निरंतर मीडिया प्रचार से भेड़ को भेड़िया और भेड़िया को भेड़ साबित किया जाता है ,निरंतर मीडिया प्रचार से जनता को गलत के चुनाव के लिए राजी किया जाता है

मीडिया मनेजमेंट नीति

-मसालेदार खबर को ज्यादा कवरेज से जनहित की खबर को दबाया जाता है
-पहले पन्ने पर अपने हित की और जनहित की छोटी से पिछले पन्नों पर दी जाती है
-निरंतर मीडिया प्रचार से भेड़ को भेड़िया और भेड़िया को भेड़ साबित किया जाता है
-प्रोपगंडा के मकसद से एक घंटे की न्यूज़ को चौबीस घंटे का चैनल बनाया जाता है
-प्रोपेगंडा से जनता को गलत के चुनाव के लिए राजी किया जाता है

उदाहरण हिटलर का मीडिया प्रयोग और राष्ट्रवाद के नाम पर मानवता का कत्लेआम

एक मुलाक़ात डाक्टर अंबेडकर के साथ…..कोलंबिया यूनिवर्सिटी से माननिये श्री रवीश कुमार जी February 13, 2016.. उनके ब्लॉग http://naisadak.org/dr-ambedkar-in-columbia/ से साभार

image-36 (1)दिलो दिमाग़ पर जिसका असर हो उसके क़दमों के निशान छू लेना किसी सपने से कम नहीं । कोलंबिया यूनिवर्सिटी जाने  के लिए हाँ शायद इसी वजह से किया था । न्यूयार्क घूमते वक्त हर वक्त दिमाग़ में यह बात नाचती रही कि कब डाक्टर भीमराव अंबेडकर के विश्वविद्यालय में उनके नाम की पट्टी देखूँगा । 1913-16 के बीच डाक्टर अंबेडकर यहाँ पढ़े थे । उनके यहाँ से जाने के ठीक सौ साल बाद मुझे आने का मौका मिला है । कोलंबिया लॉ स्कूल के दरवाज़े पर पहुँचते ही ठिठक गया । बहुत कम ऐसा होता है जब मैं अपनी तस्वीर के लिए उत्सुक रहता हूँ । प्रवेश करते ही फोटो खींचाने लगा । लगा कि शायद इसके आगे देखने का मौका ही न मिले ।

अंदर जाते ही सबसे पहले यही पूछा कि डाक्टर अंबेडकर का नाम कहाँ लिखा है । जिस सम्मेलन के लिए आया था वहाँ जाने का ख़्याल ही न रहा । दीवार पर बहुत से नाम देखकर पढ़ने में वक्त चला गया, पता चला कि ये उनके नाम हैं जिन्होंने सेंटर की इमारत बनाने में योगदान किया । काफी देर हो गई । सम्मेलन कक्ष में जाना ही पड़ गया । लंच ब्रेक होते ही प्रोफेसर सुदीप्ता कविराज और वत्सल से यही सवाल किया कि मुझे खाना नहीं खाना है । पहले वहाँ जाना है जहाँ डाक्टर अंबेडकर का नाम लिखा है ।

प्रोफेसर कविराज ने कहा कि मैं लेकर चलूँगा । प्रोफेसर कविराज आगे आगे चलने लगे और मैं पीछे पीछे । हर्बर्ट लेमन लाइब्रेरी के दरवाज़े पर हमें रोक लिया गया । यहाँ आने के लिए पास कहीं से बनना था । प्रोफेसर ने अपना कार्डनिकाला और कहा कि हमें बस उस मूर्ति तक जाना है । रिसेप्शन पर महिला ने ताक़ीद किया कि पहली बार है तो जाने दे रही हूँ । प्रोफेसर कविराज ने शराफ़त से उनका दिल जीत लिया था ।

रिसेप्शन पर एक नोटबुक दिया गया जिसमें मैंने आने का मक़सद लिख दिया । मुझसे पहले प्रोफेसर कविराज ने लिखा । उनसे पहले बहुतों ने लिखा था । उसके बाद हमें बताया गया कि आप उस तरफ जा सकते हैं । सोच रहा था कि कोलंबिया पढ़ने के लिए भारत से कितने छात्र आते होंगे । क्या उनमें ये जानने की दिलचस्पी नहीं जगी होगी कि एक छात्र के रूप में यहाँ अंबेडकर का जीवन कैसा रहा होगा उसके बारे में पता करे, लिखे । जवाब जानता हूँ पर अभी सवाल महत्वपूर्ण है ।

image-32

अब मैं यहाँ पहुँच गया था । मेरा आना सफल हो चुका था । उनकी मूर्ति के पास माला रखी हुई थी । यूनिवर्सिटी ने अपनी लाइब्रेरी में इतनी छूट दी है ये कम बड़ी बात नहीं । शायद उसे अपने इस छात्र पर विशेष नाज़ होगा । हमने भी माला चढ़ा दी । बस माला चढ़ाने की तस्वीर यहाँ नहीं लगा रहा । एक बेहतरीन छात्र के प्रति छोटा सा सम्मान था जिसने धर्म की सत्ता से लोहा लिया था । जो भारत के इतिहास में संपूर्ण रूप से पहले मानवाधिकार कार्यकर्ता और विचारक थे ।

उसके बाद वहाँ रखे कुछ दस्तावेज़ पढ़ने लगा । जिसे पढ़ कर लगा कि एक छात्र के रूप में अंबेडकर के बारे में चर्चा ही नहीं हुई । एक छात्र के रूप में अंबेडकर की भूख और लगन की कहानियाँ लाखों छात्रों की प्रेरित कर सकती थी । एक नोट में लिखा है कि अंबेडकर ने कोलंबिया यूनिवर्सिटी में तरह तरह के कोर्स लिये । अमरीका के इतिहास से लेकर रेलवे तक के बारे में पढ़ा। उस समय के कई महान प्रोफ़ेसरों से संगत किया और विषयों को जानने का प्रयास किया । सिर्फ तीन साल के प्रवास में अंबेडकर ने कितना पढ़ा होगा । उन महान प्रोफ़ेसरों के संगत में आना क्या मामूली बात रही होगी ? क्या उन प्रोफ़ेसरों ने यूँ ही किसी छात्र को इतना वक्त दिया होगा ?

