बाबा साहब डॉ भीम राव आंबेडकर के 125वि जयंती पर समयबुद्धा की विशेष धम्म देशना :- “कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं “…समयबुद्धा



dalit to baudh
dalit tyagoकोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं

इससे पहले की हम जाने की कोई व्यक्ति या कौम दलित कैसे बनते हैं, हमको दलित शब्द का सही मतलब समझना होगा|बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के निम्न शब्द पढ़ो:

“गाँवों में जिस प्रकार महार-चमार-मांग-भंगी के भी दो ही चार मकान होते हैं उसी प्रकार मुसलमानों के भी दो चार माकन होते हैं लेकिन उन मुसलामानों को कोई छेड़ता नहीं है. उन पर कोई अत्याचार करने का धैर्य नहीं करता है. लेकिन आप (अछुतों – शूद्रों पर) पर अत्याचार सदा ही होता रहता है और हिन्दू आप पर अत्याचार करना अपना धर्म समझते हैं. इसका कारण यह है की मुसलमानों के घरों के पीछे भारत का सारा मुसलमान समाज है. इस सचाई को हर हिन्दू समझता हैं और आपके सम्बन्ध में हिन्दुओं को पूर्ण विश्वास है की आप पर अत्याचार करने पर आपकी सहायता कोई भी नहीं करेगा. आपकी असमर्थता और निस्सहायता के कारण ही आप पर हिन्दू लोग अत्याचार करने का दुसहास करते हैं.” – डॉ. बी आर अम्बेडकर (३० – ३१ मई , १९३९ बम्बई)”

दलित का मतलब है ऐसे लोग जिनका दमन होता हो, जिनको हिस्सेदारी न्याय और सम्मान न मिलता हो|ये असल में एक व्यक्ति की नहीं एक कौमी बीमारी है,आप दोगे तो पाओगे की  दलितों में ही कई शिक्षित समझदार और सक्षम लोग मिल जायेंगे पर फिर भी वे दलित हैं,, जानते हैं क्यों क्योंकि उनकी कौम दलित है| दलित हर देश में होते हैं, दलित वही हो जाते हैं जो राजनीतिक रूप से दबाए सताए गए होते हैं|दलित वही है जिसपर अत्याचार करने से अत्याचार करने वाले को कोई सजा न मिले, या अगर मिले भी तो नाममात्र को, मतलब दलित पैदा ही लूटने और अत्याचार सहने के लिए होता है|ज्यादा समझने के लिए जरा उन ख़बरों और तस्वीरों को देखों जिनमे इन लोगों के धन, धंधा और धरती को जबरन छीना हो,बिना पेमेंट के गुलामी करवाना, मारे काटे कुचले लोगों की लाशें, पूरा गांव जला देना, छोटे बच्चों को उछाल के भले पर नाथ लेना, महिलाओं के साथ दुष्कर्म कर मार डालना, कभी देखी है ऐसी महिला की लाश जिसकी आँखें  फटी हो हो,जान जाटव वक़्त चेीख के कारन मुंह खुल होता है जो मरने के बाद भी यथावत गुजरे जुल्म की चुगली करता है|इतना ही नहीं फिर इन सब जुल्म को करने वालों को सजा न होना और बाईजत बच निकलना|

यही है दलितपन और इसका इलाज है बुद्ध और डॉ आंबेडकर द्वारा दिया गया ज्ञान है, उनकी तस्वीर और मूर्ती की पूजा नहीं,इनकी तस्वीर और मूर्ती केवल आपलो उनको याद रखने और उनको समझने का इशारा मात्र है|  

  • दलित बनने के लिए सबसे पहले शर्त है की दगाबाज़ होना, वक़्त पड़ने पर अपने भाईओं या अपनी कौम को दगा देना|

मैं बहुत रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पंहुचा हूँ की दगाबाजी ही दलितपन का पहला कारन है,इसी बात पर मैंने दलित सूत्र बनाया है जो कहता है “दगा देने से दलित बनते हैं और दलित बनने से दमन होता है”| बुजुर्गों की कहावत है “दगा किसी का सागा नहीं, न मानो तो कर देखो, किया है जिन्होंने भी दगा आज जाके उनके घर देखो”| भारत के मूलनिवासी कौमों के इतिहास की समीक्षा में आप पाओगे की विरोधी में कभी सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं हुई, ये सदा ही अपने ही किसी विभीषण जैसे दगाबाज भाई के धोखे के कारन परास्त होते आये हैं, इसीलिए दलित बने और हमारे घरों की दुर्दशा हुई, कौम को दगा देने से बड़ा गुनाह और कोई नहीं|दलित भाई चारा, टीम वर्क, संगठन, पे बैक तो सोसाइटी, कौमी एकता, जैसी तथ्यों से बेखबर रहता है और इसीलिए इतनी अधिक आबादी होने के बावजूद अलग अलग सब पीटते, बेइज्जत और मरते रहते हैं| दलित वही है जो पिट जायेगा मर जायेगा बेइज़्ज़ती सह लगा पर अपने भाइयों या कौम के साथ मिल कर नहीं चलेगा|

