बुद्ध का धम्म मनुष्यों के लिए मनुष्य द्वारा आविष्कृत धम्म है, धम्म और धर्म दो अलग शब्द हैं, इन्हें एक न समझें, धम्म रास्ता है आचार सहिंता है जीवन को बेहतर तरह से जीने के लिए, धर्म क्या है वो तो आप जानते ही हो| मूल लेख “अनित्य को नित्य समझना दुख का कारण” लेखक ओम प्रकाश

dhamma and dharmaभिक्षुओं को उपदेश देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा ‘हे भिक्षुओं! आप लोग कई देशों और जातियों से आये हैं, किन्तु यहां सब एक हो गये हैं.जिस प्रकार भिन्न-भिन्न देशों में अनेक नदियां बहती हैं और उनका अलग-अलग अस्तित्व दिखाई देता है, किन्तु सब जब सागर में मिलती हैं तो अपना पृथक अस्तित्व खो देती हैं, उसी प्रकार ‘बौद्ध-संघ’ में आ जाने पर सभी एक हैं, सभी एक समान हैं.’ बुद्ध ने अपने धर्म में सभी को समान माना. यह संयम और साधना का मार्ग है. यह प्रत्येक को सम्पूर्ण समष्टि मानकर चलता है.
बौद्ध संघ में स्त्री-पुरुष दोनों का प्रवेश था. यदि उन्होंने सारिपुत्र और मोदगल्यायन के प्रति आदर प्रदर्शित किया है तो राजा बिम्बिसार की पत्नी खेमा व धर्मोपदेश देने वाली भिक्षुणियों में प्रमुख धम्म दिन्ना को भी कम गौरव नहीं दिया. भिक्षुओं की तरह भिक्षुणियों को भी धर्म प्रसार की पूरी स्वतंत्रता थी. बुद्ध ने स्त्रियों की निंदा नहीं की परन्तु भिक्षुओं को उनके आकर्षण में बंधने के प्रति सावधान रहने को कहा.
बुद्ध ने कहा, ‘निर्वाण से बढ़कर सुखद कुछ नहीं.’ उनके द्वारा उपदिष्ट सभी शिक्षाओं में निर्वाण का प्रमुख स्थान है. उन्होंने निर्वाण का जो अर्थ बताया वह उनके पूर्वजों से सर्वथा भिन्न था. पूर्वजों की दृष्टि में निर्वाण का मतलब था आत्मा का मोक्ष. बुद्ध के अनुसार निर्वाण का मतलब है रागाग्नि, द्वेषाग्नि व मोहाग्नि का बुझ जाना’ अर्थात राग-द्वेष से मुक्ति. राग-द्वेष की अधीनता ही मानव को दुखी बनाती है और निर्वाण तक नहीं पहंुचने देती. उन्होंने कहा कि निर्दोष जीवन का ही दूसरा नाम निर्वाण है.
बुद्ध का धम्म मनुष्यों के लिए मनुष्य द्वारा आविष्कृत धम्म था. प्रत्येक धर्म के संस्थापक ने या तो अपने को ईश्वरीय कहा या अपने धर्म को. बुद्ध ने अपने या अपने धम्म शासन के लिए ऐसा कोई दावा नहीं किया. उनका इतना ही कहना था कि वे भी बहुत से मनुष्यों में से एक हैं और उनका संदेश एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य को दिया गया संदेश है. उन्होंने कहा कि उनका पथ मुक्ति का सत्य मार्ग है और कोई भी मनुष्य इस बारे में प्रश्न पूछ सकता है, परीक्षण कर सकता और देख सकता है कि वह सन्मार्ग है.

