बुद्ध काल में अर्थव्यवस्था और समाज,Economy and Society During Buddha Period && बौद्धकालीन भारत India During the Buddha


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बुद्ध काल में अर्थव्यवस्था और समाज Economy and Society During Buddha Period

अर्थव्यवस्था

700 ई.पू. के आस-पास उत्तर प्रदेश एवं बिहार की जनता की स्थिति में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। पाणिनी की अष्टध्यायी और सुतनिपात के अनुसार, खेत की दो या तीन बार जुताई होती थी। धान की रोपाई और लोहे के उपकरणों के ज्ञान ने कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया। चावल उत्पादक मध्य गंगा घाटी में, गेहूँ उत्पादक ऊपरी गंगा घाटी की तुलना में अधिक उत्पादन होता था। उत्पादन अधिशेष से जनसंख्या वृद्धि संभव हुई। इसके अतिरिक्त उत्पादन में यज्ञ पर खर्च करने की प्रवृत्ति कम हो गई। सांख्यान गृह सूत्र में बैल द्वारा खेती करने, हल चलाने एवं मंत्रों के साथ समस्त कृषि प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का उल्लेख है। पाणिनी के समय खेतों का सर्वेक्षण करने वाले अधिकारी को क्षेत्रकार कहा जाता था। बौधायन के अनुसार, छ: निवर्तन भूमि की उपज से एक परिवार का भरण-पोषण होता था। अत: इससे ज्ञात होता है कि भूमि-माप की इकाई निवर्तन कहलाती थी और एक निवर्तन डेढ़ एकड़ के बराबर होती थी।

फसल- सूत्र ग्रंथों में दो प्रकार के जौ- यव और यवानी, पाँच प्रकार के चावलों (कृष्ण ब्रिही, महाब्रीही, हायन, यवक और पष्टिक) का उल्लेख है। बौद्ध ग्रन्थों में ईख की खेती की चर्चा की गई है। प्राचीन बौद्ध एवं जैन साहित्य में शलिल (चावल) के 4 किस्मों की चर्चा की गई है (रक्त शलि, कालम शलि, गंधशलि, महाशलि)। प्राचीन बौद्ध साहित्य में खेत पति, खेत स्वामी या वथूपति की चर्चा की गई है। इसका अर्थ है-भूमि के अलग-अलग स्वामी होते थे। इससे यह संकेत मिलता है, भू व्यक्तिगत स्वामित्व की भावना विकसित हो। चुकी थी। कृषि में भी बड़े-बड़े फामों का विकास हुआ। माना जाता है कि 500 हलों से खेती की जाती थी। अब बौद्ध ग्रंथों के अनुसार कृषि में दासों, कर्मकारों एवं पस्सों को लगाया जाता था।

गृहपति- वैदिक युग में याजक (यज्ञ करने वाला) और पशुचारक थे किन्तु छठी सदी ई.पू. में वे पहली बार विशाल पितृसत्तात्मक परिवार का मुखिया बन गए। उन्हें धन के कारण सम्मान प्राप्त हुआ। गृहपति मेंडक राज्य की सेना को वेतन देता था और बुद्ध संघ की सेवा के लिए उसने 1250 गौ सेवकों को नियुक्त किया था। उसी तरह अनाथपिंडक संपन्न गृहपति था।

शिल्प- इस काल में राजगृह में 18 प्रकार के शिल्पों की चर्चा की गयी है। शिल्पों का केवल विशिष्टीकरण हुआ शिल्पों का क्षेत्रीयकारण भी हुआ। वैशाली के सदलपट में कुंभकार की 500 दुकाने थीं। जिलाहों की भी अलग-अलग बस्तियां थीं जुलाहों का वार्ड तंतु बायधान कहलाता था। हठी दांत का काम करने वाले दंतकारवीथि कहलाते थे। रंगरेजों का कार्य करने वाले रंगरेजकार विथि कहलाते थे। यह काल उत्तरी काले पॉलिशदार मृदभांड चरण से जुड़ा हुआ था। इसी काल में 300 ई.पू. के आस-पास घेरेदार कुएं एवं पक्के ईंटों का प्रयोग होने लगा। धातु के आहत सिक्के का प्रथम प्रयोग 500 ई.पू. के आस-पास हुआ। आरंभ में आहत सिक्के चांदी के बनाये जाते थे किन्तु तांबे के भी होते थे। पंचमार्क सिक्के में धातु के टुकड़ों पर हाथी, मछली, सांड, अर्द्धचद्र की आकृतियाँ बनाई जाती थीं। ये पूर्वी उत्तर प्रदेश, मगध और तक्षशिला में विशेष रूप से पाए गए हैं। कुछ अन्य सिक्कों की भी चर्चा हुई है यथा कर्षापण, पाद, माशक, काकणिक, सुर्वण (निष्क)। बिम्बिसार और अजातशत्रु के काल में राजगृह में पाँच मास एक पाद के बराबर होता था। पाणिनी के काल में निम्नलिखित सिक्के चलते थे-निष्क, पण, पाद, मास, शान (तांबा का एक सिक्का)।

