बुद्ध का धम्म मनुष्यों के लिए मनुष्य द्वारा आविष्कृत धम्म है, धम्म और धर्म दो अलग शब्द हैं, इन्हें एक न समझें, धम्म रास्ता है आचार सहिंता है जीवन को बेहतर तरह से जीने के लिए, धर्म क्या है वो तो आप जानते ही हो| मूल लेख “अनित्य को नित्य समझना दुख का कारण” लेखक ओम प्रकाश

dhamma and dharmaभिक्षुओं को उपदेश देते हुए भगवान बुद्ध ने कहा ‘हे भिक्षुओं! आप लोग कई देशों और जातियों से आये हैं, किन्तु यहां सब एक हो गये हैं.जिस प्रकार भिन्न-भिन्न देशों में अनेक नदियां बहती हैं और उनका अलग-अलग अस्तित्व दिखाई देता है, किन्तु सब जब सागर में मिलती हैं तो अपना पृथक अस्तित्व खो देती हैं, उसी प्रकार ‘बौद्ध-संघ’ में आ जाने पर सभी एक हैं, सभी एक समान हैं.’ बुद्ध ने अपने धर्म में सभी को समान माना. यह संयम और साधना का मार्ग है. यह प्रत्येक को सम्पूर्ण समष्टि मानकर चलता है.
बौद्ध संघ में स्त्री-पुरुष दोनों का प्रवेश था. यदि उन्होंने सारिपुत्र और मोदगल्यायन के प्रति आदर प्रदर्शित किया है तो राजा बिम्बिसार की पत्नी खेमा व धर्मोपदेश देने वाली भिक्षुणियों में प्रमुख धम्म दिन्ना को भी कम गौरव नहीं दिया. भिक्षुओं की तरह भिक्षुणियों को भी धर्म प्रसार की पूरी स्वतंत्रता थी. बुद्ध ने स्त्रियों की निंदा नहीं की परन्तु भिक्षुओं को उनके आकर्षण में बंधने के प्रति सावधान रहने को कहा.
बुद्ध ने कहा, ‘निर्वाण से बढ़कर सुखद कुछ नहीं.’ उनके द्वारा उपदिष्ट सभी शिक्षाओं में निर्वाण का प्रमुख स्थान है. उन्होंने निर्वाण का जो अर्थ बताया वह उनके पूर्वजों से सर्वथा भिन्न था. पूर्वजों की दृष्टि में निर्वाण का मतलब था आत्मा का मोक्ष. बुद्ध के अनुसार निर्वाण का मतलब है रागाग्नि, द्वेषाग्नि व मोहाग्नि का बुझ जाना’ अर्थात राग-द्वेष से मुक्ति. राग-द्वेष की अधीनता ही मानव को दुखी बनाती है और निर्वाण तक नहीं पहंुचने देती. उन्होंने कहा कि निर्दोष जीवन का ही दूसरा नाम निर्वाण है.
बुद्ध का धम्म मनुष्यों के लिए मनुष्य द्वारा आविष्कृत धम्म था. प्रत्येक धर्म के संस्थापक ने या तो अपने को ईश्वरीय कहा या अपने धर्म को. बुद्ध ने अपने या अपने धम्म शासन के लिए ऐसा कोई दावा नहीं किया. उनका इतना ही कहना था कि वे भी बहुत से मनुष्यों में से एक हैं और उनका संदेश एक मनुष्य द्वारा दूसरे मनुष्य को दिया गया संदेश है. उन्होंने कहा कि उनका पथ मुक्ति का सत्य मार्ग है और कोई भी मनुष्य इस बारे में प्रश्न पूछ सकता है, परीक्षण कर सकता और देख सकता है कि वह सन्मार्ग है.

बुद्ध ने अपने परिव्राजकों (पांच शिष्यों) को अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया. इसके आठ अंग हैं. उन्होंने सर्वप्रथम सम्यक-दृष्टि की व्याख्या की जो अष्टांगिक मार्ग में प्रथम और प्रधान है. सम्यक-दृष्टि का मतलब है आदमी ऐसी सब मिथ्या धारणाओं से मुक्त हो, जो उसके मन की कल्पना मात्र है और जिसका अनुभव या यर्थाथता से कोई सम्बन्ध न हो. इसका यह भी मतलब है कि व्यक्ति का मन स्वतंत्र हो, विचार स्वतंत्र हों. सम्यक संकल्प का मतलब है, हमारी आशाएं हमारी आकांक्षाओं से ऊंचे स्तर की हों.
सम्यक वाणी यानी मनुष्य सत्य बोले, दूसरे की बुराई न करे, किसी के प्रति कठोर वचन न बोले. सभी के साथ विनम्र व्यवहार करे. सम्यक-कर्मान्त योग्य व्यवहार की शिक्षा देता है. हमारा हर कार्य ऐसा हो जिसे करते समय हम दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखें. सम्यक आजीविका का मतलब है आदमी बिना किसी के साथ अन्याय किये अपनी जीविका कमायें. सम्यक व्यायाम-अविद्या को नष्ट करने के प्रयास की प्रथम सीढ़ी है. सम्यक-स्मृति का मतलब है हर बात पर ध्यान देना. मन में जो अकुशल विचार उठते हैं उनकी चौकीदारी करना सम्यक-स्मृति का दूसरा नाम है. सम्यक समाधि हमेशा कुशल ही कुशल सोचने का प्रयास है.
भगवान बुद्ध ने धर्म की शिक्षा चार आर्य सत्यों के माध्यम से दी है. पहला सत्य है बुढ़ापा दुख है. मृत्यु दुख है. हम जो इच्छा करते हैं उसकी अप्राप्ति दुख है, जिसकी इच्छा नहीं करते उसकी प्राप्ति दुख है. जो प्रिय है, उसका वियोग सबसे बड़ा दुख है. दूसरा सत्य है कि इस दुख का कारण तृष्णा है. जैसे काम (भोग) तृष्णा. तृष्णा ही दुख का मूल कारण है. तीसरा सत्य है कि तृष्णा के त्याग से ही दुख का निरोध सम्भव है. जब तृष्णा का सर्वनाश होता है तभी दुख का अन्त होता है. जितनी तृष्णा है उसकी जननी इच्छा है और जब तक इसकी पूर्ति नहीं होती यह दुख ही देती रहती है. चौथा सत्य है आर्य अष्टांगिक मार्ग पर चलने से आदमी सभी स्वार्थमयी इच्छाओं से मुक्त हो सकता है. यह चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म के सिद्धान्त हैं.
अनित्यता बुद्ध धर्म के मुख्य सिद्धान्तों में से एक है. अनित्य का मतलब है अस्थायी अर्थात प्राणी का जिन-जिन सामग्रियों से निर्माण होता है, वह परिवर्तनशील है. जितने भी जीवित पदार्थ हैं वे अस्थायी हैं और परिवर्तन के अतिरिक्त जगत में कुछ भी स्थाई नहीं है. प्रत्येक वस्तु क्षणिक है. आधुनिक विज्ञान विश्व में कुछ भी ऐसा नहीं खोज सकता है, जो स्थिर हो. जो कुछ अनित्य है, उसे गलती से नित्य समझ लेना ही दुख का मूल कारण है.
प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धान्त बुद्ध की महत्वपूर्ण खोज है. साधारण भाषा में इसे बौद्ध धर्म का ‘कारण कार्य का नियम’ कहते हैं. बुद्ध ने कहा, ‘इसके होने पर यह होता है.’ अर्थात एक का विनाश होने पर दूसरे की उत्पत्ति होती है. जो होता है, वह किसी न किसी कारण (प्रत्यय) होता है. दुनिया में जो हुआ है, जो हो रहा है और जो होगा, वह किसी न किसी प्रत्यय (कारणों) पर आधारित होगा. उन्होंने इसे दु:ख चक्र का अनुसंधान करते हुआ खोजा. उनकी खोज थी कि विषयों का इन्द्रियों से सम्पर्क होने पर शरीर में दु:खद या सुखद संवेदनाएं होती हैं. उन्होंने बताया कि भवचक्र तोड़ने के लिए वेदना से शुरुआत करनी होगी क्योंकि अज्ञान हर कड़ी से जुड़ा है. शारीरिक संवेदनाओं के जरिये मानसिक विकार को जड़ से निकालने की यह अद्भुत वैज्ञानिक विद्या है. प्रतीत्य समुत्पाद के ज्ञान बिना निर्वाण की प्राप्ति असम्भव है.

 

source: http://www.samaylive.com/article-analysis-in-hindi/118107/lord-buddha.html

मनु अन्याय का प्रतीक है, तो फिर राजस्थान के उच्च न्यायालय के बाहर उसकी मू्र्ती क्यों है?…हरीश परिहार ( अधिक जानकारी के लिए डॉ. भदंत आनंद कौसल्यायन जी द्वारा रचित पुस्तक “मनुस्मृति क्यों जलाई गयी” पढ़ें)

https://www.facebook.com/photo.php?fbid=1076297029130954&set=a.180224205404912.41025.100002520002974&type=3&theatermanu in rajasthan highcourtराष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहब भीमराव आम्बेडकर ने 25 दिसम्बर 1927 के दिन महाराष्ट्र के महाड़ में मनुस्मृति नाम के तथाकथित धार्मिक ग्रन्थ को पब्लिकली जलाया था। कारण: घ्रणित किताब मनुस्मृति दलितों व महिलाओं के मानव अधिकारों के विरोध में लिखी गयी थी। जाहिर तौर पर इस किताब में पाखंड है। जाति के आधार पर छुआछूत, ऊँच-नीच, असमानता का कारण मनुस्मृति ही है। सदियों से सोशल डीग्रेडेशन का मुख्य कारण मनुस्मृति है। मानव समाज में जाति के आधार पर भेदभाव को जन्म मनुस्मृति ने दिया था। चार वर्णों की व्यवस्था का भी उद्गम मनुस्मृति से होता है। वर्ण व्यवस्था ने मानव समाज में ऊँच-नीच को जन्म दिया। हिन्दू समाज में दलितों के मानव अधिकार मनुस्मृति की वजह से छीन लिए गये। इससे सम्बंधित तमाम प्रकार की बातें मनुस्मृति में लिखी हुयी है। आज के आधुनिक युग में भी हम तमाम प्रकार की ख़बरों से रूबरू होते हैं जिसमे यह पढ़ने या देखने को मिलता है कि फलांना जगह दलितों के घर जला दिए गये। फलांना जगह दलित लड़कियों के साथ उच्च जाति के असामाजिक तत्वों ने बलात्कार किया या फलांना जगह दलित महिला को नंगा कर घुमाया इत्यादि। (सन्दर्भ के तौर पर फरीदाबाद की घटना का जिक्र किया जा सकता है या फिर जोधपुर व बीकानेर में उच्च जाति के अध्यापक द्वारा दलित बच्चे को पीटा जाना आदि।)manusmriti jalai kyon gayi

इस प्रकार की तमाम प्रकार की दुखद ख़बरें हर रोज अख़बार, दूरदर्शन या फिर सोशल मीडिया पर देखने को मिलती है। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह है कि मनुस्मृति मानव समाज के लिए खतरा है। यह मानवीय मूल्यों को ठेस पहुंचाती है। मनुस्मृति को मनु नाम के काल्पनिक व्यक्ति ने लिखा था। काल्पनिक इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि मनु को किसी ने देखा नहीं था और न ही इतिहास में मनु की शक्ल के बारे में कोई जानकारी मिलती है। मनुस्मृति की वजह से महिलाओं व दलितों के साथ अन्याय होता आ रहा है। भारत में महिलाओं के विरोध में कई प्रकार की रुढ़िवादी परम्पराएँ चलती आ रही हैं। मिसाल के लिए दहेज़ प्रथा हो या घुंघट प्रथा, कन्या भ्रूण हत्या हो या बाल विवाह इत्यादि। या फिर कन्या-दान जैसा शब्द।

मनुस्मृति दहन का मकसद दलितों व महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार एवं अन्याय को खत्म करके समानता वाले समाज की स्थापना करना था। यानी कि छुआछूत, जाति आधारित भेदभाव, ऊँच-नीच, को ख़त्म करना तो था ही, इसके साथ-साथ चार वर्णों की व्यवस्था को भी ख़त्म करना था यानी कि ब्राह्मणवाद को ख़त्म करके समाजवाद, आम्बेडकरवाद स्थापित करना था। दलितों को ब्राह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष के लिए मनुस्मृति-दहन-दिवस मील का पत्थर साबित हुआ। बाबा साहेब आम्बेडकर ने उस दिन शाम को दिए भाषण में कहा था कि मनुस्मृति-दहन 1789 की “फ्रेंच-रेवोलुशन” के बराबर है। जाहिर है कि बाबा साहेब आम्बेडकर हिन्दू समाज में जात-पात के खिलाफ थे और सारा आम्बेडकरी साहित्य इस बात की पुष्टि करता है। इस प्रकार से मेरी राय के अनुसार मनुस्मृति मानवता के विरुद्ध है व उसका रचियता मनु अन्याय का प्रतीक है।

28 जून, 1989 को राजस्थान हाई कोर्ट के नये परिसर में मनु की मूर्ति का इंस्टालेशन किया गया था। माना जाता है कि मूर्ति की डिमांड लोकप्रिय नहीं थी और स्पष्ट है कि कुछ ‘पाखंडी’ लोग ही इस प्रकार अन्याय का समर्थन कर सकते हैं। शुरुआत से लेकर कार्य पूर्ण तक इस काम को गोपनीय रूप से अंजाम दिया गया, इसलिए चलते काम के बीच इसका विरोध नहीं हो पाया। इसकी जानकारी केवल उन्ही लोगों को थी जो मूर्ति लगवाना चाहते थे। स्पष्ट है कि मनु अन्याय का प्रतीक है, इसके बावजूद भी कुछ पाखंडी एवं रुढ़िवादी लोगों की डिमांड का सम्मान करते हुए न्यायालय द्वारा मनु, जिसको किसी ने देखा भी नहीं होगा फिर भी उसकी मूर्ति या पुतला बनाकर राजस्थान उच्च न्यायलय में लगाया जाना अन्याय के पक्ष में जाकर फैसला देने के बराबर है।

ध्यान रहे कि संवैधानिक रूप से न्यायालय एक ऐसी संस्थान है जहाँ पर सामाजिक व आर्थिक न्याय की उम्मीद की जाती है। मूर्ति लगने के बाद कई दलित संगठनों व महिला संगठनों ने इसके विरोध में धरना प्रदर्शन किया। धरना प्रदर्शन को देखते हुए 27 जुलाई, 1989 पर राजस्थान हाई कोर्ट की एक पीठ ने 48 घंटे की समयावधि के अन्दर-अन्दर मूर्ति को हटाने का निर्देश दिया। इसे ध्यान में रखते हुए विश्व हिन्दू परिषद के आचार्य धर्मेन्द्र ने न्यायमूर्ति महेंद्र भूषण के न्यायालय में एक रिट पेटीशन दाखिल कर दी और न्यायलय ने स्टे आर्डर लगाकर मूर्ति हटाने से मना कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि मनु की मूर्ति राजस्थान हाई कोर्ट में आज भी विद्धमान है।

मेरा प्रशन है कि ऐसा न्यायालय न्याय देता होगा कि केवल निर्णय?

