पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने बाबा साहेब डॉ बी आर आंबेडकर की जयंती मनाई। संस्था के शीर्ष अधिकारी ने इन प्रख्यात भारतीय समाज सुधारक को हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए ‘एक वैश्विक प्रतीक’ करार दिया और उनके विजन को पूरा करने के लिए भारत के साथ मिल कर काम करने की इस वैश्विक निकाय की कटिबद्धता प्रदर्शित की।


UN celebrated dr ambedkar jayantiपहली बार संयुक्त राष्ट्र ने बाबा साहेब डॉ बी आर आंबेडकर की जयंती मनाई। संस्था के शीर्ष अधिकारी ने इन प्रख्यात भारतीय समाज सुधारक को हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए ‘एक वैश्विक प्रतीक’ करार दिया और उनके विजन को पूरा करने के लिए भारत के साथ मिल कर काम करने की इस वैश्विक निकाय की कटिबद्धता प्रदर्शित की।

यूएनडीपी की प्रशासक हेलेन क्लार्क ने भारत के स्थायी मिशन द्वारा इस वैश्विक निकाय में आंबेडकर की 125 वीं जयंती पर पहली बार आयोजित विशेष समारोह में अपने संबोधन में कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र में इस महत्त्वपूर्ण वर्षगांठ को मनाए जाने पर मैं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की ओर से भारत की सराहना करती हूं।’ संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव पद के उम्मीदवारों में शामिल क्लार्क ने कहा, ‘हम वर्ष 2030 के एजंडे और दुनिया भर के गरीब एवं वंचित लोगों के लिए आंबेडकर की सोच को हकीकत में बदलना सुनिश्चित करने के लिए भारत के साथ अपनी बेहद करीबी साझेदारी को जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’

भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पी बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की 125वीं जयंती बुधवार को इस वैश्विक संस्था में मनाई गई थी। उसका आयोजन नागरिक समाज के समूहों कल्पना सरोज फाउंडेशन और फाउंडेशन आॅफ ह्यूमन होराइजन के साथ मिल कर किया गया। संयुक्त राष्ट्र विकास समूह की अध्यक्ष कलार्क ने राजनयिकों, विद्वानों और आंबेडकर के अनुयायियों को अपने संबोधन में कहा कि यह अवसर ऐसे ‘बहुत महान व्यक्ति की विरासत’ को याद करता है, जिन्होंने इस बात को समझा कि ‘अनवरत चली आ रहीं और बढ़ती असमानताएं’ देशों और लोगों की आर्थिक और सामाजिक कल्याण के समक्ष मूल चुनौतियां पेश करती हैं।

न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री क्लार्क ने कहा कि आंबेडकर के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वे 60 साल पहले थे। वंचित समूहों के समावेश और सशक्तीकरण, श्रम कानूनों में सुधार और सभी के लिए शिक्षा को बढ़ावा देने पर डॉ आंबडेकर की ओर से किए गए काम ने उन्हें ‘भारत और अन्य देशों में हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए प्रतीक बना दिया।’ इस मौके पर ‘संपोषणीय विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए असमानता से संघर्ष’ विषयक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें आंबेडकर से जुड़े कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टान कचनोवस्की और एसोसिएट प्रोफेसर अनुपमा राव एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विख्याता क्रिस्टोफर क्वीन ने हिस्सा लिया।

क्लार्क ने कहा कि अांबेडकर के विजन एवं कार्य का आधार असमानताएं एवं भेदभाव घटाना भी नए विकास एजंडे के मूल में है जिसे 2030 तक हासिल करने के प्रति विश्व ने कटिबद्धता दिखाई है। आंबेडकर को असमानताएं दूर करने के लिए जरूरी दूरगामी उपायों की गहरी समझ थी।

 

http://www.jansatta.com/international/he-struggled-for-people-around-the-globe-plea-in-un-to-declare-ambedkar-jayanti-world-equality-day/85974/

 

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/04/160414_ambedkar_un_birth_century_cj_tk

 

 

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अगर आप ईस्वरवादी है तो ठीक है कोई बात नही लेकिन वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण विचारधारा युक्त महापुरुषों की विचारधारा के बारे में भी आपको मालुम ही होना चाहिए ..पेश है.. कुछ विश्वप्रसिद्ध महामानवों के धर्म /मजहब के बारे में विचार

buddha and GOD concept god-2अगर आप ईस्वरवादी है तो ठीक है कोई बात नही लेकिन वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण विचारधारा युक्त महापुरुषों की विचारधारा के बारे में भी आपको मालुम ही होना चाहिए ..पेश है..

कुछ विश्वप्रसिद्ध महामानवों के धर्म /मजहब के बारे में विचार

१ – आचार्य चार्वाक का कहना था –
” इश्वर एक रुग्ण विचार प्रणाली है , इससे मानवता का कोई कल्याण होने वाला नहीं है ”

२ – अजित केशकम्बल ( 523 ई . पू )
अजित केश्कंबल बुद्ध के समय कालीन विख्यात तीर्थंकर थे , त्रिपितिका में अजित के विचार कई जगह आये हैं , उनका कहना था –
” दान , यज्ञ , हवन नहीं ….लोक परलोक नहीं ”

३- सुकरात ( 466-366 ई पू )
” इश्वर केवल शोषण का नाम है ”

४- इब्न रोश्द ( 1126-1198 )
इनका जन्म स्पेन के मुस्लिम परिवार में हुआ था , रोश्द के दादा जामा मस्जिद के इमाम थे , इन्हें कुरआन कंठस्थ थी । इन्होने अल्लाह के अस्तित्व को नकार दिया था और इस्लाम को राजनैतिक गिरोह कहा था । जिस कारण मुस्लिम धर्मगुरु इनकी जान के पीछे पड़ गए थे ।
रोश्द ने दर्शन के बुद्धि प्रधान हथियार से इस्लाम के मजहबी वादशास्त्रियों की खूब खबर ली ।

5 – कॉपरनिकस ( 1473-1543)
इन्होने धर्म गुरुओं की पूल खोल थी इसमें धर्मगुरु ये कह कर को मुर्ख बना रहे थे की सूर्य प्रथ्वी के चक्कर लगता है । कॉपरनिकस ने अपने पप्रयोग से ये सिद्ध कर दिया की प्रथ्वी सहित सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं, जिस कारण धर्म गुरु इतने नाराज हुए की कोपरनिकस के सभी सार्थक वैज्ञानिको को कठोर दंड देना प्रारंभ कर दिया ।