व्यवसायिक संगठन- श्रेणियों के पदाधिकारियों को चौधरी (प्रमुख) और जेठक (ज्येष्ठक) और भाण्डागारिक कहा जाता था। बिना श्रेणियों के संगठित उद्योगों का संचालन ज्येष्ठक करते थे। व्यापार प्रमुख या मुखिया ‘महासेठी’ कहलाता था। कारवाँ (व्यापारियों का काफिला) सितारों और कौए की सहायता से थलनिय्याम के नेतृत्व में चलता था। बुद्ध काल में आर्थिक संघों को बहुत स्वायत्तता प्राप्त थी। वे वस्तुओं के मूल्य निश्चित करते थे। निजी सदस्यों पर गहरी पकड़ थी और इसके लिए उन्हें राज्य की ओर से भी मान्यता प्रदान की गई थी। वे भ्रष्ट सदस्यों का निष्कासन कर सकते थे। किसी भी स्त्री को बौद्ध संघ की सदस्यता के लिए, अपने पति के अतिरिक्त पति के संघ की अनुमति भी लेनी पड़ती थी। प्रारंभिक धर्म सूत्रों में ऋणों पर ब्याज 1¼ प्रतिशत प्रतिमास (15 प्रतिशत वार्षिक) था। वाणिज्य व्यापार विकसित अवस्था में था। एक मार्ग ताम्रलिप्ति से पाटलिपुत्र एवं श्रावस्ती के माध्यम से उज्जैन होते हुए भड़ौंच से जुड़ता था। दूसरा मार्ग मथुरा-राजस्थान-तक्षशिला से जुड़ा था। व्यापार की वृद्धि के लिए पांडय सिद्धि संस्कार किया जाता था। इसमें सोम की पूजा की जाती थी।

नगरों का विकास- बुद्ध काल को द्वितीय नगरीकरण का काल भी कहा जाता है। प्रथम नगरीकरण सिन्धु घाटी सभ्यता के दौरान हुआ था। तैतरीय अरण्यक में पहली बार नगर की चर्चा की गई है। उस काल में कुल 60 नगर थे जिनमें श्रावस्ती जैसे 20 नगर थे। बुद्ध काल में 6 बड़े नगर या महानगर थे यथा, राजगृह, चंपा, काशी, श्रावस्ती, साकेत, कौशांबी।

समाज

इस कल की सामाजिक जानकारी हमें ब्राह्मण साहित्यों से मिलती है। उपनिषदों के पश्चात् ब्राहमण साहित्य का एक बड़ा भाग सूत्र के रूप में लिखा गया। सूत्र साहित्य की रचना बौद्ध धर्म के प्रचार का मुकाबला करने के लिए हुआ था। सूत्र साहित्य में कल्प सूत्र का विशेष महत्त्व है। कल्प सूत्र तीन भागों में विभाजित है- स्रौत सूत्र, गह्य सूत्र और धर्म सूत्र। आगे सूत्रों की ही भांति स्मृतियों में भी सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था का प्रतिपादन हुआ। फिर भी दोनों में अन्तर है। सूत्र साहित्य गद्य और पद्य दोनों में है जबकि स्मृति साहित्य केवल पद्य में है। सूत्र और स्मृति साहित्य मिलकर शास्त्र कहे जाते हैं। गौतम धर्मसूत्र सबसे प्राचीन माना जाता है। प्रारंभ में गौतम, बौधायन, वशिष्ठ एवं अपास्तम्ब के धर्मसूत्र लिखे गए। गौतम एवं वशिष्ठ उत्तर भारत के हैं जबकि बौधायन एवं अपास्तम्ब दक्षिण भारत के। कतिपय मुद्दों पर इन सूत्रकारों के बीच भी मतभेद है। उदाहरण के लिए गौतम एंव बौधायन आठ प्रकार के विवाहों की चर्चा करता है जबकि अपास्तम्ब के सूत्र केवल छ: प्रकार के विवाहों का जिक्र करते है। उसी तरह बौधायन उत्तराधिकार में बड़ा पुत्र को एक बडे अंग दिया जाने का हिमायत करता है जबकि अपास्तम्ब इस तथ्य को स्वीकार नहीं करता है। इसी प्रकार गौतम ब्राह्मण को विशिष्ट स्थिति में ब्याज पर धन देने का अधिकार देता है अर्थात् अगर वह किसी मध्यस्थ के माध्यम से किया जाय। फिर वह ब्राह्मण को कृषि एंव वाणिज्य व्यापार करने का अधिकार देता है। दूसरी तरफ बौधायन महत्वपूर्ण गतिविधि समुद्र-यात्रा की निन्दा करता है तथा उसें अधर्म करार देता है। इस काल में वर्ण व्यवस्था का जन्म हो गया। समाज का कबिलाई ढाँचा टूट गया और सूत्र साहित्य के द्वारा जाति पर आधारित समाज को नियमबद्ध करने की कोशिश की गई।

ब्राह्मण- यज्ञ की प्रतिष्ठा के साथ समाज में ब्राह्मणों का दर्जा सर्वश्रेष्ठ हो गया। महात्मा बुद्ध ने ब्राह्मणों को 5 वर्गों में विभाजित किया है-

