पहली बार संयुक्त राष्ट्र ने बाबा साहेब डॉ बी आर आंबेडकर की जयंती मनाई। संस्था के शीर्ष अधिकारी ने इन प्रख्यात भारतीय समाज सुधारक को हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए ‘एक वैश्विक प्रतीक’ करार दिया और उनके विजन को पूरा करने के लिए भारत के साथ मिल कर काम करने की इस वैश्विक निकाय की कटिबद्धता प्रदर्शित की।


UN celebrated dr ambedkar jayantiपहली बार संयुक्त राष्ट्र ने बाबा साहेब डॉ बी आर आंबेडकर की जयंती मनाई। संस्था के शीर्ष अधिकारी ने इन प्रख्यात भारतीय समाज सुधारक को हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए ‘एक वैश्विक प्रतीक’ करार दिया और उनके विजन को पूरा करने के लिए भारत के साथ मिल कर काम करने की इस वैश्विक निकाय की कटिबद्धता प्रदर्शित की।

यूएनडीपी की प्रशासक हेलेन क्लार्क ने भारत के स्थायी मिशन द्वारा इस वैश्विक निकाय में आंबेडकर की 125 वीं जयंती पर पहली बार आयोजित विशेष समारोह में अपने संबोधन में कहा, ‘संयुक्त राष्ट्र में इस महत्त्वपूर्ण वर्षगांठ को मनाए जाने पर मैं संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की ओर से भारत की सराहना करती हूं।’ संयुक्त राष्ट्र के अगले महासचिव पद के उम्मीदवारों में शामिल क्लार्क ने कहा, ‘हम वर्ष 2030 के एजंडे और दुनिया भर के गरीब एवं वंचित लोगों के लिए आंबेडकर की सोच को हकीकत में बदलना सुनिश्चित करने के लिए भारत के साथ अपनी बेहद करीबी साझेदारी को जारी रखने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’

भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पी बाबा साहेब डॉ आंबेडकर की 125वीं जयंती बुधवार को इस वैश्विक संस्था में मनाई गई थी। उसका आयोजन नागरिक समाज के समूहों कल्पना सरोज फाउंडेशन और फाउंडेशन आॅफ ह्यूमन होराइजन के साथ मिल कर किया गया। संयुक्त राष्ट्र विकास समूह की अध्यक्ष कलार्क ने राजनयिकों, विद्वानों और आंबेडकर के अनुयायियों को अपने संबोधन में कहा कि यह अवसर ऐसे ‘बहुत महान व्यक्ति की विरासत’ को याद करता है, जिन्होंने इस बात को समझा कि ‘अनवरत चली आ रहीं और बढ़ती असमानताएं’ देशों और लोगों की आर्थिक और सामाजिक कल्याण के समक्ष मूल चुनौतियां पेश करती हैं।

न्यूजीलैंड की पूर्व प्रधानमंत्री क्लार्क ने कहा कि आंबेडकर के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वे 60 साल पहले थे। वंचित समूहों के समावेश और सशक्तीकरण, श्रम कानूनों में सुधार और सभी के लिए शिक्षा को बढ़ावा देने पर डॉ आंबडेकर की ओर से किए गए काम ने उन्हें ‘भारत और अन्य देशों में हाशिए पर जी रहे लोगों के लिए प्रतीक बना दिया।’ इस मौके पर ‘संपोषणीय विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए असमानता से संघर्ष’ विषयक परिचर्चा का भी आयोजन किया गया जिसमें आंबेडकर से जुड़े कोलंबिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्टान कचनोवस्की और एसोसिएट प्रोफेसर अनुपमा राव एवं हार्वर्ड विश्वविद्यालय के विख्याता क्रिस्टोफर क्वीन ने हिस्सा लिया।

क्लार्क ने कहा कि अांबेडकर के विजन एवं कार्य का आधार असमानताएं एवं भेदभाव घटाना भी नए विकास एजंडे के मूल में है जिसे 2030 तक हासिल करने के प्रति विश्व ने कटिबद्धता दिखाई है। आंबेडकर को असमानताएं दूर करने के लिए जरूरी दूरगामी उपायों की गहरी समझ थी।

 

http://www.jansatta.com/international/he-struggled-for-people-around-the-globe-plea-in-un-to-declare-ambedkar-jayanti-world-equality-day/85974/

 

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/04/160414_ambedkar_un_birth_century_cj_tk

 

 

अगर आप ईस्वरवादी है तो ठीक है कोई बात नही लेकिन वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण विचारधारा युक्त महापुरुषों की विचारधारा के बारे में भी आपको मालुम ही होना चाहिए ..पेश है.. कुछ विश्वप्रसिद्ध महामानवों के धर्म /मजहब के बारे में विचार

buddha and GOD concept god-2अगर आप ईस्वरवादी है तो ठीक है कोई बात नही लेकिन वैज्ञानिक तथ्यपूर्ण विचारधारा युक्त महापुरुषों की विचारधारा के बारे में भी आपको मालुम ही होना चाहिए ..पेश है..

कुछ विश्वप्रसिद्ध महामानवों के धर्म /मजहब के बारे में विचार

१ – आचार्य चार्वाक का कहना था –
” इश्वर एक रुग्ण विचार प्रणाली है , इससे मानवता का कोई कल्याण होने वाला नहीं है ”

२ – अजित केशकम्बल ( 523 ई . पू )
अजित केश्कंबल बुद्ध के समय कालीन विख्यात तीर्थंकर थे , त्रिपितिका में अजित के विचार कई जगह आये हैं , उनका कहना था –
” दान , यज्ञ , हवन नहीं ….लोक परलोक नहीं ”

३- सुकरात ( 466-366 ई पू )
” इश्वर केवल शोषण का नाम है ”

४- इब्न रोश्द ( 1126-1198 )
इनका जन्म स्पेन के मुस्लिम परिवार में हुआ था , रोश्द के दादा जामा मस्जिद के इमाम थे , इन्हें कुरआन कंठस्थ थी । इन्होने अल्लाह के अस्तित्व को नकार दिया था और इस्लाम को राजनैतिक गिरोह कहा था । जिस कारण मुस्लिम धर्मगुरु इनकी जान के पीछे पड़ गए थे ।
रोश्द ने दर्शन के बुद्धि प्रधान हथियार से इस्लाम के मजहबी वादशास्त्रियों की खूब खबर ली ।

5 – कॉपरनिकस ( 1473-1543)
इन्होने धर्म गुरुओं की पूल खोल थी इसमें धर्मगुरु ये कह कर को मुर्ख बना रहे थे की सूर्य प्रथ्वी के चक्कर लगता है । कॉपरनिकस ने अपने पप्रयोग से ये सिद्ध कर दिया की प्रथ्वी सहित सौर मंडल के सभी ग्रह सूर्य के चक्कर लगाते हैं, जिस कारण धर्म गुरु इतने नाराज हुए की कोपरनिकस के सभी सार्थक वैज्ञानिको को कठोर दंड देना प्रारंभ कर दिया ।

6 – मार्टिन लूथर ( 1483-1546)
इन्होने जर्मनी में अन्धविश्वास, पाखंड और धर्गुरुओं के अत्याचारों के खिलाफ आन्दोलन किया इन्होने कहा था ” व्रत , तीर्थयात्रा , जप , दान अदि सब निर्थक है ”

7-सर फ्रेंसिस बेकन ( 1561-1626)
अंग्रेजी के सारगर्भित निबंधो के लिए प्रसिद्ध, तेइस साल की उम्र में ही पार्लियामेंट के सदस्य बने , बाद में लार्ड चांसलर भी बने । उनका कहना था
“नास्तिकता व्यक्ति को विचार . दर्शन , स्वभाविक निष्ठां , नियम पालन की और ले जाती है , ये सभी चीजे सतही नैतिक गुणों की पथ दर्शिका हो सकती हैं ।

8 – बेंजामिन फ्रेंकलिन (1706-1790)
इनका कहना था ” सांसारिक प्रपंचो में मनुष्य धर्म से नहीं बल्कि इनके न होने से सुरक्षित है ”

9- चार्ल्स डार्विन (1809-1882)
इन्होने ईश्वरवाद और धार्मिक गुटों पर सर्वधिक चोट पहुचाई , इनका कहना था ” मैं किसी ईश्वरवाद में विश्वास नहीं रखता और न ही आगमी जीवन के बारे में ”

10-कार्ल मार्क्स ( 1818-1883)
कार्ल मार्क्स का कहना था ” इश्वर का जन्म एक गहरी साजिश से हुआ है ” और ” धर्म एक अफीम है ” उनकी नजर में धर्म विज्ञानं विरोधी , प्रगति विरोधी , प्रतिगामी , अनुपयोगी और अनर्थकारी है , इसका त्याग ही जनहित में है ।

11- पेरियार (1879-1973)
इनका जन्म तमिलनाडु में हुआ और इन्होने जातिवाद , ईश्वरवाद , पाखंड , अन्धविश्वास पर जम के प्रहार किया ।

12- अल्बर्ट आइन्स्टीन ( 1879-1955)
विश्वविख्यात वैज्ञानिक का कहना था ” व्यक्ति का नैतिक आचरण मुख्य रूप से सहानभूति , शिक्षा और सामाजिक बंधन पर निर्भर होना चाहिए , इसके लिए धार्मिक आधार की कोई आवश्यकता नहीं है . मृत्यु के बाद दंड का भय और पुरस्कार की विंकक़शा से नियंत्रित करने पर मनुष्य की हालत दयनीय हो जाती है”

13-भगत सिंह (1907-1931)

प्रमुख स्वतन्त्रता सैनानी भगत सिंह ने अपनी पुस्तक ” मैं नास्तिक क्यों हूँ?” में कहा है ” मनुष्य ने जब अपनी कमियों और कमजोरियों पर विचार करते हुए अपनी सीमाओं का अहसास किया तो मनुष्य को तमाम कठिनाईयों का साहस पूर्ण सामना करने और तमाम खतरों के साथ वीरतापूर्ण जुझने की प्रेरणा देने वाली तथा सुख दिनों में उच्छखल न हो जाये इसके लिए रोकने और नियंत्रित करने के लिए इश्वर की कल्पना की गयी है ”

14- लेनिन
लेनिन के अनुसार ” जो लोग जीवन भर मेहनत मशक्कत करते है और आभाव में जीते हैं उन्हें धर्म इहलौकिक जीवन में विनम्रता और धैर्य रखने की तथा परलोक में सुख की आशा से सांत्वना प्राप्त करने की शिक्षा देता है , परन्तु जो लोग दुसरो के श्रम पर जीवित रहते हैं उन्हें इहजीवन में दयालुता की शिक्षा देता है , इस प्रकार उन्हें शोषक के रूप में अपने सम्पूर्ण अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने का एक सस्ता नुस्खा बता देता है ”

15. गौतम बुद्ध

बुद्ध कहते है की भगवान नाम की कोई चीज नही है! भगवान कि लिये अपना समय नष्ट मत करो,
केवल सत्य ही सबकुछ है

अत: , भले ही धर्म प्राचीन समय के समाज की आवश्यकता रहा हो परन्तु वह एक अंधविश्वास ही था जो अपने साथ कई अंधविश्वासों को जोड़ता चला गया . धर्म और अंधविश्वास दोनों एक दुसरे के पूरक हैं , अंधविश्वास का जन्म भी उसी तरह हुआ जिस तरह भांति भांति धर्मो का ।

इन धर्म के नाना प्रकार के अन्धविश्वासो के शिकार भी प्राय: गरीब लोग ही होते थे , सुविधाओं के आभाव उन्हें विज्ञानं और सच से काट देता था और वो गृहकलेश , वीमारी , प्राकर्तिक आपदाओं , निर्धनता आदि समस्याओं का समाधान के लिए टोन टोटके , तांत्रिको , बाबाओं , मौलवियों , ज्योतिषियों , व आदि के चक्कर में फंस जाते है!