6 – मार्टिन लूथर ( 1483-1546)
इन्होने जर्मनी में अन्धविश्वास, पाखंड और धर्गुरुओं के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन किया इन्होने कहा था ” व्रत , तीर्थयात्रा , जप , दान अदि सब निर्थक है ”

7-सर फ्रेंसिस बेकन ( 1561-1626)
अंग्रेजी के सारगर्भित निबंधो के लिए प्रसिद्ध, तेइस साल की उम्र में ही पार्लियामेंट के सदस्य बने , बाद में लार्ड चांसलर भी बने । उनका कहना था
“नास्तिकता व्यक्ति को विचार . दर्शन , स्वभाविक निष्ठां , नियम पालन की और ले जाती है , ये सभी चीजे सतही नैतिक गुणों की पथ दर्शिका हो सकती हैं ।

8 – बेंजामिन फ्रेंकलिन (1706-1790)
इनका कहना था ” सांसारिक प्रपंचो में मनुष्य धर्म से नहीं बल्कि इनके न होने से सुरक्षित है ”

9- चार्ल्स डार्विन (1809-1882)
इन्होने ईश्वरवाद और धार्मिक गुटों पर सर्वधिक चोट पहुचाई , इनका कहना था ” मैं किसी ईश्वरवाद में विश्वास नहीं रखता और न ही आगमी जीवन के बारे में ”

10-कार्ल मार्क्स ( 1818-1883)
कार्ल मार्क्स का कहना था ” इश्वर का जन्म एक गहरी साजिश से हुआ है ” और ” धर्म एक अफीम है ” उनकी नजर में धर्म विज्ञानं विरोधी , प्रगति विरोधी , प्रतिगामी , अनुपयोगी और अनर्थकारी है , इसका त्याग ही जनहित में है ।

11- पेरियार (1879-1973)
इनका जन्म तमिलनाडु में हुआ और इन्होने जातिवाद , ईश्वरवाद , पाखंड , अन्धविश्वास पर जम के प्रहार किया ।

12- अल्बर्ट आइन्स्टीन ( 1879-1955)
विश्वविख्यात वैज्ञानिक का कहना था ” व्यक्ति का नैतिक आचरण मुख्य रूप से सहानभूति , शिक्षा और सामाजिक बंधन पर निर्भर होना चाहिए , इसके लिए धार्मिक आधार की कोई आवश्यकता नहीं है . मृत्यु के बाद दंड का भय और पुरस्कार की विंकक़शा से नियंत्रित करने पर मनुष्य की हालत दयनीय हो जाती है”

13-भगत सिंह (1907-1931)

प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानी भगत सिंह ने अपनी पुस्तक ” मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में कहा है ” मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमजोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का अहसास किया तो मनुष्य को तमाम कठिनाईयों का साहस पूर्ण सामना करने और तमाम खतरों के साथ वीरतापूर्ण जुझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख दिनों में उच्छखल न हो जाये इसके लिए रोकने और नियंत्रित करने के लिए इश्वर की कल्पना की गयी है ”

14- लेनिन
लेनिन के अनुसार ” जो लोग जीवन भर मेहनत मशक्कत करते है और आभाव में जीते हैं उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्रता और धैर्य रखने की तथा परलोक में सुख की आशा से सांत्वना प्राप्त करने की शिक्षा देता है , परन्तु जो लोग दुसरो के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें इहजीवन में दयालुता की शिक्षा देता है , इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्खा बता देता है ”

15. गौतम बुद्ध

बुद्ध कहते है की भगवान नाम की कोई चीज नही है! भगवान कि लिये अपना समय नष्ट मत करो,
केवल सत्य ही सबकुछ है

अत: , भले ही धर्म प्राचीन समय के समाज की आवश्यकता रहा हो परन्तु वह एक अंधविश्वास ही था जो अपने साथ कई अंधविश्वासों को जोड़ता चला गया . धर्म और अंधविश्वास दोनों एक दुसरे के पूरक हैं , अंधविश्वास का जन्म भी उसी तरह हुआ जिस तरह भांति भांति धर्मो का ।

इन धर्म के नाना प्रकार के अन्धविश्वासो के शिकार भी प्राय: गरीब लोग ही होते थे , सुविधाओं के आभाव उन्हें विज्ञानं और सच से काट देता था और वो गृहकलेश , वीमारी , प्राकर्तिक आपदाओं , निर्धनता आदि समस्याओं का समाधान के लिए टोन टोटके , तांत्रिको , बाबाओं , मौलवियों , ज्योतिषियों , व आदि के चक्कर में फंस जाते है!

यदि आप शिक्षा के साथ जागरूक एवं विज्ञानवादी सोच है,तो आपकी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि महापुरुषों की विचारधारा को भी अपने साथियों तक जरूर पहुंचाएं…

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22-Apr-2016 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- आइए फासीवाद सामंतवाद और पूँजीवाद को जाने ,जब तक इनको हम जानेंगे नहीं इनसे कैसे लड़ेंगे |ये तीनों शैतान आपको निगल जाने को बढ़ रहे हैं और आप गाने बजने क्रिकेट में मस्त हो

जनता को सरकार से ये अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए की वो उनके लिए कुछ करेगी, अगर पोलिटिकल स्टेबिलिटी है और जनता को काम करने पढ़ने लिखने और न्याय पाने की आज़ादी है तो समझ लो वही स्वर्ग है| इसके बावजूद कोई गरीब और मजलूम है तो वो खुद ही निकम्मा है | लार्ड मैकॉले द्वारा शिक्षा को सर्वजन करने व इंडियन पीनल कोड की धाराएं बनाने से लेकर अभी तक भी जनता का स्वर्ण काल चल रहा है, आगे का आगे देखेंगे| पर अगर कोई मेहनत करना चाह रहा है पढ़ना चाह रहा है तो वो अपने जीवन को बदल पायेगा| ऐसा सुनहरा मौका राजतन्त्र में जनता के लिए पहले कभी नहीं था , राजतन्त्र में तो बस वही फलते फूलते हैं जिनपर राज कृपा हो बाकि तो डेन डेन को मोहताज़ होते हैं, इज्ज़्ज़त बेइज़्ज़ती की बात तो क्या चली|

इसलिए लग जाओ ज्ञान और शक्ति इकट्ठी करने में , आड़े वक़्त में बस यही काम आएगी


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27-Jan-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- आइए फासीवाद सामंतवाद और पूँजीवाद को जाने ,जब तक इनको हम जानेंगे नहीं इनसे कैसे लड़ेंगे |ये तीनों शैतान आपको निगल जाने को बढ़ रहे हैं और आप गाने बजने क्रिकेट में मस्त हो|इनका जिक्र होते ही आम लोग चैनल बदल देते हैं और नाच गाने में मस्त हो जाते हैं,

फासिस्ट और फासीवाद:

जरा देखें फासिस्ट और फासीवाद का  मतलब क्या होता है – फासीवाद की व्याख्या है – a governmental system led by a dictator having complete power, forcibly suppressing opposition and criticism, regimenting all industry, commerce, etc., and emphasizing an aggressive nationalism and often racism.

