दलित राजनीति : पहिचान बनाम पुनर्वितरण -लन्दन स्कूल ऑफ़ इकनोमिक्स, अनुवादक: एस.आर. दारापुरी

control on politics ambedkarदलित राजनीति : पहिचान बनाम पुनर्वितरण

-राधा सरकार और अमर सरकार (लन्दन स्कूल ऑफ़ इकनोमिक्स)

(अनुवादक: एस.आर. दारापुरी)

 

उत्तर तथा मध्य भारत में दलित राजनीति अधिकतर पहचान के एजंडा के गिर्द ही रही है जिस में समान  सम्मान की मांग तो की गयी परन्तु संसाधनों के पुनर्वितरण की मांग नहीं उठाई गयी. इस से वर्ग के हिसाब से उच्च दलितों का सामाजिक और आर्थिक स्तर तो ऊँचा हुआ है परन्तु अधिकतर दलितों के जीवन स्तर में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं आया है. दलितों की समान बर्ताव की चाहत सीमित ही रहेगी जब तक शोषणकारी आर्थिक संबंधों को बदलने वाली पुनर्वितरण की राजनीति का अभाव रहेगा.

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1990 से अब तक दलितों में जाति आधारित राजनीति के उभार को किस रूप में समझा जाये? क्या हमें इसे एतहासिक तौर पर शोषित समुदाय के सशक्तिकरण के रूप में देखना चाहिए जैसा कि कुछ विद्वान इसे देखते हैं? या फिर हमें इसके लाभ और सीमाओं को अधिक संदेह की दृष्टि से देखना चाहिए? हमारा तर्क है कि जाति आधारित राजनीति सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर सकती जब तक कि इसमें वर्ग को शामिल नहीं किया जाता है जैसा कि वह अधिकतर करने में विफल रही है. दलित पार्टियों द्वारा अब तक अपनाई गयी पहचान की राजनीति से दलितों को बहुत थोड़ा लाभ हुआ है और कुल मिला कर इस का लाभ उन दलितों को ही मिला है जिनकी वर्ग के हिसाब से स्थिति अच्छी रही है. दलितों की समान बर्ताव की चाहत सीमित ही रहेगी जब तक शोषणकारी आर्थिक संबंधों को बदलने वाली पुनर्वितरण की राजनीति का अभाव रहेगा. हम अपने तर्कों की व्याख्या के लिए उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी (बसपा), जो कि सबसे बड़े राज्य में राजनीतिक तौर पर काफी सफल रही है, के उदाहरण को लेते हैं.

सामाजिक न्याय

नान्सी फ्रेज़र ने सामाजिक न्याय की दो अवधारणाओं में अंतर किया है: एक पुनर्वितरण पर केन्द्रित है जिस में माल और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की मांग है और दूसरी पहचान के दावों पर आधारित है जिस के केंद्र में विभिन्न सामाजिक समूहों के समान आदर के लक्ष्य की प्राप्ति है. फ्रेज़र सामाजिक न्याय के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए संस्थागत तौर पर सामाजिक जीवन में भेदभाव के कारण पिछड़ गए समूहों की पहचान को भी उतना ही महत्त्व देती हैं. फ्रेज़र का तर्क है कि सामाजिक अन्याय को ख़त्म करने के लिए पहचान और पुनर्वितरण की राजनीति को एक साथ अपनाया जाना चाहिए क्योंकि इन में से कोई एक सांस्कृतिक और आर्थिक अन्याय को दूर करने में सक्षम नहीं है. उसका तर्क मूलरूप से तो महिलाओं के संबंध में है परन्तु यह जाति उत्पीड़न के मामले में भी सटीक बैठता है. फ्रेज़र इसे लिंग के अनुरूप आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं की उपज मानती है. इसी लिए लिंग की तरह जाति आधारित अन्याय को समाप्त करने के लिए दोनों: पहचान और पुनर्वितरण के पहलुओं की ओर ध्यान देना पड़ेगा.   

पहचान बनाम पुनर्वितरण

उत्तर और मध्य भारत में दलित राजनीतिक पार्टियाँ पहचान की राजनीति पर बल देती रही है जबकि उन्होंने पुनर्वितरण की राजनीति को किनारे करके न्याय की पूर्ण प्राप्ति को ही दरकिनार किया है. ऐसी पार्टियाँ और संगठन दूसरों से सम्मान की मांग को ले कर गठित होती हैं. उनकी मुख्य चिंता सामाजिक सांस्कृतिक स्तर में परिवर्तन द्वारा सामाजिक संबंधों में समानता प्राप्त करना होता है. फ्रेज़र के शब्दों में “यह सामाजिक संबंधों में समानता प्राप्त करना” की तलाश ही होती है. परन्तु सांस्कृतिक स्तर में परिवर्तन अधिक से अधिक गलत पहिचान या समूह के निम्न सामाजिक दर्जे को ही सुधार सकता है परन्तु यह कभी भी संसाधनों और माल के गलत और असमान वितरण को दुरुस्त नहीं कर सकता. यदि जाति ही वितरण का अकेला आधार होती तो यह बिलकुल वर्ग के समान होती. यदि एक जाति के सभी सदस्य अपने परम्परागत पेशों में ही लगे होते तो जाति अथवा उपजाति के सभी सदस्यों में संपत्ति की मिलकियत, शिक्षा, संपत्ति और आय में बहुत कम अंतर होता. समाज में किसी समूह की गलत पहचान का अर्थ है संसाधनों का गलत वितरण और पहचान की राजनीति से वितरण का अन्याय और पहचान ठीक हो जाती.

परन्तु जाति का यथार्थ बहुत टेढ़ा है क्योंकि जाति और वर्ग समान रूप नहीं हैं. आर्थिक व्यवस्था और आर्थिक नीति में परिवर्तन से हिन्दुओं और दलितों के बीच बहुत अंतर आया है. , भूमंडलीकरण, विनियमितीकरण, उदारीकरण और उच्च आर्थिक वृद्धि दर के कारण जाति व्यवस्था के विभिन्न हिस्सों को अलग अलग तरह के लाभ प्राप्त हुए हैं. निम्न जातियों के कुछ सदस्यों द्वारा शिक्षा और आरक्षण द्वारा रोज़गार प्राप्त करने से उनके बीच वर्गभेद बढ़ा है. वीनर ने शहरी दलितों के सामाजिक तौर पर गतिशील होने और कम शिक्षित ग्रामीण दलितों की उन्नति की कम संभावनाएं होने की बात कही है. इस प्रकार एक जाति के सभी लोग एक ही वर्ग में नहीं आते, जाति और वर्ग में अदला बदली न होने के कारण पुनर्वितरण की राजनीति की ज़रुरत है. इस आलेख के शेष भाग में हम यह  दिखाने की कोशिश करेंगे कि दलित पार्टियों की जाति आधारित राजनीति किस प्रकार दलितों की बहुसंख्या के उत्पीड़न के आर्थिक और सांस्कृतिक पहलुओं का निवारण करने में असमर्थ है.

