संविधान की ‘समीक्षा’ बनाम संविधान की ‘सुरक्षा’…प्रो. रतन लाल

यह पोस्ट मेरी ओर से सफाई भी है और भारत में ‘दलित/सर्वहारा’ मुक्ति की चुनौतियों को समझने का अल्प प्रयास भी है. इसलिए पहले सफाई:

पिछले डेढ़ वर्ष से ही सोशल मीडिया पर एक्टिव हुआ हूँ. अपने अल्प-ज्ञान से थोड़ा बहुत लिखने का प्रयास करता रहता हूँ. आपके कमेंट्स मेरी समझ को बढ़ाने ऑक्सीजन का काम करते रहते हैं, लेकिन मेरे कुछ मित्रों को मेरे बारे में कुछ गलतफहमी हुई है. मैं न तो कोई बड़ा सिद्धांतकार हूँ और न ही नेता. पारिवारिक और व्यवसायिक जीवन से जो समय बचता है, थोड़ा-बहुत लिख लेता हूँ और यदा-कदा प्रगतिशील आन्दोलनों में भागीदारी भी कर लेता हूँ. इसलिए आपके सभी सवालों का जवाब देने में और सभी समस्यायों का समाधान ढूँढने में असहाय और असमर्थ महसूस करता हूँ.

प्रसिद्द समाजशास्त्री हैबरमॉस ने कहा है कि अब दुनिया Mono-Causal होगी, अर्थात् किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द आन्दोलन का स्वरुप तय होगा और फिर विस्तार. जैसे – बीजेपी ‘राम-राम’ करते-करते आज सबसे बड़ी ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी बन है है और मिथकीय राम उनके ‘राष्ट्र’ का पर्याय. इस बात को थोड़ा सरल तरीके से समझने की कोशिश करता हूँ. मान लीजिए पानी में लोहा काटना हो तो कैसे कटता है, वेल्डिंग मशीन तो पानी में जा नहीं सकता? लोहे को पानी की धार से ही काटा जाता है, अर्थात पानी के concentration लेवल को बढ़ाकर. शायद आन्दोलन में भी यही फार्मूला लागू होगा, या होता है. इसलिए जो साथी दुनिया की सारी समस्यायों का एक साथ समाधान करना चाहते हैं, उन्हें उनका प्रयास मुबारक.

बहरहाल, प्रसिद्द इतिहासकार D.D. Kosambi ने लिखा है, “मार्क्सवाद इतिहास का पर्याय नहीं, इतिहास को   समझने की एक विधि है.” लेनिन ने मार्क्स को अपने काल और परिस्थिति के अनुसार पढ़ा, माओ ने भी अपनी काल और परिस्थिति के अनुसार मार्क्स को पढ़ा– नतीजा सामने है. बाद की स्थितियों पर अभी मैं नहीं जाना चाहता, लेकिन यह तो सत्य है कि लेनिन और माओ ने क्रांति को ज़मीन पर उतारा. अब यक्ष प्रश्न यह है कि भारत के ‘क्रांतिकारियों’ ने मार्क्स को भारत की परिस्थितियों के अनुसार ज़मीन पर उतारा– शायद नहीं! क्या वे वर्ग, जाति, जेंडर, और ‘संस्कृति’ के संबंधों में ‘शक्ति’ के ‘सम्बन्ध’ और ‘खेल’ को समझ पाए– शायद  नहीं. इस विषय पर कभी विस्तार से!

अब प्रश्न है, कैसे हो बदलाव? दुनिया भर में क्रांतियों का इतिहास बतलाता है कि इन क्रांतियों की वैचारिक अगुआई बुद्धिजीवी वर्ग ने की है. यदि मार्क्सवादी शब्दावली में कहें तो बुर्जुआ वर्ग ने नेतृत्व प्रदान किया है. लेकिन क्या भारत में दलितों, आदिवासियों या ‘पिछड़ों’ का वह वर्ग तैयार हुआ है– शायद नहीं! आज़ादी के बाद आरक्षण के द्वारा थोड़ा बहुत जो लोग पढ़ पाए, वे अधिकारी, डॉक्टर और इंजिनियर बने. पहली पीढ़ी थी, घर-परिवार संभालना इत्यादि में ही जीवन गुजर गई. फिर व्यवसायिक सेंसर और अपने बड़े अधिकारीयों एवं नेताओं के ‘मनुवादी’ आतंक ने उन्हें हमेशा डर के साए में  ही रखा. इसलिए संभव है मजबूरन उन्हें ‘चुप्पी’ बनाए रखना पड़ा.  आखिर यह बौद्धिक जमात कहाँ से आएगा?

विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ही बौद्धिक निर्माण के केंद्र हैं. लेकिन एक साजिश के तहत विश्वविद्यालयों और शोध संस्थान से इस पूरे ‘जमात’ को बाहर रखा गया. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 1997 में और पिछड़ा वर्ग के लिए 2007 में आरक्षण लागू किया गया. लेकिन  क्या इन वर्गों को इन संस्थानों में समुचित प्रतिनिधित्व मिला? यक़ीनन नहीं, अभी भी पर्याप्त हेरा-फेरी है. फिर भी कुछ लोग शिक्षण संस्थानों में आये हैं. लेकिन ज्यादातर लोग पहली पीढ़ी के ही हैं, इसलिए घर-परिवार इत्यादि की उलझनें तो हैं ही, ‘मनुवादी’ सोच वाले प्रिंसिपल, वाईस-चांसलर, डायरेक्टर का आतंक अलग से. इसलिए ज्यादातर लोग डर के मारे अपने संस्थान में ही नहीं बोल पाते, व्यवस्था पर क्या बोलेंगे?

हाँ, यह बात जरुर है कि अब कुछ लोगों ने लिखना-पढ़ना, व्यवस्था पर प्रश्न उठाना शुरू कर दिया है. लेकिन समस्या यह है कि जैसे दुनिया का हर ‘क्रांतिकारी’ अपने को ज्यादा ‘क्रांतिकारी’ और दूसरे को प्रति-क्रांतिकारी समझता है, उसी तरह से वंचितों की यह छोटी सी ‘बौद्धिक’ जमात, आपस में ही एक दूसरे से बड़ा ‘सिद्धान्तकार’ और ‘क्रांतिकारी’ साबित करने में लगा हुआ है. ऐसे ज्यादातर ‘बुद्धिजीवी’ चाहते है कि इन्हें हर जगह मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाय, TA, DA भी मिले, ज़मीन बंगला भी हो और लोग इन्हें ही सबसे बड़े ‘क्रांतिकारी’ समझें.

जनाब, जिस दिन आप एक कार्यकर्ता बनकर लोगों के लिए दरी बिछाना शुरू कर देंगे, जेब से कुछ पैसा ढीला करना शुरू कर देंगे, स्थितियां जरुर बदलेंगी. मैं आशावादी हूँ, इतना तो स्पष्ट है विचार मंथन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. विश्वविद्यालयों में बढ़ते प्रतिनिधित्व और लगातार दमन इस बात का प्रतीक है कि परंपरागत सोच वालों को दर्द होना शुरू हो गया है. रोहित वेमुला ही ‘आत्म-हत्या’, और देश भर के विश्वविद्यालयों में ‘परम्पगत’ मानसिकता पर सवाल उठाने वाले शिक्षकों और छात्रों का दमन अकारण नहीं है.

अब थोड़ी सी चर्चा संविधान की:

संविधान को लेकर आजकल दो तरह की चर्चाएँ आम हैं: पहला, ‘संघ परिवार’ बार-बार संविधान की समीक्षा की बात कर रहा है और दूसरा देश में कई संगठन हैं जो संविधान बचाओ आन्दोलन चला रहे हैं. अब प्रश्न है कि संविधान समीक्षा के क्या निहितार्थ हैं? क्या इसके प्रजातंत्रीय और संघीय स्वरुप को बदल कर ‘हिंदूवादी’, मनुवादी संविधान बनाने की मंशा है? मैं समझता कोई भी दस्तावेज़, ‘सम्पूर्ण’ और ‘पवित्र’ नहीं होता. काल, परिस्थित और परिवर्तन के अनुसार उस दस्तावेज़ में भी परिवर्तन/संशोधन होते हैं. भारत के संविधान में लगातार संशोधन का होना भी इस बात का प्रमाण है.

