हमारे बहुजन छात्रों का नेतृत्व जब तक सवर्णो के हाथो में रहेगा, तब तक हमारी समस्याओं का समाधान नहीं होगा…संजय बौद्ध राष्ट्रीय अध्यक्ष, डॉ आंबेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ़ इंडिया (DASFI)

sanjay baudh

हमारे बहुजन छात्रों का नेतृत्व जब तक सवर्णो के हाथो में रहेगा, तब तक हमारी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, हमारी लड़ाई सिर्फ छात्रवर्ती या हॉस्टल रूम मिलने तक सिमित नहीं है, बल्कि हमें हर उस व्यवस्था में परिवर्तन चाहिए जो हमारे छात्रों को होस्टल में खुदखुशी करने को मजबूर करती है, जातीय उत्पीडन और अस्सेस्मेंट में स्वर्ण छात्रों के मुकाबले बहुजन छात्रों के कम नंबर लगाना स्वर्ण अध्यापको की जातीय मनोरोग से बीमार होने के लक्षण है, इस व्यवस्था का अंत करने के लिए हमारे बहुजन छात्रों को राष्ट्रीय स्तर पर एक सोच, एक आंदोलन और एक नीति के तहत इकठ्ठा होकर लड़ना ही होगा.
जब समस्याएं हमारी है तो हम ही उससे अच्छे से निपट सकते है, मंच हमारा, समस्याएं हमारी, आंदोलन हमारा, तो नेतृत्व भी हमारा ही होगा.
DASFI ने बहुजन छात्रों को आवाज़ दी है, स्वर्णो की सारी राजनीति दलित-पिछडो और अल्पसंख्यक युवाओ के कारण जमी हुई है, अम्बेडकरी आंदोलन से जुड़े साथी एक दिन स्वर्णो की गलत बनाई व्यवस्था और उनकी राजनीति को ना सिर्फ ख़त्म करेगे, बल्कि उसे हमेशा के लिए दफ़न कर देगे. ऐसा मेरा विश्वास है.
जय भीम.

संजय बौद्ध
राष्ट्रीय अध्यक्ष,
डॉ आंबेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ़ इंडिया (DASFI)

 

नेतृत्व.
    ( डा. अम्बेडकर स्टूडेंट फ्रंट ऑफ़ इंडिया ( DASFI ) के 
            सभी कालेजों में, छात्र- आंदोलन को समर्पित ) 
मंच हमारा, समस्याएं हमारी तो आंदोलन भी अब हमारा रहेगा,
निपट सकते हैं अपनी समस्यायों से भी नेतृत्व जब हमारा रहेगा | 
 
       बहुजन छात्रों ने भी आज मिलकर आवाज़ दी है,
      कालेजों में भी सवर्ण- समस्या को आवाज़ दी है |
      शोषित- दलित, पिछड़े- आदिवासी सभी ने मिल 
      उस राजनीति को दफ़न करने को आवाज़ दी है |
परिवर्तन हो उनकी उन व्यवस्थाओं में ये उद्देश्य हमारा रहेगा ||
          मंच हमारा, समस्याएं हमारी तो आंदोलन भी …. 
 
   ख़ुदकुशी करने को जिसने हमें आज मज़बूर किया है,
   जाति- उत्पीडन सहने को जिसने हमें मज़बूर किया है |
   परीक्षाओं में कम- नंबर दे गिराया है उसने आज तक 
   ‘अस्सेस्मेंट’ कर पीछे रखने को उसने मज़बूर किया है |
बीमार है बूढी पड़ी है व्यवस्था में वह अब मर करके रहेगा ||
        मंच हमारा, समस्याएं हमारी तो आंदोलन भी … 
 
    सोच जागी है हमारी अब हमें एक होके लड़ना है,
    सभी धम्म- अम्बेडकरवादियों को साथ लड़ना है |
    अम्बेडकर को भी रहने दिया था प्यास से प्यासा
    प्यासे विश्वास से आंदोलन को एक हो लड़ना है |
कुचलना है, दफ़न करना है कोई विद्यार्थी अब यहां न मरेगा || 
        मंच हमारा, समस्याएं हमारी तो आंदोलन भी … 
 
      धोबी- धानुक, चमार- खटीक ये सब एक होगा,
      शोषित- पिछड़ा सब साथ आकर के एक होगा |
      ८५% स्टूडेंट फ्रंट जब अपना ये आंदोलन लड़ेगा 
      तब सवर्ण अध्यापकों के आतंक से स्वतंत्र होगा |
हम सब गुजरे हैं गन्दी वर्ण- व्यवस्था से अब वो दबंग न रहेगा ||
        मंच हमारा, समस्याएं हमारी तो आंदोलन भी … 
                  ——————–
              रामबाबू गौतम ‘आरज़ी’, न्यू जर्सी 
                   ( अगस्त ३१, २०१६ )

गुजरात के दलित योद्धाओं को सलाम,दलित आंदोलन के पास एक ताकतवर विचार है, एक सक्षम मध्यम वर्ग है, एक नही अनेक मसीहाकारी नेतृत्व मौजूद है…सुधीर कुमार कटियार

dalit mahasammelan gujrat 31july2016 DCMगुजरात के दलित योद्धाओं को लाल सलाम
दलित आंदोलन के पास एक ताकतवर विचार है, एक सक्षम मध्यम वर्ग है, एक नही अनेक मसीहाकारी नेतृत्व मौजूद है। मध्यम वर्ग ने हमेशा राजनीतिक परिवर्तन में अग्रणी भूमिका निभाई है। मार्क्सवादी चिन्तन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन के लिए एक हरावल दस्ते की अवधारणा सामने रखता है। आज दलित मध्यम वर्ग भारतीय समाज के इस पुनःउत्थान के लिए ऐसे हरावल दल की भूमिका निभाने में पूरी तरह सक्षम है

गुजरात एक बार फिर राष्ट्रीय आंदोलन का सूत्रपात करता दिख रहा है। दलितों पर अत्याचारों की जो भीषण गाथाएं इस देश में रोज लिखी जाती हैं, उनके सामने ऊना, घटनाकांड क्या है? महज एक फुटनोट। लेकिन गुजरात के दलित आन्दोलन ने जिस तरह से इस फुटनोट को अध्याय में बदला है, वह बेमिसाल है। जिस तरह से गुजरात का पूरा दलित समुदाय पिछले एक माह में ब्राह्मणवादी जकड़न भय और अत्याचार के खिलाफ सड़कों पर उतरा है, उससे पूरा देश अचंभित है। यह सही है कि ऊना से पहले भी हिन्दूवादी भाजपा सरकार के खिलाफ एक दलित लहर चल रही थी। लेकिन गुजरात का घटनाक्रम आम जनता की भागीदारी की वजह से एक अलग स्थान रखता है।

अब प्रश्न यह है कि आंदोलन किस दिशा में आगे बढ़ता है। ब्राह्मणवाद के खिलाफ मानवतावादी संघर्ष उतना ही पुराना है जितना ब्राह्मणवाद। लेकिल ब्राह्मणवाद की खासियत कुछ ऐसी है कि इसने किसी भी समतावादी आंदोलन को पनपने नहीं दिया, उनको अपने में समाहित कर लिया। वर्तमान काल में ब्राह्मणवाद को सबसे बड़ी चुनौती आंबेडकर ने दी। और ब्राह्मणवाद की प्रतिक्रिया देखिए। जिस बुद्ध धर्म को आंबेडकर ने हिन्दू धर्म का तिरस्कार कर अपनाया, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ उसी बुद्ध धर्म की उत्तरप्रदेश में पूरे जोरशोर से यात्रा निकाल रहा है। जनाब हमसे बचके कहां जाइएगा, जहां जाइएगा हमें पाइएगा!