उसी नोट में लिखा है कि 1930 में डाक्टर अंबेडकर ने अलुमनी पत्रिका में लिखा है कि मेरी जिंदगी के सबसे बेहतरीन दोस्त कोलंबिया में मेरे क्लासमेट और प्रोफेसर जॉन डीवे, प्रोफेसर जेम्स शॉटवेल, एडविन सेलिगमन, प्रोफेसर जेम्स हर्वे रोबिनसन रहे हैं ।

अंबेडकर 1923 में भारत वापस आ गए । आप सब जानते हैं कि उनका आगमन नहीं होता तो भारत की आज़ादी की लड़ाई का वैचारिक सामाजिक पक्ष कमज़ोर हो जाता । अंबेडकर एक दूसरे छोर पर खड़े होकर उसी दौर में सामाजिक इंसाफ़ की बात कर रहे थे । उन्होंने आज़ादी की लड़ाई को कमज़ोर किये बिना इन सवालों को आगे किया । वे अंग्रेज़ों के हाथ का खिलौना नहीं बने । अंबेडकर ने आज़ादी की लड़ाई को समृद्ध कर दिया ।

अंबेडकर बीसवीं सदी के बड़े विचारकों में एक थे । उन्होंने अपनी तार्किकता के लिए धर्म के प्रतीकों का सहारा नहीं लिया । दुख की बात है कि हमारी राजनीति ने उन्हें सिर्फ एक मूर्ति बनाकर छोड़ दिया है । उनके लिए अंबेडकर का मतलब इतना ही है । जयंती पुण्यतिथि याद रखो फिर भूल जाओ । आधुनिक भारतीय राजनीतिक परंपरा में नायक पूजा का विरोध करना अगर कोई सीखाता है तो वो अंबेडकर हैं । जिस दौर में लोग लंदन जाते थे अंबेडकर अमरीका आए । आज देश में अंबेडकर की अनगिनत मूर्तियाँ हैं पर एक भी क़द्दावर दलित नेता नहीं है । इसलिए इनमें से कोई भी अंबेडकर जैसा छात्र नहीं बन सका । कांशीराम आख़िरी व्यक्ति थे जिन्होंने जाति की सत्ता को चुनौती दी । उनके बाद दलित नेता अपने अपने दल में एडजस्ट होने की राजनीति करने लगे । डाक्टर अंबेडकर एडजस्ट होने नहीं आए थे । वो तोड़ने आए थे ।

उस विश्वविद्यालय की दरो दीवार को सलाम जिसने एक छात्र को भावी विचारक और राजनेता के रूप में ढलने का हर मौका उपलब्ध कराया । भारत की जनता को कोलंबिया यूनिवर्सिटी का शुक्रगुज़ार होना चाहिए । दलितों को विशेष रूप से। कोलंबिया यूनिवर्सिटी को आधुनिकता और तार्किकता के केंद्र के रूप में ही याद रखा जाना चाहिए । सीखना चाहिए उस जगह से जहाँ अंबेडकर ने कितना कुछ सीखा । हमारे मुल्क में विश्विद्यालय बंद करने के नारे लग रहे हैं । भारतीय विश्वविद्यालयों का जो हाल है वहाँ मूर्ति पूजने वाला तो पैदा हो सकता है अंबेडकर नहीं । आप कभी कोलंबिया आएं तो हर्बर्ट लेमन लाइब्रेरी आइयेगा । अपने संविधान निर्माता के बारे में नहीं जानना चाहेंगे !

Source:

http: // naisadak.org/ dr-ambedkar-in- columbia/

 

image-33 (1)

==============================================================================================

यदि आपको यह आलेख पसंद आ रहा है और आप चाहते है कि यह अधिक से अधिक लोगों तक जाए, तो इसके लिए आप  निम्न लिंक

https://samaybuddha.wordpress.com/2016/02/15/ravish-kumar-ji-in-columbia-university-to-see-legacy-of-dr-ambedkar/   को कॉपी कर पेस्ट करें.

बुद्ध की शिक्षाओं से एशिया ही नहीं विश्व भर में पहले की तरह अगुवा बन सकता है भारत देश …Written by आनंद श्रीकृष्ण

buddhist flagबोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सन् 1956 में विजयदशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा ली थी. यह वह तारीख थी, जब भारत में धम्म कारवां को नयी गति और दिशा मिली थी. असल में डॉ. आंबेडकर ने अमेरिका के कोलम्बिया विश्वविद्यालय में अपनी पढ़ाई के दौरान यह निष्कर्ष निकाल लिया था कि भारत में प्रचलित जातिगत असमानता दलितों के पिछड़े होने का मुख्य कारण है. 9 मई, 1916 को कोलम्बिया विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में अपने रिसर्च पेपर ‘भारत में जातियाः उनकी संरचना, उद्भव एवं विकास’ के जरिए डॉ. आंबेडकर ने यह साबित कर दिया था कि कुछ स्वार्थी लोगों ने जातिगत असमानता की व्यवस्था को शास्त्र सम्मत दिखाने की कोशिश की है और ये धारणा फैलाई है कि शास्त्र गलत नहीं हो सकते. भारत लौटने के बाद उन्होंने दलितों के मानवाधिकारों के लिए अलग-अलग मोर्चे पर प्रयास करना शुरू कर दिया. महाड सत्याग्रह द्वारा सार्वजनिक तालाबों से पानी पीने के अधिकार, कालाराम मंदिर में दलितों के प्रवेश का अधिकार, अंग्रेजी सरकार के सामने दलितों के लिए वयस्क मताधिकार का अधिकार, गोलमेज सम्मेलन में पृथक निर्वाचन के अधिकार की लड़ाई ऐसी ही कोशिश थी. इस संघर्ष के दौरान डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि हिन्दू धर्म में रहकर दलितों को राजनैतिक आजादी का अधिकार भले ही मिल जाए लेकिन उनको आर्थिक और सामाजिक बराबरी का हक नहीं मिल सकता. इसलिए 1935 में येवला (नाशिक) में डॉ. आंबेडकर ने घोषणा की थी कि वह हिन्दू धर्म में पैदा हुए थे यह उनके वश की बात नहीं थी लेकिन हिन्दू रहकर वह मरेंगे नहीं, यह उनके वश में है.

