आरक्षण की क्रांति से शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को जो मिला, उसकी एक सीमा थी, ऐसे में आर्थिक उदारीकरण उनके जीवन में दूसरी क्रांति लेकर आया।…चन्द्र भान प्रसाद via National Dastak



81-316-0271-0आरक्षण की क्रांति से शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को जो मिला, उसकी एक सीमा थी, ऐसे में आर्थिक उदारीकरण उनके जीवन में दूसरी क्रांति लेकर आया।

देश में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी समाज के भीतर एक छोटा, मगर सशक्त मध्यम वर्ग 1990 तक पैदा हो चुका था। और यह संभव हुआ बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के संघर्षो के कारण। उनके द्वारा शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी वर्ग को शिक्षा, सरकारी नौकरियों, संसद व विधानसभाओं में दिए गए आरक्षण के कारण। आरक्षण के रास्ते से शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मध्यम वर्ग का पैदा होना इस देश के लिए पहली शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी क्रांति साबित हुई। इसी जीवन में यह देखा गया कि शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी व्यक्ति सवर्ण के सामने बैठ नहीं सकते थे। इसी जीवन में यह भी देखा जा रहा है कि शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी दारोगा, कप्तान, कलेक्टर, कमिश्नर के तहत सवर्ण मातहत के रूप में कार्य कर रहे हैं, और उन्हें सैल्यूट मारते हैं। यह क्रांति नहीं, तो और क्या है?

लेकिन एक और क्रांति के बगैर, पहली क्रांति अधूरी थी। देश में कुल सरकारी नौकरियों की संख्या दो करोड़ के आस-पास है। यदि आरक्षण को शत-प्रतिशत लागू कर दिया जाए, तो करीब 30 लाख ही शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मुक्त हो पाएंगे, जबकि, करोड़ों शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मुक्ति की तलाश में हैं। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी मुक्ति का अर्थ है जमींदारों के खेत-खलिहानों से मुक्ति, जाति-आधारित पेशों से मुक्ति, और इसके बाद मुख्यधारा के पेशों, जैसे खाद्य उद्योग, कपड़ा उद्योग, जीवन शैली से जुड़े कारोबार वगैरह में प्रवेश। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों का बड़ा हिस्सा गावों में बसता है। ज्यादातर लोग अब भी अशिक्षित या अर्ध-शिक्षित हैं। वे सब एक तरह से सरकारी नौकरी के लिए उपयुक्त भी नहीं हैं। जाहिर है, शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों का व्यापक हिस्सा पहली शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी क्रांति, जो आरक्षण आधारित थी, उसमें शामिल होने की स्थिति में था ही नहीं। फिर, व्यापक शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी समाज को मुक्त करने वाली दूसरी शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी क्रांति क्या हो सकती थी? इसे एक किताब के माध्यम से समझा जा सकता है।

कोलकाता के अपने समय के विख्यात प्रकाशन एसोसिएशन प्रेस ने 1920 में एक अंग्रेजी किताब छापी थी, नाम था- द चमार्स। किताब के लेखक थे एक अंग्रेज शोधकर्ता जियो डब्ल्यू ब्रिज्स। किताब इतनी मशहूर हुई कि उसका प्रकाशन आज भी हो रहा है। लेखक उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले में एक गांव की शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी बस्ती में ठहर गए, और शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों की दिनचर्या पर शोध किया। जब किताब छपी, तो उसमें एक छोटी-सी कहानी भी निकली। गांव से एक शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक शहर चला गया, वहां पर उसने कोई व्यवसाय किया, पैसा बनाया, और कुछ वर्षो के बाद कुछ दिनों के लिए वापस गांव आया। एक दिन, वह गांव के खेतों की ओर घूमने निकला, धूप से बचने के लिए उसने एक छाता ले रखा था। खबर गांव के जमींदार तक पहुंच गई। जमींदार के इशारे पर उसके लठैत उस शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक को पकड़कर जमींदार के सामने हाजिर किया। जमींदार ने उस शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक का छाता ले लिया, और अगले दिन से खेतों में काम करने का आदेश दिया। क्या करूं, शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी होने की यही सजा है- इस कथन के साथ वह शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी आजीवन जमींदार के यहां काम करता रहा।