भारतीय संविधान में मनुस्मृति से सम्बंधित कानून: राष्ट्र निर्माता डॉ बाबा साहेब भीमराव आम्बेडकर व संविधान निर्माण समिति के द्वारा मनुस्मृति सम्बंध में अप्रत्यक्ष रूप से एक प्रावधान लाया गया जिसके अंतर्गत भारतीय संविधान के अनुच्छेद 13 में अगर 26 जनवरी 1950 के बाद अगर कोई पुरानी परम्परा या विधान जो मौलिक अधिकारों का हनन करे, जो किसी प्रकार की रूढी भी हो सकती है, तो इस प्रकार की परम्परा को अनुच्छेद 13 का उल्लंघन माना जायेगा। इस प्रकार से मेरा मानना है कि मनु की मूर्ति का हाई कोर्ट में लगा होना एक प्रकार से संविधान की अवमानना है।

मनु अन्याय का प्रतीक है, तो फिर राजस्थान के उच्च न्यायालय के बाहर उसकी मू्र्ती क्यों है?

http://www.neelkranti.com/2013/12/25/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%BF-%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%8B%E0%A4%82-%E0%A4%9C%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%88-%E0%A4%97%E0%A4%AF%E0%A5%80/

 

भारत के मूलनिवासी अमर शहीद बिरसा मुंडा के शहीदी दिवस 9 जून पर प्रस्तुत है उनके जीवन परिचय पर ये लेख

Birsa_Munda,_photograph_in_Roy_(1912-72)बिरसा मुंडा (जन्म- 15 नवम्बर, 1875 ई., राँची, झारखण्ड; मृत्यु- 9 जून, 1900 ई., राँची जेल) एक आदिवासी नेता और लोकनायक थे। ये मुंडा जाति से सम्बन्धित थे। वर्तमान भारत में रांची और सिंहभूमि के आदिवासी बिरसा मुंडा को अब ‘बिरसा भगवान’ कहकर याद करते हैं। मुंडा आदिवासियों को अंग्रेज़ों के दमन के विरुद्ध खड़ा करके बिरसा मुंडा ने यह सम्मान अर्जित किया था। 19वीं सदी में बिरसा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक मुख्य कड़ी साबित हुए थे।

बिरसा मुंडा भारत के एक आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और लोक नायक थे जिनकी ख्याति अंग्रेजो के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम में काफी हुयी थी | उनके द्वारा चलाया जाने वाला सहस्राब्दवादी आंदोलन ने बिहार और झारखंड में खूब प्रभाव डाला था | केवल 25 वर्ष के जीवन में उन्होंने इतने मुकाम हासिल कर लिए थे कि आज भी भारत की जनता उन्हें याद करती है और भारतीय संसद में एकमात्र आदिवासी नेता बिरसा मुंडा का चित्र टंगा हुआ है ||

Birsa Munda बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवम्बर 1875 को रांची जिले के उलिहतु गाँव में हुआ था | मुंडा रीती रिवाज के अनुसार उनका नाम बृहस्पतिवार के हिसाब से बिरसा रखा गया था | बिरसा के पिता का नाम सुगना मुंडा और माता का नाम करमी हटू था | उनका परिवार रोजगार की तलाश में उनके जन्म के बाद उलिहतु से कुरुमब्दा आकर बस गया जहा वो खेतो में काम करके अपना जीवन चलाते थे | उसके बाद फिर काम की तलाश में उनका परिवार बम्बा चला गया |

Birsa Munda बिरसा का परिवार वैसे तो घुमक्कड़ जीवन व्यतीत करता था लेकिन उनका अधिकांश बचपन चल्कड़ में बीता था | बिरसा बचपन से अपने दोस्तों के साथ रेत में खेलते रहते थे और थोडा बड़ा होने पर उन्हें जंगल में भेड़ चराने जाना पड़ता था | जंगल में भेड़ चराते वक़्त समय व्यतीत करने के लिए बाँसुरी बजाया करते थे और कुछ दिनों बाँसुरी बजाने में उस्ताद हो गये थे | उन्होंने कद्दू से एक एक तार वाला वादक यंत्र तुइला बनाया था जिसे भी वो बजाया करते थे | उनके जीवन के कुछ रोमांचक पल अखारा गाँव में बीते थे |

गरीबी के इस दौर में Birsa Munda बिरसा को उनके मामा के गाँव अयुभातु भेज दिया गया | अयुभातु में बिरसा दो साल तक रहे और वहा के स्कूल में पढने गये थे | बिरसा पढाई में बहुत होशियार थे इसलिए स्कूल चलाने वाले जयपाल नाग ने उन्हें जर्मन मिशन स्कूल में दाखिला लेने को कहा |

वो अपने विद्रोह में इतने उग्र हो गये थे कि आदिवासी जनता उनको भगवान मानने लगी थी और आज भी आदिवासी जनता बिरसा को भगवान बिरसा मुंडा के नाम से पूजती है | उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया और अपने आदिवासी लोगो को हिन्दू धर्म के सिद्धांतो को समझाया था | उन्होंने गाय की पूजा करने और गौ-हत्या का विरोध करने की लोगो को सलाह दी | अब उन्होंने अंग्रेज सरकार के खिलाफ नारा दिया “रानी का शाषन खत्म करो और हमारा साम्राज्य स्थापित करो ” | उनके इस नारे को आज भी भारत के आदिवासी इलाको में याद किया जता है | अंग्रेजो ने आदिवासी कृषि प्रणाली में बदलाव किय जिससे आदिवासियों को काफी नुकसान होता था |1895 में लगान माफी के लिए अंग्रेजो के विरुद्ध मोर्चा खोल दिय था |

Birsa Munda बिरसा मुंडा ने सन 1900 में अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह करने की घोषणा करते हुए कहा “हम ब्रिटिश शाशन तन्त्र के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करते है और कभी अंग्रेज नियमो का पालन नही करेंगे , ओ गोरी चमड़ी वाले अंग्रेजो , तुम्हारा हमारे देश में क्या काम ? छोटा नागपुर सदियों से हमारा है और तुम इसे हमसे छीन नही सकते है इसलिए बेहतर है कि वापस अपने देश लौट जाओ वरना लाशो के ढेर लगा दिए जायेंगे ” | इस घोषणा को एक घोषणा पत्र में अंग्रेजो के पास भेजा गया तो अंग्रेजो ने अपनी सेना बिरसा को पकड़ने के लिए रवाना कर दी |अंग्रेज सरकार ने बिरसा की गिरफ्तारी पर 500 रूपये का इनाम रखा था | अब बिरसा भी तीर कमान और भालो के साथ युद्ध की तैयारियों में लग गये |Birsa Munda Biographyअब बिरसा के इसके विद्रोह में लोगो को इकट्ठा किया और उनके नेतृत्व में आदिवासियों का विशाल विद्रोह हुआ था | अंग्रेज सरकार ने विद्रोह का दमन करने के लिए 3 फरवरी 1900 को मुंडा को गिरफ्तार कर लिया जब वो अपनी आदिवासी गुरिल्ला सेना के साथ जंगल में सो रहे थे |उस समय 460 आदिवासियों को भी उनके साथ गिरफ्तार किया गया | 9 जून 1900 को रांची जेल में उनकी रहस्यमयी तरीके से मौत हो गयी और अंग्रेज सरकार ने मौत का कारण हैजा बताया था जबकि उनमे हैजा के कोई लक्षण नही थे | केवल 25 वर्ष की उम्र में उन्होंने ऐसा काम कर दिया कि आज भी बिहार ,झारखंड और उडीसा की आदिवासी जनता उनको याद करती है और उनके नाम पर कई शिक्षण संस्थानों के नाम रखे गये है |

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Birsa-Munda-Biography

 

बिरसा मुंडा के शोर्य की कहानी Birsa Munda Biography in Hindi

भारत के ध्वज में चौबीस तीले वाला अशोक चक्र या धम्म चक्र असल में बौद्ध धम्म के सबसे महत्वपूर्ण सूत्र “प्रतीत्यसमुत्पाद” को दर्शाता है, बारह तीले आरम्भ और बारह तीले अंत के कुल चौबीस तीले| आइए जानते क्या है “प्रतीत्यसमुत्पाद”

girls making ashok chakraभारत के ध्वज में चौबीस तीले वाला अशोक चक्र या धम्म चक्र असल में बौद्ध धम्म के सबसे महत्वपूर्ण सूत्र “प्रतीत्यसमुत्पाद” को दर्शाता है, बारह तीले आरम्भ और बारह तीले अंत के कुल चौबीस तीले| भगवान बुद्ध का बताया ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ प्रतीत्यसमुत्पाद (‘कारण से उत्पन्न’ या कहें कि ‘अवस्था से उत्पन्न’) का सिद्धांत

प्रतीत्य समुत्पाद सिद्धान्त बुद्ध की महत्वपूर्ण खोज है. साधारण भाषा में इसे बौद्ध धर्म का ‘कारण कार्य का नियम’ कहते हैं. बुद्ध ने कहा, ‘इसके होने पर यह होता है.’ अर्थात एक का विनाश होने पर दूसरे की उत्पत्ति होती है. जो होता है, वह किसी न किसी कारण (प्रत्यय) होता है.  दुनिया में जो हुआ है, जो हो रहा है और जो होगा, वह किसी न किसी प्रत्यय (कारणों) पर आधारित होगा.  उन्होंने इसे दु:ख चक्र का अनुसंधान करते हुआ खोजा. उनकी खोज थी कि विषयों का इन्द्रियों से सम्पर्क होने पर शरीर में दु:खद या सुखद संवेदनाएं होती हैं. उन्होंने बताया कि भवचक्र तोड़ने के लिए वेदना से शुरुआत करनी होगी क्योंकि अज्ञान हर कड़ी से जुड़ा है. शारीरिक संवेदनाओं के जरिये मानसिक विकार को जड़ से निकालने की यह अद्भुत वैज्ञानिक विद्या है. प्रतीत्य समुत्पाद के ज्ञान बिना निर्वाण की प्राप्ति असम्भव है.

वेदना (सुख, दुःख, की भावना) के कारण तृष्णा (पाने की तीव्र इच्छा) उत्पन्न होती है , तृष्णा के कारण पर्येषण (=खोजना), पर्येषण के कारण लाभ, लाभ के कारण विनिश्चय (=दृढ़-विचार), विनिश्चय के कारण छंद-राग (=प्रयत्न्न की इच्छा), छंद-राग के कारण अध्यवसान (प्रयत्न्न); अध्यवसान के कारण परिग्रह (=जमा करना), परिग्रह के कारण मात्सर्य (=कंजूसी), मात्सर्य के कारण आरक्षा (=हिफाजत), आरक्षा के कारण ही दंड-ग्रहण, शास्त्र ग्रहण, विग्रह, विवाद, ‘तू’ ‘तू’ मैं-मैं (=तुवं, तुवं), चुगली, झूठ बोलना, अनेक पाप=बुराईयाँ (=अ=कुशल-धर्म) (धर्म=मन का विचार) होती हैं।

नाम-रूप (संज्ञा-भौतिक अकार, विचार-अकार, विचार-पदार्थ, विचार-शरीर, विचार-आकृति) के कारण विज्ञान (चित, मन) है. विज्ञान के कारण नाम-रूप है। नाम-रूप के कारण स्पर्श है (आँखों से देखना, जिव्हा से चखना, नाक से सूंघना, कानों से सुनना भी ‘स्पर्श’ है क्योंकि ऐसे पदार्थ जैसे प्रकाश, ध्वनि तरंगों आदि का स्पर्श इन्द्रियों को होता है)। स्पर्श के कारण वेदना है। वेदना के कारण तृष्णा है। तृष्णा के कारण उपादान (आसक्ति, अनुराग, बंधन, व्यसन, एक तरह से तीव्र तृष्णा से चिपके रहना; उपादान (आसक्ति) चार प्रकार के हैं : 1. कामुपदान = एन्द्रिय, विषय, इन्द्रिय सम्बन्धी उपादान/आसक्ति/बंधन/तीव्र इच्छा/तृष्णा, 2. दित्थुपादान = वैचारिक उपादान, 3. शीलबातुपादान = नियम/विधि और अनुष्ठान/संस्कार में उपादान/आसक्ति, अट्टा-वादुपादान = व्यक्तित्व श्रद्धा / नायक-महिमा) में उपादान/आसक्ति/बंधन) है। उपादान के कारण भव (होना) है। भव के कारण जन्म (=जाति) है। जन्म के कारण जरा-मरण है। जरा-मरण के कारण शोक, परिवेदना (=रोना पीटना), दुःख, दौर्मनस्य (=मनःसंताप) उपायास (=परेशानी) होते हैं। इस प्रकार इस केवल (=सम्पूर्ण) -दुःख-पुंज (रूपी लोक) का समुदाय (= उत्पत्ति) होता है।

नोट : इस लेख को अपने फेसबुक नोट में संभाल कर रखें और प्रिंट निकालें। यह आपको दुनिया की किसी भी पुस्तक में नहीं मिलेगा। भगवान बुद्ध के इस सिद्धांत ‘प्रतीत्य समुत्पाद’ को इतनी सरलता से समझाया आपको कहीं नहीं मिलेगा। यही समस्त आधुनिक विज्ञान है, यही सृष्टि की उत्पत्ति और जीव विकास के उद्भव का सिद्धांत है जो कि चार्ल्स डार्विन के जीव विकास के सिद्धांत को स्पष्ट करता और समझता है।

लेखक: निखिल सबलानिया। स्रोत: दीघ निकाय (अनुवादक : भिखु/भिक्षु राहुल सांकृत्यायन और भिक्षु जगदीश काश्यप) (दीघ निकाय भगवान बुद्ध के धम्म-उपदेशों के संग्रहों में से एक है जो 2550 वर्ष पुराना है।) और Buddhist Dictionary by Venerable Bhante Nyanatiloka.

बुद्ध धम्म के प्रमुख ग्रन्थ और बौद्ध साहित्य पर पुस्तकें इस लिंक पर क्लिक करके ऑर्डर करें http://www.cfmedia.in/——–buddha-dhamma-ke-pramukh-granth-aur-bauddh-sahitya

 

https://samaybuddha.wordpress.com/2014/08/09/ashok-chakra-dhamm-chakra-is-buddhist-patticha-samutpada-theory/

बुद्ध यह नहीं कह रहे हैं कि परमात्मा नहीं है, इसे तुम खयाल रखना। बुद्ध इतना ही कह रहे हैं कि तुम जो भी परमात्मा गढ़ोगे, वह नहीं है। तुम जो भी गढ़ सकते हो, वह नहीं है। तुम्हारा गढ़ा हुआ परमात्मा नहीं है। तुम अपनी सब मूर्तियां खंडित कर डालो।एस धम्‍मो सनंतनो–भाग–5 (ओशो) प्रवचन–47


india land of buddhaहम तो जीते—जी और सोते—जागते भय और अपराध—भाव के द्वारा आशेष नारकीय पीड़ा से गुजर चकते हैं। क्या यह काफी नहीं है? कि मरने के बाद फिरे हमें नर्क भेजा जाए!

