आधुनिक बुद्ध और भारतवासियों के मसीहा बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने जो संविधान बनाया है उसमें जनकल्याणकारी बौद्ध धम्म के पञ्चशील को कानून का ही रूप दे दिया है|

bhagya vidhata sansad me hain
गौतम बुद्ध द्वारा इंसान के जीवन में दुखों के कारणों का अध्ययन किया गया और उन्होंने पाया की ज्यादातर दुखों के केवल पांच ही मूल कारन हैं, जिनकी वजग से दुःख शुरू होता है और बढ़ता ही जाता है, यहीं पांच कारणों से बच कर रहने के जो पांच उसील या नियम या शील बनाए वो विश्व भर में पञ्चशील के नाम से मशहूर हैं|इतना तो आप सभी ने सुन ही रख होगा पर आपको जानकर अच्छा लगेगा की आधुनिक बुद्धा और भारतवासियों के मसीहा बाबा साहब डॉ आंबेडकर ने जो संविधान बनाया है उसमें इन शीलों से प्रेरणा लेकर शील को कानून  का ही रूप दे दिया है|

 

कृपया निम्न पञ्च शील एव उससे जुडी धाराओं पर ध्यान दें आप खुद ही समझ जायेंगे:

 

 

1)पाणातिपाता वेरमनी सीक्खापदम् सम्मादीयामी !
अर्थ (में बिना वजह प्राणि-हिंसा से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ !)
धारा 302.303,304,304ए,304बी,307,308,309,323,324,,326,328,332,333.आदि
,
2)आदिन्नादाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी!
अर्थ (मैं चोरी से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ !)
धारा 327,379,380,381,382,384,385,386,392,393,394,395,396,397,398,399 आदि

3)कामेसूमीच्छाचारा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी!
अर्थ (मैं व्यभिचार से दूर रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ !)
धारा 354,355,376,377,509 आदि

4)मुसावादा वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी !
अर्थ (मैं झूठ बोलने से दूर या विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ !)
धारा 394,305,306,509 आदि

5)सुरामेरयमज्जपमादठटाना वेरमणाी सिक्खापदम् समादियामी !
, अर्थ (मैं सुरा=पक्की शराब+मेरय=कच्ची शराब, मज्जपमादठटाना=नशीली चीजो के सेवन से विरत रहने की शिक्षा ग्रहण करता हूँ !)
धारा 510,34,4/13,जुआ एक्ट 8/20 नार्कोटीक्स एक्ट आदि

अतः हर भारतीय को बौद्ध धम्म (धर्म) मानकर अपना जीवन यापन करना ही पड़ेगा

(भारत संवेधानिक तोर पर बुद्ध के धम्म (धर्म) से चलता हें भारत की मुद्रा पर भी अशोक चक्र,अशोक स्तम्भ है)

हर एक भारतीय को यह मालूम हो जाय की बुद्ध और उनका धम्म कितना प्रभावशाली है, कितना मानवतावादी हें !
सब का मंगल सबका हो ।

आरक्षण की क्रांति से शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को जो मिला, उसकी एक सीमा थी, ऐसे में आर्थिक उदारीकरण उनके जीवन में दूसरी क्रांति लेकर आया।…चन्द्र भान प्रसाद via National Dastak


81-316-0271-0आरक्षण की क्रांति से शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को जो मिला, उसकी एक सीमा थी, ऐसे में आर्थिक उदारीकरण उनके जीवन में दूसरी क्रांति लेकर आया।

देश में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी समाज के भीतर एक छोटा, मगर सशक्त मध्यम वर्ग 1990 तक पैदा हो चुका था। और यह संभव हुआ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संघर्षो के कारण। उनके द्वारा शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी वर्ग को शिक्षा, सरकारी नौकरियों, संसद व विधानसभाओं में दिए गए आरक्षण के कारण। आरक्षण के रास्ते से शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मध्यम वर्ग का पैदा होना इस देश के लिए पहली शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी क्रांति साबित हुई। इसी जीवन में यह देखा गया कि शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी व्यक्ति सवर्ण के सामने बैठ नहीं सकते थे। इसी जीवन में यह भी देखा जा रहा है कि शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी दारोगा, कप्तान, कलेक्टर, कमिश्नर के तहत सवर्ण मातहत के रूप में कार्य कर रहे हैं, और उन्हें सैल्यूट मारते हैं। यह क्रांति नहीं, तो और क्या है?

लेकिन एक और क्रांति के बगैर, पहली क्रांति अधूरी थी। देश में कुल सरकारी नौकरियों की संख्या दो करोड़ के आस-पास है। यदि आरक्षण को शत-प्रतिशत लागू कर दिया जाए, तो करीब 30 लाख ही शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मुक्त हो पाएंगे, जबकि, करोड़ों शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मुक्ति की तलाश में हैं। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मुक्ति का अर्थ है जमींदारों के खेत-खलिहानों से मुक्ति, जाति-आधारित पेशों से मुक्ति, और इसके बाद मुख्यधारा के पेशों, जैसे खाद्य उद्योग, कपड़ा उद्योग, जीवन शैली से जुड़े कारोबार वगैरह में प्रवेश। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों का बड़ा हिस्सा गावों में बसता है। ज्यादातर लोग अब भी अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित हैं। वे सब एक तरह से सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्त भी नहीं हैं। जाहिर है, शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों का व्यापक हिस्सा पहली शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी क्रांति, जो आरक्षण आधारित थी, उसमें शामिल होने की स्थिति में था ही नहीं। फिर, व्यापक शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी समाज को मुक्त करने वाली दूसरी शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी क्रांति क्या हो सकती थी? इसे एक किताब के माध्यम से समझा जा सकता है।

कोलकाता के अपने समय के विख्यात प्रकाशन एसोसिएशन प्रेस ने 1920 में एक अंग्रेजी किताब छापी थी, नाम था- द चमार्स। किताब के लेखक थे एक अंग्रेज शोधकर्ता जियो डब्ल्यू ब्रिज्स। किताब इतनी मशहूर हुई कि उसका प्रकाशन आज भी हो रहा है। लेखक उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक गांव की शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी बस्ती में ठहर गए, और शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों की दिनचर्या पर शोध किया। जब किताब छपी, तो उसमें एक छोटी-सी कहानी भी निकली। गांव से एक शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक शहर चला गया, वहां पर उसने कोई व्यवसाय किया, पैसा बनाया, और कुछ वर्षो के बाद कुछ दिनों के लिए वापस गांव आया। एक दिन, वह गांव के खेतों की ओर घूमने निकला, धूप से बचने के लिए उसने एक छाता ले रखा था। खबर गांव के जमींदार तक पहुंच गई। जमींदार के इशारे पर उसके लठैत उस शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक को पकड़कर जमींदार के सामने हाजिर किया। जमींदार ने उस शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक का छाता ले लिया, और अगले दिन से खेतों में काम करने का आदेश दिया। क्या करूं, शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी होने की यही सजा है- इस कथन के साथ वह शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी आजीवन जमींदार के यहां काम करता रहा।

ऐसी ही घटना आजमगढ़ के एक छोटे-से गांव में घटी। यह 1980 के आस-पास की बात है। उस गांव का एक शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी हलवाहा अपने जमींदार के शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के लिए मध्य रात्रि में आजमगढ़ रेलवे स्टेशन के लिए चुपचाप पैदल निकल पड़ा। भोर होते ही यह खबर जमींदार तक पहुंच गई कि उनका हलवाहा दिल्ली भागने की नीयत से आजमगढ़ स्टेशन की ओर निकल पड़ा है। जमींदार के दो बेटे अपनी बाइक से रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े। वे ट्रेन के आने से पहले ही हलवाहे को पकड़कर गांव ले आए। इसके बाद वह हलवाहा आजीवन अपने जमींदार के यहां काम करता रहा। कुछ ही वर्ष पहले उसकी मृत्यु हुई।

ये दोनों कहानियां एक ही बात कहती हैं कि गांवों में रह रहे शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों की मुक्ति का महत्व, गांव से निकलकर शहर जाना, जमींदार की बजाय पूंजीपति की फैक्टरी में काम करना, नंगे हाथ की बजाय मशीन से काम करना है। अगर मुक्ति की राह इतनी ही सरल है कि गांव से शहर, जमींदार के खेत-खलिहान से पूंजीपति की फैक्टरी, तो फिर क्यों करोड़ों शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी गांवों में ही बने रहे या ऐसा क्या हो गया कि 1990 के बाद भारी संख्या में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी शहरों की ओर चल पड़े?

