गुजरात में गऊ-आतंकियों द्वारा दलितों की पिटाई मामले में था टेलीग्राफ में एक लेख छपा है,जिसमे इन आतंकियों की आपराधिक कुंडली छपी है…. दिलीप सी मंडल की fb पोस्ट से साभार

The Telegraph के संपादक आर. राजगोपाल टाइम्स सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज में मेरे बैचमेट रहे हैं. उन्होंने आज एक शानदार काम किया है. गुजरात के गोरक्षक गुडों की जन्मकुंडली खोल दी है. अवैध शराब के कारोबारी, छेड़खानी के आरोपी, जबरन वसूली करने वाले, अपराधी….सब जेल गए. 307 लगा है. लंबे समय के लिए गए हैं.

हे गोमाता,
तू इन पुत्रों को
अपनी विरासत से
कर दे बेदखल.
छीन ले उनसे
बेटा कहलाने का हक!
ये कपूत तो तेरा
अंतिम संस्कार तक
करने को
तैयार नहीं हैं.
जेसीबी से
उठाई जा रही हैं
तेरी लाशें.

telegraph gujrat dalit kand

बहुत हुई सामाजिक टेंशन वाली पोस्ट, आईये एक मनोरंजक कहानी पढ़ते हैं :-दो बाँके…..भगवतीचरण वर्मा

