बुद्ध पूर्णिमा ~ 21 मई 2016 पर विश्वगुरु तथागत बुद्ध से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य

Buddha-Jayanti-18बुद्ध पूर्णिमा ~ 21 मई 2016 पर विश्वगुरु तथागत बुद्ध से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य …..
•••••~•••••~••••••••••~•••••~•••••
✔ 2569 वीं बुद्ध पूर्णिमा ~ 79 तथ्य ✔
•••••~•••••~•••••~•••••~•••••~•••••~•••••
1) बौद्ध धम्म के संस्थापक ~ तथागत बुद्ध
2) तथागत बुद्ध का जन्म ~ 563 ईसा पूर्व,
बुद्ध (वैशाख) पूर्णिमा को कपिलवस्तु की
लुम्बिनी नामक स्थान पर हुआ |
3) बुद्ध किस वंश से थे ~ शाक्य वंश
4) बुद्ध के पिता का नाम ~ शुद्धोधन
5) बुद्ध की माता का नाम ~ महामाया
6) बुद्ध के बचपन का नाम ~ सिद्धार्थ
7) सिद्धार्थ का पालन -पोषण किया था ~
प्रजापति गौतमी (सिद्धार्थ की मौसी)
8) बुद्ध के पिता राजा शुद्धोधन मुखिया थे ~
शाक्य गणराज्य के
9) बुद्ध की माँ महामाया किस वंश से संबंधित
थीं ~ कोलिय वंश
10) बुद्ध की पत्नी का नाम ~ यशोधरा / गोपा
/ बिम्बा / भद्कच्छना
11) बुद्ध के पुत्र का नाम ~ राहुल
12) बुद्ध ने किस अवस्था में गृह त्याग किया
था ~ 29 वर्ष
13) गृह त्याग की घटना क्या कहलाती है ~
महाभिनिष्क्रमण
14) बुद्ध के घोड़े का नाम ~ कन्थक
15) बुद्ध के सारथी का नाम ~ चन्ना (छन्दक)
16) सिद्धार्थ जब कपिलवस्तु की सैर पर
निकले तो उन्होंने चार दृश्य क्या देखा था ~
• बूढ़ा व्यक्ति • बीमार व्यक्ति • शव • संन्यासी
17) वे संन्यासी जिनसे गृहत्याग के बाद बुद्ध
की मुलाकात हुई ~ आलार कालाम और
रूद्रक रामपुत्त
18) उरूवेला (बोधगया) में मिलने वाले पाँच
साधको के नाम ~ कौंडिन्य, वप्प, भद्दिय,
महानाम, अस्सागी
19) ज्ञान प्राप्ति से पहले किसने बुद्ध को खीर
खिलाया था ~ सुजाता
20) 35 वर्ष की आयु में बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति
कहाँ पर हुई थी ~ बोधगया [ फल्गु (निरंजना)
नदी के तट पर उरूवेला (बोधगया) नामक
स्थान पर ]
21) जिस वृक्ष के नीचे बुद्ध को ज्ञान प्राप्त
हुआ, कहलाता है ~ बोधिवृक्ष (पीपल)
22) बुद्ध ने प्रथम उपदेश कहाँ दिया ~ रिषिपत्तन (सारनाथ)
23) बुद्ध के प्रथम उपदेश को क्या कहा गया
~ धर्मचक्र प्रवर्तन
24) बुद्ध ने अपने उपदेश किस भाषा में दिए
~ पालि भाषा (धम्म लिपि)
25) बुद्ध का अर्थ है ~ ज्ञान, जागा हुआ या
ज्ञानी
26) एशिया का ज्योतिपुंज (Light of Asia)
किसे कहा जाता है ~ तथागत बुद्ध
27) तथागत का अर्थ ~ सत्य है ज्ञान जिसका
अर्थात बुद्ध
28) वह दिन जिस दिन तथागत बुद्ध को ज्ञान
प्राप्त हुआ था ~ बुद्ध (वैशाख) पूर्णिमा
29) वह स्थान जहाँ बुद्ध ने सर्वाधिक उपदेश
दिया ~ श्रावस्ती
30) 80 वर्ष की अवस्था में बुद्ध की मृत्यु कहाँ
पर हुई थी ~ कुशीनगर में
31) बुद्ध की मृत्यु कब हुई थी ~ 483 ईसा
पूर्व, बुद्ध (वैशाख) पूर्णिमा
32) बुद्ध की मृत्यु की घटना क्या कहलाता है
~ महापरिनिर्वाण
33) निर्वाण ~ तृष्णा के क्षीण होने की
अवस्था को ही बुद्ध ने निर्वाण कहा है
34) बौद्धों का पवित्र ग्रंथ ~ त्रिपिटक
35) त्रिपिटक के भाग ~
• सुत्तपिटक ~ बुद्ध के धार्मिक विचारों व
उपदेशों का संग्रह (बौद्ध धम्म के सिद्धांत)
• विनयपिटक ~ बौद्ध संघ के नियमों व
अनुशासन की व्याख्या
• अभिधम्म पिटक ~ बौद्ध मतों की दार्शनिक
व्याख्या (बौद्ध दर्शन)
36) पिटक शब्द का अर्थ ~ टोकरी, पेटी या
पिटारा
37) सुत्त पिटक के निकाय ~ दीघ, मज्झिम,
संयुक्त, अंगुत्तर, खुद्दक
38) बुद्ध के जीवन के अंतिम क्षणों का वर्णन
मिलता है ~ महापरिनिब्बानसूत्त (सबसे प्राचीन ग्रंथ)
39) चतुर्थ बौद्ध संगीति में बौद्ध धम्म दो भागों
में बँट गया ~
• हीनयान (थेरवाद) ~ जो बुद्ध के दिए हुए
सिद्धांत व दर्शन को ज्यों का त्यों मानते हैं
• महायान ~ जो बुद्ध के दिए हुए सिद्धांत व
दर्शन में परिवर्तन करके मानते हैं |
40) बौद्ध धम्म के त्रिरत्न ~ बुद्ध, धम्म, संघ
41) बुद्ध के अनुयायी शासक जो उनके
समकालीन थे ~ बिम्बिसार, प्रसेनजित, उदयन
42) त्रिपिटक की भाषा है ~ पालि भाषा
43) बौद्ध धम्म ग्रहण करने वाली प्रथम महिला
~ महाप्रजापति गौतमी
44) वह स्थान जहाँ बुद्ध वर्षा के मौसम में
प्रवास करते थे ~ बेलुवन और जेतवन
45) जेतवन को किसने बुद्ध के लिए दान
किया था ~ अनाथपिण्डक
46) त्रिपिटक का वह भाग जिसका संकलन
प्रथम बौद्ध संगीति में हुआ था ~ सुत्तपिटक और विनयपिटक
47) बुद्ध का परिनिर्वाण किस गणराज्य में
हुआ था ~ मल्ल गणराज्य
48) बुद्ध की प्रथम मूर्ति बनाने का श्रेय किस
कला को दिया जाता है ~ मथुरा कला
49) सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण किस
शैली में हुआ ~ गन्धार शैली
50) धार्मिक जलूस का प्रारंभ सबसे पहले
बौद्ध धम्म के द्वारा प्रारंभ किया गया
51) दु:ख, दु:ख का कारण, दु:ख निरोध, एवं
दु:ख निरोध के मार्ग को बुद्ध ने कहा है ~ चार आर्य सत्य
52) बौद्ध धम्म को भारत में किस शासक ने
अंतिम संरक्षण दिया ~ बंगाल के पाल वंश के शासकों ने
53) बुद्ध ने उपदेश दिया ~ मध्यम मार्ग
54) बौद्ध धम्म के अनुसार महापरिनिर्वाण
संभव है ~ मृत्यु के बाद | जबकि निर्वाण
प्राप्त हो सकता है ~ जीवनकाल में ही
55) कौन सा धर्म आत्मा और ईश्वर के
अस्तित्व को स्वीकार नही करता ~ बौद्ध धम्म
56) बौद्ध धम्म के लिए 84 हजार स्तूपों का
निर्माता कहा जाता है ~ सम्राट अशोक महान को
57) कर्मकांड व पशुबलि का विरोध किया था ~ बुद्ध ने
58) सम्यक दृष्टि, सम्यक वाणी, सम्यक
संकल्प, सम्यक कर्म, सम्यक आजीव, सम्यक
व्यायाम, सम्यक स्मृति, सम्यक समाधि … को
बुद्ध ने कहा है ~ अष्टांगिक मार्ग
59) बुद्ध ने संघ मे स्त्रियों को प्रवेश की
अनुमति दी थी ~ प्रिय शिष्य आनंद के आग्रह पर
60) सम्राट अशोक द्वारा बनवाया हुआ
रूम्मिनदेई स्तंभ बुद्ध के संदर्भ में किसका
सूचक है ~ बुद्ध के जन्म का
61) गौतम बुद्ध द्वारा भिक्षुणी संघ की स्थापना
कहाँ की गई ~ कपिलवस्तु में
62) बुद्ध के जीवन काल में ही कौन संघ
प्रमुख होना चाहता था ~ देवदत्त
63) कुख्यात डाकू अंगुलिमाल को बुद्ध ने कैसे
परास्त किया ~ बातों के प्रभाव से
64) “बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय” किसने
कहा था ~ तथागत बुद्ध ने
65) भारत में सबसे पहले मानव प्रतिमाओं को
पूजा गया वह थी ~ बुद्ध की प्रतिमा
66) प्राचीन विश्व प्रसिद्ध बौद्ध शिक्षा केन्द्र ~
नालन्दा, तक्षशिला, विक्रमशिला
67) धातु के बने सिक्के सबसे पहले प्रकट हुए
थे ~ बुद्ध काल में
68) बुद्ध के उपदेशों का सार एवं सम्पूर्ण
शिक्षाओं का आधार स्तंभ है ~ प्रतीत्य समुत्पाद
69) अर्हत का अर्थ ~ जो व्यक्ति अपनी
साधना से निर्वाण प्राप्त करते हैं
70) बुद्ध ने कभी भी अपने मत को बलात
थोपने का प्रयास नहीं किया | वे कहा करते थे
कि यदि उनकी शिक्षाएँ अच्छी और तर्कसंगत
लगे तभी उन्हें ग्रहण किया जाए |
71) बौद्ध संगीतियाँ ~
• प्रथम ~ 483 ईसा पूर्व — राजगृह (स्थान) —
बिम्बिसार (शासक) — महाकस्सप (अध्यक्ष)
• द्वितीय ~ 383 ईसा पूर्व — वैशाली (स्थान)
— कालाशोक (शासक) — साबाकामी (अध्यक्ष)
• तृतीय ~ 251 ईसा पूर्व — पाटलिपुत्र
(स्थान) — सम्राट अशोक (शासक) — मोग्गलिपुत्त तिस्स (अध्यक्ष)
• चतुर्थ ~ 72 ईसा पूर्व — कुण्डलवन (स्थान)
— कनिष्क (शासक) — वसुमित्र (अध्यक्ष)
72) बुद्ध से जुड़े आठ स्थान जिन्हें बौद्ध ग्रंथों
में “अष्टमहास्थान” कहा गया है ~ लुम्बिनी,
बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, श्रावस्ती,
संकिसा, राजगृह तथा वैशाली
73) बुद्ध के जीवन की चार महत्वपूर्ण घटना
और उनसे सम्बद्ध चार स्थान ~
• जन्म ~ लुम्बिनी • ज्ञान प्राप्ति ~ बोधगया
• प्रथम उपदेश ~ सारनाथ
• परिनिर्वाण (मृत्यु) ~ कुशीनगर
74) तथागत बुद्ध की मृत्यु चुन्द द्वारा अर्पित
भोजन “सूकरमद्दव” खाने के बाद हुआ | कुछ
विद्वानों ने सूकरमद्दव का अर्थ सूअर का मांस
निकाला है, किंतु यह तर्कसंगत नहीं है |
वस्तुतः यह एक वनस्पति / कवक थी जो
सूअर के मांद के पास उगती थी, जैसे कुकुरमुत्ता आदि |
पालि भाषा में ऐसे कई शब्द हैं जिनका प्रथम
अवयव सूअर है, जैसे ~ सूकरकन्द (शकरकन्द),
सूकर -पदिक (सूअर का पैर), सूकरेष्ट (सुअरों द्वारा इच्छित) |
75) बुद्ध के लिए प्रयुक्त अन्य शब्द और नाम
~ विश्वगुरु, तथागत, शाक्यमुनि, शाक्य -सिंह,
शाक्य शिरोमणि, गौतम
76) बुद्ध के जीवन से संबंधित बौद्ध धम्म के प्रतीक चिह्न ~
• जन्म ~ हाथी, कमल, सांढ
• गृह त्याग ~ घोड़ा
• ज्ञान प्राप्ति ~ बोधिवृक्ष (पीपल)
• निर्वाण ~ पदचिह्न
• महापरिनिर्वाण (मृत्यु) ~ स्तूप
77) बौद्ध धम्म के प्रतीक ~
• 563, नमो बुद्धाय , पंचशील ध्वज
• चार आर्य सत्य का चिह्न, तथागत बुद्ध का हाथ
• कमल, पदचिह्न, स्तूप, बोधिवृक्ष (पीपल का पेड़)
• हाथी, घोड़ा, शेर, हिरण, सांढ़, मोर, बाघ
• 32 तिल्लियों वाला चक्र, 24 तिल्लियों
वाला चक्र, 8 तिल्लियों वाला चक्र
• सम्राट अशोक स्तंभ (4 शेर वाला), सिंह
स्तंभ, अश्व (घोड़ा) स्तंभ, सांढ़ स्तंभ, हाथी स्तंभ
78) भारत ने अपने राज्य चिह्न के रूप में बौद्ध
प्रतीकों को ही ग्रहण किया है | जिसके कारण
वह शांति व सह अस्तित्व का पोषक बना हुआ है |
79) बुद्ध पूर्णिमा ~ इस दिन भगवान बुद्ध का जन्म,
ज्ञान प्राप्ति, महापरिनिर्वाण हुआ | इस दिन लोगों को
अपने -अपने घरों में दीपावली की तरह दीप जलाकर
पूरे भारत को प्रकाशित करने का संदेश देना चाहिए |
क्योंकि इस दिन उस महान महापुरूष “विश्वगुरु
तथागत बुद्ध” का जन्म हुआ था जिसके ज्ञान के
प्रकाश से भारत ही नहीं अपितु पूरा विश्व आज भी
प्रकाशित है और हमेशा रहेगा |
नमामि बुद्धा

Advertisements

21-MAY-2016 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-भारत के मूलनिवासियों के दलितीकरण करने से उनमे अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में बेहद कमी आयी थी, जिसके कारन वो अपने हकों के लिए संगर्ष कर पाने में असमर्थ रहे, आज की चर्चा का विषय है बहुजन समाज और स्वास्थ्य के सूत्र

dalit fighter buddhistये जिन्दगी का पहला नियम है की जैसा होगा भोजन वैसे  होंगे तन और मन| सम्यक, संतुलित, और सात्विक आहार शरीर और मन को पुष्ट करता है| तला हुआ चटपटा मसालेदार खाना हाजमे को ख़राब करता है और शरीर को बोझिल बनाता हैकभी कभी तो चल सकता है पर लिमिट से ज्यादा नहीं होना चाहिए|संतुलित और स्वच्छ आहार खाना जिसमें हरी सब्जी फल दूध आदि पर विशेष ध्यान देना, बुरी चीज़े जैसे नशे वाली- ड्रगस शराब सिगरेट आदि , बासी मांस का सेवन हरगिज़ नहीं करना चाहिए|

सामाजिक चर्चा में किसी ने एक बार मुझे पूछा था की हमारे लोगों की शारीरिक बनावट ज्यादा मजबूत नहीं है, तो जब शारीरिक शक्ति से संगर्ष की बात आती है तो पीछे हटना पड़ता है इसका क्या करें? साथियों  इसके जवाब के लिए है की आपको एक उदाहरण देता हूँ-