उत्तर प्रदेश का उदाहरण

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में दलित समर्थक बसपा  को लीजिये. बसपा 1991 में 9.4% वोट लेकर प्रांतीय स्तर की सत्ता की प्रतियोगी पार्टी के रूप में उभरी थी. 2007 में इसने 30.6% मत ले कर भारी बहुमत प्राप्त किया था. दलितों के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलु को मज़बूत करने के लिए बसपा की दो रणनीतियां थी. पहली उत्तर प्रदेश के परिदृश्य को दलित नेताओं के नाम पर पार्क और मूर्तियां लगा कर और  अस्पताल, स्टेडियम, शैक्षिक संस्थानों का दलित नेताओं के नाम पर नामकरण करके संकेतक परिवर्तन करने की थी. बसपा की दूसरी नीति कोई नयी योजनायें चालू न करके प्रचलित योजनाओं के ही क्रियान्वयन को बदलना था. उदहारण के लिए बसपा ने ब्यूरोक्रेसी में दलितों को महत्वपूरण पदों पर बैठाया. 1997 में जब मायावती 6 महीने के लिए मुख्य मंत्री थीं तो उस ने 1350 नागरिक और पुलिस अधिकारियों के तबादले किये थे.

सारांश यह है कि बसपा की रणनीति ब्यूरोक्रेसी और उत्तर प्रदेश के परिदृश्य में दलितों की उपस्थिति को बढ़ाना था. स्पष्ट तौर पर बसपा ने कुछ दलितों के राजनीतिक और आर्थिक कद को बढाया है. जबकि आम दलितों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है. बेशक इस से उत्तर भारत में दलित समुदाय को राजनीतिक और सांकेतिक तौर पर लाभ मिला है. दलित अब जातिभेद को चुनौती देने और राजनीति में भागीदारी करने की  पहले से बेहतर स्थिति में हैं. कुछ ग्रामीण दलित प्रदेश स्तरीय संबंधों के सहारे  राजनीतिक संसाधनों, आर्थिक और सामाजिक संबंधों का इस्तेमाल भी करने लगे हैं. जैफरलाट ने इसे “मूक क्रांति” की जो संज्ञा दी है वह अभी अपरिपक्व है क्योंकि पुनर्वितरण के बिना पहचान की राजनीति की शुरू से ही सीमाएं होती हैं. आर्थिक और सामाजिक अवसरों के वितरण में रेडिकल परिवर्तन लाये बिना पहचान की राजनीति सत्ता संबंधों में बहुत कम परिवर्तन ला पाती है.

सामाजिक-आर्थिक असमानता

बसपा की पहचान की राजनीति की सीमाएं स्पष्ट दिखाई देती हैं. इसकी पहचान की राजनीति और प्रतीकों के एजंडे को बढ़ावा देने के बावजूद बसपा भूमि और मजदूरी के झगड़ों में दखल देने और असमानता और गरीबी को दूर करने की नीतियाँ लागू करने में विफल रही है. सामाजिक आर्थिक असमानतायें जिन की जड़ असमान  भूमि और संपत्ति की मिलकियत में हैं दलितों की पहिचान की राजनीति उन्हें नीतियों का लाभ लेने में सहायक नहीं हैं. सरकारी विद्यालयों में आरक्षण लागू करके दलितों के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दर्जे का उच्चीकरण करने का दावा किया जा रहा है परन्तु इस से अधिकतर दलितों का कोई फायदा नहीं हुआ है. उदाहरण  के लिए ग्रामीण चमारों का कहना है कि उन्हें नौकरी मिलने की बहुत कम संभावनाएं हैं क्योंकि आरक्षित पदों में बहुत तीखी प्रतियोगिता है और भ्रष्टाचार है. शहरी दलितों के मुकाबले में ग्रामीण क्षेत्र के चमार जो कि उपलब्ध घटिया शिक्षा लेने के लिए बाध्य हैं और भर्ती में भ्रष्टाचार के कारण नौकरियां नहीं पा सकते हैं.

पहचान की राजनीती के कारण वर्ग में उच्च स्थान रखने वाले दलित पहचान के कारण उपलब्ध अवसरों का लाभ लेने की बेहतर स्थिति में हैं. इस के आगे पुनर्वितरण के बिना सम्मान पाने में पहचान की राजनीति की सीमाएं हैं क्योंकि देहात क्षेत्र में सामाजिक सम्मान भूमि की मिलकियत और उपभोग से जुड़ा है. क्योंकि अधिकतर दलित भूमिहीन हैं अतः वे पूरी तरह से ज़मींदारों पर आश्रित हैं. विषम मजदूरी सम्बन्ध और भूमिहीनता के कारण दलितों को काफी अपमान सहना पड़ता है और उनके मालिक उनका शोषण करते हैं. दलितों को सही रूप में इज्ज़त तभी मिल सकती जब भूमि पुनरवितरण, मजदूरी नियमितीकरण, या अन्य पुनर्वितरण तरीके अपनाये जाएँ. पहचान की राजनीती का सामाजिक जीवन में बराबरी का लक्ष्य केवल पुनर्वितरण द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है. इस का मतलब पहचान की राजनीति के मूल्य को नकारना नहीं है.

S R DARAPURIयह पहचान के नुकसानों के अन्याय हैं और इन का इलाज भी समान महत्त्व को मानना ही है. परन्तु पहचान की दलित राजनीति जो कि पुनरवितरण के एजंडे को अपनाने में असफल है छिछली है और केवल उच्च वर्ग के कुछ दलितों को ही सांकेतिक लाभ पहुंचाती है. इतना ही नहीं यह आर्थिक और सामाजिक संबंधों के अंतर्संबंध को भी नज़रंदाज़ करती है. पर्याप्त पुनर्वितरण के बिना अपने जीवन यापन के लिए दलित उच्च जातियों पर निर्भर रहने के लिए अभिशप्त हैं. यह आर्थिक निर्भरता शोषण के संबंधों को जन्म देती है और सामाजिक जीवन में बराबर की हिस्सेदारी को नकारती है जिस को पहचान की राजनीति प्राप्त करना चाहती है. देश के सब से ज्यादा उत्पीड़ित और अन्त्यज समुदायों की सामाजिक और आर्थिक जीवन में पूर्ण हिस्सेदारी के बिना भारतीय लोकतंत्र केवल आंशिक रूप में ही सफल हो पायेगा.