 

धर्म परिवर्तन पर विचार करने के लिए 30 एवं 31 मई 1936 को बंबई में आयोजित महार परिषद को संबोधित करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा थाः -‘धर्म परिवर्तन कोई बच्चों का खेल नहीं है. यह ‘मनुष्य के जीवन को सफल कैसे बनाया जाय’ इस सरोकार से जुड़ा प्रश्न है… इसको समझे बिना आप धर्म परिवर्तन के संबंध में मेरी घोषणा के वास्तविक निहितार्थ का अहसास कर पाने में समर्थ नहीं होंगे. छुआछूत की स्पष्ट समझ और वास्तविक जीवन में इसके अमल का अहसास कराने के लिए मैं आप लोगों के खिलाफ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचारों की दास्तान का स्मरण कराना चाहता हूं. सरकारी स्कूलों में बच्चों का दाखिला कराने का हक जताने पर या सार्वजनिक कुंओं से पानी भरने का अधिकार जताने पर या घोड़ी पर दूल्हे को बैठाकर बारात को जुलूस की शक्ल में सार्वजनिक रास्तों से घुमाने के अधिकार आदि का इस्तेमाल करने पर आप लोगों को सवर्ण हिन्दुओं द्वारा मारे-पीटे जाने के उदाहरण तो बहुत आम हैं. लेकिन ऐसी और भी अनेक वजहें हैं जिनके कारण दलितों पर सवर्ण हिन्दुओं द्वारा अत्याचार और उत्पीड़न का कहर ढाया जाता है… खरी बात पूछूं तो बताइये कि इस समय हिन्दुओं और आप लोगों के बीच क्या किसी प्रकार के समाजिक संबंध हैं?’

बाबासाहेब ने आगे कहा, ‘जिस तरह मुसलमान हिन्दुओं से भिन्न हैं; उसी तरह दलित लोग भी हिन्दुओं से नितान्त भिन्न हैं. जिस तरह मुसलमानों और ईसाइयों के साथ हिन्दुओं का रोटी-बेटी का कोई सम्बन्ध नहीं होता है उसी तरह आप लोगों के साथ भी हिन्दुओं का किसी भी प्रकार का रोटी-बेटी का कोई संबंध नहीं है… आपका समाज और उनका समाज दो बिल्कुल अलग-अलग समूह हैं… एक अनजान आदमी तो दलित और सवर्ण के बीच कोई अन्तर कर ही नहीं सकता. सवर्ण हिन्दुओं को जब तक साथ यात्रा कर रहे दलितों की जातियों की जानकारी नहीं होती है तब तक तो यात्रा के दौरान वे बड़े दोस्ताना अंदाज में व्यवहार करते हैं, लेकिन जैसे ही किसी हिन्दू को यह पता चलता है कि वह जिस व्यक्ति से बातचीत कर रहा है वह दलित है; तो उसका मुंह और मन तुरंत कसैला हो जाता है.’ बाबासाहेब ने सवाल उठाते हुए कहा कि आखिर ऐसा क्यों होता है?

बाबासाहेब ने कहा, ‘अपने को एक मुसलमान, एक ईसाई, एक बौद्ध या एक सिक्ख कहना एक धर्म का परिवर्तन मात्र नहीं है बल्कि एक नाम का भी परिवर्तन है. यही सच्चा नाम परिवर्तन है… जब तक आप हिन्दू धर्म में बने रहेंगे तब तक आपको अपने जाति नाम को छिपा कर नाम-परिवर्तन करते रहने पर निरन्तर मजबूर होना पड़ेगा… इसलिए मैं आप लोगों से यह पूछता हूं कि बजाय इसके कि आप आज एक नाम बदलें, कल दूसरा नाम बदलें और पेंडुलम की तरह लगातार ढुलमुल हालत में बने रहें, आप लोगों को धर्म परिवर्तन करके अपना नाम स्थाई रूप से क्यों नहीं बदल लेना चाहिये?’ डॉ. आंबेडकर द्वारा कही गई उपरोक्त बातें कमोबेश आज भी उतनी ही सत्य हैं जितनी कि सन् 1935 में थी.

एक सवाल यह भी उठता है कि बाबा साहेब ने बौद्ध धर्म ही क्यों अपनाया? असल में 20 वर्षों तक सभी धर्मों का गहन अध्ययन करने के बाद डॉ. आंबेडकर इस निश्चय पर पहुंचे कि बौद्ध धर्म सबसे उपयुक्त है, क्योंकि बौद्ध धर्म का जन्म भारत में ही हुआ है और बौद्ध धर्म समानता, करूणा, मैत्री, अहिंसा और भाई-चारे और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने का संदेश देता है. इसमें ऊंच-नीच और छुआछूत के लिए कोई जगह नहीं है. जीवन के सभी पहलुओं पर विचार करने के पश्चात डॉ. आंबेडकर ने 5 लाख अनुयायियों के साथ 14 अक्टूबर, 1956 को बौद्ध धम्म की दीक्षा लेकर बौद्धधम्म के प्रचार-प्रसार को नई गति प्रदान की. उन्होंने 22 प्रतिज्ञाओं का एक नया फार्मूला दिया. भगवान बुद्ध ने ढाई हजार साल पहले अषाढ़ पूर्णिमा के दिन धम्म चक्र प्रवर्तन करके धम्म कारवां की शुरूआत की थी. डॉ. आंबेडकर ने सन 1956 में विजयदशमी के दिन अपने लाखों अनुयायियों के साथ धम्म दीक्षा लेकर धम्म चक्र का अनुपर्वतन किया था. धम्म कारवां आज काफी फल-फूल चुका है. 1956 में पांच लाख लोगों की संख्या आज करोड़ों में पहुंच गई है. अंग्रेजी अखबार द टाईम्स ऑफ इंडिया (नई दिल्ली संस्करण,10 नवंबर 2006) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत वर्ष में सन 2006 में 30 लाख लोगों ने बौद्ध धम्म की दीक्षा ली. 2001 की जनगणना के वक्त बढ़कर यह लगभग 81 लाख हो चुकी थी. जो कि 2011 की आखिरी जनगणना के प्रारंभिक अनुमानों के अनुसार 97 लाख पहुंच गई हैं. हालांकि कुछ विशेषज्ञ भारत में बौद्धों की संख्या 3 करोड़ 50 लाख से भी अधिक मानते हैं. उनका मानना है कि जनगणना में वास्तविक संख्या इसलिए सामने नहीं आ पाती हैं क्योंकि काफी लोग बौद्ध होते हुए भी अपने को आधिकारिक दस्तावेजों में बौद्ध नहीं घोषित करते. अमेरिका और यूरोप में भी बौद्ध धम्म बहुत तेजी से बढ़ती हुई जीवनशैली बनता जा रहा है. जिनेवा आधारित ‘अंतर्राष्ट्रीय धार्मिक व आध्यात्मिक संगठन’ ने 2009 का ‘विश्व के सर्वश्रेष्ठ धर्म का सम्मान’ बौद्ध धम्म को प्रदान किया.