पहली बात, कोई भेजने वाल नहीं है, कोई भेजता नहीं है। तुम जाते हो इसे बहुत ठीक से समझ लो। अन्‍यथा बुद्ध के दृष्‍टिोण को पकड़ न पाओगे।

बुद्ध के दृष्टिकोण में जो अत्यंत आधारभूत बात है, वह यह है—धर्म, ईश्वर से शून्य। अगर तुम किसी भांति ईश्वर को पकड़े रहे, तो बुद्ध के धर्म को समझ न पाओगे। ईश्वर के बहाने तुमने किसी दूसरे पर दायित्व छोड़ा है।

तुम कहते हो, दुख तो हम भोग चुके बहुत, अब हमें नर्क न भेजा जाए—जैसे तुम्हें कोई भेजने वाला है! कि प्रार्थना और पूजा हमने इतनी की, अब हमें स्वर्ग भैजा जाए—जैसे कि कोई पुरस्कार बांट रहा है। वहां कोई भी नहीं है।

बुद्ध कहते हैं, तुम अकेले हो। और तुम्हें इस अपने अकेलेपन को इसकी समग्रता में स्वीकार कर लेना है। इस अकेलेपन की गहरी प्रतीति से ही मुक्ति होगी। क्योंकि जब तक दूसरा है और दूसरे पर टालने की सुविधा है, तब तक तुम बंधे ही रहोगे। कभी संसार तुम्हें बांधेगा और कभी धर्म तुम्हें बाध लेगा। लेकिन बांधने का सूत्र है कि कोई दूसरे पर तुम जिम्मेवारी टालते हो। भगवान है। वही करवा रहा है तो तुम कर रहे हो। वही जहा भेजेगा, वहीं तुम जाओगे। वह सुख देगा तो सुख, दुख देगा तो दुख। तुम अपने ऊपर दायित्व नहीं लेना चाहते। तुम उस जिम्मेदारी से घबड़ाते हो, जो स्वतंत्रता लाती है।

बुद्ध मनुष्य को अंतिम महिमा मानते है। उसके ऊपर कोई महिमा नहीं है। और मनुष्य की स्वतंत्रता ही उसके परमात्मा होने का उपाय है।

इसे ऐसा समझो, बहुत विरोधाभासी लगेगा, बुद्ध यह कह रहे हैं कि अगर परमात्मा को माना तो कभी परमात्मा न हो सकोगे। तुम्हारी मान्यता ही बाधा बन जाएगी।

हटाओ दूसरे को। अकेले होने को राजी हो जाओ। अगर दुख है, तो जानो कि तुम्हीं कारण हो। कोई और कारण नहीं। अगर सुख चाहते’ हो, तो प्रार्थना से न मिलेगा, पूजा से न मिलेगा, सृजन करना होगा। फसल काटनी है, बीज बोने होंगे। स्वादिष्ट आमों की अपेक्षा है, तो आम के बीज बोने होंगे। तुम नीम के बीज बोए चले जाओ और आम पाने की आकांक्षा किए जाओ और बीच में परमात्मा का बहाना बनाए रखो, यह न चलेगा।

तो पहली तो बात यह समझ लो कि कोई है नहीं जो तुम्हें भेजता है। शायद यह किसी की धारणा के कारण ही तुम अब तक सम्हल न पाए और तुमने अपने पैरों पर ध्यान न दिया और न अपनी दिशा का चिंतन किया, न अपने को जगाया। तुम गाफिल से रहे, मूर्च्छित से चले। तुमने सदा यह सोचा कि जो करवा रहा है, हो रहा है। और प्रार्थना कर लेंगे, समझा लेंगे, बुझा लेंगे, रो लेंगे, मना लेंगे, परमात्मा करुणावान है। यह करुणा की धारणा भी तुम्हारी धारणा है। परमात्मा महा—उद्धारक है, यह भी तुम्हारी धारणा है। तुमने पाप किया है, वह पतित पावन है, ऐसे तुम किसको धोखा दे रहे हो? ऐसे तुम अपने ही कल्पनाओं के जाल बुनते चले जाते हो। फिर उन्हीं में तुम उलझते चले जाते हो।

बुद्ध कहते हैं, कल्पना के जालों को तोड़ो। तुम अकेले हो। तुम्हारे संसार में, तुम्हारे मनोजगत में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई भी नहीं। संसार में भी तुम दूसरे को खोजते हो और धर्म में भी दूसरे को खोजते हो। संसार में खोजते हो पत्नी को, पति को, बेटे को, भाई को, बहन को—कोई दूसरा। अकेले होने की वहां भी तुम्हारी तैयारी नहीं है। अकेले होने में डर लगता है। अकेले घर में छूट जाते हो, भय पकड़ लेता है, कंपने लगते हो। कोई चाहिए।

अगर बिलकुल अकेले छोड़ दिए जाओ और कोई न तुम खोज सको, तो तुम कल्पना करने लगते हो। एकांत में बैठकर भी तुम दूसरे का ही सपना देखते हो। तुम्हें गुहा में गुफा में बंद कर दिया जाए तो भी तुम बैठकर भीड़ को मौजूद कर लोगे। पत्नी से बातें करोगे पति से बातें करोगे, मित्रों से बातें करोगे, झगड़े करोगे। अकेले तुम रह नहीं सकते।

किसी तरह संसार से घबड़ा जाते हो एक दिन, तो फिर तुम दूसरा संसार बना लेते हो, जिसको तुम धर्म कहते। फिर तुम मंदिर चले जाते हो, तुम पत्थर की मूर्ति से बातें करते हो। हइ का धोखा है!

पहले भी तुमने शतइrयां चुनी थीं। कम से कम जीवित थीं। कम से कम धोखे में भी थोड़ी सचाई थी। तुम्हारी पत्नी तुम्हारे परमात्मा से कम से कम ज्यादा जीवित थी। उसके जीवित होने के कारण ही अड़चन पड़ी। तुमने जो चाहा, उसने न किया। तुमने जैसा चाहा, वैसी वह सिद्ध न हुई। उसके यथार्थ ने तुम्हारी कल्पना को ठहरने न दिया, तोड़—तोड़ डाला।

तुमने तो सीता—सावित्री चाही थी। वे सब तुम्हारी कल्पनाएं हैं सीता और सावित्रिया। वे तुम्हारी पुराण—कथाएं हैं। पुरुष ने जैसी पत्नियां चाही हैं, उनके केवल सपने हैं। सीता साबित न हो सकी, क्योंकि उस तरफ भी एक जीवित स्त्री थी, किसी कथा का पात्र नहीं। तुमने तो सब तरह से अपने को भुलाने की कोशिश की, लेकिन उसके यथार्थ ने तुम्हारी कल्पना को तोड़—तोड़ दिया, झकझोर—झकझोर दिया।

आखिर तुम घबड़ा गए। अब तुम मंदिर आ गए। अब तुमने एक पत्थर की मूर्ति से अपना संबंध जोड़ा। यह मूर्ति तुम्हारी कल्पना को तोड़ भी न सकेगी। यह मूर्ति बिलकुल ही नहीं है। तुम इस पर बांसुरी रख दोगे इसके ओंठों पर, तो यह उतारकर नीचे न रख सकेगी। तुम इसे नचाओगे तो स्तुतइr नाचेगी। तुम बिठाओगे तो बैठेगी। तुम राम बनाओगे तो राम बनेगी, तुम कृष्ण बनाओगे तो कृष्ण बनेगी। यह केवल तुम्हारा ही जाल है। अब यह मूर्ति तुमने खोज ली, यह तुम्हारा ही, जैसा मदारी का बंदर होता है, ऐसे तुम्हारा यह बंदर है। तुम जैसा नचाओ यह नचेगी।

और मजा यह है कि तुम इस बंदर से प्रार्थना करोगे और तुम कहोगे कि मुझे ठीक से नचा। यह बंदर तुम्हारा, यह कल्पना तुम्हारी, यह सपना तुम्हारा, अब तुमने बड़ा गहरा धोखा देने की आयोजना की। तुमने पाप किया तो तुम इसको कहते हो, तुम पतितपावन हो। तुमने अपराध किया, तो तुम महा करुणावान हो। तुम अंधेरे में भटक रहे हो, तो परमात्मा प्रकाश है। तुम जो हो, ठीक तुम उससे विपरीत परमात्मा बनाते हो। तुम जो चाहते हो, वह तुम परमात्मा में आरोपित कर लेते हो। यह परमात्मा तुम्हारी कल्पना का विस्तार, प्रक्षेपण है।

बुद्ध कहते हैं, संसार में भी तुम दूसरे को पकड़े रहे, अब फिर तुमने दूसरे को पकड़ लिया। तुम स्व कब होओगे? तुम स्वयं कब बनोगे? अप्प दीपो भव! तुम अपने दीए खुद कब बनोगे? तुम कब कहोगे कि दूसरा नहीं है, मैं ही हूं; और मुझे जो भी करना है इस मैं से ही करना है—नर्क बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है, स्वर्ग बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है। दुख पाना है तो भी मुझे ही नियंता होना पड़ेगा, आनंद पाना है तो भी मुझे ही यात्रा करनी होगी। मेरे अतिरिक्त कोई भी नहीं है।

इसलिए तो बुद्ध का धर्म भारत में बहुत दिन टिक न सका। क्योंकि यह सत्य पर इतना जोर देते हैं और हम कल्पनाशील लोग सत्य पर इतने जोर के लिए राजी नहीं। यह सत्य तो हमें खतरनाक मालूम होता है। हम बिना स्वप्न के जी ही नहीं सकते।

सिर्ग्मड फ्रायड ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में कहा है कि जीवनभर हजारों लोगों का मनोविश्लेषण करके एक नतीजे पर मैं पहुंचा हूं कि मनुष्य सत्य के साथ जी नहीं सकता। असत्य जरूरी है, झूठ जरूरी है, धोखा जरूरी है।

यह वक्तव्य दूसरे महान जर्मन विचारक नीत्से के वक्तव्य से बड़ा मेल खाता है। नीत्से ने फ्रायड के पहले भी कहा था कि लोग सोचते हैं, सत्य और जीवन एक है। गलत सोचते हैं। सत्य जीवन—विरोधी है। झूठ जीवन का सहारा है। लोग भ्रम के सहारे जीते हैं। सत्य तो सब सहारे छीन लेता है। सत्य तो तुम्हें निपट नग्न कर जाता है। सत्य तो तुम्हें बचने की जगह ही नहीं छोड़ता। सत्य तो तुम्हें भरी बाजार की भीड़ में नग्न खड़ा कर देता हे। तुम्हें बहाने चाहिए। परमात्मा तुम्हारा सबसे बड़ा बहाना है।

बुद्ध यह नहीं कह रहे हैं कि परमात्मा नहीं है, इसे तुम खयाल रखना। बुद्ध इतना ही कह रहे हैं कि तुम जो भी परमात्मा गढ़ोगे, वह नहीं है। तुम जो भी गढ़ सकते हो, वह नहीं है। तुम्हारा गढ़ा हुआ परमात्मा नहीं है। तुम अपनी सब मूर्तियां खंडित कर डालो।

बुद्ध से बड़ा मूर्तिभंजक कोई भी नहीं हुआ। मुसलमानों ने बहुत मूर्तिया तोड़ी हैं, लेकिन फिर भी मोहम्मद इतने बड़े मूर्तिभंजक नहीं हैं, जितने बुद्ध। क्योंकि परमात्मा को स्वीकार तो किया! मत बनाओ ख्तइr, मत ढांचा रखो, लेकिन हाथ किसी दिशा में तो जोड़ोगे। मुसलमान भी काबे की तरफ हाथ जोड़कर झुकता है। जो निराकार है, उसकी भी दिशा तो बना ही लोगे। आकार निर्मित हो जाएगा। मत बनाओ चित्र, इससे क्या होता है? मन में तो चित्र बनेगा हो। बुद्ध से बड़ा कोई मूर्तिभंजक नहीं हुआ।

अब मैं तुम्हें याद दिला दूं कि बुद्ध परमात्मा—विरोधी नहीं हैं, परमात्मा के पक्ष में हैं इसीलिए विरोध है। वे चाहते यह हैं कि तुम्हारी सब कल्पनाएं ट्ट जाएं। तुम इतने नितांत अकेले छूट जाओ कि कुछ उपाय भागने का न रहे, कहीं और जाने का न रहे; कोई रास्ता न रह जाए अपने से दूर जाने का, तो तुम अपनी ही गहनता में, अपने ही स्वभाव में पाओगे उसे जिसे तुम अभी परमात्मा कहकर कल्पित करते हो। परमात्मा कल्पना नहीं है, आत्म—अनुभव है।

इसलिए पहली बात, यह तो पूछो ही मत कि हमें नर्क क्यों भेजा जाए! तुम

जाना चाहते हो तो जाओगे। तुम नहीं जाना चाहते, तुम्हें कोई भेज नहीं सकता। यह तुम ईश्वर को दोष देने की बात ही छोड़ दो।

अब यह बड़े मजे की बात है। अगर तुम धन्यवाद दोगे, तो दोष भी दोगे। अगर पूजा करोगे तो निंदा भी करोगे। अगर प्रार्थना पर तुम्हारा भरोसा है, तो कहीं शिकायत भी मौजूद रहेगी। ऐसे तुम कहोगे, हे परमात्मा! तू महान कृपाशाली है, अनुकपावान है, लेकिन नजर के किनारे से तुम देखते रहोगे अनुकंपा हो रही है कि नहीं? कि हम कहे चले जा रहे हों और तुम—कुछ हो रहा ही नहीं है! सिर्फ हमीं दोहराए जा रहे हैं, तुम हमारे अनुसार चल भी रहे कि नहीं न शिकायत भी भीतर खड़ी होती रहेगी। जहा धन्यवाद है, वहां शिकायत रहेगी। शिकायत धन्यवाद का ही शीर्षासन करता हुआ रूप है। या धन्यवाद शिकायत का शीर्षासन करता हुआ रूप है। वे एक ही चीज के दो नाम हैं, दो पहलू हैं।

बुद्ध कहते हैं, न शिकायत, न कोई धन्यवाद। वहा कोई है ही नहीं जिसे धन्यवाद दो। और कोई है नहीं जिसकी शिकायत करो। बुद्ध तुम्हें अपने पर फेंक देते हैं। बुद्ध तुम्हें इस बुरी तरह से अपने पर फेंक देते हैं; रत्तीभर तुम्हें सहारा नहीं देते, हाथ नहीं बढ़ाते। वे कहते हैं, सब हाथ खतरनाक हैं, सब सहारे खतरनाक हैं। उन्हीं सहारों के आसरे तो तुम भटक गए हो। आलंबन मत मांगो। तुम अकेले हो, तुम्हारी नियति अकेली है। इससे तुम राजी हो जाओ।