साभार : इकनामिक एंड पोलिटिकल वीकली

 

सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाली बहुजन वीरांगना फूलन देवी का परिवाद बहुत ही दयनीय स्तिथि में है, जिस परिवार के बच्चे ने जिस समाज की लड़ाई लड़ी हो ये उसका फर्ज है की उसके परिवार की देख रख और सम्मान करे| वर्ना समाज में लोग अपनी परिवार की खातिर अन्याय के खिलाफ विद्रोह नहीं कर पाएंगे, बल्कि चुप रहना या अन्यायी का साथ देना चुनेंगे|

 

सामाजिक न्याय के लिए लड़ने वाली बहुजन वीरांगना फूलन देवी का परिवार बहुत ही दयनीय स्तिथि में है| जिस परिवार के बच्चे ने जिस समाज की लड़ाई लड़ी हो ये उसका फर्ज है की वो समाज उसके परिवार की देख रख और सम्मान करे| वर्ना समाज में लोग अपनी परिवार की खातिर अन्याय के खिलाफ विद्रोह foolan deviनहीं कर पाएंगे, बल्कि चुप रहना या अन्यायी का साथ देना चुनेंगे|

देश भर में चालीस करोड़ के आस पास बहुजन जातियां होंगी अगर ये सभी एक एक रुपया भी दें तो फूलन के परिवार के पास चालीस करोड़ रुपया पहुंचेगा, और तब फूलन के परिवार वालों को ये नहीं कहना पड़ेगा की फूलन ने हमें दुःख ही दिया है|वैसे फूलन को अपने जीते जी अपने परिवार की आर्थिक समृद्धि के लिए कुछ करना चाहिए था|

क्रांतिकारियों की यही समस्या होती है की समाज की भलाई के कारन वो अपने परिवार की आर्थिक स्तीथि सुधरने पर काम नहीं कर पाते|

foolan ka parivar

वीरांगना शहीद फूलन देवी की अर्थी को मुलायम सिंह ने खुद कंधा दिया था. उन्होंने कहा था कि फूलन मेरी बेटी थी. ठाकुर वोट की परवाह नहीं की थी मुलायम ने. उन्हें लगता था कि न्यायप्रिय ठाकुर समझेंगे कि फूलन ने बेहमई के ठाकुरों को लाइन में खड़ा करके क्यों मारा.

फूलन देवी के निधन पर राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने शोक जताया था और उनके साहस और संघर्ष की प्रशंसा की थी.

मान्यवर कांशीराम साहब ने 1981 में 34 वें स्वतंत्रता दिवस को फूलन देवी वर्ष मनाया था. इस अवसर पर संगठन की पत्रिका के कवर पर फूलन वर्ष की घोषणा की गई थी.

फूलन देवी को जब बीहड़ से निकलना था, तो उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह पर भरोसा किया और उनकी मौजूदगी में हथियार डाले. फूलन देवी के संघर्ष के प्रशंसक लालू प्रसाद और विश्वनाथ प्रताप सिहं भी थे.

कोई मामूली इंसान नहीं थी फूलन देवी.

दुनिया की श्रेष्ठ विद्रोही महिलाओं की कोई भी लिस्ट उनके बिना पूरी नहीं है.

मुंबई के दादर में बाबा साहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर के भवन और प्रिंटिंग प्रेस विध्वंश की शर्मनाक घटना के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहा है।

dadar ambedkar press vandalizedDilip C Mandal facebook POST on this issue:
“रात 2 और 3 बजे के दौरान मुंबई में दादर के आंबेडकर भवन और बाबा साहेब द्वारा स्थापित ऐतिहासिक बुद्ध भूषण प्रेस को जिस तरह गिराया गया, उसकी पूरे राष्ट्र को एक स्वर में निंदा करनी चाहिए.होने को आप बाबा साहेब से असहमत भी हो सकते हैं, लेकिन यह इमारत तो राष्ट्रीय धरोहर है. हम सबकी साझा विरासत है.XXXX शर्म करो. अगर शर्म बची है तो.”….Dilip C Mandal

मुंबई के दादर इलाके में स्थित अंबेडकर भवन शनिवार तड़के बुल्डोजर से गिरा दिया गया। इससे क्षेत्र में तनाव पैदा हो गया। इस घटना से दि पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट व डा. अंबेडकर के परिवार वालों के बीच नया विवाद पैदा हो गया है।

दादर इलाके के गोकुल दास लेन पर अंबेडकर भवन व एक ऐतिहासिक प्रिटिंग प्रेस है। इन दोनों का मालिकाना हक पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट के पास है। ट्रस्ट से मिली जानकारी के मुताबिक अंबेडकर भवन को जर्जर इमारत घोषित करते हुए मुंबई महानगर पालिका (बीएमसी) ने ट्रस्ट को नोटिस जारी की थी।

बीएमसी अधिकारियों का कहना है कि तीस दिन के अंदर खतरनाक निर्माण कार्य को हटाना जरूरी था। इसलिए भवन को खाली कराकर उसे गिराया गया है। डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश व आनंद राज ने दादर पहुंच कर ट्रस्ट की ओर से कि गई तोड़फोड़ की कार्रवाई के खिलाफ विरोध व्यक्त किया।

ट्रस्ट के मुताबिक अब यहां पर सारी सुविधाओं से लैस 17 मंजिला अंबेडकर भवन बनाया जाएगा। भवन का निर्माण कार्य जल्द शुरू होगा। इस बीच डा. अंबेडकर के परिवार वालों ने इस पूरे मामले पर ऐतराज जताया है। अंबेडकर के दोनों पोतो ने अंबेडकर भवन गिराने के लिए ट्रस्ट की ओर से उठाए गए कदम की कड़ी निंदा की है। हिंद माता इलाके में प्रकाश अंबेडकर के समर्थकों ने रास्ता रोको आंदोलन भी किया। इसके चलते वहां पर तनाव का माहौल बन गया है।

http://www.amarujala.com/india-news/ambedkar-s-dadar-office-pulled-down-dalit-groups-lock-horns

मुंबई के दादर में बाबा साहेब डॉ.भीमराव अंबेडकर के भवन और प्रिंटिंग प्रेस  विध्वंश की शर्मनाक घटना के बाद देशभर में विरोध प्रदर्शन हो रहा है। अब जेएनयूएसयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने भी महाराष्ट्र सरकार और पीपुल्स इंप्रूवमेंट ट्रस्ट पर सीधा हमला किया है।कन्हैया कुमार ने अपने फेसबुक पोस्ट में फिर ब्राह्मणवाद पर हमला किया।

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/jnusu-president-kanhaiya-kumar-on-dadar-ambedkar-bhavan-incident/

ऐसे वक़्त पर बाबा साहब के नाम पर राजनीती करने वाले बड़े बड़े दलित नेताओं के मुँह से निषेद के दो शब्द भी नहीं निकल रहे ….