 

  • दलित होने का दूसरा सबसे बड़ा कारन है इतिहास में युद्द में हुए कोई हार जिसके परनाम स्वरुप सब धन धरती ज्ञान और इतिहास छीन लिया गया हो|

सभी प्रकार के अधिकार खासकर की शिक्षा लेने का अधिकार, संगठन बनने का अधिकार,हथियार और शक्ति बढ़ने का अधिकार, अपना इतिहास के प्रचार प्रसार का अधिकार अदि छीन लिए गए हों| राजनयिक उपेक्षा मतलब देश के शाशक न्य न देना चाहता हो ये  दूसरा सबसे बड़ा कारन है किसी भी कौम को दलित बने के लिए| किसी भी युद्ध में हार का कारणों में सबसे बड़ा कारन होता है कोई अपना ही भाई दगाबाजी करे| इसीलिए दलित सूत्र कहता है की दगाबाजी ही दलित बनने का सबसे पहला कारन है|

दलित बनने के लिए व्यक्तिगत कारन जैसे निकम्मापन,अपने समाज के इत्थं के मिशन में भाग न लेना, मिशन की बातों पर ध्यान न देना |हमारे समाज के लोग, बड़े बुजुर्ग  अक्सर हमको कुछ सामाजिक बातें बताना चाहते हैं, पर हमारे समाज का अनपढ़ वर्ग उसे समझ नहीं पता और शिक्षित वर्ग अहंकारवश उनकी सुने बिना ही खारिज कर देता है| वहीँ दूसरी तरफ अगर ब्राह्मणवादी अपने लोगों को कोई बात बताये तो तुरंत उनके कान खड़े हो जाते है और वो ध्यान से सुनता है फिर अपने विवेक से फैसला करता है की उस बात को छोड़ना है की अपनाना है, इसीलिए ये लोग जीतते आये हैं|जब मैंने इस बात पर गौर किया तब मैं समझ पा रहा हूँ क्यों सदियों पहले गौतम बुद्ध ने कहा था “दुःख की शुरुआत ध्यान न देने से और सुख की शुरुआत ध्यान से होती है”|

  • जिस क्षण कोई भी व्यक्ति या कौम “संतुस्ट” हो जाती है और अपनी स्तिथि को बदलने/सुधारने  के लिए संगर्ष करना छोड़ देते हैं उसी क्षण से उनका दलित बनने की प्रक्रिया शीरी हो जाती है|
  • दलित बने रहने का कारन है अपना इतिहास और महापुरुष को न जानना न मानना:

दलितों की अहसान फरामोशी इनके पतन का एकमुख्य कारन है:दलितों को कोई समझने जाता है तो ये लोग सबसे पहले अपने समझाने वाले को समझने को तैयार नहीं होते उसे शक की नज़र से देखते हैं,इन्हीं में से कुछ लोग उस समझाने वाले की शिकायत कर देते हैं, इतना ही नहीं चुगली कर मरवा डालते हैं|खलील जिब्रान की एक कहानी में उन्होंने लिखा है कि “मैंने जंगल में रहने वाले एक फ़कीर से पूछा कि आप इस बीमार मानवता का इलाज क्यों नहीं करते . तो उस फ़कीर ने कहा कि… तुम्हारी यह मानव सभ्यता उस बीमार की तरह है जो चादर ओढ़ कर दर्द से कराहने का अभिनय तो करता है. पर जब कोई आकर इसका इलाज करने के लिये इसकी नब्ज देखता है तो यह चादर के नीचे से दूसरा हाथ निकाल कर अपना इलाज करने वाले की गर्दन मरोड़ कर अपने वैद्य को मार डालता है और फिर से चादर ओढ़ कर कराहने का अभिनय करने लगता है|धार्मिक, जातीय घृणा, रंगभेद और नस्लभेद से बीमार इस मानवता का इलाज करने की कोशिश करने वालों को पहले तो हम मार डालते हैं . उनके मरने के बाद हम उन्हें पूजने का नाटक करने लगते हैं”

दलित इतिहास जानना: भारत के दलितों/पिछड़ों को अपना इतिहास जानना आवश्यक है।जब तक ये लोग अपना इतिहास नहीं जानेगें तब तक इनमें आपसी प्रेम -भाव पैदा नहीं होगा।दलित  वही है जो समझना न चाहे अपने महापुरुषों को जानना न चाहे, उल्टा अपने पूर्वजों के हत्यारों की पूजा करे|कुछ दलित मन्दिरबाजी से छूटे तो गुरुबाजी,सत्संगबाजी करने लगे हैं,उनको जब अम्बेडकर और बुद्ध के बारे में बताओ, तो वो गुरुज्ञान,लोक-परलोग की बातें झाडते हैं,कहते हैं की ये राजनैतिक बातें इसी जन्म तक हैं|हमारे गुरूजी तो जन्म मरण से छुटकारा दिल देंगे|कहते हैं हम राजनीती से दूर हैं पर गुरु जी के कहने पर वोट दे देते हैं|चलो माना सत्संगी गुरु मरने के बाद प्लानिंग हेतु ठीक होंगे,आपकी आस्था का सम्मान करते हैं,पर जिंदगी रहते जैसे शिक्षा,धन,शादी,बच्चे जरूरी है वैसे ही भारत में आज़ादी हेतु अम्बेडकरवाद बुद्धवाद जरूरी है,आजादी खोने का मतलब और कीमत है डाली बन जाना और फिर वो सब झेलना जो सुनने बोलने में ही दिल दहल जाता है|