दरिया को अपनी मौज की तुगयानियों से काम

कश्ती किसी की पार हो या दरमियां रहे

सागर को अपनी लहरों का मजा है। तुम्हारी कश्ती पार हो या न हो, इससे सागर का कोई प्रयोजन नहीं। सागर को अपनी बाढ़ में मौज है। तुम डूबो कि बचो, तुम जानो।

बुद्ध तुम्हें अपना पूरा—पूरा मालिक बना देते हैं। यद्यपि यह मालकियत बड़ा महंगा सौदा है। यह मालकियत बड़ी कठिन है। क्योंकि तुम इतने अकेले छूट जाते हो कि बहाना भी नहीं बचता। फिर तुम यह नहीं कह सकते कि मैं दुखी हूं तो कोई और जिम्मेवार है। तुम ही जिम्मेवार हो। इसे थोड़ा समझें।

मनुष्य का मन सदा यह चाहता है कि जिम्मेवारी किसी पर टल जाए। यह मनुष्य की गहरी से गहरी चाल है। तुम जब दुखी होते हो, तुम तत्कण खोजने लगते हो—कौन मुझे दुखी कर रहा है? तुम कभी यह तो सोचते ही नहीं कि दुख मेरा दृष्टिकोण हो सकता है। पत्नी ने कुछ कहा, पति कुछ बोल गया, बेटे ने कुछ दुर्व्यवहार किया, समाज ने ठीक से साथ न दिया, राज्य दुश्मन है, परिस्थिति प्रतिकूल है, तुम कहीं न कहीं तत्कण बहाना खोजते हो। क्योंकि एक बात तुम मान ही नहीं सकते कि तुम अपने कारण दुखी हो।

तुम यह मानो कैसे! क्योंकि तुम सदा यह कहते हो, दुखी मैं होना नहीं चाहता। जब तुम दुखी होना नहीं चाहते, तो तुम अपने कारण क्यों दुखी होओगे? स्वभावत:, तुम्हारा तर्क कहता है, कोई और दुखी कर रहा है। कोई और कांटे बो रहा है, कोई और जीवन में शूल बो रहा है। मैं तो फूल ही मलता हूं। मैंने तो कभी फूल के अतिरिक्त कुछ चाहा नहीं। इसलिए अगर शूल मिल रहे हैं, तो कोई और जिम्मेवार है।

लेकिन किसको पड़ी है कि तुम्हारे लिए कांटे बोए? किसको फुरसत है? कौन तुम्हें इतना मूल्य देता है कि तुम्हारे रास्ते पर कांटे बोने आए? दूसरे लोग भी अपने जीवन में फूल बोने की बातों में लगे हैं। उनको भी फुरसत नहीं है, जैसे तुमको फुरसत नहीं है। लेकिन वे भी दुखी हो रहे है, तुम भी दुखी हो रहे हो। कुछ ऐसा लगता है, तुम आंख पर पट्टी बांधकर बीज बोए चले जाते हो।

बुद्धों का अनुभव है कि दुख है, तो कारण तुम हो। इसमें कोई अपवाद का उपाय नहीं है। तुमने ही बोया होगा। देर हो गयी होगी बीज बोए, फसल आने में समय लगा होगा, तुम शायद भूल भी गए होओ कब बोए थे ये कडुवे बीज। शायद तुम्हें, तुम्हारे तर्क में संबंध भी न रह गया हो बीजों का और फलों का। लेकिन इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। दुख तुम्हारे ही बोए हुए बीजों का फल है।

मगर तुम कहते हो, दुखी मैं होना नहीं चाहता। यह बात भी सच नहीं है। हजारों लोगों से मैं भी संबंधित हुआ हूं ऐसे आदमी को मैं अभी खोज नहीं पाया जो दुखी न होना चाहता हो। कहते सभी हैं, सुख चाहते हैं। सुख चाहते ही आते हैं। लेकिन जब मैं उनको गौर से देखता हूं तो उनको दुख को इतना पकड़े देखता हूं कि यह भरोसा नहीं आता कि इनका सुख चाहने का मतलब क्या है? फिर यह भी गौर से देखने पर पता चलता है कि जिसको ये सुख कहते हैं, वह दुख का ही नाम है। इनकी समझ में कहीं भूल है।

समझो। एक आदमी सम्मान चाहता है। अब सम्मान तो सुख है। लेकिन जिसने सम्मान चाहा, अपमान का क्या करेगा? सम्मान के चाहने में ही अपमान का दुख पैदा होता है। इधर तुमने सम्मान मांगा, उधर अपमान की संभावना बनी। तुम सम्मान चाहते हो। जितना तुम सम्मान चाहोगे, उतना ही दूसरे तुम्हारा अपमान करना चाहेंगे। तुम अपने को बड़ा करके दिखाना चाहते हो, दूसरे तुम्हें छोटा करके दिखाना चाहेंगे। क्योंकि तुम अगर बड़े हो, तो दूसरे छोटे हो जाते हैं। वे भी सम्मान चाहते हैं। तुम अगर छोटे हो, तो ही वे बड़े हो सकते हैं। इसलिए संघर्ष चलता है कि मैं बड़ा हूं तुम छोटे हो। तुम भी यही कर रहे हो। दूसरे भी सम्मान चाहते हैं, तुम भी सम्मान चाहते हो। उनको भी अपमान मिलता है, तुम्हें भी अपमान मिलता है।

थोड़ा सोचो, जमीन पर कोई चार अरब आदमी हैं। एक—एक आदमी चार अरब आदमियों के खिलाफ लड़ रहा है। एक—एक आदमी सिद्ध करने की कोशिश कर रहा है, मैं बड़ा हूं! और चार अरब आदमी उसके खिलाफ सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं कि हम बड़े! कैसे तुम जीतोगे? तुम्हारे जीतने की कोई संभावना नहीं। तुम पागल हो जाओगे।

थोड़ा सोचो। अपमान से दुख पाओगे और तुम कहोगे, दूसरे दुख दे रहे हैं। क्योंकि फला आदमी ने अपमान कर दिया। गहरे जाओ, तुमने अगर सम्मान न मला होता, तो कोई तुम्हारा अपमान कर सकता था? करता रहे। तुम्हें छूता भी न।

रामकृष्ण कहा करते थे, एक चील एक मरे चूहे को लेकर उड़ रही थी। कोई पच्चीस चीले उसका पीछा कर रही थीं, झपट्टे मार रही थीं। वह चील बड़ी परेशान थी कि ये मेरे पीछे क्यों पड़ी हैं! इसी झगड़े—झांसे में उसके मुंह से मरा चूहा छूट गया। छूटते ही पच्चीसों चीले उसे छोड़कर मरे चूहे के पीछे चली गयीं। उसे अकेला छोड़ गयीं। वह एक वृक्ष पर बैठ गयी। वह सोचने लगी, इनमें से कोई भी मेरे खिलाफ न था। चूहे को मैंने पकड़ा था और ये भी चूहे को ही पकड़ना चाहती थीं। चूहे के छूटते ही बात खतम हो गयी। कोई दुश्मन न रहा।

अगर सारे लोग तुम्हारे दुश्मन हैं, तो तुमने कोई चूहा मुंह में पकड़ा होगा। उसी चूहे को वे भी पकड़ना चाहते हैं। तुम उन्हें दोष मत दो। जो तुम भूल कर रहे हो, कम से कम उतना अधिकार वही भूल करने का उन्हें भी दो। चूहे कम हैं, चीले ज्यादा हैं। और चूहे कम होंगे ही, अन्यथा उनमें कोई अर्थ न रह जाएगा।

अगर सम्मान मिलने की सभी को सुविधा हो, चार अरब आदमी सभी सम्मानित हो सकें, सभी को राष्ट्रपतियों के पुरस्कार मिल जाएं, भारत— भूषण हो जाएं, भारत—रत्न हो जाएं, महावीर चक्र बांट दिए जाएं——सभी को—तो महावीर चक्र का मतलब क्या रह जाएगा?

सम्मान का मूल्य है न्यूनता में। जितना न्यून हो उतना ही मूल्यवान है। अगर चालीस करोड़ के मुल्क में —एक आदमी को सम्मान मिले तो मूल्य है। चालीस करोड़ को ही बांट दिया जाए—मुक्तहस्त—सभी भारत—रत्न, मूल्य समाप्त हो गया। फिर तो यह भी हो सकता है कि कोई आदमी जिद्द करे कि मुझे भारत—रत्न नहीं होना है 1 मैं अकेला, जो भारत—रत्न नहीं। तो उसमें सम्मान हो जाएगा।

तो जीवन का संघर्ष ऐसा है, न्यून का मूल्य होगा। अगर कोहिनूर हीरे सभी के पास हों, तो उनका कोई मूल्य नहीं रह जाता है। कोहिनूर चूंकि एक है, सभी के पास होने का उपाय नहीं है, वही उसका मूल्य है। रासायनिक—दृष्टि से तो हीरे में और कोयले में फर्क नहीं है। दोनों का रासायनिक संगठन एक जैसा है। कोयला ही दबा—दबा सदियों में हीरा बन जाता है। समय का फासला है। लेकिन कोयले की कौन पूजा करेगा? कोयले का कौन सम्मान करेगा? कोयला बहुतायत से है। न्यून होना चाहिए, तो सम्मान मिल सकता है। सम्मान का अर्थ यह हुआ कि जिसके लिए बहुत लोग संघर्ष कर रहे हों।

परसों रात एक संन्यासिनी ने मुझे आकर कहा—प्यारी संन्यासिनी है—उसने

कहा कि मुझे एक बड़ा अजीब सा खयाल चढ़ता है मन में कि मैं रानी हूं और रानी की तरह चलूं। मैंने कहा, तू मजे से चल। इसमें कोई अड़चन नहीं है। इस आश्रम में कोई अड़चन नहीं है। तू फूल—पत्ती का ताज भी बना ले, तो भी चलेगा। मगर एक ही खयाल रखना, और भी लोग यहां राजा—रानी हैं। उसने कहा, वह तो सब मजा ही खराब हो जाता है। अकेली मैं, तो ही मजा है। मैंने कहा, यह जरा मुश्किल बात है। क्योंकि जो सुविधा मै तुझे देता हूं, वही सबको देता हूं। दूसरों के साथ भी राजा—रानियों जैसा व्यवहार करना, फिर कोई अड़चन नहीं है, रहो, रानी रहो, बनो राजा! बात उसकी समझ में आ गयी।

बड़े होने का मजा दूसरे को छोटा दिखाने में है। तो जहां तुमने सम्मान मांगा, वहां तुमने अपमान की शुरुआत कर दी। अब जद्दोजहद होगी। अपमान से तुम दुखी होओगे।

और मजा यह है, सम्मान से तुम सुखी न हो पाओगे, अपमान से तुम दुखी होओगे। क्यों? क्योंकि सम्मान कितना ही मिल जाए, अंत तो नहीं आता। आगे सदा कुछ शेष तो रह ही जाता है। तृप्ति तो नहीं होती। ऐसा तो हो ही नहीं सकता है कि तुम्हें ऐसी घड़ी आ जाए सम्मान की कि अब इसके आगे कुछ भी नहीं। कुछ न कुछ बाकी रह जाएगा। सिकंदरों को भी बाकी रह जाता है। तुम कहीं भी पहुंच जाओ, किसी भी जगह पहुंच जाओ, वहां से भी तुम्हें आगे मंजिल रहेगी। तो सम्मान तुम्हें तृप्त न करेगा और सम्मान की मांग में जो अपमान की बौछार होगी सब तरफ से, वह तुम्हें बड़े काटो से बींध जाएगी। और तुम कहोगे, दूसरे अपमान कर रहे हैं। तुमने सम्मान की चाह में ही अपमान को निमंत्रण दिया। तुमने सफलता चाही, विफलता मिलेगी। तुमने चाहा, लोग तुम्हें भला कहें, बस भूल हो गयी। तुमने अपने अहंकार को सजाना चाहा कि लोग तुम्हारे अहंकार को नग्न करने पर उतारू हो जाएंगे।

लाओत्से ने कहा है, अगर तुम्हें हार से बचना हो तो जीत की आकांक्षा मत करना। और अगर तुम्हें अपमान से बचना हो तो सम्मान मत मांगना। लाओत्से ने कहा है, मेरा कोई अपमान नहीं कर सकता, क्योंकि मैंने सम्मान नहीं महत। और मैं वहा बैठता हूं जहां लोग जूते उतारते हैं। वहां से मुझे कोई कभी नहीं भगाता। मैंने सिंहासन पर बैठने की कोई चेष्टा नहीं की। इसलिए मुझे कोई हरा नहीं सकता। कैसे हराओगे? लाओत्से यह कहता है, मैं हारा ही हुआ हूं तुम मुझे हराओगे कैसे? मैंने जीत की योजना ही नहीं बनायी, तुम मुझे हराओगे कैसे?

इस बात को खयाल में रखो, कोई तुम्हें दूसरा न तो दुख देता है, न दे सकता है, न देने का कोई उपाय है। हा, तुम अगर अपने को दुख देना चाहो, मजे से दो। ऐसा मेरा अनुभव है कि लोग दुख को पकड़े हुए हैं, दुख को संपत्ति समझा है। दुख को छोड़ने की हिम्मत नहीं होती। क्योंकि दुख के कारण लगता है, कुछ है तो।

अब मैं क्या तुमसे अपना हाल कहूं

बाखुदा याद भी नहीं मुझको

जिंदगानी का आसरा है यही

दर्द मिट जाएगा तो क्या होगा

लोग बीमारियों के सहारे जीने लगते हैं। लोग दुखों की संपदा बना लेते हैं। लोग अपनी पीड़ाओं को तिजोरियों में सम्हालकर रख लेते हैं। निकाल—निकालकर बार—बार अपने घावों को देख लेते हैं। उघाड़—उघाड़कर फिर—फिर सहला लेते हैं। फिर—फिर हरे कर लेते हैं। कुछ है तो। खाली हाथ तो नहीं। रिक्त तो नहीं। सूने तो नहीं। कुछ भराव तो है।

तुम इस पर थोड़ा सोचना। कहीं तुमने अपने दुखों के साथ बहुत ज्यादा रिश्ता तो नहीं बना लिया? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम रुग्ण—रस लेने लगे? अगर द्द्म विचार करोगे, थोड़ा ध्यान करोगे, तुम पाओगे कि तुमने अपनी बीमारी में भी नियोजन कर दिया संपत्ति का। अब तुम बीमारी के कारण भी महत्वपूर्ण हो गए हो।

मैं एक विश्वविद्यालय में शिक्षक था। एक महिला मेरे साथ शिक्षक थी। उनके पति ने एक दिन मुझे फोन किया और कहा कि मैंने सुना है कि मेरी पत्नी आपका सत्संग करती है। आप जरा खयाल रखना, वह बीमारी बढ़ा—चढ़ाकर बताती है। जरा सा फोड़ा हो, तो वह कैंसर बताती है। तो आप फिजूल उसके पीछे परेशान मत होना। क्योंकि मैं बीस साल के अनुभव से कह रहा हूं।

शक तो मुझे भी होता था उस महिला की बातों से। लेकिन वह न केवल दूसरे को ही धोखा देती थी, जैसे खुद भी धोखा खाती थी। छोटी—मोटी बात को, दुख को, खूब बड़ा करके बताती। क्या कारण रहा होगा? उसने जीवन में कभी प्रेम नहीं जाना। तो दुख को बड़ा करके जो थोड़ी सी सहानुभूति मिल जाती, उसी से तृप्ति कर रही थी। पहले पति के साथ यही संबंध रहा होगा—दुख बढ़ा—बढ़ाकर बताया। फिर पति समझ गया। कितने देर चलेगा यह? तो पति से नाता ढीला हो गया। फिर वह इधर—उधर सत्संग करने लगी। जहां भी कोई मिल जाए सहानुभूति देने वाला, वहीं वह अपने दुख!