  1. ब्रह्म समां (ब्रह्मा के समान)
  2. देव समां (देवताओं के समान)
  3. मर्यादा- (जो अपने जातीय गौरव का पालन कर रहा हो)
  4. सभिन्न मर्यादा- (जो अपनी जातीय मर्यादा से च्युत हो चुका है)
  5. ब्राह्मण चण्डाल- वह ब्राह्मण जो चाण्डाल के समान हो।

राजा अन्य वर्णों का शासक था परन्तु ब्राह्मण वर्ग का नहीं। ब्राह्मणों को किसी प्रकार का शारीरिक दंड नहीं दिया जाता था और वे कर से भी मुक्त होते थे। एक ही अपराध के लिए चारों वर्णों को अलग-अलग सजाएँ निर्धारित की गयी थीं। ब्राह्मणों को सबसे कम एवं शूद्रों को सबसे अधिक सजा मिलती थी। उसी तरह ब्याज की राशि भी अलग-अलग लगती थी। क्षत्रिय वर्ण की प्रतिष्ठा अब इसलिए बढ़ गई थी कि अब लोहे के उपकरण युद्धास्त्रों के रूप में प्रयुक्त होने लगे थे। उसी तरह कृषि उपकरण और उत्पादन में विकास से वैश्य वर्ण की आर्थिक क्षमता भी बढ़ गई और बड़े-बड़े गृहपति अस्तित्व में आए।

शूद्र की स्थिति- गौतम ने शूद्र को अनार्य कहा है। पाणिनी ने शूद्रों को दो वर्गों में विभाजित किया है, (1) अनिर्वासित (अवहिष्कृत) और (2) निर्वासित (बहिष्कृत)। ब्राह्मण शूद्रों का स्पर्श किया हुआ भोजन नहीं करते थे। द्विजों शूद्रों के साथ भोजन और विवाह निषिद्ध था। किन्तु ऐतिहासिक स्रोतों से चलता है कि शूद्रों को इस काल में अंत्येष्टी में अग्नि में आहुति देने का अधिकार था। सांख्यान स्रौत सूत्र के अनुसार, शूद्र भी ओदन एवं महाव्रत नामक संस्कार में तीन अन्य वर्णों के साथ भाग ले सकता था। अनुलोम एवं प्रतिलोम विवाह के आधार पर जाति का निर्धारण सबसे पहले बौधायन ने किया। प्रारंभिक बौद्ध ग्रन्थों में हीनसीप्प शब्द का (निम्न जातियों के लिए) प्रयोग हुआ है। इनमें प्राय: 5 हीन जातियों का उल्लेख हुआ है- चांडाल, निषाद, वेण, रथकार, पुक्कुस। बुद्ध और महावीर जन्म से जाति के समर्थक नहीं थे बल्कि कर्म पर आधारित जाति व्यवस्था के पक्षपाती थे। जैन ग्रन्थ पन्नवणा में देश, जाति, कुल, कर्म, भाषा और शिल्प के आधार पर 5 प्रकार के आर्य बताए गए हैं।

परिवार- परिवार के मुखिया के अधिकारों में वृद्धि हुई। वह अपने पुत्र को संपत्ति के अधिकार से वंचित कर सकता था। सूत्र साहित्य में पिता के द्वारा पुत्र को दे देने या बेच देने का संकेत है।

स्त्रियों की स्थिति- अविवाहित कन्या के लिए पाणिनी ने कुमार शब्द का प्रयोग किया है। जिस समय वह विवाह योग्य हो जाती थी, उस समय उसे वर्या कहा जाता है। अपनी इच्छा से पति चुनने वाली कन्या को पतिव्रा कहा जाता था। सामान्यत: स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आयी। दहेज व्यवस्था का प्रचलन शुरू हुआ। स्त्रियाँ पुरुषों के अधीन कर दी गई। उत्तराधिकार में भी उनके साथ भेदभाव बरता जाने लगा। आपस्तम्ब ने उसी दशा में पुत्री को पिता की संपत्ति का उत्तराधिकारी माना है जब उनका कोई सपिंड उत्तराधिकारी नहीं है। पहली बार सती प्रथा का साहित्यिक साक्ष्य प्राप्त होता है जब एक ग्रीक लेखक ने उत्तर-पश्चिम में इस प्रथा की चर्चा की है, दूसरी ओर महाभारत में पांडव की पत्नी माद्री के सहगमन की चर्चा है।

दास व्यवस्था- इस काल में दास व्यवस्था प्रचलित थी। विनय पिटक में तीन प्रकार के दासों की चर्चा की गई है- 1. घर में दासी से उत्पन्न, 2. युद्ध में बंदी किया हुआ, 3. धन से खरीदा हुआ। दीर्घनिकाय में चौथे प्रकार के दास (स्वेच्छा से दास बनने) की चर्चा की गई है।

