सामाजिक न्याय के एजेंडे की दरकार..Written by प्रो. विवेक कुमार Published on 09 April 2015


आम आदमी पार्टी को दिल्ली के 2015 के विधान सभा चुनाव में जनता ने अभूतपूर्व सफलता दिलाई है. ये बात और है कि केजरीवाल ने इसको कुदरत का करिश्मा बता दिया. इस चुनाव में एक बात और बड़े जोर-शोर से प्रसारित की जा रही है कि आम आदमी पार्टी ने दलित, पिछड़े एवं मुस्लिम आदि का कार्ड नहीं खेला. और अस्मिताओं की राजनीति से परहेज करते हुए सड़क, बिजली, पानी, झुग्गी-झोपड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने चुनाव प्रचार की मुहिम चलाई. ऐसा नहीं था कि पूर्व में दिल्ली के चुनाव में जाति, धर्म, भाषा, प्रांत का बहुत बोलबाला रहता था. परंतु इस चुनाव के अंदर सामाजिक न्याय एवं खंडित अस्मिताओं के विशेष अधिकार देने पर सार्वजनिक चर्चाएं लेस मात्र भी नहीं हुई. आश्चर्य की बात यह है कि जब शाही इमाम बुखारी ने अपने समुदाय के समर्थन की एकतरफा घोषणा की तो आम आदमी पार्टी के नेतृत्व ने उसे दो टूक शब्दों में नकार दिया. इन तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि आम आदमी पार्टी सामाजिक न्याय एवं प्राकृतिक अस्मिता की राजनीति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई नहीं दिखाई देना चाहती है, जैसे अन्य राजनीतिक दल जैसे बसपा, जदयू आदि राजनैतिक दल दिखाई पड़ते हैं.

प्रश्न उठता है कि क्या ‘आप’ सामाजिक न्याय एवं अस्मिताओं की राजनीति से वास्तविकता में दूर रही या उसने परोक्ष रूप में अस्मिताओं की राजनीति की और व्यवहारिक एवं अवसरवादी राजनीति का छुपे हुए रुप में प्रयोग किया. यह सर्वविदित है कि अरविंद केजरीवाल आरक्षण के विरोधी रहे हैं और ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ नामक संगठन के बैनर तले आरक्षण के विरोध में भाषण भी दे चुके हैं. आम आदमी पार्टी के दूसरे कद्दावर लीडर आशुतोष यद्यपि दलितो को सपोर्ट करते हैं लेकिन अपने छात्र जीवन में वे भी मंडल के विरोधी रहे हैं. आप में कई समाजवादी लीडर यद्यपि महिलाओं एवं धर्मनिरपेक्षता का पक्ष लेते हैं लेकिन वह दलित एवं पिछड़ों के आरक्षण को बहुत साकारात्मक दृष्टि से नहीं देखते हैं. परंतु व्यवहारिक राजनीति में आने के बाद आम आदमी पार्टी के इन सभी लीडरों को भारतीय संविधान के सामने नतमस्तक होना पड़ा. इसी संदर्भ में जब राजनैतिक दल बनाकर आप ने दिल्ली विधान सभा चुनाव लड़ा तो उसे विधान सभा चुनाव हेतु आरक्षित सीटों पर अनुसूचित जाति के सदस्यों को चुनाव लड़ाना ही पड़ा और अपनी पहली पारी में सरकार बनाने पर आठ दलित विधायकों में से उन्होंने दो को मंत्री भी बनाया. इसके पश्चात 2015 के विधान सभा चुनाव के आते-आते आप के शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली में अस्मिताओं की सोशल इंजीनियरिंग शुरू कर दी. इसी संदर्भ में उन्होंने पहले अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ का गठन किया और कहीं-कहीं दबी जबान से अपने चुनाव चिन्ह (झाड़ू) को दलित अस्मिता से जुड़ा हुआ भी प्रचारित किया. इसके फलस्वरूप दिल्ली विधान सभा के 2015 चुनाव में आम आदमी पार्टी को इसके साकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले. इन चुनावों में आम आदमी पार्टी ने दलित समुदाय के 68 प्रतिशत वोट प्राप्त कर अनुसूचित जाति हेतु आरक्षित बारह की बारह सीटों पर कब्जा कर लिया. परंतु जब उनको मंत्रिमंडल में जगह देने की बात आई तो पूर्व मंत्री राखी बिरला के स्थान पर एक नए व्यक्ति को मंत्री बना दिया गया. इससे राखी बिरला का ही नहीं परंतु उनके पूरे समुदाय का अपमान हुआ. आखिर उन्होंने ऐसी कौन सी गलती की थी जिसकी वजह से उनको दुबारा मंत्रीमंडल में जगह नहीं मिली. इसी कड़ी में 75 प्रतिशत मुस्लिम समाज के लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया. परंतु वहां पर भी केवल एक मुस्लिम समाज के व्यक्ति ही मंत्रीमंडल में जगह पा सका. महिलाओं को तो इस लायक ही नहीं समझा गया कि वह मंत्री पद ले सकें. इसी प्रकार पिछड़ों की संख्या भी मंत्रीमंडल में न के बराबर है. अब प्रश्न उठता है कि दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में संगठन एवं सरकार में प्रतिनिधित्व दिए बगैर आम आदमी पार्टी सामाजिक न्याय के एजेंडे को कैसे लागू कर सकती है.

टेलिविजन की एक बहस में आप के एक प्रवक्ता ने अपनी राजनैतिक अपरिपक्वता का परिचय देते हुए सामाजिक न्याय की बहस को केवल और केवल बिजली, सड़क और पानी तक ही सीमित कर दिया. उनका मानना था कि आम आदमी पार्टी द्वारा मुहल्ला समितियों में जब लोग अपनी-अपनी मांग उठाएंगे तो स्वतः ही सामाजिक न्याय मिल जाएगा. लेकिन आम आदमी पार्टी के लीडर जो कि उनके प्रवक्ता हैं, इस सोच को आम आदमी पार्टी की राजनैतिक विचारधारा ही माना जाएगा. परंतु यहां पर हमें यह समझना चाहिए कि सामाजिक न्याय एवं अस्मिताओं की राजनीति को केवल बिजली, सड़क, पानी एवं झुग्गी-झोपड़ी तक सीमित नहीं किया जा सकता, जब तक खंडित, बहिष्कृत एवं निष्कासित समाजों को सत्ता की सभी संस्थाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्वप्रतिनिधित्व नहीं मिल जाता और वे समान अधिकार से निर्णय में भागेदारी कर सकें. तब तक सामाजिक न्याय की लड़ाई पूर्ण नहीं हो सकती. इसलिए आम आदमी पार्टी जब तक अपने संगठन में, संगठन की कार्यकारिणी में, सरकार में, प्रवक्ताओं में एवं अपनी विचारधारा में इन समाजों को स्वप्रतिनिधित्व नहीं देती. तब तक आम आदमी पार्टी सामाजिक न्याय की राजनीति से कोसों-कोसों दूर रहेगी. फैसला जनता को करना है कि उनको सिर्फ विकास चाहिए या फिर आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के साथ विकास चाहिए.

prof vivek kumar

 

http://www.dalitmat.com/index.php/by-vivek-kumar/1439-2015-04-09-10-14-27

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