सिंधु घाटी की सभ्यता बौद्ध सभ्यता थी…http://www.nationaldastak.com/

SINDHU ghati Civilizationसिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में स्तूप नहीं मिला है बल्कि स्तूप की खुदाई में सिंधु घाटी की सभ्यता मिली है। मोहनजोदड़ो की खुदाई में विशाल स्नानागार मिला है। स्नानागार के आँगन में जलाशय है। जलाशय के तीन ओर बरामदे और उनके पीछे कई कमरे थे। इतिहासकार मैके ने बताया है कि कमरेवाला स्नानागार पुरोहितों के लिए था, जबकि विशाल स्नानागार सामान्य जनता के लिए था तथा इसका उपयोग धार्मिक समारोहों के अवसर पर किया जाता था।

डी. डी. कोसंबी ने लिखा है कि पूरे ऐतिहासिक युग में ऐसे कृत्रिम ताल बनाए गए हैं : पहले स्वतंत्र रूप में , बाद में मंदिरों के समीप। सवाल उठता है कि सिंधु घाटी के लोग विशेष धार्मिक अवसरों पर विशाल स्नानागार में पुरोहितों के संग स्नान तथा शुद्धिकरण करके कहाँ जाते थे ? मंदिर तो था नहीं। वहीं स्तूप में ! स्नानागार के बगल के स्तूप में !!

उत्तरी बिहार के वैशाली में पुरातत्वविदों ने आनंद स्तूप के बगल में ठीक ऐसा ही विशाल स्नानागार खोज निकाला है , जैसा कि मोहनजोदड़ो में है।
1826 में मैसन ने पहली बार हड़प्पा में स्तूप ही देखा था , बर्नेस ( 1831 ) और कनिंघम ( 1853 ) ने भी। सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई बाद में हुई।
राखालदास बंदोपाध्याय ने भी 1922 में मोहनजोदड़ो के बौद्ध स्तूप की खुदाई में ही सिंधु घाटी की सभ्यता की खोज की थी ।
राखीगढ़ तो हाल की घटना है , वहाँ भी सिंधु घाटी की सभ्यता स्तूप की खुदाई में ही मिली है – सिंधु घाटी सभ्यता का विशाल स्थल !
इसलिए ; सिंधु घाटी की सभ्यता की खुदाई में स्तूप नहीं मिला है बल्कि स्तूप की खुदाई में सिंधु घाटी की सभ्यता मिली है ।
मगर इतिहासकारों को सिंधु घाटी की सभ्यता के इतिहास को ऐसे लिखने में जाने क्या परेशानी है , जबकि सच यही है ।

मोहनजोदड़ो के जिस विशाल स्नानागार को मार्शल ने विश्व का एक ” आश्चर्यजनक निर्माण ” बताया है , ठीक उसी के सटे है मोहनजोदड़ो का विशाल स्तूप ।
विशाल स्तूप की ईंटें तथा अन्य इमारती सामान वहीं हैं जो विशाल स्नानागार के हैं । स्तूप का वास्तुशिल्प , प्रारूप , अभिकल्पन – सभी कुछ वही है जो हड़प्पाकाल में प्रचलित था ।
विशाल स्तूप में मिले बर्तन , बर्तन पर की गई चित्रकारी – सभी पर हड़प्पाकाल की छाप है । यदि विशाल स्नानागार हड़प्पाकालीन है तो विशाल स्तूप हड़प्पाकालीन क्यों नहीं है ?
ठीक स्नानागार के तल पर है स्तूप , ऊपर नहीं । स्तूप के नीचे नहीं है किसी अन्य सभ्यता की मौजूदगी के निशान ।

स्तूप पर 6 वीं सदी ईसा पूर्व के बाद का न कोई कला – शिल्प , न शिल्प – लेख । फिर भी इतिहासकार जाने कैसे बता गए हैं कि मोहनजोदड़ो का स्तूप 6 वीं सदी ईसा पूर्व के बाद का है ।
दरअसल इतिहासकारों के दिमाग में यह भूत पहले से बैठा हुआ है कि स्तूप जब भी बनेगा , 6 वीं सदी ईसा पूर्व के बाद ही बनेगा । इस भूत को निकाल फेंकिए , तभी इतिहास के साथ न्याय होगा ।

मोहनजोदड़ो के जलकुंड में उतरने के लिए सीढ़ियाँ हैं और उनके पीछे कमरे बने थे।वाराणसी के जलकुंड में भी उतरने के लिए सीढ़ियाँ हैं और उनके पीछे कमरे बने हैं।
जैसे मोहनजोदड़ो के जलकुंड में स्नान कर लोग बौद्ध- स्तूप जाया करते थे , वैसे ही वाराणसी के जलकुंड में भी स्नान कर लोग दुर्गा – मंदिर जाया करते हैं।
पहला बौद्ध सभ्यता का प्रतीक है , दूसरा ब्राह्मण सभ्यता का प्रतीक है।
कोई शक नहीं कि सिंधु घाटी की सभ्यता बौद्ध सभ्यता थी ।

इतिहासकार मोहनजोदड़ो के जलकुंड और बौद्ध – स्तूप का समय अलग – अलग तय करते हैं । वे जलकुंड ( स्नानागार ) को तो हड़प्पाकालीन मानते हैं , मगर बौद्ध – स्तूप को छठी शताब्दी ईसा पूर्व के बाद का बताते हैं । भाई , जलकुंड और बौद्ध – स्तूप एक – दूसरे से जुड़ा हुआ है , दोनों जुड़वाँ हैं , इन्हें अलग – अलग नहीं किया जा सकता है ।

भाषाशास्त्र के प्रोफेसर डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह से यहां संपर्क करें-

डॉ. राजेंद्र कुमार सिंह V.K.S. यूनिवर्सिटी आरा (बिहार) में प्रोफेसर हैं।

 

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/indus-valley-civilization-was-buddhist-civilization–/

सम्राट अशोक महान भारत में ही नहीं बल्कि और भी देशों में सम्मान पूर्वक याद किये जाते हैं!…Author: Dr. Sarita Chandra

सम्राट अशोक भारत में ही नहीं बल्कि और भी देशों में सम्मान पूर्वक याद किये जाते हैं!


bahujan baudh samrat ASHOKA The Greatमहान सम्राट अशोक को भारत के राजाओं में से एक है, जिनका राज सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि कई और देशों में रहा.