राष्ट्रपति भवन के उद्यान के सर्व संपन्न माहोल  से एक ही पेड़ के एक से दो पौधे लो, आप ये तो मानेंगे न को दोनों पौधे बड़े अच्छे माहोल से लिए गए हर लिहाज से तंदुरुस्त हैं एक जैसे हैं | इनमें से एक पौधे को उपजाऊ और एक पौधे को बंजर जमीन पर लगाओ, अब ये बताने की जरूरत तो नहीं है की कोन सा पौधा तगड़ा हुआ  कोन सा पौधा कमजोर रहा | साथिओं इस बंजर जमीन के पेड़ जैसी स्तिथि हमारे समाज की रही है ,हमारे समाज को सदियों  से संतुलित और संपूर्ण आहार से वंचित रखा गया,जबकि सवर्णों ने अच्छा आहार और पोषण लिया|यही कारन है की सवर्णों की कद काठी बहुजनों से सवाई होती है| क्षत्रिये ने ताकत के बल पर और वैश्य ने धनबल से और ब्राहमण वर्ग ने गुज़रे समय भी शिक्षा दीक्षा और भिक्षा के मार्ग पर चलकर अपने लिए बेहतरीन आहार की व्यस्था की |ये हम सभी जानते हैं की इस देश में ब्राह्मणों को जिमाने का चलन था और जब लोगों को रोटी तक नसीब नहीं थी तब भी ये अपनी ज्ञान के बदले  मांगने की क्षमता के बल पर अपने लिए हलुआ पूड़ी की व्यस्था कर पाते थे,और इसे कहते हैं “Fittest survives in any conditions” अर्थात किसी भी स्तिथि में योग्य  अपने अस्तित्व को बनाये रखता है |खेर ये पुरानी बात है पर तात्पर्य समझो की कैसी  भी स्तिथि हो बेहतरीन आहार लेने का जुगाड़ करते रहो|

अगर हम संपन इलाके में रहने वाले अपने लोगों की बात करें जैसे शहरों के लोग तो उन्होंने आहार सुरक्षा प्राप्त कर ली है | बहुजन समाज के सक्षम वर्ग की नयी पीढ़ी की सेहत अंपनी खुद की पिछली पीढ़ी से बेहतर है,लम्बाई भी बढ़ी है|पर शहरों में निकल आये समाज के ज्यदातर लोग संतुलित और संपूर्ण आहार जुटाने की क्षमता होते हुए  भी ताकतवर नहीं हो पा रहे हैं| इसका मुख्य कारण है की वे अपने आहार का चुनाव करना नहीं सीखे हैं|

बहुजन समाज के एक बड़े हिस्से के पतन का बड़ा कारन शराब या नशे का चुनाव है| अगर मजदूर वर्ग से शुरू करें तो एक दिन में 300 रुपये कमाने वाला यदि १०० रूपए की शराब पिएगा तो उसके परिवार को बाकी बचे 200 रुपये में जरूरी खर्चे को  काट कर कुछ 80 रूपए के आहार में गुज़ारा करना पड़ेगा,जबकि अगर वो शराब न पिए तो १४० रूपए का आहार तो उसके लिए उपलब्द है, चाहे तो वो बचत भी कर सकता है यही नियम गाँव में भी लागू है हर जगह लागू है |बहुजनों में से कुछ कहते हैं की हमारी स्तिथि बेहतर है हम अपने परिवार को पाल भी लेते हैं बचत भी कर लेते हैं और शराब भी पी लेते हैं| आज के युग में आहार आप 100 रूपए रोज़ शराब में खर्च करते हैं तो हिसाब लगाओ १ महीने में 3000 और एक साल में 36000 की शराब पीते हैं | अगर आप इस धनराशी को बचा पाते तो सोचिये ये आपके कहाँ काम आती, इतना ही नहीं अपने अपनी  सेहत की भी तो सुरक्षा की है,कई तरह की दवाइयों के खर्चे की बचत भी तो जोड़ लो| केवल फायदा ही फायदा है नुक्सान कुछ भी नहीं, इसीलिए अपनी  इस लत से जल्द से जल्द छुटकारा पा लो, अगर नहीं पाओगे तो पतन निश्चित है|

आज पूंजीवाद के इस युग में मीडिया की शक्ति का दुरूपयोग करके भोले भाले  लोगों को शराब की तरफ हर तरह से फुसला लिया है|किसी को ज्ञान का नशा है किसी को शक्ति का तो किसी को अपने धन का नशा है जिसके पपस न ज्ञान है न शक्ति न ही धन है को कृत्रिम नशा कर के खुश होता है| ऐसे लोग समझते हैं की शाराप पी ली तों बहुत रहीसी और शान वाला काम हो गया, पार्टी के नाम पर सिर्फ शराब ही रह गई है| सारा इतिहास भरा पड़ा है की नशे की लत में कितने ही लोग और समाज बर्बाद हुए, इसीलिए महकल्यानकारी  बौद्ध धर्म के अतिविशिस्ट पञ्च शील वचन में से “नशे के सेवन से बच के रहना पहला शील या उसूल है”शराब से भी कई गुना ज्यादा नुक्सान धुम्रपान और तम्बाखू सेवन से होता है, ये चीज़े अगर आप नहीं छोड़ना चाहते तो कम से कम इतना करो की सिगरेट,बीडी,हुका आदि को बिलकुल त्याग दो और शराब को कम पीओ पर अच्छी वाली पीओ और केवल चुनिन्दा मौकों पर ही लो| जो कामयाब और खुशाल है उसकी आदतों पर थोड़ा ध्यान तो दो, ब्राह्मणों की बुराई तो निकाल लेते हो पर ये भी तो देखो की आज भी सक्षम लोगों में जैसे ब्राह्मणों में धन होते हुए भी इन चीज़ों का प्रयोग नहीं होता और जो करने लगे हैं उनका पतन भी हो रहा है |

आप किसी भी दावत में जाओ या रेसटोरेंट में जाओ हर जगह उपलब्ध व्यंजनों में कुछ ज्यादा पौष्टिक व्यंजन होते हैं तो कुछ कम, हमारा जोर ज्यादा पौष्टिक खाने पर होना चाहिए| मैदा वाले जैसे चौमीन की जगह पनीर के व्यंजन,कोल्ड ड्रिंक की जगह लस्सी या जूस | खेर इतना तो हम सभी समझते हैं बस इसे लागू करने की बात है पर इन बातों का जिक्र जरूरी इसलिए था क्योंकि मैं उस वर्ग को समझा सकूं जिसे वाकई इस ज्ञान की जरूरत है|इसका ये मतलब न समझे की चौमीन, कोल्ड ड्रिंक समोसा जैसे चीज़ों की बिलकुल त्याग दो बस इनका प्रयोग कम करो केवल स्वाद तक ही सीमित रखो,और स्वाद का क्या है एक बार लिए बार बार लिया हमेशा एक सी ही अनुभूति होनी है |मेरा एक ब्रह्मण मित्र था उसने मुझे बताया की जब वह पतला था तब खाने में ज्यादा जोर पनीर को दिया था,घर पर खरीद नहीं सकता था तो दावत आदि में खूब पनीर खाया!, इसी तरह एक और  साथी थे वे अपने बड़ते वजन की वजह से कई तरह के चिकने भोजन को त्याग दिया| जिन्दगी का नियम है “आपको वही मिलता है जिसे आप चुनते हो” ,आहार भी एक चुनाव की बात है|

आज पूँजीवाद का दौर है  अर्ताथ कुछ भी हो धन जमा होना चाहिए, ऐसे समय में मिलावट के खाद्य पदार्थ मिलने की बड़ी सम्भावना रहती है, थोडा सचेत रहे  तों काफी हद तक बचा जा सकता है |

मैं ये जनता हूँ की ऐसी ज्ञान की बातें कहने सुनने को रोज ही मिलतीं हैं पर मैं इनके जिक्र से आपमें चुनाव और किस चीज़ को कितनी लिमिट में रखना है ये योग्यता विकसित करना चाहता हूँ|

एक और सवाल जिससे हमारे लोग काफी ग्रसित हैं – क्या हममे  दब्बूपन ज्यादा है ? ये दुष्प्रचार है,ऐसा नहीं है, वीरता धन व राजसत्ता की क्षमता,जगह,मौका,वक़्त और समय पर निर्भर है,जहाँ हम शक्तिहीन हैं  वहाँ तो निभ कर चलना ही पड़ेगा| ये नियम हर वर्ग पर लागू है चाहे वो कितनी भी लड़ाकू कौम  हो, जब चोट लगती है तो दर्द सबको होता है |जिस कौम में क़ुरबानी के बकरे नहीं वाही कौम पिछड जाती है,कुबानी हर कौम को देनी होती है दबंग लोग स्वेच्छा  से लड़ते व क़ुरबानी देते हैं पिछड़े लोग अत्याचार के शिकार होकर क़ुरबानी देने को बाध्य होते हैं|मरना सभी को है तो इससे पहले कोई हमें मार तो उसे ही क्यों नहीं मार देते,फिर जो होगा देखा जायेगा | अगर पिछड़े लोग अत्याचार के विरोध करते हुए क़ुरबानी दे और उसका समाज उस क़ुरबानी की वीर गाथा को पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखे तो आप भी दबंग बन जायेंगे| अपने को क्षत्रिये समझने वाले लोगों ने अपना आत्मबल उचा रखने के लिए बहुत सी वीर गाथाओं को अपने जीवन का हिस्सा बना रखा है,किसी गाथा का उल्लेख यहाँ करना जरूरी नहीं है फिर भी किसी गाथा का छोटा सा हिस्सा देखिये :

बारह वर्ष कुकर जिए पंद्रह वर्ष जिए सियार 

क्षत्रिये जिए २० वर्ष उससे ज्यादा जीना है बेकार 

अब बात आती है की हिम्मत और जस्बे  में पीछे क्यों है? ये बेहद गलत धारणा है और जो इस तरह की बात करे वो केवल हमारा मनोबल गिराने की बात करता है| सवर्ण के दुशप्रचार  और दलित साहित्य में हार और अपमान की बातों की भरमार ने मनोबल गिराया है |हमें अपने समाज के वीरों की गाथा और संगर्ष  कहने सुनने की बेहद जरूरत है जिससे की मनोबल ऊँचा रहे, अपना मनोबल ऊँचा रखने के लिए कुछ भी करो बस इसे न गिरने दो | ऐसी कोई भी सच्ची घटना या कहानी हो तो उसे प्रकाश में जरूर लायें इसके लिए जो जिस स्थर पर हैं वहां उसको प्रचारित करे, कुछ नहीं करना चाहें तो हमें भेज दें |व्यक्तिगत रूप से जज्बे में कमी नहीं है कुछ अपवाद को छोड़कर परन्तु धन बल और सत्ता में हमारी बराबर की भागीदारी न होने के कारण कई मामलों में मन मसोस कर रहना पड़ता है|

जब ये तय है की कानून का दुरूपयोग हमारे खिलाफ ही होना है तो जान बूझ कर आग के कुण्ड में कोन कूदता है, हम सभी जानते हैं की सत्ता सवर्णों की है तो कानून का फायदा भी उन्हीं को होना है| भारत सरकार के तीन स्तंभ हैं न्याय पालिका,कार्य पालिका और नगर पालिका हमारी भागीदारी इनमे नहीं रही है और अभी काफी कम है, हाँ ये ख़ुशी की बात है की अब हमारे समाज के लोगों ने एकजुट  होकर वोट देने का महत्व समझ लिया है और हममे से बहुत से शिक्षित लीडर सामने आये हैं, तो आगे हमारी भागीदारी बढ़ने की उम्मीद है|जैसे जैसे भागीदारी बढेगी वैसे वसे हिम्मत भी बढ़ेगी बस इतना याद रखना की व्यक्तिगत रूप में आपकी चाहे किसी के बारे में कोई भी राय हो पर जब समाज की बात आये तो एकजुट होकर रहना, अपने लीडर में विशवास  मत डिगाना |

मानव सुरक्षा एव विकास  संसथान द्वारा सूचना के अधिकार कानून से जुटाई जानकारी के अनुसार लगभग सारे देश के बेहद सवेदन शील ओहदे  जैसे कलेक्टर,सेक्रेटरी, जज, आदि जो देश की पोलीसी बनाने का काम करते है उसमे हमारा प्रतिनिधित्व एक प्रतिशत से भी कम है|  इसी तरह   यूनीवरसिटी में भी अधिकतम प्राचार्य सवर्ण है | मीडिया की हालत तो अप सभी जानते हैं भगवान बुद्ध के देश में उन्ही के लिए १ टीवी चैनल तक नहीं है तो आम जनता कि आवाज कि क्या कीमत होगी    |  इतना ही नहीं हमारे अपने लोग जब ऊंचे ओहदों पर बैठ जाते हैं तो भी मजोरिटी में न होने की वजह से कुछ खास नहीं कर पाते| पर ये भी एक सुखद सत्य है कि अब हमारे लोग  धीरे धीरे संवेदनशील ओहदों तक पहुँच रहे हैं, समय तो लग सकता है पर अब जब समाज जाग गया है तो बिना दमन नीति के तो इस धारा को वापस मोड़ना संभव नहीं है |

अगर फिर भी आपको लगता है की दब्बूपन  हमारे व्यक्तित्व का ही हिस्सा है तो ये एक नकारात्मक सोच है जो सदियों की गुलामी से हावी हो गई है | पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी की जिन्दगी गुजरने की वजह से हर जाती पीढ़े ने आती पीड़ी को दब के, निभा के चलने की सीख दे की बड़ा किया है|ये गलत है मैं अपने समाज के सभी लोगों से अपील करता हूँ की अपने बच्चे के मन में  किसी का भी डर न बैठाएं हाँ उसे मौके की नजाकत समझना सिखाएं और  मौकापरस्त बनायें,मौकापरस्ती भी एक वीरता है |

एक वैज्ञानिक तथ्य बताता हूँ, जब कोई स्त्री गर्भवती  होती है तो वो जैसा सोचती है जैसे विचार उसके मन में आते हैं वैसे ही भावनाएं बच्चे की भी बनती हैं |आप समझ सकते हैं की दबंग परिवार की स्त्रियाँ गर्भावस्था के दौरान कैसी सोच रखती होंगी और पिछड़े घरों की स्त्रियाँ कैसी सोच रखती होंगी | इसके अलावा बच्चे को पालते हुए  उसे कैसी भावनाए भरते हैं इस पर भी उसकी हिम्मत निर्भर करती है| एक उदाहरण बताता हूँ आपने भी अक्सर देखा होगा जहाँ कहीं भी   वर्जित वस्तुओं को  छूना मना लिखा हो वहाँ दलित माता-पिता अपने बच्चे से कहेंगे  कि “मत छूना कोई मरेगा” जबकि सक्षम समाज के लोग अपने बच्चे से कहेगा “इसको छूना नियम के विरुद्ध है इसलिए इसे मत छुओ”, दोनों बातों से पैदा होने वाली भावनाओं को आप समझ सकते हैं | बच्चे को पाल कर बड़ा करने में अनजाने में ऐसे ही छोटी छोटी बातों में हम उनको मानसिक रूप से कमजोर बना रहे होते हैं, हमें इन बातों पर ध्यान देकर सुधारना होगा| आप अपने आस पास के जानने वालों से ही समझ सकते हैं की जिन लोगों ने गाँव में दबंगी का सामना किया हो और वो शहर निकल आये हों, उसी दब्बू पीढ़ी की अगली और उससे अगली पीड़ी बिलकुल निडर हो गई है |  ये सभी बातें केवल मेहनतियों पर ही लागू हैं,निकम्मों पर लागू नहीं हैं उनका कुछ नहीं हो सकता जब तक वे निकम्मापन और खाली बैठना नहीं छोड़ देते |

बहुजनों  में से अम्बेडकरवादी समाज ने ऐसी बहुत सी शाश्क्तिकरण की बातों का अहसास और सुधार शुरू कर दिया है, बाकि तो आज तक अहसास भी नहीं कर पाए हैं | वे  मंदिरबाज़ी और पुरोहितगिरी से निकलना ही नहीं चाहते अपनी समर्थ को अपने संवर्धन में न लगा कर मंदिर बनवा रहे हैं,कमाल है |  तो साथियों थोडा और सब्र रखो हौसला मत खो, पीढ़ियों की गुलामी से जो जंग लग चुकी थी वो निकलते निकलते ही निकल पायेगी, विश्वास रखो की जो भी मेहनत कर रहे हैं वो पीढ़ी दर पीढ़ी हर द्रिस्टी से सक्षम होते जा रहे हैं | क़ुरबानी के साथ साथ  बाबा साहेब के बताये रास्ते “शिक्षित बनो ,संगठित  रहो, संगर्ष करो” पर चलोगे  तब हमें सर्व श्रेष्ठ बनने से कोई नहीं रोक सकता | शिक्षा, संगठन, संगर्ष, आत्मस्वाभिमान और नैतिक मूल्यों को वरीयता देने वाली  राजस्थान की मीणा जाती और उत्तर प्रदेश की जाटव जाती की उपलब्धियां  इसका जीवंत उदाहरण है |