bhagwati vermaदो बाँके ….. भगवतीचरण वर्मा

शायद ही कोई ऐसा अभागा हो जिसने लखनऊ का नाम न सुना हो; और युक्‍तप्रांत में ही नहीं, बल्कि सारे हिंदुस्‍तान में, और मैं तो यहाँ तक कहने को तैयार हूँ कि सारी दुनिया में लखनऊ की शोहरत है। लखनऊ के सफेदा आम, लखनऊ के खरबूजे, लखनऊ की रेवड़ियाँ – ये सब ऐसी चीजें हैं जिन्‍हें लखनऊ से लौटते समय लोग सौगात की तौर पर साथ ले जाया करते हैं, लेकिन कुछ ऐसी भी चीजें हैं जो साथ नहीं ले जाई जा सकतीं, और उनमें लखनऊ की जिंदादिली और लखनऊ की नफासत विशेष रूप से आती हैं।
ये तो वे चीजें हैं, जिन्‍हें देशी और परदेशी सभी जान सकते हैं, पर कुछ ऐसी भी चीजें हैं जिन्‍हें कुछ लखनऊवाले तक नहीं जानते, और अगर परदेसियों को इनका पता लग जाए, तो समझिए कि उन परदेसियों के भाग खुल गए। इन्‍हीं विशेष चीजों में आते हैं लखनऊ के ‘बाँके’।
‘बाँके’ शब्‍द हिंदी का है या उर्दू का, यह विवादग्रस्‍त विषय हो सकता है, और हिंदीवालों का कहना है – इन हिंदीवालों में मैं भी हूँ – कि यह शब्‍द संस्‍कृत के ‘बंकिम’ शब्‍द से निकला है; पर यह मानना पड़ेगा कि जहाँ ‘बंकिम’ शब्‍द में कुछ गंभीरता है, कभी-कभी कुछ तीखापन झलकने लगता है, वहाँ ‘बाँके’ शब्‍द में एक अजीब बाँकापन है। अगर जवान बाँका-तिरछा न हुआ, तो आप निश्‍चय समझ लें कि उसकी जवानी की कोई सार्थकता नहीं। अगर चितवन बाँकी नहीं, तो आँख का फोड़ लेना अच्‍छा है; बाँकी अदा और बाँकी झाँकी के बिना जिंदगी सूनी हो जाए। मेरे ख्‍याल से अगर दुनिया से बाँका शब्‍द उठ जाए, तो कुछ दिलचले लोग खुदकुशी करने पर आमादा हो जाएँगे। और इसीलिए मैं तो यहाँ तक कहूँगा कि लखनऊ बाँका शहर है, और इस बाँके शहर में कुछ बाँके रहते हैं, जिनमें गजब का बाँकपन है। यहाँ पर आप लोग शायद झल्‍ला कर यह पूछेंगे – “म्‍याँ, यह ‘बाँके’ है क्‍या बला? कहते क्‍यों नहीं?” और मैं उत्तर दूँगा कि आप में सब्र नहीं; अगर उन बाँकों की एक बाँकी भूमिका नहीं हुई, तो फिर कहानी किस तरह बाँकी हो सकती है!
हाँ, तो लखनऊ में रईस हैं, तवायफें हैं और इन दोनों के साथ शोहदे भी हैं। बकौल लखनऊवालों के, ये शोहदे ऐसे-वैसे नहीं हैं। ये लखनऊ की नाक हैं। लखनऊ की सारी बहादुरी के ये ठीकेदार हैं और ये जान ले लेने तथा दे देने पर आमादा रहते हैं। अगर लखनऊ से ये शोहदे हटा दिए जाएँ, तो लोगों का यह कहना, ‘अजी, लखनऊ तो जनानों का शहर है।’ सोलह आने सच्‍चा उतर जाए।
जनाब, इन्‍हीं शोहदों के सरगनों को लखनऊवाले ‘बाँके’ कहते हैं। शाम के वक्‍त तहमत पहने हुए और कसरती बदन पर जालीदार बनियान पहनकर उसके ऊपर बूटेदार चिकन का कुरता डाटे हुए जब ये निकलते हैं, तब लोग-बाग बड़ी हसरत की निगाहों से उन्‍हें देखते हैं। उस वक्‍त इनके पट्टेदार बालों में करीब आध पाव चमेली का तेल पड़ा रहता है, कान में इत्र की अनगिनती फुरहरियाँ खुँसी रहती हैं और एक बेले का गजरा गले में तथा एक हाथ की कलाई पर रहता है। फिर ये अकेले भी नहीं निकलते, इनके साथ शागिर्द-शोहदों का जुलूस रहता है, एक-से-एक बोलियाँ बोलते हुए, फबतियाँ कसते हुए और शोखियाँ हाँकते हुए। उन्‍हें देखने के लिए एक हजूम उमड़ पड़ता है।
तो उस दिन मुझे अमीनाबाद से नख्‍खास जाना था। पास में पैसे कम थे; इसलिए जब एक नवाब साहब ने आवाज दी, ‘नख्‍खास’ तो मैं उचक कर उनके इक्‍के पर बैठ गया। यहाँ यह बतला देना बेजा न होगा कि लखनऊ के इक्‍केवालों में तीन-चौथाई शाही खानदान के हैं, और यही उनकी बदकिस्‍मती है कि उनका वसीका बंद या कम कर दिया गया, और उन्‍हें इक्‍का हाँकना पड़ रहा है।
इक्‍का नख्‍खास की तरफ चला और मैंने मियाँ इक्‍केवाले से कहा – “कहिए नवाब साहब! खाने-पीने भर को तो पैदा कर लेते हैं?”
इस सवाल का पूछा जाना था कि नवाब साहब के उद्गारों के बाँध का टूट पड़ना था। बड़े करुण स्‍वर में बोले – “क्‍या बतलाऊँ हुजूर, अपनी क्‍या हालत है, कह नहीं सकता! खुदा जो कुछ दिखलाएगा, देखूँगा! एक दिन थे जब हम लोगों के बुजुर्ग हुकूमत करते थे। ऐशोआराम की जिंदगी बसर करते थे; लेकिन आज हमें – उन्‍हीं की औलाद को – भूखों मरने की नौबत आ गई। और हुजूर, अब पेशे में कुछ रह नहीं गया। पहले तो ताँगे चले, जी को समझाया-बुझाया, म्‍याँ, अपनी-अपनी किस्‍मत! मैं भी ताँगा ले लूँगा, यह तो वक्‍त की बात है, मुझे भी फायदा होगा; लेकिन क्‍या बतलाऊँ हुजूर, हालत दिनोंदिन बिगड़ती ही गई। अब देखिए, मोटरों-पर-मोटरें चल रही हैं। भला बतलाइए हुजूर, जो सुख इक्‍के की सवारी में है, वह भला ताँगे या मोटर में मिलने का? ताँगे में पालथी मार कर आराम से बैठ नहीं सकते। जाते उत्तर की तरफ हैं, मुँह दक्खिन की तरफ रहता है। अजी साहब, हिंदुओं में मुरदा उलटे सिर ले जाया जाता है, लेकिन ताँगे में लोग जिंदा ही उलटे सिर चलते हैं और जरा गौर फरमाइए! ये मोटरें शैतान की तरह चलती हैं, वह बला की धूल उड़ाती हैं कि इंसान अंधा हो जाए। मैं तो कहता हूँ कि बिना जानवर के आप चलनेवाली सवारी से दूर ही रहना चाहिए, उसमें शैतान का फेर है।”
इक्‍केवाले नवाब और न जाने क्‍या-क्‍या कहते, अगर वे ‘या अली!’ के नारे से चौंक न उठते।
सामने क्‍या देखते हैं कि एक आलम उमड़ रहा है। इक्‍का रकाबगंज के पुल के पास पहुँचकर रुक गया।
एक अजीब समाँ था। रकाबगंज के पुल के दोनों तरफ करीब पंद्रह हजार की भीड़ थी; लेकिन पुल पर एक आदमी नहीं। पुल के एक किनारे करीब पचीस शोहदे लाठी लिए हुए खड़े थे, और दूसरे किनारे भी उतने ही। एक खास बात और थी कि पुल के एक सिरे पर सड़क के बीचोंबीच एक चारपाई रक्‍खी थी, और दूसरे सिरे पर भी सड़क के बीचोंबीच दूसरी। बीच-बीच में रुक-रुककर दोनों ओर से ‘या अली!’ के नारे लगते थे।
मैंने इक्‍केवाले से पूछा – “क्‍यों म्‍याँ, क्‍या मामला है?”
म्‍याँ इक्‍केवाले ने एक तमाशाई से पूछकर बतलाया – “हुजूर, आज दो बाँकों में लड़ाई होनेवाली है, उसी लड़ाई को देखने के लिए यह भीड़ इकट्ठी है।”
मैंने फिर पूछा – “यह क्‍यों?”
म्‍याँ इक्‍केवाले ने जवाब दिया – “हुजूर, पुल के इस पार के शोहदों का सरगना एक बाँका है और उस पार के शोहदों का सरगना दूसरा बाँका। कल इस पार के एक शोहदे से पुल के उस पार के दूसरे शोहदे का कुछ झगड़ा हो गया और उस झगड़े में कुछ मार-पीट हो गई। इस फिसाद पर दोनों बाँकों में कुछ कहा-सुनी हुई और उस कहा-सुनी में ही मैदान बद दिया गया।”
“अरे हुजूर! इन बाँकों की लड़ाई कोई ऐसी-वैसी थोड़ी ही होगी; इसमें खून बहेगा और लड़ाई तब तक खत्म न होगी, जब त‍क एक बाँका खत्‍म न हो जाए। आज तो एक-आध लाश गिरेगी। ये चारपाइयाँ उन बाँकों की लाश उठाने आई हैं। दोनों बाँके अपने बीवी-बच्‍चों से रुखसत लेकर और कर्बला के लिए तैयार होकर आवेंगे।”
इसी समय दोनों ओर से ‘या अली!’ की एक बहुत बुलंद आवाज उठी। मैंने देखा कि पुल के दोनों तरफ हाथ में लाठी लिए हुए दोनों बाँके आ गए। तमाशाइयों में एक सकता सा छा गया; सब लोग चुप हो गए।
पुल के इस पारवाले बाँके ने कड़ककर दूसरे पारवाले बाँके से कहा – “उस्‍ताद !” और दूसरे पारवाले बाँके ने कड़ककर उत्तर दिया – “उस्‍ताद!”
पुल के इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, आज खून हो जाएगा, खून!”
पुल के उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, आज लाशें गिर जाएँगी, लाशें!
पुल के इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, आज कहर हो जाएगा, कहर!”
पुल के उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, आज कयामत बरपा हो जाएगी, कयामत!”
चारों ओर एक गहरा सन्‍नाटा फैला था। लोगों के दिल धड़क रहे थे, भीड़ बढ़ती ही जा रही थी।
पुल के इस पारवाले बाँके ने लाठी का एक हाथ घुमाकर एक कदम बढ़ते हुए कहा – “तो फिर उस्‍ताद होशियार!”
पुल के इस पारवाले बाँके के शागिर्दों ने गगन-भेदी स्‍वर में नारा लगाया – “या अली!”
पुल के उस पारवाले बाँके ने लाठी का एक हाथ घुमाकर एक कदम बढ़ाते हुए कहा, “तो फिर उस्‍ताद सँभलना!”
पुल के उस पारवाले बाँके के शागिर्दों ने गगन-भेदी स्‍वर में नारा लगाया – “या अली!”
दोनों तरफ के दोनों बाँके, कदम-ब-कदम लाठी के हाथ दिखलाते हुए तथा एक-दूसरे को ललकारते आगे बढ़ रहे थे, दोनों तरफ के बाँकों के शागिर्द हर कदम पर ‘या अली!’ के नारे लगा रहे थे, और दोनों तरफ के तमाशाइयों के हृदय उत्‍सुकता, कौतूहल तथा इन बाँकों की वीरता के प्रदर्शन के कारण धड़क रहे थे।
पुल के बीचोंबीच, एक-दूसरे से दो कदम की दूरी पर दोनों बाँके रुके। दोनों ने एक-दूसरे को थोड़ी देर गौर से देखा। फिर दोनों बाँकों की लाठियाँ उठीं, और दाहिने हाथ से बाएँ हाथ में चली गईं।
इस पारवाले बाँके ने कहा – “फिर उस्‍ताद!”
उस पारवाले बाँके ने कहा – “फिर उस्‍ताद!”
इस पारवाले बाँके ने अपना हाथ बढ़ाया, और उस पारवाले बाँके ने अपना हाथ बढ़ाया। और दोनों के पंजे गुँथ गए।
दोनों बाँकों के शागिर्दों ने नारा लगाया – “या अली !”
फिर क्‍या था! दोनों बाँके जोर लगा रहे हैं; पंजा टस-से-मस नहीं हो रहा है। दस मिनट तक तमाशबीन सकते की हालत में खड़े रहे।
इतने में इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, गजब के कस हैं!”
उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, बला का जोर है !”
इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, अभी तक मैंने समझा था कि मेरे मुकाबिले का लखनऊ में कोई दूसरा नहीं है।”
उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, आज कहीं जाकर मुझे अपनी जोड़ का जवाँ मर्द मिला!”
इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, तबीयत नहीं होती कि तुम्‍हारे जैसे बहादुर आदमी का खून करूँ!”
उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, तबीयत नहीं होती कि तुम्‍हारे जैसे शेरदिल आदमी की लाश गिराऊँ!”
थोड़ी देर के लिए दोनों मौन हो गए; पंजा गुँथा हुआ, टस-से-मस नहीं हो रहा है।
इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, झगड़ा किस बात का है?”
उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, यही सवाल मेरे सामने है!”
इस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, पुल के इस तरफ के हिस्‍से का मालिक मैं!”
उस पारवाले बाँके ने कहा – “उस्‍ताद, पुल के इस तरफ के हिस्‍से का मालिक मैं!”
और दोनों ने एक साथ कहा – “पुल की दूसरी तरफ से न हमें कोई मतलब है और न हमारे शागिर्दों को!”
दोनों के हाथ ढीले पड़े, दोनों ने एक-दूसरे को सलाम किया और फिर दोनों घूम पड़े। छाती फुलाए हुए दोनों बाँके अपने शागिर्दों से आ मिले। बिजली की तरह यह खबर फैल गई कि दोनों बराबर की जोड़ छूटे और उनमें सुलह हो गई।
इक्‍केवाले को पैसे देकर मैं वहाँ से पैदल ही लौट पड़ा क्‍योंकि देर हो जाने के कारण नख्‍खास जाना बेकार था।
इस पारवाला बाँका अपने शागिर्दों से घिरा चल रहा था। शागिर्द कह रहे थे – “उस्‍ताद, इस वक्‍त बड़ी समझदारी से काम लिया, वरना आज लाशें गिर जातीं।” – “उस्‍ताद हम सब-के-सब अपनी-अपनी जान दे देते!” – “लेकिन उस्‍ताद, गजब के कस हैं।”
इतने में किसी ने बाँके से कहा – “मुला स्‍वाँग खूब भरयो!”
बाँके ने देखा कि एक लंबा और तगड़ा देहाती, जिसके हाथ में एक भारी-सा लट्ठ है, सामने खड़ा मुस्‍कुरा रहा है।
उस वक्‍त बाँके खून का घूँट पीकर रह गए। उन्‍होंने सोचा – भला उस्‍ताद की मौजूदगी में उन्‍हें हाथ उठाने का कोई हक भी है?

सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद…..Ravish Kumar NDTV

सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद

मीडिया के ज़रिये आपके साथ एक खेल खेला जा रहा है। किसी व्यक्ति की राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए बहुत सारे लोग राष्ट्रवाद की गौ रक्षा में लगा दिये गए हैं।गुजरात के दलितों ने गौ रक्षा का उपाय कर दिया तो अब गौ रक्षकों ने राष्ट्रवाद को गाय बता कर उत्पात मचाना शुरू कर दिया है।  आम आवाम को यह बात देर से समझ आएगी लेकिन तब तक वह सियासी खेमों की बेड़ियों में इस कदर जकड़ दिया जाएगा कि निकलना मुश्किल हो जाएगा। शिकंजों के ज़ोर से उसके पाँव लहूलुहान होंगे मगर वो आज़ाद नहीं हो पाएगा।

इस दौर में सांप्रदायिकता अलग अलग ब्रांड रुप में आ रही है। लव जिहाद,आबादी का ख़ौफ़,गौ माँस,धार्मिक झंडे को पाकिस्तानी बताना, पलायन, गौ रक्षा। ये सब उस ब्रांड के अलग अलग वर्जन हैं। जैसे टूथपेस्ट के अलग अलग ब्रांड हो सकते हैं। पातंजलि, कोलगेट, मिस्वाक, पेप्सोडेंट।टूथपेस्ट है सांप्रदायिकता। इसे बनाने वाला कोई कारपोरेशन भी होगा। उस कारपोरेशन का नाम है राष्ट्रवाद। यह अलग अलग नाम से उसी एक टूथपेस्ट को बेच रहा है। गौ रक्षा तो कभी राष्ट्रवाद।

अब इसे बेचने के लिए उसे किराना स्टोर भी चाहिए और सुपर मॉल भी। जिसका नाम है मीडिया। जब वह टूथपेस्ट का ब्रांड अलग अलग लाँच कर सकता है तो मीडिया का भी लाँच कर सकता है। वहाँ भी आका एक ही है मगर उनके चैनल कई हैं। अब हो यह रहा है कि माडिया की दुकान में सांप्रदायिकता बेचने के लिए राष्ट्रवाद का कवर चढ़ाया जा रहा है। इतने सारे टूथपेस्ट हैं, कोई कौन सा वाला ख़रीदेगा,इसका भी इलाज है। एक ही बात कहने वाले भाँति भाँति के एंकर या भाँति भाँति के एंकरों को एक ही बात कहने का प्रशिक्षण।

आप कभी तो सोचिये कि मीडिया राष्ट्रवाद को लेकर इतना उग्र क्यों हो रहा है? क्यों हर बार सेना और सीमा के नाम पर ये राष्ट्रवाद उभारा जाता है? क्यों जब ये ठंडा पड़ता है तो गौ रक्षा आ जाता है? गौ रक्षा पिट जाता है तो राष्ट्रवाद आ जाता है? इस लड़ाई को आप भले ही चंद एंकरों के बीच का मामला समझें लेकिन ऐसा है नहीं। कोई है जो यह खेल खेल रहा है। कोई है जिसकी राजनीतिक महत्वकांक्षा के लिए यह खेल खेला जा रहा है उसका चेहरा आप कभी नहीं देख पाएँगे क्योंकि महाकारपोरेशन किसके इशारे पर चलता है, उसका चेहरा कोई नहीं देख पाता है। सिर्फ लोग गिने जाते हैं और लाशें दफ़नाई जाती हैं। पूरी दुनिया में ऐसा ही चलन है।

राष्ट्रवाद जिनमें भरपूर है यानी जिनके ट्यूब में पेस्ट भरा है उन्होंने क्या कर लिया? इसका एक सबसे बड़ा अभियान लाँच हुआ था जो आज भी लाँच अवस्था में ही है। स्वच्छ भारत अभियान। दो साल पूर्व बहुत से नेता,कार्यकर्ता, अभिनेता झाड़ू लेकर खूब ट्वीट करते थे। ट्वीटर पर नौ रत्न नियुक्त करते थे कि ये भी सफाई करेंगे तभी देश साफ होगा। कहा गया कि अकेले सरकार से कुछ नहीं होगा। सबको आगे आना होगा। आज वो लोग कहाँ है? ट्वीटर के नौ रत्न कहाँ हैं? स्वच्छता अभियान कहाँ है? वो राष्ट्रवादी भावना कहाँ है जिसे लेकर ये लोग चरणामृत छिड़क रहे थे कि अब हम साफ सुथरा होने वाले हैं। जो लोग आए थे उनका राष्ट्रवाद क्यों ठंडा पड़ गया? दो साल में तो वो अपनी पूरी कालोनी साफ कर देते। क्या उन्होंने उन एंकरों को देखना छोड़ दिया जिन्हें राष्ट्रवाद का टोल टैक्स वसूलने का काम दिया गया है?

स्वच्छ भारत अभियान के तहत नई दिल्ली के बाल्मीकि मंदिर के पास अनोखा शौचालय बना। क्या दिल्ली में वैसा शौचालय और भी कहीं रखा गया? ऐसा है तो दो साल में दिल्ली में कम से कम सौ पचास ऐसे शौचालय तो रखे ही गए होंगे? क्या आपको दिखते हैं? क्या आपको दिल्ली के मोहल्लों में या अपने किसी शहर में ऐसे शोचालय, कूड़ेदान दिखते हैं जो इस अभियान के तहत रखे गए हों? उनकी साफ सफाई होती है? एक या दो कूड़ेदान रख खानापूर्ति की बात नहीं कर रहा। अगर कहीं ये सफल भी होगा तो इन्हीं सब व्यवस्थाओं के दुरुस्त होने की वजह से न कि ट्वीटर पर छाये गाली गुंडों के राष्ट्रवाद से।

इस कहानी का मतलब यह हुआ कि आपकी समस्या की वजह राष्ट्रवाद में कमी नहीं है। स्वच्छता अभियान इसलिए फ़ेल हुआ क्योंकि दिल्ली को साफ करने के लिए कई हजार सफाई कर्मचारी की ज़रूरत थी। क्या भर्ती हुई? जो मौजूदा कर्मचारी हैं उन्हीं का वेतन न मिलने की ख़बरें आती रहती हैं। उन्होंने अपनी सैलरी के लिए दिल्ली की सड़कों पर कचरा तक फेंक दिया। अब आप इस तरह के सवाल न पूछ बैठें इसलिए आपका इंतज़ाम किया गया है। लगातार ऐसे मुद्दे पेश किये जा रहे हैं जिनका संबंध कभी सीधे सांप्रदायिकता से हो या राष्ट्रवाद से। ये इसलिए हो रहा है कि आप हमेशा काल्पनिक दुनिया में रहने लगे, वैसे रहते भी हैं। कोई है जो आपको ख़ूब समझ रहा है। यही कि आप सर नीचा किये स्मार्ट फोन पर बिजी हैं। इन्हीं स्मार्ट फोन पर एक गेम आ गया है। पोकेमौन। खेलते खेलते इसी बहाने अपने मोहल्ले में स्वच्छता खोज आइयेगा। आपकी ट्रेनिंग ऐसी कर दी गई है कि आप लोगों को ही कोसने लगेंगे। सरकार को नहीं। यह हुआ ही इसलिए है कि कोई आपको अलग-अलग नामी -बेनामी संस्थाओं की मदद से राष्ट्रवाद के ट्रेड मिल पर दौड़ाए रखे हुए है।

हमारा सैनिक क्यों अठारह हज़ार मासिक पाता है? क्या सांसद विधायक का वेतन एक सैनिक से ज़्यादा होना चाहिए? सैनिकों पर तो कम से कम सीमा पर खड़े खड़े देश लूटने का इल्ज़ाम नहीं है। वे तो जान दे देते हैं। विधायकों सांसदों में से कितने जेल गए और कितने और जा सकते हैं मगर इनसे सरकारें बनतीं हैं और चलती हैं। इनके अपार फंड की गंगोत्री किधर है? राष्ट्रवाद की चिन्ता करनी है तो यह बोलो कि सीमा से छुट्टी पर लौटने वाला जवान जनरल बोगी या सेकेंड क्लास में लदा कर क्यों जाता है? उसके लिए एसी ट्रेन क्यों नहीं बुक होती? उसका बच्चा ऐसे स्कूल में क्यों पढ़ता जिसका मास्टर जनगणना करने गया है। उसकी सैलरी पचास हज़ार क्यों नहीं है?

आप जो टीवी पर एंकरों के मार्फ़त उस अज्ञात व्यक्ति की महत्वकांक्षा के लिए रचे जा रहे तमाशे को पत्रकारिता समझ रहे हैं वो दरअसल कुछ और हैं। आपको रोज़ खींच खींच कर राष्ट्रवाद के नाम पर अपने पाले में रखा जा रहा है ताकि आप इसके नाम पर सवाल ही न करें। दाल की कीमत पर बात न करें या महँगी फीस की चर्चा न करें। इसीलिए मीडिया में राष्ट्रवाद के खेमे बनाए जा रहे हैं।एंकर सरकार से कह रहा है कि वो पत्रकारों पर देशद्रोह का मुक़दमा चलाये। जिस दिन  पत्रकार सरकार की तरफ हो गया, समझ लीजियेगा वो सरकार जनता के ख़िलाफ़ हो गई है। पत्रकार जब पत्रकारों पर निशाना साधने लगे तो वो किसी भी सरकार के लिए स्वर्णिम पल होता है। बुनियादी सवाल उठने बंद हो जाते हैं।जब भविष्य निधि फंड के मामले में चैनलों ने ग़रीब महिला मज़दूरों का साथ नहीं दिया तो वो बंगलुरू की सड़कों पर हज़ारों की संख्या में निकल आईं। कपड़ा मज़दूरों ने सरकार को दुरुस्त कर दिया। इसलिए लोग देख समझ रहे हैं। जे एन यू के मामले में यही लोग राष्ट्रवाद की आड़ लेकर लोगों का ध्यान भटका रहे थे। फ़ेल हो गए। अब कश्मीर के बहाने इसे फिर से लांच किया गया है!