याने कि एक तानाशाह के नेतृत्वकी  सर्वशक्तिमान सरकार जो बलपूर्वक टीका और विरोधकोंको कुचल दें, जो सभी उद्योगजगत, व्यापार को अपनी तर्ज पर काम करने को मजबूर करे और एक आक्रमक राष्ट्रवाद का समर्थन करे । ऐसी सरकार वंशवाद का भी समर्थन करती पायी जा सकती है ।

तो ये रहा फासीवाद और इसके तहत चलनेवाले सभी ठहरे फासिस्ट । अब इसका थोड़ा इतिहास देखें । इटली के तानाशाह मुसोलिनी का पक्ष खुद को फासिस्ट कहलाता था । हिटलर की नाझी पार्टी भी फासिस्ट थी । साथ में वंशवादी भी ।

फासीवाद या फ़ासिस्टवाद (फ़ासिज़्म) इटली में बेनितो मुसोलिनी द्वारा संगठित “फ़ासिओ डि कंबैटिमेंटो” का राजनीतिक आंदोलन था जो मार्च, १९१९ में प्रारंभ हुआ। इसकी प्रेरणा और नाम सिसिली के 19वीं सदी के क्रांतिकारियों-“फासेज़”-से ग्रहण किए गए।

फासीवाद के 14 लक्षण….डा. लॉरेंस ब्रिट

ये लक्षण डा. लॉरेंस ब्रिट ने बताए हैं जो एक राजनीतिक विज्ञानी हैं जिन्होंने फासीवादी शासनों – जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) – का अध्ययन किया और निम्नलिखित लक्षणों की निशानदेही की है:

डा. लॉरेंस ब्रिट  – एक राजनीतिक विज्ञानी जिन्होंने फासीवादी शासनों जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो  (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) का अध्ययन  किया और निम्नलिखित 14 लक्षणों की निशानदेही की है;

  1. शक्तिशाली और सतत राष्ट्रवाद — फासिस्ट शासन देश भक्ति के आदर्श वाक्यों, गीतों, नारों , प्रतीकों और अन्य सामग्री का निरंतर उपयोग करते हैं. हर जगह झंडे दिखाई देते हैं जैसे वस्त्रों पर झंडों के प्रतीक और सार्वजानिक स्थानों पर झंडों की भरमार.
  1. मानव अधिकारों के मान्यता प्रति तिरस्कार — क्योंकि दुश्मनों से डर है इसलिए फासिस्ट शासनों द्वारा लोगो को लुभाया जाता है कि यह सब सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वक्त की ज़रुरत है. शासकों के दृष्टिकोण से लोग घटनाक्रम को देखना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे अत्याचार, हत्याओं, और आनन-फानन में सुनाई गयी कैदियों को लम्बी सजाओं का अनुमोदन करना भी शुरू कर देते हैं.
  1. दुश्मन या गद्दार की पहचान एक एकीकृत कार्य बन जाता है — लोग कथित आम खतरे और दुश्मन – उदारवादी; कम्युनिस्टों, समाजवादियों, आतंकवादियों, आदि के खात्मे की ज़रुरत प्रति उन्मांद की हद तक एकीकृत किए जाते हैं.
  1. मिलिट्री का वर्चस्व — बेशक व्यापक घरेलू समस्याएं होती हैं पर सरकार सेना का विषम फंडिंग पोषण करती है. घरेलू एजेंडे की उपेक्षा की जाती है ताकि मिलट्री और सैनिकों का हौंसला बुलंद और ग्लैमरपूर्ण बना रहे.
  1. उग्र लिंग-विभेदीकरण — फासिस्ट राष्ट्रों की सरकारें लगभग पुरुष प्रभुत्व वाली होती हैं. फासीवादी शासनों के अधीन, पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को और अधिक कठोर बना दिया जाता है. गर्भपात का सख्त विरोध होता है और कानून और राष्ट्रीय नीति होमोफोबिया और गे विरोधी होती है
  1. नियंत्रित मास मीडिया – कभी कभी तो मीडिया सीधे सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, लेकिन अन्य मामलों में, परोक्ष सरकार विनियमन, या प्रवक्ताओं और अधिकारियों द्वारा पैदा की गयी सहानुभूति द्वारा मीडिया को नियंत्रित किया जाता है.   सामान्य युद्धकालीन सेंसरशिप विशेष रूप से होती है.
  1. राष्ट्रीय सुरक्षा का जुनून – एक प्रेरक उपकरण के रूप में सरकार द्वारा इस डर का जनता पर प्रयोग किया जाता है.

8.धर्म और सरकार का अपवित्र गठबंधन — फासिस्ट देशों में सरकारें एक उपकरण के रूप में सबसे आम धर्म को आम राय में हेरफेर करने के लिए प्रयोग करती हैं. सरकारी नेताओं द्वारा धार्मिक शब्दाडंबर और शब्दावली का प्रयोग सरेआम होता है बेशक धर्म के प्रमुख सिद्धांत सरकार और सरकारी कार्रवाईयों के विरुद्ध होते हैं.