यहीं पर आर्थिक सुधार का महत्व दिखता है। 1990 आते-आते भारत का औद्योगिक ढांचा ठहर-सा गया था। टैक्स कलेक्शन भी ठहर गया था, निर्यात भी ठहर गया था, डॉलर तिजोरी से निकलता गया, भारत को अपना सोना तक बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखना पड़ा। इसी बीच 1991 में नरसिंह राव, मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलुवालिया की त्रिमूर्ति ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। इंस्पेक्टर राज खत्म किया गया, लाइसेंस लेना आसान हुआ, कस्टम डय़ूटी घटा दी गई, विदेशी कंपनियों के भारत आने का रास्ता आसान हो गया।

वह दशक, 1991-2000 तक, भारत में औद्योगिक क्रांति के लिए जाना जाएगा। इस दौरान देखते-देखते ही शहरों का विस्तार हो गया, फैक्टरियां शहरों के बाहर फैलने लगीं, सड़कें चौड़ी हो गईं, शहरों में जाम लगने लगे। 1991 के बाद फैक्टरियों, शहरों में करोड़ों मजदूरों के लिए अवसर पैदा होने लगे, और इस औद्योगिक क्रांति ने एक सामाजिक क्रांति को जन्म दे दिया। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी नौजवान निकल पड़े शहरों की ओर।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वेनिया स्थित सेंटर फॉर एडवांस स्टडी ऑफ इंडिया के देवेश कपूर ने उत्तर प्रदेश के बिलरियागंज, आजमगढ़ व खुर्जा के कुल 1,933 शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी परिवारों का सर्वे किया। साल 2008 में हुए उस सर्वे में कुल 291 गांव कवर किए गए। सर्वे में देवेश ने पाया कि 1991-2007 के बीच दोनों ब्लॉक के कुल 291 गांवों से 7,464 शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक शहर की ओर निकल गए, यानी औसतन 26 शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी प्रति गांव।

आर्थिक सुधारों का अर्थ सिर्फ औद्योगिक क्रांति नहीं है। इसकी अपनी एक विचार-व्यवस्था भी है, जिसका एक मूलमंत्र है- मांग और आपूर्ति से किसी चीज का मूल्य तय होना। भारी संख्या में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी शहरों की ओर गए। उन्होंने अपने घर पैसे भेजना शुरू किया, तो घर में बचे लोगों ने भी जमींदारों के यहां काम करना बंद कर दिया। साल 2000 तक समूचे उत्तर भारत के गांवों में मजदूरों का अकाल पड़ने लगा। नतीजा यह हुआ कि पूरे उत्तर भारत से बैल विलुप्त हो गए। हलवाही प्रथा हमेशा के लिए ध्वस्त हो गई। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी समाज जमींदारों के नियंत्रण से मुक्त हो गया। मोटे अनाजों की खेती बंद हो गई। आज शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी भी वही गेहूं, चावल, दाल खा रहे हैं, जो पहले जमींदार खाया करते थे। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी भी वैसे ही कपड़े पहन रहे हैं, जैसे सवर्ण पहना करते हैं। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी बस्तियों में भी वही शैंपू, क्रीम और चाय की पत्ती बिक रही है, जो सवर्ण बस्तियों में बिकती हैं। अब तो सवर्ण महिलाओं द्वारा खोले गए ब्यूटी-पार्लर में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी महिलाओं का भी फेशियल हो रहा है।
(इसी कड़ी में मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा की जिन शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को गावों में मंदिरों में पूजा करना तो दूर घुसने भी नहीं दिया जाता था वही अब अपनी मेहनत की कमाई से मंदिर बनवा रहे हैं,पर अपने झोपड़े “बौद्ध धम्म” में एक ईट नहीं लगा रहे| उन देवी देवताओं के नाम लाखों खर्च कर जागरण करवा रहे है जो कुछ ही दसक पहले इनके छूने से अपवित्र हो जाते थे, अब धन आ गया तो सब पवित्र हो गया है| जो गुरु इन शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को ज्ञान नहीं देना चाहते थे,इनके छूने या परछाई भर से अपवित्र हो जाते थे, आज धन आने के बाद उन्ही गुरुओं के चरणों में पड़े रहने का इनको मौका मिला तो शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों ने इतनी गुरुबाजी सत्संगबाजी करनी शुरू कर दी की बच्चों का भविष्ये ही बर्बाद कर रहे हैं| शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों में से बहुत से लोग तो गौतम बुद्ध को बिलकुल अजनबी की तरह समझते हैं ध्यान तक नहीं देना चाहते| जबकि गौतम बुद्ध ने सदियों पहले खोज निकला था की इंसानों के दुःख का मूल कारन ‘आर्थिक अव्यस्था’ है, दुःख का कारन इच्छा तो इस बात को दबाने वाली मिलावट थी|मुद्दे की बात ये है की बौद्ध धम्म के पतन के कारन ही आप शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी बने थे,आज जब आपपर थोड़ा धन आ गया है तो दूसरों के महलों में उसको न लुटाओ अपने झोपड़े को भी दुरुस्त कर लो,क्योंकि वो महल उसके मालिकों मई मर्जी पर चलते हैं, जाने कब उनकी मर्जी बदल जाए, तब लौटना तो अपने झोपड़े में ही पड़ेगा|….Samaybuddha)

बेशक अभी शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी सवर्णो के बराबर नहीं हुए हैं, लेकिन शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी उनके दबाव से मुक्त होते हा रहे हैं। मुक्ति की यह यात्रा जारी है। औchandra bhan prasadर इस दूसरी क्रांति का श्रेय देश में (संविधान आधारित) आर्थिक सुधारों को ही जाता है।

(लेखक एक ‘दलित’ चिंतक हैं और ये लेखक के अपने विचार हैं। यह लेख हिन्दुस्तान से लिया गया है।)

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/opinion-of-chandra-bhan-pratap-on-dalit-issues/
नोट: हमने इस लेख में ‘दलित’ शब्द को ‘शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी’ से रेप्लस कर दिया है.क्योंकि ब्राह्मणवादी मीडिया की दिया हुआ घृणित नाम दलित इस्तेमाल न
करना हमारी पालिसी है,संविधान और हमारे इतिहास में दलित नाम का कोई शब्द नहीं है|

भारतीय लोकतन्त्र के बहुजन (SC+ST+OBC) शासकों को एकता के साथ शासन करने के लिये “क्रान्ति का दर्शन” कराने वाले क्राँतिवीर मान्यवर साहब कांशीराम जी को उनके जन्मदिन 15 MARCH पर कोटि-कोटि श्रद्धासुमन अर्पित !!!…लाला बौद्ध