हाँ, यदि संघ-परिवार, संविधान की समीक्षा कर उसे ‘हिंदूवादी’ स्वरुप में बदलने का प्रयास कर रहा है, तो उसका विरोध करने की जरुरत है. कम से कम यह तो प्रयास करने की जरुरत है कि संविधान हमें जो मौलिक और अन्य अधिकार देता है उसकी रक्षा हो सके.
अंत में,

आखिर कौन घबराता है ‘समीक्षा’ से? 

समीक्षा तो इस बात कि होनी चाहिए कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित स्वतंत्रता, समता, बंधुता और न्याय क्यों नहीं प्राप्त किया जा सका है? देश में अमीरी और गरीबी की खाई क्यों बढ़ती जा रही है? चालीस प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे क्यों है? अल्पसंख्यक, दहशत में क्यों है? संसाधनों में समुचित भागीदारी क्यों नहीं हुई है?

देश के तमाम संसाधन – अर्थ, राजनीति, अफसरशाही, न्यायपालिका, शिक्षा – कुछ परिवारों और समुदायों के नियंत्रण में क्यों है? यदि संविधान की ‘समीक्षा’ इस दिशा में हो तो स्वागत है, नहीं तो………संघर्ष जारी रहे!!! जय भीम!!!!

नोट: भाषा मर्यादित रखें, परिवर्तन धैर्य का काम है, थोड़ा धैर्य रखें और ईमानदार प्रयास जारी रखें!
source: http://www.nationaldastak.com/story/view/-constitution-review-versus-his-security

   

prof-ratan-lal

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Dilip C Mandal Speech At Bamcef Convention 2016 on burning topics like Govt. Policies for SC/ST/OBC & Minorities, Juvenile justice, Caste census, Brahminical controlled Media,Reservation Cap, Caste controlled Bureaucracy,one dominant caste in savarnas etc. in HINDI

 

Dilip C Mandalp एक जंतर देते हैं…
आप 99.99 प्रतिशत किसी भारतीय की जाति का पता कर सकते हैं. बस उनसे हौले से पूछ लीजिये की जाति जनगणना होनी चाहिए या नहीं …
अगर वो जाति जनगणना से मना करता है तो वो सवर्ण है ..
अगर चाहता है तो बहुजन है..
ट्राय करिए , अगर गलत निकला तो जंतर के पैसे वापस…

hazari-prasad-dwedi

आप सभी को धम्म दीप्दानोत्सव (present dewali) पर बधाई।

deepdanutsavआप सभी को धम्म दीप्दानोत्सव पर बधाई।
पुरातन काल मे बोध गया (बिहार) में बोधी वृक्ष के नीचे उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे सिद्धार्थ से बुद्ध बन गए। बुद्ध ज्ञान प्राप्ति करने के बाद जब कपिलवस्तु वापीस आये थे गौतम बुद्ध के समर्थकों ने 2500 वर्ष पूर्व गौतम बुद्ध के स्वागत में हजारों-लाखों दीप जलाकर दीप्दानोत्सव मनाई थी।
पुरातन काल मे सम्राट अशोक भी देश में बौद्ध धम्म को स्थापित करने के बाद बुद्ध वचनों के प्रतिक रूप में चौरासी हज़ार विहार, स्तूपों और चैत्यों का निर्माण करवाऐ सभी निर्माण पूर्ण हो जाने के बाद अशोक महान ने कार्तिक अमावश्या को एक भब्य उद्घाटन महोत्सव का आयोजन किया।


इस महोत्सव के दिन सारे नगर, द्वार, महल तथा विहारों एवं स्तूपों को दीप माला एवं पुष्प माला से अलंकृत किया गया तथा सम्राज्य के सारे वासियों ने इसे एक त्यौहार के रूप में हर्सोल्लास के साथ मनाया।