इनका नामे सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विश्व के महान सम्राट में शामिल है.

महान सम्राट अशोक ने ईरान से बर्मा तक अपना साम्राज्य फैलाया और अपने साम्राज्य के हर जगह पर अशोक स्तंभ स्थापित किया.

महान सम्राट अशोक का साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश श्रेणियों से दक्षिण में गोदावरी नदी, मैसूर, कर्नाटक तक और पूर्व क्षेत्र में बंगाल से अफगानिस्तान तक फैला हुआ था.

महान सम्राट अशोक कलिंग युद्ध में हुए नरसंहार और जनता के कष्टों को देखकर दुखी हो गए. इस युद्ध ने सम्राट की अंतरात्मा को झकझोर कर रख दिया था. सम्राट ने कलिंगवासियों पर आक्रमण कर उन्हें कुचलकर दिया था. जिसमे 1,50,000 आदमी आहात हुए और लगभग 1,00,000 लोगों की मौत हो गई थी.

इस युद्ध के विनाश से सम्राट शोक से भर गए और उसके प्रायश्चित के लिए युद्ध छोड़ धर्म की शरण में जा कर बौद्ध धर्म को धारण कर लिया.

वैसे तो सम्राट शिव भक्त थे लेकिन जब शांति और मोक्ष की तलाश में निकले तो उन्हें बौद्ध धर्म ने सबसे अधिक प्रभावित किया और सम्राट उस धर्म के प्रवर्तक और प्रचारक बन गए.

बौद्ध धर्म अपनाने के बाद महान सम्राट अशोक ने इस धर्म का प्रचार सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि श्रीलंका, पश्चिम एशिया, अफगानिस्तान, यूनान और मिस्र में भी किया और कराया.

बौद्ध ग्रन्थों में भी सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म के अनुयायी के रूप में याद किया जाता हैं और अशोक के बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा प्रमाण उसके अभिलेख में मिलता हैं. राज्याभिषेक के लघु शिलालेख, जिसमे सम्राट अशोक ने स्वयं को ‘बुद्धशाक्य’ लिखावाया है.

सम्राट ने जीते हुए देश और प्रान्त में अशोक स्तंभ बनवाया था. उनमे से हजारों स्तंभों मध्यकाल में मुस्लिमों के द्वारा ध्वस्त करा दिए गए. .

आज भारत में सम्राट अशोक का राज चिन्ह को भारत के झंडे में अशोक चक्र के रूप में रखा गया है. अशोक स्तम्भ पर बने चारमुखी शेर का चिन्ह और सत्य मेव जयते भारत का राष्ट्रीय प्रतीक माना जाता है. भारत की सेना को देश का सबसे बड़ा सम्मान अशोक चक्र राजा अशोक के नाम से दिया जाता है. सम्राट अशोक ने अखंड भारत, जो आज की तारीख में नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान का सबसे बड़ा भूभाग है, यहाँ एक छत्र राज किया था.

सम्राट अशोक के शासन काल में भारत विश्व गुरु, सोने की चिड़िया, सबसे खुशहाल देश कहलाता था. इस काल को दुनिया के सारे बुद्धिजीवी व इतिहासकार भारत का स्वर्णिम काल कहते और मानते हैं.

महान सम्राट अशोक ने अपने शासन काल में बड़ी सड़के, सड़कों पर पेड़, सराये बनाए गए और पहली बार जानवरों के लिए अस्पताल खोले और जानवरों का शिकार बंद हुआ.

चीन के जिजीयांग स्टेट में आज भी अशोक स्तम्भ को सम्मान पूर्वक सम्हाल कर रखा गया है.

इसके अलावा हर देश में बौध्द प्रचारक प्रवर्तक और अनुयायी भी महान सम्राट अशोक को सम्मान देते हुए उनकी महानता का गुणगान करते है.

Author: Dr. Sarita Chandra

बुद्ध का धम्म मनुष्यों के लिए मनुष्य द्वारा आविष्कृत धम्म है, धम्म और धर्म दो अलग शब्द हैं, इन्हें एक न समझें, धम्म रास्ता है आचार सहिंता है जीवन को बेहतर तरह से जीने के लिए, धर्म क्या है वो तो आप जानते ही हो| मूल लेख “अनित्य को नित्य समझना दुख का कारण” लेखक ओम प्रकाश