kanshiramबहुजन नायक मान्यवर कांशीराम :
जीवन परिचय :-
जन्म- 15 मार्च, 1934 को पंजाब के रोपड़ जिले के ख्वासपुर गांव में बहुजन (सिख समुदाय के रैदसिया) परिवार में हुआ.
माता-पिता – बिशन कौर और हरी सिंह
शिक्षा- स्नातक (रोपड़ राजकीय कालेज, पंजाब विश्वविद्यालय)
नौकरी- डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ)
सामाजिक प्रेरणा स्रोत:-
नौकरी के दौरान जातिगत भेदभाव से आहत होकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले और पेरियार के दर्शन को गहनता से पढ़कर दलितों को एकजुट करने में जुटे.
पंजाब के एक चर्चित विधायक की बेटी का रिश्ता आया लेकिन दलित आंदोलन के हित में उसे ठुकरा दिया.
– बुद्धिस्ट रिसर्च सेंटर की स्थापना की.
– कांशीराम जी की पहली ऐतिहासिक किताब ‘द चमचा ऐज’ (अंग्रेजी) 24 सितंबर 1982 को प्रकाशित हुआ.
-पे बैक टू सोसाइटी के सिद्धांत के तहत दलित कर्मचारियों को अपने वेतन का 10वां हिस्सा समाज को लौटाने का आह्वान किया.
राजनीतिक व सामाजिक यात्रा का प्रारम्भ :-
-सबसे पहले बाबासाहेब द्वारा स्थापित पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के सक्रिए सदस्य बनें.
-1971 में पूना में आरपीआई और कांग्रेस के बीच गैरबराबरी के समझौते और नेताओं के आपसी कलह से आहत होकर पार्टी से इस्तीफा.
-बामसेफ -1964 में 6 दिसंबर 1978 को ‘बामसेफ’ का विधिवत गठन किया. कांशीराम का मानना था कि आरक्षण का लाभ लेकर सरकारी नौकरी में पहुंचा वर्ग ही शोषितों का थिंक, इंटलैक्चुअल और कैपिटल बैंक यही कर्मचारी तबका है. बहुजनों की राजनीतिक ताकत तैयार करने में बामसेफ काफी मददगार साबित हुआ.
राजनितिक मुहिम का प्रारम्भ :-
बहुजनों को एकजुट करने और राजनीतिक ताकत बनाने का अभियान 1970 के दशक में शुरू किया.
दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) – दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक समुदाय को जोड़ने के लिए उन्होंने डीएस-4 का गठन किया. इसकी स्थापना 6 दिसंबर 1981 को की गई. डीएस-4 के जरिए सामाजिक, आर्थिक बराबरी का आंदोलन आम झुग्गी-झोपड़ी तक पहुंचाने में काफी मदद मिली. इसको सुचारु रूप से चलाने के लिए महिला और छात्र विंग में भी बांटा गया. जाति के आधार पर उत्पीड़न, गैर-बराबरी जैसे समाजिक मुद्दों पर लोगों के बीच जागरूकता और बुराइयों के खिलाफ आंदोलन करना डीएस-4 के एजेंडे में रहे. डीएस-4 के जरिए ही देश भर में साइकिल रैली निकाली गई.
भारत की तीसरे नम्बर की पार्टी का सफरनामा:-
बहुजन समाज पार्टी (बसपा)- 14 अप्रैल, 1984 को बसपा का गठन. सत्ता हासिल करने के लिए बनाया गया राजनीतिक संगठन.
– 1991 में पहली बार यूपी के इटावा से 11 लोकसभा का चुनाव जीते.
– 1996 में दूसरी बार लोकसभा का चुनाव पंजाब के होशियारपुर से जीते.
– 2001 में सार्वजनिक तौर पर घोषणा कर कुमारी मायावती को उत्तराधिकारी बनाया.
महापरिनिर्वाण:-
-2003 में लकवाग्रस्त होने के बाद सक्रिय राजनीति से दूर चले गए.
– 9 अक्टूबर, 2006 को हार्टअटैक, दिल्ली में अंतिम सांस ली.
साहित्यक योगदान:-
कांशीराम ने निम्नलिखित पत्र-पत्रिकाएं शुरू की—-
अनटचेबल इंडिया (अंग्रेजी)
बामसेफ बुलेटिन (अंग्रेजी)
आप्रेस्ड इंडियन (अंग्रेजी)
बहुजन संगठनक (हिन्दी)
बहुजन नायक (मराठी एवं बंग्ला)
श्रमिक साहित्य
शोषित साहित्य
दलित आर्थिक उत्थान
इकोनोमिक अपसर्ज (अंग्रेजी)
बहुजन टाइम्स दैनिक
बहुजन एकता
सम्पूर्ण योगदान एक नजर में:-
कांशीराम जी पहले ऐसे व्यक्ति थे जिसने शोषित समाज की निष्क्रिय रही राजनितिक चेतना को जागृत किया था. बाबासाहब ने संविधान के माध्यम से शोषित समाज के लिए विकास के लिए बंद दरवाजे खोल दिए थे, लेकिन इस विकास रूपी दरवाजे के पार पहुचाने का कार्य मान्यवर ‘कांशीराम’ जी ने किया था. बाबासाहब ने शोषितों का मनोबल प्राप्त करने का आह्वान किया, कांशीराम जी ने समाज को ‘मनोबल’ प्राप्त करने के लिए मजबूर किया. कांशीराम जी उन महान पुरुषों में से है जिन्होंने व्यक्तिगत ‘स्वार्थ’ की जगह समाज के लिए कार्य किया, अपनी माँ को लिखी चिठ्ठी में ‘मान्यवर कांशीराम’ जी ने ‘शोषित समाज’ को ही अपना परिवार बताया. वर्तमान में समाज को ‘कांशीराम’ जी जैसे महापुरुषों की अत्यंत आवश्यकता है.
भारतीय लोकतन्त्र के बहुजन शासकों को एकता के साथ शासन करने के लिये “क्रान्ति का दर्शन” कराने वाले क्राँतिवीर को उनके जन्मदिन पर कोटि-कोटि श्रद्धासुमन अर्पित !!!

गौतम बुद्ध द्वारा खोजी विपस्सना मनुष्य-जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्यान-प्रयोग है। जितने व्यक्ति विपस्सना से बुद्धत्व को उपलब्ध हुए उतने किसी और विधि से कभी नहीं।आईये जाने विपस्सना कैसे की जाती है?…OSHO

vipasshnaविपस्सना मनुष्य-जाति के इतिहास का सर्वाधिक महत्वपूर्ण ध्यान-प्रयोग है। जितने व्यक्ति विपस्सना से बुद्धत्व को उपलब्ध हुए उतने किसी और विधि से कभी नहीं। विपस्सना अपूर्व है! विपस्सना शब्द का अर्थ होता है: देखना, लौटकर देखना। बुद्ध कहते थे: इहि पस्सिको, आओ और देखो! बुद्ध किसी धारणा का आग्रह नहीं रखते। बुद्ध के मार्ग पर चलने के लिए ईश्वर को मानना न मानना, आत्मा को मानना न मानना आवश्यक नहीं है। बुद्ध का धर्म अकेला धर्म है इस पृथ्वी पर जिसमें मान्यता, पूर्वाग्रह, विश्वास इत्यादि की कोई भी आवश्यकता नहीं है। बुद्ध का धर्म अकेला वैज्ञानिक धर्म है। बुद्ध कहते: आओ और देख लो। मानने की जरूरत नहीं है। देखो, फिर मान लेना। और जिसने देख लिया, उसे मानना थोड़े ही पड़ता है; मान ही लेना पड़ता है। और बुद्ध के देखने की जो प्रक्रिया थी, दिखाने की जो प्रक्रिया थी, उसका नाम है विपस्सना।

विपस्सना बड़ा सीधा-सरल प्रयोग है। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। श्वास जीवन है। श्वास से ही तुम्हारी आत्मा और तुम्हारी देह जुड़ी है। श्वास सेतु है। इस पार देह है, उस पार चैतन्य है, मध्य में श्वास है। यदि तुम श्वास को ठीक से देखते रहो, तो अनिवार्य रूपेण, अपरिहार्य रूप से, शरीर से तुम भिन्न अपने को जानोगे। श्वास को देखने के लिए जरूरी हो जायेगा कि तुम अपनी आत्मचेतना में स्थिर हो जाओ। बुद्ध कहते नहीं कि आत्मा को मानो। लेकिन श्वास को देखने का और कोई उपाय ही नहीं है। जो श्वास को देखेगा, वह श्वास से भिन्न हो गया, और जो श्वास से भिन्न हो गया वह शरीर से तो भिन्न हो ही गया। क्योंकि शरीर सबसे दूर है; उसके बाद श्वास है; उसके बाद तुम हो। अगर तुमने श्वास को देखा तो श्वास के देखने में शरीर से तो तुम अनिवार्य रूपेण छूट गए। शरीर से छूटो, श्वास से छूटो, तो शाश्वत का दर्शन होता है। उस दर्शन में ही उड़ान है, ऊंचाई है, उसकी ही गहराई है। बाकी न तो कोई ऊंचाइयां हैं जगत में, न कोई गहराइयां हैं जगत में। बाकी तो व्यर्थ की आपाधापी है।

फिर, श्वास अनेक अर्थों में महत्वपूर्ण है। यह तो तुमने देखा होगा, क्रोध में श्वास एक ढंग से चलती है, करुणा में दूसरे ढंग से। दौड़ते हो, एक ढंग से चलती है; आहिस्ता चलते हो, दूसरे ढंग से चलती है। चित्त ज्वरग्रस्त होता है, एक ढंग से चलती है; तनाव से भरा होता है, एक ढंग से चलती है; और चित्त शांत होता है, मौन होता है, तो दूसरे ढंग से चलती है। श्वास भावों से जुड़ी है। भाव को बदलो, श्वास बदल जाती है़। श्वास को बदल लो, भाव बदल जाते हैं। जरा कोशिश करना। क्रोध आये, मगर श्वास को डोलने मत देना। श्वास को थिर रखना, शांत रखना। श्वास का संगीत अखंड रखना। श्वास का छंद न टूटे। फिर तुम क्रोध न कर पाओगे। तुम बड़ी मुश्किल में पड़ जाओगे, करना भी चाहोगे तो क्रोध न कर पाओगे। क्रोध उठेगा भी तो भी गिर-गिर जायेगा। क्रोध के होने के लिए जरूरी है कि श्वास आंदोलित हो जाये। श्वास आंदोलित हो तो भीतर का केंद्र डगमगाता है। नहीं तो क्रोध देह पर ही रहेगा। देह पर आये क्रोध का कुछ अर्थ नहीं है, जब तक कि चेतना उससे आंदोलित न हो। चेतना आंदोलित हो, तो ज़ुड गये।

फिर इससे उल्टा भी सच है: भावों को बदलो, श्वास बदल जाती है। तुम कभी बैठे हो सुबह उगते सूरज को देखते नदी-तट पर। भाव शांत हैं। कोई तरंगें नहीं चित्त में। उगते सूरज के साथ तुम लवलीन हो। लौटकर देखना, श्वास का क्या हुआ? श्वास बड़ी शांत हो गयी। श्वास में एक रस हो गया, एक स्वाद…छंद बंध गया! श्वास संगीतपूर्ण हो गयी। विपस्सना का अर्थ है शांत बैठकर, श्वास को बिना बदले…खयाल रखना प्राणायाम और विपस्सना में यही भेद है। प्राणायाम में श्वास को बदलने की चेष्टा की जाती है, विपस्सना में श्वास जैसी है वैसी ही देखने की आकांक्षा है। जैसी है—ऊबड़-खाबड़ है, अच्छी है, बुरी है, तेज है, शांत है, दौड़ती है, भागती है, ठहरी है, जैसी है!

