21-MAY-2016 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-भारत के मूलनिवासियों के दलितीकरण करने से उनमे अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में बेहद कमी आयी थी, जिसके कारन वो अपने हकों के लिए संगर्ष कर पाने में असमर्थ रहे, आज की चर्चा का विषय है बहुजन समाज और स्वास्थ्य के सूत्र


dalit fighter buddhistये जिन्दगी का पहला नियम है की जैसा होगा भोजन वैसे  होंगे तन और मन| सम्यक, संतुलित, और सात्विक आहार शरीर और मन को पुष्ट करता है| तला हुआ चटपटा मसालेदार खाना हाजमे को ख़राब करता है और शरीर को बोझिल बनाता हैकभी कभी तो चल सकता है पर लिमिट से ज्यादा नहीं होना चाहिए|संतुलित और स्वच्छ आहार खाना जिसमें हरी सब्जी फल दूध आदि पर विशेष ध्यान देना, बुरी चीज़े जैसे नशे वाली- ड्रगस शराब सिगरेट आदि , बासी मांस का सेवन हरगिज़ नहीं करना चाहिए|

सामाजिक चर्चा में किसी ने एक बार मुझे पूछा था की हमारे लोगों की शारीरिक बनावट ज्यादा मजबूत नहीं है, तो जब शारीरिक शक्ति से संगर्ष की बात आती है तो पीछे हटना पड़ता है इसका क्या करें? साथियों  इसके जवाब के लिए है की आपको एक उदाहरण देता हूँ-

राष्ट्रपति भवन के उद्यान के सर्व संपन्न माहोल  से एक ही पेड़ के एक से दो पौधे लो, आप ये तो मानेंगे न को दोनों पौधे बड़े अच्छे माहोल से लिए गए हर लिहाज से तंदुरुस्त हैं एक जैसे हैं | इनमें से एक पौधे को उपजाऊ और एक पौधे को बंजर जमीन पर लगाओ, अब ये बताने की जरूरत तो नहीं है की कोन सा पौधा तगड़ा हुआ  कोन सा पौधा कमजोर रहा | साथिओं इस बंजर जमीन के पेड़ जैसी स्तिथि हमारे समाज की रही है ,हमारे समाज को सदियों  से संतुलित और संपूर्ण आहार से वंचित रखा गया,जबकि सवर्णों ने अच्छा आहार और पोषण लिया|यही कारन है की सवर्णों की कद काठी बहुजनों से सवाई होती है| क्षत्रिये ने ताकत के बल पर और वैश्य ने धनबल से और ब्राहमण वर्ग ने गुज़रे समय भी शिक्षा दीक्षा और भिक्षा के मार्ग पर चलकर अपने लिए बेहतरीन आहार की व्यस्था की |ये हम सभी जानते हैं की इस देश में ब्राह्मणों को जिमाने का चलन था और जब लोगों को रोटी तक नसीब नहीं थी तब भी ये अपनी ज्ञान के बदले  मांगने की क्षमता के बल पर अपने लिए हलुआ पूड़ी की व्यस्था कर पाते थे,और इसे कहते हैं “Fittest survives in any conditions” अर्थात किसी भी स्तिथि में योग्य  अपने अस्तित्व को बनाये रखता है |खेर ये पुरानी बात है पर तात्पर्य समझो की कैसी  भी स्तिथि हो बेहतरीन आहार लेने का जुगाड़ करते रहो|

अगर हम संपन इलाके में रहने वाले अपने लोगों की बात करें जैसे शहरों के लोग तो उन्होंने आहार सुरक्षा प्राप्त कर ली है | बहुजन समाज के सक्षम वर्ग की नयी पीढ़ी की सेहत अंपनी खुद की पिछली पीढ़ी से बेहतर है,लम्बाई भी बढ़ी है|पर शहरों में निकल आये समाज के ज्यदातर लोग संतुलित और संपूर्ण आहार जुटाने की क्षमता होते हुए  भी ताकतवर नहीं हो पा रहे हैं| इसका मुख्य कारण है की वे अपने आहार का चुनाव करना नहीं सीखे हैं|