गौर से देखा तो पता चला कि वह अपने दुख को बड़े सम्हाल—सम्हालकर रखती है। और एक—एक दुख को लुत्फ ले—लेकर कहती। जैसे दुख कोई कविता हो, कि कोई नृत्य हो। अगर उसके दुख को गौर से न सुनो, तो वह नाराज हो जाती। अगर दुख में सहानुशइत न बताओ, तो वह तुम्हारे विपरीत हो जाती। अगर दुख में सहानुभूति बताओ, वह जितना दुख कहे उससे भी बढ़ा—चढ़ाकर मान लो, तो वह चरणों पर झुकने को राजी।

तुम जरा अपने भीतर भी इस महिला को खोजना। सभी के भीतर है।

दुख में रस मत लेना, क्योंकि रस अगर तुम लोगे, तो कौन तुम्हें दुख की तरफ

जाने से रोक सकता है फिर? और दुख का तुम शोरगुल मत मचाना। और दुख को छाती पीटकर दिखलाना मत। दुख का प्रदर्शन मत करना।

तुमने कभी खयाल किया, लोग अपने दुखों की चर्चा करते हैं, सुखों की नहीं करते। लोगों की बातें सुनो, दुख की कथाएं। सुख की तो कोई बात ही नहीं होती। कारण है। क्योंकि अगर तुम सुख की किसी से चर्चा करो, तो सहानुभूति थोड़े ही पा सकोगे, उलटी ईर्ष्या। अगर तुम किसी से कहो, मैं बहुत सुखी हूं, तो वह आदमी नाराज हो जाएगा। वह कहेगा, अच्छा! तो मेरे रहते तुम सुखी हो गए। उसकी आंख में तुम विरोध देखोगे। तुमने एक दुश्मन बना लिया।

तुम कहो कि मैं बहुत दुखी हूं? कंधे झुके जा रहे हैं बोझ से, वह तुम्हारा सिर सहलाका। वह कहेगा कि बिलकुल ठीक। तुमने उसे एक मौका दिया अपनी तुलना में ज्यादा सुख अनुभव करने का। वह कहेगा कि बिलकुल ठीक।

मैं एक घर में रहता था। मकान मालिक की जो पत्नी थी, किसी के घर कोई मर जाए—पास—पड़ोस में, दूर, संबंध हो न हो, पहचान हो न हौ—वह जरूर जाती। मैंने उससे पूछा कि जब भी कोई मरता है तो मैं तुम्हें बड़ा प्रसन्नता से जाते देखता हूं, मामला क्या है? उसकी खुशी जाहिर हुई जाती थी। वह जहां भी दुखी लोगों को देखती, वहां जाने का लोभ संवरण न कर पाती। क्योंकि उनके दुख की तुलना में अपने को थोड़ा सुखी अनुभव करती। चलो, पति किसी और का मरा, अपना तो नहीं मरा। बेटा किसी और का मरा, अपना तो नहीं मरा।

और लोग दूसरे के प्रति सहानुभूति दिखाने में बड़ा मजा लेते हैं। मुफ्त! कुछ खर्च भी नहीं होता और सहानुभूति दिखाने का मजा आ जाता है।

तुम खयाल करो। तुम्हारे घर कोई मर जाए और लोग आएं.? शरतचंद्र के प्रसिद्ध उपन्यास देवदास में वैसी घटना है। देवदास के पिता मर गए और वह दरवाजे पर बैठा है। और लोग आते हैं, बड़ी सहानुभूति करते हैं। वह कहता है कि अंदर जाएं, मेरे बड़े भाई को कहें, उनको काफी मजा आएगा। तो लोगों को बड़ा सदमा लगता है। यह किस तरह का लड़का है! कहता है, अंदर जाएं। आगे बढ़ा देता है, कोई रस नहीं लेता उनकी बातों में। वे बड़ी तैयारी करके आए हैं। लोग जब किसी के घर जाते हैं मरण के अवसर पर तो सब सोचकर जाते हैं, क्या—क्या कहेंगे, कैसे—कैसे कहेंगे। पच्चीस दफे रिहर्सल कर लेते हैं मन में कि इस—इस तरह कहेंगे बात, बात को जमा देंगे। वह सुनता ही नहीं। वह, कोई बात शुरू करता है, वह कहता है कि रुको, अंदर चले जाओ, बड़े भाई बैठे हैं, उनको। लोग नाराज हो गए हैं उस पर। यह बर्दाश्त के बाहर है।

तुम सहानुभूति देना चाहो और कोई न ले, तुम बहुत नाराज हो जाओगे। लोग सहानुभूति मुक्तहस्त बांटते हैं। क्योकि यही तो थोड़े से क्षण हैं जब उन्हें सुखी होने का अवसर मिलता है। किसी को दुखी देखकर लोग सुखी होते हैं।

तुमने खयाल किया, किसी को सुखी देखकर तुम कभी सुखी हुए? कोई बड़ा मकान बना लेता है, तब तुम्हें कोई सुख नहीं होता। लेकिन किसी के मकान में आग लग जाती है, तब तुम बड़े दुखी होते हो।

यह थोड़ा विचारने जैसा है कि जिसको दूसरे का बड़ा मकान देखकर सुख न हुआ था, उसे उसके मकान में आग लगी देखकर दुख होगा क्यों? दुख हो कैसे सकता है? यह तो सारी सरणी गलत हो गयी।

हां, अगर उसके बड़े मकान को बनते देखकर सुख हुआ था, तो आग त्नगी देखकर दुख होगा। लेकिन बड़ा मकान जब बना था, तब तो तुम दुखी हुए थे। सुख नहीं हुआ था। तुम जार—जार हो गए थे, तार—तार हो गए थे। तुम्हारी छाती में गोली लग गयी थी। तुम्हारी कमर झुक गयी थी उस दिन, तुम के हो गए थे उस बड़े मकान को देखकर। एक पराजय साफ लिख गयी थी खुले आकाश में—यह मकान तुम्हारा होना था और नहीं हो पाया और कोई और बना ले गया। बाजी कोई और ले गया। वह पराजय की स्पष्ट कथा थी। फिर जब इस घर में आग लग जाती है तब तुम दुखी कैसे हो सकते हो?

नहीं, तुम दुख दिखाते हो। होते तुम सुखी हो। भीतर बड़ा रस आता है। मन तो यही कहता है कि पाप का फल है। किया था, भोगा! अब कोई ब्लैक—मार्केट करे, चोरी—रिश्वत करे और बड़ा मकान बना ले! देर है, अंधेर थोड़े ही है! अब देख लिया! यह तो भीतर होता है। बाहर से जाकर तुम जार—जार आंसू बहाते हो। यह मौका तुम नहीं छोड़ सकते। बड़ा मकान न बना पाए, लेकिन बड़े मकान बनाने वाले आदमी को नीचा दिखाने का अवसर तो मिला—मकान में आग लग गयी।

ध्यान रखना, धार्मिक आदमी वह नहीं है जो दूसरे के दुख में सहानुभूति बताता है। धार्मिक आदमी वह है जो दूसरे के सुख में सुख अनुभव करता है।

और जिसने दूसरे के सुख में सुख अनुभव किया, उसकी सहानुभूति हीरे जैसी है। उसकी दुख में सहानुभूइत अर्थ रखती है। और जिसने सुख में ईर्ष्या अनुभव की, उसकी सहानुभूति तो ऊपर—ऊपर मलहम—पट्टी है। भीतर— भीतर आग है। सहानुभूति के धोखे में मत पड़ना।

तुमसे लोगों ने कहा है, दूसरों के दुख में दुखी होओ। मैं तुमसे कहता हूं दूसरों के सुख में सुखी होओ। दूसरों के दुख में दुखी होना! तुम वैसे ही दुखी काफी हो, अब और दुखी होना! तुम दूसरों के सुख में सुखी होओ। सुख सीखो। अपने सुख में तो सुखी होओ ही, दूसरे के सुख में भी सुखी होओ। सुख की आदत बनाओ। और जैसे—जैसे आदत घनी होगी, और बड़ा—बड़ा सुख आएगा।

कल मैं एक कहानी पढ़ रहा था कि एक आदमी अपने मनोवैज्ञानिक के पास गया। वह बड़ा घबड़ाया हुआ, बड़ा बेचैन था। और मनोवैज्ञानिक ने पूछा, क्या परेशानी है, इतने क्यो पसीने से तरबतर, इतने क्यों बेचैन, इतने क्यों हांफ रहे हो? क्या तकलीफ आ गयी है, शांति से बैठकर कहो। उसने कहा, बड़ा बुरा हुआ। रात मैं सोया था, मेरे पेट पर से एक चूहा निकल गया। उस मनोवैज्ञानिक ने कहा, हद्द हो गयी चूहा ही निकला है, कोई हाथी तो नहीं निकला! उसने कहा, वह तो मुझे भी पता है, लेकिन चूहा निकल गया, रास्ता तो बन गया। अब हाथी भी किसी दिन निकल जाएगा। रास्ता बन गया, असली तकलीफ यह है।

यह कहानी मुझे जंची। चूहे को भी मत निकलने देना, रास्ता तो बन गया। हाथी के आने में कितनी देर लगेगी! एक दफा पता हो जाए कि यहां से निकला जाता है। न, वह आदमी ठीक कह रहा था, उसकी घबड़ाहट ठीक थी—सच।

तुम सुख के लिए थोड़ा रास्ता तो बनाओ। पहले चूहे की तरह सही, फिर हाथी की तरह भी निकलेगा। तुम सुख का कोई अवसर मत खोजो। तुम सुख का जो भी अवसर मिल सके चूको ही मत। और अगर तुम ध्यान रखो, तो ऐसी कोई भी घड़ी नहीं है जहां तुम सुख का अवसर न पा सको। गहन से गहन दुख के क्षण में भी सुख की कोई किरण होती है। अंधेरी से अंधेरी रात में भी सुबह बहुत दूर नहीं होती, पास ही होती है। और फिर अंधेरी से अंधेरी रात में भी चमकते तारों का फैलाव होता है। थोड़ी नजर सुख की खोजने वाली चाहिए।

अपने में भी सुख खोजो, दूसरे में भी सुख खोजो, ताकि सुख में तुम्हारी आदत रम जाए। ताकि सुख तुम्हारा सहज स्वभाव बन जाए। सुख पर तुम्हारी अनायास आंख पड़ने लगे। यह तुम्हारा ऐसा अभ्यास हो जाए कि इसके लिए कुछ करने की जरूरत न रहे, यह सहज होने लगे।

अभी तुमने उलटा किया है। अभी तुमने दुख की आदत बनायी है।

एक मनोवैज्ञानिक छोटा सा प्रयोग कर रहा था। उसने अपनी कक्षा में आकर बड़े ब्लैकबोर्ड पर एक छोटा सा सफेद बिंदु रखा—जरा सा—कि मुश्किल से दिखायी पड़े। फिर उसने पूछा विद्यार्थियों को कि क्या दिखायी पड़ता है? किसी को भी उतना बड़ा ब्लैकबोर्ड दिखायी न पड़ा, सभी को वह छोटा सा बिंदु दिखायी पड़ा—जो कि मुश्किल से दिखायी पड़ता था। उसने कहा, यह चकित करने वाली बात है। इतना बड़ा तख्ता कोई नहीं कहता कि दिखायी पड़ रहा है; सभी यह कहते हैं, वह छोटा सा बिंदु दिखायी पड़ रहा है।

तुम जो देखना चाहते हो, वह छोटा हो तो भी दिखायी पड़ता है। तुम जो देखना नहीं चाहते, वह बड़ा हो तो भी दिखायी नहीं पड़ता। तुम्हारी चाह पर सब कुछ निर्भर है। तुम्हारा चुनाव निर्णायक है।

तो मैं तुमसे कहता हूं—इस जीवन में तुम कहते हो दुख पाया बहुत, अब अगले जन्म में और हमें नर्क न भेजा जाए—कोई भेजने वाला नहीं है। लेकिन इस जीवन में अगर तुमने दुख की आदत बनायी, तो तुम नर्क चले जाओगे।

अब तुम्हें लगता है, इसमें बड़ा अन्याय हो रहा है कि हमने जीवनभर दुख

भोगा, फिर नरक भेजा! मैं तुमसे कहता हूं र जीवनभर दुख का अभ्यास किया, तुम

नरक के अतिरिक्त जाओगे भी कहां! तुम्हारा अभ्यास तुम्हें ले जाएगा। रास्‍त बना

लिया, अब तुम उसी रास्ते से चलोगे। तुम्हें अगर कोई स्वर्ग भेजना भी चाहे तो कोई उपाय नहीं है। तुम स्वर्ग में भी नर्क खोज लोगे।

नर्क तुम्हारा जीवन कोण है। यह कोई स्थान नहीं है कहीं। यह तुम्हारे देखने का ढंग है। तुम जहां जाओगे, नर्क खोज लोगे। तुम्हारा नर्क तुम्हारे साथ चलता है। तुम्हारा स्वर्ग भी तुम्हारे साथ चलता है। तुम अभ्यास करना यहीं से शुरू करो। तुम कल की प्रतीक्षा मत करो कि मरने के बाद स्वर्ग जाएंगे। अधिक लोग यही भूल कर रहे है—कि मरे, फिर स्वर्गीय हुए!