dhamma and dharmaभिक्षुओं को उपदेश देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा ‘हे भिक्षुओं! आप लोग कई देशों और जातियों से आये हैं, किन्तु यहां सब एक हो गये हैं.जिस प्रकार भिन्न-भिन्न देशों में अनेक नदियां बहती हैं और उनका अलग-अलग अस्तित्व दिखाई देता है, किन्तु सब जब सागर में मिलती हैं तो अपना पृथक अस्तित्व खो देती हैं, उसी प्रकार ‘बौद्ध-संघ’ में आ जाने पर सभी एक हैं, सभी एक समान हैं.’ बुद्ध ने अपने धर्म में सभी को समान माना. यह संयम और साधना का मार्ग है. यह प्रत्येक को सम्पूर्ण समष्टि मानकर चलता है.
बौद्ध संघ में स्त्री-पुरुष दोनों का प्रवेश था. यदि उन्होंने सारिपुत्र और मोदगल्यायन के प्रति आदर प्रदर्शित किया है तो राजा बिम्बिसार की पत्नी खेमा व धर्मोपदेश देने वाली भिक्षुणियों में प्रमुख धम्म दिन्ना को भी कम गौरव नहीं दिया. भिक्षुओं की तरह भिक्षुणियों को भी धर्म प्रसार की पूरी स्वतंत्रता थी. बुद्ध ने स्त्रियों की निंदा नहीं की परन्तु भिक्षुओं को उनके आकर्षण में बंधने के प्रति सावधान रहने को कहा.
बुद्ध ने कहा, ‘निर्वाण से बढ़कर सुखद कुछ नहीं.’ उनके द्वारा उपदिष्ट सभी शिक्षाओं में निर्वाण का प्रमुख स्थान है. उन्होंने निर्वाण का जो अर्थ बताया वह उनके पूर्वजों से सर्वथा भिन्न था. पूर्वजों की दृष्टि में निर्वाण का मतलब था आत्मा का मोक्ष. बुद्ध के अनुसार निर्वाण का मतलब है रागाग्नि, द्वेषाग्नि व मोहाग्नि का बुझ जाना’ अर्थात राग-द्वेष से मुक्ति. राग-द्वेष की अधीनता ही मानव को दुखी बनाती है और निर्वाण तक नहीं पहंुचने देती. उन्होंने कहा कि निर्दोष जीवन का ही दूसरा नाम निर्वाण है.
बुद्ध का धम्म मनुष्यों के लिए मनुष्य द्वारा आविष्कृत धम्म था. प्रत्येक धर्म के संस्थापक ने या तो अपने को ईश्वरीय कहा या अपने धर्म को. बुद्ध ने अपने या अपने धम्म शासन के लिए ऐसा कोई दावा नहीं किया. उनका इतना ही कहना था कि वे भी बहुत से मनुष्यों में से एक हैं और उनका संदेश एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य को दिया गया संदेश है. उन्होंने कहा कि उनका पथ मुक्ति का सत्य मार्ग है और कोई भी मनुष्य इस बारे में प्रश्न पूछ सकता है, परीक्षण कर सकता और देख सकता है कि वह सन्मार्ग है.

बुद्ध ने अपने परिव्राजकों (पांच शिष्यों) को अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया. इसके आठ अंग हैं. उन्होंने सर्वप्रथम सम्यक-दृष्टि की व्याख्या की जो अष्टांगिक मार्ग में प्रथम और प्रधान है. सम्यक-दृष्टि का मतलब है आदमी ऐसी सब मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो, जो उसके मन की कल्पना मात्र है और जिसका अनुभव या यर्थाथता से कोई सम्बन्ध न हो. इसका यह भी मतलब है कि व्यक्ति का मन स्वतंत्र हो, विचार स्वतंत्र हों. सम्यक संकल्प का मतलब है, हमारी आशाएं हमारी आकांक्षाओं से ऊंचे स्तर की हों.
सम्यक वाणी यानी मनुष्य सत्य बोले, दूसरे की बुराई न करे, किसी के प्रति कठोर वचन न बोले. सभी के साथ विनम्र व्यवहार करे. सम्यक-कर्मान्त योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है. हमारा हर कार्य ऐसा हो जिसे करते समय हम दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखें. सम्यक आजीविका का मतलब है आदमी बिना किसी के साथ अन्याय किये अपनी जीविका कमायें. सम्यक व्यायाम-अविद्या को नष्ट करने के प्रयास की प्रथम सीढ़ी है. सम्यक-स्मृति का मतलब है हर बात पर ध्यान देना. मन में जो अकुशल विचार उठते हैं उनकी चौकीदारी करना सम्यक-स्मृति का दूसरा नाम है. सम्यक समाधि हमेशा कुशल ही कुशल सोचने का प्रयास है.
भगवान बुद्ध ने धर्म की शिक्षा चार आर्य सत्यों के माध्यम से दी है. पहला सत्य है बुढ़ापा दुख है. मृत्यु दुख है. हम जो इच्छा करते हैं उसकी अप्राप्ति दुख है, जिसकी इच्छा नहीं करते उसकी प्राप्ति दुख है. जो प्रिय है, उसका वियोग सबसे बड़ा दुख है. दूसरा सत्य है कि इस दुख का कारण तृष्णा है. जैसे काम (भोग) तृष्णा. तृष्णा ही दुख का मूल कारण है. तीसरा सत्य है कि तृष्णा के त्याग से ही दुख का निरोध सम्भव है. जब तृष्णा का सर्वनाश होता है तभी दुख का अन्त होता है. जितनी तृष्णा है उसकी जननी इच्छा है और जब तक इसकी पूर्ति नहीं होती यह दुख ही देती रहती है. चौथा सत्य है आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने से आदमी सभी स्वार्थमयी इच्छाओं से मुक्त हो सकता है. यह चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म के सिद्धान्त हैं.
अनित्यता बुद्ध धर्म के मुख्य सिद्धान्तों में से एक है. अनित्य का मतलब है अस्थायी अर्थात प्राणी का जिन-जिन सामग्रियों से निर्माण होता है, वह परिवर्तनशील है. जितने भी जीवित पदार्थ हैं वे अस्थायी हैं और परिवर्तन के अतिरिक्त जगत में कुछ भी स्थाई नहीं है. प्रत्येक वस्तु क्षणिक है. आधुनिक विज्ञान विश्व में कुछ भी ऐसा नहीं खोज सकता है, जो स्थिर हो. जो कुछ अनित्य है, उसे गलती से नित्य समझ लेना ही दुख का मूल कारण है.
प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धान्त बुद्ध की महत्वपूर्ण खोज है. साधारण भाषा में इसे बौद्ध धर्म का ‘कारण कार्य का नियम’ कहते हैं. बुद्ध ने कहा, ‘इसके होने पर यह होता है.’ अर्थात एक का विनाश होने पर दूसरे की उत्पत्ति होती है. जो होता है, वह किसी न किसी कारण (प्रत्यय) होता है. दुनिया में जो हुआ है, जो हो रहा है और जो होगा, वह किसी न किसी प्रत्यय (कारणों) पर आधारित होगा. उन्होंने इसे दु:ख चक्र का अनुसंधान करते हुआ खोजा. उनकी खोज थी कि विषयों का इन्द्रियों से सम्पर्क होने पर शरीर में दु:खद या सुखद संवेदनाएं होती हैं. उन्होंने बताया कि भवचक्र तोड़ने के लिए वेदना से शुरुआत करनी होगी क्योंकि अज्ञान हर कड़ी से जुड़ा है. शारीरिक संवेदनाओं के जरिये मानसिक विकार को जड़ से निकालने की यह अद्भुत वैज्ञानिक विद्या है. प्रतीत्य समुत्पाद के ज्ञान बिना निर्वाण की प्राप्ति असम्भव है.