बहुजन समाज के एक बड़े हिस्से के पतन का बड़ा कारन शराब या नशे का चुनाव है| अगर मजदूर वर्ग से शुरू करें तो एक दिन में 300 रुपये कमाने वाला यदि १०० रूपए की शराब पिएगा तो उसके परिवार को बाकी बचे 200 रुपये में जरूरी खर्चे को  काट कर कुछ 80 रूपए के आहार में गुज़ारा करना पड़ेगा,जबकि अगर वो शराब न पिए तो १४० रूपए का आहार तो उसके लिए उपलब्द है, चाहे तो वो बचत भी कर सकता है यही नियम गाँव में भी लागू है हर जगह लागू है |बहुजनों में से कुछ कहते हैं की हमारी स्तिथि बेहतर है हम अपने परिवार को पाल भी लेते हैं बचत भी कर लेते हैं और शराब भी पी लेते हैं| आज के युग में आहार आप 100 रूपए रोज़ शराब में खर्च करते हैं तो हिसाब लगाओ १ महीने में 3000 और एक साल में 36000 की शराब पीते हैं | अगर आप इस धनराशी को बचा पाते तो सोचिये ये आपके कहाँ काम आती, इतना ही नहीं अपने अपनी  सेहत की भी तो सुरक्षा की है,कई तरह की दवाइयों के खर्चे की बचत भी तो जोड़ लो| केवल फायदा ही फायदा है नुक्सान कुछ भी नहीं, इसीलिए अपनी  इस लत से जल्द से जल्द छुटकारा पा लो, अगर नहीं पाओगे तो पतन निश्चित है|

आज पूंजीवाद के इस युग में मीडिया की शक्ति का दुरूपयोग करके भोले भाले  लोगों को शराब की तरफ हर तरह से फुसला लिया है|किसी को ज्ञान का नशा है किसी को शक्ति का तो किसी को अपने धन का नशा है जिसके पपस न ज्ञान है न शक्ति न ही धन है को कृत्रिम नशा कर के खुश होता है| ऐसे लोग समझते हैं की शाराप पी ली तों बहुत रहीसी और शान वाला काम हो गया, पार्टी के नाम पर सिर्फ शराब ही रह गई है| सारा इतिहास भरा पड़ा है की नशे की लत में कितने ही लोग और समाज बर्बाद हुए, इसीलिए महकल्यानकारी  बौद्ध धर्म के अतिविशिस्ट पञ्च शील वचन में से “नशे के सेवन से बच के रहना पहला शील या उसूल है”शराब से भी कई गुना ज्यादा नुक्सान धुम्रपान और तम्बाखू सेवन से होता है, ये चीज़े अगर आप नहीं छोड़ना चाहते तो कम से कम इतना करो की सिगरेट,बीडी,हुका आदि को बिलकुल त्याग दो और शराब को कम पीओ पर अच्छी वाली पीओ और केवल चुनिन्दा मौकों पर ही लो| जो कामयाब और खुशाल है उसकी आदतों पर थोड़ा ध्यान तो दो, ब्राह्मणों की बुराई तो निकाल लेते हो पर ये भी तो देखो की आज भी सक्षम लोगों में जैसे ब्राह्मणों में धन होते हुए भी इन चीज़ों का प्रयोग नहीं होता और जो करने लगे हैं उनका पतन भी हो रहा है |