ईरानी आक्रमण

ईरानी शासक साइरस (558-530 ई.पू.) भारत की ओर बढ़ा और उसने हिन्दुकुश पर्वतमाला तक अपना विस्तार किया, यद्यपि भारत जीतने में उसे सफलता नहीं मिली। उसका उत्तराधिकारी डेरियस प्रथम था। उसने कबोज, पश्चिमी गांधार और सिंधु क्षेत्र पर विजय प्राप्त की। हेरोडोटस का कहना है कि ईरानी शासक को भारतीय साम्राज्य से 360 स्वर्ण मुद्राएँ (जो युद्ध के पूर्व के दो लाख 90 हजार पौंड के बराबर होते थे) प्राप्त हुई। इसका उत्तराधिकारी जरक्सीज या क्षयार्ष था। उसने भी भारत के एक क्षेत्र पर अधिकार बनाये रखा और भारतीयों को सेना में नियुक्त किया।

सिकन्दर का आक्रमण

सिकन्दर ने (327-326 ई.पू.) भारत पर आक्रमण किया। सिकन्दर ने सबसे पहले अस्पोसिओई (अश्वजाति) नामक राज्य को जीता। फिर सिकन्दर ने निसा (Nysa राज्य) को जीता। तत्पश्चात् उसने अश्वक को जीता। तक्षशिला के शासक राजा आंभीक ने समर्पण कर दिया और उसे मदद देना स्वीकार किया। अभिसार के शासक ने भी उसके सामने आत्मसमर्पण कर दिया। फिर पोरस से उसकी मुठभेड़ हुई जिसमें पोरस की हार हुई। सिकन्दर ने दो नगर बूकेफेला बसाये। पहला नगर उसने अपने घोड़े की स्मृति तथा दूसरा नगर निकाई नामक पोरस पर विजय की स्मृति में बसाया। चेनाब एवं रावी के बीच उसने ग्लानिकोई और छोटे पोरस के राज्य को जीता। उसके बाद उसने संगल राज्य की ध्वस्त किया। व्यास नदी के आगे उसकी सेना ने बढ़ने से इंकार कर गई। सिकंदर वहीँ से वापस लौट गया। लौटते हुए उसने कुछ राज्यों पर विजय भी पायी। वह सिबोई, उग्रसेनी, मालव, क्षुद्रक, अम्बष्ठ, कठ और मूसिकनोई को जीतते हुए लौटा। लौटते हुए 323 ई.पू. में बेबीलोन में उसकी मृत्यु हो गई।

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बौद्धकालीन भारत India During the Buddha

भारतीय इतिहास में बुद्ध का आगमन एक क्रान्तिकारी घटना है। उनका जन्म छठी शताब्दी ई.पू. में हुआ था। भारतीय इतिहास में यह कालबुद्ध युग के नाम से विख्यात है। 600 ई.पू. से लेकर 400 ई.पू. तक का काल-खण्ड भारतीय इतिहास का महत्त्वपूर्ण काल-खण्ड है। इस काल-खण्ड में भारत के इतिहास-गगन पर युग प्रवर्त्तनकारी घटनाएँ घटित हुई। इन घटनाओं ने भारत के राजनैतिक एवं धार्मिक जीवन को नए आयाम दिए। राजनैतिक दृष्टि से इस काल-खण्ड में सशक्त केन्द्रीय राजनैतिक शक्ति का अभाव था और समस्त देश छोटे-बड़े अनेक राज्यों में विभक्त था। इन राज्यों में षोडस महाजनपद (सोलह महाजनपद) सुविख्यात हैं। अंग, मगध, काशी, कोशल, वज्जि, मल्ल, चेदी, वत्स, कुरू, पांचाल, मत्स्य, सूरसेन, अस्सक, अवन्ति कम्बोज तथा गान्धार, ये सोलह महाजनपद थे। इन महाजनपदों में कुछ में राजतंत्रात्मक व्यवस्था थी तो कुछ में प्रजातंत्रात्मक। राजनैतिक एकता के अभाव में ये महाजन पद आपस में लड़ते रहते थे और शक्तिशाली महाजनपद अशक्त राज्यों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लेता था। इन महाजनपदों के अतिरिक्त दस गणराज्य थे। ये इस प्रकार थे-कपिल वस्तु के शाक्य, अल्लकय बुली, केसपुत्र के कालाम, रामग्राम के कोलिय, सुसभागिरि के भाग, पावा के भल्ल, कुशी नारा के मल्ल, यिप्पलिवन के मोरिय, मिथिला के विदेइ तथा वैशाली के लिच्छवि।

यह काल-खण्ड धार्मिक दृष्टि से भारत के दो प्रभावकारी धर्मों के अभ्युदय का युग है। ये धर्म हैं- जैन धर्म और बौद्ध धर्म। ये दोनों धर्म पारम्परिक वैदिक धर्म की मान्यताओं यथा कर्मकाण्ड यज्ञ आदि के विरुद्ध थे। जैन धर्म के प्रवर्त्तक ऋषभदेव थे जो प्रथम तीर्थंकर थे। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं जिन्होंने जैन धर्म का प्रचार प्रसार किया। बौद्ध धर्म के प्रवर्त्तक महान गौतम बुद्ध थे जिनके व्यक्तित्व और कृतित्व का न केवल भारतवासियों पर प्रभाव पड़ा प्रत्युत भारत के बाहर भी उसका व्यापक प्रसार हुआ। आज भी भारत के बाहर अनेक देशों यथा चीन, तिब्बत, कोरिया, श्रीलंका, जापान आदि देशों में इस महान् विभूति के समर्थकों और अनुयायियों की विशाल जनसंख्या है। आज भी भारत में गौतम बुद्ध के जन्म और जीवन से जुड़े अनेक पवित्र कोटि-कोटि भारतीयों और श्रद्धालुओं की आस्था के पावन स्थल के रूप में प्रतिष्ठापित है।