सम्राट अशोक ने इस त्यौहार को “दिप्दानोत्सव” नाम दिया अशोक के आदेश पर यह त्यौहार शुरू हुआ और आज तक देश में मनाया जाता है। महाराज बृहदत्त के समय भी यह त्यौहार पुरे उत्साह और खुशियों के साथ पुरे देश में मनाया जाता था। सम्राट अशोक द्वारा शुरू किया गया दिप्दानोत्सव महोत्सव त्यौहार के रूप में हर्सोल्लास के साथ मनाये प्रत्येक घरों में स्तूप के मोडल के रूप में आँगन अथवा द्वार पर स्तूप बनाया गया जिसे आज किला , घर कुंडा अथवा घरौंदा कहा जाता है इस दिन उपसोथ (भिक्खुओं के सानिध्य में घर अथवा विहार में धम्म कथा सुनना ) किया गया ,बुद्ध वंदना किया गया तथा भिक्खुओं को कल्याणार्थ दान दिए गए ।


दिप्दानोत्सव दिवस के दुसरे तीसरे दिन गोबर्धन पूजा होता है गोबर्धन पूजा के एक दिन बाद बैल पूजा ( गाय डाढ ) होता है यह सिन्धु घटी सभ्यता के समय के साढ पूजा की परंपरा की मज़बूत कड़ी है । जय सम्राट धम्म अशोक। नमो बुद्धाय

पहले भारत में उत्सव मनाए जाते थे त्यौहार शब्द का मतलब तो जानते ही होंगे आप, नहीं तो संधि विछेद कर के देख लो

पुराने ब्राह्मणवादी संविधान मनुस्मृति में जाती देखकर दंड देने की व्यस्था थी,शूद्र तो तड़पाकर मार दो ब्राह्मण तो अधिक से अधिक देश निकाला| इस अमानवीय न्याय व्यस्था की जगह इंडियन पीनल कोड IPC नमक सामान न्याय व्यस्था देने वाले लार्ड मेकाले के जन्मदिन 25 अक्टूबर को बहुजन समाज उन्हें कुछ इस तरह याद किया …National Dastak

lord-thomas-babington-macaulayमनुस्मृति के बारे में संशिप्त परिचय पाने के लिए निम्न लेख पढ़ें https://samaybuddha.wordpress.com/manusmriti-jalai-kyon-gayi/

 

या निम्न लिंक से पूरी पुस्तक डाउनलोड करें :https://drive.google.com/file/d/0BxcTXJRxuCcVc2Q0SDNfY2J0cEE/view?pref=2&pli=1

 