ऐसी ही घटना आजमगढ़ के एक छोटे-से गांव में घटी। यह 1980 के आस-पास की बात है। उस गांव का एक शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी हलवाहा अपने जमींदार के शोषण-उत्पीड़न से मुक्ति के लिए मध्य रात्रि में आजमगढ़ रेलवे स्टेशन के लिए चुपचाप पैदल निकल पड़ा। भोर होते ही यह खबर जमींदार तक पहुंच गई कि उनका हलवाहा दिल्ली भागने की नीयत से आजमगढ़ स्टेशन की ओर निकल पड़ा है। जमींदार के दो बेटे अपनी बाइक से रेलवे स्टेशन के लिए निकल पड़े। वे ट्रेन के आने से पहले ही हलवाहे को पकड़कर गांव ले आए। इसके बाद वह हलवाहा आजीवन अपने जमींदार के यहां काम करता रहा। कुछ ही वर्ष पहले उसकी मृत्यु हुई।

ये दोनों कहानियां एक ही बात कहती हैं कि गांवों में रह रहे शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों की मुक्ति का महत्व, गांव से निकलकर शहर जाना, जमींदार की बजाय पूंजीपति की फैक्टरी में काम करना, नंगे हाथ की बजाय मशीन से काम करना है। अगर मुक्ति की राह इतनी ही सरल है कि गांव से शहर, जमींदार के खेत-खलिहान से पूंजीपति की फैक्टरी, तो फिर क्यों करोड़ों शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी गांवों में ही बने रहे या ऐसा क्या हो गया कि 1990 के बाद भारी संख्या में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी शहरों की ओर चल पड़े?

यहीं पर आर्थिक सुधार का महत्व दिखता है। 1990 आते-आते भारत का औद्योगिक ढांचा ठहर-सा गया था। टैक्स कलेक्शन भी ठहर गया था, निर्यात भी ठहर गया था, डॉलर तिजोरी से निकलता गया, भारत को अपना सोना तक बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास गिरवी रखना पड़ा। इसी बीच 1991 में नरसिंह राव, मनमोहन सिंह, मोंटेक सिंह अहलुवालिया की त्रिमूर्ति ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की। इंस्पेक्टर राज खत्म किया गया, लाइसेंस लेना आसान हुआ, कस्टम डय़ूटी घटा दी गई, विदेशी कंपनियों के भारत आने का रास्ता आसान हो गया।

वह दशक, 1991-2000 तक, भारत में औद्योगिक क्रांति के लिए जाना जाएगा। इस दौरान देखते-देखते ही शहरों का विस्तार हो गया, फैक्टरियां शहरों के बाहर फैलने लगीं, सड़कें चौड़ी हो गईं, शहरों में जाम लगने लगे। 1991 के बाद फैक्टरियों, शहरों में करोड़ों मजदूरों के लिए अवसर पैदा होने लगे, और इस औद्योगिक क्रांति ने एक सामाजिक क्रांति को जन्म दे दिया। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी नौजवान निकल पड़े शहरों की ओर।

अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पेन्सिल्वेनिया स्थित सेंटर फॉर एडवांस स्टडी ऑफ इंडिया के देवेश कपूर ने उत्तर प्रदेश के बिलरियागंज, आजमगढ़ व खुर्जा के कुल 1,933 शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी परिवारों का सर्वे किया। साल 2008 में हुए उस सर्वे में कुल 291 गांव कवर किए गए। सर्वे में देवेश ने पाया कि 1991-2007 के बीच दोनों ब्लॉक के कुल 291 गांवों से 7,464 शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी युवक शहर की ओर निकल गए, यानी औसतन 26 शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी प्रति गांव।