महामानव गौतम बुद्ध की 2560 जयंती (21 may) पर प्रस्तुत है ये लेख| गौतम बुद्ध वास्तव में कौन हैं, उनकी शिक्षा क्या है, उनका मकसद और उपलब्धि क्या है अदि समझने के लिए उनके बारे में ओशो द्वारा बताई प्रस्तुत सात प्रमुख बातें जरूर पढ़ें |मूल लेख “भगवान् बुद्ध मेरी दृस्टि में – ओशो” …SBMT टीम

ओशो ने सभी धर्मों पर बहुत अध्ययन किया गहन और विस्तार से व्याख्यान दिए हैं, धर्मों को खंगालते खंगालते वो बौद्ध धम्म तक पहुंचे और फिर बौद्ध धम्म पर ठहर गए|बौद्ध धम्म किताबों में बंद है आम जनता को उसको समझने के लिए किसी जीवित टीचर या गुरु की जरूरत है जो जनता को उनके स्तर तक आकर समझा सके|इस जरूरत को ओशो के धम्म पर रिकॉर्डिंग बहुत कमाल की है, उसी में से एक रिकॉर्डिंग पर आधारित है ये लेख|

हमने यूट्यूब पर वो वीडियो भी डाले थे पर भारत में धम्म को न पनपने देने के लिए बहुत बड़ा षडियंत्र चलता है| आपको जानकार हैरानी होगी की बाकि के धर्मों के व्याख्यान यूट्यूब पर हो तो कोई आपत्ति नहीं पर अगर बौद्ध धम्म पर उनका कोई व्याख्यान यूट्यूब पर डाल दे तो तुरंत कॉपीराइट का हवाला देकर उसे हटवा देते हैं|और सबसे बही बात अगर कॉपी राइट है तो खुद अपने नाम से ही डालो वो भी नहीं डालते| बौद्ध धम्म पर उनके भाषणों का लेख और ऑडियो वीडियो अगर कहीं मिले तो उसे तुरंत डाउनलोड कर के रख ले, पता नहीं षडियंत्र करी कब उसे ऑफ लाइन करवा दे|

dhyan do buddh parबुद्ध कहते हैं,

“तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो मानना या न मानना बाद की बात है। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यह तुम्हारी ही अंतर्मन का भवन है।”

Buddha-Jayanti-18

 

पहली, गौतम बुद्ध दार्शनिक नहीं, द्रष्टा हैं।:   

दार्शनिक वह, जो सोचे। द्रष्टा वह, जो देखे। सोचने से दृष्टि नहीं मिलती। सोचना अज्ञात का हो भी नहीं सकता। जो ज्ञात नहीं है, उसे हम सोचेंगे भी कैसे? सोचना तो ज्ञात के भीतर ही परिभ्रमण है। सोचना तो ज्ञात की ही धूल में ही लोटना है। सत्य अज्ञात है। ऐसे ही अज्ञात है जैसे अंधे को प्रकाश अज्ञात है। अंधा लाख सोचे, लाख सिर मारे, तो भी प्रकाश के संबंध में सोचकर क्या जान पाएगा! आंख की चिकित्सा होनी चाहिए। आंख खुली होनी चाहिए। अंधा जब तक द्रष्टा न बनें, तब तक सार हाथ नहीं लगेगा।

तो पहली बात बुद्ध के संबंध में स्मरण रखना, उनका जोर द्रष्टा बनने पर है। वे स्वयं द्रष्टा हैं। और वे नहीं चाहते कि लोग दर्शन के ऊहापोह में उलझें।
दार्शनिक ऊहापोह के कारण ही करोड़ों लोग दृष्टि को उपलब्ध नहीं हो पाते हैं। प्रकाश की मुफ्त धारणाएं मिल जाएं, तो आंख का महंगा इलाज कौन करे! सस्ते में सिद्धान्त मिल जाएं, तो सत्य को कौन खोजे! मुफ्त, उधार सब उपलब्ध हो, तो आंख की चिकित्सा की पीड़ा से कौन गुजरे! और चिकित्सा कठिन है। और चिकित्सा में पीड़ा भी है।बुद्ध ने बार-बार कहा है कि मैं चिकित्सक हूं। उनके सूत्रों को समझने में इसे याद रखना। बुद्ध किसी सिद्धांत का प्रतिपादन नहीं कर रहे हैं।

वे किसी दर्शन का सूत्रपात नहीं कर रहे हैं। वे केवल उन लोगों को बुला रहे हैं जो अंधे हैं और जिनके भीतर प्रकाश को देखने की प्यास है। और जब लोग बुद्ध के पास गए, तो बुद्ध ने उन्हें कुछ शब्द पकड़ाए, बुद्ध ने उन्हें ध्यान की तरफ इंगित और इशारा किया। क्योंकि ध्यान से है खुलती आंख, ध्यान से खुलती है भीतर की आंख।विचारों से तो पर्त की पर्त तुम इकट्ठी कर लो, आंख खुली भी हो तो बंद हो जाएगी। विचारों के बोझ से आदमी की दृष्टि खो जाती है। जितने विचार के पक्षपात गहन हो जाते हैं, उतना ही देखना असंभव हो जाता है। फिर तुम वही देखने लगते हो जो तुम्हारी दृष्टियां होती है। फिर तुम वह नहीं देखते, जो है। जो है, उसे देखना हो तो सब दृष्टियों से मुक्त हो जाना जरूरी है।इस विरोधाभास को खयाल में लेना, दृष्टि पाने के लिए सब दृष्टियांे से मुक्त हो जाना जरूरी है। जिसकी कोई भी दृष्टि नहीं, जिसका कोई दर्शनशास्त्र नहीं, वही सत्य को देखने में समर्थ हो पाता है।

*********************************************************************************************************

=> दूसरी बात, गौतम बुद्ध पारंपरिक नही, मौलिक हैं।: 

गौतम बुद्ध किसी परंपरा, किसी लीक को नहीं पीटते हैं। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि अतीत के ऋषियों ने ऐसा कहा था, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि वेद में ऐसा लिखा है, इसलिए मान लो। वे ऐसा नहीं कहते हैं कि मैं कहता हूं, इसलिए मान लो। वे कहते हैं, जब तक तुम न जान लो, मानना मत। उधार श्रद्धा दो कौड़ी की है। विश्वास मत करना, खोजना। अपने जीवन को खोज में लगाना, मानने में जरा भी शक्ति व्यय मत करना। अन्यथा मानने में ही फांसी लग जाएगी। मान-मानकार ही लोग भटक गए हैं।

तो बुद्ध न तो परंपरा की दुहाई देते, न वेद की। न वे कहते हैं कि हम जो कहते हैं, वह ठीक होना ही चाहिए। वे इतना ही कहते हैं, ऐसा मैंने देखा। इसे मानने की जरूरत नहीं है। इसको अगर परिकल्पना की तरह ही स्वीकार कर लो, तो काफी है।परिकल्पना का अर्थ होता है, हाइपोथीसिस। जैसे कि मैंने कहा कि भीतर आओ, भवन में दीया जल रहा है। तो मैं तुमसे कहता हूं कि यह मानने की जरूरत नहीं है कि भवन में दीया जल रहा है। इसको विश्वास करने की जरूरत नहीं। इस पर किसी तरह की श्रद्धा लाने की जरूरत नहीं है। तुम मेरे साथ आओ और दीए को जलता देख लो। दीया जल रहा है तो तुम मानो या न मानो, दीया जल रहा है। और दीया जल रहा है तो तुम मानते हुए आओ कि न मानते हुए आओ, दीया जलता ही रहेगा। तुम्हारे न मानने से दीया बुझेगा नहीं, तुम्हारे मानने से जलेगा नहीं।

इसलिए बुद्ध कहते हैं, तुम सिर्फ मेरा निमंत्रण स्वीकार करो। इस भवन में दीया जला है, तुम भीतर आओ। और यह भवन तुम्हारा ही है, यही तुम्हारी ही अंतरात्मा का भवन है। तुम भीतर आओ और दीए को जलता देख लो। देख लो, फिर मानना।
और खयाल रहे जब देख ही लिया तो मानने की कोई जरूरत नहीं रह जाती है। हम जो देख लेते हैं, उसे थोड़े ही मानते हैं। हम तो जो नहीं देखते, उसी को मानते हैं। तुम पत्थर-पहाड़ को तो नहीं मानते, परमात्मा को मानते हो। तुम सूरज-चांद-तारों को तो नहीं मानते, वे तो हैं। तुम स्वर्गलोक, मोक्ष, नर्क को मानते हो। जो नहीं दिखाई पड़ता, उसको हम मानते हैं। जो दिखायी पड़ता है, उसको तो मानने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, उसका यथार्थ तो प्रगट है।
तो बुद्ध कहते हैं, मेरी बात पर भरोसा लाने की जरूरत नहीं, इतना ही काफी है कि तुम मेरा निमंत्रण स्वीकार कर लो। इतना पर्याप्त है। इसको वैज्ञानिक कहते हैं, हाइपोथीसिस, परिकल्पना। एक वैज्ञानिक कहता है, सौ डिग्री तक पानी गर्म करने से पानी भाप बन जाता है। मानने की कोई जरूरत नहीं, चूल्हा तुम्हारे घर में है, जल उपलब्ध है, आग उपलब्ध है, चढ़ा दो चूल्हे पर जल को, परीक्षण कर लो। परीक्षण करने के लिए जो बात मानी गयी है, वह परिकल्पना। अभी स्वीकार नहीं कर ली है कि यह सत्य है, लेकिन एक आदमी कहता है, शायद सत्य हो, शायद असत्य हो, प्रयोग करके देख लें, प्रयोग ही सिद्ध करेगा-सत्य है या नहीं?
तो बुद्ध पारंपरिक नहीं हैं, मौलिक हैं। विचार की परंपरा होती है, दृष्टि की मौलिकता होती है। विचार अतीत के होते हैं, दृष्टि वर्तमान में होती है। विचार दूसरों के होते हैं, दृष्टि अपनी होती है।

*********************************************************************************************************
=> तीसरी बात, गौतम बुद्ध शास्त्रीय नहीं हैं। पंडित नहीं हैं, वैज्ञानिक हैं। :

बुद्ध ने धर्म को पहली दफे वैज्ञानिक प्रतिष्ठा दी। बुद्ध ने धर्म को पहली दफे विज्ञान के सिंहासन पर विराजमान किया। इसके पहले तक धर्म अंधविश्वास था। बुद्ध ने उसे बड़ी गरिमा दी। बुद्ध ने कहा, अंधविश्वास की जरूरत ही नहीं है। धर्म तो जीवन का परम सत्य है। एस धम्मो सनंतनो। यह धर्म तो शाश्वत और सनातन है। तुम जब आंख खोलोगे तब इसे देख लोगे।
इसलिए बुद्ध ने यह नहीं कहा कि नरक के भय के कारण मानो, और यह भी नहीं कहा कि स्वर्ग के लोभ के कारण मानो। और इसलिए यह भी नहीं कहा कि परमात्मा सताएगा अगर न माना, और परमात्मा पुरस्कार देगा अगर माना। नही, ये सब व्यर्थ की बातें बुद्ध ने नहीं कहीं।
बुद्ध ने तो सारसूत्र कहा। बुद्ध ने तो कहा, यह धर्म तुम्हारा स्वभाव है। यह तुम्हारे भीतर बह रहा है, अहर्निश बह रहा है। इसे खोजने के लिए आकाश में आंखें उठाने की जरूरत नहीं है, इसे खोजने के लिए भीतर जरा सी तलाश करने की जरूरत है। यह तुम हो, तुम्हारी नियति है, यह तुम्हारा स्वभाव है। एक क्षण को भी तुमने इसे खोया नहीं, सिर्फ विस्मरण हुआ है।

तो बुद्ध ने चैतन्य की सीढ़ियां कैसे पार की जाएं, मूर्छा से कैसे आदमी अमूर्छा में जाए, बेहोशी कैसे टूटे और होश कैसे जगे, इसका विज्ञान थिर किया। और जो उनके साथ भीतर गए, उन्हें निरपवाद रूप से मान लेना पड़ा कि बुद्ध जो कहते हैं, ठीक कहते हैं।
यह अपूर्व क्रांति थी। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। बुद्ध मील के पत्थर हैं मनुष्य-जाति के इतिहास में। संत तो बहुत हुए, मील के पत्थर बहुत थोड़े लोग होते हैं। महावीर भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि महावीर ने जो कहा, वह तेईस तीर्थंकर पहले कह चुके थे। कृष्ण भी मील के पत्थर नहीं हैं। क्योंकि कृष्ण ने जो कहा, वह उपनिषद और वेद सदा से कहते रहे थे। बुद्ध मील के पत्थर हैं, जैसे लाओत्सू मील का पत्थर है। कभी-कभार, करोड़ों लोगों में एकाध संत होता है, करोड़ों संतों में एकाध मील का पत्थर होता है। मील के पत्थर का अर्थ होता है, उसके बाद फिर मनुष्य-जाति वही नहीं रह जाती। सब बदल जाता है, सब रूपांतरित हो जाता है। एक नयी दृष्टि और एक नया आयाम और एक नया आकाश बुद्ध ने खोल दिया।

इस प्रवचन में ओशो भगवान बुद्ध की विशेषताओं पर प्रकाश डालते है,इस प्रवचन को सुनने के बाद यही प्रतीत होता है की , बुद्ध को अगर कोई ठीक से समझ पाया है तो वोह एक मात्र ओशो है|बुद्ध के साथ धर्म अंधविश्वास न रहा, अंतर्खोज बना। बुद्ध के साथ धर्म ने बड़ी छलांग लगा ली। आस्तिक को ही धर्म में जाने की सुविधा न रही, नास्तिक को भी सुविधा हो गयी। ईश्वर को नहीं मानते, कोई हर्ज नहीं, बुद्ध कहते ही नहीं कि मानना जरूरी है। कुछ भी नहीं मानते, बुद्ध कहते हैं, तो भी कोई चिंता की बात नहीं। कुछ मानने की जरूरत ही नहीं है। बिना कुछ माने अपने भीतर तो जा सकते हो। भीतर जाने के लिए मानने की आवश्यकता क्या है! न तो ईश्वर को मानना है, न आत्मा को मानना है, न स्वर्ग-नर्क को मानना है। इसे तो नास्तिक भी इनकार न कर सकेगा कि मेरा भीतर है। इसे तो नास्तिकों ने भी नहीं कहा है कि भीतर नहीं है। भीतर तो है ही। नास्तिक कहते हैं, यह भीतर शाश्वत नहीं है। बुद्ध कहते हैं, फिकर छोड़ो, पहले यह जितना है उसे जान लो, उसी जानने से अगर शाश्वत का दर्शन हो जाए तो फिर मानने की जरूरत न होगी; तुम मान ही लोगे।
बुद्ध ने नास्तिकों को धार्मिक बनाने का महत कार्य पूरा किया। इसलिए बुद्ध के पास जो लोग आकर्षित हुए, बड़े बुद्धिमान लोग थे। आमतौर से धार्मिक साधु-संतों के पास बुद्धिहीन लोग इकट्ठे होते हैं। जड़, मूर्छित, मुर्दा। बुद्ध ने मनुष्य-जाति की जो श्रेष्ठतम संभावनाएं हैं, उनको आकर्षित किया। बुद्ध के पास नवनीत इकट्ठा हुआ चैतन्य का। ऐसे लोग इकट्ठे हुए जो और किसी तरह तो धर्म को मान ही नहीं सकते थे, उनके पास प्रज्वलित तर्क था। इसलिए बुद्ध दार्शनिक हैं, लेकिन बुद्ध के पास इस देश के सबसे बड़े से बड़े दार्शनिक इकट्ठे हो गए। बुद्ध अकेले एक व्यक्ति के पीछे इतना दर्शनशास्त्र पैदा हुआ, जितना मनुष्य-जाति के इतिहास में किसी दूसरे व्यक्ति के पीछे नहीं हुआ। और बुद्ध के पीछे इतने महत्वपूर्ण विचारक हुए कि जिनकी तुलना सारी पृथ्वी पर कहीं भी खोजनी मुश्किल है।
कैसे यह घटित हुआ? बुद्ध ने महानास्तिकों को आकर्षित किया। आस्तिक को बुला लेना मंदिर में तो कोई खास बात नहीं, नास्तिक को बुला लेने में कुछ खास बात है। बुद्ध वैज्ञानिक हैं, इसलिए नास्तिक भी उत्सुक हुआ। विज्ञान को तो नास्तिक ठुकरा न सकेगा। बुद्ध ने कहा, संदेह है, चलो, संदेह की ही सीढ़ी बनाएंगे। संदेह से और शुभ क्या हो सकता है! संदेह के पत्थर को लेंगेी बना लेंगेे। संदेह से ही तो खोज होती है। इसलिए संदेह को फेंको मत।
इस बात को समझना। जिसके पास जितनी विराट दृष्टि होती है, उतना ही वह हर चीज का उपयोग कर लेना चाहता है। सिर्फ क्षुद्र दृष्टि के लोग काटते हैं। क्षुद्र दृष्टि का आदमी कहेगा, संदेह नहीं चाहिए, श्रद्धा चाहिए। काटो संदेह को। लेकिन संदेह तुम्हारा जीवंत अंग है, काटोगे तो तुम अपंग हो जाओगे। संदेह का रूपांतरण होना चाहिए, खंडन नहीं। संदेह ही श्रद्धा बन जाए, ऐसी कोई प्रक्रिया होनी चाहिए।
कोई कहता है, काटो कामवासना को। लेकिन काटने से तो तुम अपंग हो जाओगे। कुछ ऐसा होना चाहिए कि कामवासना राम की वासना बन जाए। ऊर्जा का अधोगमन ऊर्ध्वगमन बन जाए। तुम ऊर्ध्वरेतस बन जाओ। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे कंकड़-पत्थर भी हीरों में रूपांतरित हो जाएं। कुछ ऐसा होना चाहिए कि तुम्हारे जीवन की कीचड़ कमल बन सके।बुद्ध ने वह कीमिया दी।