बुद्ध कहते हैं, तुम अगर चेष्टा करके श्वास को किसी तरह नियोजित करोगे, तो चेष्टा से कभी भी महत फल नहीं होता। चेष्टा तुम्हारी है, तुम ही छोटे हो; तुम्हारी चेष्टा तुमसे बड़ी नहीं हो सकती। तुम्हारे हाथ छोटे हैं; तुम्हारे हाथ की जहां-जहां छाप होगी, वहां-वहां छोटापन होगा।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा है कि श्वास को तुम बदलो। बुद्ध ने प्राणायाम का समर्थन नहीं किया है। बुद्ध ने तो कहा: तुम तो बैठ जाओ, श्वास तो चल ही रही है; जैसी चल रही है बस बैठकर देखते रहो। जैसे राह के किनारे बैठकर कोई राह चलते यात्रियों को देखे, कि नदी-तट पर बैठ कर नदी की बहती धार को देखे। तुम क्या करोगे? आई एक बड़ी तरंग तो देखोगे और नहीं आई तरंग तो देखोगे। राह पर निकली कारें, बसें, तो देखोगे; नहीं निकलीं, तो देखोगे। गाय-भैंस निकलीं, तो देखोगे। जो भी है, जैसा है, उसको वैसा ही देखते रहो। जरा भी उसे बदलने की आकांक्षा आरोपित न करो। बस शांत बैठ कर श्वास को देखते रहो। देखते-देखते ही श्वास और शांत हो जाती है। क्योंकि देखने में ही शांति है।

और निर्चुनाव—बिना चुने देखने में बड़ी शांति है। अपने करने का कोई प्रश्न ही न रहा। जैसा है ठीक है। जैसा है शुभ है। जो भी गुजर रहा है आंख के सामने से, हमारा उससे कुछ लेना-देना नहीं है। तो उद्विग्न होने का कोई सवाल नहीं, आसक्त होने की कोई बात नहीं। जो भी विचार गुजर रहे हैं, निष्पक्ष देख रहे हो। श्वास की तरंग धीमे-धीमे शांत होने लगेगी। श्वास भीतर आती है, अनुभव करो स्पर्श…नासापुटों में। श्वास भीतर गयी, फेफड़े फैले; अनुभव करो फेफड़ों का फैलना। फिर क्षण-भर सब रुक गया…अनुभव करो उस रुके हुए क्षण को। फिर श्वास बाहर चली, फेफड़े सिकुड़े, अनुभव करो उस सिकुड़ने को। फिर नासापुटों से श्वास बाहर गयी। अनुभव करो उत्तप्त श्वास नासापुटों से बाहर जाती। फिर क्षण-भर सब ठहर गया, फिर नयी श्वास आयी।

यह पड़ाव है। श्वास का भीतर आना, क्षण-भर श्वास का भीतर ठहरना, फिर श्वास का बाहर जाना, क्षण-भर फिर श्वास का बाहर ठहरना, फिर नयी श्वास का आवागमन, यह वर्तुल है—वर्तुल को चुपचाप देखते रहो। करने की कोई भी बात नहीं, बस देखो। यही विपस्सना का अर्थ है।
क्या होगा इस देखने से? इस देखने से अपूर्व होता है। इसके देखते-देखते ही चित्त के सारे रोग तिरोहित हो जाते हैं। इसके देखते-देखते ही, मैं देह नहीं हूं, इसकी प्रत्यक्ष प्रतीति हो जाती है। इसके देखते-देखते ही, मैं मन नहीं हूं, इसका स्पष्ट अनुभव हो जाता है। और अंतिम अनुभव होता है कि मैं श्वास भी नहीं हूं। फिर मैं कौन हूं? फिर उसका कोई उत्तर तुम दे न पाओगे। जान तो लोगे, मगर गूंगे का गुड़ हो जायेगा। वही है उड़ान। पहचान तो लोगे कि मैं कौन हूं, मगर अब बोल न पाओगे। अब अबोल हो जायेगा। अब मौन हो जाओगे। गुनगुनाओगे भीतर-भीतर, मीठा-मीठा स्वाद लोगे, नाचोगे मस्त होकर, बांसुरी बजाओगे; पर कह न पाओगे।

और विपस्सना की सुविधा यह है कि कहीं भी कर सकते हो। किसी को कानों-कान पता भी न चले। बस में बैठे, ट्रेन में सफर करते, कार में यात्रा करते, राह के किनारे, दुकान पर, बाजार में, घर में, बिस्तर पर लेटे…किसी को पता भी न चले! क्योंकि न तो कोई मंत्र का उच्चार करना है, न कोई शरीर का विशेष आसन चुनना है। धीरे-धीरे…इतनी सुगम और सरल बात है और इतनी भीतर की है, कि कहीं भी कर ले सकते हो। और जितनी ज्यादा विपस्सना तुम्हारे जीवन में फैलती जाये उतने ही एक दिन बुद्ध के इस अदभुत आमंत्रण को समझोगे: इहि पस्सिको! आओ और देख लो!

बुद्ध कहते हैं: ईश्वर को मानना मत, क्योंकि शास्त्र कहते हैं; मानना तभी जब देख लो। बुद्ध कहते हैं: इसलिए भी मत मानना कि मैं कहता हूं। मान लो तो चूक जाओगे। देखना, दर्शन करना। और दर्शन ही मुक्तिदायी है। मान्यताएं हिंदू बना देती हैं, मुसलमान बना देती हैं, ईसाई बना देती हैं, जैन बना देती हैं, बौद्ध बना देती हैं; दर्शन तुम्हें परमात्मा के साथ एक कर देता है। फिर तुम न हिंदू हो, न मुसलमान, न ईसाई, न जैन, न बौद्ध; फिर तुम परमात्ममय हो। और वही अनुभव पाना है। वही अनुभव पाने योग्य है।

 

http://www.osho.com/hi/meditate/meditation-tool-kit/questions-about-meditation/what-is-vipassana

ओशो: मरो हे जोगी मरो , #12

मान्यवर कांशीराम साहब के जीवन पर्यंत संघर्ष का मुख्य मकसद था सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाना. उनका मकसद था एक ऐसा समाज बनाना जो समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व पर आधारित हो. अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए वे सत्ता को एक साधन मानते थे….मा कांशीराम जी के भाषण की CD से साभार