आर्थिक सुधारों का अर्थ सिर्फ औद्योगिक क्रांति नहीं है। इसकी अपनी एक विचार-व्यवस्था भी है, जिसका एक मूलमंत्र है- मांग और आपूर्ति से किसी चीज का मूल्य तय होना। भारी संख्या में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी शहरों की ओर गए। उन्होंने अपने घर पैसे भेजना शुरू किया, तो घर में बचे लोगों ने भी जमींदारों के यहां काम करना बंद कर दिया। साल 2000 तक समूचे उत्तर भारत के गांवों में मजदूरों का अकाल पड़ने लगा। नतीजा यह हुआ कि पूरे उत्तर भारत से बैल विलुप्त हो गए। हलवाही प्रथा हमेशा के लिए ध्वस्त हो गई। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी समाज जमींदारों के नियंत्रण से मुक्त हो गया। मोटे अनाजों की खेती बंद हो गई। आज शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी भी वही गेहूं, चावल, दाल खा रहे हैं, जो पहले जमींदार खाया करते थे। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी भी वैसे ही कपड़े पहन रहे हैं, जैसे सवर्ण पहना करते हैं। शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी बस्तियों में भी वही शैंपू, क्रीम और चाय की पत्ती बिक रही है, जो सवर्ण बस्तियों में बिकती हैं। अब तो सवर्ण महिलाओं द्वारा खोले गए ब्यूटी-पार्लर में शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी महिलाओं का भी फेशियल हो रहा है।
(इसी कड़ी में मैं एक बात और जोड़ना चाहूँगा की जिन शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को गावों में मंदिरों में पूजा करना तो दूर घुसने भी नहीं दिया जाता था वही अब अपनी मेहनत की कमाई से मंदिर बनवा रहे हैं,पर अपने झोपड़े “बौद्ध धम्म” में एक ईट नहीं लगा रहे| उन देवी देवताओं के नाम लाखों खर्च कर जागरण करवा रहे है जो कुछ ही दसक पहले इनके छूने से अपवित्र हो जाते थे, अब धन आ गया तो सब पवित्र हो गया है| जो गुरु इन शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों को ज्ञान नहीं देना चाहते थे,इनके छूने या परछाई भर से अपवित्र हो जाते थे, आज धन आने के बाद उन्ही गुरुओं के चरणों में पड़े रहने का इनको मौका मिला तो शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों ने इतनी गुरुबाजी सत्संगबाजी करनी शुरू कर दी की बच्चों का भविष्ये ही बर्बाद कर रहे हैं| शेडूल-कास्ट/मूलनिवासियों में से बहुत से लोग तो गौतम बुद्ध को बिलकुल अजनबी की तरह समझते हैं ध्यान तक नहीं देना चाहते| जबकि गौतम बुद्ध ने सदियों पहले खोज निकला था की इंसानों के दुःख का मूल कारन ‘आर्थिक अव्यस्था’ है, दुःख का कारन इच्छा तो इस बात को दबाने वाली मिलावट थी|मुद्दे की बात ये है की बौद्ध धम्म के पतन के कारन ही आप शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी बने थे,आज जब आपपर थोड़ा धन आ गया है तो दूसरों के महलों में उसको न लुटाओ अपने झोपड़े को भी दुरुस्त कर लो,क्योंकि वो महल उसके मालिकों मई मर्जी पर चलते हैं, जाने कब उनकी मर्जी बदल जाए, तब लौटना तो अपने झोपड़े में ही पड़ेगा|….Samaybuddha)

बेशक अभी शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी सवर्णो के बराबर नहीं हुए हैं, लेकिन शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी उनके दबाव से मुक्त होते हा रहे हैं। मुक्ति की यह यात्रा जारी है। औchandra bhan prasadर इस दूसरी क्रांति का श्रेय देश में (संविधान आधारित) आर्थिक सुधारों को ही जाता है।

(लेखक एक ‘दलित’ चिंतक हैं और ये लेखक के अपने विचार हैं। यह लेख हिन्दुस्तान से लिया गया है।)

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/opinion-of-chandra-bhan-pratap-on-dalit-issues/
नोट: हमने इस लेख में ‘दलित’ शब्द को ‘शेडूल-कास्ट/मूलनिवासी’ से रेप्लस कर दिया है.क्योंकि ब्राह्मणवादी मीडिया की दिया हुआ घृणित नाम दलित इस्तेमाल न
करना हमारी पालिसी है,संविधान और हमारे इतिहास में दलित नाम का कोई शब्द नहीं है|

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