विस्तार

वैदिक युग के जन पहले जनपद और फिर अब महाजनपद के रूप में विकसित हो गए। महाजनपदों का विस्तार उ.भारत में पाकिस्तान और दक्षिण में गोदावरी तक हुआ। 15 महाजनपद नर्मदा से उत्तर में है जबकि एक अश्मक, नर्मदा नदी के दक्षिण में स्थित है। बौद्ध ग्रन्थ अगुत्तरनिकाय एवं महावस्तु तथा जैन ग्रन्थ भगवती सूत्र से 16 महाजनपदों के बारे में सूचना मिलती है। उसी तरह भगवती सूत्र में बंग एवं मलय महाजनपद की चर्चा की गयी है। अंगुत्तर निकाय में 16 महाजनपदों का उल्लेख मिलता है। सबसे अधिक जनपद गंगा घाटी में देखे जा सकते हैं।

अंग- इसकी राजधानी चम्पा थी। यह आधुनिक भागलपुर के निकट था। मगध के शासक बिम्बिसार ने यहाँ के शासक ब्रह्मदत को पराजित कर मगध साम्राज्य में मिला लिया।

अवन्ति- पश्चिम भारत में यह मालवा एवं मध्य प्रदेश में स्थित था। उत्तरी अवन्ति की राजधानी उज्जैन एवं दक्षिण अवन्ति की राजधानी महिष्मति थी। गौतम बुद्ध के समय अवन्ति का शासक चण्डप्रद्योत था। मगध सम्राट् शिशुनाग ने अवन्ति को मिला लिया।

अशमक- यह गोदावरी नदी के किनारे स्थित था। इसकी राजधानी पतिन या पोतना थी। संभवत: अवन्ति ने इसे अपने राज्य में मिला लिया।

चेदि- यह यमुना नदी के किनारे स्थित था। इसकी राजधानी सोत्थिवती थी। महाभारत में इस नगर का नाम शक्तिमती या शुल्डि-साह्य भी आया है। छठी शताब्दी के मध्य में गंधम् के सिंहासन पर राजा पुक्कुसाति आसीन था। इसका सबसे महत्त्वपूर्ण राजा शिशुपाल था, जिसकी चर्चा महाभारत में हुई है।

गांधार- इसके अन्तर्गत पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान का भाग आता था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी। यह विद्या एवं व्यापार का महत्त्वपूर्ण केन्द्र था। प्रो. हेमचंद्र राय चौधरी के अनुसार, छठी सदी ई.पू. उत्तरार्ध में गांधार पर फारस (इरान) का अधिकार हो गया।

काशी- इसकी राजधानी वाराणसी थी। प्रारंभ में यह एक शक्तिशाली राज्य था। छठी सदी ई.पू. में काशी सम्भवत: सर्वाधिक शक्तिशाली था। अनेक जातकों में वाराणसी को भारतवर्ष के प्रमुख नगरों में माना गया है। सोननन्द जातक के अनुसार, काशी के राजा मनोज ने कोशल, मगध और अंग राज्य के राजाओं को अपने अधीन कर लिया था। काशी की महिमा-गरिमा के कारण पड़ोसी राज्य काशी पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील रहते थे। डॉ. हेमचन्द्र राय चौधरी ने काशी की तुलना प्राचीन बेबीलोन तथा मध्यकालीन सेन से की है। कालान्तर में काशी कोशल के साम्राज्यवाद का शिकार हो गया। जैन तीर्थकर पाश्र्वनाथ के पिता अश्वसेन काशी के राजा थे।

कोशल- कोशल राज्य के पश्चिम में गोमती, दक्षिण में रुचिका या स्यन्दिका अर्थात् यह नदी, पूर्व में विदेह से कोशल को अलग करने वाली सदा नीरा तथा उत्तर में नेपाल की पहाड़ियाँ थीं। सरयू नदी इसे दो भागों में विभाजित करती थी। उ. कोशल की आरंभिक राजधानी श्रावस्ती थी। बाद में वह साकेत या अयोध्या हो गई। द. कोशल की राजधानी कुशावती थी। प्रसेनजित और विदुधान के प्रयास से कोशल राज्य का विस्तार हुआ। काशी, मल्ल और शाक्य को कोशल के साम्राज्यवाद का शिकार होना पड़ा। अजातशत्रु ने कोशल को मगध साम्राज्य में मिला लिया।

कुरु- यह दिल्ली-मेरठ क्षेत्र में विस्तृत था। इसकी राजधानी इन्द्रप्रस्थ थी। सूतसोम जातक के अनुसार, कुरू राज्य का विस्तार 900 मी. था। पालि ग्रंथों के अनुसार, इस राज्य पर युधिष्ठिला-वंश (युधिष्टिर के वंश) के राजा राज्य करते थे। आधुनिक दिल्ली के पास इन्द्रपत्त या इन्द्रपत्तन (इन्द्रपत या इन्द्रप्रस्था) कुरु की राजधानी थी।