मैं तब हैरान हो जाता हूँ जब भारत के मूलनिवासी लोग जो कभी बौद्ध थे आज वो खुद को गर्व से दलित कहते हैं|जब भगवन बुद्धा ने हमको बहुजन और श्रमण कहा जब साहब कांशीराम ने हमें बहुजन बनाने को कहा, जब बाबा साहब ने कभी हमें दलित नहीं कहा, तो फिर हमारे लोग अपने लिए विरोधियों का दिया हुआ नाम दलित क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं|ज्ञात हो कि शूद्र ,अछूत,राक्षश की तरह “दलित” शब्द भी धम्म विरोधियों द्वारा फैलाया गया भ्रामक जाल है जो भारतीय बहुजनों की इस पीढ़ी और आने वाली पीढयों को मानसिक रूप से कमजोर बनाये रखेगा। दलित शब्द कलंक है इसे त्यागो,अपने लिए ऐसे सम्भोधन चुनो जो आपकी शक्ति दिखाए कमजोरी नहीं| दलित शब्द कमजोरी बताता है,खुद को बौद्ध कहो और गौरवशाली विजेता बौद्ध इतिहास से जोड़ो |खुद को बहुजन कहो, बहुजन शब्द जनसंक्या बल दर्शाता है जिसमें सभी 6000 जातियां में बटे भारतीय लोग आते हैं| इज्ज़त मांगी नहीं जाती कमाई जाती है,जब तुम अपनी इज्ज़त खुद करोगे तभी तो दुनिया भी करेगी|जो कौम अपना नाम भी खुद नहीं रख सकती विरोधियों का दिया कलंकित नाम “दलित” को ढो रही है वो उन मनुवादियों से क्या मुकाबला करेगी जो सदियों से संगर्ष/ षडियंत्र  कर रहे हैं|

ये जो दलितपन है ये किसी क्रांति से ही दूर हो सकता है, पर इतना सहने के बात भी इन शूद्र बन दिए गए इंसानों से कभी क्रांति क्यों नहीं की, इस विषय पर ओशो रजनीश के व्याख्यान का ये हिस्सा देखे

“ गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया वो शहर के बाहर रहता है वो शहर के अंदर नहीं रह सकता.गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है और राजा के पास अपने कुँए है ही। अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है. वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है |उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है|“इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी  कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा| तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं. और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथकुछ औरभी चाहिए. ये जोकुछ औरऔर है यही तो बुद्धि हो जाता है,बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है| लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि  इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी  वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं|” … ओशो रजनीश. Book Title: The Last Testament, Vol. 2.       //  Chapter 6: The Intelligent Way

हमारे गांव में एक कहावत है “मूर्खों के गांव नहीं बसा करते”, जब दलितों को बस्ती जलती है,नरसंघार होता है तब ये कहावत याद आती है और याद आता है इन दलितों का विशेषकर पढ़े लिखे दलितों का की वो अम्बेडकरवाद/बुद्धवाद को छोड़ मन्दिरबजी, देविदेवतबजी करना, शिक्षा और ज्ञान की जगह नशा,मौज और निकम्मापन, संगठन की जगह अपनी कौम को दगा देना,और फिर रोना की इनके साथ जुल्म होता है| इसीलिए डॉ आंबेडकर ने कहा है की “जुल्म करने वाले से सहने वाला ज्यादा गुनहगार होता है”

सवर्णों और दलितों में जो सबसे बड़ा फर्क मुझे समझ में आया वो ये है की जैसे ही सुख के दिन आते हैं दलित अपने समाज और संगर्ष को छोड़ देता है जबकि सवर्ण इसके उलट जितना संपन्न होता जाता है उतना ही संगर्ष और अपने समाज के उत्थान के लिए समर्पित होता जाता है| हमारे सक्षम वर्ग को ये समझना होगा की अम्बेडकरवाद संगर्ष के चलते उनकी जिन्दगी में आज जो सम्पन्नता आई है उससे अर्जित ज्ञान,धन और समय का ५% हिस्सा इसी संगर्ष पर खर्च करना होगा वरना वो नीं दूर नहीं ये ५% बचने के चक्कर में पूरा १०० % छीनने वाले का सामना अकेले करना पड़ेगा| मैं अपनी बात को बाबा साहब डॉ अम्बेडकर के निम कथन से समाप्त करना चाहूंगा:

“वही कौम तरक्की करती है जिस कौम में क़ुरबानी देने और लेने की जज्स्बा और क्षमता होती है|” …..बाबा साहेब डॉ भीम राव अम्बेडकर

 

 

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