मूलनिवासी आत्मस्वाभिमान की मिसाल: ब्राह्मणवादियों/जातिवादियों ने जब पत्नी को पानी देने से मना किया तो भारतवासी/मूलनिवासी (जिसे मीडिया दलित कहता है) व्यक्ति जिसका नाम है:- बापूराव ताजणे ने खुद का कुआं खोदा,अब सारा गांव उससे पानी भरता है, वो भी जो उसके कुआँ खोदने की कोशिश का मज़ाक उड़ाते थे


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अपनी पत्नी के पैर फिसलकर पहाड़ से गिर जाने के बाद दशरथ मांझी द्वारा वर्षों की मेहनत से पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बना देने की कहानी तो आपने सुनी ही होगी. मांझी की कहानी भले ही कई साल पुरानी हो लेकिन पति द्वारा अपनी पत्नी को मुश्किलों से बचाने की कहानियां इस देश में और भी हैं.

ऐसा ही कुछ नागपुर में हुआ, जहां अपनी पत्नी को पानी के लिए दुत्कारे जाने के बाद पति ने एक कुआं खोद डाला. नागपुर के इस शख्स की कोशिशें भले ही दशरथ मांझी जितनी मुश्किल और बड़ी न हों लेकिन अपनी पत्नी के लिए इस शख्स का प्रेम उतना ही गहरा जरूर है. आइए जानें इस शख्स की ये हैरान कर देने वाली कहानी.

पत्नी को नहीं दिया गया पानी तो पति ने खोद डाला कुआं:

अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक वाशिम जिले के कालामबेश्वर गांव के गरीब श्रमिक बापूराव ताजणे दलित समुदाय के हैं. ऊंची जाति के लोगों ने उनकी पत्नी को अपने कुएं से पानी देने से मना कर दिया. बस फिर क्या था, पत्नी और दलितों के अपमान से तिलमिलाए बापूराव जुट गए उस काम को करने में जिसे लोग असंभव मानते थे. बापूराव ने 40 दिन तक हर दिन छह घंटे की खुदाई करते हुए एक कुआं खोद डाला.

इस काम में गांव के तो छोड़िए खुद बापूराव के परिवार वालों ने भी उनका सहयोग नहीं किया क्योंकि उन्हें लगता था कि बापूराव पागल हो गया है. उन लोगों के ऐसा सोचने की वजह भी थी, जिस पथरीले इलाके में बापूराव कुआं खोदने की कोशिश कर रहा था उस जगह के पास ही स्थित तीन कुएं और एक बोरवेल पहले ही सूख चुके थे. लेकिन आमतौर पर जिस काम को 5-6 लोग मिलकर अंजाम देते हैं, उसे बापूराव ने अकेले ही करते हुए तब तक कुआं खोदना जारी रखा, जब तक कि पानी नजर नहीं आ गया.

बापूराव की मेहनत आखिरकार रंग लाई और कुएं में पानी दिख गया. इस कुएं से बापूराव ने न सिर्फ अपनी पत्नी के लिए पानी उपलब्ध करवाया बल्कि अपने गांव के पूरे दलित समुदाय के लिए पानी का इंतजाम कर दिया. अपनी मेहनत से बापूराव ने दलितों की ऊंची जातियों के ऊपर पानी के लिए निर्भरता भी खत्म करने में मदद की.

बीए फाइनल ईयर तक की पढ़ाई करने वाले बापूराव पेशे से मजदूर हैं. इसलिए हर दिन वह काम पर जाने से पहले 4 घंटे और फिर वापस आने के बाद 2 घंटे कुआं खोदने का काम करते थे. इस तरह लगातार 40 दिनों तक उन्होंने बिना ब्रेक लिए रोजाना 14 घंटे मेहनत की. उनकी पत्नी संगीता यह कुआं खोदे जाने से खुश तो हैं लेकिन उन्हें इस बात की निराशा है कि शुरुआत में उन्होंने इस काम में पति का साथ नहीं दिया. लेकिन अब वह और उनका पूरा परिवार बापूराव की मदद करने में जुट गए हैं. 6 फीट चौड़े और 15 फीट गहरे कुएं को बापूराव 5 फीट और गहरा और 2 फीट और चौड़ा करना चाहते हैं.

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बापूराव खराब व्यवहार करने वाले कुआं मालिकों को नाम नहीं लेना चाहते क्योंकि इससे गांव में खून-खराबा हो सकता है. उस दिन की घटना को याद करते हुए वह कहते हैं, मैं उनका नाम नहीं लेना चाहता लेकिन उन्होंने हमारा अपमान किया क्योंकि हम गरीब और दलित हैं. उस दिन से मैंने किसी से कुछ भी न मांगने की कसम खाई और मालेगांव जाकर औजार लाया और खुदाई शुरू कर दी.

ये कहानी दिखाती है कि अगर इंसान में कुछ कर दिखाने का जज्बा और जुनून हो तो दुनिया में कोई भी काम असंभव नहीं है. बापूराव ने अपनी पत्नी के अपमान की तड़प से वो कर दिखाया जिससे कइयों की जिंदगी में खुशहाली आ गई. ऐसे जज्बे और प्रेम को सलाम!

इसी तरह बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को जब ब्राह्मण/हिन्दू  धर्म के महलों में सम्मान और पूछ नहीं मिली तो उन्होंने वापस अपने खुद के टूटे फूटे पड़े झोपड़े “बौद्ध धम्म” को दुरुस्त किया और उसकी शरण न केवल खुद लौटे बल्कि भारतवासियों को भी लौटा दिया, ये बहुत बड़ी क्रांति है|

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