लार्ड मैकाले के जन्मदिन पर उनके योगदान को लेकर सोशल साइट्स पर पर बहस तेज़ हो गयी है. विदित हो की सदियों से इस देश में मनुस्मृति व्यवस्था लागू रही है. जाति क्रमानुसार पर दंड व्यवस्था निर्धारित की गयी थी. साथ ही अंग्रेजी के आगमन की वजह से मनुवादी भाषा संस्कृत का वर्चस्व टूट गया और बड़ी संख्या में बहुजन शिक्षित होने लगे. ये बात भी दीगर है की मैकाले का उद्देश्य वो नहीं था जो हो गया. पर जो हुआ है उसका जश्न मनाया ही जाना चाहिए. 25 अक्टूबर को उनका जन्मदिन था। इस मौके पर लोगों ने अपने विचार शेयर किए हैं…
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा है…
आज़ाद भारत के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे को जिनकी वजह से फाँसी हुई.
मैकाले से भारतीय प्रभु वर्ग की नफ़रत इसलिए नहीं है कि उन्होंने इंग्लिश एजुकेशन को बढ़ावा दिया। आप जानते ही हैं कि इंग्लिश एजुकेशन का सबसे ज़्यादा लाभ सवर्ण ही उठा रहे हैं।
मैकाले से दिक़्क़त किसी और बात के लिए है।
भारत के पहले लॉ कमीशन के चेयरमैन होने के नाते मैकाले ने इंडियन पीनल कोड (IPC) बनाया, जिससे तमाम जातियों और समुदायों (ब्रिटिश लोग भी) के लिए समान अपराध के लिए समान दंड का प्रावधान किया.
इस वजह से न तो वे ब्रिटिशर्स के बीच लोकप्रिय हुए, न उन जातियों के बीच, जिनके लिए IPC से पहले लागू दंड विधान, अपेक्षाकृत नर्म थे.
समान अपराध के लिए अलग अलग जातियों को अलग अलग दंड दिए जाने का मैकाले ने अंत कर दिया.
मिसाल के तौर पर IPC न होता तो नाथूराम गोडसे को फाँसी नहीं होती, क्योंकि वह ब्राह्मण था.
एक लिंक शेयर करते हुए दिलीप मंडल लिखते हैं…
जो लोग भी कहें कि मैकाले ने यह कहा था, वह कहा था, भारत में कोई भी भिखारी नहीं देखा टाइप बातें, तो अगर वह आदमी पढ़ सकता है तो यह पढ़ा दीजिए कि मैकाले ने भारतीय शिक्षा के बारे में यह कहा था। बाक़ी सब गप है। दीक्षित जी की फ़ैक्टरी से निकला है।
आंबेडकर फुले युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ ओम सुधा लिखते हैं- 
और इस तरह मैकाले ने मनु की पुंगी बजा दी थी..
आज की तारीख में ” मनु की औलाद” इस सदी की सबसे गन्दी गाली है. किसी घनघोर संघी को भी मनु औलाद कहके देखियेगा. कैसे भड़क जाएगा. मरने मारने पर उतारू हो आएगा.ये सब ऐसे ही नहीं हो गया. कभी मनुस्मृति इस देश का सबसे पवित्र ग्रन्थ था. वो किताब मनु स्मृति ही है जिसने देश में भारत में वर्ण व्यवस्था को पुष्पित-पल्लवित किया. हम सब इस बात से भिग्य हैं की तमाम धर्म ग्रन्थ बहुजन-स्त्री विरोधी हैं. ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुसूक्त में ही सबसे पहले वर्णव्यवस्था की नीव रखे जाने का वर्णन मिलता है. जिसमे वर्णित है की ब्राह्मणों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से , राजपूतों की बाजू , विषयों की जंघा और शूद्रों की पैर से हुयी है. कालांतर में महामना ज्योतिबा फुले ने इन ग्रंथों की तार्किक तरीके से बघिया उधेर कर रख दी.
लार्ड मैकाले जिंदाबाद..
सिंह बलदेव महतो लिखते हैं…
ब्राह्मणी शिक्षा पद्धति के समर्थक यह बताने का कष्ट करेंगे कि पेशवा शासन के काल में किस राजा के यहां कोई अहीर, कुर्मी, सैनी, भंगी, चमार, मोची, बैरवा, रैगर, भांभी, कोली, धोबी, मीणा, नाई, कुम्हार, खाती या इसी प्रकार कोई एससी, एसटी या ओबीसी समुदाय का व्यक्ति मंत्री, पेशकार, महामंत्री या सलाहकार रहा हो?
पुणे के पेशवा शासन के काल के भारत के गुरुकुलों में ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के बच्चे को प्रवेश ही नहीं दिया जाता था. महिलाओ की शिक्षा नहीं थी. 1818 में देश में 2% लोग साक्षर थे. ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय में एक भी व्यक्ति साक्षर नहीं था.
ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन ने सन 1835 ई. में भारत के लिये एक विधि आयोग का गठन किया था, जिसका अध्यक्ष बना कर लॅार्ड मैकाले को भारत भेजा गया. इसी वर्ष लार्ड मैकाले ने भारत में नई शिक्षा नीति की नींव रखी. 6 अक्टूबर 1860 को लॅार्ड मैकाले द्वारा लिखी गई भारतीय दण्ड संहिता लागू हुई और मनुस्मृति का विधान खत्म हुआ.
ओबीसी, एससी और एसटी के बच्चो के लिए शिक्षा के द्वार लार्ड मेकोले की नयी शिक्षा नीति लागु होते ही खुले और पिछड़ेवर्गों के बच्चे का ब्राह्मणों के बच्चे के साथ शिक्षा में स्पर्धा का प्रारम्भ हुवा. इसीलिए राजीव दीक्षित जैसे जातिवादी प्रचारकों लार्ड मेकोले के विरोधी रहे है.
तुलसी राम कनौजिया ने लिखा….
आज आधुनिक भारत की नींव रखने वाले लार्ड मैकाले का जन्मदिन है जिन्होंने भारत मे अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान, प्रजातंत्र, न्यायपालिका, मनुष्यों की समानता आदि विचारों की नीव रखी और हमें यहाँ के पाखंडियों द्वारा फैलाए गए अंधविश्वासों से किसी सीमा तक मुक्ति दिलाई.