बौद्ध धम्म को गतिमान रखने की सीख भगवान बुद्ध से ली जा सकती है. गौतम बुद्ध ने छः वर्षों तक ध्यान साधना किया और विपस्सना का आविष्कार किया. विपस्सना करते-करते 35 वर्ष की उम्र में बुद्धत्व को प्राप्त किया. बुद्धत्व प्राप्त करने के पश्चात 45 वर्षो तक शहरों, गांवों, कस्बों में जा-जाकर धम्म का प्रसार किया. भगवान बुद्ध बोधगया से चलकर सारनाथ आए थे और धम्मचक्र प्रवर्तन किया था. वह इस भरोसे में नहीं बैठे रहे कि लोग बोधगया आए और तब वो उनको धम्म सिखाएं. इसीलिए डॉं. आंबेडकर ने ‘इंगेज्ड बुद्धिज्म’ की परिकल्पना की थी. इस परिकल्पना को पूरी दुनिया में मान्यता मिली है. वियतनाम में भिक्खु संघ ने अमेरिका के आक्रमण के खिलाफ पूरी ताकत से विरोध किया और लोगों के बीच जाकर धर्म का प्रचार-प्रसार किया. ताईवान में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में वहां के भिक्खुनी संघ ने अहम भूमिका अदा की है. ताईवान में भिक्खुनी संघ स्कूल भी चलाता है, अस्पताल भी चलाता है और लोगों के घरों में जाकर उनकी समस्याओं का निदान भी करता है. ताईवान के उदाहरण को भारत वर्ष में भी दोहराने की आवश्यकता है. यहां भी भिक्खुओं को लोगों से संपर्क करना होगा. लोगों के बीच जाना होगा. उन्हें यह विचार त्यागना होगा कि लोग उनके पास आएंगे तब वो उन्हें धम्म की शिक्षा और दीक्षा देंगे.

इस कड़ी में बौद्ध संस्कृति विकसित करना भी जरूरी है. हर सिक्ख रविवार को अनिवार्य रूप से गुरूद्वारा जाता है, ईसाई चर्च जाते है. हर मुसलमान शुक्रवार की नमाज मस्जिद जाकर अता करता है. बौद्ध समाज के लोगों को भी ऐसी परंपरा डालनी होगी. डॉ. आंबेडकर ने स्वयं बुद्ध पूर्णिमा के दिन अपने आवास को सजाना आरंभ किया और उत्सव मनाने की परंपरा आरंभ की. डॉ. आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1956 को सारनाथ के मृगदाय वन में 150 भिक्खुओं के समक्ष भाषण दिया था कि प्रत्येक बौद्ध के लिए अनिवार्य है कि वह हर रविवार को बौद्ध विहार में जाए और वहां उपदेश सुने. यदि ऐसा नहीं होगा तो नव दीक्षित बौद्ध को धम्म की जानकारी नहीं हो सकेगी. प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे बौद्ध विहारों का निर्माण किया जाए जिसमें सभा करने के लिए काफी स्थान रहे. बौद्ध विहारों को सभामंदिर होना चाहिए.

बौद्ध धम्म के अनुयायियों को उपजातिवाद से भी बचने की जरूरत है. डॉ. आंबेडकर का निष्कर्ष था कि जाति की प्रकृति ही विखण्डन और विभाजन करना है. जातीय भावनाओं से आर्थिक विकास रूकता है. इसलिए डॉ. अंबेडकर का लगातार यह प्रयत्न रहा कि भारत में एक ऐसी सांझी संस्कृति का निर्माण हो जिसमें जात-पात के आधार पर लोगों के साथ अन्याय और शोषण न हो और हर नागरिक अपनी क्षमताओं के अनुसार राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सके. आपस में उपजातिवाद छोड़कर एक साझा पहचान जो बौद्ध पहचान है उसको अपनाना चाहिए और आपस में रोटी-बेटी का संबंध कायम करना चाहिए, जिससे कि राष्ट्रीय एकता के विकास में सहायता मिले. डॉ. आंबेडकर चाहते थे कि समाज के सभी वर्गों में खान-पान का संबंध विकसित हो. जो लोग धम्म दीक्षा लेने के बाद भी जाति और उप-जाति बनाए रखना चाहते हैं या जात-पात में विश्वास करते हैं वो बौद्ध धर्म का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं क्योंकि इससे बौद्ध धर्म में भी जाति का जहर फैल जाएगा.

धम्म कारवां की लोकप्रियता से डरे कुछ लोगों और संगठनों द्वारा अनेकों दुष्प्रचार करने की घटना भी सामने आई हैं. इसमें एक दुष्प्रचार यह किया जा रहा है कि बौद्धधर्म केवल दलित अपना रहे हैं. जबकि हकीकत इससे अलग है. भगवान बुद्ध दलित नहीं थे. उनके प्रथम पांचों शिष्य ब्राह्मण थे. उसके बाद यश और उसके 54 साथी व्यापारी वर्ग से थे. उसके बाद धम्मदीक्षा लेने वाले उरूवेला कश्यप, नदी कश्यप, गया कश्यप और उनके 1000 शिष्य सभी ब्राह्मण थे. राजा बिबिंसार और राजा प्रसेनजित तथा शाक्य संघ के लोग सभी के सभी क्षत्रिय थे. वर्तमान समय में बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन, धर्मानंद कौशाम्बी, डी डी कौशाम्बी पूर्व में ब्राह्मण थे. इसी तरह भदन्त आनंद कौशलायन, आचार्य सत्यनारायण गोयनका (परिनिर्वाण प्राप्त), भन्तेसुरई सशई, अमेरिका के मशहूर फिल्म अभिनेता रिचर्ड गेरे, फिल्म प्रोड्यूसर टीना टर्नर कोई भी दलित वर्ग से नहीं है. इसलिए बौद्ध धर्म के विरोधियों के इस मिथ्या प्रचार को कि बौद्ध धर्म दलितों का धर्म होता जा रहा रोका जाना चाहिए.

इसी तरह एक प्रचार और किया जा रहा है कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. ऐसा प्रचार पहले भी होता रहा है. बुद्ध को अवतार मानने की बात सबसे पहले संभवतः छठी सदी के दौरान मत्स्यपुराण में की गई, मत्स्य पुराण का एक चरण 700 ईसवीं में महाबलीपुरम में, जहां मध्यकालीन ब्राह्मण पुस्तकों में 10 अवतारों की संकल्पना की गई है, पल्लव स्मारकों में उत्कीर्ण हैं. इस बिषय में नॉरमन कौसिन्स लिखते हैं कि बौद्ध धर्म का निर्माण होने पर हिन्दू धर्म ने उसके साथ होड़ नहीं लगाई, बल्कि उसे सोख लिया. बुद्ध को अवतार के रूप में शामिल करने का मुख्य उद्देश्य बौद्ध धम्म को अवशोषित (सोख) कर उसका ब्राह्मणीकरण करना था, जिसे ब्राह्मण विरोध करके भी दबा नहीं पाए. इस प्रक्रिया में उन्होंने पशु-हिंसा छोड़कर, शाकाहार के आदर्श को अपना लिया. इस प्रक्रिया की अत्यंत चतुर चाल यह थी कि भगवान बुद्ध को वैदिक साहित्य में विष्णु के नवें अवतार के रूप में जबरन शामिल करना. हालांकि कई विद्वानों ने इस दुष्प्रचार का खंडन किया है.