15 अगस्त को ऊना में ‘दलित अस्मिता सम्मेलन’ के सफल रहने के बाद दबंग जाति के लोगों ने गोरक्षकों से मिलकर उनपर हमला बोला, लेकिन यह हमला आंदोलन को और गति ही देगा. सवाल है कि गुजरात का आंदोलन किस लक्ष्य को लेकर शान्त होगा? आनंदीबेन की बलि तो यह ले चुका है? क्या ऊना के पीड़ितों को मुआवजा, दलितो पर दायर मुकदमों को वापस लेने, थानगढ केस को फिर खोलने से आंदोलन अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा? क्या आनंदीबेन के बाद मोदी की बलि से नैया पार लग जाएगी? क्या आगामी चुनाव में गुजरात में भाजपा की पराजय काफी है? गुजरात के संघर्ष को इसके समुचित मुकाम तक पहुंचने के लिए इस आंदोलन को दलितों पर हो रहे अत्याचारों के विरोध प्रदर्शन से आगे बढ़ कर इन अत्याचारों की जड़ ब्राह्मणवाद पर प्रहार करना होगा। दलित समस्या का निराकरण अनुसूचित जाति सबप्लान बना कर, उनको भूमि के टुकड़े एलाट कर, एट्रोसिटी एक्ट को कठोर बनाकर, आरक्षण का संपूर्ण पालन कर नहीं हो सकता।

una3भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 छुआछूत को निषेध करता है। इस आर्टिकल को क्रियान्वित करने के लिए छुआछूत निवारण अधिनियम 1955 बनाया गया। जब इस अनुच्छेद पर संविधान सभा में चर्चा हुई तो बंगाल से सदस्य प्रोमथ रंजन ठाकुर ने कहा ‘ मेरी समझ में नही आता कि आप बिना जाति व्यवस्था को खत्म किए छुआछूत कैसे खत्म कर सकते है। छुआछूत कुछ नहीं, जाति व्यवस्था नाम की बीमारी का लक्षण मात्र है। यह जाति व्यवस्था का अंग है। सभा को इस बिन्दु पर विचार करना चाहिए। जब तक हम जाति व्यवस्था को पूरी तौर पर खत्म नहीं करते, छुआछूत की समस्या के साथ सतही छेड़छाड़ करने से कुछ भी हासिल नहीं होगा’।

हकीकत यह है कि संविधान में जाति व्यवस्था का जिक्र तक नहीं है, दिशा निर्देश सिद्दान्तों तक में नहीं, जहां दुनिया भर के आदर्श प्रस्थापित किए गए। उच्च वर्गों से भरी, सीमित मताधिकार पर आधारित संविधान सभा से यह उम्मीद करना कि वह अपनी जड़ें खुद खोदेगा, एक दिवास्वपन ही हो सकती है। बाबा साहेब को संविधान निर्मात्री सभा का अध्यक्ष बना कर आजाद भारत में ब्राह्मणवाद ने आने वाली सदियों के लिए अपना प्रभुत्व सुनिश्चित किया। यह है ब्राह्मणवाद का चमत्कार! बाबा साहेब के प्रयासों के चलते जो कुछ प्रगतिशील सिद्धांत संविधान में प्रतिपादित किये गए, उनका कभी पालन नहीं हुआ। मुंह में राम बगल में छुरी, कोई चालू मुहावरा नहीं, बल्कि ब्राह्मणवाद का मूल सिद्धांत है।

आरक्षण व्यवस्था के चलते दलितों में मध्यम वर्ग का उदय हुआ। व्यापक मताधिकार के चलते राज्यो में दलित पिछड़ा वर्ग आधारित सरकारें भी बनी। लेकिन इस सबके बावजूद जाति व्यवस्था ज्यों की त्यों बनी रही। देश का अधिकांश दलित तबका आज भी अशिक्षित है, बच्चे मजदूरी करने के लिए मजबूर है और वयस्क रोजी रोटी के खातिर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए मजबूर हैं। समाज के हर क्षेत्र प्रशासन, चयनित निकायों, न्यायपालिका, अर्थतन्त्र में उच्च वर्ग का दबदबा बरकरार है।

गुजरात का दलित आंदोलन ब्राह्मणवाद की आखिर कील साबित हो सकता है। लेकिन इसके लिए इसे अपने लक्ष्यों को और व्यापक करना होगा। कांग्रेस और भाजपाईयो, मान्यवर कांशी राम के शब्दों में सांपनाथ और नागनाथ, से इतर एक नई राजनैतिक जमीन को तलाशना होगा। इस नई जमीन के घटक वर्तमान में मौजूद है। समाज के अलग-अलग हिस्से आंदोलित हैं । कोई जमीन पर अधिकार मांग रहा है, कोई शहर में रहने की जगह, कोई वन भूमि पर अधिकार चाहता है, कोई विनाशकारी बांधो से मुक्ति। कोई मैला ढोना बंद करना चाहता है तो कोई प्रमोशन में आरक्षण। इन सारे आंदोलनों को समझना होगा कि 1500 साल से जारी जाति व्यवस्था ही हमारी बहुसंख्यक समस्याओं की जड़ है। इसको खत्म किये बिना एक मानवतावादी प्रजातान्त्रिक समाज का निर्माण नहीं हो सकता।

समय की आवश्यकता है कि दलित आंदोलन अपनी बनाई चौहद्दी से बाहर निकले और सामाजिक परिवर्तन कामी सारे आंदोलनों को एक मानवतावादी नेतृत्व प्रदान करे। यह नेतृत्व एक जागरूक मानवतावादी दलित नेतृत्व ही प्रदान कर सकता। समाज में मौजूद अन्य परिर्वतनकारी विचारधाराएं अपनी ऊर्जा खो चुकी हैं। साम्यवादी आंदोलन अस्ताचल की ओर अग्रसर हैं। समाजवादी पार्टियां पारिवारिक गिरोहो में परिवर्तित हो चुकी है। व्यापक परिवर्तन की झलकी दिखाने के बाद आप ने अपनी जमीन खोने में तनिक भी देर नही की। दलित आंदोलन के पास एक ताकतवर विचार है, एक सक्षम मध्यम वर्ग है, एक नहीं अनेक मसीहाकारी नेतृत्व मौजूद है। मध्यम वर्ग ने हमेशा राजनीतिक परिवर्तन में अग्रणी भूमिका निभाई है। मार्क्सवादी चिन्तन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिवर्तन के लिए एक हरावल दस्ते की अवधारणा सामने रखता है। आज दलित मध्यम वर्ग भारतीय समाज के इस पुनःउत्थान के लिए ऐसे हरावल दल की भूमिका निभाने में पूरी तरह सक्षम है।