कम्बोज- यह पश्चिमी सीमा का दूसरा महत्त्वपूर्ण राज्य था। इसकी राजधानी हाटक या राजपुर थी। इसके दो महत्त्वपूर्ण शासक चन्द्रवर्धन और सुदक्षिण थे। विविध शिलालेखों में कम्बोज तथा गान्धार को एक-दूसरे से सम्बद्ध कहा गया है। गान्धार की भाँति कम्बोज भी सुदूर उत्तरापथ का राज्य था। महाभारत में कम्बोजों को राजपुर नामक स्थान से सम्बन्धित कहा गया है। महाभारत में उल्लिखित राजपुर नामक स्थान पुंछ के दक्षिण-पूर्व में था। कम्बोज ब्राह्मण विधा का सुविख्यात केन्द्र था।

मगध- आधुनिक पटना, गया एवं शाहाबाद का क्षेत्र इस राज्य में शामिल था। इसकी प्राचीन राजधानी गिरिव्रज (या राजग्रह) थी। मगध शब्द का उल्लेख सर्वप्रथम अथर्ववेद में आया है। मगध की गाथाओं की प्राचीनता के विषय में कहा गया कि यह उतनी ही प्राचीन हैं जितनी की यजुर्वेद। बाद में इसकी राजधानी पाटलिपुत्र हो गई। पुराणों के अनुसार इस वंश का प्रथम शासक शिशुनाग था। किन्तु बौद्ध लेखक इसकी वंशावली हर्यक वंश के प्रथम शासक बिम्बिसार से प्रारंभ करते हैं। उसका शासन काल 544 ई.पू. से 492 ई.पू. था। इसका वृज्जि (लिच्छवि) कोशल एवं मद्र क्षेत्रों से वैवाहिक संबंध था। वैवाहिक संबंध के बदले कोशल से इसे काशी का गाँव प्राप्त हुआ, जिसका राजस्व एक लाख सिक्के वार्षिक था। इससे संकेत मिलता है कि उस समय भू-राजस्व का आकलन मुद्रा में होने लगा था। बिम्बिसार ने अंग के शासक ब्रह्मदत को पराजित करके अंग को मगध साम्राज्य में मिला लिया। बिम्बिसार ने 80 हजार ग्राम भोजकों की एक सभा बुलाई। मगध के पुनर्गठन का श्रेय भी बिम्बिसार को दिया जाता है। शासन कार्य में राजा की सहायता के लिए बहुत-से महामात्र होते थे। इनकी तीन श्रेणियाँ होती थीं- (i) सब्बधक (सामान्य मामलों का कर्ता-धर्ता), (ii) सेनानायक महामत्त, (iii) वोहारिक महामत्त (न्यायाधीश वर्ग)। राज्य के सामान्य प्रशासन के पदाधिकारियों को सत्वात्थक कहा जाता है गांधार के शासक पुष्कासीरिन से इसके राजनयिक संबंध थे। अवन्ति के शासक चन्द्रप्रद्योत महासेन की चिकित्सा के लिए उसने अपने राजवैद्य जीवक को भेजा। इसने मगध साम्राज्य की राजधानी गिरिव्रज की स्थापना की। उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसकी हत्या कर दी। बिम्बिसार श्रेणिक के नाम से जाना जाता था। उसका उत्तराधिकारी अजातशत्रु (492 ई.पू.-460 ई.पू.) हुआ।

अजातशत्रु कुणिक के नाम से जाना जाता था। उसने अपने पिता की साम्राज्यवादी नीति को आगे बढ़ाया। उसने कोशल को पराजित किया और प्रसेनजित की पुत्री वजीरा से शादी की। माना जाता है कि उसने वृज्जि संघ की शक्ति को तोड़ दिया। अपने मंत्री सुनीध एवं वर्षाकार की मदद से वह वज्जि संघ में फूट डलवाने में सफल रहा और फिर उसने इस संघ को समाप्त कर दिया। भगवती सूत्र के अनुसार, अजातशत्रु ने 9 लिच्छवियों, 9 मल्लों तथा काशी कोशल के 18 गणराज्यों के संघ को परास्त किया। पुराणों के अनुसार, अजातशत्रु का निकटतम उत्तराधिकारी दर्शक था। किन्तु जैन एवं बौद्ध लेखक उदयन को उसका उत्तराधिकारी मानते हैं। उदयन को यह श्रेय दिया जाता है कि उसने कुसुमपुर या पाटलिपुत्र की नींव डाली।

मल्ल- मल्ल प्रदेश दो भागों में विभक्त था। एक की राजधानी कुशीनरा थी। तथा दूसरे की पावा। मल्ल में राजतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था थी तथा इक्ष्वाकु और महासुदासन यहाँ के प्रसिद्ध सम्राट् थे। बाद में यहाँ गणतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था स्थापित हुई। अजातशत्रु ने मल्ल को अपने राज्य में मिला लिया था।

मत्स्य- यह भरतपुर, जयपुर एवं अलवर क्षेत्र में विस्तृत था। इसकी राजधानी विराटनगर थी। मत्स्य को चेदि के द्वारा मिला लिया गया।