*********************************************************************************************************
= > चौथी बात, गौतम बुद्ध वायवी, एब्सट्रेक्ट नहीं, अत्यंत व्यावहारिक हैं।

ऊंचे से ऊंची छलांग ली है उन्होंने, लेकिन पृथ्वी को कभी नहीं छोड़ा। जड़ें जमीन में जमाए रखीं। वह सिर्फ हवा में ही पंख नहीं मारते रहे।
एक बहुत प्राचीन कथा है कि ब्रह्मा ने जब सृष्टि बनायी और सब चीजें बनायीं, तभी उसने यथार्थ और स्वप्न भी बनाया। बनते ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ और स्वप्न का झगड़ा तो प्राचीन है। पहले दिन ही झगड़ा शुरू हो गया। यथार्थ ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं; स्वप्न ने कहा, मैं श्रेष्ठ हूं, तुझमे रखा क्या है! झगड़ा यहां तक बढ़ गया कि कौन महत्वपूर्ण है दोनों में कि दोनों झगड़ते हुए ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मा हंसे और उन्होंने कहा, ऐसा करो, सिद्ध हो जाएगा प्रयोग से। तुममें से जो भी जमीन पर पैर गड़ाए रहे और आकाश को छूने में समर्थ हो जाए, वही श्रेष्ठ है।
दोनों लग गये। स्वप्न ने तो तत्क्षण आकाश छू लिया, देर न लगी, लेकिन पैर उसके जमीन तक न पहुंच सके। टंग गया आकाश में। हाथ तो लग गए आकाश से, लेकिन पैर जमीन से न लगे-स्वप्न के पैर होते ही नहीं। यथार्थ जमीन में पैर गड़ाकर खड़ा हो गया, जैसे कि कोई वृक्ष हो, लेकिन ठूंठ की तरह, आकाश तक उसके हाथ न पहुंचे।
ब्रह्मा ने कहा, समझे कुछ? स्वप्न अकेला आकाश में अटक जाता है, यथार्थ अकेला जमीन पर भटक जाता है। कुछ ऐसा चाहिए कि स्वप्न और यथार्थ का मेल हो जाए।
तो बुद्ध वायवी नहीं हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि उन्होंनें आकाश नहीं छुआ। उन्होंने आकाश छुआ, लेकिन यथार्थ के आधार पर छुआ।
इस फर्क को समझना।
बुद्ध ने अपने पैर तो जमीन पर रोके, बुद्ध ने यथार्थ को तो जरा भी नहीं भुलाया, यथार्थ में बुनियाद रखी; भवन उठा, मंदिर ऊंचा उठा, मंदिर पर स्वर्णकलश चढ़े। लेकिन मंदिर के स्वर्णकलश टिकते तो जमीन में छिपे हुए पत्थरों पर हैं, भूमि के भीतर छिपे हुए बुनियाद के पत्थरों पर टिकते हैं। बुद्ध ने एक मंदिर बनाया, जिसमें बुनियाद भी है और शिखर भी।
बहुत लोग हैं, जिनको हम नास्तिक कहते हैं, वे जमीन पर अटके रह जाते हैं। वे ठूंठ की तरह हैं। यथार्थ का ठूंठ। मार्क्सवादी हैं या चार्वाकवादी हैं, वे यथार्थ का ठूंठ। वे जमीन में तो पैर गड़ा लेते हैं, लेकिन उनके भीतर आकाश तक उठने की कोई अभीप्सा नहीं है, आकाश तक उठने की कोई क्षमता नहीं है। और चूंकि वे सपने को काट डालते हैं बिलकुल और कह देते हैं, आदर्श है ही नहीं जगत में। बस यही सब कुछ है, मिट्टी ही सब कुछ है। उनके जीवन में कमल नहीं फूलता, कमल नहीं उठता। कमल का उपाय ही नहीं रह जाता। जिसको इनकार कर दिया आग्रहपूर्वक, उसका जन्म नहीं होता।
और फिर दूसरी तरफ सिद्धांतवादी हैं: एब्सट्रेक्ट, वायवी विचारक है; वे आकाश में ही पर मारते रहते हैं, वे कभी जमीन पर पैर नहीं रोकते हैं। वे आदर्श में जीते हैं, यथार्थ से उनका कभी कोई मिलन ही नहीं होता। उनकी आंखों में आकाश-कुसुम खिलते हैं, असली कुसुम नहीं।
बुद्ध स्वप्नवादी नहीं हैं, परम व्यावहारिक हैं। लेकिन चार्वाक जैसे व्यवहारवादी भी नहीं हैं। उनका व्यवहारवाद अपने भीतर आदर्श की संभावना छिपाए हुए है। लेकिन वे कहते हैं, शुरू तो करना होगा जमीन पर पैर टेकने से। जिसके पैर जमीन में जितनी मजबूती से टिके हैं, वह उतनी ही आसानी से आकाश को छूने में समर्थ हो पाएगा। मगर यात्रा तो शुरू करनी पड़ेगी जमीन में पैर टेकने से।
इसलिए जब कोई बुद्ध के पास आता है और ईश्वर की बात पूछता है, वे कहते हैं, व्यर्थ की बातें मत पूछो। अनेकों को तो लगा कि बुद्ध अनीश्वरवादी हैं, इसलिए ईश्वर के बाबत जवाब नहीं देते। यह बात सच नहीं है। बुद्ध कहते हैं, पहले जमीन में तो पैर गड़ा लो, पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अंतस चेतना में तो जड़ें फैला लो, पहले तुम जो हो उसको तो पहचान लो, फिर यह पीछे हो लेगा। यह अपने से हो लेगा। यह एक दिन अचानक हो जाता है। जब जमीन में वृक्ष की जड़े खूब मजबूती से रुक जाती हैं, तो वृक्ष अपने आप आकाश की तरफ उठने लगता है। एक दिन आकाश में उठे वृक्ष में फूल भी खिलते हैं, वसंत भी आता है। मगर वह अपने से होता है। असली बात जड़ की है।
तो बुद्ध बहुत गहरे में यथार्थवादी हैं, लेकिन उनका यथार्थ आदर्श को समाहित किए हुए है। वह आदर्श समन्वित है यथार्थ में।

*********************************************************************************************************

=>पांचवी बात, गौतम बुद्ध विधिवादी नहीं, मानवीय हैं।:

एक तो विधिवादी होता है, जैसे मनु। सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं, मनुष्य महत्वपूर्ण नहीं है। ऐसा लगता है मनु में, जैसे मनुष्य सिद्धांत के लिए बना है। मनुष्य की आहुति चढ़ायी जा सकती है सिद्धांत के लिए, लेकिन सिद्धांत में फेर-बदल नहीं की जा सकती।
बुद्ध अति मानवीय हैं, ह्ययूमनिस्ट। मानववादी हैं। वे कहते हैं, सिद्धांत का उपयोग है मनुष्य की सेवा में तत्पर हो जाना। सिद्धांत मनुष्य के लिए है, मनुष्य सिद्धांत के लिए नहीं। इसलिए बुद्ध के वक्तव्यों में बड़े विरोधाभास हैं। क्योंकि बुद्ध एक-एक व्यक्ति की मनुष्यता को इतना मूल्य देते, इतना चरम मूल्य देते हैं कि अगर उन्हें लगता है इस आदमी को इस सिद्धांत से ठीक नहीं पड़ेगा, तो वे सिद्धांत बदल देते हैं। अगर उन्हें लगता है कि थोड़े से सिद्धांत में फर्क करने से इस आदमी को लाभ होगा, तो उन्हें फर्क करने में जरा भी झिझक नहीं होती। लेकिन मौलिक रूप से ध्यान उनका व्यक्ति पर है, मनुष्य पर है। मनुष्य परम है। मनुष्य मापदंड है। सब चीजें मनुष्य पर कसी जानीं चाहिए।

इसलिए बुद्ध वर्ण-व्यवस्था को न मान सके। इसलिए बुद्ध आश्रम-व्यवस्था को भी न मान सके। क्योंकि ये जड़ सिद्धांत हैं। बुद्ध ने कहा, ब्राह्मण वही जो ब्रह्म को जाने। ब्राह्मण-घर में पैदा होने से कोई ब्राह्मण नहीं होता। और शूद्र वही जो ब्रह्म न जाने। शूद्र-घर में पैदा होने से कोई शूद्र नहीं होता। तो अनेक ब्राह्मण शूद्र हो गए, बुद्ध के हिसाब से, और अनेक शूद्र बाह्मण हो गए। सब अस्तव्यस्त हो गया। मनु के पूरे शास्त्र को बुद्ध ने उखाड़ फेंका।
हिंदू अब तक भी बुद्ध से नाराजगी भूले नहीं हैं। वर्ण-व्यवस्था को इस बुरी तरह बुद्ध ने तोड़ा। यह कुछ आकस्मिक बात नहीं थी कि डाक्टर अंबेडकर ने ढाई हजार साल बाद फिर शूद्रों को बौद्ध होने को निमंत्रण दिया। इसके पीछे कारण है। अंबेडकर ने बहुत बातें सोची थीं। पहले उसने सोचा कि ईसाई हो जाएं, क्योंकि हिंदुओ ने तो सता डाला है, तो ईसाई हो जाएं। फिर सोचा कि मुसलमान हो जाएं। लेकिन यह कोई बात जमीं नही, क्योंकि मुसलमानों में भी वही उपद्रव है। वर्ण के नाम से न होगा तो शिया-सुन्नी का है।
अंततः अंबेडकर की दृष्टि बुद्ध पर पड़ी और तब बात जंच गयी अंबेडकर को कि शूद्र को सिवाय बुद्ध के साथ और कोई उपाय नहीं है। क्योंकि शूद्र के लिए भी अपने सिद्धांत बदलने को अगर कोई आदमी राजी हो सकता है तो वह गौतम बुद्ध हैं-और कोई राजी नहीं हो सकता-जिसके जीवन में सिद्धांत का मूल्य ही नहीं, मनुष्य का चरम मूल्य है।
यह आकस्मिक नहीं है कि अंबेडकर बौद्ध हुए। पच्चीस सौ साल के बाद शूद्रों का फिर बौद्धत्व की तरफ जाना, या बौद्धत्व के मार्ग की तरफ जाना, बौद्ध होने की आकांक्षा, बड़ी सूचक है। इससे बुद्ध के संबंध में खबर मिलती है।
बुद्ध ने वर्ण की व्यवस्था तोड़ दी और आश्रम की व्यवस्था भी तोड़ दी। जवान, युवकों को संन्यास दे दिया। हिंदू नाराज हुए। संन्यस्त तो आदमी होता है आखिरी अवस्था में, मरने के करीब। अगर बचा रहा, पचहत्तर साल के बाद उसे संन्यस्त होना चाहिए। तो पहले तो पचहत्तर साल तक लोग बचते नहीं। अगर बच गए, तो पचहत्तर साल के बाद ऊर्जा नहीं बचती जीवन में। तो हिंदुओं का संन्यास एक तरह का मुर्दा संन्यास है, जो आखिरी घड़ी में कर लेना है। मगर इसका जीवन से कोई बहुत गहरा संबंध नहीं है।
बुद्ध ने युवकों को संन्यास दे दिया, बच्चों को संन्यास दे दिया और कहा कि यह बात मूल्यवान नहीं है, लकीर के फकीर होकर चलने से कुछ भी न चलेगा। अगर किसी व्यक्ति को युवावस्था में भी परमात्मा को खोजने की, सत्य को खोजने की, जीवन के यथार्थ को खोजने की प्रबल आकांक्षा जगी है, तो मनु महाराज का नियम मानकर रुकने की कोई जरूरत नहीं है। वह अपनी आकांक्षा को सुने, वह अपनी आकांक्षा से जाए। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंकाक्षा को सुने। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आकांक्षा से जीए। उन्होंनें सब सिद्धांत एक अर्थ में गौण कर दिए, मनुष्य प्रमुख हो गया।
तो वे सैद्धांतिक नहीं हैं, विधिवादी नहीं हैं। लीगल नहीं है उनकी पकड़, उनकी पकड़ मानवीय है। कानून इतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य मूल्यवान है। और हम कानून बनाते ही इसीलिए हैं कि मनुष्य के काम आए। मनुष्य कानून के काम आने के लिए नहीं है। इसलिए जब जरूरत हो, कानून बदला जा सकता है। जब मनुष्य के हित में हो, ठीक है, जब अहित में हो जाए तोड़ा जा सकता है। जो-जो मनुष्य के अहित में हो जाए, तोड़ देना है। कोई कानून शाश्वत नहीं है, सब कानून उपयोग के लिए हैं।

*********************************************************************************************************

=> और छठवीं बात, गौतम बुद्ध नियमवादी नहीं है, बोधवादी हैं।

अगर बुद्ध से पूछो, क्या अच्छा है, क्या बुरा है, तो बुद्ध उत्तर नहीं देते। बुद्ध यह नहीं कहते कि यह काम बुरा है और यह काम अच्छा है। बुद्ध कहते हैं, जो बोधपूर्वक किया जाए, वह अच्छा; जो बोधहीनता से किया जाए, बुरा।
इस फर्क को खयाल में लेना। बुद्ध यह नहीं कहते कि हर काम हर स्थिति में भला हो सकता है। या कोई काम हर स्थिति में बुरा हो सकता है। कभी कोई बात पुण्य हो सकती है, और कभी कोई बात पाप हो सकती है-वही बात पाप हो सकती है, भिन्न परिस्थति में वही बात पाप हो सकती है। इसलिए पाप और पुण्य कर्मो के ऊपर लगे हुए लेबिल नहीं हैं। अभी जो तुमने किया, पुण्य है; और सांझ को दोहराओ तो शायद पाप हो जाए। भिन्न परिस्थिति।
तो फिर हमारे पास शाश्वत आधार क्या होगा निर्णय का? बुद्ध ने एक नया आधार दिया। बुद्ध ने आधार दिया-बोध, जागरूकता। इसे खयाल में लेना। जो मनुष्य जागरूकतापूर्वक कर पाए, जो भी जागरूकता में ही किया जा सके, वही पुण्य है। और जो बात केवल मूर्छा में ही की जा सके, वही पाप है। जैसे, तुम पूछो, क्रोध पाप है या पुण्य? तो बुद्ध कहते हैं, अगर तुम क्रोध जागरूकतापूर्वक कर सको, तो पुण्य है। अगर क्रोध तुम मूर्छित होकर ही कर सको, तो पाप है।
अब फर्क समझना। इसका मतलब यह हुआ कि हर क्रोध पाप नहीं होता और हर क्रोध पुण्य नहीं होता। कभी मां जब अपने बेटे पर क्रोध करती है, तो जरूरी नहीं है कि पाप हो। शायद पुण्य भी हो, पुण्य हो सकता है। शायद बिना क्रोध के बेटा भटक जाता। लेकिन इतना ही बुद्ध का कहना है, होशपूर्वक किया जाए।
मैंने एक झेन कहानी सुनी है। एक समुराई, एक क्षत्रिय के गुरु को किसी ने मार दिया। और जापान में ऐसी व्यवस्था है, अगर किसी का गुरु मार डाला जाए, तो शिष्य का कर्तव्य है कि बदला ले। और जब तक वह मारने वाले को न मार दे, तब तक चैन न ले। ये समुराई तो बड़े भयानक योद्धा होते हैं। गुरु को किसी ने मार डाला, तो उसका जो शिष्य था, वह तो सब कुछ छोड़कर बस इसी में लग गया।

दो साल बाद उसका पीछा करते-करते एक जंगल में, एक गुफा में उसको पकड़ लिया। बस उसकी छाती में छुरा भोंकने को था ही कि उस आदमी ने उस समुराई के ऊपर थूक दिया। जैसे ही उसने थूका, उसने छुरा वापस रख लिया अपनी म्यान में और वापस गुफा के बाहर निकल आया।
उस आदमी ने कहा, क्यों भाई, क्या हो गया? दो साल से मेरे पीछे पड़े हो, बमुश्किल तुम मुझे खोज पाए, मैं जंगल-जंगल भागता रहा, आज तुम्हें मिल गया, आज क्या बात हो गयी कि छुरा निकाला हुआ वापस रख लिया?

