ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही


dhyam meditation” ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही ,,
ध्यान की विधि के लिए अक्सर लोग पूछते है की ध्यान की क्या विधि होती ध्यान क्या होता है ! ध्यान कैसे करे ?
जिस क्रत्यो से कुछ पाया जाता है उसकी विधि होती है या विज्ञानं के लिए विधि होती है! कुछ पकड़ना है उसकी विधि होती है ! और कुछ भी नहीकरने की और देखने की कोई विधि नही होती है वह किसी और को नही स्वयम को ही देखना है!

लेकिन देखने भाषा ठीकभी नही है क्योकि लोग जो अपने कोसमझते वाहीदेखने लगते है ,जो शरीर के तल पर खड़ा है वह अपने शरीर को देखना ध्यान समझ लेता है , हमारा स्वयम की मन कीउर्जा की सूक्ष्म हलचल को देखना ध्यान है! ध्यान की कोई प्रमाणिक विधि नही है! जिस कृत्य से कुछ मिलता नही वह ध्यान है ! ध्यान का कृत्य कृष्ण की गीता का निष्काम कर्म समझो ! ध्यान मे नाचना ,कूदना रोना ,हसना दोड़ना , चिलाना,पागल जैसी हरकते करना और जिसकी कोई विधि नही होती है इन क्रत्यो में आनन्द भी नही मिलेगा यह तुम्हारी मनोस्थ्ती पर निर्भर है ! इन क्रत्यो से न धन मिलता नही प्रसिध्ही मिलती है और नही कोई पद मिलता है न कोई पुन्य मिलता है ! जो जरूरत से जायदा है वह खो जाता है जो नही है वह प्रकट हो जाता है ! ध्यान समय के साथ होने की मनोस्थ्ती है आनन्द मिलता है लेकिन वह भी आपका उस के लिए अपने भाव पर निर्भर है! उसकी भी कोई गारंटी नही है ! और सामान्य व्यक्ति की सोच ही यही होती है की जिसे कृत्य से कुछ भी नही मिलता हो वे कृत्य क्यों करे ?

सामान्य लोग बिना फल की प्राप्ति बिना कुछ भी करने को तेयार नही होते है ! सामान्य हमेशा कर्म का मूल्याकन करता है ! इसलिए सामान्य लोगो के लिए ध्यान का कोई मूल्य नही है ! सामान्य व्यक्ति को धर्मकर्मकांड करवाने केलिए बड़े बड़े पुन्य सर्वग के सपने दिखाने पड़ते है लोभ देना होता है, तब वे जा कर धार्मिक कर्म कांड करेंगे ! तब बिना सपने बिना लोध केलिए सामान्य लोगो को कहा जाय की कुछ भी नही मिलेगा लेकिन तुम तीर्थ यात्रा करो हवन करो भजन पूजा पाठ करो तब वे बिना सपने, बिना फल के लिए कुछ भी नही करेगे !


धार्मिक कर्म कांड और ध्यान के लिए किये गए कृत्य में यही बड़ा अंतर होता है ,धर्मकर्म कांड में फल लोभ का लक्ष्य मुख्य होता है!
ध्यान की विज्ञानंमें यहा मन और उर्जा की दिशा को मोड़ने एवं परिवर्तन करने का सबसे बड़ा माध्यम है धयन !यह उर्जा को नई दिशा देने की आधुनिक साधना है और जिसको अपने मन और उर्जा को नई दिशा देने की कला मिल जाती है ध्यान से धन्य हो जाता है धनवान नही!

One thought on “ध्यान से धन्य हो सकते है धनवान नही

  1. सभी धम्म बंधुओं को
    धम्म प्रभात !!!
    संसार चल रहा है दो वस्तुओं से
    मोटे तौर पर कहा जा सकता है ।।
    १-भौतिक कारणों से -मतलब दुनिया में जीव अर्थात मनुष्य भी खानपान रहन सहन सुखदुख जीवनमरण आदि को अनुभव करता ही है ।
    २-अध्यात्मिक अर्थात सूक्ष्म meaning the finest things which are not being felt by the five organ system अर्थात जो आँख कान नाक जिह्वा और काया के स्पर्श द्वारा नहीं जानी जाती हैं उसे ही पुरातन समय में अध्यात्म कहा गया ,जिसे जानने समझने के लिए छटी इंद्री अर्थात sixth sense की जरूरत पड़ती है और यह सिक्स्थ सेंस मन की इंद्री है जिसे पञ्ञा (wisdom eye ) यानि अंतर्मन के ज्ञान चक्षु कहा जाता है ।
    जब तक व्यक्ति में यह इन्द्रिय बलवती न हो पाये तो वह वाह्य संसार की भी ऊपरी ऊपरी बातों को ही अपने पूर्व अनुभवों के अनुसार बुद्धि बल (intellect ) से समझता जानता है जो कि पूर्ण सत्य नहीं होता है ।

    अतः अपनी छटी इन्द्रिय को बलवती बनाने का मार्ग पकड़ें और वास्तविक सत्यों का अनुभव करें ।।
    मार्ग वही पुरातन है
    अरिय अट्ठंगिक मग्ग
    Eightfold Noble Path.
    इसे भावित अर्थात practically जाना जाए तो ही लाभ है और यह मार्ग है विपस्सना और केवल विपस्सना ।
    i.e.
    Noble Eightfold Path
    Which is taught by Lord Buddha…

    नमो बुद्धाय ।।

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