पांचाल- यह प. उत्तर प्रदेश में स्थित था। इसकी राजधानी अहिच्छत्र और कांपिल्य थी।

सूरसेन- यह मथुरा प्रदेश में स्थित था। इसके शासक यदु या यादव कहलाते थे।

वृज्जि- वज्जि संघ में आठ गणराज्य शामिल थे। इसमें वज्जि, विदेह और लिच्छवि प्रमुख थे।

वत्स- इसकी राजधानी कौशांबी थी। माना जाता है कि कुरु वंशज ने एक बाढ़ के कारण हस्तिनापुर को छोड़ दिया और उन्होंने नये जनपद वत्स को जन्म दिया।

शिशुनागवंश- बौद्ध साहित्य के अनुसार राजा नागदार्शक को नागरिकों के द्वारा निष्कासित कर दिया गया। फिर नागरिकों ने एक सभा बुलाई और शिशुनाग को शासक नियुक्त किया। शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक हुआ। उसके बाद उसके दस पुत्र राजा हुए। इनमें नवम् नन्दिवर्धन एवं दशम पंचमक थे। शिशुनाग ने अवन्ति को मगध में मिला लिया। शिशुनाग का उत्तराधिकारी कालाशोक या काकवर्णन था। कालाशोक के विषय में कहा जाता है कि उसने पाटलिपुत्र के अतिरिक्त वैशाली को भी अपनी राजधानी बनाई थी।

नंद वंश- नंद वंश की स्थापना उग्रसेन या महापद्मनंद ने की। पुराण उसे शिशुनाग वंश का अंतिम राजा महानन्दिन का पुत्र और शूद्र स्त्री से उत्पन्न बताता है। दूसरी तरफ जैन लेखक उसे एक नाई और वेश्या का पुत्र बताते हैं। पुराणों में उसे सर्व क्षत्रातंक की उपाधि दी गई है। कलिंग के शासक खारवेल के हाथी गुफा अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि उसने कलिंग के कुछ क्षेत्रों पर अपना आधिपत्य स्थापित किया। उसके राज्य के अंतर्गत पंजाब से संपूर्ण उत्तरी भारत, मालवा मध्य प्रदेश तथा गोदावरी नदी तक का इलाका आ गया। प्रथम नंद के लगभग आठ उत्तराधिकारी माने जाते हैं। धनानंद इस वंश का अंतिम शासक था। इसे ग्रीक लेखक अग्रमीज कहते हैं।

अराजक गणतंत्र

बुद्ध कालीन पाली ग्रन्थों के अध्ययन से यह पता चलता है कि उस समय कुछ गणतंत्र भी थे-

  1. कपिलवस्तु के शाक्य।
  2. सुसुभारगिरि के भग्ग या भर्ग।
  3. अलकप्प के बुली।
  4. केसपुत्त के कलाम-बुद्ध के गुरु अलार कलाम इसी से संबंद्ध थे।
  5. रामगाम का कोलिय- ये शाक्यों से पूरब की ओर बसे हुए थे और दोनों की सीमा रोहिणी नदी थी। शाक्यों एवं कोलिय के बीच विवाद भी हुआ करते थे। इसी प्रकार के एक झगड़े को महात्मा बुद्ध ने निपटाया था।
  6. पावा के मल्ल।
  7. कुशीनारा के मल्ल आधुनिक कसिया जिला में बसे थे। यह इस बात से भी प्रमाणित होता है कि वहाँ एक छोटे मंदिर में बुद्ध की परिनिर्वाण मुद्रा में मूर्ति मिली है।
  8. पिप्पलिवन के मोरिय।
  9. मिथिला के विदेह-पहले यह राजतंत्रात्मक राज्य था, किन्तु अब यह एक गणतंत्र हो चुका था।
  10. वैशाली के लिच्छवि।

राजनैतिक अवस्था और प्रशासन इस काल में राजत्व के सिद्धान्त में भी बहुत से परिवर्तन हुए। इस काल में जनपद का स्थान महाजनपद ले रहा था तथा राज्य के अंतर्गत बहुत-सी गैर आर्य जनजातियाँ भी शामिल हो रही थीं। अब कर का भुगतान करने वाले नये आर्थिक समूहों का निर्माण हो रहा था। अत: करारोपण प्रणाली नियमित हो गई एवं बलि, शुल्क और भाग नामक कर पूरी तरह स्थापित हो गए। राजा की शक्ति में वृद्धि हुई, क्योंकि स्थायी सेना एवं रक्त संबंध से पृथक नौकरशाही की स्थापना हुई। इस काल में सर्वप्रथम स्थायी सेना का गठन हुआ। इसके प्रमाण हैं कि बिम्बिसार अपने को क्षेत्रीय बिम्बिसार कहता था जिसका अर्थ है सेना का बिम्बिसार। उसी तरह कोशल का शासक अपने को अधिकारमदमर्त्त कहता था। राजा की शक्ति में वृद्धि हुई और उसे ब्राह्मण और सेठी को भूमि अनुदान देने में समुदाय की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं थी। रक्त संबंध से पृथक नौकरशाही स्थापित हुई। अधिकतर अधिकारी पुरोहित वर्ग से चुने जाते थे। नये अधिकारियों में आयुक्त एवं महामात्र की चर्चा मिलती है। उत्तर वैदिक काल में हम करारोपण से जुड़े भागदुघ नामक अधिकारी की चर्चा सुनते थे। किन्तु इस युग में करारोपण से जुड़े आधे दर्जन अधिकारियों की चर्चा सुनते हैं।