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा है कि बुरहान वानी को छोड़ दिया जाता अगर सेना को पता होता कि वह बुरहान है। बीजेपी की सहयोगी महबूबा ने बुरहान को आतंकवादी भी नहीं कहा और अगर वो है तो उसके देखते ही मार देने की बात क्यों नहीं करती हैं जैसे राष्ट्रवादी करते हैं। महबूबा मुफ्ती ने तो सेना से एक बड़ी कामयाबी का श्रेय भी ले लिया कि उसने अनजाने में मार दिया। अब तो सेना की शान में भी गुस्ताख़ी हो गई। क्या महबूबा मुफ्ती को गिरफ़्तार कर देशद्रोह का मुक़दमा चलाया जाए? क्या एंकर लोग ये भी मांग करेंगे ? किस हक से पत्रकारों के ख़िलाफ़ देशद्रोह का मुक़दमा चलाने की बात कर रहे हैं? जिस सरकार के दम पर वो कूद रहे हैं क्या वो सरकार ऐसा करेगी कि महबूबा को बर्खास्त कर दे? क्या उस सरकार का कोई बड़ा नेता महबूबा से यह बयान वापस करवा लेगा?

इसलिए राजनीति को राजनीति की तरह देखिये। इसमें अगर राष्ट्रवाद का इस्तमाल होगा तो एक दिन राष्ट्रवाद की हालत भी ये नेता देश सेवा जैसी कर देंगे।जब भी वे देश सेवा का नाम ज़ुबान पर लाते हैं,लगता है कि झूठ बोल रहे हैं। बल्कि उनके मुँह से राष्ट्रवाद खोखला ही लगता है। हम सब राष्ट्रवादी हैं। इसे पता करने के लिए रोज़ रात को नौ बजे टीवी देखने की नौबत आ जाए तो आपको राष्ट्रवाद नहीं दाद खाज खुजली है। नीम हकीम जिसकी दवा ज़ालिम लोशन बताते हैं।

मैं आपको मुफ़्त में एक सलाह देता हूँ।चैनलों को देखने के लिए केबल पर हर महीने तीन से पाँच सौ रुपया खर्च हो ही जाता होगा।जब पाँच सौ रुपया देकर राष्ट्रवाद की आड़ में हिन्दू- मुस्लिम के बीच नफ़रत की गोली ही लेनी है तो आप केबल कटवा दीजिये। जब आपने नफरत ठान ही ली है तो कीजिये नफ़रत। इसके लिए केबल के पाँच सौ और रद्दी अख़बारों के पांच सौ क्यों दे रहे हैं? अपना एक हज़ार तो बचा लीजिये!

तो आप से गुज़ारिश है कि राजनीति और राष्ट्रवाद में फर्क कीजिये। यह वो राष्ट्रवाद नहीं है जो आप समझ रहे हैं। यह राष्ट्रवाद के नाम पर सांप्रदायिकता है जो आप देखना ही नहीं चाहते। सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद। ज़रूरत है राष्ट्रवाद को सांप्रदायिकता से बचाने की और टीवी कम देखने की।

 

 

http://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-blog-on-communalism-1437639

सांप्रदायिकता का नया नाम है राष्ट्रवाद

mediamaygal

मुंबई.  19 जुलाई, 2016.बाबा साहेब का बुद्ध भूषण प्रेस और आंबेडकर भवन को रात के अंधेरे में गिराए जाने के खिलाफ लोगों का गुस्सा सड़कों पर,शहर का हाल के दिनों का सबसे बड़ा जनसैलाब. 

 

MUMBAI buddh press agitation1 MUMBAI buddh press agitation2 MUMBAI buddh press agitation3

 

https://samaybuddha.wordpress.com/2016/06/26/demolition-dr-babasaheb-ambedkar-bhavan-dadar-mumbai/

for more read:

http://navbharattimes.indiatimes.com/metro/mumbai/politics/yechury-condemns-demolition-of-ambedkar-bhavan/articleshow/53243083.cms

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/baudh-mahasabha-s-statement-at-babasaheb-printing-press-break-/

 

गुजरात गाय कांड:- सदियों से चमड़ा व्यापार के धार्मिक आदेश को जबरन ढोने वाले दलितों की कट्टरपंथी गो रक्षकों ने बेरहम और सार्वजानिक पिटाई की| इसके बाद पूरे गुजरात में दलितों के उग्र प्रदर्शन जारी है, देश भर से तीखी प्रतिक्रियां आ रही हैं| गाए को माता मानने वालों से उसका अंतिम संस्कार खुद करने की अपील हो रही है| दलित समुदाय में भारी गुस्सा है, कलेक्टर दफ्तर पर पहुंचाईं मरी गाय, गुजरात बंद बुलाया गया जिसके दौरान कुछ जगहों पर हिंसा की घटनाएँ हुई हैं, मामला राज्ये सभा में उठा| विपक्षी नेता और दलों से तीखी प्रतिक्रिया आ रही हैं, कुछ गिरफ्तारियां और मौतें भी हुई हैं

 

गुरु कबीर साहेब यह लिख गए हैं.

निर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय |
मरे जीव के चाम से, लोह भस्म हो जाय ||

गुजरात में मरी गाय का खाल उतारने वाले चार दलित युवकों की पिटाई के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। सुरेंद्र नगर में दलित समाज के लोगों ने मरी हुई गाय को ट्रकों में भरकर कलेक्ट्रेट पर पहुंचा दिया। आंदोलन और विरोध का ये तरीका पूरे गुजरात में शुरू हो चुका है। लोग मरी हुई गाय को सरकारी अधिकारियों के दफ्तर पर पहुंचा रहे हैं। आपको बता दें कि उना में चार दलितों को बदमाशों ने पूरे शहर में घूमाकर बेरहमी से पीटा था। जिसके बाद छह बदमाशों को गिरफ्तार किया गया है। तीन अधिकारी भी सस्पेंड किए गए हैं। लेकिन पूरे सूबे में दलित समुदाय के लोग गुस्से में हैं और उबल रहे हैं। मरी हुई गाय को कलेक्टर दफ्तर पर पहुंचाने का तरीका पूरे गुजरात में फैलता जा रहा है। वहीं सोशल साइट्स पर ये तरीका वायरल हो रहा है। लोग इसे दलितों समाज के विरोध प्रदर्शन का गुजरात मॉडल कहकर फैला रहे हैं।

 

 

 

आजादी के बाद 70 साल होने को आए. आज भी अगर करोड़ों दलित जीने के लिए चमड़ा उतारने को मजबूर है| सबसे ज्यादा कांग्रेस ने ही शाशन किया है  इसलिए जब कांग्रेसी नेता गुजरात पर आंसू बहाएंगे, तो लाजिम है कि हम विश्वास योग्ये कैसे हो पाएंगे,फिलहाल सत्ता से बेदखल हैं, इसलिये जनता के क्रोध से बचे हुए हैं.