आप किसी भी दावत में जाओ या रेसटोरेंट में जाओ हर जगह उपलब्ध व्यंजनों में कुछ ज्यादा पौष्टिक व्यंजन होते हैं तो कुछ कम, हमारा जोर ज्यादा पौष्टिक खाने पर होना चाहिए| मैदा वाले जैसे चौमीन की जगह पनीर के व्यंजन,कोल्ड ड्रिंक की जगह लस्सी या जूस | खेर इतना तो हम सभी समझते हैं बस इसे लागू करने की बात है पर इन बातों का जिक्र जरूरी इसलिए था क्योंकि मैं उस वर्ग को समझा सकूं जिसे वाकई इस ज्ञान की जरूरत है|इसका ये मतलब न समझे की चौमीन, कोल्ड ड्रिंक समोसा जैसे चीज़ों की बिलकुल त्याग दो बस इनका प्रयोग कम करो केवल स्वाद तक ही सीमित रखो,और स्वाद का क्या है एक बार लिए बार बार लिया हमेशा एक सी ही अनुभूति होनी है |मेरा एक ब्रह्मण मित्र था उसने मुझे बताया की जब वह पतला था तब खाने में ज्यादा जोर पनीर को दिया था,घर पर खरीद नहीं सकता था तो दावत आदि में खूब पनीर खाया!, इसी तरह एक और  साथी थे वे अपने बड़ते वजन की वजह से कई तरह के चिकने भोजन को त्याग दिया| जिन्दगी का नियम है “आपको वही मिलता है जिसे आप चुनते हो” ,आहार भी एक चुनाव की बात है|

आज पूँजीवाद का दौर है  अर्ताथ कुछ भी हो धन जमा होना चाहिए, ऐसे समय में मिलावट के खाद्य पदार्थ मिलने की बड़ी सम्भावना रहती है, थोडा सचेत रहे  तों काफी हद तक बचा जा सकता है |

मैं ये जनता हूँ की ऐसी ज्ञान की बातें कहने सुनने को रोज ही मिलतीं हैं पर मैं इनके जिक्र से आपमें चुनाव और किस चीज़ को कितनी लिमिट में रखना है ये योग्यता विकसित करना चाहता हूँ|

एक और सवाल जिससे हमारे लोग काफी ग्रसित हैं – क्या हममे  दब्बूपन ज्यादा है ? ये दुष्प्रचार है,ऐसा नहीं है, वीरता धन व राजसत्ता की क्षमता,जगह,मौका,वक़्त और समय पर निर्भर है,जहाँ हम शक्तिहीन हैं  वहाँ तो निभ कर चलना ही पड़ेगा| ये नियम हर वर्ग पर लागू है चाहे वो कितनी भी लड़ाकू कौम  हो, जब चोट लगती है तो दर्द सबको होता है |जिस कौम में क़ुरबानी के बकरे नहीं वाही कौम पिछड जाती है,कुबानी हर कौम को देनी होती है दबंग लोग स्वेच्छा  से लड़ते व क़ुरबानी देते हैं पिछड़े लोग अत्याचार के शिकार होकर क़ुरबानी देने को बाध्य होते हैं|मरना सभी को है तो इससे पहले कोई हमें मार तो उसे ही क्यों नहीं मार देते,फिर जो होगा देखा जायेगा | अगर पिछड़े लोग अत्याचार के विरोध करते हुए क़ुरबानी दे और उसका समाज उस क़ुरबानी की वीर गाथा को पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखे तो आप भी दबंग बन जायेंगे| अपने को क्षत्रिये समझने वाले लोगों ने अपना आत्मबल उचा रखने के लिए बहुत सी वीर गाथाओं को अपने जीवन का हिस्सा बना रखा है,किसी गाथा का उल्लेख यहाँ करना जरूरी नहीं है फिर भी किसी गाथा का छोटा सा हिस्सा देखिये :