अगर जन्म में, जीते—जी नरक में रहे, तो अचानक तुम स्वर्ग में नहीं पहुंच सकते। कोई छलांग थोड़े ही है कि तुमने एकदम से तय कर लिया और तुम स्वर्ग में चले गए। तुम्हारे जिंदगीभर का अभ्यास तुम्हारी दिशा बनेगा।

यही सारा अर्थ है कर्म के सिद्धात का। और बुद्ध ने कर्म के सिद्धात को अपरिसीम महत्ता दी है। और ईश्वर को हटा लिया। क्योंकि बुद्ध को लगा, ईश्वर की मौजूदगी कर्म के सिद्धात को पूरा न होने देगी।

ऐसा समझो कि अगर अदालत में कहीं ऐसी व्यवस्था हो जाए कि हम न्यायाधीश को अलग कर लें, और कानून हो सके, तो कानून ज्यादा पूर्ण होगा। न्यायाधीश की मौजूदगी कानून को गड़बड़ करती है। क्योंकि न्यायाधीश के भी अपने दृष्टिकोण हैं। किसी पर दया खा जाएगा, किसी पर क्रोध से भर जाएगा। न्यायाधीश हिंदू होगा तो हिंदू पर दया कर लेगा, मुसलमान होगा तो मुसलमान पर दया कर लेगा। न्यायाधीश खुद शराबी होगा तो शराबी को थोड़ा कम दंड देगा, अगर शराब के खिलाफ होगा तो शराबी को थोड़ा ज्यादा दंड दे देगा।

आज नहीं कल, भविष्य में कभी न कभी न्यायाधीश की जगह कंप्यूटर होगा। होना चाहिए। क्योंकि कंप्यूटर पक्षपात न करेगा। वह तो सीधा—सीधा हिसाब न्याय का कर देगा। वहां कोई बीच में मनुष्य नहीं है, जो न्याय में किसी तरह की गड़बड़ कर सके।

बुद्ध ने, महावीर ने परमात्मा को अलग कर लिया, वह एक बहुत वैज्ञानिक आधार पर। वह आधार यह है कि परमात्मा की मौजूदगी न तो तुम्हें स्वतंत्र होने देगी, और परमात्मा की मौजूदगी कर्म के सिद्धात को भी पूर्ण न होने देगी।

एडमंड बर्क यूरोप का एक बड़ा विचारक हुआ। वह एक चर्च में सुनने गया था। पादरी के बोलने के बाद प्रश्न पूछे गए, तो उसने चर्च के पादरी से पूछा कि मुझे एक प्रश्न पूछना है : आपने कहा कि मरने के बाद, जो लोग सदाचारी थे और जिनका भगवान में भरोसा था, वे स्वर्ग जाएंगे। मेरे मन में एक सवाल है। वह सवाल यह है कि जो लोग सदाचारी थे लेकिन भगवान में भरोसा नहीं था, वे कहौ जाएंगे? या, जो लोग सदाचारी नहीं थे लेकिन भगवान में भरोसा था, वे कहां जाएंगे?

वह पादरी ईमानदार आदमी रहा होगा। पादरी आमतौर से इतने ईमानदार होते नहीं। धर्मगुरु और ईमानदार, जरा मुश्किल बात है! वह धंधा ही जरा बेईमानी का है। शायद एडमंड बर्क की मौजूदगी ने भी उसे ईमानदार बनने में सहायता दी, क्योंकि यह आदमी बड़ा सदाचारी था, लेकिन इसका ईश्वर पर भरोसा नहीं था। इसका प्रश्न वास्तविक था, किताबी नहीं था। पूछ रहा था अपने बाबत कि ऐसा तो मैंने कोई आचरण नहीं किया है कि नर्क भेजा जाऊं। लेकिन ईश्वर पर मुझे भरोसा नहीं, मजबूरी है, मैं क्या करूं! तो मेरा क्या होगा?

पादरी ने कहा कि मुझे थोड़ा सोचने का मौका दें। उसने सात दिन सोचा। सोचा, कुछ समझ में न आया। क्योंकि मामला बड़ा उलझन का हो गया। कठिनाई यह हो गयी, अगर वह यह कहे कि सदाचारी परमात्मा को न मानने के कारण नर्क भेजा जाएगा, तो सदाचार का सारा मूल्य समाप्त हो गया। अगर वह यह कहे कि परमात्मा को मानने वाला असदाचारी हो तो भी स्वर्ग जाएगा; तो सिर्फ परमात्मा को मान लेना, खुशामद कर लेना, स्तुति कर देना काफी हो गया। सदाचार का क्या मूल्य रहा ‘ और अगर वह यह कहे कि सदाचारी स्वर्ग जाएगा, परमात्मा को माने या न माने तो भी सवाल उठता है फिर परमात्मा को मानने जरूरत क्या? सदाचार ही निर्णायक है। तो फिर परमात्मा को बीच में क्यों लेना?

विज्ञान का एक नियम है, जितने कम ‘ काम चल सके उतना उचित। क्योंकि ज्यादा सिद्धात उलझाव खड़ा करते हैं। तो अगर सदाचार से ही स्वर्ग जाया जाता है और असद—आचार से नर्क जाया जाता है, तो बात खतम हो गयी, फिर परमात्मा को बीच में क्यों लेना? अगर परमात्मा को मानने से स्वर्ग जाया जाता है और परमात्मा को न मानने से नर्क जाया जाता है, तो सदाचार की बात समाप्त हो गयी, फिर सदाचार की बात को, बकवास को बीच में मत लाओ। न्यूनतम सिद्धात विज्ञान का आधार है।

इसी आधार पर बुद्ध और महावीर ने परमात्मा को इनकार किया। बड़े वैज्ञानिक चिंतक थे। कर्म का सिद्धात पर्याप्त है। परमात्मा को बीच में लाने से अड़चन होगी। दो सिद्धात हो जाएंगे। विभाजन होगा। निर्णय करना मुश्किल हो जाएगा। एक ही सिद्धात को रहने दो और उसकी सत्ता को सार्वभौम रहने दो।

सात दिन सोचा पादरी ने, कुछ सोच न पाया। जल्दी सातवें दिन चर्च आ गया कि अ?ब क्या करें! लोग अभी आए न थे, जाकर छत पर बैठ गया। रातभर सोचता रहा था, नींद न लगी थी, झपकी लग गयी। उसने एक स्वभ देखा। स्वप्न देखा, सात दिन का जो ऊहापोह था, वही स्वप्न बन गया। स्वप्न देखा कि एक ट्रेन में बैठा है, स्वर्ग पहुंच रहा है। उसने कहा, यह अच्छा हुआ! देख ही लें कि मामला क्या है? पता लगा लें वहीं।

स्वर्ग जाकर उसने पूछा कि सुकरात यहां है? क्योंकि सुकरात ईश्वर को नहीं मानता था, लेकिन सदाचारी था। लोगों ने कहा कि नहीं, सुकरात का तो यहां कुछ पता नहीं है। खबर नहीं सुनी कभी सुकरात की यहं।, कौन सुकरात ‘ कैसा सुकरात? सदमा लगा उसे। फिर उसने चारों तरफ स्वर्ग में खोजकर देखा और भी खबर पूछी—गौतम बुद्ध यहां हैं? तीर्थंकर महावीर यहां हैं? कोई पता नहीं। लेकिन एक बात और उसे हैरानी की हुई कि स्वर्ग बड़ा बेरौनक मालूम पड़ता है। उदास—उदास है। उसने तो सोचा था उत्सव होगा वहा, लेकिन धूल—धूल सी जमी है। संसार से भी ज्यादा उदास मालूम पड़ता है। थका—हारा सा है। फूल खिले से नहीं लगते। सब तरफ गमगीनी है। बड़ा हैरान हुआ कि स्वर्ग भी स्वर्ग जैसा नहीं मालूम पड़ता। सुकरात भी नहीं, महावीर भी नहीं, बुद्ध भी नहीं, ये गए कहां? नर्क! यह बात ही सोचकर उसके मन को घबड़ाने लगी।

भागा स्टेशन आया। दूसरी ट्रेन तैयार थी, जा रही थी नर्क की तरफ, चढ़ गया। उसने कहा, यह अच्छा हुआ कि वक्त पर आ गए। नर्क पहुंचा, बड़ा चकित हुआ। वहां रौनक कुछ ज्यादा मालूम पड़ती थी। गीत गाए जा रहे थे संगीत था हवा में, फूल खिले थे ताजा—ताजा था। उसने कहा, यह कुछ मामला क्या है? कहीं तख्तिया तो गलत नहीं लगी हैं? यह तो स्वर्ग जैसा मालूम पड़ता है।

वह अंदर गया, उसने लोगों से पूछा कि सुकरात ‘ तो उसने बताया कि सुकरात वह सामने खेत में काम कर रहा है। सुकरात वहां हल—बक्सर चला रहा था। उसने पूछा, आप नर्क में? आप यहां नर्क में क्या कर रहे हो? इतने सदाचारी व्यक्ति को नर्क में? सुकरात ने कहा, किसने तुमसे कहा यह नर्क है? जहा सदाचारी है वहां स्वर्ग है। हम तो जब से आए, स्वर्ग में ही हैं। उसने लोगों से पूछताछ की।

उन्होंने कहा, यह बात सच है। जब से ये कुछ लोग आए हैं—बुद्ध, महावीर, सुकरात—तब से नर्क का नक्यग़ बदल गया है। इन्होंने स्वर्ग बना दिया है।

उसकी नींद खुली गयी। घबड़ा गया। उसने उत्तर दिया अपने सुबह के प्रवचन में, उसने कहा कि संत स्वर्ग जाते हैं ऐसा नहीं, जहां संत जाते हैं वहां स्वर्ग है। पापी नर्क जाते हैं ऐसा नहीं, पापी जहां जातेर हैं वहां नर्क है।

निर्णायक तुम हो। स्वर्ग और नर्क तुम्हारी हवा है, तुम्हारा वातावरण है। हर आदमी अपने स्वर्ग और नर्क को अपने साथ लेकर चलता है।

इसे स्मरण रखना, तो ही बुद्ध को ठीक से समझ पाओगे। दुख की आदत छोड़ो, नहीं तो दुख की आदत तुम्हें नर्क ले जाएगी। नर्क और स्वर्ग तो कहने की बातें हैं, कहने के ढंग हैं। दुख की आदत नर्क है।

उस तो सारी कटी इश्के—बुतां में मोमिन

आखिरी वक्त में क्या खाक मुसलमा होंगे

जिंदगीभर अगर तुम शतइrयों की पूजा करते रहे, तो मरते वक्त मुसलमान कैसे

हो जाओगे! वही मूर्तियां तुम्हें घेरे रहेंगी मरते वक्त भी। मरने के बाद मृत्यु तुम्हें वही देगी तो तुमने जीवन में अर्जित किया हो। मृत्यु तुम्हें वही सौंप देगी जो तुमने जीवनभर में कमाया हो। मौत तुम्हें नया कुछ नहीं दे सकती। मौत तो जीवनभर का निचोड़ है।

फिर से प्रश्न को हम समझ लें, ‘हम तो जीते—जी और सोते—जागते भय और अपराध— भाव के द्वारा अशेष नारकीय पीड़ा से गुजर चुकते हैं, क्या वह काफी नहीं…..?

किससे पूछते हो कि वह काफी नहीं? अगर काफी खै, तो बाहर निकलो। अगर काफी हो चुका है, तो क्यों खड़े हो भीतर?

नहीं, अभी काफी नहीं है। तुम्हारे अनुभव से अभी काफी नहीं है। अभी दिल कहता है, थोड़ा और भोग लें। अभी दिल कहता है, पता नहीं कहीं कोई सुख छिपा हो इस दुख में! अभी दिल कहता है, आज तक नहीं हुआ, कल हो जाए, किसे मालूम! अभी मन भरा नहीं दुख से। अन्यथा कौन तुम्हें रोक रहा है? द्वार—दरवाजे पर किसी ने भी सांकल नहीं चढ़ायी है। दरवाजे खुले हैं। तुम्हौं अटक रहे हो। काफी अभी हुआ नहीं। और अगर तुम्हीं नहीं जानते कि काफी हुआ है, तो अस्तित्व कैसे जानेगा कि काफी हुआ है? अस्तित्व ने तुम्हें मालिक बनाया है, तुम्हें परिपूर्ण स्वतंत्रता दी है। जब तक तुम्हीं अपने नर्क से मुक्त न हो जाओ तब तक कोई तुम्हें मुक्त नहीं कर सकता।osho36

थोड़ा सोचो, दुख से भी मुक्त होना कितना कठिन मालूम हो रहा है। और बुद्धपुरुष कहते हैँ, सुख से भी मुक्त हो जाना है। और तुम दुख से भी मुक्त नहीं हो पा रहे हो। क्योंकि तुम्हें दुख में सुख छिपा हुआ मालूम पड़ता है। और बुद्धपुरुष कहते हैं, सुख से भी मुक्त हो जाना है, क्योंकि उन्होंने सुख में भी दुख को ही छिपा पाया है।

दोनों की दृष्टि अगर ठीक से समझो तो अलग—अलग दृष्टिकोणों से है, लेकिन एक ही है। तुमने दुख में सुख को छिपा सोचा है। बुद्धपुरुषों ने सुख में दुख को छिपा पाया। बहुत फर्क नहीं है। जरा सा। लेकिन बहुत भी। क्योंकि अगर तुम दुख में सुख को छिपा पा रहे हो, तो तुम दुख को पकड़े रहोगे। और अगर तुम्हें यह दिखायी पड़ जाए कि तुम्हारे सारे सुख दुख का ही आवरण हैं, तो तुम द्ख से तो मुका होओगे ही, तुम सुख से भी मुक्त हो जाओगे। तुम दोनों को छोड़कर बाहर आ जाओगे।

उस घड़ी का नाम निष्कलुष निर्वाण की घड़ी है; जब तुम सुख और दुख को पीछे छोड़कर आ जाते हो। जब तुम सोने की, लोहे की, सब जंजीरें छोड़कर बाहर आ जाते हो। और बाहर आने का एक ही आधार है—काफी का पता चल जाना, पर्याप्त हो चुका!

मैंनै सुना है, एक आदमी ने नब्बे साल की उम्र में अदालत में तलाक के लिए निवेदन किया। खुद नब्बे साल का, पत्नी कोई पचासी साल की। मजिस्ट्रेट भी थोड़ा

चौंका। उसने पूछा कि तुम कब से विवाहित हो? उस नब्बे साल के आदमी ने कहा, कोई सत्तर साल हो चुके विवाहित हुए। तो उस मजिस्ट्रेट ने कहा कि अब सत्तर साल के बाद, मरने की घड़ी करीब आ रही है, अब तुम्हें तलाक की सूझी? उसने कहा, उगखिर काफी काफी है। इनफ इज इनफ। किसी भी दृष्टिकोण से लें उस आदमी ने कहा, काफी काफी है। सत्तर साल अब बहुत हो गया, अब छुटकारा चाहिए। और फिर अब ज्यादा समय भी नहीं बचा है, उस आदमी ने कहा, मौत करीब आ रही है, अब न छूटे तो फिर कब छूटेंगे?