 

राजकोट। गुजरात के ऊना शहर में दलित लड़कों की पिटाई मामला हिंसक हो गया है, सरे देश में भरी प्रदर्शन और आक्रोश है। सोमवार १८ जुलाई 2016 को पिटाई के विरोध में निकाली गई रैली के दौरान पांच लड़कों ने सुसाइड की कोशिश की और लोगों ने कई बसों को आग लगा दी। इसके बाद से ही राजकोट सहित पूरे सौराष्ट्र में तनाव का माहौल है।

दलित नेताओं ने राजयसभा में मामला उठाया, मायावती ने दलित लड़कों की पिटाई का मामला राज्यसभा में उठाया।
क्या है पूरा मामला :
– गुजरात के ऊना तहसील के समढीयाणा गांव में पिछले हफ्ते गौ रक्षक हिन्दू चरमपंथीयो ने चार दलित लड़कों को बेरहमी से पीटा था। ये लड़के चमड़ा उद्योग के लिए मरे हुए जानवरों की खाल निकालने का काम करते हैं|धर्म शास्त्रों के आदेश से इनकी कौम सदियों से ये काम कर रही है
– पिटाई करने वालों का उनपर गो-हत्या /बीफ का आरोप था
– इसके बाद दलित समुदाय आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए सड़कों पर उतर आया।
– सोमवार देर शाम दलित समुदाय के लोगों ने गोंडल हाईवे पर जाम लगा दिया और 3 एसटी बसों को आग के हवाले कर दिया।
– सभी को 108 एम्बुलेंस से अस्पताल भेज कर भर्ती करवाया गया। फिलहाल, सभी की हालत में सुधार है।
– आक्रोश के chalte 5 युवकों द्वारा ऊना में कीटनाशक पीकर आत्महत्या की कोशिश के बाद दलित समुदाय के लोग सड़कों पर उतर आए।
– सोमवार शाम को हजारों की संख्या में मौजूद भीड़ ने नगरपालिका और डिप्टी कलेक्टर के ऑफिस को घेर लिया
– भीड़ को हिंसक होते देख नगरपालिका के सारे कर्मचारी मौके से भाग निकले।
– इसके बाद उपद्रवियों ने मरे हुए जानवरों के शव पालिका के ऑफिस में घुसकर टेबल पर रख दिए,और वहां मरी हुए गाए डालकर प्रदर्शन किया
– हालांकि, भारी पुलिस फोर्स के मौजूद होने के चलते भीड़ डिप्टी कलेक्टर के ऑफिस में दाखिल नहीं हो पाई।
– दलित लड़कों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।
इतना भीषण जनाक्रोश चल रहा है पर मीडिया चुप, पहले के अन्ये दलित मामलों की तरह इसे भी ईमानदारी से मीडिया कवरेज नहीं मिल रही है

पर ये घटनाक्रम सोशल मीडिया पर सारे देश को पता चल गया है

कई नमी गिरामी बड़े राजनीतिक दल और उनके नेता गुजरात उन पहुँचने लगे हैं

gyjrat gaye dalit kand

 

भारत के बुद्धिजीवियों ने कड़ी प्रीतिक्रिये दी है, वरिस्ट पत्रकार  दिलीप सी मंडल लिखते हैं 

गुजरात गाय कांड अपडेट

– पूरे प्रदेश में तूफान. कई जगहों पर लोगों ने ट्रैफिक रोका. बसों में तोड़फोड़, सड़कों पर टायर जलाए गए
– सुरेंद्रनगर कलेक्टर ऑफिस में तीन ट्रक भरकर गायों के शव पहुंचाने के बाद, कई और कार्यालयों में गायों के अवशेष पहुंचाए गए
– बहन मायावती ने मामला राज्य सभा में उठाया, राज्यसभा की कार्यवाही रोकी गई
– देश के तमाम राष्ट्रीय चैनलों ने साधी चुप्पी
– गुजराती चैनलों ने जनता से शांति बनाए रखने की अपील की
– गुजरात में इंटरनेट पर लग सकती है रोक
– राज्य सरकार ने सीआईडी जांच के आदेश दिए
– गिरफ्तार गो – तालीबान की संख्या नौ हुई
– सस्पेंड होने वाले पुलिस अफसर तीन
– मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल पर इस्तीफे के लिए दबाव, फैसला संघ करेगा
– गो – तालीबान पर मुकदमा के लिए स्पेशल प्रॉसिक्यूटर नियुक्त

Sources:

‘भागवत  जी गाय का अंतिम संस्कार कीजिए’

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/07/160719_gujarat_dalit_protest_gain_momentum_on_social_dil

 

गुजरात: ‘गोरक्षा’ के नाम पर पिटाई, दलित संगठनों का प्रदेश बंद का एलान

Violent Protests In Gujarat Over Dalit Men Being Beaten By ‘Cow Protectors’

 

 

गुजरात में दलितों की पिटाई के मुद्दे पर संसद में भारी हंगामा, कार्यवाही बाधित

LIVE: Hungama in parliament on Dalit attack in Gujarat

 

गुजरात: दलितों के उग्र प्रदर्शन, आत्महत्या की कोशिश

 http://www.bbc.com/hindi/india/2016/07/160718_gujarat_dalit_vk

गुजरात के दलितों का मुद्दा राज्यसभा में गूँजा

 http://www.bbc.com/hindi/india/2016/07/160720_gujrat_dalit_protest_ra

 

गुजरातः दलित पिटाई का एक और वीडियो, पीटने वालों के हाथ में पुलिस की लाठी

http://khabar.ibnlive.com/news/desh/gujarat-dalit-violence-499952.html

 

गुजरात : उना में दलितों की पिटाई के खिलाफ प्रदर्शन में हेड कांस्टेबल की मौत, बसों में तोड़फोड़

http://khabar.ndtv.com/news/india/violent-protests-in-gujarat-over-dalit-men-being-beaten-by-cow-protectors-1433520

 

दलितों की पिटाई मामले में 16 गिरफ़्तार

http://www.bbc.com/hindi/india/2016/07/160719_gujrat_dalit_protest_sr

 

गुजरात दलित पिटाई पर मायावती की संसद में हुंकार का असर। दलित सड़कों पर उतरे

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/impact-of-mayawati-in-gujrat-dalit-atrocity-case/

India tension after ‘cow protectors’ assault Dalits in Gujarat

 http://www.bbc.com/news/world-asia-india-36832687

गुजरात: दलित अत्याचार के विरोध में जहर पीने वाले हेमंत भाई की मौत

http://www.nationaldastak.com/news-view/view/dalit-protester-dead-in-gujrat-due-to-poision-consume/

Digital Library Of India पर बुद्ध और बौद्ध धम्म से सम्बंधित पुस्तकें ये पुस्तकें गौतम बुद्ध तथा बौद्ध धम्म (धर्मं) से सम्बंधित है . ये बहुत ही महत्वपूर्ण और इनमे से कई दुर्लभ हैं . ये पुस्तकें Digital Library of India पर संग्रहित हैं. ये सभी पुस्तकें स्कैन की हुई डिजिटल रूप में सुरक्षित की हुई हैं….http://buddhambedkar.blogspot.jp/

Digital Library Of India पर बुद्ध और बौद्ध धम्म से सम्बंधित पुस्तकें

ये पुस्तकें गौतम बुद्ध तथा बौद्ध धम्म (धर्मं) से सम्बंधित है . ये बहुत ही महत्वपूर्ण और इनमे से कई दुर्लभ हैं . ये पुस्तकें Digital Library of India पर संग्रहित हैं. ये सभी पुस्तकें स्कैन की हुई डिजिटल रूप में सुरक्षित की हुई हैं.
   Digital Library of India  एक एसा प्रोजेक्ट है जिसमें कई राष्ट्रीय स्तर के संस्थानों द्वारा सम्मलित रूप से कई दुर्लभ एवं महत्वपूर्ण पुस्तकों को स्कैन कर डिजिटल रूप में सुरक्षित रखा गया है.   इनमें से ही एक है : http://www.new.dli.ernet.in/. ये सभी सेण्टर आपस में जुड़े हुए हैं तथा किसी भी एक सेंटर से संपूर्ण  Digital Library of India पर संग्रहित पुस्तकों को ढूंढा जा सकता है .
डिजिटल लाइब्ररी ऑफ़ इंडिया के  http://www.new.dli.ernet.in/  सेंटर पर जुलाई  2010  को buddha कीवर्ड के साथ ढूंढ़ी गई पुस्तकें निम्नलिखित हैं ,यहाँ से इन्हें डाऊनलोड (TIFF images) किया जा सकता है .
 
Buddha – vachan., 99999990233624. Bikshu, Aanand kaushalyayan. 1954. hindi. Vachan sangrah. 99 pgs.
Buddha – vani., 99999990233626. Viyogi hari. 1935. hindi. NULL. 163 pgs.
Buddha Aur Naachghar., 5990010124474. Bachchan. . hindi. Literature. 186 pgs.
Buddha charitawali., 1990010087251. Ram Chandra Lal. 1953. hindi. Buddha-Biography. 129 pgs.
Buddha charrya., 99999990243331. Aacharya, Tripitak. 1931. hindi. Jivani – Bhagvan Buddha. 654 pgs.
Buddha chitrawali., 1990010087252. Vidya. 1956. hindi. Buddha-Biography. 63 pgs.
Buddha dharm ke upadesh., 1990010087253. Dharmarakshit. . hindi. Buddha religion. 149 pgs.
Buddha-charit., 5990010044621. . 1979. hindi. Literature. 298 pgs.
Buddham Sharanam., 5990010114124. Chandra Dev Singh. 1956. hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 130 pgs.
Gautam buddha., 5990010044879. Aanand prasad kapoor. 0. hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 140 pgs.
Mahamanav Buddha., 5990010116281. Rahul Sankratyayan. . hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 185 pgs.
Mahatma Buddha., 5990010115444. Sukhsampati Roy Bhandari. 1920. hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 155 pgs.
papancasudani majjhimanikayatthakatha of buddhaghosacariya., 5990010124569. J.H. WOODS AND D. KOSAMBI. 1922. hindi. LITRATURE. 334 pgs.
Sankshipta Buddha jeevani., 1990010087671. Amritanand Sthavir. 2013. hindi. Buddha biography. 151 pgs.
Siddharth Buddha., 5990010043250. Banaarasidaas ‘Karunaakar’. 1955. hindi. LITERATURE. 156 pgs.
Sri Buddha Geeta., 5990010116350. Swami satyadev ji paribrajak. . hindi. LANGUAGE. LINGUISTICS. LITERATURE. 126 pgs.