उसने कहा कि मुझे क्रोध आ गया। तुमने थूक दिया, मुझे क्रोध आ गया। मेरे गुरु का उपदेश था, मारो भी अगर किसी को, तो मूर्छा में मत मारना। तो मारने में भी कोई पाप नहीं है। लेकिन तुमने जो थूक दिया, दो साल तक मैंने होश रखा-यह तो सिर्फ एक व्यवस्था की बात थी कि गुरु को मेरे तुमने मारा तो मैं तुम्हें मार रहा था, मेरा इसमें कुछ वैयक्तिक लेना-देना नहीं था-लेकिन तुमने थूक क्या दिया मुझ पर, मैं भूल ही गया गुरु को और मेरे मन में भाव उठा कि मार डालूं इस आदमी को, इसने मेरे ऊपर थूका! मैं बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। अहंकार बीच में आ गया, मूर्छा आ गयी। इसलिए अब जाता हूं। अब फिर जब यह मूर्छा हट जाएगी तब सोचूंगा। लेकिन मूर्छा में कुछ किया नहीं जा सकता।
बुद्ध ने कहा है, जो तुम मूर्छा में करो, वही पाप; जो जागरूकता में करों, वही पुण्य है। यह पाप और पुण्य की बड़ी नयी व्यवस्था थी। और इसमें व्यक्ति को परम स्वतंत्रता है। कोई दूसरा तय नहीं कर सकता कि क्या पाप है, क्या पुण्य है। तुमको ही तय करना है। बुद्ध ने व्यक्ति को परम गरिमा दी।

*********************************************************************************************************

और सातवीं बात, गौतम बुद्ध असहज के पक्षपाती नहीं, सहज के उपदेष्टा हैं।

गौतम बुद्ध कहते हैं, कठिन के ही कारण आकर्षित मत होओ। क्योंकि कठिन में अहंकार का लगाव है।

इसे तुमने देखा कभी? जितनी कठिन बात हो, लोग करने को उसमें उतने ही उत्सुक होते हैं। क्योंकि कठिन बात में अहंकार को रस आता है, मजा आता है-करके दिखा दूं। अब जैसे पूना की पहाड़ी पर कोई चढ़ जाए, तो इसमें कुछ मजा नहीं है, एवरेस्ट पर चढ़ जाऊं तो कुछ बात है। पूना की पहाड़ी पर चढ़कर कौन तुम्हारी फिकर करेगा, तुम वहां लगाए रहो झंडा, खड़े रहो चढ़कर! न अखबार खबर छापेंगे, न कोई वहां तुम्हारा चित्र लेने आएगा। तुम बड़े हैरान होओगे कि फिर यह हिलेरी पर और तेनसिंग पर इतना शोरगुल क्यों मचाया गया! आखिर इन ने भी कौन सी बड़ी बात की थी, जाकर हिमालय पर झंडा गाड़ दिया था, मैंने भी झंडा गाड़ दिया! लेकिन तुम्हारी पहाड़ी छोटी है। इस पर कोई भी चढ़ सकता है। जिस पहाड़ी पर कोई भी चढ़ सकता है, उसमें अहंकार को तृप्ति का उपाय नहीं है।
तो बुद्ध ने कहा कि अहंकार अक्सर ही कठिन में और दुर्गम में उत्सुक होता है। इसलिए कभी-कभी ऐसा हो जाता है कि जो सहज और सुगम है, जो हाथ के पास है, वह चूक जाता है और दूर के तारों पर हम चलते जाते हैं।
देखते हैं, आदमी चांद पर पहुंच गया। अभी अपने पर नहीं पहुंचा! तुमने कभी देखा, सोचा इस पर? चांद पर पहुंचना तकनीक की अदभुत विजय है। गणित की अदभुत विजय है। विज्ञान की अदभुत विजय है। जो आदमी चांद पर पहुँच गया, यह अभी छोटी-छोटी चीजें करने में सफल नहीं हो पाया है। अभी एक ऐसा फाउंटेनपेन भी नहीं बना पाया जो लीकता न हो। और चांद पर पहुँच गए! छोटी-सी बात भी, अभी सर्दी-जुखाम का इलाज नहीं खोज पाए, चांद पर पहुंच गए! अब ऐसे फाउंटेनपेन को बनाने में उत्सुक भी कौन है जो लीके न! छोटी-मोटी बात है, इसमें रखा क्या है!
फाउंटेनपेन सदा लीकेंगे। कोई आशा नहीं दिखती कि कभी ऐसे फाउंटेनपेन बनेंगे जो लीकें न। और सर्दी-जुखाम सदा रहेगी, इससे छुटकारे का उपाय नहीं है। क्योंकि चिकित्सक कैंसर में उत्सुक हैं, सर्दी-जुखाम में नहीं। बड़ी चीज अहंकार की चुनौती बनती है। आदमी अपने भीतर नहीं पहुंचा जो निकटतम है और चांद पर पहुंच गया। मंगल पर भी पहुंचेगा, किसी दिन और तारों पर भी पहुंचेगा, बस, अपने को छोड़कर और सब जगह पहुंचेगा।
तो बुद्ध असहजवादी नहीं हैं। बुद्ध कहते है, सहज पर ध्यान दो। जो सरल है, सुगम है, उसको जीओ। जो सुगम है, वही साधना है। इसको खयाल में लेना। तो बुद्ध ने जीवनचर्या को अत्यंत सुगम बनाने के लिए उपदेश दिया है। छोटे बच्चे की भांति सरल जीओ। साधु होने का अर्थ बहुत कठिन और जटिल हो जाना नहीं, कि सिर के बल खड़े हैं, कि खड़े हैं तो खड़े ही हैं, बैठते नहीं, कि भूखों मर रहे हैं, कि लंबे उपवास कर रहे हैं, कि कांटों की शय्या बिछाकर उस पर लेट गए हैं, कि धूप में खड़े हैं, कि शीत में खड़े हैं, कि नग्न खड़े हैं। बुद्ध ने इन सारी बातों पर कहा कि ये सब अहंकार की ही दौड़ हैं। जीवन तो सुगम है, सरल है। सत्य सुगम और सरल ही होगा। तुम नैसर्गिक बनो और अहंकार के आकर्षणों में मत उलझो।

-ओशो

रहस्यदर्शियों पर ओशो
एस धम्मो सनंतनो, भाग 9
(प्रवचन नं. 82 से संकलित)

वाकई बाबा साहब आंबेडकर को छोड़कर अब तक के सभी भारतीय विद्वानों में बुद्धा को ओशो ने ही सही से समझा पाया है|

वेब चैनल नेशनल दस्तक को है अनुभवी मीडिया पर्सन की जरूरत।जुड़ें नेशनल दस्तक की मुहिम से।

जुड़ें नेशनल दस्तक की मुहिम से। वेब चैनल नेशनल दस्तक को है अनुभवी मीडिया पर्सन की जरूरत।
इस पद के लिए है जरूरत
प्रोड्यूसर- अनुभव (5-8 साल, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में)
रिपोर्टर- अनुभव (4-6 साल, इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया में)
वीडियो एडिटर- अनुभव ( 3-5 साल)
कैमरामैन (अनुभव 3-5 साल)
अपनी पूरी जानकारी मेल करें
hr@nationaldastak.com
कॉल करें- 0120-4214907

मूलनिवासी आत्मस्वाभिमान की मिसाल: ब्राह्मणवादियों/जातिवादियों ने जब पत्नी को पानी देने से मना किया तो भारतवासी/मूलनिवासी (जिसे मीडिया दलित कहता है) व्यक्ति जिसका नाम है:- बापूराव ताजणे ने खुद का कुआं खोदा,अब सारा गांव उससे पानी भरता है, वो भी जो उसके कुआँ खोदने की कोशिश का मज़ाक उड़ाते थे

dalit well

अपनी पत्नी के पैर फिसलकर पहाड़ से गिर जाने के बाद दशरथ मांझी द्वारा वर्षों की मेहनत से पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बना देने की कहानी तो आपने सुनी ही होगी. मांझी की कहानी भले ही कई साल पुरानी हो लेकिन पति द्वारा अपनी पत्नी को मुश्किलों से बचाने की कहानियां इस देश में और भी हैं.

ऐसा ही कुछ नागपुर में हुआ, जहां अपनी पत्नी को पानी के लिए दुत्कारे जाने के बाद पति ने एक कुआं खोद डाला. नागपुर के इस शख्स की कोशिशें भले ही दशरथ मांझी जितनी मुश्किल और बड़ी न हों लेकिन अपनी पत्नी के लिए इस शख्स का प्रेम उतना ही गहरा जरूर है. आइए जानें इस शख्स की ये हैरान कर देने वाली कहानी.

पत्नी को नहीं दिया गया पानी तो पति ने खोद डाला कुआं:

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वाशिम जिले के कालामबेश्वर गांव के गरीब श्रमिक बापूराव ताजणे दलित समुदाय के हैं. ऊंची जाति के लोगों ने उनकी पत्नी को अपने कुएं से पानी देने से मना कर दिया. बस फिर क्या था, पत्नी और दलितों के अपमान से तिलमिलाए बापूराव जुट गए उस काम को करने में जिसे लोग असंभव मानते थे. बापूराव ने 40 दिन तक हर दिन छह घंटे की खुदाई करते हुए एक कुआं खोद डाला.

इस काम में गांव के तो छोड़िए खुद बापूराव के परिवार वालों ने भी उनका सहयोग नहीं किया क्योंकि उन्हें लगता था कि बापूराव पागल हो गया है. उन लोगों के ऐसा सोचने की वजह भी थी, जिस पथरीले इलाके में बापूराव कुआं खोदने की कोशिश कर रहा था उस जगह के पास ही स्थित तीन कुएं और एक बोरवेल पहले ही सूख चुके थे. लेकिन आमतौर पर जिस काम को 5-6 लोग मिलकर अंजाम देते हैं, उसे बापूराव ने अकेले ही करते हुए तब तक कुआं खोदना जारी रखा, जब तक कि पानी नजर नहीं आ गया.

बापूराव की मेहनत आखिरकार रंग लाई और कुएं में पानी दिख गया. इस कुएं से बापूराव ने न सिर्फ अपनी पत्नी के लिए पानी उपलब्ध करवाया बल्कि अपने गांव के पूरे दलित समुदाय के लिए पानी का इंतजाम कर दिया. अपनी मेहनत से बापूराव ने दलितों की ऊंची जातियों के ऊपर पानी के लिए निर्भरता भी खत्म करने में मदद की.

बीए फाइनल ईयर तक की पढ़ाई करने वाले बापूराव पेशे से मजदूर हैं. इसलिए हर दिन वह काम पर जाने से पहले 4 घंटे और फिर वापस आने के बाद 2 घंटे कुआं खोदने का काम करते थे. इस तरह लगातार 40 दिनों तक उन्होंने बिना ब्रेक लिए रोजाना 14 घंटे मेहनत की. उनकी पत्नी संगीता यह कुआं खोदे जाने से खुश तो हैं लेकिन उन्हें इस बात की निराशा है कि शुरुआत में उन्होंने इस काम में पति का साथ नहीं दिया. लेकिन अब वह और उनका पूरा परिवार बापूराव की मदद करने में जुट गए हैं. 6 फीट चौड़े और 15 फीट गहरे कुएं को बापूराव 5 फीट और गहरा और 2 फीट और चौड़ा करना चाहते हैं.

bapurao dalit dig own well

बापूराव खराब व्यवहार करने वाले कुआं मालिकों को नाम नहीं लेना चाहते क्योंकि इससे गांव में खून-खराबा हो सकता है. उस दिन की घटना को याद करते हुए वह कहते हैं, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता लेकिन उन्होंने हमारा अपमान किया क्योंकि हम गरीब और दलित हैं. उस दिन से मैंने किसी से कुछ भी न मांगने की कसम खाई और मालेगांव जाकर औजार लाया और खुदाई शुरू कर दी.

ये कहानी दिखाती है कि अगर इंसान में कुछ कर दिखाने का जज्बा और जुनून हो तो दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है. बापूराव ने अपनी पत्नी के अपमान की तड़प से वो कर दिखाया जिससे कइयों की जिंदगी में खुशहाली आ गई. ऐसे जज्बे और प्रेम को सलाम!

इसी तरह बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को जब ब्राह्मण/हिन्दू  धर्म के महलों में सम्मान और पूछ नहीं मिली तो उन्होंने वापस अपने खुद के टूटे फूटे पड़े झोपड़े “बौद्ध धम्म” को दुरुस्त किया और उसकी शरण न केवल खुद लौटे बल्कि भारतवासियों को भी लौटा दिया, ये बहुत बड़ी क्रांति है|

धम्म सूत्र : जो हम सोचते हैं वही बन जाते हैं,सोच और कर्म बड़े रखो, छोटी सोच वाला व्यक्ति या वो व्यक्ति जिसकी सोच बड़ी हो पर कर्म छोटे हों , ये ही शूद्र बनते हैं,पढ़िए एक व्यंग कहानी, पेंटर और पेंटिंग की कीमत

painting rich ladyधम्म सूत्र : जो हम सोचते हैं वही बन जाते हैं,सोच बड़ी रखो, छोटी सोच वाला व्यक्ति ही शूद्र बनता है.