  1. कारपोरेट पावर संरक्षित होती है – फासीवादी राष्ट्र में औद्योगिक और व्यवसायिक शिष्टजन सरकारी नेताओं को शक्ति से नवाजते हैं जिससे अभिजात वर्ग और सरकार में एक पारस्परिक रूप से लाभप्रद रिश्ते की स्थापना होती है.
  1. श्रम शक्ति को दबाया जाता है – श्रम-संगठनों का पूर्ण रूप से उन्मूलन कर दिया जाता है या कठोरता से दबा दिया जाता है क्योंकि फासिस्ट सरकार के लिए एक संगठित श्रम-शक्ति ही वास्तविक खतरा होती है.
  1. बुद्धिजीवियों और कला प्रति तिरस्कार – फासीवादी राष्ट्र उच्च शिक्षा और अकादमिया के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. अकादमिया और प्रोफेसरों को सेंसर करना और यहाँ तक कि गिरफ्तार करना असामान्य नहीं होता. कला में स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पर खुले आक्रमण किए जाते हैं और सरकार कला की फंडिंग करने से प्राय: इंकार कर देती है.
  1. अपराध और सजा प्रति जुनून – फासिस्ट सरकारों के अधीन कानून लागू करने के लिए पुलिस को लगभग असीमित अधिकार दिए जाते हैं. पुलिस ज्यादितियों के प्रति लोग प्राय: निरपेक्ष होते हैं  यहाँ तक कि वे सिविल आज़ादी तक को देशभक्ति के नाम पर कुर्बान कर देते हैं. फासिस्ट राष्ट्रों में अक्सर असीमित शक्ति वाले  विशेष पुलिस बल होते हैं.
  1. उग्र भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार — फासिस्ट राष्ट्रों का राज्य संचालन मित्रों के समूह द्वारा किया जाता है जो अक्सर एक दूसरे को सरकारी ओहदों पर नियुक्त करते हैं और एक दूसरे को जवाबदेही से बचाने के लिए सरकारी शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग किया जाता है. सरकारी नेताओं द्वारा राष्ट्रीय संसाधनों और खजाने को लूटना असामान्य बात नहीं होती.

14. चुनाव महज धोखाधड़ी होते हैं — कभी-कभी होने वाले चुनाव महज दिखावा होते हैं. विरोधियों के विरुद्ध लाँछनात्मक अभियान चलाए जाते है और कई बार हत्या तक कर दी जाती है , विधानपालिका के अधिकारक्षेत्र का प्रयोग वोटिंग संख्या या राजनीतिक जिला सीमाओं को नियंत्रण करने के लिए और मीडिया का दुरूपयोग करने के लिए किया जाता है.

https://samajvad.wordpress.com/2009/06/19/%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%87-14-%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/

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fascism vs captalism

सामंतवाद /Feudalism

सामंतवाद ऐसी प्रथा होती है जिसमे शीर्ष स्थान में राजा होता है जिसके नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते हैं जो किसी इलाके के 1/2 धन और धरती के मालिक होते हैं और आम जनता सबसे निम्न स्तर में किसान या दास बनकर गुलामी को मजबूर होते है 2/2

सामंतवाद (Feudalism / फ्युडलिज्म) मध्यकालीन युग की प्रथा थी। इन सामंतों की कई श्रेणियाँ थीं जिनके शीर्ष स्थान में राजा होता था। उसके नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते थे और सबसे निम्न स्तर में किसान या दास होते थे। यह रक्षक और अधीनस्थ लोगों का संगठन था। राजा समस्त भूमि का स्वामी माना जाता था। सामंतगण राजा के प्रति स्वामिभक्ति बरतते थे, उसकी रक्षा के लिए सेना सुसज्जित करते थे और बदले में राजा से भूमि पाते थे। सामंतगण भूमि के क्रय-विक्रय के अधिकारी नहीं थे। प्रारंभिक काल में सामंतवाद ने स्थानीय सुरक्षा, कृषि और न्याय की समुचित व्यवस्था करके समाज की प्रशंसनीय सेवा की। कालांतर में व्यक्तिगत युद्ध एवं व्यक्तिगत स्वार्थ ही सामंतों का उद्देश्य बन गया। साधन-संपन्न नए शहरों के उत्थान, बारूद के आविष्कार, तथा स्थानीय राजभक्ति के स्थान पर राष्ट्रभक्ति के उदय के कारण सामंतशाही का लोप हो गया।

भारत में सामंतवाद दसवीं शताब्दी के बाद भारतीय समाज में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इनमें से एक यह था कि विशिष्ट वर्ग के लोगों की शक्ति बहुत बढ़ी जिन्हें सामंत, रानक अथवा रौत्त (राजपूत) आदि पुकारा जाता था। इन वर्गों की उत्पत्ति विभिन्न तरीकों से हुई थी। इनमें से कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी थे जिनको वेतन मुद्रा की जगह ग्रामों में दिया जाता था, जिससे ये कर प्राप्त करते थे। कुछ और ऐसे पराजित राजा थे जिनके समर्थक सीमित क्षेत्रों के कर के अभी भी अधिकारी बने बैठे थे। कुछ और वंशागत स्थानीय सरदार या बहादुर सैनिक थे, जिन्होंने अपने कुछ हथियारबन्द समर्थकों की सहायता से अधिकार क्षेत्र स्थापित कर लिया था। इन लोगों की हैसियत भी अलग-अलग थी। इनमें से कुछ केवल ग्रामों के प्रमुख थे और कुछ का अधिकार कुछ ग्रामों पर था और कुछ ऐसे भी थे जो एक सारे क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो सके थे। इस प्रकार इन सरदारों की निश्चित श्रेणियाँ थी। ये अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए आपस में लगातार संघर्ष किया करते थे। ऐसे ‘लगान’ वाले क्षेत्र[1] जो राजा अपने अधिकारियों या समर्थकों को देता था, वे अस्थायी थे और जिन्हें राजा अपनी मर्जी से जब चाहे, वापस ले सकता था। लेकिन बड़े विद्रोह अथवा विश्वासघात के मामलों में छोड़कर राजा द्वारा ज़मीन शायद ही वापस ली जाती थी। समसामयिक विचारधारा के अनुसार पराजित नरेश की भूमि को भी लेना पाप माना जाता था।

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साभार bhartdiscovery.org

अगर सामंतवाद को धर्म द्वारा लोगों के दिमाग में बिठाकर लोगों से गुलामी करवाई जाये तो उसे ब्राह्मणवाद कहते हैं जिसमें लोग ख़ुशी ख़ुशी धर्म के नाम पर अपना शोषण करवाते हैं, इसी को मानसिक गुलामी कहते हैं जिसमे गुलाम अपने बेड़ियों से ही प्रेम करता है, इनको आज़ाद नहीं करवाया जा सकता है

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पूंजीवाद/Capitalism

पूंजीवाद प्राइवेटिकरन से पनपी आर्थिक व्यस्था को कहते हैं जिसमें उत्पादन के साधन मतलब कम्पनिया,स्कूल,कालेज,माल,हस्पताल,खेती/फसल पर सरकार की जगह कोई सेठ मालिक होते है,सरकारी नियंत्रण नाम मात्र को रह जाता है| ये एक प्रकार का सामंतवाद है जिसमे खेती की जगह कम्पनियाँ हैं जिसमे जनता का शोषण हो सकता है| भारत में जातिवाद और पूँजीवाद ने मिलकर सदियों से शोषण सह रहे भारतवासियों को फिर शोषण की तरफ हांक दिया है