kanshiram ashokaमान्यवर कांशीराम साहब के जीवन पर्यंत संघर्ष का मुख्य मकसद था सामाजिक एवं आर्थिक परिवर्तन लाना. उनका मकसद था एक ऐसा समाज बनाना जो समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व पर आधारित हो. अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए वे सत्ता को एक साधन मानते थे. लेकिन उनके सामने अनेक कठिनाइयाँ थीं. अपने संघर्ष और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे मनी, माफिया और मीडिया को सबसे बड़ा रोड़ा मानते थे. उन्होंने इनसे मुकाबला करने के लिए अलग-अलग रणनीति बनायीं, साथ ही बहुजन समाज के लोगों को इन तीनों से सावधान रहने का आह्वान किया. हम यहाँ अन्य बिन्दुओं पर विस्तार में जाने की बजाय उन घटनाओं की ओर आपका का ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं जिनसे आप जान सकें कि मान्यवर कांशीराम साहब ने किस-किस प्रकार की परिस्थितियों का सामना करके चुनावों में सफलता के कीर्तिमान स्थापित किये. और बहुजन समाज को सत्ता के मंदिर तक पहुँचाने के लिए मजबूत आधार प्रदान किया.
लोकसभा चुनाव 1984 में मान्यवर कांशीराम ने पहला लोकसभा चुनाव “जांजगीर मध्यप्रदेश” से लड़ा था. मान्यवर के शब्दों में “लोकसभा चुनाव 1984 के लिए हमारे पास न पैसा था, न संगठन औरन ही कोई शक्ति लेकिन, फिर भी हमने हिम्मत और हौसला करके अपने कुछ उम्मीदवार खड़े किये. छतीसगढ़ में कुछ साथियों को, जो मेरे साथ चल रहे थे उनको लड़ाने के लिए मैं उधर पहुंचा. लेकिन छत्तिसगढ़ के लोग थे वो तो पक्के कांग्रेसी थे. श्री खुंटे (टी. आर. खुंटे) को लड़ाने के लिए मैं उधर गया था और उसके ही घर में ही मेरे ठहरने की व्यवस्था थी. उधर उसके बाप ने घर के बाहर भूख हड़ताल शुरू कर दी, यह कहते हुए कि मेरे लड़के का दिमाग ख़राब हो गया है, ये कांशीराम के चक्कर में आ गया है. यह बहुजन समाज पार्टी से चुनाव लड़ना चाहता है, मैं कांग्रेस वालों को क्या जवाब दूंगा. इस तरह वह बेचारा भूख हड़ताल पर बैठा था और उसी के घर पर मैं ठहरा हुआ था तो, मैंने सोचा कि भई मुझे क्या करना चाहिए. जिसको लड़ाने के लिए मैं वहां गया था जब वह नहीं लड़ा तो मैंने सोचा कि मैं तो इसे लड़ाने के लिए यहाँ तैयारी करके आया हूँ. अब ये नहीं लड़ रहा है तो मुझे क्या करना चाहिए. मैंने सोचा कि नामांकन का आज आखिरी दिन है, तो अब मुझे ही लड़ना चाहिए लेकिन, उस वक्त तो मेरे पास नामांकन के दौरान अनामत राशि भरने का पैसा नहीं था. मैंने उधर चादर बिछाई और बहुजन समाज के जिन लोगों को मैंने तैयार किया था उनसे अपील किया कि आप लोग इस चादर पर थोड़ा-थोड़ा पैसा डालें ताकि मैं 500 रूपये जमा करके अपना नामांकन कर सकूं. जब वहाँ उन्होंने पैसा डाला और मैंने गिना तो 700 रुपया हो गया. उसमें से 500 रूपये डिपोजिट भर दिया और 200 रूपये में मैंने एक साइकिल खरीद ली क्योंकि अब मुझे प्रचार भी करना था. इसलिए मेरे पास साईकिल भी होना जरूरी चाहिए. मैंने सोचा बाकि कर्मचारियों के पास अपनी- अपनी साइकिलें हैं, हम इकट्ठे होकर साइकिल से प्रचार करेंगे. इस तरह से साथियों ! हम लोगों ने प्रचार शुरू कर दिया और मुझे 32 हजार वोट मिले.”
हरिद्वार लोकसभा चुनाव 1987.
1987 में हरिद्वार लोकसभा सीट के लिए उपचुनाव हुआ.कांग्रेस पार्टी ने उत्तर प्रदेश का गृहमंत्री चुनाव मैदान में उतारा, तब कांग्रेस का मुकाबला करने के लिए सारी विपक्षियों को मिलकर चुनाव लड़ना पड़ता था.उन सभी विपक्षियों ने रामविलास पासवान को खड़ा किया. उन्होंने रामविलास पासवान को चुनाव मैदान में उतारने से पहले हरिद्वार में हर की पौड़ी पर गंगा स्नान करवाया. ठाकुर चंद्रशेखर ने पासवान को कंधे पर बैठाकर स्नान कराया और पंडितों ने आशीर्वाद दिया कि ‘इसने पवित्र जगह से स्नान किया है, इसलिए यह जरूर जीतेगा.’ कांग्रेस वाले प्रत्याशी ने भी कहा कि ‘मैं तो इधर गंगा किनारे ही पैदा हुआ हूँ, मैं तो हमेशा गंगा में ही स्नान करता रहा हूँ ऐसा करके मैं भी जीतूँगा.’ तब (व्यंग करते हुए) मैं भी मायावती को उनसे एक फर्लांग ऊपर लेकर गया. मैंने कहा कि वे जिधर नहाये हैं, उधर गंगा गन्दी हो चुकी है इसलिए इधर गंगा साफ है इधर आप स्नान करो ताकि मैं घोषणा कर सकूं कि हमारा उम्मीदवार जीतेगा (मा.कांशीराम साहब अपने भाषणों में अक्सर इस तरह के अन्ध विश्वासों पर व्यंग करते थे).
अब चुनाव में खर्च करने के लिए हमारे पास कोई पैसे नहीं. चुनाव आने तक हम एक-एक, दो-दो, पांच-पांच रुपया इकठ्ठा करते रहे. मैंने पार्लियामेंट के अन्दर पड़ने वाले विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से पांच चुनाव कार्यालय खोलकर सिल्वर के बर्तन इकट्ठे करके रखे थे कि इन पांच जगहों पर पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए लंगर चलाऊंगा.परन्तु चुनाव ख़त्म हो गया आखिर तक हम लंगर नहीं चला सके. मेरे पास साईकिल थी तो मैं कुछ कार्यकर्ताओं को लेकर जगह-जगह घूमता था.मायावती को साइकिल चलाना नहीं आता था तो वो बस से घूमती थी. तब मायावती ने मुझे बताया कि ‘प्रत्याशी को बस में घूमने से बेइज्जती होती है क्योंकि, मैं बस में घूमती हूँ तो लोग कहते हैं कि देखो ये चुनाव लड़ रही है’. चुनाव तक मैंने एक गाड़ी लेनी चाही लेकिन आखिर तक हम वह गाड़ी भी नहीं ले सके. पांच दिन चुनाव के रह गये. हमें एक पुरानी टूटी सी जीप किराये पर मिली जो इतनी ख़राब थी कि उसमें तेल की टंकी की जगह पीपी रखी थी. तब मायावती ने बताया की इस जीप में आग लग गयी तो मैं कहाँ जाऊँगी. मैंने उस जीप में बैठने के लिए मायावती को तैयार किया. इसके बाद सारे देश भर से पार्टी समर्थक कार्यकर्ताओं ने थोड़ा-थोड़ा पैसा भेजा जो, आखिर तक मेरे पास कुल 87000 रुपया इकठ्ठा हुआ जिससे हमने वह चुनाव लड़ा. उस 87000 रुपया खर्च करने पर सुश्री मायावती को 1.36.000 (एक लाख छत्तीस हजार) वोट पड़े. जबकि नोटों वाली कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार को १ लाख 49 हजार और सारी विपक्षी पार्टियों के उम्मीदवार रामविलास पासवान को मात्र 32 हजार वोट पड़े. इस तरह मात्र 13 हजार वोट के अन्तर से (सुश्री) मायावती को हारना पड़ा. यह 23 मार्च 1987 की कहानी है. इसके बाद मैं हमेशा पश्चाता रहा कि अगर मेरे पास एक लाख रूपये भी होता तो मैं मायावती को सांसद बना देता. फिर (सुश्री) मायावती को दो साल इन्तजार करना पड़ा.
1989 में हरिद्वार की बजाय हरिद्वार से लगी हुयी पार्लियामेंट की बिजनौर सीट से वह पार्लियामेंट मेम्बर बनीं.
इलाहाबाद लोकसभा चुनाव 1988