 

source: http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/118107/lord-buddha.html

मनु अन्याय का प्रतीक है, तो फिर राजस्थान के उच्च न्यायालय के बाहर उसकी मू्र्ती क्यों है?…हरीश परिहार ( अधिक जानकारी के लिए डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन जी द्वारा रचित पुस्तक “मनुस्मृति क्यों जलाई गयी” पढ़ें)

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1076297029130954&set=a.180224205404912.41025.100002520002974&type=3&theatermanu in rajasthan highcourtराष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाराष्ट्र के महाड़ में मनुस्मृति नाम के तथाकथित धार्मिक ग्रन्थ को पब्लिकली जलाया था। कारण: घ्रणित किताब मनुस्मृति दलितों व महिलाओं के मानव अधिकारों के विरोध में लिखी गयी थी। जाहिर तौर पर इस किताब में पाखंड है। जाति के आधार पर छुआछूत, ऊँच-नीच, असमानता का कारण मनुस्मृति ही है। सदियों से सोशल डीग्रेडेशन का मुख्य कारण मनुस्मृति है। मानव समाज में जाति के आधार पर भेदभाव को जन्म मनुस्मृति ने दिया था। चार वर्णों की व्यवस्था का भी उद्गम मनुस्मृति से होता है। वर्ण व्यवस्था ने मानव समाज में ऊँच-नीच को जन्म दिया। हिन्दू समाज में दलितों के मानव अधिकार मनुस्मृति की वजह से छीन लिए गये। इससे सम्बंधित तमाम प्रकार की बातें मनुस्मृति में लिखी हुयी है। आज के आधुनिक युग में भी हम तमाम प्रकार की ख़बरों से रूबरू होते हैं जिसमे यह पढ़ने या देखने को मिलता है कि फलांना जगह दलितों के घर जला दिए गये। फलांना जगह दलित लड़कियों के साथ उच्च जाति के असामाजिक तत्वों ने बलात्कार किया या फलांना जगह दलित महिला को नंगा कर घुमाया इत्यादि। (सन्दर्भ के तौर पर फरीदाबाद की घटना का जिक्र किया जा सकता है या फिर जोधपुर व बीकानेर में उच्च जाति के अध्यापक द्वारा दलित बच्चे को पीटा जाना आदि।)manusmriti jalai kyon gayi

इस प्रकार की तमाम प्रकार की दुखद ख़बरें हर रोज अख़बार, दूरदर्शन या फिर सोशल मीडिया पर देखने को मिलती है। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मनुस्मृति मानव समाज के लिए खतरा है। यह मानवीय मूल्यों को ठेस पहुंचाती है। मनुस्मृति को मनु नाम के काल्पनिक व्यक्ति ने लिखा था। काल्पनिक इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मनु को किसी ने देखा नहीं था और न ही इतिहास में मनु की शक्ल के बारे में कोई जानकारी मिलती है। मनुस्मृति की वजह से महिलाओं व दलितों के साथ अन्याय होता आ रहा है। भारत में महिलाओं के विरोध में कई प्रकार की रुढ़िवादी परम्पराएँ चलती आ रही हैं। मिसाल के लिए दहेज़ प्रथा हो या घुंघट प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या हो या बाल विवाह इत्यादि। या फिर कन्या-दान जैसा शब्द।

मनुस्मृति दहन का मकसद दलितों व महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अन्याय को खत्म करके समानता वाले समाज की स्थापना करना था। यानी कि छुआछूत, जाति आधारित भेदभाव, ऊँच-नीच, को ख़त्म करना तो था ही, इसके साथ-साथ चार वर्णों की व्यवस्था को भी ख़त्म करना था यानी कि ब्राह्मणवाद को ख़त्म करके समाजवाद, आम्बेडकरवाद स्थापित करना था। दलितों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए मनुस्मृति-दहन-दिवस मील का पत्थर साबित हुआ। बाबा साहेब आम्बेडकर ने उस दिन शाम को दिए भाषण में कहा था कि मनुस्मृति-दहन 1789 की “फ्रेंच-रेवोलुशन” के बराबर है। जाहिर है कि बाबा साहेब आम्बेडकर हिन्दू समाज में जात-पात के खिलाफ थे और सारा आम्बेडकरी साहित्य इस बात की पुष्टि करता है। इस प्रकार से मेरी राय के अनुसार मनुस्मृति मानवता के विरुद्ध है व उसका रचियता मनु अन्याय का प्रतीक है।

28 जून, 1989 को राजस्थान हाई कोर्ट के नये परिसर में मनु की मूर्ति का इंस्टालेशन किया गया था। माना जाता है कि मूर्ति की डिमांड लोकप्रिय नहीं थी और स्पष्ट है कि कुछ ‘पाखंडी’ लोग ही इस प्रकार अन्याय का समर्थन कर सकते हैं। शुरुआत से लेकर कार्य पूर्ण तक इस काम को गोपनीय रूप से अंजाम दिया गया, इसलिए चलते काम के बीच इसका विरोध नहीं हो पाया। इसकी जानकारी केवल उन्ही लोगों को थी जो मूर्ति लगवाना चाहते थे। स्पष्ट है कि मनु अन्याय का प्रतीक है, इसके बावजूद भी कुछ पाखंडी एवं रुढ़िवादी लोगों की डिमांड का सम्मान करते हुए न्यायालय द्वारा मनु, जिसको किसी ने देखा भी नहीं होगा फिर भी उसकी मूर्ति या पुतला बनाकर राजस्थान उच्च न्यायलय में लगाया जाना अन्याय के पक्ष में जाकर फैसला देने के बराबर है।

ध्यान रहे कि संवैधानिक रूप से न्यायालय एक ऐसी संस्थान है जहाँ पर सामाजिक व आर्थिक न्याय की उम्मीद की जाती है। मूर्ति लगने के बाद कई दलित संगठनों व महिला संगठनों ने इसके विरोध में धरना प्रदर्शन किया। धरना प्रदर्शन को देखते हुए 27 जुलाई, 1989 पर राजस्थान हाई कोर्ट की एक पीठ ने 48 घंटे की समयावधि के अन्दर-अन्दर मूर्ति को हटाने का निर्देश दिया। इसे ध्यान में रखते हुए विश्व हिन्दू परिषद के आचार्य धर्मेन्द्र ने न्यायमूर्ति महेंद्र भूषण के न्यायालय में एक रिट पेटीशन दाखिल कर दी और न्यायलय ने स्टे आर्डर लगाकर मूर्ति हटाने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मनु की मूर्ति राजस्थान हाई कोर्ट में आज भी विद्धमान है।

मेरा प्रशन है कि ऐसा न्यायालय न्याय देता होगा कि केवल निर्णय?