 

http://buddhambedkar.blogspot.jp/2010/07/buddhism-books-on-digital-library-of.html

डा तुलसीराम ने दलित राजनीती का पोस्टमार्टम किया है | दलित राजनीती,दलित आन्दोलन पर जिन्हें जरा भी दिलचस्पी हो उनकी जानकारी के लिए |..- प्रो. तुलसी राम, जे.एन.यू

ambedkar hamare haiडा तुलसीराम ने दलित राजनीती का पोस्टमार्टम किया है | दलित राजनीती,दलित आन्दोलन पर जिन्हें जरा भी दिलचस्पी हो उनकी जानकारी के लिए |
– प्रो. तुलसी राम, जे.एन.यू
(जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में प्रोफेसर रहे तुलसीराम का इसी साल फरवरी में निधन हो गया. जीवन के अंतिम छह-सात साल उन्होंने असाध्य पीड़ा में गुजारे. हर हफ्ते उनका दो बार डायलिसिस होता था. पीड़ा के इस दौर में ही उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘मुर्दहिया’ और ‘मणिकर्णिका’ लिखी. जीवन के आखिरी दिनों में स्वतंत्र मिश्र ने उनसे आंबेडकर की राजनीति और दर्शन के आईने में दलित राजनीति पर बातचीत की)
देश में दलितों की स्थिति में क्या कोई सुधार आया है?
दलितों से छुआछूत का मामला हो या मंदिर में प्रवेश को लेकर टकराहट या उनसे व्यभिचार की घटनाएं- लगभग हर रोज देश के किसी न किसी कोने से देखने-सुनने को मिल जाती हैं. मंदिर में प्रवेश के मसले पर दलितों की हत्या तक कर दी जाती है. थोड़ी पुरानी बात है. उत्तर प्रदेश में समाजवादी सरकार के आने के बाद बरेली के पास ही एक गांव में मंदिर में दलितों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगाया गया था. अखबार और टेलीविजन चैनलों ने इस घटना को छापा-दिखाया. पुजारी मंदिर में ताला लगाकर गांव छोड़कर भाग गया लेकिन पुलिस प्रशासन और सरकारी तंत्र में इसे लेकर कोई सुगबुगाहट नहीं दिखी.
देश में इस तरह की घटनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए बहुत सख्त कानून मौजूद हैं. ‘दलित एक्ट’ के तहत सजा के कठोर प्रावधान किए गए हैं. दलित उत्पीड़न के संदर्भ में उन्हें उचित ढंग से लागू किया जाए तो उसके भय से ही बहुत हद तक ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण पाया जा सकेगा. दलित, सवर्णों के रास्ते से गुजर कर न जाएं इसलिए महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में कई जगहों पर बहुत ऊंची-ऊंची दीवारें खड़ी कर दी गईं. अफ्रीका में ‘रंगभेद’ की बातें जब थीं तब वहां काले लोगों के लिए चलने के लिए सड़कों पर अलग लेन होती थीं. उनके लिए दुकानें अलग होती थीं. वे गोरों की दुकानों से अपनी जरूरत का समान नहीं खरीद सकते थे. वे रेलगाडि़यों के सामान्य डिब्बों में यात्रा नहीं कर सकते थे. उनके लिए ट्रेनों में अलग डिब्बे होते थे. पर भारत में यह सब तो आज भी घट रहा है. ‘रंगभेद’ व्यवस्था के खिलाफ पूरी दुनिया एक हो गई थी. भारत भी ‘रंगभेद’ के खिलाफ उठ खड़ा हुआ था. उस जमाने में अफ्रीका के लिए ‘वीजा’ नहीं मिलता था. मुझे याद है कि उन दिनों मुझे भारत सरकार ने 1980 के आसपास किसी साल में पासपोर्ट जारी किया तो उसपर साफ-साफ लिखा था कि आप दो देशों (अफ्रीका और इजरायल) की यात्रा नहीं कर सकते थे. लेकिन यह सोचकर भी शर्म आती है कि आज 21वीं सदी के भारत में भी ऐसी घटनाएं घट रही हैं! ‘रंगभेद’ के खिलाफ जो माहौल पूरी दुनिया में बना वैसा भारत में ‘जाति-व्यवस्था’ के खिलाफ कभी बन नहीं पाया. ‘रंगभेद’ की जो विशेषताएं थीं, वे सब इस जाति व्यवस्था में पाई जाती हैं. यहां जाति-व्यवस्था के बने रहने की मूल वजह ‘हिन्दू धर्म’ है. धार्मिक व्यवस्था में बदलाव लाए बगैर आप सिर्फ कानून के सहारे सामाजिक या धार्मिक स्तर पर दलित उत्पीड़न खत्म नहीं कर सकते. चाहे इस देश में लेनिन ही क्यों न पैदा हो लें.
मतलब आप यह कहना चाह रहे हैं कि जाति-व्यवस्था या दलित उत्पीड़न को खत्म करने के प्रयास अपने देश में ईमानदारी से नहीं हुए?
मैं आपको थोड़ा पीछे स्वतंत्रता संग्राम में ले जाना चाहूंगा. 1929-30 के आसपास गांधी जी की बाबा साहब अांबेडकर की पहली मुलाकात हुई थी तब उन्होंने आंबेडकर से कहा कि मैंने देश की आजादी का आंदोलन छेड़ रखा है. अांबेडकर ने बहुत दिलचस्प जवाब दिया, ‘मैं सारे देश की आजादी की लड़ाई के साथ उन एक चौथाई जनता के लिए भी लड़ना चाहता हूं जिस पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है. आजादी की लड़ाई में सारा देश एक है और मैं जो लड़ाई लड़ रहा हूं, वह सारे देश के खिलाफ है. मेरी लड़ाई बहुत कठिन है.’ औपनिवेशिक सत्ता (अंग्रेजों) के खिलाफ तो सारा देश खड़ा था इसलिए उनका जाना तय था लेकिन देश के लोग अपने ही लोगों के साथ जो भेदभाव बरत रहे हैं तो मेरी लड़ाई तो उनसे भी है. दलितों, पिछड़ों को न तो जमीन रखने का अधिकार था, न ही उन्हें शिक्षा पाने का अधिकार था. वे सदियों से जमींदारों और सामंतों के खेतों और कारखानों में मजदूरी करते चले आ रहे थे. हिंदू धर्म, वर्ण व्यवस्था और जातिगत व्यवस्था की खुलकर वकालत करते हैं. डॉ. अांबेडकर ने सोचा कि यहां जातिगत व्यवस्था का मूल आधार धार्मिक व्यवस्था से ही लड़ना पड़ेगा. संकेत के तौर पर 1927 में डॉ. अांबेडकर ने ‘मनुस्मृति’ को जलाया. यह यहां दोहराने की जरूरत नहीं है कि इस हिंदू धर्म-ग्रंथ में शूद्रों के बारे में क्या-क्या लिखा गया है. मनुस्मृति के जलाए जाने से हिंदू घबरा उठे.
धार्मिक व्यवस्था में बदलाव लाए बगैर आप सिर्फ कानून के सहारे सामाजिक या धार्मिक स्तर पर दलित उत्पीड़न खत्म नहीं कर सकते. चाहे इस देश में लेनिन ही क्यों न पैदा हो लें.
एक उदाहरण और देना चाहूंगा. अपने देश में दलितों को कुएं और तालाब से पानी नहीं लेने दिया जाता था. महाराष्ट्र में इस भेदभाव से लड़ने के लिए बाबा साहब ने ‘महाड़’ आंदोलन चलाया. जलगांव में एक तालाब के किनारे लाखों की संख्या में दलित जुटे और उन्होंने प्रकृति के पानी पर अपना हक जताया था. बाद में कोंकणी ब्राह्मणों ने उस तालाब के शुद्धिकरण के लिए मंत्रोच्चारण और पूजा-पाठ आयोजित करवाया. इसके विरोध में अांबेडकर ने 12 दलितों का चयन किया और कहा कि तुम इस्लाम स्वीकार कर लो. देश में सनसनी फैल गई. तत्काल ब्राह्मणों ने दलितों के लिए गांव के दो कुएं पानी लेने के लिए खोल दिए. ब्राह्मणों ने इस दबाव में कुएं का पानी लेने की आजादी दलितों को दे दी क्योंकि उन्हें लगा कि उनका धर्म खतरे में पड़ जाएगा. अांबेडकर ने पूना-पैक्ट के समय यह बयान दिया कि वे बौद्ध धर्म अपना लेंगे तो तुरंत पैक्ट पर समझौता हो गया. पूना पैक्ट की वजह से दलितों का बहुत लाभ हुआ. उनका सबलीकरण इस पैक्ट की वजह से ही संभव हो पाया. इसी पैक्ट की वजह से दलितों को आरक्षण आधा-अधूरा ही सही मिल पाया. इसी पैक्ट के नतीजे के चलते दलित समुदाय के लोग मंत्री, मुख्यमंत्री और राष्ट्रपति भी बन पाए. इसी पैक्ट की वजह से लाखों की संख्या में दलितों के लिए शिक्षा के दरवाजे खुले. इस बारे में प्रसिद्ध कहानीकार चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ का एक लेख है ‘कछुआ धर्म’. वे पंडित थे. हर रोज पूजा-अर्चना करते थे. टीका लगाते थे. उन्होंने अपने लेख में हिंदू धर्म की बहुत अच्छी व्याख्या की थी. उन्होंने लिखा है, ‘हिंदू धर्म को जब अपने ऊपर खतरा नजर आता है तब वह कछुए की तरह अपनी गर्दन और मुंह अंदर समेट कर मृत के समान निष्क्रिय होने का प्रदर्शन करता है लेकिन जब कोई संकट नहीं दिखता है तब वह गर्दन उठाकर आक्रामक मुद्रा में ऐसे चलता है मानो पूरी दुनिया जीतने निकला हो.’