लेकिन जैसा कि पूर्व में कहा गया है, इस भूमिका को अदा करने के लिए दलित समाज को अपनी सीमाओं को पार करना होगा। यह समझना होगा कि केवल दलित समाज को आंदोलित करके क्या हो सकता है? दलित समाज के लिए कुछ हासिल कर लें, लेकिन जातिवाद नहीं तोड़ सकते, समाज में व्यापक परिवर्तन नहीं ला सकते, समाज के अन्य घटकों के मसलों को, उनकी समस्यायों को भी अपने आन्दोलन में स्थान देना होगा। मात्र आंबेडकरवाद से आगे बढ़ना होगा। मार्क्सवाद, लोहियावादी समाजवाद, गांधीवाद अपनी उर्जा खो चुके हैं। लेकिन इससे इन विचाधाराओं की आधुनिक भारतीय समाज के उदय में भूमिका और वर्तमान में इनकी प्रासंगिकता को नाकारा नहीं जा सकता। हर-हर मोदी का चुनाव करके और गुजरात माडल को पूरे देश में तेजी से लागू करके ब्राह्मणवाद ने जो माहौल पैदा किया है वह एक जलजला पैदा कर सकता हैं। एक ऐसा जलजला जो जाति व्यवस्था को जड़ से उखाड़ फेके। इस देश का बहुसंख्यक मेहनतकश तबका, गरीब-गुरबा पिछली सहस्राब्दि से इस जलजले का इंतजार कर रहा हैं। इंतजार है तो बस नेतृत्व का !

https://www.forwardpress.in/2016/08/gujrat-ke-dalit-yoddhayon-ko-lal-salam_sudhir-kumar-katiyar/

 

sudhir-photo-001-100x100

Sudhir Kumar Katiyar सुधीर कुमार कटियार

सुधीर कुमार कटियार सेंटर फॉर लेबर रिसर्च एंड एक्शन के संस्थापक हैं। सेंटर गुजरात, राजस्थान व देश के अन्य राज्यों में असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के श्रमिक व मानव अधिकारों के लिए कार्य करता हैं। जाति व्यवस्था व सामाजिक परिवर्तन पर लिखे सुधीर के लेख इकनोमिक एंड पोलिटिकल वीकली तथा दलित वौइस् में प्रकाशित हो चुके हैं।

अपनी ग़लतफ़हमी दुरुस्त कीजिये, गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है आरक्षण,ये राष्ट्र निर्माण का संवैधानिक उपचार है, …..डॉ ओम सुधा का लेख नेशनल दस्तक से

jainmunitarunsagarantiquotaनई दिल्ली। “आरक्षण” आज के दौर का सबसे ज्यादा प्रचलित शब्द बन चुका है। अधिकांश राजनीतिक पार्टियां आरक्षण को खत्म करने या इसमें संसोधन की बात कर रही हैं। लोगों के मन में भी धारणा बन चुकी है कि आरक्षण से सवर्णों को नुकसान हो रहा है। लेकिन सच्चाई यह है कि अभी तक आरक्षण के बावजूद भी दलितों, पिछड़ों को उनका हक नहीं मिल पा रहा। अभी भी जातीय तौर पर उत्पीड़न जारी है। नौकरी से लेकर पिटाई तक हर मामला जाति से जोड़कर देखा जाता है। हाल ही में देशभर में हुईं अनेकों घटनाएं इसका उदाहरण है।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण के बावजूद भी हाशिये पर खड़े वर्ग की मौजूदगी इसका उदाहरण है। भारत किस दौर में विश्व गुरू था इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। अगर विश्व गुरू भी था तो यहां द्रोणाचार्यों का ही बोलवाला क्यों रहा है। यह भी चिंतनीय विषय है। जिन्होंने हजारों सालों से एक समाज को हाशिये पर रखा वे छह दशक के आरक्षण से तिलमिला रहे हैं….. इस मामले पर डॉ. ओम सुधा लिख रहे हैं…….

असल में भारतीय समाज अपनी गलती सुधारने को लेकर तत्पर नहीं दीखता। जिस दौर में हम भारत को विश्वगुरु घोषित करते रहते हैं, याद रखिए ये वही दौर था जब भारत में सती प्रथा, विधवा विवाह पर रोक, बाल विवाह और जाति प्रथा अपने चरम पर थी। हम अपनी बीमारियों पर गर्व करते रहे। ये भी कहा जा सकता है कि हम बीमारियों को लेकर अनुकूलित हो गये। सामाजिक बीमारियों का अनुकूलन इतना ज़बरदस्त रहा है कि आज भी हम इन बीमारियों को सही ठहराने के पक्ष में तर्क गढ़ते रहते हैं। जाति व्यवस्था ऐसी ही बीमारी है।

सोचिये, कितना गन्दा समाज है जो जाति के आधार पर भेदभाव करता है।

इस बीमारी को डॉ आंबेडकर ने ना केवल समझा बल्कि इसका मुकम्मल इलाज भी लेकर आये। आरक्षण के रूप में बाबा साहब जाति नामक लाइलाज बीमारी का इलाज लेकर आये। मज़ा देखिये देश अब स्वस्थ हो रहा है।

कुछ लोग जो कास्ट हेरारकी के टॉप पर हैं। उनकी सत्ता हिलने लगी। कभी सवा लग्घा दूर से छूत फैलाने वाले बराबरी पर आ गए। साथ वाली कुर्सी पर बैठने लगे। दलित लड़की यू पी एस सी में टॉप पर आ जाती हैं। ये सब आरक्षण की वजह से मुमकिन हुआ। उनका तिलमिलाना लाजिमी भी है।Dr OM Sudha

इसलिए ये समय समय पर मेरिट की बात करते रहते हैं। सोचिये की आई टी ओ चौक पर आपकी गाड़ी की खिड़की पर 5 रूपये की कलम बेचने वाले बच्चे का एड्मिसन यदि किसी डी. पी. एस. में करा दिया जाय तो वह  कलक्टर ना भी बने तो कम से कम डॉक्टर या इंजिनियर तो जरूर बनेगा। मतलब साफ है कि मेरिट कुछ नहीं होता है, अवसर सबकुछ होता है।

समता मूलक समाज से चिढ़ने वाले लोग समय-समय पर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने का भी शिगूफा छोड़ते रहते हैं। इनको समझना पड़ेगा की आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है बल्कि सबको सामान अवसर और प्रतिनिधित्व मिलने का कार्यक्रम है, जो राष्ट्र निर्माण से जुड़ा है। अपने आसपास नज़रें उठाकर हमें देखना चाहिए की आरक्षण की वजह से कितना कुछ बदल गया है। सब एक पांत में खड़े हो गए हैं।

http://nationaldastak.com/story/view/opinion-about-reservation-

 

गुजरात मूलनिवासी (दलित) अस्मिता यात्रा : SC आन्दोलन का नया माडल ….एस.आर.दारापुरी

MUMBAI  buddh press agitation3
gujrat dalit protestगुजरात दलित अस्मिता यात्रा : दलित आन्दोलन का नया माडल

एस.आर.दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

गुजरात में दलित आन्दोलन की शुरुआत ऊना में चार दलितों की गोहत्या के नाम पर की गयी निर्मम पिटाई के प्रतिरोध के तौर पर हुयी थी. इसका प्रारंभ दलितों द्वारा धरना, जुलुस और सुरेन्द्र नगर कलेक्ट्र के कार्यालय के बाहर मरी गाय फेंक कर हुआ था. इसी सम्बन्ध में 31 अगस्त को अहमदाबाद में एक महासम्मेलन किया गया था. इस सम्मलेन में जो मांगें रखी गयीं उन में मुख्य मांग तो ऊना काण्ड के दोषियों को दण्डित करने की थी. परन्तु इस के साथ ही जो अन्य मांगें रखी गयीं वे भी बहुत महत्वपूर्ण हैं. इनमे सब से महत्वपूर्ण मांग है दलितों को भूमि वितरण. इस के साथ अन्य मांगें हैं प्रत्येक जिले में दलित उत्पीडन के मामलों के लिए विशेष अदालतों की स्थापना और 2012 में धनगढ़ में पुलिस फायरिंग में मारे गए तीन दलितों के मामले में दोषी पुलिस वालों को सजा. इसके साथ ही दलितों ने जो घोषणाएं की हैं वे भी बहुत क्रांतिकारी प्रकृति की हैं. इनमें एक बड़ी घोषणा है मरे जानवरों को न उठाना और चमड़ा न उतारना. दूसरी बड़ी घोषणा है हाथ से मल सफाई का काम न करना और गटर और सैप्टिक टैंक की मानव द्वारा सफाई का बहिष्कार. इन दोनों मुद्दों को लेकर दलितों ने इन कामों को न करने की शपथ भी ग्रहण की है.