हरिद्वार उपचुनाव के बाद 1988में इलाहबाद संसदीय सीट का उपचुनाव हुआ. वहां से मैंने अपना नामांकन भरा. जहाँ एक तरफ कांग्रेस पार्टी मैदान में थी तो दूसरी तरफ सारी विपक्षी पार्टियों की ओर से वी. पी. सिंह चुनाव मैदान में थे जिनके पास खर्च करने को करोड़ों रूपये थे. हमारे पास वहां पर भी पैसों की कमी थी. तब वहां पर मैंने चुनाव के लिए एक डिब्बा ख़रीदा और एक रेड़ी किराये पर लिया. रेड़ी पर हारमोनियम लेकर गाना गानेवालों का साज-बाज रखा और मैं उस रेड़ी के पीछे-पीछे ‘एक वोट के साथ एक नोट’ डालनेवाला डिब्बा लेकर चला. गाना गानेवाले साथ-साथ चलते हुए कहते थे कि ‘नोट भी दे दो और वोट भी दे दो’. इस प्रकार तब मैंने गाँव-गाँव, गली-गली घूमकर बहुजन समाज के लोगों से अपील की कि मैं निर्धन समाज की ओर से उमीदवार खड़ा हूँ. मेरा बहुजन समाज निर्धन समाज है. हमारा (निर्धन समाज का) मुकाबला धनवानों (मनुवादी समाज)से है. मैं अभी आप लोगों से वोट मांगने आया हूँ. आपको यदि मुझे एक वोट डालना है तो उससे पहले मुझे अपने वोट के साथ एक नोट भी डालना है. आप निर्धन समाज के लोग हैं इसलिए आपको यदि मुझे वोट डालना है तो अभी से मन बना लें और एक वोट के साथ एक नोट भी डालना है.हमारा चुनाव भर में यह कार्यक्रम चलेगा. इसके बाद चुनाव आयोग की ओर से वोट के लिए मतदान-पत्र का डिब्बा आयेगा. इसलिए इससे पहले मुझे अपना एक नोट के साथ एक वोट भी डालें ताकि मैं अंदाजा लगा सकूँ कि मुझे मेरे निर्धन समाज का इतना वोट जरूर मिलेगा. इसके साथ-साथ हमारे कुछ पेन्टर कार्यकर्ता भी आये. उनको मैंने बोला कि वइलाहबाद की हर दीवार पर हाथी बना दो.उन्होंने इलाहबाद की दीवारों पर एक लाख हाथी बना दिये. इसके आलावा हमारा कोई प्रचार नहीं था. उन हाथियों को देखकर अख़बार वाले भी कुछ लिखने लग ये कि कांग्रेस और विपक्षी पार्टियों के वी. पी. सिंह के आलावा बहुजन समाज पार्टी का कांशीराम भी चुनाव मैदान में है. जब चुनाव का दिन आया तो वोट पड़ने के बाद इलेक्शन कमिश्नर ने अपने डिब्बे में वोट गिनकर घोषणा की कि डिब्बे में से कांशीराम के 86 हजार नोट निकले जबकि कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के मात्र 92 हजार वोट निकले. कांग्रेस पार्टी के मुझसे मात्र 6 हजार वोट ज्यादा निकले. तब थोड़े से ज्यादा वोट लेकर विपक्षी पार्टियों का उम्मीदवार वी. पी. सिंह जीत गया.
इटावा लोकसभा चुनाव 1991
मान्यवर अब तक जितने चुनाव लड़े थे वह समाज को तैयार करने और उसका हौसला बढ़ाने की दृष्टि से लड़ते आये थे. उनका मानना था कि जब तक बहुजन समाज के 50 सांसद जीतकर नहीं पहुँचते तब तक मुझे संसद में नहीं जाना चाहिए. उनका कहना था कि मैं अपने बहुजन समाज को तैयार करके पूरी ताकत के साथ संसद में जाऊंगा. परन्तु 1991 के लोकसभा चुनावों के बाद पूरे पूरे देश के कार्यकर्ताओं ने मा. कांशीराम साहब से व्यक्तिगत मुलाकातें करके आग्रह किया कि सामाजिक परिवर्तन की लहर को आगे बढाने के लिए आपका लोकसभा में जाना जरुरी है. अत: अपने निकट सहयोगियों और सक्रिय कार्यकर्ताओं की इच्छा को देखते हुए मान्यवर कांशीराम साहब ने इटावा संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से अपना नामांकन दाखिल किया. इटावा में हो रही चुनावी सभाओं में मान्यवर ने ऐलान किया कर दिया था- “अभी तक मैंने समाज को तैयार करने के लिए इलाहबाद में वी. पी. सिंह, अमेठी में राजीव गाँधी व पूर्वी दिल्ली में एच. के. एल. भगत के मुकाबले चुनाव लड़ा किन्तु, अब मैं इटावा से चुनाव जीतने के लिए लड़ रहा हूँ. हमें यह चुनाव जीतना है. कार्यकर्ताओं को भी निर्देश है- ‘करो या मरो’. अगर हम ऐसा नहीं करते हैं तो समाज का मनोबल ऊँचा नहीं कर गपाएंगे. इसलिए हमें बहुजन समाज का मनोबल बढ़ाने के लिए पूरी ताकत तो लगानी ही होगी.” इस चुनाव में मान्यवर कांशीराम के मुकाबले समाजवादी जनता पार्टी का रामसिंह शक्य, भाजपा का लाल सिंह वर्मा और कांग्रेस का शंकर तिवारी था. इस मुकाबले में कड़े संघर्ष के बावजूद भी
मा. कांशीराम साहब ने भाजपा के उम्मीदवार को 21951 मतों से हराकर विजय हासिल की.मान्यवर की जीत से कार्यकर्ताओं तथा लोगों में ख़ुशी की लहर दौड़ गयी.
लोगों का आभार व्यक्त करते हुए मान्यवर ने सार्वजानिक पत्र लिखा- “इटावा लोकसभा चुनाव में सफलता से बहुजन समाज में हर्षोल्लास का वातावरण निर्माण हुआ. इस सन्दर्भ में देश-विदेश से असंख्य बधाई-पत्र तथा टेलीग्राम प्राप्त हुए हैं. इन तमाम बधाई-पत्रों तथा टेलीग्राम का प्रत्यक्ष जवाब देना तो मेरे लिए असंभव है. बहुजन समाज निर्माण की प्रक्रिया में जुड़े हुए तमाम साथियों, हित चिंतकों तथा मित्रों का मैं अत्यंत आभारी हूँ. शुभ कामनाओं के साथ, जय भीम”.
इस तरह मान्यवर कांशीराम साहब ने अपने पास उपलब्ध छोटे-छोटे साधनों का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करके तथा धनवानों से मुकाबला करने के लिए अपने निर्धन समाज से थोड़ा- थोड़ा धन का बंदोबस्त करके अपने विरोधियों परास्त किया और सफलता के कीर्तिमान स्थापित किये. मान्यवर कांशीराम साहब का सांसद में प्रवेश बहुजन नायक
मान्यवर कांशीराम साहब ने 20 नवम्बर, 1991 को प्रात : 11 बजे संसद में उस समय पहला कदम रखा जब संसद में सभी सांसद सदस्य प्रवेश कर चुके थे. संसद के मुख्य द्वार पर जैसे ही मान्यवर पहुंचे तो सैकड़ों पत्रकार, फोटो ग्राफर आदि ने उन्हें घेर लिया. कुछ देर फोटोग्राफरों ने इतने फोटो खींचे की बिजली की सी चका- चौंध होती रही. इसके बाद संसद की सीढियाँ चढ़ते हुए भी फोटोग्राफरों के फोटो खींचें जाने के कारण उन्हें हर सीढ़ी पर रुक-रुक कर आगे बढ़ना पड़ रहा था. पत्रकारों की निगाह में भी अब तक सांसद तो बहुत जीत कर आते रहे किन्तु कांशीराम साहब की जीत के मायने ही कुछ और थे. इसलिए उनके इंतजार में आज पत्रकार 10 बजे से ही खड़े थे. इसके बाद आगे बढ़ते हुए
मान्यवर कांशीराम साहब ने जब संसद के मुख्य हाल में प्रवेश किया तो सबसे पहले लोकसभा अध्यक्ष श्री शिवराज पाटिल अपनी सीट छोडकर उन्हें लेने पहुंचे और उनसे हाथ मिलाया. मुख्य हाल में प्रवेश करते ही अन्दर बैठे सभी सांसदों ने अपने स्थान में खड़े होकर इस तरह स्वागत किया जैसे संसद में प्रधानमंत्री के स्वागत में खड़े हुए हों. प्रधानमंत्री श्री पी. वी. नरसिम्हाराव और अन्य पार्टियों के सभी बड़े नेता भी आगे बढ़कर मा. कांशीरामजी से हाथ मिलाये. शून्यकाल से पहले जब मान्यवर साहब को शपथ दिलायी गयी तो उस वक्त भी संसद तालियों से गूंज उठा. मान्यवर ने अंग्रेजी में “सत्यनिष्ठा” की शपथ ली थी. इस तरह उन्होंने न केवल शून्य से शिखर तक का रास्ता तय किया अपितु भारतीय राजनीति में उनकी इस आगाज ने देश की राजनीति की दिशा भी बदल दी ।
( मा कांशी रामजी के भाषण की CD से साभार)
मा.साहब के एतिहासिक साहस को नमन तथा नमन उस बहुजन समाज को जिसने फुले-शाहू आंबेडकर और कांशीराम साहब की विचारधारा को समझा और जो समझकर इनकी विचारधारा को जन जन तक पहुँचाने में लगे हैं ।