डॉ. एम. एल. जोशी के मुताबिक ‘बुद्ध को विष्णु के अवतार के रूप में प्रचारित करने का सटीक कारण यह है कि बुद्ध का व्यक्तित्व इतना महान था कि उसे नजरअंदाज करना किसी भी सूरत में संभव नहीं था. बुद्ध की भारतीय जनमानस में इतनी गहरी पैठ है कि पूरे देश में असंख्य विहारों के हजारों स्तंभों, दीवारों और दरवाजों पर उत्कीर्ण की गई. उनकी शिक्षाएं लगभग न समाप्त होने वाले पालि और संस्कृत साहित्य के अकूत खजाने के माध्यम से फैलाकर लोकप्रिय की गईं. अनेकों राजाओं और महान चिंतकों ने उनके युक्तिवादी व मानवतावादी मिशन को अत्यधिक ससम्मान से अपनाया. असंख्य भारतीय सदियों से उनकी प्रशंसा का गुणगान करते आ रहे हैं.’ सवाल यह भी उठता है कि अगर बुद्ध को श्रद्धावश विष्णु का अवतार माना गया होता तो यह कैसे संभव है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक और बंगाल से लेकर गुजरात तक हजारों हिन्दू मंदिरों में किसी में भी भगवान बुद्ध की मूर्ति नहीं होती? एक और तथ्य जानने योग्य है. बुद्ध का अर्थ ही होता है कि जन्म-मरण के संसार चक्र से पूरी तरह मुक्त हो जाना. अगर कोई दुबारा जन्म लेता है, तो फिर बुद्ध कैसे हुआ? इसलिए बुद्ध को अवतार बताना उनके बुद्धत्व को नकारना है. 19 नबवंर, 1999 को सारनाथ में विपस्सना के प्रधानाचार्य सत्यनारायण गोयन्का और कांचीकामकोटि पीठम के तत्कालीन शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती ने संयुक्त रूप से प्रेस विज्ञप्ति जारी करके घोषणा की थी कि बुद्ध विष्णु के अवतार नहीं थे. भगवान बुद्ध ने स्वयं ही अवतार के सिद्धांत को नकारा था. बुद्धत्व प्राप्ति के बाद उन्होंने यह उल्हास भरी घोषणा की थी-

‘अयं अन्तिमा जाति’   (अर्थातः यह मेरा अंतिम जन्म है),

‘नत्थिदानि पुनब्भवोति’ (अर्थात अब मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा)

धम्म के आम आदमी के जीवन में पड़ते प्रभाव और इसकी वैज्ञानिक जीवन पद्धति को देखकर यह कहा जा सकता है कि धम्म कारवां का भविष्य अत्यंत उज्जवल है. धम्म दीक्षा लेने वालों के जीवन में बहुत परिवर्तन आया है और उनका चहुमुंखी विकास हुआ है.मशहूर समाजशास्त्री डी.एस. जनबन्धू और गौतम गवली द्वारा महाराष्ट्र में किए गए समाजशास्त्रीय सर्वेक्षण के अनुसार जिन लोगों ने धम्म दीक्षा ली उनमें एक नई पहचान और आत्मसम्मान की भावना विकसित हुई, जिससे उनके सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्तर में काफी सुधार आया. एक सर्वे के अनुसार ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या सन् 1980 में 8 लाख थी जो 2001 में बढ़कर 55 लाख और 2006 में बढ़कर 80 लाख हो गई. इस तरह 26 सालों में ताईवान में बौद्ध अनुयायियों की संख्या दस गुणा बढ़ी है. इसी अवधि में ताईवान में बुद्ध विहारों की संख्या 1157 से बढ़कर 4500 और बौद्ध भिक्षुओं की संख्या 3470 से बढ़कर 10 हजार पहुंच गई. ताईवान में भिक्षु और भिक्षुनियां अनेक प्रकार के समाजिक कार्य, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा जैसे व्यक्ति विकास के काम कर रहे हैं. इसी तरह चीन में बौद्ध धर्म मानने वालों की संख्या 10 करोड़ से भी अधिक हो गई है. थाईलैंड में 90 प्रतिशत से भी अधिक जनसंख्या बौद्ध धर्म मानने वालों की है. यही स्थिति श्रीलंका, म्यामांर और भूटान जैसे देशों की है. भगवान बुद्ध के कारण एशिया के अधिकतर देश भारत को बहुत पवित्र मानते हैं और भारत की यात्रा करना अपना धर्म समझते हैं. जापान, कोरिया, थाईलैंड, चीन, म्यांमार, श्रीलंका, ताईवान सहित अनेकों देशों के करोड़ों लोगों के मन में एक लालसा रहती है कि जीवन में कम से कम एक बार बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती, संकिशा और सांची के दर्शन कर पाएं. इसलिए भारतवर्ष के लिए बुद्ध और उनकी शिक्षाओं द्वारा पूरे एशिया का अगुवा बनने का सुनहरा अवसर है. बौद्ध धम्म के अनुयायियों को चाहिए कि जहां-जहां भी संभव हो, बौद्ध विहारों का निर्माण कराया जाए और उसमें गांव और कस्बों के सभी लोगों को शामिल किया जाए क्योंकि बुद्ध की शिक्षाओं की जरूरत सिर्फ दलितों को ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर उस व्यक्ति को है, जो अपना कल्याण चाहते हैं और जो दुखों से मुक्त होना चाहते हैं.

लेखक एक बौद्ध विचारक, साहित्यकार और सामाजिक चिंतक हैं.

Source

http://www.dalitmat.com/index.php/hamare-nayak1/1408-india-can-lead-asia-with-budhh-thought

 

==============================================================================================

यदि आपको यह आलेख पसंद आ रहा है और आप चाहते है कि यह अधिक से अधिक लोगों तक जाए, तो इसके लिए आप  निम्न लिंक

https://samaybuddha.wordpress.com/2016/02/12/buddhism-can-only-make-india-a-vishwaguru-by-anand-shrikrishan/  को कॉपी कर पेस्ट करें.