एक बहुत अरबपति महिला ने एक गरीब चित्रकार से अपना चित्र बनवाया, पोट्रट बनवाया। चित्र बन गया, तो वह अमीर महिला अपना चित्र लेने आयी। वह बहुत खुश थी। चित्रकार से उसने कहा, कि क्या उसका पुरस्कार दूं? चित्रकार गरीब आदमी था। गरीब आदमी वासना भी करे तो कितनी बड़ी करे, मांगे भी तो कितना मांगे?
हमारी मांग, सब गरीब आदमी की मांग है परमात्मा से। हम जो मांग रहे हैं, वह क्षुद्र है। जिससे मांग रहे हैं, उससे यह बात मांगनी नहीं चाहिए।
तो उसने सोचा मन में कि सौ डालर मांगूं, दो सौ डालर मांगूं, पांच सौ डालर मांगूं। फिर उसकी हिम्मत डिगने लगी। इतना देगी, नहीं देगी! फिर उसने सोचा कि बेहतर यह हो कि इसी पर छोड़ दूं, शायद ज्यादा दे। डर तो लगा मन में कि इस पर छोड़ दूं, पता नहीं दे या न दे, या कहीं कम दे और एक दफा छोड़ दिया तो फिर! तो उसने फिर भी हिम्मत की। उसने कहा कि आपकी जो मर्जी। तो उसके हाथ में जो उसका बैग था, पर्स था, उसने कहा,तो अच्छा तो यह पर्स तुम रख लो। यह बडा कीमती पर्स है।
पर्स तो कीमती था, लेकिन चित्रकार की छाती बैठ गयी कि पर्स को रखकर करूंगा भी क्या? माना कि कीमती है और सुंदर है, पर इससे कुछ आता-जाता नहीं। इससे तो बेहतर था कुछ सौ डालर ही मांग लेते। तो उसने कहा, नहीं-नहीं, मैं पर्स का क्या करूंगा, आप कोई सौ डालर दे दें।
उस महिला ने कहा, तुम्हारी मर्जी। उसने पर्स खोला, उसमें एक लाख डालर थे, उसने सौ डालर निकाल कर चित्रकार को दे दिये और पर्स लेकर वह चली गयी।
सुना है कि चित्रकार अब तक छाती पीट रहा है और रो रहा है–मर गये, मारे गये, अपने से ही मारे गये!

खेल खेल में बुद्धत्‍व–नमो बुद्धस्‍य–(कथा–54) OSHO

Gautam-Buddhaभगवान राजगृह में विहरते थे। उसी समय राजगृह में घटी यह घटना है। उस महानगर में दो छोटे लड़के सदा साथ— साथ खेलते थे। उनमें बड़ी मैत्री थी। अनेक प्रकार के खेल वे खेलते थे। आश्चर्य की बात यह थी कि एक सदा जीतता था औरदूसरा सदा हारता था। और भी आश्चर्य की बात यह थी कि जो सदा जीतता था वह हारने वाले से सभी दृष्टियों से कमजोर था। हारने वाले ने सब उपाय किए पर कभी भी जीत न सका। खेल चाहे कोई भी हो उसकी हार सुनिश्चित ही थी। वहजीतने वाले के खेल के ढंगों का सब भांति अध्ययन भी करता था— जानना जरूरी था कि दूसरे की जीत हर बार क्यों हो जाती है क्या राज है? — एकांत में अभ्यास भी करता था पर जीत न हुई सो न हुई। एक बात जरूर उसने परिलक्षित की थीकि जीतने वाला अपूर्व रूप से शांत था। और जीत के लिए कोई आतुरता भी उसमें नहीं थी। कोई आग्रह भी नहीं था कि जीतू ही। खेलता था—अनाग्रह से। फलाकांक्षा नहीं थी। और सदा ही केंद्रित मालूम होता था जैसे अपने में ठहरा है। औरसदा ही गहरा मालूम होता था छिछला नहीं था ओछा नहीं था। उसके अंतस में जैसे कोई लौ निष्कंप जलती थी। उसके पास एक प्रसादपूर्ण आभामंडल भी था। इसलिए उससे बार— बार हारकर भी हारने वाला उसका शत्रु नहीं हो गया था—मित्रता कायम थी। जीत भी जाता था जीतने वाला तो कभी अहंकार से न भरता था। जैसे यह कोई खास बात ही न थी। खेल अपने में पूरा था जीते कि हारे इससे उसे प्रयोजन नहीं था। मगर जीतता सदा था।
हारने वाले ने यह भी देखा था कि प्रत्येक खेल शुरू करने के पूर्व वह आंखें बंद करके एक क्षण को बिलकुल निस्तब्ध हो जाता था जैसे सारा संसार रुक गया हो। उसके ओंठ जरूर कुछ बुदबुदाते थे— जैसे वह कोई प्रार्थना करता हो या किमंत्रोच्चार करता हो या कि कोई स्मरण करता हो।
अंतत: हारने वाले ने अपने मित्र से उसका राज पूछा क्या करते हो? उसने पूछा हर खेल शुरू होने के पहले किस लोक में खो जाते हो? जीतने वाले ने कहा भगवान का स्मरण करता हूं। नमो बुद्धस्स का पाठ करता हूं। इसीलिए तो जीतता हूं। मैं नहीं जीतता भगवान जीतते हैं।
उस दिन से हारने वाले ने भी नमो बुद्धस्स का पाठ शुरू कर दिया। यद्यपि यह
कोरा अभ्यास ही था फिर भी उसे इसमें धीरे— धीरे रस आने लगा। तोतारटत ही था यह मंत्रोच्चार पर फिर भी मन पर परिणाम होने लगे गहरे न सही तो न सही पर सतह पर स्पष्ट ही फल दिखायी पड़ने लगे। वह थोड़ा शांत होने लगा। थोड़ीउच्छृंखलता कम होने लगी थोड़ा छिछलापन कम होने लगा। हार की पीड़ा कम होने लगी जीत की आकांक्षा कम होने लगी। खेल खेलने में पर्याप्त है ऐसा भाव धीरे— धीरे उसे भी जगने लगा। भगवान के इस स्मरण में वह अनजाने ही धीरे—धीरे डुबकी भी खाने लगा शुरू तो किया था परिणाम के लिए कि खेल में जीत जाऊं लेकिन धीरे— धीरे परिणाम तो भूल गया और स्मरण में ही मजा आने लगा पहले तो खेल के शुरू— शुरू में याद करता था फिर कभी एकांत मिल जाता तोबैठकर नमो बुद्धस्सु नमो बुद्धस्सु नमो बुद्धस्स का पाठ करता। फिर तो खेल गौण होने लगा और पाठ प्रमुख हो गया फिर तो जब कभी पाठ करने से समय मिलता तो ही खेलता। रात भी कभी नीद खुल जाती तो बिस्तर पर पड़ा— पड़ा नमोबुद्धस्स का पाठ करता उसे कुछ ज्यादा पता नहीं था कि क्या है इसका राज लेकिन स्वाद आने लगा। एक मिश्री उसके मुंह में धुलने लगी।

छोटा बच्चा था, शायद इसीलिए सरलता से बात हो गयी। जितने बड़े हम हां जाते हैं उतने विकृत हो जाते हैं। सरल था, कूडा—कचरा जीवन ने अभी इकट्ठा न किया था—अभी स्लेट कोरी थी।
जो बच्चे बचपन में ध्यान की तरफ लग जाएं, धन्यभागी हैं। क्योंकि जितनी देर हो जाती है, उतना ही कठिन हो जाता है। जितनी देर हो जाती है, उतनी ही अड़चनें बढ़ जाती हैं। फिर बहुत सी बाधाएं हटाओ तो ध्यान लगता है। और बचपन मेंतो ऐसे लग सकता है। इशारे में लग सकता है। क्योंकि बच्चा एक अर्थ में तो ध्यानस्थ है ही। अभी संसार पैदा नहीं हुआ है। अभी कोई बड़ी महत्वाकांक्षा पैदा नहीं हुई है। छोटी सी महत्वाकांक्षा थी कि खेल में जीत जाऊं, और तो कोई बड़ीमहत्वाकांक्षा नहीं थी—राष्ट्रपति नहीं होना, प्रधानमंत्री नहीं होना, धनपति नहीं होना, पद—प्रतिष्ठा का मोह नहीं था। गिल्ली—डंडा खेलता होगा, इसमें जीत जाऊं, छोटी सी महत्वाकांक्षा थी, थोड़े ही स्मरण से टूट गयी होगी। थोड़ा सा जालमन ने फैलाया था, थोडे ही स्मरण से कट गया होगा।