यदि आप शिक्षा के साथ जागरूक एवं विज्ञानवादी सोच है,तो आपकी यह नैतिक जिम्मेदारी है कि महापुरुषों की विचारधारा को भी अपने साथियों तक जरूर पहुंचाएं…

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22-Apr-2016 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- आइए फासीवाद सामंतवाद और पूँजीवाद को जाने ,जब तक इनको हम जानेंगे नहीं इनसे कैसे लड़ेंगे |ये तीनों शैतान आपको निगल जाने को बढ़ रहे हैं और आप गाने बजने क्रिकेट में मस्त हो

जनता को सरकार से ये अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए की वो उनके लिए कुछ करेगी, अगर पोलिटिकल स्टेबिलिटी है और जनता को काम करने पढ़ने लिखने और न्याय पाने की आज़ादी है तो समझ लो वही स्वर्ग है| इसके बावजूद कोई गरीब और मजलूम है तो वो खुद ही निकम्मा है | लार्ड मैकॉले द्वारा शिक्षा को सर्वजन करने व इंडियन पीनल कोड की धाराएं बनाने से लेकर अभी तक भी जनता का स्वर्ण काल चल रहा है, आगे का आगे देखेंगे| पर अगर कोई मेहनत करना चाह रहा है पढ़ना चाह रहा है तो वो अपने जीवन को बदल पायेगा| ऐसा सुनहरा मौका राजतन्त्र में जनता के लिए पहले कभी नहीं था , राजतन्त्र में तो बस वही फलते फूलते हैं जिनपर राज कृपा हो बाकि तो डेन डेन को मोहताज़ होते हैं, इज्ज़्ज़त बेइज़्ज़ती की बात तो क्या चली|

इसलिए लग जाओ ज्ञान और शक्ति इकट्ठी करने में , आड़े वक़्त में बस यही काम आएगी


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27-Jan-2013 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- आइए फासीवाद सामंतवाद और पूँजीवाद को जाने ,जब तक इनको हम जानेंगे नहीं इनसे कैसे लड़ेंगे |ये तीनों शैतान आपको निगल जाने को बढ़ रहे हैं और आप गाने बजने क्रिकेट में मस्त हो|इनका जिक्र होते ही आम लोग चैनल बदल देते हैं और नाच गाने में मस्त हो जाते हैं,

फासिस्ट और फासीवाद:

जरा देखें फासिस्ट और फासीवाद का  मतलब क्या होता है – फासीवाद की व्याख्या है – a governmental system led by a dictator having complete power, forcibly suppressing opposition and criticism, regimenting all industry, commerce, etc., and emphasizing an aggressive nationalism and often racism.

याने कि एक तानाशाह के नेतृत्वकी  सर्वशक्तिमान सरकार जो बलपूर्वक टीका और विरोधकोंको कुचल दें, जो सभी उद्योगजगत, व्यापार को अपनी तर्ज पर काम करने को मजबूर करे और एक आक्रमक राष्ट्रवाद का समर्थन करे । ऐसी सरकार वंशवाद का भी समर्थन करती पायी जा सकती है ।

तो ये रहा फासीवाद और इसके तहत चलनेवाले सभी ठहरे फासिस्ट । अब इसका थोड़ा इतिहास देखें । इटली के तानाशाह मुसोलिनी का पक्ष खुद को फासिस्ट कहलाता था । हिटलर की नाझी पार्टी भी फासिस्ट थी । साथ में वंशवादी भी ।

फासीवाद या फ़ासिस्टवाद (फ़ासिज़्म) इटली में बेनितो मुसोलिनी द्वारा संगठित “फ़ासिओ डि कंबैटिमेंटो” का राजनीतिक आंदोलन था जो मार्च, १९१९ में प्रारंभ हुआ। इसकी प्रेरणा और नाम सिसिली के 19वीं सदी के क्रांतिकारियों-“फासेज़”-से ग्रहण किए गए।

फासीवाद के 14 लक्षण….डा. लॉरेंस ब्रिट

ये लक्षण डा. लॉरेंस ब्रिट ने बताए हैं जो एक राजनीतिक विज्ञानी हैं जिन्होंने फासीवादी शासनों – जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) – का अध्ययन किया और निम्नलिखित लक्षणों की निशानदेही की है:

डा. लॉरेंस ब्रिट  – एक राजनीतिक विज्ञानी जिन्होंने फासीवादी शासनों जैसे हिटलर (जर्मनी), मुसोलिनी (इटली ) फ्रेंको (स्पेन), सुहार्तो  (इंडोनेशिया), और पिनोचेट (चिली) का अध्ययन  किया और निम्नलिखित 14 लक्षणों की निशानदेही की है;

  1. शक्तिशाली और सतत राष्ट्रवाद — फासिस्ट शासन देश भक्ति के आदर्श वाक्यों, गीतों, नारों , प्रतीकों और अन्य सामग्री का निरंतर उपयोग करते हैं. हर जगह झंडे दिखाई देते हैं जैसे वस्त्रों पर झंडों के प्रतीक और सार्वजानिक स्थानों पर झंडों की भरमार.
  1. मानव अधिकारों के मान्यता प्रति तिरस्कार — क्योंकि दुश्मनों से डर है इसलिए फासिस्ट शासनों द्वारा लोगो को लुभाया जाता है कि यह सब सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए वक्त की ज़रुरत है. शासकों के दृष्टिकोण से लोग घटनाक्रम को देखना शुरू कर देते हैं और यहाँ तक कि वे अत्याचार, हत्याओं, और आनन-फानन में सुनाई गयी कैदियों को लम्बी सजाओं का अनुमोदन करना भी शुरू कर देते हैं.
  1. दुश्मन या गद्दार की पहचान एक एकीकृत कार्य बन जाता है — लोग कथित आम खतरे और दुश्मन – उदारवादी; कम्युनिस्टों, समाजवादियों, आतंकवादियों, आदि के खात्मे की ज़रुरत प्रति उन्मांद की हद तक एकीकृत किए जाते हैं.
  1. मिलिट्री का वर्चस्व — बेशक व्यापक घरेलू समस्याएं होती हैं पर सरकार सेना का विषम फंडिंग पोषण करती है. घरेलू एजेंडे की उपेक्षा की जाती है ताकि मिलट्री और सैनिकों का हौंसला बुलंद और ग्लैमरपूर्ण बना रहे.
  1. उग्र लिंग-विभेदीकरण — फासिस्ट राष्ट्रों की सरकारें लगभग पुरुष प्रभुत्व वाली होती हैं. फासीवादी शासनों के अधीन, पारंपरिक लिंग भूमिकाओं को और अधिक कठोर बना दिया जाता है. गर्भपात का सख्त विरोध होता है और कानून और राष्ट्रीय नीति होमोफोबिया और गे विरोधी होती है
  1. नियंत्रित मास मीडिया – कभी कभी तो मीडिया सीधे सरकार द्वारा नियंत्रित किया जाता है, लेकिन अन्य मामलों में, परोक्ष सरकार विनियमन, या प्रवक्ताओं और अधिकारियों द्वारा पैदा की गयी सहानुभूति द्वारा मीडिया को नियंत्रित किया जाता है.   सामान्य युद्धकालीन सेंसरशिप विशेष रूप से होती है.
  1. राष्ट्रीय सुरक्षा का जुनून – एक प्रेरक उपकरण के रूप में सरकार द्वारा इस डर का जनता पर प्रयोग किया जाता है.

8.धर्म और सरकार का अपवित्र गठबंधन — फासिस्ट देशों में सरकारें एक उपकरण के रूप में सबसे आम धर्म को आम राय में हेरफेर करने के लिए प्रयोग करती हैं. सरकारी नेताओं द्वारा धार्मिक शब्दाडंबर और शब्दावली का प्रयोग सरेआम होता है बेशक धर्म के प्रमुख सिद्धांत सरकार और सरकारी कार्रवाईयों के विरुद्ध होते हैं.

  1. कारपोरेट पावर संरक्षित होती है – फासीवादी राष्ट्र में औद्योगिक और व्यवसायिक शिष्टजन सरकारी नेताओं को शक्ति से नवाजते हैं जिससे अभिजात वर्ग और सरकार में एक पारस्परिक रूप से लाभप्रद रिश्ते की स्थापना होती है.
  1. श्रम शक्ति को दबाया जाता है – श्रम-संगठनों का पूर्ण रूप से उन्मूलन कर दिया जाता है या कठोरता से दबा दिया जाता है क्योंकि फासिस्ट सरकार के लिए एक संगठित श्रम-शक्ति ही वास्तविक खतरा होती है.
  1. बुद्धिजीवियों और कला प्रति तिरस्कार – फासीवादी राष्ट्र उच्च शिक्षा और अकादमिया के प्रति दुश्मनी को बढ़ावा देते हैं. अकादमिया और प्रोफेसरों को सेंसर करना और यहाँ तक कि गिरफ्तार करना असामान्य नहीं होता. कला में स्वतन्त्र अभिव्यक्ति पर खुले आक्रमण किए जाते हैं और सरकार कला की फंडिंग करने से प्राय: इंकार कर देती है.
  1. अपराध और सजा प्रति जुनून – फासिस्ट सरकारों के अधीन कानून लागू करने के लिए पुलिस को लगभग असीमित अधिकार दिए जाते हैं. पुलिस ज्यादितियों के प्रति लोग प्राय: निरपेक्ष होते हैं  यहाँ तक कि वे सिविल आज़ादी तक को देशभक्ति के नाम पर कुर्बान कर देते हैं. फासिस्ट राष्ट्रों में अक्सर असीमित शक्ति वाले  विशेष पुलिस बल होते हैं.
  1. उग्र भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार — फासिस्ट राष्ट्रों का राज्य संचालन मित्रों के समूह द्वारा किया जाता है जो अक्सर एक दूसरे को सरकारी ओहदों पर नियुक्त करते हैं और एक दूसरे को जवाबदेही से बचाने के लिए सरकारी शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग किया जाता है. सरकारी नेताओं द्वारा राष्ट्रीय संसाधनों और खजाने को लूटना असामान्य बात नहीं होती.

14. चुनाव महज धोखाधड़ी होते हैं — कभी-कभी होने वाले चुनाव महज दिखावा होते हैं. विरोधियों के विरुद्ध लाँछनात्मक अभियान चलाए जाते है और कई बार हत्या तक कर दी जाती है , विधानपालिका के अधिकारक्षेत्र का प्रयोग वोटिंग संख्या या राजनीतिक जिला सीमाओं को नियंत्रण करने के लिए और मीडिया का दुरूपयोग करने के लिए किया जाता है.

https://samajvad.wordpress.com/2009/06/19/%E0%A4%AB%E0%A4%BE%E0%A4%B8%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%95%E0%A5%87-14-%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3/

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fascism vs captalism

सामंतवाद /Feudalism

सामंतवाद ऐसी प्रथा होती है जिसमे शीर्ष स्थान में राजा होता है जिसके नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते हैं जो किसी इलाके के 1/2 धन और धरती के मालिक होते हैं और आम जनता सबसे निम्न स्तर में किसान या दास बनकर गुलामी को मजबूर होते है 2/2

सामंतवाद (Feudalism / फ्युडलिज्म) मध्यकालीन युग की प्रथा थी। इन सामंतों की कई श्रेणियाँ थीं जिनके शीर्ष स्थान में राजा होता था। उसके नीचे विभिन्न कोटि के सामंत होते थे और सबसे निम्न स्तर में किसान या दास होते थे। यह रक्षक और अधीनस्थ लोगों का संगठन था। राजा समस्त भूमि का स्वामी माना जाता था। सामंतगण राजा के प्रति स्वामिभक्ति बरतते थे, उसकी रक्षा के लिए सेना सुसज्जित करते थे और बदले में राजा से भूमि पाते थे। सामंतगण भूमि के क्रय-विक्रय के अधिकारी नहीं थे। प्रारंभिक काल में सामंतवाद ने स्थानीय सुरक्षा, कृषि और न्याय की समुचित व्यवस्था करके समाज की प्रशंसनीय सेवा की। कालांतर में व्यक्तिगत युद्ध एवं व्यक्तिगत स्वार्थ ही सामंतों का उद्देश्य बन गया। साधन-संपन्न नए शहरों के उत्थान, बारूद के आविष्कार, तथा स्थानीय राजभक्ति के स्थान पर राष्ट्रभक्ति के उदय के कारण सामंतशाही का लोप हो गया।

भारत में सामंतवाद दसवीं शताब्दी के बाद भारतीय समाज में कई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इनमें से एक यह था कि विशिष्ट वर्ग के लोगों की शक्ति बहुत बढ़ी जिन्हें सामंत, रानक अथवा रौत्त (राजपूत) आदि पुकारा जाता था। इन वर्गों की उत्पत्ति विभिन्न तरीकों से हुई थी। इनमें से कुछ ऐसे सरकारी अधिकारी थे जिनको वेतन मुद्रा की जगह ग्रामों में दिया जाता था, जिससे ये कर प्राप्त करते थे। कुछ और ऐसे पराजित राजा थे जिनके समर्थक सीमित क्षेत्रों के कर के अभी भी अधिकारी बने बैठे थे। कुछ और वंशागत स्थानीय सरदार या बहादुर सैनिक थे, जिन्होंने अपने कुछ हथियारबन्द समर्थकों की सहायता से अधिकार क्षेत्र स्थापित कर लिया था। इन लोगों की हैसियत भी अलग-अलग थी। इनमें से कुछ केवल ग्रामों के प्रमुख थे और कुछ का अधिकार कुछ ग्रामों पर था और कुछ ऐसे भी थे जो एक सारे क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हो सके थे। इस प्रकार इन सरदारों की निश्चित श्रेणियाँ थी। ये अपने अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने के लिए आपस में लगातार संघर्ष किया करते थे। ऐसे ‘लगान’ वाले क्षेत्र[1] जो राजा अपने अधिकारियों या समर्थकों को देता था, वे अस्थायी थे और जिन्हें राजा अपनी मर्जी से जब चाहे, वापस ले सकता था। लेकिन बड़े विद्रोह अथवा विश्वासघात के मामलों में छोड़कर राजा द्वारा ज़मीन शायद ही वापस ली जाती थी। समसामयिक विचारधारा के अनुसार पराजित नरेश की भूमि को भी लेना पाप माना जाता था।