ग़नीमत है कि वे केवल आरक्षण मांग रहे हैं… http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com/ आरक्षण के खिलाफ सवर्णों का दुस्प्रचार से बचाव हेतु जानिए तथ्यों को , आरक्षण देश निर्माण की प्रक्रिया है, जो विरोधी हैं वो देश का निर्माण नहीं सिर्फ स्वहित चाहते हैं। आरक्षण की मजबूती से ही देश मजबूत होगा।



यदि आपको
किसी रोज़ अचानक पता चले कि आप जिस घर में रहते हैं, वह घर किसी और का था और आपके पिता ने छल करके वह अपने नाम लिखवाया है तो आपको कैसा लगेगा? कैसा लगेगा अगर आपको पता चले कि जिस व्यक्ति को आपके पिता ने छला था, उसका क़त्ल भी आपके पिता ने ही करवाया था? और कैसा लगेगा यह जानकर कि जिस व्यक्ति का क़त्ल आपके पिता ने किया था, क़त्ल वाली रात उसकी पत्नी की इज़्ज़त …………. और उस महिला ने बाद में आत्महत्या कर ली थी? और कैसा लगेगा अगर उस मारे गए दंपती का बेटा एक दिन आपके सामने आ जाए और बोले, ‘मुझे मेरा घर वापस दो, मुझे मेरी माता के अपमान और पिता की हत्या का मुआवज़ा दो!’?

आप क्या करेंगे और आप क्या कहेंगे, यह निर्भर करता है इस बात पर कि आप कैसे व्यक्ति हैं। यदि आप अपने बाप की ही तरह के होंगे तो आप उसे अपने नौकरों के हाथों पिटवा देंगे और मां-बहन की गाली देकर कहेंगे, ‘क्या बकवास करता है? यह घर मेरा है और मेरे पिता ने अपनी मेहनत से कमाया है। अपनी गंदी मां का नाम मेरे शरीफ़ पिता के साथ जोड़कर तू उनको बदनाम करना चाहता है! साले, तू जानता नहीं, मैं कौन हूं। फिर कभी ऐसी गंदी बात कही ना मेरे पिता के बारे में तो सीधे जेल भिजवा दूंगा। सारी उमर चक्की पीसता रहेगा। ’ यह कहकर आप अपने आलीशान ड्रॉइंग रूम में चले जाएंगे मन में बड़बड़ाते हुए, ‘कुत्ता साला… पूरा मूड ख़राब कर दिया सुबह-सुबह!’

और अगर आप सेंसिटिव होंगे, आपके भीतर इंसानियत होगी, आप न्याय-अन्याय में विश्वास करते होंगे तो आप उस लड़के से बात करेंगे, सच्चाई जानने की कोशिश करेंगे और जब सच पता चलेगा कि आपके पिता वाक़ई वैसे ही थे तो आपको अपने पिता से घृणा हो जाएगी, घर की एक-एक ईंट से आपको ख़ून टपकता दिखाई देगा। वहां आपको लड़के के मृत माता-पिता की आत्माएं घूमती नज़र आएंगी। आप उस घर में एक पल भी नहीं रह पाएंगे। आप उस लड़के से माफ़ी मांगेंगे और कहेंगे, ‘मैं अपने पिता के पापों को अनहुआ तो नहीं कर सकता। मैं तुम्हारे माता-पिता को जीवित भी नहीं कर सकता। मगर यह घर जो तुम्हारा है, मैं तुमको सौंपता हूं।’ यह कहकर आप निकल जाएंगे।

सोच में पड़ गए आप? आप सोच रहे होंगे कि आपके पिता तो ऐसे हैं ही नहीं इसलिए आपके सामने ऐसी स्थिति कभी नहीं आएगी। चलिए, पिता को छोड़ देते हैं। वे शायद ऐसे न हों (हालांकि क्या गारंटी है)। लेकिन आपके दादा या परदादा या उससे भी पहले के पूर्वज – वे कैसे थे? कभी जानने का प्रयास किया है, आपके बाप-दादों और पूर्वजों ने क्या-क्या कुकर्म किए हैं।

शूद्रों को आज भी मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता।

शूद्रों को आज भी मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता।

आपके पूर्वजों ने समाज के एक वर्ग को सदियों तक शिक्षा-दीक्षा से वंचित रखा, संपत्ति से वंचित रखा, उनको बस्ती से बाहर नारकीय जीवन जीने को मजबूर किया, उनकी छाया से दूर रहे लेकिन उनकी औरतों के साथ बलात्कार किया, और प्रतिरोध करने पर उनको लठैतों से पिटवा दिया, उनकी झोपड़ियां जला दीं। और यह सब करते हुए उन्होंने ज़मीनें क़ब्जाईं, हवामहल बनाए, पत्नियों के लिए गहने गढ़वाए और अय्याशी की। अपने उन आततायी पूर्वजों की उस पाप की कमाई के बल पर ही आप आज उस जगह पर है जहां आप हैं। अच्छा पक्का घर है, गांव में ज़मीन है, पढ़ाई भी अच्छे स्कूल या कॉलेज से की है, और प्राइवेट या सरकारी नौकरी करते हैं या घर का व्यवसाय है।

सोचिए, यदि आप उस दूसरे वर्ग में पैदा हुए होते तो आप आज कहां होते? वहां होते, जहां हैं? नहीं होते। ज़्यादा सर खपाने की ज़रूरत नहीं है। एक बार अपने ऑफ़िस में काम करनेवाले लोगों के सरनेम याद कर लीजिए – बॉस से लेकर चपरासी तक – 70 से 80 परसेंट तक – सब ऊंची जाति के होंगे। कितने हैं उनमें जो दलित हैं? यदि आप गांव में रहते हैं तो एक बार गांव का मुआयना कर लीजिए और सवर्णों और दलितों के इलाक़ों की तुलना करके देख लीजिए।

यदि उन दलितों का हाल थोड़ा भी अच्छा है तो वह इसलिए कि हमारे संविधान निर्माताओं ने हमारे पूर्वजों के पापों का प्रायश्चित करते हुए यह फ़ैसला किया कि शिक्षा में और नौकरियों में दलितों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यह भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए ही उन्होंने आरक्षण की व्यवस्था की ताकि सवर्ण अपने रुसूख़, दौलत और ताक़त के बल पर सारी सुविधाएं ख़ुद ही बटोर न ले जाएं।