भारतीय संविधान में मनुस्मृति से सम्बंधित कानून: राष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर व संविधान निर्माण समिति के द्वारा मनुस्मृति सम्बंध में अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रावधान लाया गया जिसके अंतर्गत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में अगर 26 जनवरी 1950 के बाद अगर कोई पुरानी परम्परा या विधान जो मौलिक अधिकारों का हनन करे, जो किसी प्रकार की रूढी भी हो सकती है, तो इस प्रकार की परम्परा को अनुच्छेद 13 का उल्लंघन माना जायेगा। इस प्रकार से मेरा मानना है कि मनु की मूर्ति का हाई कोर्ट में लगा होना एक प्रकार से संविधान की अवमानना है।

http://www.youthkiawaaz.com/2015/12/manu-statue-in-rajasthan-high-court/

http://www.neelkranti.com/2013/12/25/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A5%80/

 

भारत के मूलनिवासी अमर शहीद बिरसा मुंडा के शहीदी दिवस 9 जून पर प्रस्तुत है उनके जीवन परिचय पर ये लेख

Birsa_Munda,_photograph_in_Roy_(1912-72)बिरसा मुंडा (जन्म- 15 नवम्बर, 1875 ई., राँची, झारखण्ड; मृत्यु- 9 जून, 1900 ई., राँची जेल) एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे। ये मुंडा जाति से सम्बन्धित थे। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब ‘बिरसा भगवान’ कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे।

बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे जिनकी ख्याति अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में काफी हुयी थी | उनके द्वारा चलाया जाने वाला सहस्राब्दवादी आंदोलन ने बिहार और झारखंड में खूब प्रभाव डाला था | केवल 25 वर्ष के जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल कर लिए थे कि आज भी भारत की जनता उन्हें याद करती है और भारतीय संसद में एकमात्र आदिवासी नेता बिरसा मुंडा का चित्र टंगा हुआ है ||

Birsa Munda बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था | मुंडा रीती रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था | बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था | उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया जहा वो खेतो में काम करके अपना जीवन चलाते थे | उसके बाद फिर काम की तलाश में उनका परिवार बम्बा चला गया |

Birsa Munda बिरसा का परिवार वैसे तो घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करता था लेकिन उनका अधिकांश बचपन चल्कड़ में बीता था | बिरसा बचपन से अपने दोस्तों के साथ रेत में खेलते रहते थे और थोडा बड़ा होने पर उन्हें जंगल में भेड़ चराने जाना पड़ता था | जंगल में भेड़ चराते वक़्त समय व्यतीत करने के लिए बाँसुरी बजाया करते थे और कुछ दिनों बाँसुरी बजाने में उस्ताद हो गये थे | उन्होंने कद्दू से एक एक तार वाला वादक यंत्र तुइला बनाया था जिसे भी वो बजाया करते थे | उनके जीवन के कुछ रोमांचक पल अखारा गाँव में बीते थे |

गरीबी के इस दौर में Birsa Munda बिरसा को उनके मामा के गाँव अयुभातु भेज दिया गया | अयुभातु में बिरसा दो साल तक रहे और वहा के स्कूल में पढने गये थे | बिरसा पढाई में बहुत होशियार थे इसलिए स्कूल चलाने वाले जयपाल नाग ने उन्हें जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लेने को कहा |

वो अपने विद्रोह में इतने उग्र हो गये थे कि आदिवासी जनता उनको भगवान मानने लगी थी और आज भी आदिवासी जनता बिरसा को भगवान बिरसा मुंडा के नाम से पूजती है | उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया और अपने आदिवासी लोगो को हिन्दू धर्म के सिद्धांतो को समझाया था | उन्होंने गाय की पूजा करने और गौ-हत्या का विरोध करने की लोगो को सलाह दी | अब उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारा दिया “रानी का शाषन खत्म करो और हमारा साम्राज्य स्थापित करो ” | उनके इस नारे को आज भी भारत के आदिवासी इलाको में याद किया जता है | अंग्रेजो ने आदिवासी कृषि प्रणाली में बदलाव किय जिससे आदिवासियों को काफी नुकसान होता था |1895 में लगान माफी के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध मोर्चा खोल दिय था |

Birsa Munda बिरसा मुंडा ने सन 1900 में अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा करते हुए कहा “हम ब्रिटिश शाशन तन्त्र के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करते है और कभी अंग्रेज नियमो का पालन नही करेंगे , ओ गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजो , तुम्हारा हमारे देश में क्या काम ? छोटा नागपुर सदियों से हमारा है और तुम इसे हमसे छीन नही सकते है इसलिए बेहतर है कि वापस अपने देश लौट जाओ वरना लाशो के ढेर लगा दिए जायेंगे ” | इस घोषणा को एक घोषणा पत्र में अंग्रेजो के पास भेजा गया तो अंग्रेजो ने अपनी सेना बिरसा को पकड़ने के लिए रवाना कर दी |अंग्रेज सरकार ने बिरसा की गिरफ्तारी पर 500 रूपये का इनाम रखा था | अब बिरसा भी तीर कमान और भालो के साथ युद्ध की तैयारियों में लग गये |Birsa Munda Biographyअब बिरसा के इसके विद्रोह में लोगो को इकट्ठा किया और उनके नेतृत्व में आदिवासियों का विशाल विद्रोह हुआ था | अंग्रेज सरकार ने विद्रोह का दमन करने के लिए 3 फरवरी 1900 को मुंडा को गिरफ्तार कर लिया जब वो अपनी आदिवासी गुरिल्ला सेना के साथ जंगल में सो रहे थे |उस समय 460 आदिवासियों को भी उनके साथ गिरफ्तार किया गया | 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी रहस्यमयी तरीके से मौत हो गयी और अंग्रेज सरकार ने मौत का कारण हैजा बताया था जबकि उनमे हैजा के कोई लक्षण नही थे | केवल 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने ऐसा काम कर दिया कि आज भी बिहार ,झारखंड और उडीसा की आदिवासी जनता उनको याद करती है और उनके नाम पर कई शिक्षण संस्थानों के नाम रखे गये है |

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बिरसा मुंडा के शोर्य की कहानी Birsa Munda Biography in Hindi