 

संघप्रिय गौतम ने लिखा है…
आज लार्ड मैकाले का जन्म दिन मनाया गया
मैकाले के कारण ही बाबा साहेब पढ पाये और बाबा साहेब के कारण ही आज हम यहाँ हैं तो उनको नमन तो बनता ही है

 

सुशीला धुर्वे ने लिखा है…
यूँ कहें की लार्ड मैकाले ने सीधे सीधे .. मनु स्मृति को ही ध्वस्त कर दिया था
जहाँ भारत भूमि में शिक्छा सिर्फ आर्यों की बपौती थी …सुनने पर कान में पिघला शीसा और बोलने पर जीभ काट ली जाती थी ..अधिनियम १८१३ के तहत हमे शिक्छा का अधिकार दिया ……और आज हम फेसबुक के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान कर रहे हैं
जहाँ मनुवाद के तहत ब्राम्हण को सजा नही होती थी ..मैकाले के कारण १७७५ में भारत भूमि में पहले ब्राम्हण नन्द कुमार को फांसी दी गई ………….ब्राम्हण मन्दिरों में शूद्रों ..आदिवासियों की नर बली देते थे उस पर रोक लगाई
और सरकारी नौकरी पर जातिगत भेदभाव हटाया …..शिक्छा का माध्यम अंग्रेजी बनाने के कारण आज हम पुरे विश्व से जुड़े हैं
तो क्या हमे लार्ड मैकाले को …….सम्मान से याद नही करना चाहिए ?

 

बसंत वर्मा ने लिखा है…
लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति
1. इसका आधार तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उत्पन्न आवश्यकतायें रहीं.
2. लॅार्ड मैकाले ने शिक्षक भर्ती की नई व्यवस्था की, जिसमें हर जाति व धर्म का व्यक्ति शिक्षक बन सकता था. तभी तो रामजी सकपाल (बाबा साहेब डॉक्टर अम्बेडकर के पिताजी) सेना में शिक्षक बने.
3. जो भी शिक्षा को ग्रहण करने की इच्छा और क्षमता रखता है, वह इसे ग्रहण कर सकता है.
4. इसमें धार्मिक पूजापाठ और कर्मकाण्ड के बजाय तार्किकता को महत्त्व दिया जाता है.
5. इसमें इतिहास, कला, भूगोल, भाषा-विज्ञान, विज्ञान, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, भेशजी, प्रबन्धन और अनेक आधुनिक विद्यायें शामिल हैं.
6. इसका माध्यम प्रारम्भ में अंग्रेजी भाषा और बाद में इसके साथ-साथ सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हो गईं.
7. इसमें ज्ञान-विज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों की प्रचुरता रहती है और अतिश्योक्ति पूर्ण या अविश्वसनीय बातों का कोई स्थान नहीं होता है.
8. इस नीति के तहत सर्व प्रथम 1835 से 1853 तक लगभग प्रत्येक जिले में एक स्कूल खोला गया. आज यही कार्य राज्य और केंद्र सरकारें कर रही हैं. साथ ही निजी संस्थाएं भी शामिल हैं.
9. भारत में स्वाधीनता आंदोलन खड़ा हुआ, उसमें लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का बहुत भारी योगदान रहा, क्योंकि जन सामान्य पढ़ा-लिखा होने से उसे देश-विदेश की जानकारी मिलने लगी, जो इस आंदोलन में सहायक रही.
10. यह विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लागू होती आई है.
11. इसको ग्रहण करने में किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं रही, अतः यह जन साधारण और दलितों के लिये सर्व सुलभ रही. अगर शूद्रों और दलितों का भला किसी शिक्षा से हुआ तो वह लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ही हुआ. इसी से पढ़ लिख कर बाबासाहेब अम्बेडकर डॉक्टर बने.
12. इसमें तर्क को पूरा स्थान दिया गया है. धर्म अथवा आस्तिकता-नास्तिकता से इसका कोई वास्ता नहीं है.
13. यह गरीब भिखारी से लेकर राजा-महाराजा, सब के लिये सुलभ है.
14. इसमें सर्व वर्ण व सर्व धर्म समान हैं. आदिवासी और मूलनिवासी भी इसमें शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं. लेकिन जहां-जहां संकीर्ण मानसिकता वाले ब्राह्मणवादियों का वर्चस्व बढ़ा है, उन्होनें इसमें भी दलितों को शिक्षा से वंचित किया है.
15. इससे हम आधुनिक विश्व से सरलता से परिचित हो रहे हैं.
16. इसमें सभी जातियां, वर्ण और धर्म समान हैं.