अब गुजरात के दलितों ने उपरोक्त मुद्दों को लेकर 5 अगस्त से “दलित अस्मिता यात्रा” नाम से अहमदाबाद से ऊना तक मार्च शुरू की है. यह मार्च 15 अगस्त को ऊना पहुंचेगी और उस दिन दलित अपनी आज़ादी का जश्न मनाएंगे. इस मार्च का मुख्य उद्देश्य दलितों में उनकी दुर्दशा और उत्पीड़न के बारे में जागृति पैदा करना और इसके प्रतिरोध के लिए उन्हें लामबंद करना. अब तक देखा गया है कि इस मार्च को हरेक जगह पर बड़ा जन समर्थन मिल रहा है लोग उपरोक्त शपथ भी ग्रहण कर रहे हैं. वहां पर स्थानीय उत्पीड़न और समस्यायों पर चर्चा भी हो रही है. इस यात्रा में भाग लेने वाले लोगों का मनोबल बहुत ऊँचा है. इस मार्च को अलग अलग राज्यों में दलित मीटिंगे, धरने और प्रदर्शन करके अपना समर्थन व्यक्त कर रहे हैं. गुजरात के दलितों को विदेशों से भी दलित संगठनों का समर्थन मिल रहा है.

उक्त दलित अस्मिता यात्रा में जो मुद्दे उठाये गए हैं वे दलितों के बहुत बुनियादी मुद्दे हैं. जाति आधारित भेदभाव और उत्पीड़न को रोकने के लिए सरकार से सख्त कार्रवाही की मांग बहुत महत्वपूर्ण है. यह देखा गया है कि गुजरात पूरे देश में दलित उत्पीड़न के मामले में सबसे अधिक उत्पीड़न वाले पांच राज्यों में से एक है. गृह मंत्रालय के ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि 2014 में देश भर में दलितों के उत्पीड़न के 47,000 मामले दर्ज हुए थे जबकि 2015 में 54,000 के क़रीब मामले दर्ज हुए हैं. यानी एक साल में 7000 घटनाएं बढ़ीं हैं. इसी प्रकार 2014 में गुजरात में 1100 अत्याचार के मामले दर्ज किये गये थे, जो कि 2015 में बढ़कर 6655 हो गये. इस प्रकार अकेले गुजरात में पिछले साल में दलित उत्पीडन में पांच गुना वृद्धि हुयी है. न्यायालय में इन मुकदमों के निस्तारण की सबसे खराब स्थिति गुजरात की ही है जहां दोषसिद्धि की दर 2.9 फीसदी है जबकि देश में  दोषसिद्धि की दर 22 फीसदी है. इस प्रकार गुजरात में जहाँ एक तरफ दलित उत्पीड़न में भारी वृद्धि हो रही है, वहीँ दूसरी तरफ उत्पीड़न के मामलों में सजा की दर बहुत निम्न है. इन कारणों से गुजरात के दलितों की स्थिति बहुत खराब है. इसके लिए गुजरात की जातिवादी सामाजिक व्यवस्था और सरकार की निष्क्रियता जुम्मेदार है. अतः सरकार पर दलित उत्पीड़न को रोकने का दबाव बनाना, कानून को प्रभावी ढंग से लागू कराने और सभी जिलों में विशेष अदालतों के गठन की मांग बहुत उचित है.

उक्त यात्रा की सबसे महत्वपूर्ण मांग भूमि वितरण की है. गुजरात में दलितों की कुल आबादी लगभग 7% है परन्तु बहुत ही कम दलितों के पास ज़मीन है. इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि ऊना में 57 दलित परिवारों में से केवल 3 परिवारों के पास ही थोड़ी सी ज़मीन है. यह बताया जाता है कि गुजरात में पहले से बहुत सारी ज़मीन उपलब्ध है जिस का आबंटन भूमिहीनों को किया जाना था परन्तु वह नहीं किया गया. भारत एक कृषि प्रधान देश है. इस की आबादी का सामाजिक और आर्थिक जनगणना 2011 से यह उभर कर आया है कि देहात क्षेत्र में 56% परिवार भूमिहीन हैं और 30% परिवार केवल शारीरिक श्रम ही कर सकते हैं. जनगणना ने इन दोनों वंचनाओं को इन लोगों की बड़ी कमजोरियां होना बताया है. इस श्रेणी में अगर दलितों का प्रतिश्त देखा जाये तो यह 70 से 80 प्रतिश्त हो सकता है. इस प्रकार  ग्रामीण दलितों की बहुसंख्या आज भी भूमिधारी जातियों पर आश्रित है. इस पराश्रिता के कारण चाहे मजदूरी का सवाल हो या उत्पीड़न का मामला हो दलित इन के खिलाफ मजबूती से लड़ नहीं पाते हैं क्योंकि सवर्ण  जातियों के पास सामाजिक बहिष्कार एक बहुत बड़ा हथियार है. अतः उत्पादन के संसाधनों के पुनर्वितरण के बिना दलितों की पराश्रिता समाप्त करना संभव नहीं है. इसके लिए भूमि सुधार और भूमिहीनों को भूमि वितरण आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना कि सौ वर्ष पहले था. इसी लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि गुजरात आन्दोलन में दलितों ने प्रत्येक दलित परिवार को 5 एकड़ भूमि देने की मांग उठाई गयी है. वास्तव में भूमि की मांग पूरे भारत के दलितों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण मांग है जो कि पूरे देश में दलित आन्दोलन का हिस्सा बननी चाहिए.

गुजरात के दलितों ने हाथ से मैला उठाने और मानव द्वारा गटर और नाले साफ़ करने के काम का बहिष्कार करने की जो घोषणा की है वह बहुत कारगर और क्रान्तिकारी है. यह दोनों काम बहुत कठिन और खतरनाक हैं. वास्तव में यह पेशा दलित जातियों पर ज़बरदस्ती थोपा गया प्रतीत होता है क्योंकि कोई भी सामान्य व्यक्ति इसे आसानी से करने के लिए राजी नहीं हो सकता. इसी लिए डॉ. आंबेडकर ने “भंगी झाड़ू छोडो” का नारा दिया था. यह एक सच्चाई है सदियों से इन पेशों को सुधारने अथवा इन के आधुनिकीकरण के लिए कुछ भी नहीं किया गया है. इसका मुख्य कारण यह है कि वर्तमान में यह पेशा केवल दलित जातियों तक ही सीमित है और सवर्ण जातियों को इनके सुधारने अथवा इनके आधुनिकीकरण की ज़रुरत महसूस नहीं हुयी है. अब अगर दलित इन पेशों का बहिष्कार कर देते हैं जैसा कि गुजरात में स्थिति पैदा हो रही है तो सामान्य जातियों को मजबूर होकर यह काम करना पड़ेगा और मोदी जी के कथनानुसार इसका आध्यात्मिक लाभ भी उठाने का अवसर प्राप्त होगा. जब यह स्थिति आएगी तो सवर्ण जातियों को इन पेशों का आधुनिकीकरण करना पड़ेगा जो सब के हित में होगा. अगर गुजरात के दलितों से शेष भारत के दलित भी प्रेरणा लेकर इन पेशों का बहिष्कार करना शुरू कर देते हैं तो देश में सफाई कर्मियों के पेशे में क्रांतिकारी परिवर्तन हो जायेगा.