बारह वर्ष कुकर जिए पंद्रह वर्ष जिए सियार 

क्षत्रिये जिए २० वर्ष उससे ज्यादा जीना है बेकार 

अब बात आती है की हिम्मत और जस्बे  में पीछे क्यों है? ये बेहद गलत धारणा है और जो इस तरह की बात करे वो केवल हमारा मनोबल गिराने की बात करता है| सवर्ण के दुशप्रचार  और दलित साहित्य में हार और अपमान की बातों की भरमार ने मनोबल गिराया है |हमें अपने समाज के वीरों की गाथा और संगर्ष  कहने सुनने की बेहद जरूरत है जिससे की मनोबल ऊँचा रहे, अपना मनोबल ऊँचा रखने के लिए कुछ भी करो बस इसे न गिरने दो | ऐसी कोई भी सच्ची घटना या कहानी हो तो उसे प्रकाश में जरूर लायें इसके लिए जो जिस स्थर पर हैं वहां उसको प्रचारित करे, कुछ नहीं करना चाहें तो हमें भेज दें |व्यक्तिगत रूप से जज्बे में कमी नहीं है कुछ अपवाद को छोड़कर परन्तु धन बल और सत्ता में हमारी बराबर की भागीदारी न होने के कारण कई मामलों में मन मसोस कर रहना पड़ता है|

जब ये तय है की कानून का दुरूपयोग हमारे खिलाफ ही होना है तो जान बूझ कर आग के कुण्ड में कोन कूदता है, हम सभी जानते हैं की सत्ता सवर्णों की है तो कानून का फायदा भी उन्हीं को होना है| भारत सरकार के तीन स्तंभ हैं न्याय पालिका,कार्य पालिका और नगर पालिका हमारी भागीदारी इनमे नहीं रही है और अभी काफी कम है, हाँ ये ख़ुशी की बात है की अब हमारे समाज के लोगों ने एकजुट  होकर वोट देने का महत्व समझ लिया है और हममे से बहुत से शिक्षित लीडर सामने आये हैं, तो आगे हमारी भागीदारी बढ़ने की उम्मीद है|जैसे जैसे भागीदारी बढेगी वैसे वसे हिम्मत भी बढ़ेगी बस इतना याद रखना की व्यक्तिगत रूप में आपकी चाहे किसी के बारे में कोई भी राय हो पर जब समाज की बात आये तो एकजुट होकर रहना, अपने लीडर में विशवास  मत डिगाना |

मानव सुरक्षा एव विकास  संसथान द्वारा सूचना के अधिकार कानून से जुटाई जानकारी के अनुसार लगभग सारे देश के बेहद सवेदन शील ओहदे  जैसे कलेक्टर,सेक्रेटरी, जज, आदि जो देश की पोलीसी बनाने का काम करते है उसमे हमारा प्रतिनिधित्व एक प्रतिशत से भी कम है|  इसी तरह   यूनीवरसिटी में भी अधिकतम प्राचार्य सवर्ण है | मीडिया की हालत तो अप सभी जानते हैं भगवान बुद्ध के देश में उन्ही के लिए १ टीवी चैनल तक नहीं है तो आम जनता कि आवाज कि क्या कीमत होगी    |  इतना ही नहीं हमारे अपने लोग जब ऊंचे ओहदों पर बैठ जाते हैं तो भी मजोरिटी में न होने की वजह से कुछ खास नहीं कर पाते| पर ये भी एक सुखद सत्य है कि अब हमारे लोग  धीरे धीरे संवेदनशील ओहदों तक पहुँच रहे हैं, समय तो लग सकता है पर अब जब समाज जाग गया है तो बिना दमन नीति के तो इस धारा को वापस मोड़ना संभव नहीं है |

अगर फिर भी आपको लगता है की दब्बूपन  हमारे व्यक्तित्व का ही हिस्सा है तो ये एक नकारात्मक सोच है जो सदियों की गुलामी से हावी हो गई है | पीढ़ी दर पीढ़ी गुलामी की जिन्दगी गुजरने की वजह से हर जाती पीढ़े ने आती पीड़ी को दब के, निभा के चलने की सीख दे की बड़ा किया है|ये गलत है मैं अपने समाज के सभी लोगों से अपील करता हूँ की अपने बच्चे के मन में  किसी का भी डर न बैठाएं हाँ उसे मौके की नजाकत समझना सिखाएं और  मौकापरस्त बनायें,मौकापरस्ती भी एक वीरता है |