http://www.nationaldastak.com/story/view/lord-macauley-birthday-social-media-reaction

भारत में जातियां हैं, जातियां राष्ट्रविरोधी हैं, संविधान सभा में बाबा साहेब के अंतिम वक्तव्य (25 नवंबर 1949) का एक अंश…लेखक: डॉ. भीमराव आंबेडकर।। http://ambedkartimes.blogspot.in/

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भारत में जातियां हैं, जातियां राष्ट्रविरोधी हैं, संविधान सभा में बाबा साहेब के अंतिम वक्तव्य (25 नवंबर 1949) का एक अंश

लेखक: डॉ. भीमराव आंबेडकर।।
हमें सिर्फ राजनीतिक लोकतंत्र से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। हमें अपने राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र भी बनाना चाहिए। राजनीतिक लोकतंत्र तब तक स्थायी नहीं हो सकता, जब तक इसकी बुनियाद में सामाजिक लोकतंत्र न हो। सामाजिक लोकतंत्र का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है एक ऐसी जीवन शैली, जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन का मूल सिद्धांत मानती हो। इसकी शुरुआत इस तथ्य को मान्यता देकर ही की जा सकती है कि भारतीय समाज में दो चीजें सिरे से अनुपस्थित हैं। इनमें एक है समानता। सामाजिक धरातल पर, भारत में एक ऐसा समाज है जो श्रेणीबद्ध असमानता पर आधारित है। और आर्थिक धरातल पर हमारे समाज की हकीकत यह है कि इसमें एक तरफ कुछ लोगों के पास अकूत संपदा है, दूसरी तरफ बहुतेरे लोग निपट भुखमरी में जी रहे हैं।
अंतर्विरोधों भरा जीवन
26 जनवरी 1950 को हम एक अंतर्विरोध पूर्ण जीवन में प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी, जबकि सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम असमानता से ग्रस्त होंगे। राजनीति में हम ‘एक मनुष्य, एक वोट’ और ‘एक वोट, एक मूल्य’ वाले सिद्धांत को मान्यता दे चुके होंगे। सामाजिक और आर्थिक जीवन में तथा अपने सामाजिक-आर्थिक ढांचे का अनुसरण करते हुए हम ‘एक मनुष्य, एक मूल्य’ वाले सिद्धांत का निषेध कर रहे होंगे। ऐसा अंतर्विरोधों भरा जीवन हम कब तक जीते रहेंगे? सामाजिक-आर्थिक जीवन में समानता का निषेध कब तक करते रहेंगे? अगर हम ज्यादा दिनों तक इसे नकारते रहे तो इसका कुल नतीजा यह होगा कि हमारा राजनीतिक जनतंत्र ही संकट में पड़ जाएगा। इस अंतर्विरोध को हम जितनी जल्दी खत्म कर सकें उतना अच्छा, वर्ना असमानता के शिकार लोग राजनीतिक लोकतंत्र के ढांचे को उड़ा देंगे, जिसे इस सभा ने इतनी मुश्किल से खड़ा किया है।
जिस दूसरी चीज का हमारे यहां सर्वथा अभाव है, वह है भ्रातृत्व के सिद्धांत की मान्यता। भ्रातृत्व का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना- बशर्ते भारतीयों को हम एक जनसमुदाय मानते हों। यह ऐसा सिद्धांत है जो सामाजिक जीवन को एकता और एकजुटता प्रदान करता है, लेकिन इसे हासिल करना कठिन है। कितना कठिन है, इसका अंदाजा यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के संदर्भ में जेम्स ब्राइस द्वारा लिखे गए ग्रंथ अमेरिकन कॉमनवेल्थ को पढ़कर लगाया जा सकता है।