प्राचीन काल से एक उदाहरण पेश करना चाहूंगा. गौतम बुद्ध ने अपनी शिक्षा और उपदेशों के बल पर जाति-व्यवस्था के खिलाफ मोर्चा लिया और धर्म-परिवर्तन किया. बड़ी संख्या में ब्राह्मण ही बौद्धभिक्षु बने. कई राजाओं ने भिक्षुओं के खिलाफ अभियान चलाया. पुष्यमित्र आदि राजाओं ने छोटे-मोटे अभियान चलाए. सबसे जोरदार अभियान बौद्ध-धर्म के खिलाफ 9वीं शताब्दी में शंकराचार्य के समर्थकों ने चलाए. शंकराचार्य और उसके समर्थकों को हिंदू राजाओं का समर्थन था, उन्हें किसी का डर नहीं था तो वे बौद्ध मठों को तोड़ने और भिक्षुओं पर हमले करने लगे. दरअसल, बुद्ध वर्ण व्यवस्था पर चोट कर रहे थे. वे मानव-मानव के बीच वर्ण के आधार पर भेद करने की बात को झुठला रहे थे. वर्ण व्यवस्था की रक्षा और शंकराचार्य का समर्थन पाकर तीसरी सदी में व्यापक स्तर पर हिंदू धर्म-ग्रंथ रचे गए. उससे पूर्व सिर्फ वेदों की रचनाएं ही हुई थीं, जिनका जिक्र बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है. बौद्ध-ग्रंथों में रामायण और महाभारत की चर्चा नहीं मिलती है. बुद्ध के आसपास ही चार्वाक भी हुए जिन्होंने तीन वेद होने की ही बात की है. मतलब साफ है कि सिर्फ तीन वेद ही बुद्ध-चार्वाक के समय तक रचे गए थे. आप गौर करें तो पाएंगे, शंकराचार्य के बाद जिस भी धर्म ग्रंथ की रचना की गई, उनमें वर्ण व्यवस्था का समर्थन किया गया है.
आप पूना पैक्ट के जरिए दलितों के जीवन में बदलाव आने की बात कर रहे हैं, लेकिन अक्सर यह सुनने को मिलता है किसी भी सरकार ने दलितों के लिए कुछ नहीं किया है. उत्तर प्रदेश के संदर्भ में आपका जबाव चाहूंगा?
हां, सरकारों द्वारा दलितों के विकास के लिए उठाए गए कदम संतोषजनक नहीं कहे जा सकते हैं लेकिन यह कहना कि दलितों के लिए किसी भी सरकार ने कुछ नहीं किया है, एक उग्रवादी किस्म की सोच है. उत्तर प्रदेश हिंदुत्ववादियों का सबसे बड़ा केंद्र रहा है. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बहुत सारी धार्मिक नदियां उत्तर प्रदेश से होकर गुजरती हैं इसलिए इस प्रदेश का सबसे ज्यादा सांप्रदायीकरण हुआ है. गंगा का सबसे बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश में है. कुंभ का आयोजन इलाहाबाद में होता है. ज्योतिर्लिंग बनारस में है. मेरे कहने का मतलब यह है कि उत्तर प्रदेश हिंदुत्व को उर्वर भूमि प्रदान करने का काम करती रही है. यह भी सच है कि उत्तर प्रदेश में कुछ भी घटित होता है तो उसका असर दूसरे राज्यों पर जरूर पड़ता है. इसलिए मेरा मानना है कि अगर उत्तर प्रदेश में जाति-व्यवस्था को कमजोर कर दिया जाए तो उसका असर पूरे देश पर पड़ेगा.
मायावती या कोई दलित हजार बार भी मुख्यमंत्री बन जाए, उससे दलितों के जीवन में परिवर्तन नहीं आनेवाला. परिवर्तन सामाजिक आंदोलन के दबाव के फलस्वरूप ही आ पाएगा
कांशीराम -मायावती का आंदोलन और खासकर मायावती का उत्तर प्रदेश की सत्ता में आसीन होने का असर दलितों की जिंदगी बदलने में कितना हो पाया है?
जाति-व्यवस्था के खिलाफ सामाजिक आंदोलन चलाए गए थे. वह बुद्ध, ज्योतिबा फुले से लेकर आंबेडकर तक चलता चला आ रहा है. आंबेडकर के बाद जो भी दलित आंदोलन हुए उसकी सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि सभी दलित नेतृत्व अपनी-अपनी अलग-अलग डफली पीटते चले गए. खुद आंबेडकर द्वारा खड़ी की गई रिपब्लिकन पार्टी भी बाद के दिनों में चार भागों में बंट गई. उसका एक भाग रामदास अठावले के नेतृत्व में पहले शिवसेना और बाद में भाजपा में शामिल हो चुका है. आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए. एक भाग में योगेंद्र कबाड़े थे, वे अब भाजपा में हैं. रिपब्लिकन पार्टी के एक भाग के नेता आरएस गंवई थे जो कांग्रेस में शामिल हो गए. कुछ दिनों तक वे केरल के राज्यपाल भी रहे. आंबेडकर के बाद उनकी पार्टी विखंडित हुई और उसका अधिकांश हिस्सा दक्षिणपंथी पार्टियों में शामिल होता चला गया. निश्चित तौर पर इससे सामाजिक न्याय की लड़ाई कमजोर हुई. दलित राजनीति में निर्वात-सा बन गया. उसका फायदा निश्चित तौर पर कांशीराम को मिला.
कांशीराम ने शुरू में यह तय किया कि दलितों को सबसे पहले सामाजिक तौर पर चेतना संपन्न किया जाए. 1960-80 तक उन्होंने चुनाव लड़ने की बात नहीं की थी. इस दलित राजनीति का मूलाधार बामसेफ पार्टी रही. कांशीराम ने सामाजिक जागृति के लिए बहुत मेहनत की. वे गली-गली साइकिल पर घूमते थे. उत्तर प्रदेश में इस आंदोलन का असर बहुत पड़ा. उन्होंने दलितों को अपने आंदोलन से बड़ी संख्या में जोड़ा. दलितों को संगठित करने के बाद उन्होंने राजनीति में उतरने की बात की जिसके चलते बामसेफ भी कई भागों में बंट गया. कांशीराम से अलग हुए दूसरे दल सामाजिक जागृति फलाने की बात पर जोर देने की बात कर रहे थे. आंबेडकर ने सामाजिक बदलाव कोई मंत्री पद पर रहते हुए नहीं किया था. सामाजिक आंदोलनों के जरिए जो परिवर्तन समाज में आता है, वह स्थायी भाववाला होता है.
मतलब आप यह कह रहे हैं कि सामाजिक परिवर्तन की बात मायावती तक आते-आते पीछे छूट गई?
सामाजिक परिवर्तन पीछे ही नहीं छूटा बल्कि उलटी दिशा में चल पड़ा. कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की नींव रखी और राजनीति में पूरी तरह उतर गए. सामाजिक आंदोलन से जो दबाव समाज में बनता था, वह दबाव बनना खत्म हो गया और जिसके चलते दलित उत्पीड़न की घटनाओं में लगातार इजाफा हुआ, इसे साफ-साफ महसूस किया जा सकता है. गांधी और आंबेडकर की जब बातचीत हो रही थी तब उन्होंने साफ-साफ कहा था कि सामाजिक आंदोलनों का राजनीतिक आंदोलनों पर वर्चस्व होना चाहिए. राजनीतिक आंदोलन के चलते सत्ता तो मिल जाएगी लेकिन समाज में बदलाव नहीं आ पाएगा इसलिए यदि समाज बदलना है तो सामाजिक आंदोलन बहुत जरूरी हैं.