बुद्ध ने अपने परिव्राजकों (पांच शिष्यों) को अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया. इसके आठ अंग हैं. उन्होंने सर्वप्रथम सम्यक-दृष्टि की व्याख्या की जो अष्टांगिक मार्ग में प्रथम और प्रधान है. सम्यक-दृष्टि का मतलब है आदमी ऐसी सब मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो, जो उसके मन की कल्पना मात्र है और जिसका अनुभव या यर्थाथता से कोई सम्बन्ध न हो. इसका यह भी मतलब है कि व्यक्ति का मन स्वतंत्र हो, विचार स्वतंत्र हों. सम्यक संकल्प का मतलब है, हमारी आशाएं हमारी आकांक्षाओं से ऊंचे स्तर की हों.
सम्यक वाणी यानी मनुष्य सत्य बोले, दूसरे की बुराई न करे, किसी के प्रति कठोर वचन न बोले. सभी के साथ विनम्र व्यवहार करे. सम्यक-कर्मान्त योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है. हमारा हर कार्य ऐसा हो जिसे करते समय हम दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखें. सम्यक आजीविका का मतलब है आदमी बिना किसी के साथ अन्याय किये अपनी जीविका कमायें. सम्यक व्यायाम-अविद्या को नष्ट करने के प्रयास की प्रथम सीढ़ी है. सम्यक-स्मृति का मतलब है हर बात पर ध्यान देना. मन में जो अकुशल विचार उठते हैं उनकी चौकीदारी करना सम्यक-स्मृति का दूसरा नाम है. सम्यक समाधि हमेशा कुशल ही कुशल सोचने का प्रयास है.
भगवान बुद्ध ने धर्म की शिक्षा चार आर्य सत्यों के माध्यम से दी है. पहला सत्य है बुढ़ापा दुख है. मृत्यु दुख है. हम जो इच्छा करते हैं उसकी अप्राप्ति दुख है, जिसकी इच्छा नहीं करते उसकी प्राप्ति दुख है. जो प्रिय है, उसका वियोग सबसे बड़ा दुख है. दूसरा सत्य है कि इस दुख का कारण तृष्णा है. जैसे काम (भोग) तृष्णा. तृष्णा ही दुख का मूल कारण है. तीसरा सत्य है कि तृष्णा के त्याग से ही दुख का निरोध सम्भव है. जब तृष्णा का सर्वनाश होता है तभी दुख का अन्त होता है. जितनी तृष्णा है उसकी जननी इच्छा है और जब तक इसकी पूर्ति नहीं होती यह दुख ही देती रहती है. चौथा सत्य है आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने से आदमी सभी स्वार्थमयी इच्छाओं से मुक्त हो सकता है. यह चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म के सिद्धान्त हैं.
अनित्यता बुद्ध धर्म के मुख्य सिद्धान्तों में से एक है. अनित्य का मतलब है अस्थायी अर्थात प्राणी का जिन-जिन सामग्रियों से निर्माण होता है, वह परिवर्तनशील है. जितने भी जीवित पदार्थ हैं वे अस्थायी हैं और परिवर्तन के अतिरिक्त जगत में कुछ भी स्थाई नहीं है. प्रत्येक वस्तु क्षणिक है. आधुनिक विज्ञान विश्व में कुछ भी ऐसा नहीं खोज सकता है, जो स्थिर हो. जो कुछ अनित्य है, उसे गलती से नित्य समझ लेना ही दुख का मूल कारण है.
प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धान्त बुद्ध की महत्वपूर्ण खोज है. साधारण भाषा में इसे बौद्ध धर्म का ‘कारण कार्य का नियम’ कहते हैं. बुद्ध ने कहा, ‘इसके होने पर यह होता है.’ अर्थात एक का विनाश होने पर दूसरे की उत्पत्ति होती है. जो होता है, वह किसी न किसी कारण (प्रत्यय) होता है. दुनिया में जो हुआ है, जो हो रहा है और जो होगा, वह किसी न किसी प्रत्यय (कारणों) पर आधारित होगा. उन्होंने इसे दु:ख चक्र का अनुसंधान करते हुआ खोजा. उनकी खोज थी कि विषयों का इन्द्रियों से सम्पर्क होने पर शरीर में दु:खद या सुखद संवेदनाएं होती हैं. उन्होंने बताया कि भवचक्र तोड़ने के लिए वेदना से शुरुआत करनी होगी क्योंकि अज्ञान हर कड़ी से जुड़ा है. शारीरिक संवेदनाओं के जरिये मानसिक विकार को जड़ से निकालने की यह अद्भुत वैज्ञानिक विद्या है. प्रतीत्य समुत्पाद के ज्ञान बिना निर्वाण की प्राप्ति असम्भव है.

 

source: http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/118107/lord-buddha.html