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साभार bhartdiscovery.org

अगर सामंतवाद को धर्म द्वारा लोगों के दिमाग में बिठाकर लोगों से गुलामी करवाई जाये तो उसे ब्राह्मणवाद कहते हैं जिसमें लोग ख़ुशी ख़ुशी धर्म के नाम पर अपना शोषण करवाते हैं, इसी को मानसिक गुलामी कहते हैं जिसमे गुलाम अपने बेड़ियों से ही प्रेम करता है, इनको आज़ाद नहीं करवाया जा सकता है

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पूंजीवाद/Capitalism

पूंजीवाद प्राइवेटिकरन से पनपी आर्थिक व्यस्था को कहते हैं जिसमें उत्पादन के साधन मतलब कम्पनिया,स्कूल,कालेज,माल,हस्पताल,खेती/फसल पर सरकार की जगह कोई सेठ मालिक होते है,सरकारी नियंत्रण नाम मात्र को रह जाता है| ये एक प्रकार का सामंतवाद है जिसमे खेती की जगह कम्पनियाँ हैं जिसमे जनता का शोषण हो सकता है| भारत में जातिवाद और पूँजीवाद ने मिलकर सदियों से शोषण सह रहे भारतवासियों को फिर शोषण की तरफ हांक दिया है

CAPITALISM

पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र की दुर्गति……गुरचरन दास|

भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र।

हमने पिछले दिनों एक और गणतंत्र दिवस मनाया, लेकिन कई भारतीयों के लिए इसमें उत्साह की कोई बात नहीं थी क्योंकि सरकार को लकवा मार जाने से वे हताश हैं। यह अब तक की सबसे कमजोर सरकारों में से एक है और कई लोग दृढ़ एवं निर्णयात्मक नेतृत्व की कामना कर रहे हैं।

प्रसिद्ध सुधारकों के नेतृत्व वाली इस सरकार ने लगभग कोई नया सुधार लागू नहीं किया है और भारत-अमेरिका परमाणु करार के भविष्य को लेकर भी अनिश्चितता जारी है। यह भारत के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण करारों में से एक है, जो हमारे देश को विश्व की बड़ी ताकतों की श्रेणी में ला सकता है और पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंधों को बदलकर रख सकता है। जब से यह सरकार सत्ता में आई है, तब से वाम दलों के व्यवहार को लेकर मध्यम वर्ग में रोष है। गठबंधन प्रणाली में बहुत बड़ी गड़बड़ यह है कि अल्पमत वाला एक छोटा मगर वाचाल वर्ग हमारे राष्ट्रीय हित को बंधक बनाकर रख सकता है।

हमारी हताशा की जड़ इतिहास के एक अदद हादसे में निहित है। भारत ने पहले लोकतंत्र का वरण किया और बाद में पूँजीवाद का। वह पूर्ण लोकतंत्र तो 1950 में ही बन गया लेकिन बाजार की ताकतों को खुली छूट उसने 1991 में जाकर दी। शेष विश्व में यह इससे ठीक उलट हुआ। वहाँ पहले पूँजीवाद आया, फिर लोकतंत्र। अर्थात पहले समृद्धि की निर्माण किया गया और फिर इस बात पर बहस छिड़ी कि इस समृद्धि का वितरण कैसे किया जाए।

इस ऐतिहासिक हादसे का मतलब यह है कि भारत का भविष्य अकेले पूँजीवाद की देन नहीं होगा। वह जाति, धर्म तथा गाँव की रूढ़िवादी ताकतों, देश के बौद्धिक जीवन पर 60 साल से हावी वामपंथी एवं समाजवादी ताकतों और वैश्विक पूँजीवाद की नई ताकतों के बीच रोजाना के संवाद से उभरकर सामने आएगा।

लोकतंत्र की इन लाख बहसों, हितों की बहुलता और हमारे लोगों के कलहप्रिय व्यवहार को देखते हुए यह आर्थिक सुधारों की रफ्तार धीमी ही रहेगी। इसका मतलब यह हुआ कि भारत चीन या एशियाई शेरों की रफ्तार से विकास नहीं करेगा और न ही उनकी तरह शीघ्रता से गरीबी व अशिक्षा को दूर कर पाएगा।

अधिकांश देशों में आधुनिक लोकतंत्र का प्रवेश पूँजीवाद के बाद ही हुआ। ये सब देश औद्योगिक क्रांति से गुजर चुके थे, जिसने संपन्नाता का आधार बना दिया था। इसके बाद ही यूरोप में उन्नीसवीं सदी में क्रमिक रूप से मताधिकार दिया जाने लगा। इसके बाद बड़े राजनीतिक दलों का विकास हुआ। तत्पश्चात लोकतंत्र ने पूँजीवादी संस्थाओं को प्रभावित करना शुरू किया।

वामपंथी दलों और मजदूर यूनियनों ने धन-संपत्ति का पुनर्वितरण करने व राज सहायताएँ देने की कोशिश भी की और इससे पश्चिमी देशों में भी उत्पादकता वृद्धि में कमी आई। इस प्रक्रिया की परिणति द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पश्चिमी विश्व में ‘जन-कल्याणकारी राज्य’ के रूप में हुई, जिसमें आम लोगों को बेरोजगारी बीमा तथा स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ मिला।

इसके विपरीत भारत में हमें औद्योगिक क्रांति लाने का मौका मिलता, इससे पहले ही लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना कर दी गई। रोटी बनाने से पहले ही हम इस बहस में उलझ गए कि रोटियों का वितरण कैसे किया जाए। इससे पहले कि हम भोजन, उर्वरक, बिजली आदि पर सबसिडियाँ देने में समर्थ बनते, हम इन पर सबसिडियाँ देने लग गए। हमारे उद्योग उत्पादन में कुशल बन पाते, इससे पहले ही हमने उन पर विस्तृत नियंत्रण बैठा दिए।

‘कल्याण’ उत्पन्न करने वाले रोजगार सृजित होने से पहले ही हम लोगों का ‘कल्याण’ करने के विषय में सोचने लगे। नतीजा रहा उद्यमशीलता का गला घोंटना, धीमा विकास तथा खोए हुए अवसर। लायसेंस राज ने एक विशाल काली अर्थव्यवस्था का निर्माण किया।

चूँकि हमारे पास गरीबों तक सबसिडियों का लाभ पहुँचाने के लिए संस्थागत ढाँचा था ही नहीं, अतः तमाम सबसिडियाँ रास्ते में ही डकार ली गईं और गरीबों तक पहुँची ही नहीं। यह थी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गाँधी के समाजवाद की असफलता। जब तक हम सार्वजनिक रूप से इस असफलता को स्वीकार नहीं करते, तब तक हम एक परिपक्व राष्ट्र नहीं बन सकते। हम चोरी-छुपे आर्थिक सुधार लाते रहेंगे और एक झूठ को जीते रहेंगे।

यह है पूँजीवाद से पहले लोकतंत्र लाने की कीमत, बल्कि बहुत अधिक लोकतंत्र और अपर्याप्त पूँजीवाद लाने की कीमत, जो हम चुका रहे हैं। इस समाजवादी मॉडल ने अंततः हमें 1991 में दिवालिएपन के कगार पर ला दिया और हम सुधार लागू करने पर विवश हुए। यह उस समय हुआ, जब पूर्वी यूरोप में साम्यवाद का पतन हुआ और सोवियत संघ का अवसान हो गया। तब जाकर हम समझ सके कि किसी राष्ट्र को धन-संपत्ति का वितरण करने से पहले उसका निर्माण कर लेना चाहिए।

आर्थिक सुधारों की बदौलत अंततः हम संपन्नाता का निर्माण कर रहे हैं। भारतीयों की उद्यमशीलता पर लगी बेड़ियाँ खोल दी गई हैं और हमारे निजी क्षेत्र ने भारत को विश्व की दूसरी सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना दिया है।

लेकिन राजनीतिज्ञों ने इससे कोई सबक नहीं लिया है। चूँकि भारत में गरीब बहुत बड़ी संख्या में हैं, अतः राज्य सरकारों को दिवालिया बना देने वाले वादे करने का प्रलोभन हमेशा बना रहता है। यदि कोई राजनेता दो रुपए किलो में चावल उपलब्ध कराने का वादा करे, जबकि बाजार में वह पाँच रुपए किलो हो, तो वह चुनाव जीत जाता है।

एनटी रामाराव ने 1994 में आंध्रप्रदेश में यही किया। वे चुनाव जीत गए, मुख्यमंत्री बने और राज्य को दिवालिया बना बैठे। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल ने 1997 में किसानों को मुफ्त बिजली और पानी दिया। उन्होंने अपना चुनावी वादा निभाया लेकिन बारह महीनों में पंजाब की अर्थव्यवस्था चौपट हो गई और सरकारी सेवकों को वेतन देने के लिए भी पैसे नहीं रह गए।

जो सबक हम सब सीख चुके हैं, वह राजनेता नहीं सीख पाए हैं। वे मतदाताओं को मुफ्त का माल तथा सेवाएँ बाँटने की आपस में होड़ लगाते हैं। तब फिर स्कूल व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित करने के लिए पैसा कहाँ से आएगा?

इन सब बातों को देखते हुए भारत कभी आर्थिक शेर नहीं बन पाएगा। वह तो हाथी है। लेकिन यह हाथी 8 प्रतिशत की सम्मानजनक दर से आगे बढ़ने लगा है। वह कभी भी गति नहीं पकड़ पाएगा लेकिन दूरी तय अवश्य करेगा।

पूँजीवाद और लोकतंत्र की उलटी गंगा बहने के ऐतिहासिक हादसे को देखते हुए लगता है कि शायद चीन के मुकाबले भारत अधिक स्थिर, शांतिपूर्वक एवं परस्पर सहमतिपूर्वक भविष्य में पदार्पण करेगा। वह बिना तैयारी के पूँजीवादी समाज बनाने के घातक दुष्प्रभावों से भी बच जाएगा, जो कि रूस भुगत रहा है।

(लेखक प्रॉक्टर एंड गैम्बल इंडिया के पूर्व सीईओ तथा ‘मुक्त भारत’ के लेखक हैं।)

 

http://hindi.webdunia.com/current-affairs/%E0%A4%AA%E0%A5%82%E0%A4%81%E0%A4%9C%E0%A5%80%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%AA%E0%A4%B9%E0%A4%B2%E0%A5%87-%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%97%E0%A4%A4%E0%A4%BF-108020200036_1.htm

प्राचीन भारत में धार्मिक आन्दोलन Religious Movement in Ancient India

प्राचीन भारत में धार्मिक आन्दोलन Religious Movement in Ancient India

Religious-Movement-in-Ancient-Indiaलगभग 600 ई.पू. भारत में एक धार्मिक आन्दोलन उठ खड़ा हुआ जिसने भारतीय जनमानस को बौद्धिक रूप से आन्दोलित कर दिया। ईसा पूर्व छठी सदी का काल बौद्धिक चिंतन का युग माना जाता है। इस काल में यूनान में पाइथागोरस, ईरान में जरथ्रुष्ट, चीन में कन्फूसियसऔर लाआोत्से और भारत में बुद्ध और महावीर जैसे चिंतक हुए। इस काल में परंपरागत लौकिक धर्म अपनी गति से चल रहा था और इसमें इंद्र देवता को प्रधान माना जाता था। उसे शक्र और मधवा कहा जाता था। बौद्ध ग्रंथ में ब्रह्मा (बम्मा) का भी उल्लेख है। रूद्र शिव के रूप में जाने जाते थे। पाणिनी ने वासुदेव संप्रदाय की चर्चा की है जो भागवत धर्म से जुड़ा हुआ था। महाभारत में भी कृष्ण पूजा का उल्लेख है। उनके भाई बलदेव (लांगुलिन) के नाम का उल्लेख है। जैन ग्रन्थ में स्कंदकी चर्चा है जो शिव के पुत्र थे। इस युग में भी नाग पूजा की चर्चा होती है। गरुड़ पूजा भी प्रचलित थी। बौद्ध और जैन ग्रंथों में यक्ष पूजा के भी दृष्टांत मिलते हैं। यक्षों के राजा को वेसवन कहा जाता था। उदार एवं परोपकारी यक्ष मणिभद्र था।

छठी शताब्दी ईसा पूर्व उत्तर भारत के गांगेय प्रदेश (पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार) के जनजीवन में सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से नगरीयकरण, शिल्प समुदाय के विस्तार, व्यवसाय और वाणिज्य में तीव्र विकास, तत्कालीन धर्म एवं दार्शनिक चिन्तन में होने वाले परिवर्तनों से घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध थे। परम्परागत रूढ़िवादिता एवं नगरों में उभरते नये वर्गों की आकांक्षाओं में होने वाले संघर्ष ने इस प्रक्रिया को गतिशील बनाया होगा जिससे चिन्तन के क्षेत्र में ऐसी एक नवीन शक्ति एवं अद्भुत सम्पन्नता का आविर्भाव हुआ जिसने भारत ही नहीं विश्व के बड़े जनसमुदाय को प्रभावित किया। इस बौद्धिक गतिविधि का केन्द्र मगध था। मगध में इस काल में एक विशाल साम्राज्य की नींव भी पड़ रही थी।