CAPITALISM

पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र की दुर्गति……गुरचरन दास|

भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र।

हमने पिछले दिनों एक और गणतंत्र दिवस मनाया, लेकिन कई भारतीयों के लिए इसमें उत्साह की कोई बात नहीं थी क्योंकि सरकार को लकवा मार जाने से वे हताश हैं। यह अब तक की सबसे कमजोर सरकारों में से एक है और कई लोग दृढ़ एवं निर्णयात्मक नेतृत्व की कामना कर रहे हैं।

प्रसिद्ध सुधारकों के नेतृत्व वाली इस सरकार ने लगभग कोई नया सुधार लागू नहीं किया है और भारत-अमेरिका परमाणु करार के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता जारी है। यह भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण करारों में से एक है, जो हमारे देश को विश्व की बड़ी ताकतों की श्रेणी में ला सकता है और पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंधों को बदलकर रख सकता है। जब से यह सरकार सत्ता में आई है, तब से वाम दलों के व्यवहार को लेकर मध्यम वर्ग में रोष है। गठबंधन प्रणाली में बहुत बड़ी गड़बड़ यह है कि अल्पमत वाला एक छोटा मगर वाचाल वर्ग हमारे राष्ट्रीय हित को बंधक बनाकर रख सकता है।

हमारी हताशा की जड़ इतिहास के एक अदद हादसे में निहित है। भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र। अर्थात पहले समृद्धि की निर्माण किया गया और फिर इस बात पर बहस छिड़ी कि इस समृद्धि का वितरण कैसे किया जाए।

इस ऐतिहासिक हादसे का मतलब यह है कि भारत का भविष्य अकेले पूँजीवाद की देन नहीं होगा। वह जाति, धर्म तथा गाँव की रूढ़िवादी ताकतों, देश के बौद्धिक जीवन पर 60 साल से हावी वामपंथी एवं समाजवादी ताकतों और वैश्विक पूँजीवाद की नई ताकतों के बीच रोजाना के संवाद से उभरकर सामने आएगा।

लोकतंत्र की इन लाख बहसों, हितों की बहुलता और हमारे लोगों के कलहप्रिय व्यवहार को देखते हुए यह आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी ही रहेगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत चीन या एशियाई शेरों की रफ्तार से विकास नहीं करेगा और न ही उनकी तरह शीघ्रता से गरीबी व अशिक्षा को दूर कर पाएगा।

अधिकांश देशों में आधुनिक लोकतंत्र का प्रवेश पूँजीवाद के बाद ही हुआ। ये सब देश औद्योगिक क्रांति से गुजर चुके थे, जिसने संपन्नाता का आधार बना दिया था। इसके बाद ही यूरोप में उन्नीसवीं सदी में क्रमिक रूप से मताधिकार दिया जाने लगा। इसके बाद बड़े राजनीतिक दलों का विकास हुआ। तत्पश्चात लोकतंत्र ने पूँजीवादी संस्थाओं को प्रभावित करना शुरू किया।

वामपंथी दलों और मजदूर यूनियनों ने धन-संपत्ति का पुनर्वितरण करने व राज सहायताएँ देने की कोशिश भी की और इससे पश्चिमी देशों में भी उत्पादकता वृद्धि में कमी आई। इस प्रक्रिया की परिणति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी विश्व में ‘जन-कल्याणकारी राज्य’ के रूप में हुई, जिसमें आम लोगों को बेरोजगारी बीमा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिला।

इसके विपरीत भारत में हमें औद्योगिक क्रांति लाने का मौका मिलता, इससे पहले ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना कर दी गई। रोटी बनाने से पहले ही हम इस बहस में उलझ गए कि रोटियों का वितरण कैसे किया जाए। इससे पहले कि हम भोजन, उर्वरक, बिजली आदि पर सबसिडियाँ देने में समर्थ बनते, हम इन पर सबसिडियाँ देने लग गए। हमारे उद्योग उत्पादन में कुशल बन पाते, इससे पहले ही हमने उन पर विस्तृत नियंत्रण बैठा दिए।

‘कल्याण’ उत्पन्न करने वाले रोजगार सृजित होने से पहले ही हम लोगों का ‘कल्याण’ करने के विषय में सोचने लगे। नतीजा रहा उद्यमशीलता का गला घोंटना, धीमा विकास तथा खोए हुए अवसर। लायसेंस राज ने एक विशाल काली अर्थव्यवस्था का निर्माण किया।

चूँकि हमारे पास गरीबों तक सबसिडियों का लाभ पहुँचाने के लिए संस्थागत ढाँचा था ही नहीं, अतः तमाम सबसिडियाँ रास्ते में ही डकार ली गईं और गरीबों तक पहुँची ही नहीं। यह थी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवाद की असफलता। जब तक हम सार्वजनिक रूप से इस असफलता को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम एक परिपक्व राष्ट्र नहीं बन सकते। हम चोरी-छुपे आर्थिक सुधार लाते रहेंगे और एक झूठ को जीते रहेंगे।

यह है पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र लाने की कीमत, बल्कि बहुत अधिक लोकतंत्र और अपर्याप्त पूँजीवाद लाने की कीमत, जो हम चुका रहे हैं। इस समाजवादी मॉडल ने अंततः हमें 1991 में दिवालिएपन के कगार पर ला दिया और हम सुधार लागू करने पर विवश हुए। यह उस समय हुआ, जब पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का पतन हुआ और सोवियत संघ का अवसान हो गया। तब जाकर हम समझ सके कि किसी राष्ट्र को धन-संपत्ति का वितरण करने से पहले उसका निर्माण कर लेना चाहिए।

आर्थिक सुधारों की बदौलत अंततः हम संपन्नाता का निर्माण कर रहे हैं। भारतीयों की उद्यमशीलता पर लगी बेड़ियाँ खोल दी गई हैं और हमारे निजी क्षेत्र ने भारत को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया है।