गुजरात के दलितों ने मरे पशु न उठाने और चमड़ा न उतारने के काम का बहिष्कार करके एक क्रांतिकारी  कदम उठाया है. एक तो यह काम केवल दलितों पर ही थोपा गया है और दूसरे इस काम को घृणा की दृष्टि से  देखा जाता है. इस पर इधर दलितों को गोरक्षकों की गुंडागर्दी और प्रताड़ना भी झेलनी पड़ रही है. इस काम को दलितों द्वारा ही किये जाने के कारण इस में न तो कोई सुधार हुआ है और न ही इसका आधुनिकीकरण ही हुआ है. सवर्णों द्वारा इस काम को घृणा की दृष्टि से देखे जाने और इसके लिए दलितों को नीच समझे जाने के कारण ही डॉ. आंबेडकर ने 1929 में ही इसे छोड़ देने का आवाहन किया था. यह बात निश्चित है कि जब तक सवर्ण भी इस काम को करने के लिए बाध्य नहीं होंगे तब तक इसका न तो कोई सुधार होगा और न ही आधुनिकीकरण. इस पेशे के प्रति धारणा भी तभी बदलेगी जब सवर्ण भी इसे करने लगेंगे.

गुजरात के दलित आन्दोलन से यह बात भी स्पष्ट हुयी है कि जब तक दलितों के वास्तविक मुद्दे जैसे जातिगत उत्पीड़न, भूमि आबंटन, रोज़गार, दलितों से जुड़े पेशों में सुधार और उनका आधुनिकीकरण, संसाधनों का पुनर्वितरण, निजीकरण का विरोध और सामाजिक सम्मान दलित आन्दोलन और दलित राजनीति के केंद्र में नहीं आते तब तक दलितों का न तो सशक्तिकरण होगा और न ही उनका उत्पीड़न रुकेगा. गुजरात दलित आन्दोलन की यह भी विशेषता है कि यह वर्तमान अस्मिता की राजनीति से प्रेरित न होकर जनता का स्वत स्फूर्त आन्दोलन है. इसके केंद्र में केवल दलित सम्मान ही नहीं बल्कि उस सम्मान को मूर्तरूप देने के लिए व्यवस्था परिवर्तन और सार्वजानिक संसाधनों में हिस्सेदारी जैसे भूमि तथा रोज़गार आदि मुद्दे भी हैं. यह भी सर्वविदित है कि वर्तमान दलित राजनीति केवल अस्मिता और सम्मान की बात करती रही है परन्तु इसे प्राप्त करने हेतु सार्वजानिक संसाधनों जैसे भूमि जो सवर्ण जातियों के कब्जे में है, के पुनर्वितरण तथा व्यापार एवं उद्योग में हिस्सेदारी आदि मुद्दों से भागती रही है. इन कारणों से वर्तमान दलित राजनीति व्यक्तिवाद, जातिवाद, स्वार्थपरता, सौदेबाजी और मुद्दाविहिनता का शिकार हो गयी है जिसका लाभ केवल कुछ व्यक्तियों को ही हुआ है व्यापक दलित समुदाय को नहीं. वर्तमान गुजरात दलित आन्दोलन ने दलित संघर्ष और दलित राजनीति को नयी दिशा दी है और दलितों से जुड़े मुद्दों को उछाला है. इस आन्दोलन के संचालक व्यक्ति कम दलित सरोकार ज्यादा हैं. इससे एक आशा जगती है कि दलित राजनीति और दलित आन्दोलन जाति और व्यक्तियों की पकड़ से मुक्त होकर दलित मुद्दों पर आधारित होगा जिस से दलितों का वास्तविक सशक्तिकरण और उत्थान होगा और बाबासाहेब का जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज की स्थापना का सपना साकार हो सकेगा.

 

 

कामयाब होना है तो बहुजन मार्गदाता महामानव तथागत गौतम बुद्ध की इस बात को याद रखें….SAMAYBUDDHA MISHAN

brahman vs buddhaभगवान बुद्ध एक गांव में उपदेश दे रहे थे। सभा में सभी शांति से बुद्ध की वाणी सुन रहे थे, लेकिन वहां स्वभाव से ही अतिक्रोधी एक ऐसा व्यक्ति भी था, जिसे बुद्ध की बातें बेतुकी लग रही थीं। वह कुछ देर तक तो सुनता रहा फिर अचानक ही बोल उठा, ‘तुम पाखंडी हो। बड़ी-बड़ी बातें करना यही तुम्हारा काम है। तुम लोगों को भ्रमित कर रहे हो। तुम्हारी बातें आज के समय में कोई मायने नहीं रखतीं।’

ऐसे कई कटु वचनों को सुनकर भी बुद्ध शांत रहे। उन्हें शांत देख कर उस व्यक्ति का क्रोध और भी उफन उठा। उन्हें और भी तेजी से भला-बुरा कहते हुए वह चला गया। अगले दिन जब उस व्यक्ति का क्रोध शांत हुआ, तो वह पछतावे की आग में जलने लगा और बुद्ध को ढूंढता हुआ उसी स्थान पर पहुंचा। लेकिन बुद्ध तो अपने शिष्यों के साथ पास वाले दूसरे गांव की ओर निकल चुके थे।

स व्यक्ति ने बुद्ध के बारे में लोगों से पूछा और जहां बुद्ध प्रवचन दे रहे थे, वहां पहुंच गया। उन्हें देखते ही वह उनके चरणों में गिर पड़ा और उनसे क्षमा मांगने लगा। बुद्ध ने पूछा, ‘कौन हो भाई? तुम्हें क्या हुआ है? क्यों क्षमा मांग रहे हो?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं वही हूं, जिसने कल आपसे बहुत बुरा व्यवहार किया था। मैं शर्मिंदा हूं।’

भगवान बुद्ध ने उससे कहा, ‘बीता हुआ कल तो मैं वहीं छोड़कर आ गया। हर कोई उस जगह को छोड़ कर चला जाता है। तुम अभी वहीं रुके हुए हो। तुम्हें अपनी गलती का आभास हो गया, तुमने पश्चाताप कर लिया और तुम निर्मल हो गए। अब तुम आज में प्रवेश करो। बुरी बातें तथा बुरी घटनाएं याद करते रहने से वर्तमान और भविष्य दोनों बिगड़ते जाते है। बीते हुए कल के कारण आज को मत बिगाड़ो।‘पर हाँ बीते हुए कल से सबक लो ज्ञान लो और उसे वर्तमान को सुधरने में लगाओ, कल में जिओ नहीं पर कल से सबक लरूर लो ताकि फिर दोबारा ठोकर न खाओ 

