घर का व्यवसाय है।

सोचिए, यदि आप उस दूसरे वर्ग में पैदा हुए होते तो आप आज कहां होते? वहां होते, जहां हैं? नहीं होते। ज़्यादा सर खपाने की ज़रूरत नहीं है। एक बार अपने ऑफ़िस में काम करनेवाले लोगों के सरनेम याद कर लीजिए – बॉस से लेकर चपरासी तक – 70 से 80 परसेंट तक – सब ऊंची जाति के होंगे। कितने हैं उनमें जो दलित हैं? यदि आप गांव में रहते हैं तो एक बार गांव का मुआयना कर लीजिए और सवर्णों और दलितों के इलाक़ों की तुलना करके देख लीजिए।

यदि उन दलितों का हाल थोड़ा भी अच्छा है तो वह इसलिए कि हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित करते हुए यह फ़ैसला किया कि शिक्षा में और नौकरियों में दलितों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यह भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही उन्होंने आरक्षण की व्यवस्था की ताकि सवर्ण अपने रुसूख़, दौलत और ताक़त के बल पर सारी सुविधाएं ख़ुद ही बटोर न ले जाएं।

 

general arakshanआश्चर्य होता है जब ऐसे लोग जिनके पूर्वजों के पाप मैंने ऊपर गिनवाए, दलितों से कहते हैं कि आरक्षण की भीख मांगना बंद करो। यह बात वे कह रहे हैं जिनके बाप-दादों ने शिक्षा और संपत्ति पर पिछले दो हज़ार सालों या उससे भी ज़्यादा समय से 100 परसेंट आरक्षण अपने समुदाय के नाम कर रखा है। आदिवासी एकलव्य धनुर्विद्या नहीं सीख सकता था। सीख ली तो उसे अंगूठा कटवाना पड़ा ताकि वह एक राजपुत्र अर्जुन से श्रेष्ठ न निकल जाए। शूद्र शंबूक तपस्या नहीं कर सकता था और इस अपराध के लिए राम ने ब्राह्मणों की शिकायत पर उसका सर धड़ से अलग कर दिया! कितना अद्भुत न्याय है मर्यादा पुरुषोत्तम राम का। और मनु महाराज के क्या कहने! उनका कानून है कि यदि किसी शूद्र के कान में वेदमंत्र चले गए तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। और कैसी महान हिंदू संस्कृति है कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। प्रवेश करेंगे तो भगवान अपवित्र हो जाएंगे।

एकलव्य की कथा जातीय अन्याय की कहानी है लेकिन इसे गुरुभक्ति के उदाहरण के तौर पर प्रचारित किया जाता है।,शंबूक की हत्या रामायण का एक अत्यंत घृणित अध्याय है मगर इसे कभी भी सामने नहीं लाया जाता।

शंबूक की हत्या रामायण का एक अत्यंत घृणित अध्याय है मगर इसे कभी भी सामने नहीं लाया जाता।

आदिकाल से चला आ रहा है यह अन्याय और आज भी चल रहा है। आदिकाल से एक समूह को पढ़ने-लिखने-सीखने और आगे बढ़ने से वंचित रखा गया, समाज से काटकर अलग रखा गया, उसे अपमानित किया गया। इसी कारण आज वे इस स्थिति में नहीं हैं कि आपसे मुकाबला कर सकें। इसीलिए उनको आरक्षण चाहिए। किसी को सालों तक अंधेरे कमरे में बांधकर रखो, खाने-पीने को कुछ न दो और फिर एक दिन बंधन खोलकर कहो कि आओ, मेरे साथ दौड़ो। मेरी बराबरी करो। यह न्याय है या मज़ाक़ है?

और एक बात। कहा जा रहा है कि जातिवाद का फ़ायदा उठाना छोड़ो और हमारे साथ जाति तोड़ने की मुहीम में शामिल हो जाओ। कमाल है। जातीय श्रेष्ठता का बिगुल बजानेवाले आज जाति तोड़ने की बात कर रहे हैं। इसलिए कर रहे हैं कि आज उनको जाति के कारण परेशानी आ रही है। जब तक जाति के नाम पर अपना वर्चस्व चल रहा था, तब तक जाति बहुत अच्छी थी। आज भी दोस्ती-यारी और खाने-पीने से लेकर शादी-ब्याह तक में ये जाति के दायरे से बाहर नहीं निकलते लेकिन आरक्षण के कारण कॉलेजों में सींटें कम हो गईं, सरकारी नौकरियां कम हो गईं तो नारा दे रहे हैं जाति तोड़ने का। उत्कर्ष और उनके भाइयो, जाति तोड़नी है तो पहले अपने बाप और दादा-दादी से जाकर कह दो कि ‘मैं दहेज लेकर आपके द्वारा चुनी गई अपनी ही जाति की लड़की से शादी नहीं करूंगा। मैं ख़ुद चुनूंगा अपनी जीवनसंगिनी। अपनी पसंद से करूंगा चाहे वह जिस जाति या धर्म की हो।’ ऐसा कहो, फिर उस पर अमल करो और अपनी उस विजातीय या विधर्मी पत्नी को लेकर अपने बाप-दादा के घर जाओ। यदि घरवाले उसे स्वीकार न करें तो अपना घर-परिवार छोड़ दो।

जिस दिन तुम यह सब करोगे, उस दिन तुम्हारे सर से तुम्हारे पूर्वजों के पाप का बोझ ख़त्म होगा। वरना तुम्हारी हर सांस उन दलितों और वंचितों की ऋणी है। ख़ैर मनाओ कि वे अपने हिस्से की कुछ सीटें और सरकारी नौकरियां ही मांग रहे हैं। अगर उनके और उनके पूर्वजों के ख़ून, पसीने और आंसुओं का हिसाब करने बैठोगे तो तुम्हारे रक्त की एक-एक बूंद, तुम्हारे घर की एक-एक ईंट और तुम्हारे बैंक में पड़ा एक-एक रुपया उनके हिस्से में चला जाएगा।

The sins of upper castes down the ages justify reservations

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arakshan samb

One thought on “ग़नीमत है कि वे केवल आरक्षण मांग रहे हैं… http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/ आरक्षण के खिलाफ सवर्णों का दुस्प्रचार से बचाव हेतु जानिए तथ्यों को , आरक्षण देश निर्माण की प्रक्रिया है, जो विरोधी हैं वो देश का निर्माण नहीं सिर्फ स्वहित चाहते हैं। आरक्षण की मजबूती से ही देश मजबूत होगा।

  1. सारे आरक्षण खत्म कर 80 प्रतिशत आरक्षण ‘अन्तर्जातीय’ शादी करनेवाले को दे दो,भारतीय समाज का उद्धार हो जायेगा।है हिम्मत तुममे बोलो…समयबुद्धा

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