इस आन्दोलन के कई प्रत्यक्ष एवं परोक्ष कारण थे जो तत्कालीन सामाजिक, धार्मिक एवं आर्थिक परिवर्तनों में निहित थे। कुछ विद्वानों ने सामाजिक स्तर पर आर्य-अनार्य, ब्राह्मण-क्षत्रिय तथा परम्परागत वर्ण व्यवस्था एवं विभिन्न जातियों में परस्पर संघर्ष की कल्पना की है। वैदिक आर्य नितान्त प्रवृत्तिमार्गी थे, वे सदैव श्रेष्ठ धन एवं ऐश्वर्य की कामना करते थे। इस विचारधारा के प्रति विरोध का आभास समाज के एक प्रबुद्ध वर्ग में रिग्वेग कल से ही देखने को मिलता है जिसकी अभिव्यक्ति एकेश्वरवादी धरना में देखि जाती है। प्रगार्य इस निवृत्तिमूलक विचारधारा के प्रणेता थे, ऐसी कुछ विद्वानों की धारणा है।

एक बौद्ध ग्रंथ में विशुद्ध यज्ञ की चर्चा मिलती है, राजा महाविजित के यज्ञ में गायें नहीं मारी गई, बकरी-भेड़े नहीं मारी गई, मुर्गे-सूअर नहीं काटे गये, न नाना प्रकार के प्राणियों की ही हत्या की गई। घी, तेल, मक्खन, दही, मधु और गुड़ से ही यज्ञ समाप्त हुआ। मज्झिमनिकाय में उल्लेख आया है कि में यज्ञ प्रक्रिया सरल थी। अट्ठक आदि ऋषियों ने हिंसाविहीन मंत्रों की रचना की थी कितु परवर्ती ब्राह्मणों ने प्राणी हिंसा का प्रावधान किया। बौद्ध साहित्य में रुधिर होम के विवरण भी मिलते हैं।

जैन एवं बौद्ध धर्म के अभ्युत्थान से पूर्व (छठी शताब्दी ईसा पूर्व) अनेक मतमतान्तरों का प्रादुर्भाव हो रहा था। किंतु यह युग मुख्य रूप से निवृतिवादी विचारधारा से विशेषत: दिखाई पड़ता है। इस युग में क्रान्तिकारी सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिवर्तन भी हुए। दूसरी ओर धार्मिक क्षेत्र में घटित परिवर्तनों को सर्वथा असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता। जहाँ कुछ लोगों ने सहज आध्यात्मिक प्रेरणा से निवृतिवादी धर्म को स्वीकार किया होगा वहीं अन्य लोगों ने सामाजिक हीनता तथा आर्थिक कठिनाइयों से मुक्ति पाने का मार्ग पाया होगा। कठिन सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों से त्रस्त लोगों का ऐसे धार्मिक आन्दोलनों की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक था जिसमें इन कठिनाइयों से मुक्ति के उपाय निहित हों। इस प्रकार महावीर एवं बुद्ध द्वारा प्रवर्तित जैन एवं बौद्ध धर्म का उदय इस युग की महत्त्वपूर्ण घटना है। बुद्ध और महावीर के अलावा इस युग में कई चिंतक हुए जिन्होंने इस धार्मिक आन्दोलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, जहां इस काल में 62 धार्मिक संप्रदाय अस्तित्व में थे, वहीं जैन ग्रंथ सूत्र कृताके अनुसार, कुल धार्मिक संप्रदायों की संख्या 363 थी।

अजित केशकंबीलन भारत का सबसे पहला भौतिकवादी चिंतक अजित केशकंबीलन था। अजित केशकंबीलन ने एक पक्के भौतिकवादी चिन्तन का प्रचार किया। उनका मानना था कि अच्छे या बुरे कर्मों का कोई फल नहीं होता। आदमी चाहे जो करे उसका सार भूत में विलीन हो जाता है। दान या दया का मनुष्य की नियति से कोई संबंध नहीं होता। उसका मानना था कि प्रत्येक घटना अपने स्वभाव के अनुरूप होती है। अत: जो इच्छा है वही करो। इसे यदृच्छावादी कहा गया है। आगे चलकर इससे लोकायत दर्शन का विकास हुआ। इसका प्रतिपादक चार्वाक था।

पुरण कश्यप- सुमंगल विलासिनी के अनुसार, वह एक दास पुत्र था जो अपने स्वामी के घर से भाग गया था। एक बौद्ध जनश्रुति के अनुसार, उसने बुद्ध के परिनिर्वाण के 16वें वर्ष में श्रावस्ती के निकट जलसमाधि ले ली। उसका मानना था कि- न तो कर्म होता है और न पुनर्जन्म। उसे अक्रियावादी कहा जाता है। संभवत: पुरण कश्यप ने ही सांख्य दर्शन की नींव डाली। इसके अनुसार आत्मा शरीर से पृथक है। आगे चलकर पुरण कश्यप के संप्रदाय का मक्खलि गोशाल के संप्रदाय में विलय हो गया।

मक्खलि गोशाल- वह छः वर्षों तक महावीर के साथ रहा। फिर उसने आजीवक संप्रदाय की स्थापना की। कुछ पुस्तकों में इसका संस्थापक नंदवच्छ को माना गया है। मक्खलि गोशाल का मत था कि आत्मा को अनेकानेक पुनर्जन्मों के पूर्व निर्धारित अटल चक्र से गुजरना ही पड़ता था और फिर प्रत्येक जन्म में वह जिस शरीर से संबंधित होता है वह होगा ही, चाहे उसने कर्म कैसा भी क्यों न किया हो। उसे नियतिवादी कहा जाता है। बिंदुसार ने इस धर्म को संरक्षण दिया और अशोक एवं दशरथ ने इसे गुफाएं प्रदान कीं।

पकुध कात्यायन- यह भी नियतिवादी था। वह भी कर्म और पुनर्जन्म में आस्था नहीं रखता था। उसके विचार में सात वस्तुएं पृथ्वी, जल, तेज, वायु, सुख, दुख और जीव न तो पैदा किए जा सकते हैं और न ही नष्ट। अत: न तो संसार में कोई किसी को मारता है और न ही कोई मारा ही जाता है। अत: यदि कोई किसी को हथियार से काटे भी तो वह नहीं कटता है। इससे परवर्ती वैशेषिक दर्शन का उद्गम माना जा सकता है। इस धर्म के अनुयायी मक्खलिपुत्र गोसाल के संप्रदाय से जुड़ गए।

संजय वेलट्टपुत्त- इसे अनिश्चयवादी भी माना जाता है। इसका मानना है न तो यह कहा जा सकता है कि स्वर्ग या नरक हैं, या फिर नहीं हैं।

चार्वाक- उसे बृहस्पति का शिष्य माना जाता है और उसने बृहस्पति सूत्र (ग्रंथ) भी लिखा है। चार्वाक, भौतिकवादी दार्शनिक है। उसका मानना है कि प्रत्यक्ष अनुभव ही एक मात्र ज्ञान का साधन है। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु के रूप में, अचेतन अवस्था में प्राप्त, द्रव्य एकमात्र वास्तविकता है। भौतिक तत्वों से बना शरीर मानव का एक मात्र सार है। राजा एक मात्र देवता है। मृत्यु मानव का एक मात्र अन्त है। ऐन्द्रिक आनन्द ही जीवन का एक मात्र उद्देश्य है। मृत्यु के बाद न तो स्वर्ग है और न नरक। इसलिए कर्म और पुनर्जन्म अपना अर्थ नहीं रखता है।

संभवत: इन अतिवादी तथा सामाजिक नैतिकताविहीन चिंतन में कार्य कारण सम्बंधी प्रकृति के नियम की धारणा कार्य कर रही थी, जिससे इस विचार का विकास हुआ कि प्रकृति में सदैव कार्य कारण सम्बन्ध कार्यरत है, जिसे न ईश्वर ही बदल सकता है न कर्मकाण्ड या यज्ञों से ऐसा संभव है। इस विचारधारा का विकास उपनिषदिक चिंतन के साथ ही हुआ होगा जो छठी शताब्दी ईसा पूर्व में नास्तिकवादी सम्प्रदायों का प्रेरक बन गया।

आज भी प्रचलित कुछ शब्दों से हम प्राचीन भारत में प्रचलित बौद्ध धम्म जैन धर्म ब्राह्मण धर्म और उनसे प्रेरित राजनीतिक वर्चस्व की खुनी लड़ाई को महसूस कर सकते हैं , जैसे:

त्यौहार : तुम्हारी हार
दशहरा : दस पीढ़ियों की हार (बौद्ध सम्राट अशोक महान की दस पीढ़ियां )
भंगी:  हिंसक यज्ञ को भांग करने वाली सेना
राक्षस : रक्षा करने वाली सेना
असुर :  अ+सुर  जो ब्राह्मण धर्म के सुर में सुर न मिलाये मतलब साथ न दे

बुद्ध ही बुत है, बुत ही भूत हैं, इसीलिए कहा जाता है कि पीपल ( बोधिवृक्ष ) में भूत बसते हैं।भूत काल अर्थात बुद्ध काल!!!

बेहद खुनी संगर्ष और जबरदस्त षडयंत्र का युग था, हम आज भी पौराणिक नाटकों फिल्मों में असुर राक्षश आदि देस्ख सुन सकते हैं, आज भी इनके द्वारा स्थापित बौद्ध मूर्तियां खंडित रूप में संघ्रालयों में देख सकते हैं.

खेर वो समय गुज़र गया और आज ये सभी अंतर्विरोधी धर्म एक बड़े धर्म हिन्दू धर्म के तहत संगठित होकर भारत निर्माण में कंधे से कन्धा मिलकर चल रहे हैं

http://www.vivacepanorama.com/religious-movement-in-ancient-india/

बाबा साहब डॉ भीम राव आंबेडकर के 125वि जयंती पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :- “कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं “…समयबुद्धा

समयबुद्धा दलित सूत्र कहता है की  “दगा से दलित और दलित से दमन होता है”
dalit to baudh

कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं

इससे पहले की हम जाने की कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं, हमको दलित शब्द का सही मतलब समझना होगा|

दलित का मतलब है ऐसे लोग जिनका दमन होता हो, जिनको हिस्सेदारी न्याय और सम्मान न मिलता हो|दलित होना कोई एक ही वर्ग की बपौती नहीं, कोई भी कौम दलित हो सकती है,जिस भी कौम में दगाबाज, निकम्मे ,नशाखोर,अत्याचारी बढ़ जाते हैं उनका पतन हो जाता है और वो दलित बन जाते हैं| ऐसे लोगों को ज्यादा मेहनतकश और संगठित लोग हरा देते हैं , परिणाम गुलामी या दलितपन है |दलितपन से छुटकारा अपने व्यक्तिगत और कौमी अवगुणों को छोड़कर शिक्षा संगठन और संगर्ष से अपने विरोधी को पछाड़ देने से होता है

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के निम्न शब्द पढ़ो:

“गाँवों में जिस प्रकार महार-चमार-मांग-भंगी के भी दो ही चार मकान होते हैं उसी प्रकार मुसलमानों के भी दो चार माकन होते हैं लेकिन उन मुसलामानों को कोई छेड़ता नहीं है. उन पर कोई अत्याचार करने का धैर्य नहीं करता है. लेकिन आप (अछुतों – शूद्रों पर) पर अत्याचार सदा ही होता रहता है और हिन्दू आप पर अत्याचार करना अपना धर्म समझते हैं. इसका कारण यह है की मुसलमानों के घरों के पीछे भारत का सारा मुसलमान समाज है. इस सचाई को हर हिन्दू समझता हैं और आपके सम्बन्ध में हिन्दुओं को पूर्ण विश्वास है की आप पर अत्याचार करने पर आपकी सहायता कोई भी नहीं करेगा. आपकी असमर्थता और निस्सहायता के कारण ही आप पर हिन्दू लोग अत्याचार करने का दुसहास करते हैं.” – डॉ. बी आर अम्बेडकर (३० – ३१ मई , १९३९ बम्बई)”

दलितपन असल में एक व्यक्ति की नहीं एक कौमी बीमारी है|आप ध्यान दोगे तो पाओगे की  दलितों में ही कई शिक्षित समझदार और सक्षम लोग मिल जायेंगे पर फिर भी वे दलित हैं, जानते हैं क्यों क्योंकि उनकी कौम दलित है| दलित हर देश में होते हैं, दलित वही हो जाते हैं जो राजनीतिक रूप से दबाए सताए गए होते हैं|दलित वही है जिसपर अत्याचार करने से अत्याचार करने वाले को कोई सजा न मिले, या अगर मिले भी तो नाममात्र को, मतलब दलित पैदा ही लूटने और अत्याचार सहने के लिए होता है|ज्यादा समझने के लिए जरा उन ख़बरों और तस्वीरों को देखों जिनमे इन लोगों के धन, धंधा और धरती को जबरन छीना हो,बिना पेमेंट के गुलामी करवाना, मारे काटे कुचले लोगों की लाशें, पूरा गांव जला देना, छोटे बच्चों को उछाल के भले पर नाथ लेना, महिलाओं के साथ दुष्कर्म कर मार डालना, कभी देखी है ऐसी महिला की लाश जिसकी आँखें  फटी हो हो,जान जाटव वक़्त चेीख के कारन मुंह खुल होता है जो मरने के बाद भी यथावत गुजरे जुल्म की चुगली करता है|इतना ही नहीं फिर इन सब जुल्म को करने वालों को सजा न होना और बाईजत बच निकलना|