क्या आप यह कहना चाह रहे हैं कि कांशीराम और मायावती द्वारा सामाजिक आंदोलन को अचानक बंद करके राजनीति शुरू कर देने से समाज में बदलाव की दिशा में निर्वात की स्थिति बन गई?
जी हां, बहुत बड़ा निर्वात बन गया और अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो आज दलितों की स्थिति कई गुणा ज्यादा बेहतर होती. मैं यह कतई नहीं कह रहा हूं कि दलितों को राजनीति में नहीं आना चाहिए. मैं यह कहना चाह रहा हूं कि सामाजिक आंदोलन से मानस में बदलाव आता है और इसका असर दलित ही नहीं बल्कि गैर-दलितों पर भी देखा जा सकता है. कांशीराम के राजनीति में आने के फैसले से दलितों की सामाजिक स्थिति में जो सुधार दर्ज किया जा रहा था, वह उलटी दिशा में चल पड़ा.
क्या इस परिस्थिति से जो सामाजिक दबाव बनने लगा था वह अब नहीं बन पा रहा है. क्या इसकी वजह से भी दलितों के उत्पीड़न के मामलों में बढ़ोतरी हो रही है?
देखिए, कांशीराम-मायावती ने जब तक सामाजिक आंदोलन छेड़े रखा था तब तक हर राजनीतिक पार्टी इस दबाव में काम करती थी कि बिना दलित को साथ लिए चुनाव जीतना मुश्किल होगा. लेकिन मायावती के राजनीति में आते ही ब्राह्मण सत्ता के केंद्र में आ गए. ब्राह्मणों के बारे में यह गुणगान होने लगा कि वे हाशिये पर चले गए हैं. उनकी स्थिति खराब हो गई है. मैं यहां किसी खास व्यक्ति के बारे में बात नहीं कर रहा हूं. ब्राह्मण का मतलब व्यवस्था से मानता हूं. कांशीराम पहले ‘तिलक, तराजू और तलवार…’ का नारा लगाते थे लेकिन राजनीति में आते ही वे ‘हाथी नहीं गणेश हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश है’ के नारे लगाने लगे. ब्रह्मा, विष्णु और महेश के खिलाफ अांबेडकर पूरा जीवन लड़ते रहे. कांशीराम और मायावती ने इसे उलट दिया.
कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी के निर्माण के बाद एक और खतरनाक कदम उठाया था. उन्होंने कहा कि अपनी-अपनी जातियों को मजबूत करो और इसी से कल्याण होगा. इसके बाद ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और दलितों की अलग-अलग जातियों के सम्मेलन होने लगे. लेकिन कांशीराम और मायावती भूल गए कि जातियों के मजबूत होने से जाति-व्यवस्था कैसे टूटेगी? इससे हरेक जाति का गौरव भड़क उठा और सामाजिक बदलाव और जाति-व्यवस्था के खिलाफ चल रहे आंदोलन को जोरदार झटका लगा. राजनीति में जातीय धुव्रीकरण बड़े पैमाने पर होने लगा. जातियों के नाम पर अलग-अलग जाति के गुंडे ध्रुवीकरण की वजह से जीतकर नगरपालिका से लेकर विधानसभा और संसद तक में पहुंचने लगे. आज राजनीति का चेहरा जातीय ध्रुवीकरण की वजह से ज्यादा विद्रूप हो गया है. इसकी वजह से देश में लोकतंत्र नहीं जातियां फल-फूल रही हैं. अब पार्टियां नहीं जातियां सत्ता में आने लगी हैं. कांशीराम-मायावती ने सभी जातियों के लोगों से मंत्री पद देने का वायदा किया. सत्ता में आने के बाद मायावती ने ऐसा किया भी लेकिन सभी सुख-सुविधा पाने के बाद भी उन जातियों के लोगों ने पांच साल के भीतर ही इन्हें लात मारकर किनारा कर लिया. मतलब यह है कि आप जाति-व्यवस्था खत्म करने की लड़ाई को मजबूत नहीं करेंगे और जातियों को मजबूत करने की बात करेंगे तो इससे दलित विरोधी शक्तियां ही मजबूत होंगी. बसपा के शासनकाल में तमाम जातियां दलित विरोधी शक्तियों के रूप में खड़ी हो गईं.
कांशीराम पहले ‘तिलक, तराजू और तलवार’ का नारा लगाते थे लेकिन राजनीति में आते ही वे ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु और महेश है’ के नारे लगाने लगे.
यह अक्सर आरोप लगाया जाता है कि दलित चिंतक, दलित नेतृत्व ही दलित महिलाओं की उपेक्षा करते हैं.वे ही उन्हें आगे नहीं आने देना चाहते हैं.
जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हैं. बाबा साहेब ने अपने आंदोलन के जरिए यह कोशिश की थी कि दलित महिलाएं आगे आएं. वे दलित महिलाओं के साथ हिंदू महिलाओं को भी आगे लाने की बात कर रहे थे. इसलिए 1951 में वह हिंदू कोड बिल लेकर आए. हिंदू कोड बिल, सवर्ण महिलाओं को पिता की संपत्ति में अधिकार देने और दहेज प्रथा आदि जैसी कुरीतियों के खिलाफ लाया गया. लेकिन उस समय बनारस, इलाहाबाद और देश के दूसरे हिस्सों के साधू-संन्यासी गोलबंद होकर बिल के विरोध में उठ खड़े हो गए. बिल को स्वीकृति नहीं मिल पाई. दलित पुरुष नेता तो कई उभरे लेकिन महिला नेतृत्व नहीं उभर पाया. बाबा साहब की मृत्यु आजादी के चंद वर्षों बाद ही हो गई. उसके बाद जगजीवन राम आए तो उन्होंने भी दलित महिलाओं को नेतृत्व दिलाने के लिए कोई प्रयास नहीं किया. उनकी मृत्यु के बाद उनकी बेटी मीरा कुमार राजनीति में आईं जरूर लेकिन उन्हें यह विरासत में मिली. उन्हें राजनीति संघर्ष के रास्ते से नहीं मिली है. रिपब्लिकन पार्टी के चारों धड़े जिसका मैंने पहले जिक्र किया उसमें से कोई महिला नेतृत्व सामने नहीं आया. मायावती ने तो हद ही कर दी. उसके नेतृत्व में कोई दलित पुरुष तो छोडि़ए, कोई दलित महिला भी आगे नहीं आ पाई. दलित राजनीति में मायावती को छोड़कर कोई दूसरी महिला नजर नहीं आती हैं. मायावती खुद dr tulsiramचार बार मुख्यमंत्री बन चुकी हैं लेकिन किसी दूसरी दलित महिला को उन्होंने आगे नहीं आने दिया. मायावती की सामंती सोच देखिए कि उन्होंने पांच-छह वर्ष पहले अपना उत्तराधिकारी घोषित करने की बात की थी. उन्होंने यह भी कहा था, ‘मैं अपने उत्तराधिकारी का नाम एक लिफाफे में बंद करके जाऊंगी. मेरे मरने के बाद लिफाफा खोला जाएगा.’ मैं इस बात का जिक्र सिर्फ इसलिए कर रहा हूं ताकि आनेवाली पीढ़ी दलित राजनीति में महिलाओं की स्थिति को समझ सके और उसे दुरुस्त करने की कवायद में लगे. दलित राजनीति में सफल पुरुष ने अपनी पत्नी को गृहणी बनाकर रखना पसंद किया. यह स्त्रीविरोधी मानसिकता है और यह भी उसी धर्म व्यवस्था की देन है. इसकी शिकार दूसरी पार्टियां भी रही हैं. महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का मामला दसियों साल से लटका पड़ा है. स्त्री विरोधी मानसिकता को मीडिया और सिनेमा भी बढ़ावा दे रहे हैं. पतियों की पूजा कीजिए और यह इच्छा कीजिए कि वह आपको बराबरी का दर्जा देगा, परस्पर विरोधी बातें हैं. कर्मकांडी व्यवस्था को खत्म किए बगैर स्त्रियों का कभी भी भला नहीं हो सकता है.
साभार: तहलका हिंदी