 

general arakshanआश्चर्य होता है जब ऐसे लोग जिनके पूर्वजों के पाप मैंने ऊपर गिनवाए, दलितों से कहते हैं कि आरक्षण की भीख मांगना बंद करो। यह बात वे कह रहे हैं जिनके बाप-दादों ने शिक्षा और संपत्ति पर पिछले दो हज़ार सालों या उससे भी ज़्यादा समय से 100 परसेंट आरक्षण अपने समुदाय के नाम कर रखा है। आदिवासी एकलव्य धनुर्विद्या नहीं सीख सकता था। सीख ली तो उसे अंगूठा कटवाना पड़ा ताकि वह एक राजपुत्र अर्जुन से श्रेष्ठ न निकल जाए। शूद्र शंबूक तपस्या नहीं कर सकता था और इस अपराध के लिए राम ने ब्राह्मणों की शिकायत पर उसका सर धड़ से अलग कर दिया! कितना अद्भुत न्याय है मर्यादा पुरुषोत्तम राम का। और मनु महाराज के क्या कहने! उनका कानून है कि यदि किसी शूद्र के कान में वेदमंत्र चले गए तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाए। और कैसी महान हिंदू संस्कृति है कि दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं करने दिया जाता। प्रवेश करेंगे तो भगवान अपवित्र हो जाएंगे।

एकलव्य की कथा जातीय अन्याय की कहानी है लेकिन इसे गुरुभक्ति के उदाहरण के तौर पर प्रचारित किया जाता है।,शंबूक की हत्या रामायण का एक अत्यंत घृणित अध्याय है मगर इसे कभी भी सामने नहीं लाया जाता।

शंबूक की हत्या रामायण का एक अत्यंत घृणित अध्याय है मगर इसे कभी भी सामने नहीं लाया जाता।

आदिकाल से चला आ रहा है यह अन्याय और आज भी चल रहा है। आदिकाल से एक समूह को पढ़ने-लिखने-सीखने और आगे बढ़ने से वंचित रखा गया, समाज से काटकर अलग रखा गया, उसे अपमानित किया गया। इसी कारण आज वे इस स्थिति में नहीं हैं कि आपसे मुकाबला कर सकें। इसीलिए उनको आरक्षण चाहिए। किसी को सालों तक अंधेरे कमरे में बांधकर रखो, खाने-पीने को कुछ न दो और फिर एक दिन बंधन खोलकर कहो कि आओ, मेरे साथ दौड़ो। मेरी बराबरी करो। यह न्याय है या मज़ाक़ है?

और एक बात। कहा जा रहा है कि जातिवाद का फ़ायदा उठाना छोड़ो और हमारे साथ जाति तोड़ने की मुहीम में शामिल हो जाओ। कमाल है। जातीय श्रेष्ठता का बिगुल बजानेवाले आज जाति तोड़ने की बात कर रहे हैं। इसलिए कर रहे हैं कि आज उनको जाति के कारण परेशानी आ रही है। जब तक जाति के नाम पर अपना वर्चस्व चल रहा था, तब तक जाति बहुत अच्छी थी। आज भी दोस्ती-यारी और खाने-पीने से लेकर शादी-ब्याह तक में ये जाति के दायरे से बाहर नहीं निकलते लेकिन आरक्षण के कारण कॉलेजों में सींटें कम हो गईं, सरकारी नौकरियां कम हो गईं तो नारा दे रहे हैं जाति तोड़ने का। उत्कर्ष और उनके भाइयो, जाति तोड़नी है तो पहले अपने बाप और दादा-दादी से जाकर कह दो कि ‘मैं दहेज लेकर आपके द्वारा चुनी गई अपनी ही जाति की लड़की से शादी नहीं करूंगा। मैं ख़ुद चुनूंगा अपनी जीवनसंगिनी। अपनी पसंद से करूंगा चाहे वह जिस जाति या धर्म की हो।’ ऐसा कहो, फिर उस पर अमल करो और अपनी उस विजातीय या विधर्मी पत्नी को लेकर अपने बाप-दादा के घर जाओ। यदि घरवाले उसे स्वीकार न करें तो अपना घर-परिवार छोड़ दो।

जिस दिन तुम यह सब करोगे, उस दिन तुम्हारे सर से तुम्हारे पूर्वजों के पाप का बोझ ख़त्म होगा। वरना तुम्हारी हर सांस उन दलितों और वंचितों की ऋणी है। ख़ैर मनाओ कि वे अपने हिस्से की कुछ सीटें और सरकारी नौकरियां ही मांग रहे हैं। अगर उनके और उनके पूर्वजों के ख़ून, पसीने और आंसुओं का हिसाब करने बैठोगे तो तुम्हारे रक्त की एक-एक बूंद, तुम्हारे घर की एक-एक ईंट और तुम्हारे बैंक में पड़ा एक-एक रुपया उनके हिस्से में चला जाएगा।

The sins of upper castes down the ages justify reservations

==================================================================================================

arakshan samb

ब्रिटेन के प्रसिद्ध लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने डॉ. बीआर अंबेडकर की 125 वीं जयंती पर अपने मशहूर छात्र और भारतीय संविधान के निर्माता पर अभिलेखीय दस्तावेज जारी किया है।..http://khabar.ndtv.com/

dr Ambedkar imageलंदन: ब्रिटेन के प्रसिद्ध लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स ने डॉ. बीआर अंबेडकर की 125 वीं जयंती पर अपने मशहूर छात्र और भारतीय संविधान के निर्माता पर अभिलेखीय दस्तावेज जारी किया है।

अंबेडकर 1920 में जब कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे थे तो अर्थशास्त्री एडविन आर सेलिगमेन ने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) में पढ़ाने वाले प्रोफेसर हार्बर्ट फॉक्सवेल को पत्र लिखकर अंबेडकर की पढ़ाई में मदद करने को कहा था।

अंबेडकर के लंदन में छात्र दिनों को पिछले साल नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेखांकित किया, जब उन्होंने उत्तरी लंदन में उनके पहले के घर में एक संग्रहालय का उद्घाटन किया। अंबेडकर मास्टर डिग्री में पंजीकरण के लिए गए थे और एलएसई में पीएचडी पूरी की थी।

सामाजिक न्याय के एजेंडे की दरकार..Written by प्रो. विवेक कुमार Published on 09 April 2015

आम आदमी पार्टी को दिल्ली के 2015 के विधान सभा चुनाव में जनता ने अभूतपूर्व सफलता दिलाई है. ये बात और है कि केजरीवाल ने इसको कुदरत का करिश्मा बता दिया. इस चुनाव में एक बात और बड़े जोर-शोर से प्रसारित की जा रही है कि आम आदमी पार्टी ने दलित, पिछड़े एवं मुस्लिम आदि का कार्ड नहीं खेला. और अस्मिताओं की राजनीति से परहेज करते हुए सड़क, बिजली, पानी, झुग्गी-झोपड़ी और भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने चुनाव प्रचार की मुहिम चलाई. ऐसा नहीं था कि पूर्व में दिल्ली के चुनाव में जाति, धर्म, भाषा, प्रांत का बहुत बोलबाला रहता था. परंतु इस चुनाव के अंदर सामाजिक न्याय एवं खंडित अस्मिताओं के विशेष अधिकार देने पर सार्वजनिक चर्चाएं लेस मात्र भी नहीं हुई. आश्चर्य की बात यह है कि जब शाही इमाम बुखारी ने अपने समुदाय के समर्थन की एकतरफा घोषणा की तो आम आदमी पार्टी के नेतृत्व ने उसे दो टूक शब्दों में नकार दिया. इन तथ्यों से यह प्रमाणित होता है कि आम आदमी पार्टी सामाजिक न्याय एवं प्राकृतिक अस्मिता की राजनीति से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई नहीं दिखाई देना चाहती है, जैसे अन्य राजनीतिक दल जैसे बसपा, जदयू आदि राजनैतिक दल दिखाई पड़ते हैं.