यही है दलितपन और इसका इलाज है बुद्ध और डॉ आंबेडकर द्वारा दिया गया ज्ञान है, उनकी तस्वीर और मूर्ती की पूजा नहीं,इनकी तस्वीर और मूर्ती केवल आपलो उनको याद रखने और उनको समझने का इशारा मात्र है| 

1. दलित बनने के लिए सबसे पहले शर्त है की दगाबाज़ होना, वक़्त पड़ने पर अपने भाईओं या अपनी कौम को दगा देना|

संगठन के दगाबाज अपनी कौम को दलित बनाते हैं |मैं बहुत रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पंहुचा हूँ की दगाबाजी ही दलितपन का पहला कारन है,इसी बात पर मैंने दलित सूत्र बनाया है जो कहता है “दगा देने से दलित बनते हैं और दलित बनने से दमन होता है”| बुजुर्गों की कहावत है “दगा किसी का सागा नहीं, न मानो तो कर देखो, किया है जिन्होंने भी दगा आज जाके उनके घर देखो”| भारत के मूलनिवासी कौमों के इतिहास की समीक्षा में आप पाओगे की विरोधी में कभी सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं हुई, ये सदा ही अपने ही किसी विभीषण जैसे दगाबाज भाई के धोखे के कारन परास्त होते आये हैं, इसीलिए दलित बने और हमारे घरों की दुर्दशा हुई, कौम को दगा देने से बड़ा गुनाह और कोई नहीं|दलित भाई चारा, टीम वर्क, संगठन, पे बैक तो सोसाइटी, कौमी एकता, जैसी तथ्यों से बेखबर रहता है और इसीलिए इतनी अधिक आबादी होने के बावजूद अलग अलग सब पीटते, बेइज्जत और मरते रहते हैं| दलित वही है जो पिट जायेगा मर जायेगा बेइज़्ज़ती सह लगा पर अपने भाइयों या कौम के साथ मिल कर नहीं चलेगा|

2. दलित होने का दूसरा सबसे बड़ा कारन है इतिहास में युद्द में हुए कोई हार जिसके परनाम स्वरुप सब धन धरती ज्ञान और इतिहास छीन लिया गया हो|

सभी प्रकार के अधिकार खासकर की शिक्षा लेने का अधिकार, संगठन बनने का अधिकार,हथियार और शक्ति बढ़ने का अधिकार, अपना इतिहास के प्रचार प्रसार का अधिकार अदि छीन लिए गए हों| राजनयिक उपेक्षा मतलब देश के शाशक न्य न देना चाहता हो ये  दूसरा सबसे बड़ा कारन है किसी भी कौम को दलित बने के लिए| किसी भी युद्ध में हार का कारणों में सबसे बड़ा कारन होता है कोई अपना ही भाई दगाबाजी करे| इसीलिए दलित सूत्र कहता है की दगाबाजी ही दलित बनने का सबसे पहला कारन है|

दलित बनने के लिए व्यक्तिगत कारन जैसे निकम्मापन,अपने समाज के इत्थं के मिशन में भाग न लेना, मिशन की बातों पर ध्यान न देना |हमारे समाज के लोग, बड़े बुजुर्ग  अक्सर हमको कुछ सामाजिक बातें बताना चाहते हैं, पर हमारे समाज का अनपढ़ वर्ग उसे समझ नहीं पता और शिक्षित वर्ग अहंकारवश उनकी सुने बिना ही खारिज कर देता है| वहीँ दूसरी तरफ अगर ब्राह्मणवादी अपने लोगों को कोई बात बताये तो तुरंत उनके कान खड़े हो जाते है और वो ध्यान से सुनता है फिर अपने विवेक से फैसला करता है की उस बात को छोड़ना है की अपनाना है, इसीलिए ये लोग जीतते आये हैं|जब मैंने इस बात पर गौर किया तब मैं समझ पा रहा हूँ क्यों सदियों पहले गौतम बुद्ध ने कहा था “दुःख की शुरुआत ध्यान न देने से और सुख की शुरुआत ध्यान से होती है”|

3. राजनीती में पकड़ न होना दलितीकरण का एक मुख्य कारन है  राजनीती वो जगह हैं जहाँ से किसी भी कौम का भाग्ये या दशा तय होती है, अगर राजनीती में सक्रिय नहीं होंगे तो हक़ नहीं मिलेंगे और पिछड़ने की वजह से दलितीकण हो जाएगा |बाबा साहब का निम्न कोटेशन देखिये

control on politics ambedkar

4. जिस क्षण कोई भी व्यक्ति या कौम “संतुस्ट” हो जाती है और अपनी स्तिथि को बदलने/सुधारने  के लिए संगर्ष करना छोड़ देते हैं उसी क्षण से उनका दलित बनने की प्रक्रिया शीरी हो जाती है|

जो लोग अपने जीवन में अपनी वर्तमान दशा में बेहतरी के लिए संगर्ष करना छोड़ देते हैं वही दलित हो लेते हैं , दलित बस्तियों में जाकर देखों दलित बुड्ढे और जवान भी टॉस पीटते मिल जाएंगे जबकि सवर्ण बुड्ढे खाखी चड्डी पहनकर शाखाएं लगते और युवाओं को अपने रंग में रंगते मिल जाएंगे| इतना तो कोई मूर्ख भी समझ सकता है की जो म्हणत करेगा वो पायेगा| अपनी दशा से संतुस्ट लोग निकम्मे हो जाते हैं और निकम्मों का न कोई भूतकात होता है न वर्तमान न ही कोई भविष्य, ये लोग सिर्फ गुलामी करने के लिए होते हैं|

5. दलित बने रहने का कारन है अपना इतिहास और महापुरुष को न जानना न मानना:

दलितों की अहसान फरामोशी इनके पतन का एकमुख्य कारन है:दलितों को कोई समझने जाता है तो ये लोग सबसे पहले अपने समझाने वाले को समझने को तैयार नहीं होते उसे शक की नज़र से देखते हैं,इन्हीं में से कुछ लोग उस समझाने वाले की शिकायत कर देते हैं, इतना ही नहीं चुगली कर मरवा डालते हैं|खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि “मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है|धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं”

दलित इतिहास जानना: भारत के दलितों/पिछड़ों को अपना इतिहास जानना आवश्यक है।जब तक ये लोग अपना इतिहास नहीं जानेगें तब तक इनमें आपसी प्रेम -भाव पैदा नहीं होगा।दलित  वही है जो समझना न चाहे अपने महापुरुषों को जानना न चाहे, उल्टा अपने पूर्वजों के हत्यारों की पूजा करे|कुछ दलित मन्दिरबाजी से छूटे तो गुरुबाजी,सत्संगबाजी करने लगे हैं,उनको जब अम्बेडकर और बुद्ध के बारे में बताओ, तो वो गुरुज्ञान,लोक-परलोग की बातें झाडते हैं,कहते हैं की ये राजनैतिक बातें इसी जन्म तक हैं|हमारे गुरूजी तो जन्म मरण से छुटकारा दिल देंगे|कहते हैं हम राजनीती से दूर हैं पर गुरु जी के कहने पर वोट दे देते हैं|चलो माना सत्संगी गुरु मरने के बाद प्लानिंग हेतु ठीक होंगे,आपकी आस्था का सम्मान करते हैं,पर जिंदगी रहते जैसे शिक्षा,धन,शादी,बच्चे जरूरी है वैसे ही भारत में आज़ादी हेतु अम्बेडकरवाद बुद्धवाद जरूरी है,आजादी खोने का मतलब और कीमत है डाली बन जाना और फिर वो सब झेलना जो सुनने बोलने में ही दिल दहल जाता है|

मैं तब हैरान हो जाता हूँ जब भारत के मूलनिवासी लोग जो कभी बौद्ध थे आज वो खुद को गर्व से दलित कहते हैं|जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं| इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी|जो कौम अपना नाम भी खुद नहीं रख सकती विरोधियों का दिया कलंकित नाम “दलित” को ढो रही है वो उन मनुवादियों से क्या मुकाबला करेगी जो सदियों से संगर्ष/ षडियंत्र  कर रहे हैं|

dalit tyago

ये जो दलितपन है ये किसी क्रांति से ही दूर हो सकता है, पर इतना सहने के बात भी इन शूद्र बन दिए गए इंसानों से कभी क्रांति क्यों नहीं की, इस विषय पर ओशो रजनीश के व्याख्यान का ये हिस्सा देखे

“ गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया वो शहर के बाहर रहता है वो शहर के अंदर नहीं रह सकता.गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है और राजा के पास अपने कुँए है ही। अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है. वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है |उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है|“इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी  कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा| तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं. और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथकुछ औरभी चाहिए. ये जोकुछ औरऔर है यही तो बुद्धि हो जाता है,बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है| लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि  इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी  वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं|” … ओशो रजनीश. Book Title: The Last Testament, Vol. 2.       //  Chapter 6: The Intelligent Way

हमारे गांव में एक कहावत है “मूर्खों के गांव नहीं बसा करते”, जब दलितों को बस्ती जलती है,नरसंघार होता है तब ये कहावत याद आती है और याद आता है इन दलितों का विशेषकर पढ़े लिखे दलितों का की वो अम्बेडकरवाद/बुद्धवाद को छोड़ मन्दिरबजी, देविदेवतबजी करना, शिक्षा और ज्ञान की जगह नशा,मौज और निकम्मापन, संगठन की जगह अपनी कौम को दगा देना,और फिर रोना की इनके साथ जुल्म होता है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने कहा है की “जुल्म करने वाले से सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता है”

सवर्णों और दलितों में जो सबसे बड़ा फर्क मुझे समझ में आया वो ये है की जैसे ही सुख के दिन आते हैं दलित अपने समाज और संगर्ष को छोड़ देता है जबकि सवर्ण इसके उलट जितना संपन्न होता जाता है उतना ही संगर्ष और अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होता जाता है| हमारे सक्षम वर्ग को ये समझना होगा की अम्बेडकरवाद संगर्ष के चलते उनकी जिन्दगी में आज जो सम्पन्नता आई है उससे अर्जित ज्ञान,धन और समय का ५% हिस्सा इसी संगर्ष पर खर्च करना होगा वरना वो नीं दूर नहीं ये ५% बचने के चक्कर में पूरा १०० % छीनने वाले का सामना अकेले करना पड़ेगा| मैं अपनी बात को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के निम कथन से समाप्त करना चाहूंगा:

“वही कौम तरक्की करती है जिस कौम में क़ुरबानी देने और लेने की जज्स्बा और क्षमता होती है|” …..बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर

भारत की वर्ण व्यस्था में चार वर्ण हैं ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्ये और शूद्र, इनमे से ब्राह्मण और वैश्ये चाहे कुछ  भी करें उनका दलितीकरण नहीं हो पाता क्योंकि उनकी कौम में दगाबाजों के मुकाबले  संघर्षशील लोग ज्यादा होते हैं| जबकि क्षत्रिय  शूद्र में कई  और शूद्र क्षत्रिय बन सकता है, हालाँकि ये सदियों का गेम है| उदाहरण के लिए हाल ही में चमार जात का संगठन देखकर उनको किताब लिखकर क्षत्रिय घोषित किया है आरएसएस ने| मुसलमान जो अभी ३०० साल पहले ही भारत के शाशक थे उनके दलितीकरण जोरो से चालू है, अगर आप ध्यान दोगे तो उनमे गरीबी और अशिक्षा बढ़ रही है

 

जहाँ एक तरफ डॉ आंबेडकर के लोगों पर अत्याचार बढ़ रहा है वहीँ दूसरी तरफ डॉ अम्बेडकर को पूजनीय नायक बना रहे हैं,पीढ़ियों की क़ुरबानी से तैयार हुई डॉ अम्बेडकर नाम की फसल को लूटने की इस मुहीम को समझना होगा |

125 jayanti dr ambedkarमानो या न मानो पर अम्बेडकर युग शुरू हो चुका है,विरोधियों की मजबूरी ऐसी की अब डॉ आंबेडकर को पूजने चलें हैं,और आप अम्बेडकरवादी होने में शर्मा रहे हो| ध्यान रहे विरोधी फसल लूटने में माहिर हैं, बुद्ध की फसल लूटने के सदियों बाद अम्बेडकरवाद के बीजों से कपोल फुट पड़ीं हैं, खेत पर एक हरी चादर बिछ गयी है, सतर्क रहना कहीं फसल लूट न जाए| मुह में अम्बेडकर बगल में मनुस्मृति है| सावधान!