एक खुला आकाश उसे दिखायी पड़ने लगा। धीरे— धीरे उसके सपने खो गए और दिन में भी उठते— बैठते एक शांत धारा उसके भीतर बहने लगी।
एक दिन उसका पिता गाड़ी लेकर उसके साथ जंगल गया और लकड़ी से गाड़ी लाद घर की तरफ लौटने लगा मार्ग में श्मशान के पास बैलों को खोलकर वे थोड़ी देर’ विश्राम के लिए रुके— दोपहरी थी और थक गए थे। लेकिन उनके बैल दूसरों केसाथ राजगृह में चले गए— वे तो सोए थे और बैल नगर में प्रवेश कर गए पिता बेटे को वहीं गाड़ी के पास छोड़ गाड़ी को देखने की कह नगर में बैलों को खोजने गया बैल मिले तो लेकिन तब जब कि सूर्य ढल गया था और नगर द्वार— बंद होगए. थे सो वह नगर के बाहर न आ सका। बेटा नगर के बाहर रह गया बाप नगर के भीतर बंद हो गया अंधेरी रात बाप तो बहुत घबड़ाया। श्मशान में पड़ा छोटा सा बेटा क्या गुजरेगी उस पर! बाप तो बहुत रोया— चिल्लाया लेकिन कोई उपाय नथा द्वार बंद हो गए सो द्वार बद हो गए।
और लकड़हारे की सुने भी कौन! और लकड़हारे के बेटे का मूल्य भी कितना! द्वारपालों से सिर फोड़ा होगा, चिल्लाया होगा, रोया होगा, उन्होंने कहा कि अब कुछ नहीं हो सकता, बात समाप्त हो गयी।
अंधेरी रात अमावस की रात और वह छोटा सा लड़का मरघट पर अकेला। लेकिन उस लड़के को भय न लगा। भय तो दूर उसे बड़ा मजा आ गया। ऐसा एकांत उसे कभी मिला ही न था। गरीब का बेटा था छोटा सा घर होगा एक ही कमरे में सबरहते होंगे—और बच्चे होने मां होगी पिता होगा पिता के भाई होने पत्नियां होंगी पिता के भाइयों की बूढ़ी दादी होगी दादा होगे न मालूम कितनी भीड़— भाड़ होगी कभी ऐसा एकांत उसे न मिला था यह अमावस की रात आकाश तारों से भराहुआ यह मरघट का सन्नाटा जहां एक भी आदमी दूर— दूर तक नहीं नगर के द्वार— दरवाजे बंद सारा नगर सो गया यह अपूर्व अवसर था ऐसी शांति और सन्नाटा उसने कभी जाना नहीं था। वह बैठकर नमो बुद्धस्स का पाठ करने लगा। नमोबुद्धस्सु नमो बुद्धस्सु नमो बुद्धस्स कहते कब आधी रात बीत गयी उसे स्मरण नहीं। तार जुड़ गया संगीत जम गया वीणा बजने लगी पहली दफा ध्यान की झलक मिली।
शांति तो मिली थी अब तक, रस भी आना शुरू हुआ था, लेकिन अब तक बूंद—बूंद था, आज डुबकी खा ‘गया, आज पूरी डुबकी खा गया। आज डूब गया, बाढ़ आ गयी।
ऐसा नमो बुद्धस्सु नमो बुद्धस्सु नमो बुद्धस्स कहता— कहता गाड़ी के नीचे सरककर सो गया।
यह साधारण नींद न थी, नींद भी थी और जागा हुआ भी था—यह समाधि थी। उसने उस रात जो जाना, उसी को जानने के लिए सारी दुनिया तडुफती है। उस लकड़हारे के बेटे ने उस रात जो पहचाना, उसको बिना पहचाने कोई कभी संतुष्ट नहींहुआ, सुखी नहीं हुआ। सुख बरस गया। उसका मन मग्न हो उठा। शरीर सोया था और भीतर कोई जागा था—सब रोशन था, उजियारा ही उजियारा था, जैसे हजार—हजार सूरज एक साथ जग गए हों। जैसे जीवन सब तरफ से प्रकाशित हो उठाहो। किसी कोने में कोई अंधेरा न था।
वह किसी और ही लोक में प्रवेश कर गया वह इस संसार का वासी न रहा। जो घटना किसी दूसरे के लिए अभिशाप हो सकती थी उसके लिए वरदान बन गयी मरघट का सन्नाटा मौत बन सकती थी छोटे बच्चे की, लेकिन उस बच्चे को अमृतका अनुभव बन गयी। सब हम पर निर्भर है। वही अवसर मृत्यु में ले जाता है, वही अमृत में। वही अवसर वरदान बन सकता, वही अभिशाप। सब हम पर निर्भर है। अवसर में कुछ भी नहीं होता, हम अवसर के साथ कैसे चैतन्य का प्रवाह लातेहैं, इस पर सब निर्भर होता है।
था मरघट, लेकिन मरघट की तो उसे याद ही न आयी। उसने तो एक क्षण भी सोचा नहीं कि मरघट है। उसने तो सोचा कि ऐसा अवसर, धन्यभाग मेरे। पिता .आए नहीं, बैल लौटे नहीं, सन्नाटा अपूर्व है, द्वार—दरवाजे बंद हो गए, आज इसघडी को भगवान के साथ पूरा जी लू। वह नमो बुद्धस्स कहते —कहते, कहते—कहते, बुद्ध के साथ एकरूप हो गया होगा। जिसका हम स्मरण करते हैं, उसके साथ हम एकरूप हो जाते हैं।
वह निद्रा अपूर्व थी।
इस निद्रा के लिए योग में विशेष शब्द है—योगतंद्रा। आदमी सोया भी होता और नहीं भी सोया होता। इसीलिए तो कृष्ण ने कहा है कि जब सब सो जाते हैं तब भी योगी जागता है। उसका यही अर्थ है। या निशा सर्वभूतानाम् तस्याम् जागर्तिसंयमी—जब सब सो गए होते हैं, जो सब के लिए अंधेरी रात है, निद्रा है, सुषुप्ति है, योगी के लिए वह भी जागरण है।
उस रात वह छोटा सा बच्चा योगस्थ हो गया, योगारूढ़ हो गया। और अनजाने हुआ यह, अनायास हुआ यह। चाहकर भी नहीं हुआ था, ऐसी कुछ योजना भी न थी। अक्सर यही होता है कि जो योजना बनाकर चलते हैं, नहीं पहुंच पाते, क्योंकियोजना में वासना आ जाती है। अक्सर अनायास होता है।
यहां रोज ऐसा अनुभव मुझे होता है। जो लोग यहां ध्यान करने आते हैं बडी योजना और आकांक्षा से, उन्हें नहीं होता। जो ऐसे ही आ गए होते हैं, सयोगवशात, सोचते हैं कर लें, देख लें, शायद कुछ हो, उन्हें हो जाता है।
और पहली दफा तो जब किसी को होता है तो आसानी से हो जाता है, दूसरी दफे कठिन होता है। क्योंकि दूसरी दफे वासना आ जाती है। पहली दफा तो अनुभव था नहीं, तो वासना कैसे करते? ध्यान शब्द सुना भी था तो भी ध्यान का कुछ अर्थतो पकड़ में आता नहीं था—क्या है, कैसा है। जब पहली दफा ध्यान उतर आता है और किरण तुम्हें जगमगा जाती है, ऐसा रस मिलता है कि फिर सारी वासना उसी तरफ दौड़ने लगती है।
वह वासना जो बड़े मकान चाहती थी, बड़ी कार चाहती थी, सुंदर स्त्री चाहती थी, शक्तिशाली पति चाहती थी, धन—पद चाहती थी, सब तरफ से वासना इकट्ठी होकर ध्यान की तरफ दौड़ पड़ती है। क्योंकि जो धन से नहीं मिला, वह ध्यान सैमिलता है। जो पद से नहीं मिला, वह ध्यान से मिलता है। जो किसी संभोग से नहीं मिला, वह ध्यान से मिलता है। तो सब तरफ से वासना के झरने इकट्ठे एक धारा में हो जाते हैं और ध्यान की तरफ दौडने लगते हैं। लेकिन ध्यान वासना सेनहीं मिलता। ध्यान तो निर्वासना की स्थिति में घटता है। जब तुम चाहोगे, तब तुम चूकोगे।
तो तुम्हें यह हैरानी होगी, इस छोटे से बच्चे ने चाहा तो नहीं था, यह घटना कैसे घट गयी! यह बात सार्थक है। घटना ऐसे ही घटती है, अनायास ही घटती है। इस जगत में जो भी श्रेष्ठ है, वह मांगने से नहीं मिलता। मांगने से तो हम भिखारी होजाते हैं। बिना मांगे मिलता है। बिन मांगे मोती मिले, मांगे मिले न चूंन। उसने मांगा भी नहीं था। उसे तो एक अवसर मिल गया कि अंधेरी रात, यह आकाश में झिलमिलाते तारे, यह सन्नाटा, यह चुप्पी, यह नीरव ध्वनि, यह मरघट, वह तोबैठ गया! किसी खास वजह से नहीं, कुछ लक्ष्य न था सामने, उसने शास्त्र भी न पढ़े थे, शास्त्र सुने भी न थे, संतों की वाणी भी नहीं सुनी थी, लोभ का कोई कारण भी नहीं था, वह किसी मोक्ष, किसी भगवान के दर्शन करने को उत्सुक भी नहींथा, कोई निर्वाण भी नहीं पाना चाहता था। मगर यह मौका था सन्नाटे का, और धीरे— धीरे उसे नमो बुद्धस्स के अतिरिक्त कुछ बचा भी नहीं था उसके पास, करता भी क्या! बाप आया नहीं, बैल लौटे नहीं, घर जाने का उपाय नहीं, नगर केद्वार—दरवाजे बंद हो गए, करता भी क्या? वह तो बहुत दिन से जब भी मौका मिलता था, एकांत मिलता था, नमो बुद्धस्स करता था, नमो बुद्धस्स करने लगा। डोलने लगा।
जैसे सांप डोलने लगता है बीन सुनकर, ऐसा मंत्रोच्चार अगर कोई बिना किसी वासना के करे, तो तुम्हारे भीतर की चेतना डोलने लगती है। एक अपूर्व नृत्य का समायोजन हो जाता है। चाहे शरीर न भी हिले, भीतर नृत्य खड़ा हो जाता है।
डोलते—डोलते लेट गया, गाड़ी के नीचे सो गया। सोया भी था और जागा भी था। इस जगत का जो सब से महत्वपूर्ण अनुभव है वह यही है—सोए भी और जागे भी। अभी तो हालत उलटी है—जागे हो और सोए हो। अभी लगते हो कि जागे होऔर बडी गहरी नींद है, आंख खुली हैं और भीतर नींद समायी है। इससे उलटी भी घटना घटती है। अभी तो तुम शीर्षासन कर रहे हो, सिर के बल खड़े हों—जागे हो और सोए हो। जिस दिन पैर के बल खड़े होओगे—वही तो बुद्धत्व का अर्थ है—पैरपर खडे हो जाना। आदमी उलटा खड़ा है। जो सीधा खड़ा हो गया, वही बुद्ध है। वह सोता भी है तो जागता है।
जो रात अभिशाप हो सकती थी, वह वरदान हो गयी। और जो मंत्र मात्र संयोग से मिला था, वह उस रात्रि स्वाभाविक हो गया।
संयोग की ही बात थी कि दूसरा लड़का जीतता था और यह लड़का भी जीतना चाहता था—कौन नहीं जीतना चाहता! के तक जीत के भाव से मुक्त नहीं होते हैं, तो बच्चों से तो आशा नहीं की जा सकती है। बूढों को तो क्षमा नहीं किया जासकता, क्योंकि जिंदगी बीत गयी अभी तक इतना भी नहीं सीखें कि जीतने में कुछ सार नहीं है, हारने में कोई हारता नहीं, जीतने में कोई जीतता नहीं—यहां हार और जीत सब बराबर है, क्योंकि मौत सब को एक सा मिटा जाती है। हारे हुएमिट्टी में गिर जाते हैं, जीते हुए मिट्टी में गिर जाते हैं।
यह तो छोटा बच्चा था, इसको तो हम क्षमा कर सकते हैं, यह जीतना चाहता था। इसने सब उपाय कर लिए थे, इसने सब तरह से निरीक्षण किया था कि जीतने वाले की कला क्या है! क्यों जीत—जीत जाता है! मैं क्यों हार—हार जाता हूं।शक्तिशाली था जीतने वाले से, इसलिए बात बड़ी आश्चर्य की थी—इसकी शक्ति का स्रोत कहां है! क्योंकि शरीर से मैं बलवान हूं, जीतना मुझे चाहिए गणित के हिसाब से। लेकिन जिंदगी बडी अजीब है, यहां गणित के हिसाब से कोई बातघटती कहां है? यहां गणित को मानकर जिंदगी चलती कहां है? यहां कभी—कभी कमजोर जीत जाते हैं और शक्तिशाली हार जाते हैं।
देखते हैं, पहाड़ से जल की धारा गिरती है, चट्टान पर गिरती है। जब चट्टान पर पहली दफा जल की धारा गिरती होगी तो चट्टान सोचती होगी—अरे पागल मुझको तोड्ने की कोशिश कर रही है! और जल इतना कोमल है, इतना स्त्रैण है, औरचट्टान इतनी परुष, और इतनी कठोर, मगर एक दिन चट्टान टूट जाती है। रेत होकर बह जाएगी चट्टान! जो समुद्रों के तटों पर रेत है, जो नदियों के तटों पर रेत है, वह कभी पहाड़ों में बड़ी—बड़ी चट्टानें थीं। सब रेत चट्टान से बनी है। और चट्टानेंटूटती हैं जल की सूक्ष्म धार से, कोमल धार सै। कोमल धार अंततः जीत जाती है। मगर धार में कुछ बात होगी, जीतने का कुछ राज होगा। इस जगत में सब कुछ गणित के हिसाब से नहीं चलता। इस जगत का कुछ सूक्ष्म गणित भी है।
तो सब ऊपर के उपाय कर लिए होंगे उस लडके ने। कैसे खेलता है, उसका एकांत में अभ्यास भी किया था, मगर फिर भी हार—हार गया—न जीता सो न जीता। पूछना नहीं चाहता था उससे, क्योंकि उससे क्या पूछना उसके जीतने का राज!चुपचाप निरीक्षण करता था। जब कोई उपाय न बचा होगा तो उसने पूछा। एक ही बात अनबूझी रह गयी थी कि हर खेल शुरू करने के पहले वह लड़का आंख बंद करके खड़ा हो जाता है, उसके ओंठ कुछ बुदबुदाते हैं, तब एक अपूर्व शांति उसकेचेहरे पर मालूम होती है, एक रोशनी झलकती है। अब सिर्फ यही एक राज रह गया था। और सब तो कर लिया था, उससे कुछ काम नहीं हुआ था।
अंततः उसने पूछा कि भाई मुझे बता दो। क्या करते हो? कैसा स्मरण? क्या मंत्र? संयोग की बात थी कि वह लड़का नमो बुद्धस्स का पाठ करता था। वही उसका बल था। सुना है न तुमने वचन—निर्बल के बल राम। निर्बल भी बली हो जाता हैअगर राम का साथ हो। और बलवान भी कमजोर हो जाता है अगर राम का साथ न हो। यहां सारा बल राम का बल है। यहां जो अपने बल पर टिका है, हारेगा। जिसने प्रभु के बल पर छोड़ा, वह जीतेगा। जब तक तुम अपने बल पर टिके हो,रोओगे, परेशान होओगे, टूटोगे—तब तक तुम चट्टान हो, तब तक तुम रेत हो —होकर दुख पाओगे। खंड—खंड हो जाओगे।
जिस दिन तुमने राम के बल का सहारा पकड लिया, जिस दिन तुमने कहा, मैं नहीं हूं? तू ही है, यही तो अर्थ होता है स्मरण का, प्रभु—स्मरण का, नाम—स्मरण का। उस लड़के ने कहा कि मैं थोड़े ही जीतता हूं भगवान जीतते हैं। मैं उनकास्मरण करता हूं उन्हीं पर छोड़ देता हूं? मैं तो उपकरण हो जाता हूं। जैसा कृष्ण ने अर्जुन को गीता में कहा कि तू निमित्त मात्र हो जा, तू प्रभु को करने दे जो वह करना चाहते हैं, तू बीच में बाधा मत बन। जैसा कबीर ने कहा कि मैं तो बांस कीपोगरी हूं। गीत मेरे नहीं, गीत तो परमात्मा के हैं। जब उसकी मरजी होती, गाता, मैं तो बांस की पोगरी हूं। सिर्फ मार्ग हूं उसके आने का। गीतों पर मेरी छाप नहीं है, गीतों पर मेरा कब्जा नहीं है, गीत उसके हैं, मैं सिर्फ द्वार हूं उसका—उपकरणमात्र।
ऐसा ही उस लड़के ने कहा कि मैं थोड़े ही जीतता हूं! इसमें कुछ राज नहीं है, मैं प्रभु का स्मरण करता हूं, फिर खेल में लग जाता हूं, फिर वह जाने।
मगर इस बात में बडा बल है। क्यौंकि जैसे ही तुम्हारा अहंकार .विगलित हुआ, तुम बलशाली हुए, तुम विराट हुए। अहंकार विगलित होते ही तुम जल की धार हो गए, अहंकार के रहते—रहते तुम चट्टान हो। और अहंकार के विगलित होने काएक ही उपाय है कि किसी भांति तुम अपना हाथ भगवान के हाथ में दे दो। किस बहाने देते हो, इससे कुछ फर्क नहीं पड़ता। तुम्हारा हाथ भगवान के हाथ में हो। तुम निमित्त मात्र हो जाओ।
यह संयोग की ही बात थी कि उस लडके ने कहा, मैं भगवान का स्मरण करता हूं बुद्ध का स्मरण करता हूं—नमो बुद्धस्स।—जीतने के लिए आतुर इस युवक ने इसकी नकलपट्टी शुरू की।
खयाल रखना, कभी—कभी गलत कारणों से भी लोग ठीक जगह पहुंच जाते हैं। कभी—कभी संयोग भी सत्य तक पहुंचा देता है। कभी—कभी तुम जो शुरू करते हो, वह कोई बहुत गहरा नहीं होता, लेकिन शुरू करने से ही यात्रा का पहला कदमपड़ जाता है।
मेरे पास लोग आते हैं, वह कहते हैं, संन्यास हम लेना चाहते हैं, लेकिन कपड़े रंगने से क्या होगा? मैं कहता हूं तुम फिकर छोड़ो, कपड़े तो रंगो, कुछ तो रंगो। वह कहते हैं, कबीर तो कहते हैं—मन न लाए लाए जोगी कपड़ा! मैं कहता हूं, ठीककहते हैं, मन भी रंग जाएगा, तुम कपड़े रंगाने की हिम्मत तो करो! जो कपड़े रंगाने तक से डर रहा है, उसका मन कैसे रंगेगा? कबीर ठीक कहते हैं। मगर खयाल रखना, कबीर ने जोगियों से कहा था। कबीर ने उनसे कहा था जिन्होंने कपड़े रंगलिए थे और मन अभी तक नहीं रंगा था। उन्होंने कहा था—मन न रंगाए जोगी! जोगियों से कहा था कि तुमने मन तो लाया नहीं, रंगा लिए कपड़ा! इससे क्या होगा? अब मन रंगाओ। तुमने अभी कपड़ा भी नहीं रंगाया; तुम अभी जोगी नहीं हो,कबीर का वचन तुम्हारे लिए नहीं है। जिन्होंने कपडा रंगा लिया, उनसे मैं भी कहता हूं—मन न लाए लाए जोगी कपड़ा! मगर तुमसे न कहूंगा। तुमसे तो कहूंगा—पहले जोगी तो बनो, कम से कम कपड़ा तो लाओ। एक बार कपड़ा रंग जाए,इतनी हिम्मत तो करो! और तुम कहते हो कि बाहर के कपड़े से क्या होगा!
बाहर और भीतर में जोड़ है। संयोग और सत्य भी जुड़े हैं। जो बाहर है, एकदम बाहर थोड़े ही है, वह भी भीतर का ही फैलाव है। तुम भोजन तो करते न! तो बाहर से ही भोजन लेते हो, वह भीतर पहुंच जाता है। तुम यह तो नहीं कहते, बाहर काभोजन क्या करना? बाहर का जल क्या पीना? भीतर प्यास है, बाहर के जल से क्या होगा? ऐसा तो नहीं कहते। या कहते हो! भीतर की प्यास बाहर के जल से बुझ जाती है, और भीतर की भूख बाहर के भोजन से बुझ जाती है, और भीतर के प्रेमके लिए बाहर प्रेमी खोजते हो, और कभी नहीं कहते कि प्रेम की प्यास तो भीतर है, बाहर के प्रेमी से क्या होगा?