बौद्ध धम्म को ठीक से समझते समझाते ओशो पर एक ब्राह्मण का शक और सवाल जवाब,सुनिये ओशो के जवाब, हस्ते हस्ते लोट पॉट हो जाओगे

बौद्ध धम्म को ठीक से समझते समझाते ओशो पर ब्रामणो को शक हुआ की कहीं ये बौद्ध धम्म चक्र परिवर्तन तो नहीं कर रहा, कहीं ये ब्राह्मणवाद  के लिए खतरा तो नहीं, तो ब्राह्मणों ने टोह लेने के लिए ओशो से अपने छद्म टोही सवाल पूछे | उसके बाद ओशो ने जो जवाब दिया है, यकीन मानिये इसको मैं ‘हँसा हँसा के मारना कहूँगा’, इस सुनो और आप समझ जाओगे की क्यों गौतम बुद्ध ने कहा है की एक चालक व्यक्ति हर परिस्थिति को झेल लेता है और उसमे से सकुशल निकल जाता है इसलिए चालक बनो|

वाकई  बौद्ध धम्म के मर्म को सही से समझा पाने की क्षमता ओशो में ही है. इस बात से भयभीत ब्राह्मणवादियों ने ओशो को सेक्स गुरु के नाम से बदनाम कर दिया है ताकि लोग इसी बात सुनकर देशप्रेमी बौद्ध न हो जाए| ये एक नीति है जीमे लोगों को किसी की बात सुनने से रोकने के लिए उस बन्दे को बदनाम कर दो| यही हुआ चार्वाक के साथ , चार्वाक मतलब चारु वाकया , यानि ऐसी बातें को कानों को सुनने में अच्छी लगे| तो चार्वाक की व्याहारिक बातें केवल सुनने में अच्छी हैं ऐसा प्रचार प्रसार हुआ| खेर ये बहुत गहरी नीति है शायद आप नहीं समझोगे, आप तो बस ये वीडियो सुनो है है कर लोट पॉट न हो गए तो कहना|.

मोएनजोदारो को यूनेस्को ने बौद्ध स्तूप बताया है.इसका काल निर्धारण लगभग 200 ईस्वी सन् का है. यानी बुद्ध के जन्म के कोई छह सौ साल बाद. अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध की विशाल मूर्तियां इसके भी दो सौ साल बाद की हैं. Dilip C Mandal FB post

mohenjodaroयह है मोएनजोदारो की सबसे ऊंची और सभ्य भव्य इमारत. यूनोस्को की साइट पर उसकी यह सुंदर तस्वीर लगी है.

यूनेस्को ने इसे बौद्ध स्तूप बताया है.क्या भारत की स्कूली किताबों में सिंधु घाटी सभ्यता पढ़ाते समय इस स्तूप के बारे में आपने कभी कुछ पढ़ा है?
सच से डरता कौैन है?

यूनेस्को के मुताबिक यह स्तूप बाकी इमारतों के बाद की बनी हुई है. कच्ची ईंट से बनी यह इमारत अब भी अपने मूल स्वरूप में विद्यमान है.

इसका काल निर्धारण लगभग 200 ईस्वी सन् का है. यानी बुद्ध के जन्म के कोई छह सौ साल बाद. अफगानिस्तान में बामियान बुद्ध की विशाल मूर्तियां इसके भी दो सौ साल बाद की हैं.

और हां, मोएनजोदारो में कोई हथियार नहीं मिला है त्रिशूल तो कतई नहीं. न ही घोड़ा होने का कोई संकेत या कोई घोड़े की कोई मूर्ति वगैरह.

यूनेस्को ने यह लिखा है- ”Moenjodaro comprises two sectors: a citadel area in the west where the Buddhist stupa was constructed with unbaked brick over the ruins of Moenjodaro in the 2nd century AD, and to the east, the lower city ruins spread out along the banks of the Indus. Here buildings are laid out along streets intersecting each other at right angles, in a highly orderly form of city planning that also incorporated systems of sanitation and drainage.”

लिंक देखिए – http://whc.unesco.org/en/list/138

 

मुअनजो-दड़ो सिंघु घाटी सभ्यता का सबसे परिपक्व शहर जहाँ पर सबसे बड़ा ढांचा एक बौद्ध स्तूप है , इससे साबित होता है की वो एक बौद्ध सभ्यता थी और गौतम बुद्ध के बाद यानि 2600 वर्षों के भीतर ही पनपी और नष्ट हुई …source WIKIPEDIA

OLYMPUS DIGITAL CAMERA

मुअनजो-दड़ो सभ्यता
मुअनजो-दड़ो का सिन्धी भाषा में अर्थ है ” मुर्दों का टीला “। यह दुनिया का सबसे पुराना नियोजित और उत्कृष्ट शहर माना जाता है। यह सिंघु घाटी सभ्यता का सबसे परिपक्व शहर है। यह नगर अवशेष सिन्धु नदी के किनारे सक्खर ज़िले में स्थित है। मोहन जोदड़ो शब्द का सही उच्चारण है ‘मुअन जो दड़ो’। इसकी खोज राखालदास बनर्जी ने 1922 ई. मे की। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जान मार्शल के निर्देश पर खुदाई का कार्य शुरु हुआ। यहाँ पर खुदाई के समय बड़ी मात्रा मे ईमारतें, धातुओं की मूर्तियाँ, और मुहरें आदि मिले। पिछले 100 वर्षों में अब तक इस शहर के एक-तिहाई भाग की ही खुदाई हो सकी है, और अब वह भी बंद हो चुकी है। माना जाता है कि यह शहर 200 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला था।

इतिहास

 
मुअनजो-दड़ो सभ्यता
विशेषताएँ
मुअनजो-दड़ो की सड़कों और गलियों में आप आज भी घूम सकते हैं। यह शहर जहाँ था आज भी वहीं है। यहाँ की दीवारें आज भी मजबूत हैं, आप यहाँ पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। इस शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर उस बैलगाड़ी की रून-झुन सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्व की तसवीरो में देखा है। इसे नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप कहा गया है। मुअनजो-दड़ो के सबसे खास हिस्से पर बौद्ध स्तूप है।

प्रसिद्ध जल कुंड

जल-कुंडMohenjodaro_bath
मुअनजो-दड़ो की दैव-मार्ग नामक गली मे करीब चालीस फुट लम्बा और पच्चीस फुट चौड़ा प्रसिध्द जल कुंड है, इसकी गहराई सात फुट है। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। कुंड के तीन तरफ़ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में २ पाँत में ८ स्नानघर है। इस कुंड को काफ़ी समझदारी से बनाया गया है, क्योंकि इसमें किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता। यहाँ की ईंटें इतनी पक्की हैं, जिसका कोई ज़वाब ही नहीं। कुंड में बाहर का अशुद्ध पानी ना आए इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोडी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। दीवारों में डामर का प्रयोग किया गया है। कुंड में पानी की व्य्वस्था के लिये दोहरे घेरे वाला कुआँ बनाया गया है। कुंड से पानी बाहर निकालने के लिए पक्की ईंटो से नालियाँ भी बनाई गयी हैं, और खास बात यह है की इसे पक्की ईंटो से ढका गया है। इससे यह प्रमाणित होता है कि, यहाँ के लोग इतने प्राचीन होने के बावजूद भी हमसे कम नहीं थे। कुल मिलाकर सिंधु घाटी की पहचान वहाँ कि पक्की-घूमर ईंटों और ढकी हुई नालियाों से है, और यहाँ के पानी निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के इतिहास मे नही मिलता।