 

निम्न लिंक से पढ़ें लेख :-“आंबेडकर के नाम पर” – आनंद तेल्तुम्बडे,   (अनुवादक : एस.आर. दारापुरी)

http://www.instantkhabar.com/articles/item/30786-article.html

ambedkar hamare hai

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की १२५वि जयंती के उपलक्ष में प्रस्तुत हैं उनकी कुछ असली तस्वीरें

control on politics ambedkar

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर विचार महोत्सव समिति द्वारा बाबा साहब की 125वि जयंती के उपलक्ष में  MMRDA Ground, BKC, मुंबई में विशाल प्रोग्राम किया गया और जिसमे बॉलीवुड फिल्म कलाकार आमिर खान को सम्मानित किया गया,बाबा साहब पर आमिर खान की ये स्पीच स्वागत योग्य है  


भारत की मूलनिवासी जनता की दशा सुधारने में महामना ज्योतिबा फुले जी का योगदान अतुलनीय है, आज 11अप्रिल2016 को उनका 189 वें जन्मदिवस पर आप सभी को बहुत बहुत मंगलकामनायें,आइए उन जीवन पर आधारित इस लेख से उनको जानने की शुरुआत करें…

phule fooleमहात्मा ज्योतिबा फुले जी का जन्म सन 1827 ई० को महाराष्ट्र की एक माली जाति के परिवार में हुआ था| ज्योतिबा फुले के पिता का नाम गोविन्द राव और माता का नाम चिमनबाई था| ज्योतिबा जी के बड़े भाई का नाम राजाराम था| पूना के आस-पास माली जाति के लोगों को फुले (फूल वाले) कहा जाता है| ज्योतिराव फुले की माता चिमनाबाई का निधन उस समय हो गया जब वे मात्र एक वर्ष के थे| अब उनके पिता जी के सामने ज्योतिबा के पालन-पोषण की चिंता थी । उन्होंने उनके लिए एक धाय को नौकर रखा लेकिन दूसरी शादी नहीं की | उस धाय ने भी एक माता के समान ज्योतिबा का पालन-पोषण किया |

गोविन्द राव ने अपने पुत्र की जन्मजाति प्रतिभा को देखकर शिक्षार्जन हेतु भेजने का विचार किया | विद्यामन्दिरों में पंडित लोग तर्कशास्त्र, दर्शन-शास्त्र, व्याकरण आदि संस्कृति में ही पढ़ाते थे और किताबें इतिहास-भूगोल की जगह देवी-देवताओं की कहानियों से पटी पड़ी हुई थी | सन 1836 से ग्राम पाठशालाओं का सूत्रपात हुआ | ब्रिटिश सरकार के प्रारम्भ होने पर ही व्यवस्थित शिक्षा का सूत्रपात हुआ | उस समय जो स्कूल थे उन पर सिर्फ सवर्ण समाज का ही अधिकार था यदि किसी अब्राह्मण बालक ने काव्यपाठ किया या कुछ पढ़ा तो उसके साथ कठोर व्यवहार किया जाता था | आगे समय बीतने के साथ-साथ ब्रिटिश सरकार ने शिक्षा का अधिकार सबको सुनिश्चित किया |

गोविंदराव ने अपने पुत्र ज्योतिबाफुले को 7 वर्ष की आयु में एक मराठी पाठशाला में प्रवेश दिलाया | उधर ब्राह्मणों के लिए अंग्रेजी शिक्षा पद्धति अभिशाप प्रतीत हुई | वे अपने बच्चों को स्कूल के बाद इस लिए नहलाते थे कि वो अंग्रेजी पुस्तकें और अछूत बच्चों के साथ पढ़कर आया है | उस समय सवर्ण समाज की मानसिकता थी कि शिक्षा पाना सिर्फ ब्राह्मणों का अधिकार है अछूतों का नहीं और उनका विश्वास था कि सम्पूर्ण ज्ञान सिर्फ संस्कृति भाषा की पुस्तकों में विद्यमान है | ऐसी सामाजिक परस्थितियों में गोविंदराव ने अपने पुत्र ज्योतिबा को शिक्षा देने का आसाधारण कार्य किया | ज्योतिबा जी पढ़ने में काफी होशियार थे उन्होंने जल्द ही मराठी का लिखना-पढ़ना और बोलना सीख लिया |

उन्ही दिनों के बार ऐसा हुआ कि ‘बम्बई नैटिव एजुकेशन सोसाइटी’के संकेत पर सोसाइटी के विद्यालय से छोटी जाति के छात्रों को निकाल दिया गया | गोविंदराव ने भी उसी समय अपने पुत्र ज्योतिबा को विद्यालय से निकाल लिया | अब ज्योति फावड़ा और खुरपी लेकर खेतों में लग गए तथा फूलों के कार्य को आगे बढ़ाने लगे | धीरे-धीरे ज्योतिबा जब 13 वर्ष के हुए तो पिता गोविंदराव ने परम्परागत पद्धति के अनुसार ज्योतिबा का विवाह निश्चित कर दिया | बालिका-पत्नी जिसका नाम सावित्रीबाई फुले था की आयु 8 वर्ष थी | पूना के पास एक गाँव कबाड़ी में लड़की का मायका था | विद्यालय से अलग हो जाने से भी ज्योतिबा का लगाव पुस्तकों से दूर न हो सका | ज्योतिबा दिन भर खेतों में काम करने के बाद रात में दिये की रोशनी में पुस्तकें पढ़ते थे | उनकी इस लगन का पड़ोस में रहने वाले दो पड़ोसी गफारबेग तथा लेजिट पर बहुत प्रभाव पड़ा और उन्होंने गोविंदराव को स्कूल में दाखिला दिलाने का परामर्श दिया | गोविंदराव ने इस परामर्श को स्वीकार करते हुए 1841 ई० में पुनः मिशन स्कूल में ज्योतिबा को प्रवेश दिलाया |

दो ब्राह्मण सहपाठियों को छोड़ कर ज्योतिबा जी के अधिकतर मुसलमान सहपाठी थे | स्कॉटलैंड के मिशन द्वारा संचालित स्कूल में ज्योतिबा जी ने अधिकतर शिक्षा ग्रहण की | अपने एक विशिष्ट सहपाठी के साथी ज्योतिबा फुले जी वाशिंगटन और शिवजी की जीवन कथाएं पढ़ते थे | उनके मन में भी अपने देश को स्वतंत्र करने के लिए निरंतर भाव जागृत रहता था | ज्योतिबा और उनका ब्राह्मण मित्र सदाशिव बल्लाल गोबंदे मिलकर अंधविश्वासों तथा मिथ्या कुरीतियों में फंसे लोगों को उनसे मुक्त होने के लिए प्रेरित करते रहते थे | 1847 ई० में ज्योतिबा जी ने मिशन स्कूल की शिक्षा पूरी कर ली | ज्योतिबाफुले जी ने अपनी पुस्तक ‘गुलामी’ (स्लेवरी) में स्पष्ट लिखा है कि वे अपने देश से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेकना चाहते थे | ज्योतिबा जी के छात्र जीवन से ही अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध छुटपुट घटनाएँ होने लगी थी |

ज्योतिबा जी के साथ एक घटना घटित हुई जिससे उनकी जीवन की दिशा ही बदल दी | एक बार ज्योतिबा फुले जी ब्राह्मण मित्र के विवाह में गए हुए थे | ज्योतिबा जी अपने ब्राह्मण मित्रों के सच्चे स्नेही थे | दूल्हे के साथ बरात सजधज कर जा रही थी ज्योतिबा जी भी साथ में चल रहे थे | बारात में प्रायः ब्राह्मण जाति के लोग थे | एक ब्राह्मण ने ज्योतिबा फुले जी को पहचान लिया और उसको यह सहन न हो सका कि ब्राह्मण के साथ शूद्र चले, उसने आवेश में आकर ज्योतिबा फुले जी को डांटने लगा और कहने लगा “अरे…! शूद्र तूने जातीय व्यवस्था की सारी मर्यादा तोड़ दी, तूने सबको अपमानित किया है तू जब हमारे बराबर नहीं है तो तुझे ऐसा करने से पहले सौ बार सोचना चाहिए था, तू बारात के पीछे चल या यहाँ से चल जा |” ज्योतिबा जी स्तंभित रह गए, दिमाग शून्य हो गया | जब कुछ देर बाद सामान्य हुए तो उन्हें अपने अपमान का अहसास हुआ, उनकी रग-रग में खून खौल उठा |

ज्योतिबा बारात से वापस अपने घर आ गए | उनकी आँखों में आंशू देखकर पिता ने जब कारण पूछा तो उन्होंने अपने अपमान का सारा कथानक पिता को सुनाया | उनके पिता ने तब उन्हें वर्ण व्यवस्था के बारे में विस्तार से समझाया और फिर कहा कि अच्छा हुआ केवल तुमको वह से उन्होंने भगा दिया अन्यथा वो तुमको मार-पीट भी सकते थे कभी-कभी तो वे इस तरह की भूल पर वे हाथी के पैर के नीचे गिराकर कुचल देते है | ज्योतिबा जी के पिता जी नहीं चाहते थे कि वे सामाजिक रीति-रिवाज़ों का उल्लंघन करके ब्राह्मणों का कोप भाजन बने | परन्तु ज्योतिबा शिवजी, वाशिंगटन तथा लूथर के आदर्शों को नहीं भुला सके, वह इसी उधेड़ बुन में पूरी रात सो नहीं सके | ज्योतिबा जी ने अनुभव किया कि शूद्रों को गुलामी और गरीबी में ही मरना-जीना है | शूद्र वर्ण में जन्म लेने का अर्थ है अपमान और दासता | ज्योतिबा जी ने हिन्दू धर्म में फैली ऊंच-नीच की अमानवीय भावना तथा रूढ़ियों एवं अंध-परम्पराओं को समाप्त करने का संकल्प लिया जबकि वह जानते थे कि इसकी जड़े काफी गहरी है |

ज्योतिबा फुले जी ने इस अज्ञान को ध्वस्त करने के लिए विद्रोह के ध्वजा अपने हाथों में ले ली | उनको विश्वास था कि छोटी जातियों के लोग सामाजिक समानता के लिए अवश्य संघर्ष करेंगे | ज्योतिबा जी की तरह और भी वयस्क लोग थे लेकिन ज्योतिबा जी के पास जो साहस और संकल्प था वह और किसी के पास नहीं था | 21 वर्ष की आयु में ज्योतिबा फुले जी ने महाराष्ट्र को एक नये ढंग का नेतृत्व दिया | ज्योतिबाफुले जी ने महाराष्ट्र की नारी तथा शूद्रों दोनों को सामाजिक गुलामी से मुक्त कराने की प्रतिज्ञा की | सर्वप्रथम उन्होंने एक बालिका विद्यालय की नींव डाली और उस विदयालय में सभी छोटी जातियों की छात्राएं शिक्षा पाने लगी | ज्योतिबा जी का विचार था कि अगर नारी शिक्षित नहीं होगी तो उसके बच्चे संस्कारी और परिष्कृत नहीं बन सकते |

ज्योतिबा जी ने मनुस्मृति के आसामाजिक सिंद्धान्तों का खंडन किया | मनुस्मृति की खुली आलोचना की | उन्होंने समाज के निम्न वर्गों को ललकार पूर्वक सम्बोधित किया और कहा “मेरा अनुसरण करो, अब मत डगमगाओ | शिक्षा तुमको आनंद देगी ज्योतिबा तुम से विश्वास पूर्वक कहता है |” ज्योतिबाफुले जी ने समूची सामाजिक परम्पराओं का विरोध किया तो परम्परा प्रेमी ज्योतिबा को अपना शत्रु समझने लगे |

उनके विद्यालय को जब कोई अध्यापक नहीं मिला तो उन्होंने इस कार्य के लिए अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को शिक्षित किया, उनकी पत्नी ने भी इस कार्य को सहज स्वीकार किया | उनकी पत्नी विदयालय में पढ़ाने जाने लगी | सवर्णों के क्रोध की कोई सीमा न रही | सावित्रीबाई फुले जब स्कूल जाती थी तो लोग उन पर ढेले चलाना शुरू कर देते थे, उन पर कीचड़, कंकड़-पत्थर फेकने लगे | साड़ी गन्दी हो जाया करती थे इस लिए वो एक साड़ी हमेशा साथ ले कर चलती थी |