लेकिन राजनीतिज्ञों ने इससे कोई सबक नहीं लिया है। चूँकि भारत में गरीब बहुत बड़ी संख्या में हैं, अतः राज्य सरकारों को दिवालिया बना देने वाले वादे करने का प्रलोभन हमेशा बना रहता है। यदि कोई राजनेता दो रुपए किलो में चावल उपलब्ध कराने का वादा करे, जबकि बाजार में वह पाँच रुपए किलो हो, तो वह चुनाव जीत जाता है।

एनटी रामाराव ने 1994 में आंध्रप्रदेश में यही किया। वे चुनाव जीत गए, मुख्यमंत्री बने और राज्य को दिवालिया बना बैठे। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल ने 1997 में किसानों को मुफ्त बिजली और पानी दिया। उन्होंने अपना चुनावी वादा निभाया लेकिन बारह महीनों में पंजाब की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और सरकारी सेवकों को वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं रह गए।

जो सबक हम सब सीख चुके हैं, वह राजनेता नहीं सीख पाए हैं। वे मतदाताओं को मुफ्त का माल तथा सेवाएँ बाँटने की आपस में होड़ लगाते हैं। तब फिर स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने के लिए पैसा कहाँ से आएगा?

इन सब बातों को देखते हुए भारत कभी आर्थिक शेर नहीं बन पाएगा। वह तो हाथी है। लेकिन यह हाथी 8 प्रतिशत की सम्मानजनक दर से आगे बढ़ने लगा है। वह कभी भी गति नहीं पकड़ पाएगा लेकिन दूरी तय अवश्य करेगा।

पूँजीवाद और लोकतंत्र की उलटी गंगा बहने के ऐतिहासिक हादसे को देखते हुए लगता है कि शायद चीन के मुकाबले भारत अधिक स्थिर, शांतिपूर्वक एवं परस्पर सहमतिपूर्वक भविष्य में पदार्पण करेगा। वह बिना तैयारी के पूँजीवादी समाज बनाने के घातक दुष्प्रभावों से भी बच जाएगा, जो कि रूस भुगत रहा है।

(लेखक प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ तथा ‘मुक्त भारत’ के लेखक हैं।)

 

http://hindi.webdunia.com/current-affairs/%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BF-108020200036_1.htm

बाबा साहब डॉ भीम राव आंबेडकर के 125वि जयंती पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :- “कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं “…समयबुद्धा

समयबुद्धा दलित सूत्र कहता है की  “दगा से दलित और दलित से दमन होता है”
dalit to baudh

कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं

इससे पहले की हम जाने की कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं, हमको दलित शब्द का सही मतलब समझना होगा|

दलित का मतलब है ऐसे लोग जिनका दमन होता हो, जिनको हिस्सेदारी न्याय और सम्मान न मिलता हो|दलित होना कोई एक ही वर्ग की बपौती नहीं, कोई भी कौम दलित हो सकती है,जिस भी कौम में दगाबाज, निकम्मे ,नशाखोर,अत्याचारी बढ़ जाते हैं उनका पतन हो जाता है और वो दलित बन जाते हैं| ऐसे लोगों को ज्यादा मेहनतकश और संगठित लोग हरा देते हैं , परिणाम गुलामी या दलितपन है |दलितपन से छुटकारा अपने व्यक्तिगत और कौमी अवगुणों को छोड़कर शिक्षा संगठन और संगर्ष से अपने विरोधी को पछाड़ देने से होता है

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के निम्न शब्द पढ़ो:

“गाँवों में जिस प्रकार महार-चमार-मांग-भंगी के भी दो ही चार मकान होते हैं उसी प्रकार मुसलमानों के भी दो चार माकन होते हैं लेकिन उन मुसलामानों को कोई छेड़ता नहीं है. उन पर कोई अत्याचार करने का धैर्य नहीं करता है. लेकिन आप (अछुतों – शूद्रों पर) पर अत्याचार सदा ही होता रहता है और हिन्दू आप पर अत्याचार करना अपना धर्म समझते हैं. इसका कारण यह है की मुसलमानों के घरों के पीछे भारत का सारा मुसलमान समाज है. इस सचाई को हर हिन्दू समझता हैं और आपके सम्बन्ध में हिन्दुओं को पूर्ण विश्वास है की आप पर अत्याचार करने पर आपकी सहायता कोई भी नहीं करेगा. आपकी असमर्थता और निस्सहायता के कारण ही आप पर हिन्दू लोग अत्याचार करने का दुसहास करते हैं.” – डॉ. बी आर अम्बेडकर (३० – ३१ मई , १९३९ बम्बई)”

दलितपन असल में एक व्यक्ति की नहीं एक कौमी बीमारी है|आप ध्यान दोगे तो पाओगे की  दलितों में ही कई शिक्षित समझदार और सक्षम लोग मिल जायेंगे पर फिर भी वे दलित हैं, जानते हैं क्यों क्योंकि उनकी कौम दलित है| दलित हर देश में होते हैं, दलित वही हो जाते हैं जो राजनीतिक रूप से दबाए सताए गए होते हैं|दलित वही है जिसपर अत्याचार करने से अत्याचार करने वाले को कोई सजा न मिले, या अगर मिले भी तो नाममात्र को, मतलब दलित पैदा ही लूटने और अत्याचार सहने के लिए होता है|ज्यादा समझने के लिए जरा उन ख़बरों और तस्वीरों को देखों जिनमे इन लोगों के धन, धंधा और धरती को जबरन छीना हो,बिना पेमेंट के गुलामी करवाना, मारे काटे कुचले लोगों की लाशें, पूरा गांव जला देना, छोटे बच्चों को उछाल के भले पर नाथ लेना, महिलाओं के साथ दुष्कर्म कर मार डालना, कभी देखी है ऐसी महिला की लाश जिसकी आँखें  फटी हो हो,जान जाटव वक़्त चेीख के कारन मुंह खुल होता है जो मरने के बाद भी यथावत गुजरे जुल्म की चुगली करता है|इतना ही नहीं फिर इन सब जुल्म को करने वालों को सजा न होना और बाईजत बच निकलना|

यही है दलितपन और इसका इलाज है बुद्ध और डॉ आंबेडकर द्वारा दिया गया ज्ञान है, उनकी तस्वीर और मूर्ती की पूजा नहीं,इनकी तस्वीर और मूर्ती केवल आपलो उनको याद रखने और उनको समझने का इशारा मात्र है| 

1. दलित बनने के लिए सबसे पहले शर्त है की दगाबाज़ होना, वक़्त पड़ने पर अपने भाईओं या अपनी कौम को दगा देना|