मैं तुमसे कहता हूं? दुख को तलाक दो, काफी काफी है।

https://oshosatsang.wordpress.com/2013/12/09/%E0%A4%8F%E0%A4%B8-%E0%A4%A7%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E2%80%8D%E0%A4%AE%E0%A5%8B-%E0%A4%B8%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A4%E0%A4%A8%E0%A5%8B-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%97-5-%E0%A4%93%E0%A4%B6%E0%A5%8B-%E0%A4%AA-5/

यह जान कर तुम हैरान होओगे कि चमार मूलत: बौद्ध हैं!…ओशो (रैदाशवाणी.मन हि पुजा मन हि धूप)

sant ravidasभारत का आकाश संतों के सितारों से भरा है। अनंत—अनंत सितारे हैं, यद्यपि ज्योति सबकी एक है। संत रैदास उन सब सितारों में ध्रुवतारा हैं— इसलिए कि शूद्र के घर में पैदा होकर भी काशी के पंडितों को भी मजबूर कर दिया स्वीकार करने को। महावीर का उल्लेख नहीं किया ब्राह्मणों ने अपने शास्त्रों में। बुद्ध की जड़ें काट डालीं, बुद्ध के विचार को उखाड़ फेंका। लेकिन रैदास में कुछ बात है कि रैदास को नहीं उखाड़ सके और रैदास को स्वीकार भी करना पड़ा।

ब्राह्मणों के द्वारा लिखी गई संतों की स्मृतियों में रैदास सदा स्मरण किए गए। चमार के घर में पैदा होकर भी ब्राह्मणों ने स्वीकार किया— —वह भी काशी के ब्राह्मणों ने! बात कुछ अनेरी है, अनूठी है।महावीर को स्वीकार करने में अड़चन है, बुद्ध को स्वीकार करने में अड़चन है। दोनों राजपुत्र थे जिन्हें स्वीकार करना ज्यादा आसान होता। दोनों श्रेष्ठ वर्ण के थे, दोनों क्षत्रिय थे। लेकिन उन्हें स्वीकार करना मुश्किल पड़ा।

रैदास में कुछ रस है, कुछ सुगंध है— जो मदहोश कर दे। रैदास से बहती है कोई शराब, कि जिसने पी वही डोला। और रैदास अड्डा जमा कर बैठ गए थे काशी में, जहां कि सबसे कम संभावना है जहां का पंडित पाषाण हो चुका है। सदियों का पांडित्य व्यक्तियों के हृदयों को मार डालता है, उनकी आत्मा को जड़ कर देता है। रैदास वहां खिले, फूले। रैदास ने वहां हजारों भक्तों को इकट्ठा कर लिया। और छोटे—मोटे भक्त नहीं, मीरा जैसी अनुभूति को उपलब्ध महिला ने भी रैदास को गुरु माना! मीरा ने कहा है. गुरु मिल्या रैदास जी! कि मुझे गुरु मिल गए रैदास। भटकती फिरती थी, बहुतों में तलाशा था लेकिन रैदास को देखा कि झुक गई। चमार के सामने राजरानी झुके तो बात कुछ रही होगी। यह कमल कुछ अनूठा रहा होगा! बिना झुके न रहा जा सका होगा।

रैदास कबीर के गुरुभाई हैं। रैदास और कबीर दोनों एक ही संत रामानंद के शिष्य हैं! रामानंद गंगोत्री हैं जिनसे कबीर और रैदास की धाराएं बही हैं। रैदास के गुरु हैं रामानंद जैसे अदभुत व्यक्ति; और रैदास की शिष्या है मीरा जैसी अदभुत नारी! इन दोनों के बीच में रैदास की चमक अनूठी है।

रामानंद को लोग भूल ही गए होते अगर रैदास और कबीर न होते। रैदास और कबीर के कारण रामानंद याद किए जाते हैं। जैसे फल से वृक्ष पहचाने जाते हैं वैसे शिष्यों से गुरु पहचाने जाते हैं। रैदास का अगर एक भी वचन न बचता और सिर्फ मीरा का यह कथन बचता, गुरु मिल्या रैदास जी, तो काफी था। क्योंकि जिसको मीरा गुरु कहे, वह कुछ ऐसे—वैसे को गुरु न कह देगी। जब तक परमात्मा बिलकुल साकार न हुआ हो तब तक मीरा किसी को गुरु न कह देगी। कबीर को भी मीरा ने गुरु नहीं कहा है, रैदास को गुरु कहा।  इसलिए रैदास को मैं कहता हूं, वे भारत के संतों से भरे आकाश में ध्रुवतारा हैं। उनके वचनों को समझने की कोशिश करना।

रैदास इसलिए भी स्मरणीय हैं कि रैदास ने वही कहा है जो बुद्ध ने कहा है। लेकिन बुद्ध की भाषा ज्ञानी की भाषा है, रैदास की भाषा भक्त की भाषा है, प्रेम की भाषा है। शायद इसीलिए बुद्ध को तो उखाड़ा जा सका, रैदास को नहीं उखाड़ा जा सका। जिसकी जड़ों को प्रेम से सींचा गया हो उसे उखाड़ना असंभव है। बुद्ध के साथ तर्क किया जा सका, बुद्ध के साथ विवाद किया जा सका, रैदास के साथ तर्क नहीं हो सकता, विवाद नहीं हो सकता। रैदास को तो देखोगे तो या तो दिखाई पड़ेगा तो झुक जाओगे, नहीं दिखाई पड़ेगा तो लौट जाओगे। प्रेम के सामने झुकने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है, क्योंकि प्रेम परमात्मा का प्रकटीकरण है, अवतरण है।

बुद्ध की भाषा बहुत मंजी हुई है राजपुत्र की भाषा है। शब्द नपे—तुले हैं। शायद कभी कोई मनुष्य इतने नपे—तुले शब्दों में नहीं बोला जैसा बुद्ध बोले हैं। लेकिन बुद्ध को भी तर्क का तूफान सहना पड़ा और बुद्ध की भी जड़ें उखड़ गईं। भारत से बुद्ध धर्म विलीन हो गया। रैदास ने फिर बुद्ध की बातें ही कही हैं पुन:, लेकिन भाषा बदल दी, नया रंग डाला। पात्र वही था, बात वही थी, शराब वही थी—नई बोतल दी। और रैदास को नहीं उखाड़ा जा सका।

यह जान कर तुम हैरान होओगे कि चमार मूलत: बौद्ध हैं! जब भारत से बौद्ध धर्म उखाड़ डाला गया और बौद्ध भिक्षुओं को जिंदा जलाया गया और बौद्ध दार्शनिकों को खदेड़ कर देश के बाहर कर दिया गया, तो एक लिहाज से तो यह अच्छा हुआ। क्योंकि इसी कारण पूरा एशिया बौद्ध हुआ। कभी—कभी दुर्भाग्य में भी सौभाग्य छिपा होता है।

जैन नहीं फैल सके क्योंकि जैनों ने समझौते कर लिए। बच गए, लेकिन क्या बचना! आज कुल तीस—पैंतीस लाख की संख्या है। पांच हजार साल के इतिहास में तीस—पैंतीस लाख की संख्या कोई संख्या होती है! बच तो गए, किसी तरह अपने को बचा लिया, मगर बचाने में सब गंवा दिया।

बौद्धों ने समझौता नहीं किया, उखड़ गए। टूट गए, मगर झुके नहीं। और उसका फायदा हुआ। फायदा यह हुआ कि सारा एशिया बौद्ध हो गया। क्योंकि जहां भी बौद्ध—दार्शनिक और मनीषी गए, वहीं उनकी प्रकाश—किरणें फैलीं, वहीं उनका रस बहा, वहीं लोग तृप्त हुए। चीन, कोरिया…… दूर—दूर तक बौद्ध धर्म फैलता चला गया। इसका श्रेय हिंदू पंडितों को है।

जो भाग सकते थे भाग गए। भागने के लिए सुविधा चाहिए, धन चाहिए। जो नहीं भाग सकते थे— इतने दीन थे, इतने दरिद्र थे— वे हिंदू जमात में सम्मिलित हो गए। लेकिन हिंदू जमात में अगर सम्मिलित होओ तो सिर्फ शूद्रों में ही सम्मिलित हो सकते हो। ब्राह्मण तो जन्म से ब्राह्मण होता है, और क्षत्रिय भी जन्म से क्षत्रिय होता है, और वैश्य भी। सिर्फ अगर किसी को हिंदू धर्म में सम्मिलित होना है तो एक ही जगह रह जाती है— शूद्र, अछूत। वह असल में हिंदू धर्म के बाहर ही है, मंदिर के बाहर ही है। हो जाओ शूद्र अगर बचना है तो।

oshoतो जो बौद्ध बच गए और नहीं भाग सके और मजबूरी में सम्मिलित होना पड़ा हिंदू धर्म में, वे ही बौद्ध चमार हैं, वे ही बौद्ध चमार हो गए। और क्यों चमार हो गए? एक कारण। कभी किसी ने सोचा भी न होगा बुद्ध के समय में कि यह कारण इतना बड़ा परिणाम लाएगा। जिंदगी बड़ी रहस्यपूर्ण है।

 

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डॉ० भीमराव अम्बेडकर और मूलनिवासी (/SC/ST/OBC/converted Minorities) चिन्तन की प्रतिबद्धता: परिवर्ती अम्बेडकरवाद नव जागरण युग [आलेख] – डॉ० वीरेन्द्र सिंह यादव

varn vyastahइसमें कोई शक नहीं कि वर्ण-व्यवस्था के माध्यम से परम्परावादियों ने एक प्रकार की निर्णायक संस्कृति और मनोवैज्ञानिक जीत हासिल कर ली है। शायद इसकी प्रतिक्रिया के कारण ही मूलनिवासी चेतना पूर्णत: उभार पर है। मूलनिवासी आन्दोलन/ संस्कृति साहित्य के प्रणेता डॉ. अम्बेडकर ने ठीक ही लिखा है- “हिन्दू धर्म मेरी बुद्धि में जँचता नहीं, स्वाभिमान को भाता नहीं। जो धर्म तुम्हें शिक्षा प्राप्त नहीं करने देता, उस धर्म में तुम क्यों रहते हो? जिस धर्म में मनुष्यता नहीं, वह धर्म उद्दण्डता की सजावट है।” डॉ. अम्बेडकर ने महसूस किया इस छुआछूत के विनाश के लिए अनिवार्य है कि जाति का विनाश हो। साथ ही वर्ण व्यवस्था जिस पर जातियाँ आधारित हैं, का विनाश हो। चूँकि जाति हिन्दू धर्म का प्राण है, अत: जब तक हिन्दू धर्म इसके वर्तमान रूप में प्रचलित है तब तक जाति प्रथा रहना स्वाभाविक है। हमारे यहाँ जाति सामाजिक, राजनैतिक एवं आर्थिक जीवन का मूल स्त्रोत है अर्थात् जाति सामाजिक संस्कारों एवं रिश्तों की सीमा तय करती है।1

शूद्र  संवेदनाओं को अपने जीवनकाल में निरन्तर भोगते रहने के कारण डॉ. अम्बेडकर का अनुभव प्रगाढ़ था। इसलिए आपने अपने सम्बोधन में बड़ी दृढ़ता से कहा था कि “हिन्दू धर्म में मूलनिवासीों की उन्नति सम्भव नहीं है। मैं हिन्दू धर्म में मरूँगा नहीं। हिन्दू धर्म विषमतावादी है। हिन्दू धर्म अछूतों का धर्म नहीं। उच्चता कर्म से नहीं जन्म से है। हिन्दू समाज व्यवस्था मुर्दे के समान है। हिन्दू देवताओं के दर्शन से कोई लाभ नहीं है।” सामाजिक एकता का सिध्दान्त उनको बौद्ध धर्म के अन्दर ही मिल गया। यही कारण था कि उन्होंने अपने कई अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था। उनका यह कदम हमेशा विवादास्पद ही रहा है। किन्तु यदि हम उनके धर्म परिवर्तन के पीछे की वास्तविक भावना को समझें तो हमें प्रतीत होता है कि इस धर्म परिवर्तन के पीछे उनका यह विश्वास था जो उन्हें सामाजिक एकता के आदर्श की ओर ले गया। इसका एक दूसरा पक्ष भी है। संभवत: उनको बौद्ध धर्म की महत्ता का अहसास न होता यदि वे पश्चिम के उदारवादी दृष्टिकोण के सम्पर्क में न आते। उन्होंने कई विदेशी समाजों का गहन अध्ययन किया था और इन समाजों की जो विशेषता उनको विशेष रूप से प्रिय थी, वह थी सामाजिक एकता। उनको यह अहसास हुआ कि भारतीय धर्म-दर्शनों में बुद्ध-दर्शन ही एक ऐसा दर्शन है जो सामाजिक एकता का आदर्श प्राप्त कर सकता है। जहाँ टैगोर ने आध्यात्मिक मानवतावाद का सिद्धान्त प्रचारित किया, नेहरू ने समाजवादी दृष्टिकोण को समझने-समझाने का प्रयास किया, वहीं डॉ. अम्बेडकर ने जातीय सन्दर्भ में पश्चिमी उदारवादी दृष्टिकोण की महत्ता को समझाने का प्रयत्न किया। उनकी इस भूमिका को उचित स्थान दिया जाना चाहिए।2