एक वैज्ञानिक तथ्य बताता हूँ, जब कोई स्त्री गर्भवती  होती है तो वो जैसा सोचती है जैसे विचार उसके मन में आते हैं वैसे ही भावनाएं बच्चे की भी बनती हैं |आप समझ सकते हैं की दबंग परिवार की स्त्रियाँ गर्भावस्था के दौरान कैसी सोच रखती होंगी और पिछड़े घरों की स्त्रियाँ कैसी सोच रखती होंगी | इसके अलावा बच्चे को पालते हुए  उसे कैसी भावनाए भरते हैं इस पर भी उसकी हिम्मत निर्भर करती है| एक उदाहरण बताता हूँ आपने भी अक्सर देखा होगा जहाँ कहीं भी   वर्जित वस्तुओं को  छूना मना लिखा हो वहाँ दलित माता-पिता अपने बच्चे से कहेंगे  कि “मत छूना कोई मरेगा” जबकि सक्षम समाज के लोग अपने बच्चे से कहेगा “इसको छूना नियम के विरुद्ध है इसलिए इसे मत छुओ”, दोनों बातों से पैदा होने वाली भावनाओं को आप समझ सकते हैं | बच्चे को पाल कर बड़ा करने में अनजाने में ऐसे ही छोटी छोटी बातों में हम उनको मानसिक रूप से कमजोर बना रहे होते हैं, हमें इन बातों पर ध्यान देकर सुधारना होगा| आप अपने आस पास के जानने वालों से ही समझ सकते हैं की जिन लोगों ने गाँव में दबंगी का सामना किया हो और वो शहर निकल आये हों, उसी दब्बू पीढ़ी की अगली और उससे अगली पीड़ी बिलकुल निडर हो गई है |  ये सभी बातें केवल मेहनतियों पर ही लागू हैं,निकम्मों पर लागू नहीं हैं उनका कुछ नहीं हो सकता जब तक वे निकम्मापन और खाली बैठना नहीं छोड़ देते |

बहुजनों  में से अम्बेडकरवादी समाज ने ऐसी बहुत सी शाश्क्तिकरण की बातों का अहसास और सुधार शुरू कर दिया है, बाकि तो आज तक अहसास भी नहीं कर पाए हैं | वे  मंदिरबाज़ी और पुरोहितगिरी से निकलना ही नहीं चाहते अपनी समर्थ को अपने संवर्धन में न लगा कर मंदिर बनवा रहे हैं,कमाल है |  तो साथियों थोडा और सब्र रखो हौसला मत खो, पीढ़ियों की गुलामी से जो जंग लग चुकी थी वो निकलते निकलते ही निकल पायेगी, विश्वास रखो की जो भी मेहनत कर रहे हैं वो पीढ़ी दर पीढ़ी हर द्रिस्टी से सक्षम होते जा रहे हैं | क़ुरबानी के साथ साथ  बाबा साहेब के बताये रास्ते “शिक्षित बनो ,संगठित  रहो, संगर्ष करो” पर चलोगे  तब हमें सर्व श्रेष्ठ बनने से कोई नहीं रोक सकता | शिक्षा, संगठन, संगर्ष, आत्मस्वाभिमान और नैतिक मूल्यों को वरीयता देने वाली  राजस्थान की मीणा जाती और उत्तर प्रदेश की जाटव जाती की उपलब्धियां  इसका जीवंत उदाहरण है |

One thought on “21-MAY-2016 के पूर्णिमा धम्म संघायन पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:-भारत के मूलनिवासियों के दलितीकरण करने से उनमे अपने मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता में बेहद कमी आयी थी, जिसके कारन वो अपने हकों के लिए संगर्ष कर पाने में असमर्थ रहे, आज की चर्चा का विषय है बहुजन समाज और स्वास्थ्य के सूत्र

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s