कृषि
खुदाई मे यह बात भी उजागर हुई है कि यहाँ भी खेतिहर और पशुपालक सभ्यता रही होगी। सिंध के पत्थर, तथा राजस्थान के ताँबो से बनाये गये उपकरण यहाँ खेती करने के लिये काम में लिये जाते थे। इतिहासकार इरफ़ान हबीब के अनुसार यहाँ के लोग रबी की फसल लेते थे। गेहूँ, सरसो, कपास, जौ और चने की खेती के यहाँ खुदाई में पुख़्ता सबूत मिले हैं। माना जाता है कि यहाँ और भी कई तरह की खेती की जाती थी, केवल कपास को छोडकर यहाँ सभी के बीज मिले है। दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने कपड़ों में से एक का नमूना यहाँ पर ही मिला था। खुदाई मे यहाँ कपडो की रंगाई करने के लिये एक कारखाना भी पाया गया है।

नगर नियोजन

सड़कें – MohenjodaroStreet_-_Mohenjodaro
मुअनजो-दड़ो की इमारतें भले ही खंडहरों में बदल चुकी हों परंतु शहर की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिये ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की सड़कें ग्रिड प्लान की तरह हैं मतलब आड़ी-सीधी हैं। पूरब की बस्तियाँ “रईसों की बस्ती” है, क्योंकि यहाँ बड़े-घर, चौड़ी-सड़कें, और बहुत सारे कुएँ है। मुअनजो-दड़ो की सड़कें इतनी बड़ी हैं, कि यहाँ आसानी से दो बैलगाड़ी निकल सकती हैं। यहाँ पर सड़क के दोनो ओर घर हैं, दिलचस्प बात यह है, कि यहाँ सड़क की ओर केवल सभी घरो की पीठ दिखाई देती है, मतलब दरवाज़े अंदर गलियों में हैं। वास्तव में स्वास्थ्य के प्रति मुअनजो-दड़ो का शहर काबिले-तारीफ़ है, कयोंकि हमसे इतने पिछड़े होने के बावज़ूद यहाँ की जो नगर नियोजन व्यव्स्था है वह कमाल की है। इतिहासकारों का कहना है कि मुअनजो-दड़ो सिंघु घाटी सभ्यता में पहली संस्कृति है जो कि कुएँ खोद कर भू-जल तक पहुँची। मुअनजो-दड़ो में करीब ७०० कुएँ थे। यहाँ कि बेजोड़ पानी-निकासी, कुएँ, कुंड, और नदीयों को देखकर हम यह कह सकते हैं कि मुअनजो-दड़ो सभ्यता असल मायने में जल-संस्कृति थी।
प्रसिद्ध “नर्तकी” शिल्प
Dancing_girl._Mohenjodaroपुरातत्त्वशास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर यहाँ “डीके-जी” हलका है, जहाँ ज्यादातर उच्च वर्ग के घर हैं। इसी तरह यहाँ पर ओर डीके-बी,सी आदि नाम से जाने जाते हैं। इन्हीं जगहों पर प्रसिद्ध “नर्तकी” शिल्प खुदाई के समय मिला। यह मूर्ति अब दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में है।

संग्रहालय
मुअनजो-दड़ो का संग्रहालय छोटा ही है। मुख्य वस्तुएँ कराची, लाहौर, दिल्ली और लंदन में हैं। यहाँ काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद्-भांड, उन पर काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार और पत्थर के औज़ार। संग्रहालय में काम करने वाले अली नवाज़ के अनुसार यहाँ कुछ सोने के गहने भी हुआ करते थे जो चोरी हो गए।

संग्रहालय में रखी वस्तुओं में कुछ सुइयाँ भी हैं। खुदाई में ताँबे और काँसे की बहुता सारी सुइयाँ मिली थीं। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ मिलीं जिनमें एक दो-इंच लंबी थी। समझा गया है कि यह सूक्ष्म कशीदेकारी में काम आती होगी। खुदाई में सुइयों के अलावा हाथीदाँत और ताँबे के सुए भी मिले हैं।

कला
सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व अधिका था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर सूक्ष्मता से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से अधिक कला-सिद्ध प्रदर्शित करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के अनुसार सिंधु सभ्यता की विशेषता उसका सौंदर्य-बोध है, “जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।”

https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%AE%E0%A5%8B%E0%A4%B9%E0%A4%A8_%E0%A4%9C%E0%A5%8B%E0%A4%A6%E0%A4%A1%E0%A4%BC%E0%A5%8B

सन 1982 में मान्यवर साहब कांशीराम जी की किताब ”चमचा युग” (An Era of the Stooges) प्रकाशित हुई,ये किताब हमें सच्चे एवं नकली नेतृत्व की पहचान करना सिखाती है और सिखाती रहेगी, पुस्तक समीक्षा

kanshiramसच्चे एवं नकली नेतृत्व की पहचान*

अर्थात

*मान्यवर साहब कांशीरामजी की किताब ”चमचा युग”*

सन 1982 में कांशीरामजी लिखित किताब ”चमचा युग” (An Era of the Stooges) प्रकाशित हुई।

*यह किताब अम्बेडकर के अभ्युदय से लेकर पूना पैक्ट, शोषित समाज के नकली नेतृत्व से होती हुई स्थायी समाधान तक पहुचती है।*

कुल जमा चार भागो में विभक्त यह किताब मात्र 127 पृष्ठों की है।

गौरतलब है कि कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी का औपचारिक गठन 1984 में किया।

मूलतः अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब का सरल सहज हिन्दी में अनुवाद रामगोपाल आजाद ने किया है।

*यह किताब महात्मा ज्योतिराव फुले जी को समर्पित की गई है।*

कांशीराम इस पुस्तक के उद्देश्‍य के बारे में लिखते है कि

*”इस पुस्तक को लिखने का उद्देश्‍य दलित शोषित समाज को और उसके कार्यकर्ताओं एवं नेताओं को दलित शोषित समाज में व्यापक स्तर पर विद्यमान पिट्ठू तत्वो के बारे में शिक्षित, जागृत और सावधान करना है।*

*इस पुस्तक को जनसाधारण को और विशेषकर कार्यकर्ताओ को सच्चे एवं नकली नेतृत्व के बीच अन्तर को पहचानने की समझ पैदा करने की दृष्टि से भी लिखा गया है।*

उन्हे यह समझना भी आवश्‍यक है कि वे किस प्रकार के युग में रह रहे है और कार्य कर रहे है- यह पुस्तक इस उद्देश्‍य की पूर्ति भी करती है।”

*कांशीरामजी अपनी किताब चमचा युग में उद्धृत करते है कि किस प्रकार प्रसिद्ध डा. अम्बेडकर को उनके ही बिरादरी के अनजाने प्रत्याशी ने हरा दिया।*

वे कहते है कि डा.अम्बेडकर को इसकी आशंका पूना पैक्ट के दौरान थी इसलिए उन्होने पृथक निर्वाचक मण्डल की वकालत की।

*डा आंबेडकर का यह कथन ध्यान देने योग्य है-*

”संयुक्त निर्वाचक मण्डल और सुरक्षित सीटों की प्रणाली के अन्तर्गत स्थिति और भी बदतर हो जायेगी, जो एतत्पष्चात पूना-पैक्ट की शर्तो के अनुसार लागू होगी।