बाहर और भीतर में बहुत फर्क नहीं है। वृक्ष पर जो फल अभी लटका है, बहुत दूर और बाहर है, जब तुम उसे चबा लोगे और पचा लोगे, भीतर हो जाएगा। तुम्हारा खून बन जाएगा, मांस—मज्जा बन जाएगा। आज तुम्हारे भीतर जो मांस—मज्जा है, कल तुम मर जाओगे, तुम्हारी कब बन जाएगी, तुम्हारी मांस—मज्जा मिट्टी में मिल जाएगी और मिट्टी से फिर वृक्ष उगेगा, और वृक्ष में फिर फल लगेंगे—तुम्हारा मांस—मज्जा फिर फल बन जाएगा। बाहर और भीतर अलग—अलग नहीं हैं, संयुक्त हैं, जुड़े हैं।
इसलिए ऐसे मन को धोखा देने के उपाय मत किया करें कि बाहर से क्या होगा! और यह सिर्फ उपाय है। अब भीतर का तो किसी को पता नहीं, तुम लोगे कि नहीं रंगोगे, बाहर का पता चल सकता है। बाहर से घबड़ाते हो कि लोग गैरिक वस्त्रों मेंदेखकर कहेंगे—अरे, पागल हो गए! लोगों का इतना डर है, लोगों के मंतव्य की इतनी चिंता है! सीधी बात नहीं कहते कि मैं लोगों से डरता हूं कायर हूं बहाना खोजते हो कबीर का कि कबीर ने ऐसा कहा है कि बाहर के कपड़े रंगाने से क्या होगा?मैं भी कहता हूं क्या होगा, लेकिन यह कहा उनसे जिन्होंने रंगा लिए थे। उनसे मैं भी कहता हूं।
बाहर की घटना थी, बिलकुल सयोगवशात शुरू हुई थी। कोई लड़के के भीतर ध्यान की तलाश न थी, न भगवान की कोई खोज थी। खेल—खेल में सीख लिया था, खेल—खेल में दाव लग गया। नमो बुद्धस्स, नमो बुद्धस्स रटने लगा। रटंत थी,तोता—रटत थी, किसी बड़े मूल्य की बात नहीं थी। लेकिन रटते—रटते एक बात लगी कि रटते —रटते ही सतह पर कुछ शांति आ जाती है। वह जो उद्विग्नता थी, वह कम होने लगी। विचार थोड़े क्षीण हुए। वह जो जीत की आंकाक्षा थी, वहभी क्षीण होने
लगी। अब खेलता था, लेकिन खेल में दूसरे ढंग का मजा आने लगा। अब खेलने के लिए खेलने लगा। पहले जीतने के लिए खेलता था।
जो जीतने के लिए खेलता है, उसकी हार निश्चित है। क्योंकि वह तना हुआ होता है, वह परेशान होता है। उसका मन खेल में तो होता ही नहीं, उसकी आंख गडी होती है आगे, भविष्य में, फल में—जल्दी से जीत जाऊं। जो खेलने में ही डूबा होताहै, उसको फल की कोई फिकर ही नहीं होती। वह खेलने में पूरा संलग्न होता है। उसके पूरे संलग्न होने से जीत आती है। और जीत की आंकाक्षा से पूरे संलग्न नहीं हो पाते, तो हार हो जाती है।
तुम देखते न, आमतोर से सब लोग कितनी अच्छी तरह बातचीत करते हैं, गपशप करते हैं। फिर किसी को मंच पर खड़ा कर दो, और बस उनकी बोलती बंद हो गयी, हाथ—पैर कंपने लगे। क्या हो जाता है मंच पर पहुंचकर? कौन सी अड़चन होजाती है? भले —चंगे थे, सदा बोलते थे, असल में इनको चुप ही करना मुश्किल था, बोल—बोलकर लोगों को उबा देते थे, आज अचानक बोलती बंद क्यों हो गयी? आज पहली दफा लोगों को सामने बैठे देखकर इनको एक खयाल पकड़ गया किआज कुछ ऐसा बोलना है कि लोग प्रभावित हो जाएं। बस, अड़चन हो गयी। आज बोलने में पूरी प्रक्रिया न रही, लक्ष्य में ध्यान हो गया। लोग प्रभावित हो जाएं! ये इतनी आंखें जो देख रही हैं, ये सब मान लें कि हां, कोई है बोलने वाला! कोई हैवक्ता! बस इसी से अड़चन हो गयी।
मंच पर खड़े होकर अभिनेता कंपने लगता है, हाथ—पैर डोलने लगते हैं, पसीना—पसीना होने लगता है। क्यों? पहली दफा कृत्य में नहीं रहा, कृत्य के पार आंकाक्षा दौड़ने लगी। बड़ा अभिनेता वही है जिसको इसकी चिंता ही नहीं होती कि लोगोंपर क्या परिणाम होंगे। और बड़ा वक्ता वही है जिसे खयाल भी नहीं आता कि लोग इसके संबंध में क्या सोचेंगे। बड़ा खिलाड़ी वही है जो खेल में पूरा डूब जाता है, समग्रभावेन। उसी से जीत आती है।
धीरे— धीरे इसको भी फिकर छूटने लगी। यह लडका भी रस लेने लगा खेलने में। एक और ही मजा आने लगा। एक और तरह की तृप्ति मिलने लगी। अंतर्निहित हो गयी तृप्ति खेल के भीतर। क्रीड़ा में ही रस हो गया। खेल काम न रहा। खेलपहली दफा खेल हुआ।
इसलिए इस देश में हम कहते हैं— भगवान ने सृष्टि बनायी, ऐसा नहीं कहते—सृष्टि का खेल खेला, लीला की। क्या फर्क है खेल और सृष्टि में?
पश्चिम में क्रिश्चियनिटी है—ईसाइयत है—जुदाइजम है, इस्लाम है, वे सब कहते हैं, भगवान ने दुनिया बनायी। कृत्य की तरह। छह दिन में बनायी, फिर थक गया। खेल से कोई कभी नहीं थकता, खयाल रखना, इसलिए हिंदुओं के पास छुट्टीका कोई उपाय ही नहीं है भगवान के लिए। छह दिन में थक गया, सातवें दिन विश्राम किया। इसीलिए तो रविवार को छुट्टी मनाते हैं ईसाई। भगवान तक ने छुट्टी ली तो आदमी का क्या! भगवान थक गया छह दिन बना—बनाकर, उस दिनविश्राम किया उसने। देर से उठा होगा सुबह, अखबार भी देर से पढ़ा होगा, चाय भी बिस्तर पर बुलायी होगी, पत्नी को डाटा—डपटा भी होगा, बिस्तर पर ही लेटे—लेटे रेडियो सुना होगा, या टी वी देखा होगा—जो कुछ भी किया—दोपहर तकसोया रहा होगा। थक गया। कृत्य, काम थका देता है।
इस देश में हमारी धारणा है, यह जगत भगवान की लीला है; थका ही नहीं, अभी तक छुट्टी नहीं ली। छुट्टी की धारणा ही भारत के पुराणों में नहीं है, कि भगवान छुट्टी ले। छुट्टी का मतलब तो हुआ, थक जाए। खेल से कभी कोई थकता है!
सच तो यह है, जब तुम काम से थक जाते हो तो खेल में थकान मिटाते हो। दिनभर दफ्तर से लौटे, फिर घर आकर ताश खेलने लगे, या बैडमिंटन खेलने लगे। छह दिन थक गए, फिर सातवें दिन गोल्फ खेलने चले गए। थकान को मिटाते होखेल से। तो खेल से तो कोई कभी थकता नहीं, खेल से तो पुनरुज्जीवित होता है। हमारी धारणा यही है कि जीवन कृत्य नहीं होना चाहिए, जीवन खेल होना चाहिए। खेल का यही फर्क है। कृत्य का लक्ष्य होता है, खेल का लक्ष्य नहीं होता। खेलमें कोई फलाकांक्षा नहीं होती, काम में फलाकांक्षा होती है।
तुम दफ्तर में बैठे काम करते हो, थक जाते हो, उतना ही काम तुम रविवार के दिन घर में बैठकर करते रहते हो, नहीं थकते। अपना काम, तो खेल है। खोल ली कार, सफाई करने लगे, तो नहीं थकते, दिनभर लगे रहते हो। दफ्तर में फाइल यहांसे वहा रखने में थक जाते हो। जहां काम आया, वहा थकान है। क्योंकि काम आया, लक्ष्य आया।
उस लड़के को पहली दफा खेल खेल हुआ। अब मजा और ही आने लगा, अब जीत की कोई चिंता न रही।
संयोग से यह घटना घटी थी। नमो बुद्धस्स कहना ऐसे ही खेल—खेल में शुरू किया था। लेकिन उस रात संयोग स्वाभाविक हो गया। उस रात मंत्र प्राणों में उतर गया। उस दिन मंत्र ऊपर—ऊपर न रहा, उस दिन मंत्र को उच्चार न करना पड़ा,उस दिन भीतर से उच्चार उठने लगा। इसी को तो हमने प्रणव कहा है। जब मंत्र अपने आप उठने लगे।
वह सन्नाटा, वह रात, जरा सोचो उस रात की। तुम होते, तुम्हारे भीतर भी कुछ होता— भय पकड़ता। और भय उठने लगता तुम्हारी नाभि सै, और सारे प्राण भय से कंपने लगते। कंपित हो जाते, रात ठंडी भी होती तो पसीना आता। भूत—प्रेतदिखायी पड़ने लगते। मरघट, कोई साधारण जगह नहीं! अंधेरी रात, छोटा सा बच्चा! लेकिन यह संयोग, यह सुअवसर पाकर जो मंत्र अब तक किसी तरह ऊपर—ऊपर चलता रहा था, आज उसने पहली दफे डुबकी मार दी। इस मौके का अपूर्वलाभ हो गया। उसके हृदय से गुजार उठने लगी होगी। अब ऐसा कहना ठीक नहीं कि उसने नमो बुद्धस्स का पाठ किया, अब तो ऐसा कहना ठीक होगा, नमो बुद्धस्स का पाठ हुआ। उस अपूर्व अवसर के बीच यह घटना घटी। ध्यान स्वाभाविकहुआ।
रात्रि वहां श्मशान में कुछ भूत आए। श्मशान! वे बड़े प्रसन्न हुए। वे उस लड़के को खा जाना चाहते थे। वे अनायास मिले इस शिकार से अत्यंत खुश हो गए और उसके आसपास नाचने लगे।
और वह लड़का तो उस दशा में था—या निशा सर्वभूतानाम् तस्याम् जागर्ति संयमी। वह तो सोया था और जागा भी था।
भूतों को नाचते देखकर वह उठकर बैठ गया। भूत नाच रहे थे वह भी अपने भीतर के नाच में मग्न हो गया उसने फिर नमो बुद्धस्सु नमो बुद्धस्स कहना शुरू कर दिया।
लड़के की जैसे ही आंखें खुलीं, भूतों को नाचते देखा, वह भी अपने अंतर के नृत्य में संलग्न हो गया। आज उसे भूत डरा न पाए। जिस दिन ध्यान हो जाए, उस दिन मृत्यु डरा नहीं पाती— भूत यानी मृत्यु के प्रतीक। जिस दिन ध्यान हो जाए,उस दिन तो कुछ भी नहीं डरा पाता। ध्यानी के लिए भय होता ही नहीं। उसे तो खूब मजा आया। उसने तो सोचा होगा, तो ये भी ध्यानस्थ हो गए या बात क्या है? यै भी नमो बुद्धस्स का पाठ करते हैं, या बात क्या है? उसे वे भूत जैसे दिखायी हीन पड़े होंगे। और जब उसने नमो बुद्धस्स का उच्चार शुरू कर दिया तो भूत घबड़ा गए। जब अमृत मौजूद हो तो मौत घबड़ा जाती है। जब ध्यान मौजूद हो तो यमदूत घबड़ा जाते हैं। वे तो बहुत घबड़ा गए।
उन्होंने गौर से देखा यह कोई साधारण बच्चा नहीं था इसके चारों तरफ प्रकाश मंडित था एक आभामंडल था वे तो उसकी सेवा में लग गए। वे तो भागे गए राजमहल सम्राट की सोने की थाली और सम्राट का भोजन लेकर आए। उस छोटे सेबच्चे को भोजन कराया, उसकी खूब पूजा की। फिर उसके पैर दाबे। रातभर उसकी रक्षा की पहरा दिया।
ये तो प्रतीक हैं। जिसको ध्यान लग गया, मौत भी उसका पहरा देती है। जिसको ध्यान लग गया, मौत भी उसकी सेवा करती है। इस बात को खयाल में रखना, प्रतीकों पर मत चले जाना। ऐसे कुछ भूत हुए, ऐसा नहीं है, ऐसा अर्थ मत ले लेना।ये तो सिर्फ सांकेतिक कथाएं हैं। ये इतना ही कहती हैं कि ऐसा घटता है। जब अमृत भीतर उपलब्ध होता है, तो मौत सेवा में रत हो जाती है। मौत तभी तक घातक है जब तक तुम मरणधर्मा से जुडे हो। जब तक तुम सोचते हो मैं देह हूं तब तकमौत घातक है। जिस दिन तुमने जाना कि मैं देह नहीं हूं, मैं मन नहीं हूं, उस दिन मौत घातक नहीं है।
रात्रिभर पहरा देते रहे और सुबह जब सूरज ऊगने लगा तो जल्दी से सोने की थाली को गाड़ी की लकड़ियों में छिपाकर भाग गए। प्रात: नगर में यह समाचार फैला कि राजमहल से सम्राट के स्वर्ण— थाल की चोरी हो गयी है। सिपाही इधर—उधर खोजते हुए न पाकर अंतत: नगर के बाहर भी खोजने लगे। उस गाड़ी में वह स्वर्ण—कैल पाया गया। उस लडके को यही चोर है ऐसा मान सम्राट के समक्ष प्रस्तुत किया गया। और वह लड़का तो रास्तेभर नमो बुद्धस्स जपता रहा उसकीमस्ती देखते ही बनती थी। शहर में भीड़ उसके पीछे चलने लगी! वैसा रूप किसी ने देखा नहीं था।
वह उसी गांव का लड़का था! लेकिन अब किसी और दुनिया का हिस्सा हो गया था। उसका बाप भी भीड़ में चलने लगा, वह बाप भी बड़ा चकित हुआ—इस लड़के को क्या हो गया है! यह अपना नहीं मालूम होता। यह तो कहीं बहुत दूर मालूमहोता है, यह कुछ और मालूम होता है। इसको हमने पहले कभी इस तरह देखा नहीं! सिपाही हथकड़ियां डाले थे, लेकिन अब कैसी हथकडिया! सिपाही उसे महल की तरफ ले जा रहे थे, लेकिन वह जरा भी शंकित नहीं था, अब कैसी शंका। अबकैसा भय! वह मग्न था। सिपाही थोडे बेचैन थे और परेशान थे। और भीड़ बढ़ने लगी। और जब सम्राट के ‘सामने लाया गया तो सम्राट तक भौचक्का रह गया जो देखा उसने सामने सम्राट था बिंबिसार। उस समय का बड़ा प्रसिद्ध सम्राट था।बुद्ध के पास जाता भी था। बुद्ध से ध्यान की बातें भी सुनी थीं। जो बुद्ध में देखा था, जो बुद्ध के कुछ खास शिष्यों में देखा था, उसकी ही झलक—और बड़ी ताजी झलक जैसे झरना अभी फूटा हो, फूल अभी खिला हो—इस लड़के में थी।
वह उस लड़के को पूछा कि हुआ क्या है? यह थाल तूने चुराया? उस लड़के ने सारी कथा कह दी कि हुआ ऐसा। मैं नमो बुद्धस्स कहते— कहते सो गया— सोया भी जागा भी। मानो न मानो ऐसा हुआ। मुझसे भी कोई पहले कहता तो मैं भी नमानता कि सोना और जागना एक साथ हो सकता है। मगर ऐसा हुआ। कुछ बातें ऐसी हैं जो हो तभी मानी जा सकती हैं। न हो तो मानने का कोई उपाय नहीं। उसने कहा आप भरोसा कर लो ऐसा हुआ। मेरे आसपास कुछ लोग आकर नाचनेलगे। मैने आंख खोली उनको नाचते देखकर मैं भी मस्त हुआ। मैने सोचा शायद ये भी नमो बुद्धस्स का पाठ कर रहे हैं तो मैं फिर नमो बुद्धस्स का पाठ करने लगा। फिर पता नहीं उन्हें क्या हुआ वे मेरे चरण दाबने लगे भोजन लाए थाली लाएमुझे भोजन करवाया मुझे सुलाया रातभर मेरे पास खड़े रहे पहरा देते रहे सुबह इस थाली को लकड़ियों में छिपाकर भाग गए। फिर आपके सिपाही आए फिर तो कथा आपको मालूम है इसके बाद की कथा आपको मालूम है।
सम्राट उसे लेकर भगवान बुद्ध के पास. गया। भगवान राजगृह में ठहरे थे। सम्राट ने भगवान से पूछा— भंते क्या बुद्धानुस्मृति इस तरह की रक्षक हो सकती क्या नमो बुद्धस्स के पाठ मात्र से इस छोटे से बच्चे को जो हुआ है वह किसी को होसकता है? और यह भी खेल— खेल में! मैं तो लोगों को जीवनभर तपश्चर्या करते देखता हूं तब नहीं होता कैसे भरोसा करूं कि इस छोटे से लड़के को हो गया है? आप क्या कहते हैं? क्या इस लड़के की कथा सच है?
भगवान ने कहा— हां महाराज बुद्धानुस्मृति स्वयं के ही परम रूप की स्मृति है। जब तुम कहते हो नमो बुद्धस्सु तो तुम अपनी ही परम दशा का स्मरण कर रहे हो— तुम्हारा ही भगवत— स्वरूप।
बुद्ध यानी कोई व्यक्ति नहीं, बुद्ध का कुछ लेना—देना गौतम बुद्ध से नहीं है। बुद्धत्व तो तुम्हारे ही जागरण की आखिरी दशा है, तुम्हारी ही ज्योतिर्मय दशा है, तुम्हारा ही चिन्मय रूप है। जब तुम स्मरण करते हो—नमो बुद्धस्स, तो तुम अपने हीचिन्मय रूप को पुकार रहे हो। तुम अपने ही भीतर अपनी ही आत्मा को आवाज दे रहे हो। तुम चिल्ला रहे हो कि प्रगट हो जाओ, जो मेरे भीतर छिपे हो। नमो बुद्धस्स किसी बाहर के बुद्ध के लिए समर्पण नहीं है, अपने अंतरतम में छिपे बुद्ध केलिए खोज है। और अगर कोई सरल चित्त हो तो जल्दी हो जाता है।
इसीलिए जल्दी हो गया, यह छोटा बच्चा है, सरल चित्त है। तपस्वी सरल चित्त नहीं हैं। बड़े कठिन हैं, बड़े कठोर हैं। और वासना से भरे हैं, लोभ से भरे हैं। ध्यान करने चले हैं, लेकिन ध्यान में भी पीछे लक्ष्य बना हुआ है। इसने बिना लक्ष्य केकिया इसलिए हो गया। इसे सहज समाधि लग गयी है।
नमो बुद्धस्स या बुद्धानुस्मृति स्वयं के ही परम रूप की स्मृति है। वह सतह के द्वारा अपनी ही गहराई की पुकार है। वह परिधि के द्वारा केद्र का स्मरण है। वह बाह्य के द्वारा अंतर की जागृति की चेष्टा है उसके अतिरिक्त और कोई शरणनहीं है। उसके अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं है। वही मृत्यु से रक्षा और अमृत की उपलब्धि बनती है। और तब उन्होंने ये गाथाएं कहीं—
सुप्पुबुद्धं पबुज्झंनति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्तोब च निच्चंत बुद्धगता सति ।।
सुप्‍पबुद्धं पबुज्झं ति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्तोझ च निच्चंत धम्मिगता सति ।।
सुप्पाबुद्धं पबुज्झंिति सदा गोतमसावका।
येसं दिवा च रत्तोत च निच्चंत संधगता सति ।।

‘जिनकी स्मृति दिन—रात सदा बुद्ध में लीन रहती है, वे गौतम के शिष्य सदा सुप्रबोध के साथ सोते और जागते हैं।’
‘जिनकी स्मृति दिन—रात सदा बुद्ध में लीन रहती है।’

 

http://oshosatsang.org/2014/01/28/%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%96%E0%A5%87%E0%A4%B2-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AC%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%A7%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%B5-%E0%A4%A8%E0%A4%AE%E0%A5%8B/