बलिसाधक- बलि वसूल करने वाला अधिकारी था।

शौल्किक शुल्काध्यक्ष था जिसका कार्य शुल्क वसुलना था।

रज्जुग्राहक भूमि की माप करने वाला अधिकारी था।

द्रोणमापक- अनाज के तौल का निरीक्षण करने वाला अधिकारी था। जातक कथाओं में हमें कुछ दमनात्मक कार्यवाही की चर्चा भी मिलती है। दो अधिकारी तुन्दिया एवं अकाशिया बलपूर्वक कर की वसूली करते थे।

सभा एवं समिति जैसी आदिम संस्थाओं का अंत हो गया और उनका स्थान परिषद् ने ले लिया। राजकीय मुहर का प्रथम प्रयोग इसी युग में आरम्भ हुआ। राजकीय दस्तावेज की परम्परा भी यहीं से शुरू हुई। अक्षपटलाधिकृत नामक अधिकारी की नियुक्ति हुई। कौटिल्य राज्य के लोक कल्याणकारी रूप पर बल देता है। कानून एवं अदालत का प्रथम विकास इसी युग में हुआ। लेखन कला के विकास के साथ प्रशासन में दक्षता आई। जाति विभाजित समाज में पुराने समतावादी कानून बाधक सिद्ध हो रहे थे। अत: कबिलाई कानून का स्थानं जाति कानूनों ने ले लिया। प्रशासन की छोटी इकाई के रूप में कुल के स्थान पर ग्राम स्थापित हुआ। ग्राम और उससे ऊपर की इकाइयों की चर्चा समकालीन ग्रन्थों में की गई है। ये इकाइयाँ इस प्रकार हैं-

  1. ग्राम
  2. खरवटक- 200 ग्रामों का संघ
  3. द्रोणमुख- 400 ग्रामों का संघ
  4. पतन- व्यापार या खानों का केन्द्र
  5. मंतभ- दस हजार ग्रामों और दुर्गों का संघ
  6. नगर
  7. निगम-व्यापारियों की बस्ती
  8. राजधानी

प्रथम बार इसी युग में निवास की भूमि और कृषि की भूमि अलग-अलग हुई। राजा की शक्ति में विकास के परिणामस्वरूप राजस्व से संबंधी दो अवधारणाएँ विकसित हुई।

राजत्व की रहस्यवादी अवधारणा- यह ब्राह्मणों के द्वारा प्रतिपादित की गयी और इसका आधार ऐतरेय ब्राह्मण है।

राजत्व का अनुबंधात्मक (समझौतावादी) सिद्धांत- यह बौद्ध विचारकों के द्वारा प्रतिपादित है और महासम्मत की अवधारणा पर आधारित है। इसका आधार बौद्ध ग्रन्थ दीघ निकाय है। इस युग में राजतंत्र के अतिरिक्त गणतंत्र भी थे, इन्हें हम गण या संघ के नाम से जानते हैं। गणतंत्र में वास्तविक सत्ता कबिलाई अल्पतंत्र में निहित थी। शाकयों एवं लिच्छवि के गणराज्यों में शासक वर्ग एक ही गोत्र एवं एक ही वर्ण के होते थे। वैशाली के लिच्छवियों की सभा में 7707 सदस्य थे जो राजा कहलाते थे। किन्तु ब्राह्मणों को इसमें शामिल नहीं किया गया था। जैसे, मौर्योत्तर काल में मालव एवं क्षुद्रकों के गणराज्य में ब्राह्मण एवं क्षत्रिय को नागरिकता प्राप्त थी, किन्तु दासों एवं शूद्रों को नहीं। पंजाब में व्यास नदी के आस-पास एक ऐसा गणतंत्र था, जिसके सभागार में ऐसे ही लोग सदस्य हो सकते थे जो कम से कम एक हाथी दे सकते थे। शाक्यों एवं लिच्छवियों का प्रशासन तंत्र सरल था, इसमें राजा, उपराजा, सेनापति एवं भाण्डागरिक (राजकोषाध्यक्ष) शामिल होते थे। ग्रीक लेखकों के अनुसार, उ.प. के एक राज्य, पातल में एक विशिष्ट प्रकार की व्यवस्था थी। इसमें युद्ध के समय दो वंशानुगत राजा मिलकर शासन करते थे और शांति के समय शासन का संचालन वृद्ध जनों की एक परिषद् द्वारा होता था। उसी तरह सौभूति एवं अम्बष्ठ के गणतंत्र में बच्चों के लालन-पालन का अधिभार राज्य अपने हाथ में लेता था ताकि बच्चे स्वस्थ पैदा हो सके। मूषिकवंश एक ऐसा राज्य था जहाँ दास नहीं पाये जाते थे।

 

 

 

http://www.vivacepanorama.com/india-during-the-buddha/

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