संगठन के दगाबाज अपनी कौम को दलित बनाते हैं |मैं बहुत रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पंहुचा हूँ की दगाबाजी ही दलितपन का पहला कारन है,इसी बात पर मैंने दलित सूत्र बनाया है जो कहता है “दगा देने से दलित बनते हैं और दलित बनने से दमन होता है”| बुजुर्गों की कहावत है “दगा किसी का सागा नहीं, न मानो तो कर देखो, किया है जिन्होंने भी दगा आज जाके उनके घर देखो”| भारत के मूलनिवासी कौमों के इतिहास की समीक्षा में आप पाओगे की विरोधी में कभी सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं हुई, ये सदा ही अपने ही किसी विभीषण जैसे दगाबाज भाई के धोखे के कारन परास्त होते आये हैं, इसीलिए दलित बने और हमारे घरों की दुर्दशा हुई, कौम को दगा देने से बड़ा गुनाह और कोई नहीं|दलित भाई चारा, टीम वर्क, संगठन, पे बैक तो सोसाइटी, कौमी एकता, जैसी तथ्यों से बेखबर रहता है और इसीलिए इतनी अधिक आबादी होने के बावजूद अलग अलग सब पीटते, बेइज्जत और मरते रहते हैं| दलित वही है जो पिट जायेगा मर जायेगा बेइज़्ज़ती सह लगा पर अपने भाइयों या कौम के साथ मिल कर नहीं चलेगा|

2. दलित होने का दूसरा सबसे बड़ा कारन है इतिहास में युद्द में हुए कोई हार जिसके परनाम स्वरुप सब धन धरती ज्ञान और इतिहास छीन लिया गया हो|

सभी प्रकार के अधिकार खासकर की शिक्षा लेने का अधिकार, संगठन बनने का अधिकार,हथियार और शक्ति बढ़ने का अधिकार, अपना इतिहास के प्रचार प्रसार का अधिकार अदि छीन लिए गए हों| राजनयिक उपेक्षा मतलब देश के शाशक न्य न देना चाहता हो ये  दूसरा सबसे बड़ा कारन है किसी भी कौम को दलित बने के लिए| किसी भी युद्ध में हार का कारणों में सबसे बड़ा कारन होता है कोई अपना ही भाई दगाबाजी करे| इसीलिए दलित सूत्र कहता है की दगाबाजी ही दलित बनने का सबसे पहला कारन है|

दलित बनने के लिए व्यक्तिगत कारन जैसे निकम्मापन,अपने समाज के इत्थं के मिशन में भाग न लेना, मिशन की बातों पर ध्यान न देना |हमारे समाज के लोग, बड़े बुजुर्ग  अक्सर हमको कुछ सामाजिक बातें बताना चाहते हैं, पर हमारे समाज का अनपढ़ वर्ग उसे समझ नहीं पता और शिक्षित वर्ग अहंकारवश उनकी सुने बिना ही खारिज कर देता है| वहीँ दूसरी तरफ अगर ब्राह्मणवादी अपने लोगों को कोई बात बताये तो तुरंत उनके कान खड़े हो जाते है और वो ध्यान से सुनता है फिर अपने विवेक से फैसला करता है की उस बात को छोड़ना है की अपनाना है, इसीलिए ये लोग जीतते आये हैं|जब मैंने इस बात पर गौर किया तब मैं समझ पा रहा हूँ क्यों सदियों पहले गौतम बुद्ध ने कहा था “दुःख की शुरुआत ध्यान न देने से और सुख की शुरुआत ध्यान से होती है”|

3. राजनीती में पकड़ न होना दलितीकरण का एक मुख्य कारन है  राजनीती वो जगह हैं जहाँ से किसी भी कौम का भाग्ये या दशा तय होती है, अगर राजनीती में सक्रिय नहीं होंगे तो हक़ नहीं मिलेंगे और पिछड़ने की वजह से दलितीकण हो जाएगा |बाबा साहब का निम्न कोटेशन देखिये

control on politics ambedkar

4. जिस क्षण कोई भी व्यक्ति या कौम “संतुस्ट” हो जाती है और अपनी स्तिथि को बदलने/सुधारने  के लिए संगर्ष करना छोड़ देते हैं उसी क्षण से उनका दलित बनने की प्रक्रिया शीरी हो जाती है|

जो लोग अपने जीवन में अपनी वर्तमान दशा में बेहतरी के लिए संगर्ष करना छोड़ देते हैं वही दलित हो लेते हैं , दलित बस्तियों में जाकर देखों दलित बुड्ढे और जवान भी टॉस पीटते मिल जाएंगे जबकि सवर्ण बुड्ढे खाखी चड्डी पहनकर शाखाएं लगते और युवाओं को अपने रंग में रंगते मिल जाएंगे| इतना तो कोई मूर्ख भी समझ सकता है की जो म्हणत करेगा वो पायेगा| अपनी दशा से संतुस्ट लोग निकम्मे हो जाते हैं और निकम्मों का न कोई भूतकात होता है न वर्तमान न ही कोई भविष्य, ये लोग सिर्फ गुलामी करने के लिए होते हैं|

5. दलित बने रहने का कारन है अपना इतिहास और महापुरुष को न जानना न मानना:

दलितों की अहसान फरामोशी इनके पतन का एकमुख्य कारन है:दलितों को कोई समझने जाता है तो ये लोग सबसे पहले अपने समझाने वाले को समझने को तैयार नहीं होते उसे शक की नज़र से देखते हैं,इन्हीं में से कुछ लोग उस समझाने वाले की शिकायत कर देते हैं, इतना ही नहीं चुगली कर मरवा डालते हैं|खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि “मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है|धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं”

दलित इतिहास जानना: भारत के दलितों/पिछड़ों को अपना इतिहास जानना आवश्यक है।जब तक ये लोग अपना इतिहास नहीं जानेगें तब तक इनमें आपसी प्रेम -भाव पैदा नहीं होगा।दलित  वही है जो समझना न चाहे अपने महापुरुषों को जानना न चाहे, उल्टा अपने पूर्वजों के हत्यारों की पूजा करे|कुछ दलित मन्दिरबाजी से छूटे तो गुरुबाजी,सत्संगबाजी करने लगे हैं,उनको जब अम्बेडकर और बुद्ध के बारे में बताओ, तो वो गुरुज्ञान,लोक-परलोग की बातें झाडते हैं,कहते हैं की ये राजनैतिक बातें इसी जन्म तक हैं|हमारे गुरूजी तो जन्म मरण से छुटकारा दिल देंगे|कहते हैं हम राजनीती से दूर हैं पर गुरु जी के कहने पर वोट दे देते हैं|चलो माना सत्संगी गुरु मरने के बाद प्लानिंग हेतु ठीक होंगे,आपकी आस्था का सम्मान करते हैं,पर जिंदगी रहते जैसे शिक्षा,धन,शादी,बच्चे जरूरी है वैसे ही भारत में आज़ादी हेतु अम्बेडकरवाद बुद्धवाद जरूरी है,आजादी खोने का मतलब और कीमत है डाली बन जाना और फिर वो सब झेलना जो सुनने बोलने में ही दिल दहल जाता है|