“क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?” 8 जनवरी 1934 को ‘हंस’ में प्रकाशित महानतम हिंदी लेखक मुंशी प्रेमचंद का यह लेख आज बेहद प्रासंगिक है…www.tehelkahindi.com

क्या हम वास्तव में राष्ट्रवादी हैं?

राष्ट्र्वाद का वजूद साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष के रूप में सामने आया था, लेकिन कुछ देश राष्ट्रवाद की राह पर चलकर सर्वसत्तावादी राष्ट्र-राज्य में तब्दील हो गए. चूंकि राष्ट्रवाद देशप्रेम जैसी स्वाभाविक भावना का राजनीतिक रूप है, इसलिए इसका कोई सर्वमान्य मूल्य स्थापित नहीं है. इसकी सकारात्मकता में दमनकारी होने की संभावनाएं भी मौजूद हैं. भारत के राष्ट्रीय आंदोलन में राष्ट्रवाद की भूमिका बेहद अहम रही है, लेकिन तभी से इसकी कई धाराएं भी मौजूद रही हैं. आज जब एक खास तरह का राष्ट्रवाद अराजक तत्वों के रूप में कोर्ट परिसरों से लेकर विश्वविद्यालयों तक में उपद्रवकारी साबित हो रहा है तब 8 जनवरी 1934 को ‘हंस’ में प्रकाशित प्रेमचंद का यह लेख बेहद प्रासंगिक हो गया है

munshi premchand

यह तो हम पहले भी जानते थे और अब भी जानते हैं कि साधारण भारतवासी राष्ट्रीयता का अर्थ नहीं समझता, और यह भावना जिस जागृति और मानसिक उदारता से उत्पन्न होती है, वह अभी हम में बहुत थोड़े आदमियों में आई है. लेकिन इतना जरूर समझते थे कि जो पत्रों के संपादक हैं, राष्ट्रीयता पर लंबेे-लंबे लेख लिखते हैं और राष्ट्रीयता की वेदी पर बलिदान होने वालों की तारीफों के पुल बांधते हैं, उनमें जरूर यह जागृति आ गई है और वह जात-पांत की बेडि़यों से मुक्त हो चुके हैं, लेकिन अभी हाल में ‘भारत’ में एक लेख देखकर हमारी आंखें खुल गईं और यह अप्रिय अनुभव हुआ कि हम अभी तक केवल मुंह से राष्ट्र-राष्ट्र का गुल मचाते हैं, हमारे दिलों में अभी वही जाति-भेद का अंधकार छाया हुआ है. और यह कौन नहीं जानता कि जाति भेद और राष्ट्रीयता दोनों में अमृत और विष का अंतर है. यह लेख किन्हीं ‘निर्मल’ महाशय का है और यदि यह वही ‘निर्मल’ हैं, जिन्हें श्रीयुत ज्योतिप्रसाद जी ‘निर्मल’ के नाम से हम जानते हैं, तो शायद वह ब्राह्मण हैं. हम अब तक उन्हें राष्ट्रवादी समझते थे, पर ‘भारत’ में उनका यह लेख देखकर हमारा विचार बदल गया, जिसका हमें दुख है. हमें ज्ञात हुआ कि वह अब भी उन पुजारियों का, पुरोहितों का और जनेऊधारी लुटेरों का हिंदू समाज पर प्रभुत्व बनाए रखना चाहते हैं जिन्हें वह ब्राह्मण कहते हैं पर हम उन्हें ब्राह्मण क्या, ब्राह्मण के पांव का धूल भी नहीं समझते. ‘निर्मल’ की शिकायत है कि हमने अपनी तीन-चौथाई कहानियों में ब्राह्मणों को काले रंगों में चित्रित करके अपनी संकीर्णता का परिचय दिया है जो हमारी रचनाओं पर अमिट कलंक है. हम कहते हैं कि अगर हममें इतनी शक्ति होती, तो हम अपना सारा जीवन हिंदू-जाति को पुरोहितों, पुजारियों, पंडों और धर्मोपजीवी कीटाणुओं से मुक्त कराने में अर्पण कर देते. हिंदू-जाति का सबसे घृणित कोढ़, सबसे लज्जाजनक कलंक यही टकेपंथी दल हैं, जो एक विशाल जोंक की भांति उसका खून चूस रहा है, और हमारी राष्ट्रीयता के मार्ग में यही सबसे बड़ी बाधा है. राष्ट्रीयता की पहली शर्त है, समाज में साम्य-भाव का दृढ़ होना. इसके बिना राष्ट्रीयता की कल्पना ही नहीं की जा सकती. जब तक यहां एक दल, समाज की भक्ति, श्रद्धा, अज्ञान और अंधविश्वास से अपना उल्लू सीधा करने के लिए बना रहेगा, तब तक हिंदू समाज कभी सचेत न होगा. और यह दल दस-पांच लाख व्यक्तियों का नहीं है, असंख्य है. उसका उद्यम यही है कि वह हिंदू जाति को अज्ञान की बेडि़यों में जकड़ रखे, जिससे वह जरा भी चूं न कर सके. मानो आसुरी शक्तियों ने अंधकार और अज्ञान का प्रचार करने के लिए स्वयंसेवकों की यह अनगिनत सेना नियत कर रखी है.

अगर हिंदू समाज को पृथ्वी से मिट नहीं जाना है, तो उसे इस अंधकार-शासन को मिटाना होगा. हम नहीं समझते, आज कोई भी विचारवान हिंदू ऐसा है, जो इस टकेपंथी दल को चिरायु देखना चाहता हो, सिवाय उन लोगों के जो स्वयं उस दल में हैं और चखौतियां कर रहे हैं. निर्मल, खुद शायद उसी टकेपंथी समाज के चौधरी हैं, वरना उन्हें टकेपंथियों के प्रति वकालत करने की जरूरत क्यों होती? वह और उनके समान विचारवाले उनके अन्य भाई शायद आज भी हिंदू समाज को अंधविश्वास से निकलने नहीं देना चाहते, वह राष्ट्रीयता की हांक लगाकर भी भावी हिंदू समाज को पुरोहितों और पुजारियों ही का शिकार बनाए रखना चाहते हैं. मगर हम उन्हें विश्वास दिलाते हैं कि हिंदू-समाज उनके प्रयत्नों और सिरतोड़ कोशिशों के बावजूद अब आंखें खोलने लगा है और इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि जिन कहानियों को ‘निर्मल’ जी ब्राह्मण-द्रोही बताते हैं, वह सब उन्हीं पत्रिकाओं में छपी थीं, जिनके संपादक स्वयं ब्राह्मण थे. मालूम नहीं ‘निर्मल’ जी ‘वर्तमान’ के संपादक श्री रमाशंकर अवस्थी, ‘सरस्वती’ के संपादक श्री देवीदत्त शुक्ल, ‘माधुरी’ के संपादक पं. रूपनारायण पांडे, ‘विशाल भारत’ के संपादक श्री बनारसीदास चतुर्वेदी आदि सज्जनों को ब्राह्मण समझते हैं या नहीं, पर इन सज्जनों ने उन कहानियों को छापते समय जरा भी आपत्ति न की थी. वे उन कहानियों को आपत्तिजनक समझते, तो कदापि न छापते. हम उनका गला तो दबा न सकते थे. मुरव्वत में पड़कर भी आदमी अपने धार्मिक विश्वास को तो नहीं त्याग सकता.  ये कहानियां उन महानुभावों ने इसीलिए छापीं, कि वे भी हिंदू समाज को टकेपंथियों के जाल से निकालना चाहते हैं, वे ब्राह्मण होते हुए भी इस ब्राह्मण जाति को बदनाम करने वाले जीवों का समाज पर प्रभुत्व नहीं देखना चाहते. हमारा खयाल है कि टकेपंथियों से जितनी लज्जा उन्हें आती होगी, उतनी दूसरे समुदायों को नहीं आ सकती, क्योंकि यह धर्मोपजीवी दल अपने को ब्राह्मण कहता है. हम कायस्थ कुल में उत्पन्न हुए हैं और अभी तक उस संस्कार को न मिटा सकने के कारण किसी कायस्थ को चोरी करते या रिश्वत लेते देखकर लज्जित होते हैं. ब्राह्मण क्या इसे पसंद कर सकता है, कि उसी समुदाय के असंख्य प्राणी भीख मांगकर, भोले-भाले हिंदुओं को ठगकर, बात-बात में पैसे वसूल करके, निर्लज्जता के साथ अपने धर्मात्मापन का ढोंग करते फिरें. यह जीवन व्यवसाय उन्हीं को पसंद आ सकता है, जो खुद उसमें लिप्त हैं और वह भी उसी वक्त तक, जब तक कि उनकी अंधस्वार्थ भावना प्रचंड है और भीतर की आंखें बंद हैं. आंखें खुलते ही वह उस व्यवसाय और उस जीवन से घृणा करने लगेंगे. हम ऐसे सज्जनों को जानते हैं, जो पुरोहित कुल में पैदा हुए, पर शिक्षा प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें वह टकापंथपन इतना जघन्य जान पड़ा कि उन्होंने लाखों रुपए साल की आमदनी पर लात मार स्कूल में अध्यापक होना स्वीकार कर लिया. आज भी कुलीन ब्राह्मण पुरोहितपन और पुजारीपन को त्याज्य समझता है और किसी दशा में भी यह निकृष्ट जीवन अंगीकार न करेगा. ब्राह्मण वह है, जो निस्पृह हो, त्यागी हो और सत्यवादी हो. सच्चे ब्राह्मण महात्मा गांधी, मदनमोहन मालवीय जी हैं, नेहरू हैं, सरदार पटेल हैं, स्वामी श्रद्धानंद हैं. वह नहीं जो प्रातःकाल आपके द्वार पर करताल बजाते हुए- ‘निर्मलपुत्र देहि भगवान’ की हांक लगाने लगते हैं, या गणेश-पूजा और गौरी पूजा और अल्लम-गल्लम पूजा पर यजमानों से पैसे रखवाते हैं, या गंगा में स्नान करने वालों से दक्षिणा वसूल करते हैं, या विद्वान होकर ठाकुर जी और ठकुराइन जी के श्रृंगार में अपना कौशल दिखाते हैं, या मंदिरों में मखमली गावतकिये लगाये वेश्याओं का नृत्य देखकर भगवान से लौ लगाते हैं.