हमारे तथाकथित हिन्दू समाज की सनातनी व्यवस्था में भारतीय दीन-मूलनिवासी समाज अज्ञानांधकार में तड़फड़ाने के साथ चातुर्वर्ण्य व्यवस्था में पिसने के साथ दरिद्रता की आग में जल रहा था। इसके पीछे कारण यह था कि हमारे सिद्धान्त सदियों से ईश्वरकृत, अपौरुषेय एवं प्रश्नों से परे माने जाते रहे, क्योंकि इन सिद्धान्तों की जड़ें हमारे जेहन में इतनी गहरी कर दी गयी थीं, साथ ही इनकी व्याख्या ऐसी की गई थी जिनका कोई अकाट्य प्रमाण नहीं था। ऐसे मृतवत, अस्पृश्य मूलनिवासी समाज में भगवान बुद्ध के पश्चात कई शताब्दियों तक कोई एक अकेला ऐसा सामाजिक चिंतक भारत में नहीं अवतरित हुआ जिसने इन तथाकथित सिद्धान्तों का खण्डन किया हो। हजारों वर्षों से शोषित, पीड़ित, मूलनिवासी, अछूतपन, शासक-पोषक, सवर्ण वर्गों के जघन्य एवं अमानवीय शोषण, दमन, अन्याय के विरुद्ध छोटे-मोटे संघर्ष को संगठित रूप देने का कार्य सर्वप्रथम अद्भुत प्रतिभा, सराहनीय निष्ठा, न्यायशीलता, स्पष्टवादिता के धनी बाबा साहब युगपुरुष डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने किया। आप ज्ञान के भण्डार और मूलनिवासीों एवं शोषितों के मसीहा बनकर भारतीय समाज में अवतरित हुए। आपने मूलनिवासीों एवं शोषितों को समाज में सर ऊँचा कर बराबरी के साथ चलना सिखाया। आप ऐसे समाज की केवल कल्पना ही कर सकते हैं, जब हमारे पुरखों में से कुछ को इन्सान जैसी शक्ल-सूरत होने के बावजूद, उन्हें सवर्ण समाज इन्सान नहीं समझता था। ऐसे समाज के प्रति बाबा साहब ने स्वअस्तित्व की सामर्थ्य, अस्मिता एवं क्रांन्ति की आग जलाई जिससे सामाजिक न्याय प्राप्ति के लिए अनेक मूलनिवासी-शोषित कार्यकर्ता आत्मबलिदान के लिए उनके साथ खड़े हो गये।3
परम्परावादी व्यवस्था (वैदिक संस्कृति) के कारण हजारों वर्षों से कुचले गये समाज के लोग आज ”दलित/मूलनिवासी/SC/ST/OBC/converted Minorities/BAHUJAN” संज्ञा से जाने जाते हैं और उनके विरोध का प्रमुख कारण वर्ण-धर्म है। कर्म श्रेष्ठ न होने पर भी जाति के नाम से श्रेष्ठ कहलाने वाला व्यक्ति या समाज अपने आप में एक धोखा है। विश्व की सभ्यता और संस्कृति में ऐसा कहीं भी देखने को नहीं मिलेगा कि व्यक्ति को एक बार स्पर्श होने से छूने वाला व्यक्ति अपवित्र हो जाए। भारत में अस्पृश्यता के इस जादुई सिद्धान्त का कोई तार्किक जवाब किसी समाजशास्त्री के पास अभी तक उपलब्ध नहीं है। यह अनूठा और बेमिसाल सिद्धान्त पूर्णतया षडयन्त्र और बेईमानी के अलावा कुछ नहीं दिखता है। जीवन की इन दग्ध एवं करुण स्थितियों से उबरने के लिये मूलनिवासी साहित्य के माध्यम से मूलनिवासी अपनी अस्मिता को पहचानने का प्रयास कर रहा है- मूलनिवासी कौन है, उसकी स्थिति क्या थी? उसकी इस स्थिति के लिये कौन उत्तरदायी है, उनकी संस्कृति क्या थी? उसके पूर्वज कौन थे? यह चिन्तन ही मूलनिवासी साहित्य के प्रमुख विषय हैं। मूलनिवासी समुदाय के बहुजन (करोड़ों) लोग आर्य हिन्दुओं से सामाजिक न्याय की आशा लगाये हुए हैं, परन्तु धर्मान्धता और असमानता के पक्षधर ये लोग समानता के चिन्तन को ताक में रख देते हैं। आज देश में करोड़ों निर्धन, अनपढ़, बेरोजगार मूलनिवासी व्यक्ति अपनी अस्मिता की तलाश में भटक रहे हैं। गिरिराज किशोर के शब्दों में कहें तो भारतीय समाज, खासतौर से जातीय हिन्दू समाज, जिसके कारण देश में दालित्य पनपा और आज भी अपने विकृत रूप में मौजूद है, विचित्र और परस्पर विरोधी मानसिकताओं का पुंज बनकर रह गया है। यह सब हजारों वर्षों से चले आ रहे मानसिक और मनोवैज्ञानिक अवरोधों का प्रतिफल है। ये मानसिक ग्रन्थियाँ ही विभिन्न स्तरों पर अपने को सही साबित करती हुई दालित्य को बढ़ाती ही नहीं गईं अपितु उसे अस्पृश्यता और दमन का शिकार भी बनाती गईं। इसी का फल था कि मूलनिवासीों को भी यह समझाया गया कि दालित्य कर्मफल है।4
संसार में ऐसा कोई देश नहीं होगा जो मानव-मानव में इतना भेद रखता हो। परन्तु भारत का SC/ST, वह शोषित मानव है जो पैदा हुआ तब भी SC/ST, है, जिन्दा रहेगा तब भी SC/ST, है और मरेगा तब भी SC/ST, है। अर्थात् आज भी SC/ST समाज स्मृतियुग की परम्परा में जी रहा है। कुछ मामलों में आज भी अछूत अन्य सवर्ण समाज के समक्ष बैठ नहीं सकता। उसके बच्चों के साथ बराबरी में बैठकर पढ़ नहीं सकता। चाय पीने के लिये अछूतों के लिये अलग कप, गिलास की व्यवस्था है। अछूतों के नाई द्वारा बाल नहीं बनाए जाते हैं। सामूहिक उत्सव में ढ़ोल नहीं बजाने दिया जाता। पंचायत में बराबरी से नहीं बैठने दिया जाता। जातिवादी मोहल्लों में अछूतों को मकान किराये पर नहीं दिये जाते। अछूतों को बारात ले जाते समय बैण्ड-बाजों पर रोक लगा दी जाती है। घोड़ी पर नहीं बैठने दिया जाता। अछूतों के लिये शमषान भूमि पृथक से है। अछूतों को मद्रास में कुछ स्थानों पर दिन में खरीद-फरोख्त की इजाजत नहीं है। ये समस्त उदाहरण सम्पूर्ण भारत के राज्यों में व्याप्त मूलनिवासी वेदनाओं एवं सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। परन्तु सामाजिक परिवर्तन के इस दौर में स्थितियाँ मूलनिवासीों के पक्ष में भी जा रही हैं। राजनीति ने वर्तमान दौर में मूलनिवासीों को असीमित अधिकार दिए हैं और मूलनिवासीों को इससे काफी राहत भी मिली है परन्तु कभी-कभी सनातनी व्यवस्था के शिकार कुछ मूलनिवासी आज भी हो जाते हैं।
वर्तमान समय में मूलनिवासीों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती उनकी जातीय अस्मिता एवं आर्थिक स्थिति को लेकर है। क्योंकि जगतगुरू से लेकर छोटे धार्मिक मठाधीशों तक किसी को भी इस बात की चिन्ता नहीं है कि मूलनिवासीों को निरन्तर शोषण एवं उत्पीड़न से कैसे बचाया जा सकता है। समाज में उन्हें सम्मानजनक स्थिति में कैसे लाया जा सकता है। कुछ परम्परावादी मूलनिवासी चिंतक साहित्यकार, समानता और भ्रातृत्व पर आधारित बौद्ध एवं अम्बेडकरवादी सिद्धान्त की ओर आकर्षित हो रहे हैं, जो भारतीय संविधान की आत्मा भी है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता है कि जैसे-जैसे अंग्रेजी शासन काल में अछूतों और शूद्रों के लिए शिक्षा के द्वारा खुलते गये, ये लोग शिक्षित होते गये। जहाँ एक ओर विज्ञान की चहुमुँखी तरक्की ने दुनिया को अपनी मुठ्ठी में समेट लिया है, वहीं शूद्रों द्वारा हिन्दू धर्म ग्रन्थों को अधिकाधिक रूप में पढ़ा जाने लगा है। स्वतंत्र भारत में संवैधानिक संरक्षण और प्रदत्त सुविधाओं, अपने अधिकारों को समझने और उन्हें पाने के कारण से परम्परावादियों के अनेक बन्धन शिथिल होते गये। वर्तमान में भी जो सनातनी (वैदिक) साहित्य उपलब्ध है, उसमें अभिजात्य एवं सवर्णवादी प्रवृत्तियों के लक्षण सर्वाधिक व्याप्त हैं। उसमें शासक और शोषित दोनों ही भावनाएं सर्वत्र नजर आती हैं।
परिवर्ती अम्बेडकरवाद या मूलनिवासी नव जागरण युग: अम्बेडकरवाद की द्वितीय मुक्ति शृंखला का आरम्भ सन् 1975 के बाद प्रारम्भ होता है। 1975 के बाद मूलनिवासी चेतना की जो धारा विकसित हुई, वह इसलिये विशिष्ट है कि उसने हिन्दी जगत में अपनी पृथक और विशिष्ट पहचान बनायी। यह प्रयास अभिनव एवं महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभी तक ऐसा प्रयास किसी युग में नहीं किया गया था। एक पृथक धारा के रूप में हिन्दी मूलनिवासी साहित्य इसी युग में अस्तित्व में आया। यही नहीं बल्कि उसे परिभाषित भी इसी काल में किया गया। यह धारा समग्र रूप में अम्बेडकर-दर्शन से विकसत हुई और यह दर्शन ही उसका मूलाधार बना। इसमें कोई दो राय नहीं कि अम्बेडकर-दर्शन में मूलनिवासी-मुक्ति की अवधारणा की अभिव्यंजना ही वर्तमान हिन्दी मूलनिवासी साहित्य की प्रतिबद्धता है। इसने नये सौन्दर्यशास्त्र की स्थापना की जो स्वतंत्रता, समता और बन्धुत्व के सिद्धान्तों पर आधारित है। इस धारा ने अपने सौन्दर्यशास्त्र से हिन्दी मुख्यधारा के साहित्य का मूल्यांकन कर उसे काफी हद तक मूलनिवासीों के लिये अप्रासंगिक साबित किया है। इसने प्रेमचन्द्र, निराला एवं अन्य रचनाकारों तक का पूर्नमूल्यांकन किया और उनकी कई रचनात्मक स्थापनाओं पर प्रश्नचिह्व भी लगाये। वर्तमान हिन्दी मूलनिवासी साहित्य इस अर्थ में भी विशिष्ट है कि साहित्य की सभी विधाओं में उसका विकास हो रहा है। यद्यपि फूले और अम्बेडकर ने संस्थागत प्रयत्नों के माध्यम से मूलनिवासीों के पक्ष-पोषण की बात की लेकिन सन्-70 के दशक के बाद कई संस्थायें सामने आती हैं, जिन्होंने अपने प्रयासों से मूलनिवासीों के उत्थान पर कार्य किया। इस सन्दर्भ में मूलनिवासी साहित्य प्रकाशन संस्था, अम्बेडकर मिशन, मूलनिवासी आर्गनाइजेशन, राष्ट्रीय मूलनिवासी संघ, मूलनिवासी राइटर्स फोरम, मूलनिवासी साहित्य मंच, लोक कल्याण संस्थान आदि के माध्यम से मूलनिवासीों की स्थिति सुधारने के सन्दर्भ में अनेक कार्य किये गये! इन मूलनिवासी संस्थाओं ने जिन दो महत्वपूर्ण पक्षों की ओर ध्यान आकृष्ट कराया उनमें एक है मूलनिवासीों की सामाजिक स्थिति में सुधार और दूसरा मूलनिवासीों के लिए आरक्षण की माँग। इस सन्दर्भ में भारतीय संविधान में संशोधन का भी प्रावधान किया गया और संस्थाओं में समाचार पत्रों, लेखों और गोष्ठियों का भी सहारा लिया जिसके माध्यम से मूलनिवासीों को जागरूक और एकत्रित करने का कार्य किया गया। यह ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इन संस्थाओं ने मूलनिवासी चिंतन को राजनैतिक स्वरूप भी प्रदान किया और समाज में एक विशेष वर्ग का नये सिरे से ध्रुवीकरण किया। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि वर्तमान-सामाजिक एवं राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में मूलनिवासी विमर्श चिंतन का एक प्रमुख हिस्सा बन चुका है।5 मौजूदा मूलनिवासी साहित्यकारों ने मूलनिवासी लेखन को स्थपित करने के लिये कड़ा संघर्ष किया। यह उनके संघर्षों का ही परिणाम है कि हिन्दी जगत और मीडिया ने एक शताब्दी की लम्बी उपेक्षा के बाद मूलनिवासी साहित्य को स्वीकार किया और उसे अपने पत्रों एवं पत्रिकाओं में थोड़ा-थोड़ा स्थान दिया। लेकिन यह भी तब सम्भव हुआ, जब सामाजिक परिवर्तन की राजनीति ने नयी मूलनिवासी चेतना विकसित की और उसका प्रभाव सम्पूर्ण संविधान पर पड़ा। इसलिए यह हिन्दी जगत की राजनैतिक विवशता भी है। इस मत से कुछ विद्वत मूलनिवासी चिंतकों की असहमति हो सकती है, परन्तु सत्ता के बनते-बिगड़ते समीकरण भी मूलनिवासी साहित्य को प्रभावित करते हैं, इस बात से मुँह नहीं मोड़ा जा सकता है। कुछ हद तक यह युग मूलनिवासी पत्रकारिता के लिये भी जाना जायेगा, क्योंकि मूलनिवासी साहित्य के साथ-साथ मूलनिवासी पत्रकारिता का भी सशक्त विकास इस युग में हुआ है। मूलनिवासी पत्रकारों में डॉ. सोहनपाल सुमनाक्षर, मोहन दास नैमिशराय, डॉ. श्यौराज सिंह ‘बेचैन’, के.पी. सिंह, प्रेम कपाड़िया, मणिमाला, ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहर सिंह, बी.आर. बुद्धिप्रिय, सुरेश कानडे, डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव इत्यादि पत्रकारों ने मूलनिवासी पत्रकारिता को प्रखर मूलनिवासी प्रश्नों से जोड़कर विचारोत्तेजक और क्रांन्तिकारी बनाया है। इसलिये मूलनिवासी चेतना के इस वर्तमान युग को मूलनिवासी ‘नवजागरण’ युग का नाम भी दिया जा सकता है।

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1.युगपुरुष डॉ0 अम्बेडकर स्मारिका-2006, सामाजिक न्याय व्यवस्था के सजग प्रहरी: डॉ0 भीमराव अम्बेडकर-डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, पृ0-19.
2.सामाजिक क्रांन्ति के अग्रदूत : डॉ. भीमराव अम्बेडकर – डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, जन-सम्मान, नवम्बर-2005, पृ0-19.
3.युगपुरुष डॉ0 अम्बेडकर स्मारिका, 2006, सामाजिक न्याय और व्यवस्था के सजग प्रहरी : डॉ. भीमराव अम्बेडकर- डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, पृ0-18.
4.मूलनिवासी विमर्श : सन्दर्भ गाँधी, गिरिराज किशोर, पृ0-28, 29.
5.मूलनिवासी विमर्श : चिन्तन एवं परम्परा, नवम्बर-2005, सम्पादन – डॉ. वीरेन्द्र सिंह यादव, पृ0-66.

रचनाकार परिचय:-Dr virendra yadav

युवा साहित्यकार के रूप में ख्याति प्राप्त डा. वीरेन्द्र सिंह यादव ने मूलनिवासी विमर्श के क्षेत्र में ‘मूलनिवासी विकासवाद’ की अवधारणा को स्थापित कर उनके सामाजिक,आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया है। आपके दो सौ पचास से अधिक लेखों का प्रकाशन राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर की पत्रिकाओं में हो चुका है। मूलनिवासी विमर्श, स्त्री विमर्श, राष्ट्रभाषा हिन्दी में अनेक पुस्तकों की रचना कर चुके डा. वीरेन्द्र ने विश्व की ज्वलंत समस्या पर्यावरण को शोधपरक ढंग से प्रस्तुत किया है। राष्ट्रभाषा महासंघ मुम्बई, राजमहल चौक कवर्धा द्वारा स्व0 श्री हरि ठाकुर स्मृति पुरस्कार, बाबा साहब डा0 भीमराव अम्बेडकर फेलोशिप सम्मान 2006, साहित्य वारिधि मानदोपाधि एवं निराला सम्मान 2008 सहित अनेक सम्मानो से उन्हें अलंकृत किया जा चुका है। वर्तमान में आप भारतीय उच्च शिक्षा अध्ययन संस्थान राष्ट्रपति निवास, शिमला (हि0प्र0) में नई आर्थिक नीति एवं मूलनिवासीों के समक्ष चुनौतियाँ (2008-11) विषय पर तीन वर्ष के लिए एसोसियेट हैं।

 

नोट: मूल लेख में से ‘दलित’ शब्द को ‘मूलनिवासी’ शब्द से रिप्लेस किया है, क्योंकि दलित शब्द के कलंक को न ढोना हमारी पालिसी है|यदि आपको ऐतराज है तो jileraj@gmail.com  पर मेल कर हमें सूचित करें, पालिसी तो नहीं बदल सकती पर लेख हटा दिया जायेगा