अब सवर्णों को कोई रास्ता नहीं दिख रहा था ज्योतिबा जी को रोकने के लिए तब उन्होंने उनके पिता पर दबाव बनाना शुरू किया और कहा कि “तुम्हारा बेटा हिन्दू धर्म एवं समाज के लिए कलंक है और उसी प्रकार उसकी निर्लज्ज पत्नी भी | तुम अनावश्यक भगवान का कोप भाजन बन रहे हो | धर्म और भगवान के नाम पर हम तुमसे कहते है कि तुम उसे ऐसा करने से रोको या फिर घर से निकाल दो |” उस समय ब्राह्मणों का वर्चस्व था इस कारण ज्योतिबा के पिता गोविंदराव को अपनी अन्तरात्मा विरुद्ध अपने ज्योतिबा से कहना पड़ा कि वह विद्यालय छोड़ दे या फिर घर को छोड़ दे | ब्राह्मण ज्योतिबा के घर में क्लेश करने में कामयाब हो गए चूँकि ज्योतिबाफुले जी को पता था कि वह सही रास्ते पर चल रहे है अतः उन्होंने पिता जी से कहा “परिणाम चाहे कुछ भी हो पर मैं अपने उद्देश्य से विरत नहीं हो सकता |” पिता ने भी साहस समेटकर कर कह दिया कि “जहाँ तुमको जाना है वहां जाओ लेकिन मेरा घर छोड़ दो |” धन्य थी वह स्त्री जिसने अनगिनत कष्ट सहते हुए अपने पति के साथ जाने के लिए कटिबद्ध हो गयी | उसने समाज को अनेक प्रकार की विषमताओं से मुक्त कराने के लिए अपने पति की अनुगामिनी बनकर ही रहना उचित समझा |

ज्योतिबा जी और उनकी पत्नी घर से निकाल दिए जाने के बाद भी विद्यालय चलाने की मनसा से मुक्त नहीं हो सके | सावित्रीबाई फुले जी ने अपने आगे की पढाई को सुचारू रूप से पूरा किया | कुछ समय पश्चात अपने दो मित्रों के सहायता से पुनः एक बालिका विद्यालय खोला | विदयालय के लिए जब कोई मकान किराये पर नहीं मिला तो उनके मित्र सदाशिव गोबांदे जूनागंज में एक स्थान की व्यवस्था कर दी | लेकिन वहां भी ब्राह्मणों ने अपना रोष व्यक्त किया और उस जगह को छोड़ने पर विवश कर दिया और उन्होंने एक मुसलमान से स्थान ले लिया | छात्रों के निर्धन होने के कारण ज्योतिबा उन्हें वस्त्र और पुस्तकें मुफ्त प्रदान करते थे |

पिछले तीन हज़ारों सालों के इतिहास में ऐसे विद्यालय का खोला जाना पहली घटना थी तथा ज्योतिबा जी ऐसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अपने साहस और लगन से यह अभूतपूर्व कार्य कर दिखाया | तब समाज की यह स्थिति थी कि यदि शूद्र कभी वेद पाठ सुन लेता तो उसके कानों में तपता हुआ तरल पदार्थ दाल दिया जाता था |

दो वर्षों तक शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करने के बाद ज्योतिबा जी ने 3 जुलाई 1953 को एक दूसरा विद्यालय पूना के अन्नासाहेब चिपलूणकर भवन में खोला | अपने इस विदयालय के संचालन के लिए एक प्रबंध समिति का गठन किया | उस समय की सरकार को प्रबंध समिति की सूची प्रस्तुत की गयी | शासन ने ज्योतिबा फुले जी के शिक्षा सम्बन्धी कार्यों की प्रशंसा की और उन्हें एक महान समाज सेवी की रूप में मान्यता दी | प्रबंध समिति ने हमेशा यही आशा रखी कि ज्यो-ज्यो नारी शिक्षा की गति बढ़ेगी और उसका विकास होगा वैसे-वैसे देश का विकास होगा | ज्योतिबा फुले केवल पीड़ित-शोषितजनों के ही नहीं, बल्कि समाज सुधारकों के भी रक्षक थे | ज्योतिबा फुले को उनके अदम्य साहस एवं सेवा भावना के फलस्वरूप उनको समाज सेवियों के बीच प्रथम स्थान मिला था | उस समय के कुछ समाज सेवी ब्राह्मणों ने ज्योतिबा की नीतियों से प्रभावित होकर उनका सहयोग करना प्रारम्भ कर दिया जिससे रूढ़िवादी और समाज सेवी ब्राह्मणों में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी | इसी क्रम में ज्योतिबा जी ने आगे कई विद्यालय खोले |

19 फरवरी 1852 के ‘टेलीग्राफ एंड कोरियर’ पत्र में एक पर्यवेक्षक ने लिखा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि “ब्राह्मण छोटी जातियों के भयानक शत्रु थे किन्तु कुछ ब्राह्मणों ने यह भी अनुभव करना प्रारम्भ कर दिया है कि उनके पूर्वजों ने इन जातियों के लोगों को अनगिनत अघात पहुचाएं है |”

ज्योतिबा जी ने पूना में एक पुस्तकालय की स्थापना की जो छोटी जाति के छात्र-छात्रों के लिए अत्याधिक उपयोगी सिद्ध हुआ | इस कार्य के लिए पूना के अनेक महानुभावों ने हर प्रकार का सहयोग दिया | ज्योतिबा जी शिक्षक का कार्य जरूर करते थे किन्तु उनके अध्यापन की सीमा केवल विद्यालय तक सीमित नहीं रही, वे एक समग्र समाज के शिक्षक सिद्ध हुए |

ज्योतिबा फुले जी अब न तो माली थे, न शूद्र और न मात्र व्यक्ति | अब वे भारत की सामाजिक नव क्रांति के प्रतीक बन चुके थे | लेकिन विचित्र था वह धर्म और अनोखी थी यहाँ की वर्ण व्यवस्था कि समाज की सेवा करने वाले मनुष्य को शूद्र कहकर अत्याचारों और अपमानों का हल उनकी छाती पर चलाया जाता था | ज्योतिबा जी ने सभी को चुनौती देते हुए शिक्षा के द्वार सभी के लिए खोल दिए, ज्योतिबा जी ने शूद्र और नारी उद्धार के लिए शिक्षा पर ही विशेष बल दिया |

समाज में नयी चेतना के उदय होने पर भी ब्राह्मण अपना पुराना राग अलाप रहे थे। वे डर रहे थे कि यदि स्त्री और शूद्र शिक्षित हो गए तो समाज से उनका एकाधिपत्य और जातीय वर्चस्व ख़त्म हो जाएगा।

काफी हिन्दू ईसाई हो चुके थे लेकिन ज्योतिबा फुले जी ने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया। उनका मानना था कि हिन्दू धर्म में रहकर ही उसकी कुरीतियों को दूर किया जा सकता है और उसका स्वरुप बदला जा सकता है। ईसाई धर्म का द्वार सबके लिए खुला था लेकिन हिन्दू धर्म का द्वार हिन्दुओं के लिए ही बंद था। अनेक प्रतिष्ठित लोगों ने हिन्दू धर्म को त्याग कर ईसाई धर्म को धारण कर लिया। उन दिनों हिन्दू समाज में एक अजीब सा सूना पन छा गया। ब्राह्मणों की जड़ता, अहंकार, छुआ-छूत का भाव तथा अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने के अहंकार ने हिन्दू धर्म को बर्बाद कर दिया, और हिन्दुओं की संख्या घटती चली गयी।

ज्योतिबा फुले की यह शूद्र तथा नारी शिक्षा की सफल योजना पूना के उच्च वर्ग के लोगों के आँखों की किरकिरी बन गयी थी। ज्योतिबा जी के कुछ चुने हुए ब्राह्मण मित्र थे जो हर प्रकार का खतरा उठाकर कर ज्योतिबा जी की हर संभव मदद करते थे। महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक ज्योतिबा फुले जी ने जब देख लिया कि छोटी जातियां और स्त्रियों की शिक्षा पूना ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण महाराष्ट्र में व्यवस्थित रूप से चलने लगी तो उन्होंने समाज सुधार के दूसरे पटल पर अपना ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया।

1840 में महाराष्ट्र में विधवा विवाह का प्रचार प्रारम्भ हुआ। ज्योतिबा जी विधवाओं की स्थिति देखकर बहुत ही दुखी थे, पति के बाद उन्हें एकाकी जीवन जीना पड़ता था और उनका समाज से कोई लेना-देना नहीं रह जाता था। न ही वो किसी मांगलिक कार्यक्रम में जा सकती थी। ज्योतिबा जी विधवा नारी के उद्धार का कार्यक्रम बनाया। ज्योतिबा जी की देखरेख में 8 मार्च 1860 में एक विधवा युवती का विवाह कराया गया। ज्योतिबा जी के इस प्रयास से एक नयी क्रांति का उदय हुआ | स्त्रियों को एक नया जीवन मिल गया।

उन्ही दिनों ज्योतिबा फुले जी के पिता गोविन्द राव रोगग्रस्त हो गए। वे अपने दूसरे पुत्र राजाराम के साथ रहते थे। उनके दूसरे पुत्र ही उनकी सारी सम्पति की देख-रेख करते थे। ज्योतिबा फुले जी के पिता को सबसे ज्यादा यह चिंता थी कि ज्योतिबा जी की कोई संतान नहीं थी इसलिए उन्होंने ज्योतिबा फुले को बुलाकर दूसरी शादी का प्रस्ताव रखा लेकिन ज्योतिबा जी इसके लिए तैयार नहीं हुए। ज्योतिबा जी की पत्नी सावित्रीबाई फुले ने कदम-कदम पर उनका साथ दिया तो वे भला दूसरे विवाह की कैसे सोंच सकते थे उन्हें पता था कि इससे अच्छा जीवन साथी और कोई नहीं हो सकता। कुछ समय पश्चात उनके पिता का निधन हो गया।

ज्योतिबा जी महाराष्ट्र के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने शिवाजी के पराक्रम, साहस और कुशलता पर गीत लिखे | उन्होंने शिवाजी के महान आदर्शों का वर्णन किया।

पंद्रह वर्ष के लगातार संघर्ष के पश्चात ज्योतिबा जी ने अनुभव किया कि उनके विचार, सिद्धांतों एवं आदर्शों के लिए एक ऐसा मंच और संस्था की आवश्यकता है। जिसके माध्यम से छोटे वर्गों को समाज के समान धरातल पर लाने के लिए भरपूर प्रयास किया जाए। अभी तक वह पुस्तकों, पर्चों और भाषणों के द्वारा ही इस कार्य को सम्पादित कर रहे थे। अतः ज्योतिबा जी ने 24 सितम्बर 1873 में अपने सभी हितैषियों, प्रशंसकों तथा अनुयायियों की एक सभा बुलाई। उनसे विचार-विमर्श के बाद तथा ज्योतिबा जी के विचारों से सहमत होते हुए संस्था का गठन कर दिया गया। महात्मा ज्योतिबा फुले जी ने संस्था का नाम दिया “सत्य शोधक समाज।” यहाँ जो अहम बात है जो हमें याद रखना होगा कि उनके तीन ब्राह्मण मित्रों ने विनायक बापूजी भंडारकर, विनायक बापूजी डेंगल तथा सीताराम सखाराम दातार ऐसे थे जिन्होंने सत्यशोधक समाज को हर प्रकार का सहयोग देने का वचन दिया।

जुलाई 1883 में महात्मा ज्योतिबा फुले ने अपनी एक किताब पूरी कर ली। उनकी एक प्रति उन्होंने महाराजा बड़ौदा व एक प्रति गवर्नर जनरल को भेंट की। पुस्तक की प्रस्तावना के प्रारम्भ में ज्योतिबा फुले जी ने लिखा था :-

 

शिक्षा के अभाव में बुद्धि का ह्रास हुआ।

बुद्धि के अभाव में नैतिकता की अवनति हुई।
नैतिकता के अभाव में प्रगति अवरूद्ध हो गयी।
प्रगति के अभाव में शूद्र मिट गए।
सारी विपत्तियों का आविर्भाव निरक्षरता से हुआ।

 

जीवन के अंतिम समय में महात्मा ज्योतिबा फुले जी के शुभ चिंतक यह चाहते थे कि ज्योतिबा का शेष जीवन सुखमय व्यतीत हो, उनको किसी प्रकार की आर्थिक असुविधा न हो। उनके मित्रों ने महाराजा बड़ौदा को एक पत्र लिखा और महात्मा ज्योतिबा फुले जी के जीवन संघर्ष और उनकी सेवाओं का स्मरण दिलाया तथा अनुरोध किया कि ज्योतिबा फुले जी के परिवार को आर्थिक सहायता भेजी जाय। वृहस्पतिवार 27 नवम्बर 1890 को महात्मा ज्योतिबा जी का गिरा हुआ स्वास्थ्य उनके महाप्रयाण का संकेत देने लगा। ज्योतिबा फुले जी ने लगभग शाम 5 बजे अपने परिवार के लोगों को अपनी चारपाई के पास बुलाया। महातम ज्योतिबा फुले जी ने सभी को स्वार्थहीन तथा सात्विक ढंग से अपने कर्तव्यों के पालन का उपदेश दिया। उनके सबके सिर पर हाथ फेरा। अपनी पत्नी सावित्री बाई को बुलाकर अंतिम विदा ली। सावित्री बाई ज्योतिबा की शोक पूर्ण तथा शांत मुद्रा को देख रही थी।