“हिंदू बालक जब से धरती पर आता है और जब तक वह धरती से प्रस्थान नहीं कर जाता, इसी अंधविश्वास और अज्ञान के चक्कर में सम्मोहित पड़ा रहता है और नाना प्रकार के दृष्टांतों से मनगढ़ंत किस्से कहानियों से, पुण्य और धर्म के गोरखधंधों से, स्वर्ग और नरक की मिथ्या कल्पनाओं से, वह उपजीवी दल उनकी सम्मोहनावस्था को बनाए रखता है” और उनकी वकालत करते हैं हमारे कुशल पत्रकार ‘निर्मल’ जी, जो राष्ट्रवादी हैं. राष्ट्रवाद ऐसे उपजीवी समाज को घातक समझता है और समाजवाद में तो उसके लिए स्थान ही नहीं. और हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे, सभी ब्राह्मण होंगे, या सभी हरिजन होंगे. कुछ मित्रों की यह राय हो सकती है कि माना टकेपंथी समाज निकृष्ट है, त्याज्य है, पाखंडी है, लेकिन तुम उसकी निंदा क्यों करते हो, उसके प्रति घृणा क्यों फैलाते हो, उसके प्रति प्रेम और सहानुभूति क्यों नहीं दिखलाते, घृणा तो उसे और भी दुराग्रही बना देती है और फिर उसके सुधार की संभावना भी नहीं रहती. इसके उत्तर में हमारा यही नम्र निवेदन है कि हमें किसी व्यक्ति या समाज से कोई द्वेष नहीं, हम अगर टकेपंथीपन का उपहास करते हैं, तो जहां हमारा एक उद्देश्य यह होता है कि समाज में से ऊंच-नीच, पवित्र-अपवित्र का ढोंग मिटावें, वहां दूसरा उद्देश्य यह भी होता है कि टकेपंथियों के सामने उनका वास्तविक और कुछ अतिरंजित चित्र रखें, जिसमें उन्हें अपने व्यवसाय, अपनी धूर्तता, अपने पाखंड से घृणा और लज्जा उत्पन्न हो, और वे उसका परित्याग कर ईमानदारी और सफाई की जिंदगी बसर करें और अंधकार की जगह प्रकाश के स्वयंसेवक बन जाएं. ‘ब्रह्मभोज’ और ‘सत्याग्रह’ नामक कहानियों ही को देखिए, जिन पर ‘निर्मल’ जी को आपत्ति है. उन्हें पढ़ कर क्या यह इच्छा होती है कि चौबे जी या पंडित जी का अहित किया जाए? हमने चेष्टा की है कि पाठक के मन में उनके प्रति द्वेष न उत्पन्न हो, हां परिहास द्वारा उनकी मनोवृत्ति दिखाई है. ऐसे चौबों को देखना हो, तो काशी या वृंदावन में देखिए और ऐसे पंडितों को देखना हो तो, वर्णाश्रम स्वराज्य संघ में चले जाइए, और निर्मल जी पहले ही उस धर्मात्मा दल में नहीं जा मिले हैं, तो अब उन्हें चटपट उस दल में जा मिलना चाहिए, क्योंकि वहां उन्हीं की मनोवृत्ति के महानुभाव मिलेंगे. और वहां उन्हें मोटेराम जी के बहुत से भाई-बंधु मिल जाएंगे, जो उनसे कहीं बड़े सत्याग्रही होंगे. हमने कभी इस समुदाय की पोल खोलने की चेष्टा नहीं की, केवल मीठी चुटकियों से और फुसफुसे परिहास से काम लिया, हालांकि जरूरत थी बर्नाड शाॅ जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति की, जो घन से चोट लगाता है.

हिंदू बालक जब से धरती पर आता है और जब तक वह धरती से प्रस्थान नहीं कर जाता, इसी अंधविश्वास और अज्ञान के चक्कर में सम्मोहित पड़ा रहता है और नाना प्रकार के दृष्टांतों से मनगढ़ंत किस्से कहानियों से, पुण्य और धर्म के गोरखधंधों से, स्वर्ग और नरक की मिथ्या कल्पनाओं से, वह उपजीवी दल उनकी सम्मोहनावस्था को बनाए रखता है

निर्मल जी को इस बात की बड़ी फिक्र है कि आज के पचास साल बाद के लोग जो हमारी रचनाएं पढ़ेंगे, उनके सामने ब्राह्मण समाज का कैसा चित्र होगा और वे हिंदू समाज से कितने विरक्त हो जाएंगे. हम पूछते हैं कि महात्मा गांधी के हरिजन आंदोलन को लोग आज के एक हजार साल के बाद क्या समझेंगे? यह कि हरिजनों को ऊंची जाति के हिंदुओं ने कुचल रखा था. हमारे लेखों से भी आज के पचास साल बाद लोग यही समझेंगे कि उस समय हिंदू समाज में इसी तरह के पुजारियों, पुरोहितों, पंडों, पाखंडियों और टकेपंथियों का राज था और कुछ लोग उनके इस राज को उखाड़ फेंकने का प्रयत्न कर रहे थे. निर्मल जी इस समुदाय को ब्राह्मण कहें, हम नहीं कह सकते. हम तो उसे पाखंडी समाज कहते हैं, जो अब निर्लज्जता की पराकाष्ठा तक पहुंच चुका है. ऐतिहासिक सत्य चुप-चुप करने से नहीं दब सकता. साहित्य अपने समय का इतिहास होता है, इतिहास से कहीं अधिक सत्य. इसमें शर्माने की बात अवश्य है कि हमारा हिंदू समाज क्यों ऐसा गिरा हुआ है और क्यों आंखें बंद करके धूर्तों को अपना पेशवा मान रहा है और क्यों हमारी जाति का एक अंग पाखंड को अपनी जीविका का साधन बनाए हुए है, लेकिन केवल शर्माने से तो काम नहीं चलता. इस अधोगति की दशा सुधार करना है. इसके प्रति घृणा फैलाइए, प्रेम फैलाइए, उपहास कीजिए या निंदा कीजिए सब जायज है और केवल हिंदू-समाज के दृष्टिकोण से ही नहीं जायज है, उस समुदाय के दृष्टिकोण से भी जायज है, जो मुफ्तखोरी, पाखंड और अंधविश्वास में अपनी आत्मा का पतन कर रहा है और अपने साथ हिंदू-जाति को डुबोए डालता है. हमने अपने गल्पों में इस पाखंडी समुदाय का यथार्थ रूप नहीं दिखाया है, वह उससे कहीं पतित है, उसकी सच्ची दशा हम लिखें, तो शायद निर्मल जी को तो न आश्चर्य होगा, क्योंकि वह उसी समुदाय के एक व्यक्ति हैं, लेकिन हिंदू समाज की जरूर आंखें खुल जाएंगी, मगर यह हमारी कमजोरी है कि बहुत सी बातें जानते हुए भी उनके लिखने का साहस नहीं रखते और अपने प्राणों का भय भी है, क्योंकि यह समुदाय कुछ भी कर सकता है. शायद इस सांप्रदायिक प्रसंग को इसीलिए उठाया भी जा रहा है कि पंडों और पुरोहितों को हमारे विरुद्ध उत्तेजित किया जाए.

source

http://tehelkahindi.com/are-we-really-nationalist-a-relevent-essay-by-munshi-premchand/

हम जिस राष्ट्रीयता का स्वप्न देख रहे हैं उसमें तो जन्मगत वर्णों की गंध तक न होगी, वह हमारे श्रमिकों और किसानों का साम्राज्य होगा, जिसमें न कोई ब्राह्मण होगा, न हरिजन, न कायस्थ, न क्षत्रिय. उसमें सभी भारतवासी होंगे…Rajesh Gulabrao Ingle