मैं तब हैरान हो जाता हूँ जब भारत के मूलनिवासी लोग जो कभी बौद्ध थे आज वो खुद को गर्व से दलित कहते हैं|जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं| इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी|जो कौम अपना नाम भी खुद नहीं रख सकती विरोधियों का दिया कलंकित नाम “दलित” को ढो रही है वो उन मनुवादियों से क्या मुकाबला करेगी जो सदियों से संगर्ष/ षडियंत्र  कर रहे हैं|

dalit tyago

ये जो दलितपन है ये किसी क्रांति से ही दूर हो सकता है, पर इतना सहने के बात भी इन शूद्र बन दिए गए इंसानों से कभी क्रांति क्यों नहीं की, इस विषय पर ओशो रजनीश के व्याख्यान का ये हिस्सा देखे

“ गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया वो शहर के बाहर रहता है वो शहर के अंदर नहीं रह सकता.गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है और राजा के पास अपने कुँए है ही। अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है. वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है |उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है|“इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी  कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा| तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं. और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथकुछ औरभी चाहिए. ये जोकुछ औरऔर है यही तो बुद्धि हो जाता है,बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है| लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि  इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी  वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं|” … ओशो रजनीश. Book Title: The Last Testament, Vol. 2.       //  Chapter 6: The Intelligent Way

हमारे गांव में एक कहावत है “मूर्खों के गांव नहीं बसा करते”, जब दलितों को बस्ती जलती है,नरसंघार होता है तब ये कहावत याद आती है और याद आता है इन दलितों का विशेषकर पढ़े लिखे दलितों का की वो अम्बेडकरवाद/बुद्धवाद को छोड़ मन्दिरबजी, देविदेवतबजी करना, शिक्षा और ज्ञान की जगह नशा,मौज और निकम्मापन, संगठन की जगह अपनी कौम को दगा देना,और फिर रोना की इनके साथ जुल्म होता है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने कहा है की “जुल्म करने वाले से सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता है”

सवर्णों और दलितों में जो सबसे बड़ा फर्क मुझे समझ में आया वो ये है की जैसे ही सुख के दिन आते हैं दलित अपने समाज और संगर्ष को छोड़ देता है जबकि सवर्ण इसके उलट जितना संपन्न होता जाता है उतना ही संगर्ष और अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होता जाता है| हमारे सक्षम वर्ग को ये समझना होगा की अम्बेडकरवाद संगर्ष के चलते उनकी जिन्दगी में आज जो सम्पन्नता आई है उससे अर्जित ज्ञान,धन और समय का ५% हिस्सा इसी संगर्ष पर खर्च करना होगा वरना वो नीं दूर नहीं ये ५% बचने के चक्कर में पूरा १०० % छीनने वाले का सामना अकेले करना पड़ेगा| मैं अपनी बात को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के निम कथन से समाप्त करना चाहूंगा:

“वही कौम तरक्की करती है जिस कौम में क़ुरबानी देने और लेने की जज्स्बा और क्षमता होती है|” …..बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर

भारत की वर्ण व्यस्था में चार वर्ण हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्ये और शूद्र, इनमे से ब्राह्मण और वैश्ये चाहे कुछ  भी करें उनका दलितीकरण नहीं हो पाता क्योंकि उनकी कौम में दगाबाजों के मुकाबले  संघर्षशील लोग ज्यादा होते हैं| जबकि क्षत्रिय  शूद्र में कई  और शूद्र क्षत्रिय बन सकता है, हालाँकि ये सदियों का गेम है| उदाहरण के लिए हाल ही में चमार जात का संगठन देखकर उनको किताब लिखकर क्षत्रिय घोषित किया है आरएसएस ने| मुसलमान जो अभी ३०० साल पहले ही भारत के शाशक थे उनके दलितीकरण जोरो से चालू है, अगर आप ध्यान दोगे तो उनमे गरीबी और अशिक्षा बढ़ रही है

 

जहाँ एक तरफ डॉ आंबेडकर के लोगों पर अत्याचार बढ़ रहा है वहीँ दूसरी तरफ डॉ अम्बेडकर को पूजनीय नायक बना रहे हैं,पीढ़ियों की क़ुरबानी से तैयार हुई डॉ अम्बेडकर नाम की फसल को लूटने की इस मुहीम को समझना होगा |

125 jayanti dr ambedkarमानो या न मानो पर अम्बेडकर युग शुरू हो चुका है,विरोधियों की मजबूरी ऐसी की अब डॉ आंबेडकर को पूजने चलें हैं,और आप अम्बेडकरवादी होने में शर्मा रहे हो| ध्यान रहे विरोधी फसल लूटने में माहिर हैं, बुद्ध की फसल लूटने के सदियों बाद अम्बेडकरवाद के बीजों से कपोल फुट पड़ीं हैं, खेत पर एक हरी चादर बिछ गयी है, सतर्क रहना कहीं फसल लूट न जाए| मुह में अम्बेडकर बगल में मनुस्मृति है| सावधान!

 

निम्न लिंक से पढ़ें लेख :-“आंबेडकर के नाम पर” – आनंद तेल्तुम्बडे,   (अनुवादक : एस.आर. दारापुरी)

http://www.instantkhabar.com/articles/item/30786-article.html

ambedkar hamare hai

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की १२५वि जयंती के उपलक्ष में प्रस्तुत हैं उनकी कुछ असली तस्वीरें

control on politics ambedkar

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर विचार महोत्सव समिति द्वारा बाबा साहब की 125वि जयंती के उपलक्ष में  MMRDA Ground, BKC, मुंबई में विशाल प्रोग्राम किया गया और जिसमे बॉलीवुड फिल्म कलाकार आमिर खान को सम्मानित किया गया,बाबा साहब पर आमिर खान की ये स्पीच स्वागत योग्य है