अगर आप दलित थे और अपने बौद्ध धम्म में लौट गए हैं, तो इस बात की दोगुना ज्यादा संभावना है कि आप ग्रेजुएट या टेक्निकल डिग्री से लैस हो पाएंगे. बौद्ध भारत के दूसरे सबसे शिक्षित लोग हैं…एम. ओबैद


20160902_160755अगर आप दलित थे और अपने बौद्ध धम्म में लौट गए हैं, तो इस बात की दोगुना ज्यादा संभावना है कि आप ग्रेजुएट या टेक्निकल डिग्री से लैस हो पाएंगे. बौद्ध भारत के दूसरे सबसे शिक्षित लोग हैं.बौद्ध धम्म में वापस लौटने वाले दलितों का हुआ विकास|
control on politics ambedkar हाल में जारी साल 2011 के जनगणना के शैक्षणिक आंकड़ों के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर की तुलना में बौद्ध धर्म के लोग ज्यादा पढ़े लिखे हैं। सभी धर्मों का औसत लें तो 5.6% लोग ग्रेजुएट हैं, जबकि बौद्ध ग्रेजुएट्स की संख्या 8.8 प्रतिशत है। सिर्फ जैनियों का आंकड़ा बौद्धों से बेहतर है। दलितों में ग्रेजुएट की संख्या सिर्फ 4 फीसदी है। देखें रिपोर्ट.

बात सिर्फ संख्या की नहीं है। 2001 से 2011 की जनगणना के बीच जहां हिंदू धर्म में ग्रेजुएट्स की संख्या में सिर्फ 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, वहीं बौद्ध ग्रेजुएट्स की संख्या 74% बढ़ गई। जाहिर है कि आने वाले दिनों में बौद्ध ग्रेजुएट्स की संख्या और तेजी से बढ़ेगी।

माना जा सकता है कि बौद्ध धर्म के लोगों ने बाबा साहेब भीम राव आंबेडकर के “एजुकेट” यानी शिक्षित बनो के फार्मूले को अपना लिया है। साल 2011 की जनगणना के अनुसार अनुसूचित समुदाय की आबादी देश की आबादी का 16.6 प्रतिशत है। बाबा साहेब ने 1956 में बौद्ध धर्म अपनाया था। भारत में ज्यादातर बौद्ध पहले दलित थे।

भारत में बौद्धों की आबादी सिर्फ 0.8 फीसदी है। देखें जनगणना के आंकड़े.

बौद्धों की इस शैक्षणिक प्रगति की छाया बाकी दलितों पर नहीं पड़ी है और वे आज भी तमाम तरह के उत्पीड़न के शिकार बने हुए हैं।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबरों के अनुसार इस वर्ष के अनुसूचित जाति आयोग के वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक यह पाया गया है कि करीब-करीब सभी राज्य अपने बजट में अनुसूचित समुदाय को दिए गए वचन में असफल रहे हैं। आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2012-13 के बजट में ‘एससी-स्पेसिफिक’ के मद में खर्च करने के लिए जितने फंड 26 राज्यों को दिए गए उसमें मामूली खर्च किया गया। इस वर्ष आवंटित बजट का केवल 12 प्रतिशत ही इन राज्यों द्वारा किया गया।

ज्ञात हो कि दलित समाज से संबंध रखने वाले बीआर अंबेडकर ने सामाजिक कुप्रथा से तंग आकर बौद्ध धर्म स्वीकार किया था जहां सभी लोगों को समानता का अधिकार प्राप्त है। अंबेडकर के आह्वान पर दलित समुदाय के लोगों ने अपनी प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए बौद्ध धर्म को स्वीकार करना शुरु किया। दलित समाज के लोगों को प्राचीन काल से ही दबाया गया। उच्च जाति के लोगों के बीच इन्हें हमेशा हीन भावना से देखा जाता था और इन्हें समानता का स्तर कभी नहीं दिया गया। धीरे-धीरे ये खुद को निम्न स्तरीय समझने लगे और उच्च जाति के लोग इनका लाभ उठाते रहे। इन्हें हमेशा शिक्षा से दूर रखा जाने लगा और इनसे निम्न स्तरीय काम करवाए जाने लगे। इससे वे मानसिक जकड़न का शिकार हो गए। आर्थिक स्थिति खराब होने के चलते इनका ध्यान उच्च शिक्षा की ओर नहीं जाता। इससे समाज में उनकी स्थिति निम्न बनी हुई है। आज भी प्रोफेशनल कोर्स जैसे मेडिकल, इंजीनिरिंग में बच्चों का दाखिला कराने के लिए अभिभावकों को सोचना पड़ता है। सभ्य समाज के मुंह पर यह एक तमाचा है। यह मानव जीवन की सबसे बड़ी और दुखद त्रासदी है।

दलित अत्याचार के खिलाफ समय-समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों ने आंदोलन तो किया है लेकिन इसमें कुछ ज्यादा परिवर्तन देखने को नहीं मिला। समाज की इस कुप्रथा को समाप्त करने के लिए समाज के सभी वर्गों, सरकार, राजनीतिक दलों को इच्छाशक्ति से काम करने की आवश्यकता है।

बौद्ध धर्म स्वीकार करने वाले दलितों का हुआ विकास

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