प्रश्न उठता है कि क्या ‘आप’ सामाजिक न्याय एवं अस्मिताओं की राजनीति से वास्तविकता में दूर रही या उसने परोक्ष रूप में अस्मिताओं की राजनीति की और व्यवहारिक एवं अवसरवादी राजनीति का छुपे हुए रुप में प्रयोग किया. यह सर्वविदित है कि अरविंद केजरीवाल आरक्षण के विरोधी रहे हैं और ‘यूथ फॉर इक्वालिटी’ नामक संगठन के बैनर तले आरक्षण के विरोध में भाषण भी दे चुके हैं. आम आदमी पार्टी के दूसरे कद्दावर लीडर आशुतोष यद्यपि दलितो को सपोर्ट करते हैं लेकिन अपने छात्र जीवन में वे भी मंडल के विरोधी रहे हैं. आप में कई समाजवादी लीडर यद्यपि महिलाओं एवं धर्मनिरपेक्षता का पक्ष लेते हैं लेकिन वह दलित एवं पिछड़ों के आरक्षण को बहुत साकारात्मक दृष्टि से नहीं देखते हैं. परंतु व्यवहारिक राजनीति में आने के बाद आम आदमी पार्टी के इन सभी लीडरों को भारतीय संविधान के सामने नतमस्तक होना पड़ा. इसी संदर्भ में जब राजनैतिक दल बनाकर आप ने दिल्ली विधान सभा चुनाव लड़ा तो उसे विधान सभा चुनाव हेतु आरक्षित सीटों पर अनुसूचित जाति के सदस्यों को चुनाव लड़ाना ही पड़ा और अपनी पहली पारी में सरकार बनाने पर आठ दलित विधायकों में से उन्होंने दो को मंत्री भी बनाया. इसके पश्चात 2015 के विधान सभा चुनाव के आते-आते आप के शीर्ष नेतृत्व ने दिल्ली में अस्मिताओं की सोशल इंजीनियरिंग शुरू कर दी. इसी संदर्भ में उन्होंने पहले अनुसूचित जाति प्रकोष्ठ का गठन किया और कहीं-कहीं दबी जबान से अपने चुनाव चिन्ह (झाड़ू) को दलित अस्मिता से जुड़ा हुआ भी प्रचारित किया. इसके फलस्वरूप दिल्ली विधान सभा के 2015 चुनाव में आम आदमी पार्टी को इसके साकारात्मक परिणाम भी देखने को मिले. इन चुनावों में आम आदमी पार्टी ने दलित समुदाय के 68 प्रतिशत वोट प्राप्त कर अनुसूचित जाति हेतु आरक्षित बारह की बारह सीटों पर कब्जा कर लिया. परंतु जब उनको मंत्रिमंडल में जगह देने की बात आई तो पूर्व मंत्री राखी बिरला के स्थान पर एक नए व्यक्ति को मंत्री बना दिया गया. इससे राखी बिरला का ही नहीं परंतु उनके पूरे समुदाय का अपमान हुआ. आखिर उन्होंने ऐसी कौन सी गलती की थी जिसकी वजह से उनको दुबारा मंत्रीमंडल में जगह नहीं मिली. इसी कड़ी में 75 प्रतिशत मुस्लिम समाज के लोगों ने आम आदमी पार्टी को वोट दिया. परंतु वहां पर भी केवल एक मुस्लिम समाज के व्यक्ति ही मंत्रीमंडल में जगह पा सका. महिलाओं को तो इस लायक ही नहीं समझा गया कि वह मंत्री पद ले सकें. इसी प्रकार पिछड़ों की संख्या भी मंत्रीमंडल में न के बराबर है. अब प्रश्न उठता है कि दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों एवं महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में संगठन एवं सरकार में प्रतिनिधित्व दिए बगैर आम आदमी पार्टी सामाजिक न्याय के एजेंडे को कैसे लागू कर सकती है.

टेलिविजन की एक बहस में आप के एक प्रवक्ता ने अपनी राजनैतिक अपरिपक्वता का परिचय देते हुए सामाजिक न्याय की बहस को केवल और केवल बिजली, सड़क और पानी तक ही सीमित कर दिया. उनका मानना था कि आम आदमी पार्टी द्वारा मुहल्ला समितियों में जब लोग अपनी-अपनी मांग उठाएंगे तो स्वतः ही सामाजिक न्याय मिल जाएगा. लेकिन आम आदमी पार्टी के लीडर जो कि उनके प्रवक्ता हैं, इस सोच को आम आदमी पार्टी की राजनैतिक विचारधारा ही माना जाएगा. परंतु यहां पर हमें यह समझना चाहिए कि सामाजिक न्याय एवं अस्मिताओं की राजनीति को केवल बिजली, सड़क, पानी एवं झुग्गी-झोपड़ी तक सीमित नहीं किया जा सकता, जब तक खंडित, बहिष्कृत एवं निष्कासित समाजों को सत्ता की सभी संस्थाओं में उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्वप्रतिनिधित्व नहीं मिल जाता और वे समान अधिकार से निर्णय में भागेदारी कर सकें. तब तक सामाजिक न्याय की लड़ाई पूर्ण नहीं हो सकती. इसलिए आम आदमी पार्टी जब तक अपने संगठन में, संगठन की कार्यकारिणी में, सरकार में, प्रवक्ताओं में एवं अपनी विचारधारा में इन समाजों को स्वप्रतिनिधित्व नहीं देती. तब तक आम आदमी पार्टी सामाजिक न्याय की राजनीति से कोसों-कोसों दूर रहेगी. फैसला जनता को करना है कि उनको सिर्फ विकास चाहिए या फिर आत्मसम्मान और सामाजिक न्याय के साथ विकास चाहिए.

prof vivek kumar

 

http://www.dalitmat.com/index.php/by-vivek-kumar/1439-2015-04-09-10-14-27