यह कोरी कल्पना मात्र नही है।

पिछले चुनाव ने 1946 निर्णायक रूप से यह सिध्द कर दिया है कि अनुसूचित जातियों के संयुक्त निर्वाचक मण्डल से पूर्ण रूपेण मताधिकारच्युत किया जा सकता है।”  – *डा.बी.आर.अम्बेडकर पृ.85 चमचा युग*

*यानि बाबा साहेब ये मानते थे कि वर्तमान मतदान प्रणाली दलित बहुजन को अपने सच्चे प्रतिनीधि चुनने के काम नही आयेगी।*

हिन्दू जिन आरक्षित सीटों में दलित बहुजन को खड़ा करेगे वे दलितों के नही वरन हिन्दूओं के चमचे (हितैषी) होगे।

*मान्यवर कांशीराम पुस्तक के प्रारंभ में चमचा/पिटठु की परिभाषा बतलाते है -*

”चमचा एक देशी शब्द है जो ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयुक्त किया जाता है जो अपने आप क्रियाशील नही हो पाता है बल्कि उसे सक्रिय करने के लिए किसी अन्य व्यक्ति की आवश्‍यकता पड़ती है। वह अन्य व्यक्ति चमचे को सदैव अपने व्यक्ति उपयोग और हित में अथवा अपनी जाति की भलाई में इस्तेमाल करता है जो स्वयं चमचे की जाति के लिए हमेशा नुकसानदेह होता है।” – *पृष्ठ-80 चमचा युग*

इस प्रकार कांशीराम मुख्य रूप से चमचों/ मौका परस्तों को छःभागो में बांटते है-

*1.  जाति या समुदायवार चमचे*

अनुसूचित जाति -(अनिच्छुक चमचे)- इन्होने संघर्ष करके उज्जवल युग में प्रवेश करने का प्रयास किया लेकिन गांधी और कांग्रेस ने अनिच्छुक चमचा बना दिया।

*अनुसूचित जनजाति* -(नवदीक्षित चमचे)- इन्हे दलितों के संघर्ष के कारण पहचान एवं अधिकार मिल गया लेकिन ये अपने उत्पीड़क को अपना हितैषी समझते है।

*अन्य पिछड़ा वर्ग* – (महत्वकांक्षी चमचे) – ये अब महसूस करते है कि वे दलितों से भी पीछे हो गये है इसलिए इन्हे महत्वकांक्षा बहुत है। इसी कारण बहुजन आंदोलन से जुड़ रहे है।

*अल्पसंख्यक* – (मजबूर चमचे)- इसाई, मुसलमान, सिक्ख, बौध्द ये मजबूर चमचे है क्योकि ये शासक जातियों के रहमों करम पर है।

*2.  पार्टीवार चमचे*

ये चमचे अपने आपको दलीय अनुशासन में जकड़े होने का हवाला देकर समाज विरोधी कार्य करते है।

*3.  अबोध या अज्ञानी चमचे*

ये वो चमचे है जो अपने शोषको को ही अपना उध्दारक मानते है।

*4 ज्ञानी चमचे अम्बेडकरवादी चमचे*

ये वो लोग है जो बड़ी- बड़ी बाते करते है अम्बेडकर को पढ़ते और कोड भी करते है लेकिन आचरण उसके विपरीत करते है।

कांशीराम इन चम्मचों से सबसे ज्यादा आहत थे।

*5. चमचों के चम्मच*

ये राजनैतिक चम्मच अपनी जाति या समुदाय में पैठ दिखाने के लिए अपने चमचे बनाते है। जो शासक जातियों की पूरी सेवा करने के लिए तत्पर रहते है। शिक्षित-नौकरी पेशा वाले लोगो अपने निजी फायदे के लिए इन चम्मचों की चमचागिरी करते है।

*6.चमचे विदेशों में*

विदेश में रहने वाल अछूत जिन्हे लगता है कि भारत में चमचों की कमी है तो वे भारत आकर शासक जाति की चमचागीरी चालू करते है और अपने आपको आम्बेडकर समझने लगते है। जैसे ही दलित बहुजन आंदोलन गति पकड़ेगा वे पुनः खुले रूप में बाहर आ जायेगे।

उनकी यह किताब किसी भी दलित बहुजन को परिस्कृत करने के लिए काफी है।

आज हम जान सकते है कि किस प्रकार चमचों के कारण बसपा कमजोर हो गई।

*बहुजन आन्दोलन गद्दारों का आन्दोलन न बन पाये इसलिए भविष्य को ध्यान में रखकर उन्होने आगाह करने के लिए यह किताब लिखीं ।*

यह किताब अम्बेडकर आन्दोलन को एक कदम आगे ले जाने के लिए प्रेरित करती ।

*वे अम्बेडकर के शब्दो को मंत्रो की तरह रटने के लिए नही बल्कि उसका अंगीकार करने के लिए जोर देते। इस किताब में घटनाओं एवं तथ्यों का विशलेषण तथा व्याख्या महत्वपूर्ण।*

*कांशीराम को सभी जानते होगे, लेकिन समझ वही सकते है जिन्होने उनकी किताब चमचा युग पढ़ी होगी।*

आज भी उनकी किताब प्रासंगीक है ओर हमेशा रहेगी।

“मूर्तियाँ पूजने के बजाय मैं मानव पूजता हूँ”…कवी अर्जुन भिमराव सुर्वे

कवी अर्जुन भिमराव सुर्वे की कविता का भावार्थ:-dabholkar baudha

मूर्तियाँ पूजने के बजाय
मैं मानव पूजता हूँ
कृत्रिम देवों को न मानकर
मैं फूले-शाहू-आंबेडकर को पढ़ता हूँ
मैं छाती ठोंककर कहता हूँ
मैं झूठ त्यागकर, नास्तिक हूँ ।

पोथी-पुराण पढ़ने के बजाय
मैं शिवाजी को पड़ता हूँ
पत्थर के सामने क्यों झुकूँ
सावित्री, जिजाई, रमाई के
सामने झुकता  हूँ
मैं छाती ठोंककर कहता हूँ
मैं झूठ त्यागकर नास्तिक हूँ ।

मेहनत का कमाना
दान-पेटी में गंवाना
बामनों का घर मैं भरता नहीं
प्यासों को पानी,
भूखों को भोजन देता हूँ
मैं ऐसा देवता खोजता हूँ
मैं छाती ठोंक कर कहता हूँ
मैं झूठ त्यागकर नास्तिक हूँ ।

हिन्दू -मुस्लिम-सिख-ईसाई
पर गर्व करने की बजाय
मैं इंसान होने पर गर्व करता हूँ
धर्म में पाखंड जपने के बजाय
मैं मानवता को जपता हूँ
छाती ठोंककर कहता हूँ
मैं झूठ त्यागकर नास्तिक हूँ ।

कर्मशील मानव के आगे
मैं पत्थर को श्रेष्ठ नहीं मानता हूँ
मंत्र, होम-हवन, कर्मकांड
पांव के नीचे रख,
तर्क पर विश्वास रखता हूँ
छाती ठोंककर कहता हूँ
मैं झूठ त्यागकर नास्तिक हूँ ।

– कवी अर्जुन भिमराव सुर्वे

 

नोट:धार्मिक अन्धकार को बचाये रखने के लिए धार्मिक कट्टरपंथियों ने डॉ नरेंद्र दाभोळकर की हत्या कर दी थी