धीरे-धीरे अर्द्ध रात्रि गुज़र गयी। घडी में 2 बजकर 20 मिनट हुआ था ठीक उसी समय महात्मा ज्योतिबा फुले जी चिरनिद्रा में सो गए। शोषितों-पीड़ितों के लिए जिए और उन्ही के लिए मरे। अपना सम्पूर्ण जीवन उन्ही के लिए बलिदान कर दिया। वो भले ही इस संसार को छोड़ कर जा चुके थे लेकिन उनके सिद्धांत व आदर्श आज भी जिन्दा है और हम उनसे प्रेरणा लेते रहेंगे।

महात्मा ज्योतिबा फुले जी के महान कार्यों के ऐतिहासिक महत्व को स्वीकार करके मिस्टर गांधी ने ज्योतिबाफुले जी के प्रति यह कह कर श्रद्धा व्यक्त की थी “ज्योतिबा असली महात्मा थे।” मिस्टर गांधी के उक्त उद्गार 25 नवम्बर 1949 में ‘दीनबन्धु’ नामक पत्र के महात्मा फुले विशेषांक में प्रकाशित हुए थे।

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ज्योतिबा फुले जी की जयंती 11अप्रिल पर विशेष लेख:- भारत की मूलनिवासी जनता का सच्चा इतिहास और गुलामी के कारणों पर प्रकाश डालती महामना ज्योतिबा फुले की पुस्तक ‘गुलामगीरी’ मामूली किताब नहीं, क्रान्तिकारी परिवर्तन का दस्तावेज़ है…नारायण सिंह

gulami_giri_40ज्योतिराव फुले के जन्मदिन 11-April पर विशेष : महात्मा गांधी की किताब हिंद स्वराज की शताब्दी के वर्ष में कई स्तरों पर उस किताब की चर्चा हुई. उसी दौर में मैंने यह लेख लिखा था. आज महात्मा फुले के जन्मदिन के अवसर पर इसे फिर पोस्ट करके मुझे हार्दिक खुशी हो रही है. दरअसल हिंद स्वराज एक ऐसी किताब है, जिसने भारत के सामाजिक राजनीतिक जीवन को बहुत गहराई तक प्रभावित किया। बीसवीं सदी के उथल पुथल भरे भारत के इतिहास में जिन पांच किताबों का सबसे ज़्यादा योगदान है, हिंद स्वराज का नाम उसमें सर्वोपरि है। इसके अलावा जिन चार किताबों ने भारत के राजनीतिक सामाजिक चिंतन को प्रभावित किया उनके नाम हैं, भीमराव अंबेडकर की जाति का विनाश मार्क्‍स और एंगेल्स की कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो, ज्योतिराव फुले की गुलामगिरी और वीडी सावरकर की हिंदुत्व।

अंबेडकर, मार्क्‍स और सावरकर के बारे में तो उनकी राजनीतिक विचारधारा के उत्तराधिकारियों की वजह से हिंदी क्षेत्रों में जानकारी है। क्योंकि मार्क्‍स का दर्शन कम्युनिस्ट पार्टी का, सावरकर का दर्शन बीजेपी का और अंबेडकर का दर्शन बहुजन  का आधार है लेकिन 19 वीं सदी के क्रांतिकारी चितंक और वर्णव्यवस्था को गंभीर चुनौती देने वाले ज्योतिराव फुले के बारे में जानकारी की कमी है। ज्योतिराव गोविंदराव फुले का जन्म पुणे में हुआ था और उनके पिता पेशवा के राज्य में बहुत सम्माननीय व्यक्ति थे। लेकिन ज्योतिराव फुले अलग किस्म के इंसान थे। उन्होंने दलितों के उत्थान के लिए जो काम किया उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। उनका जन्म 1827 में पुणे में हुआ था, माता पिता संपन्न थे लेकिन महात्मा फुले हमेशा ही गरीबों के पक्षधर बने रहे। उनकी महानता के कुछ खास कार्यों का ज़‍िक्र करना ज़रूरी है।

1848 में शूद्रातिशूद्र लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना कर दी थी। आजकल जिन्हें दलित कहा जाता है, महात्मा फुले के लेखन में उन्हें शूद्रातिशूद्र कहा गया है। 1848 में दलित लड़कियों के लिए स्कूल खोलना अपने आप में एक क्रांतिकारी कदम है। क्योंकि इसके 9 साल बाद बंबई विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। उन्होंने 1848 में ही मार्क्‍स और एंगेल्स ने कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो का प्रकाशन किया था। 1848 में यह स्कूल खोलकर महात्मा फुले ने उस वक्त के समाज के ठेकेदारों को नाराज़ कर दिया था। उनके अपने पिता गोविंदराव जी भी उस वक्त के सामंती समाज के बहुत ही महत्वपूर्ण व्यक्ति थे। दलित लड़कियों के स्कूल के मुद्दे पर बहुत झगड़ा हुआ लेकिन ज्योतिराव फुले ने किसी की न सुनी। नतीजतन उन्हें 1849 में घर से निकाल दिया गया। सामाजिक बहिष्कार का जवाब महात्मा फुले ने 1851 में दो और स्कूल खोलकर दिया। जब 1868 में उनके पिताजी की मृत्यु हो गयी तो उन्होंने अपने परिवार के पीने के पानी वाले तालाब को अछूतों के लिए खोल दिया। 1873 में महात्मा फुले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की और इसी साल उनकी पुस्तक गुलामगिरी का प्रकाशन हुआ। दोनों ही घटनाओं ने पश्चिमी और दक्षिण भारत के भावी इतिहास और चिंतन को बहुत प्रभावित किया।

महात्मा फुले के चिंतन के केंद्र में मुख्य रूप से धर्म और जाति की अवधारणा है। वे कभी भी हिंदू धर्म शब्द का प्रयोग नहीं करते। वे उसे ब्राह्मणवाद के नाम से ही संबोधित करते हैं। उनका विश्वास था कि अपने एकाधिकार को स्थापित किये रहने के उद्देश्य से ही ब्राह्मणों ने श्रुति और स्मृति का आविष्कार किया था। इन्हीं ग्रंथों के जरिये ब्राह्मणों ने वर्ण व्यवस्था को दैवी रूप देने की कोशिश की। महात्मा फुले ने इस विचारधारा को पूरी तरह ख़ारिज़ कर दिया। फुले को विश्वास था कि ब्राह्मणवाद एक ऐसी धार्मिक व्यवस्था थी, जो ब्राह्मणों की प्रभुता की उच्चता को बौद्घिक और तार्किक आधार देने के लिए बनायी गयी थी। उनका हमला ब्राह्मण वर्चस्ववादी दर्शन पर होता था। उनका कहना था कि ब्राह्मणवाद के इतिहास पर गौर करें तो समझ में आ जाएगा कि यह शोषण करने के उद्देश्य से हजारों वर्षों में विकसित की गयी व्यवस्था है। इसमें कुछ भी पवित्र या दैवी नहीं है। न्याय शास्त्र में सत की जानकारी के लिए जिन 16 तरकीबों का वर्णन किया गया है, वितंडा उसमें से एक है। महात्मा फुले ने इसी वितंडा का सहारा लेकर ब्राह्मणवादी वर्चस्व को समाप्त करने की लड़ाई लड़ी। उन्होंने अवतार कल्पना का भी विरोध किया। उन्होंने विष्णु के विभिन्न अवतारों का बहुत ही ज़ोरदार विरोध किया। कई बार उनका विरोध ऐतिहासिक या तार्किक कसौटी पर खरा नहीं उतरता लेकिन उनकी कोशिश थी कि ब्राह्मणवाद ने जो कुछ भी पवित्र या दैवी कह कर प्रचारित कर रखा है उसका विनाश किया जाना चाहिए। उनकी धारणा थी कि उसके बाद ही न्याय पर आधारित व्यवस्था कायम की जा सकेगी। ब्राह्मणवादी धर्म के ईश्वर और आर्यों की उत्पत्ति के बारे में उनके विचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि यह ध्यान में रखा जाए कि महात्मा फुले इतिहास नहीं लिख रहे थे। वे सामाजिक न्याय और समरसता के युद्घ की भावी सेनाओं के लिए बीजक लिख रहे थे।

महात्मा फुले ने कर्म विपाक के सिद्धांत को भी ख़ारिज़ कर दिया था, जिसमें जन्म जन्मांतर के पाप पुण्य का हिसाब रखा जाता है। उनका कहना था कि यह सोच जाति व्यवस्था को बढ़ावा देती है इसलिए इसे फौरन ख़ारिज़ किया जाना चाहिए। फुले के लेखन में कहीं भी पुनर्जन्म की बात का खंडन या मंडन नहीं किया गया है। यह अजीब लगता है क्योंकि पुनर्जन्म का आधार तो कर्म विपाक ही है। महात्मा फुले ने जाति को उत्पादन के एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करने और ब्राह्मणों के आधिपत्य को स्थापित करने की एक विधा के रूप में देखा। उनके हिसाब से जाति भारतीय समाज की बुनियाद का काम भी करती थी और उसके ऊपर बने ढांचे का भी। उन्होंने शूद्रातिशूद्र राजा, बालिराज और विष्णु के वामनावतार के संघर्ष का बार-बार ज़‍िक्र किया है। ऐसा लगता है कि उनके अंदर यह क्षमता थी कि वह सारे इतिहास की व्याख्या बालि राज-वामन संघर्ष के संदर्भ में कर सकते थे। स्थापित व्यवस्था के खिलाफ महात्मा फुले के हमले बहुत ही ज़बरदस्त थे। वे एक मिशन को ध्यान में रखकर काम कर रहे थे। उन्होंने इस बात के भी सूत्र दिये, जिसके आधार पर शूद्रातिशूद्रों का अपना धर्म चल सके। वे एक क्रांतिकारी सामाजिक परिवर्तन की बात कर रहे थे। ब्राह्मणवाद के चातुर्वर्ण्‍य व्यवस्था को उन्होंने ख़ारिज़ किया, ऋग्वेद के पुरुष सूक्त का, जिसके आधार पर वर्णव्यवस्था की स्थापना हुई थी, को फर्ज़ी बताया और द्वैवर्णिक व्यवस्था की बात की।

महात्मा फुले एक समतामूलक और न्याय पर आधारित समाज की बात कर रहे थे इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में किसानों और खेतिहर मजदूरों के लिए विस्तृत योजना का उल्लेख किया है। पशुपालन, खेती, सिंचाई व्यवस्था सबके बारे में उन्होंने विस्तार से लिखा है। गरीबों के बच्चों की शिक्षा पर उन्होंने बहुत ज़ोर दिया। उन्होंने आज के 150 साल पहले कृषि शिक्षा के लिए विद्यालयों की स्थापना की बात की। जानकार बताते हैं कि 1875 में पुणे और अहमदनगर जिलों का जो किसानों का आंदोलन था, वह महात्मा फुले की प्रेरणा से ही हुआ था। इस दौर के समाज सुधारकों में किसानों के बारे में विस्तार से सोच-विचार करने का रिवाज़ नहीं था लेकिन महात्मा फुले ने इस सबको अपने आंदोलन का हिस्सा बनाया। स्त्रियों के बारे में महात्मा फुले के विचार क्रांतिकारी थे। मनु की व्यवस्था में सभी वर्णों की औरतें शूद्र वाली श्रेणी में गिनी गयी थीं। लेकिन फुले ने स्त्री पुरुष को बराबर समझा। उन्होंने औरतों की आर्य भट्ट यानी ब्राह्मणवादी व्याख्या को ग़लत बताया।

फुले ने विवाह प्रथा में बड़े सुधार की बात की। प्रचलित विवाह प्रथा के कर्मकांड में स्त्री को पुरुष के अधीन माना जाता था लेकिन महात्मा फुले का दर्शन हर स्तर पर गैरबराबरी का विरोध करता था। इसीलिए उन्होंने पंडिता रमाबाई के समर्थन में लोगों को लामबंद किया, जब उन्होंने धर्म परिवर्तन किया और ईसाई बन गयीं। वे धर्म परिवर्तन के समर्थक नहीं थे लेकिन महिला द्वारा अपने फ़ैसले खुद लेने के सैद्घांतिक पक्ष का उन्होंने समर्थन किया। महात्मा फुले की किताब गुलामगिरी बहुत कम पृष्ठों की एक किताब है, लेकिन इसमें बताये गये विचारों के आधार पर पश्चिमी और दक्षिणी भारत में बहुत सारे आंदोलन चले। उत्तर प्रदेश में चल रही दलित अस्मिता की लड़ाई के बहुत सारे सूत्र गुलामगिरी में ढूंढ़े जा सकते है। आधुनिक भारत महात्मा फुले जैसी क्रांतिकारी विचारक का आभारी है।

लेखक शेष नारायण सिंह वरिष् पत्रकार और स्तम्भकार हैं. वे एनडीटीवी, सहारा, जनसंदेश टाइम् समेत कई संस्थानों में काम कर चुके हैं. इनदिनों हिंदी दैनिक देशबंधु के साथ जुड़े हुए हैंsource:  http://news.bhadas4media.com/yeduniya/1118-2012-04-12-04-38-17

 

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