ब्राइस के ही शब्दों में- ‘कुछ साल पहले अमेरिकन प्रोटेस्टेंट एपीस्कोपल चर्च के त्रिवार्षिक सम्मेलन में पूजा पद्धति के बदलाव को लेकर चर्चा चल रही थी। इस दौरान यह जरूरी पाया गया कि छोटे वाक्यों वाली प्रार्थनाओं में ऐसी एक प्रार्थना भी शामिल की जानी चाहिए, जो समूची जनता के लिए हो। न्यू इंग्लैंड के एक प्रतिष्ठित धर्माचार्य ने इसके लिए इन शब्दों का प्रस्ताव रखा- ‘ओ लॉर्ड, ब्लेस अवर नेशन’ (हे प्रभु, हमारे राष्ट्र पर कृपा करो)। उस शाम तो झटके में इसे स्वीकार कर लिया गया, लेकिन अगले दिन जब इसको पुनर्विचार के लिए लाया गया तो गृहस्थ ईसाइयों ने ‘राष्ट्र’ शब्द पर कई तरह की आपत्तियां उठा दीं। उनका कहना था कि इस शब्द के जरिए राष्ट्रीय एकता को कुछ ज्यादा ही ठोस रूप दे दिया गया है। नतीजा यह हुआ कि प्रार्थना से इस शब्द को हटा दिया गया। पुराने वाक्य की जगह जो नया वाक्य आया, वह था- ‘हे प्रभु, इन संयुक्त राज्यों पर कृपा करो।’
जब यह घटना घटित हुई, उस समय तक संयुक्त राज्य अमेरिका के लोगों में एकजुटता का तत्व इतना कम था कि वे स्वयं को एक राष्ट्र नहीं महसूस कर पाते थे। अगर संयुक्त राज्य अमेरिका के लोग खुद को एक राष्ट्र नहीं मान पाते थे तो भारतीयों के लिए ऐसा मान पाना कितना मुश्किल होगा, यह बात आसानी से समझी जा सकती है। मुझे वे दिन याद हैं जब राजनीतिक मिजाज वाले भारतीय भी ‘भारत के लोग’ जैसी अभिव्यक्ति पर नाराजगी जताते थे। इसकी जगह ‘भारतीय राष्ट्र’ उन्हें कहीं बेहतर जान पड़ता था। मेरी राय है कि स्वयं को एक राष्ट्र मान कर हम बहुत बड़ी गलतफहमी पाल रहे हैं। कई हजार जातियों में बंटे हुए लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं?
बंधुत्व ही आधार
जितनी जल्दी हम यह मान लें कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक अर्थों में हम अभी तक एक राष्ट्र नहीं बन पाए हैं, हमारे लिए उतना ही अच्छा होगा। क्योंकि इस सचाई को स्वीकार कर लेने के बाद हमें एक राष्ट्र बनने की जरूरत महसूस होगी और उसके बाद ही हम इस लक्ष्य को हासिल करने के रास्तों और तौर-तरीकों पर विचार कर पाएंगे। casteइस लक्ष्य को हासिल करना बहुत मुश्किल साबित होने वाला है- अमेरिका में यह जितना मुश्किल साबित हुआ, उससे कहीं ज्यादा। अमेरिका में जाति कोई समस्या नहीं है। भारत में जातियां हैं और जातियां राष्ट्रविरोधी हैं। सबसे पहले तो इसलिए क्योंकि ये सामाजिक जीवन में अलगाव लाती हैं। वे इसलिए भी राष्ट्रविरोधी हैं क्योंकि वे विभिन्न जातियों के बीच ईर्ष्या और द्वेष की भावना पैदा करती हैं। लेकिन अगर हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं तो हमें हर हाल में इन कठिनाइयों पर विजय पानी होगी। वह इसलिए, क्योंकि बंधुत्व तभी संभव है जब हम एक राष्ट्र हों, और बंधुत्व न हो तो समानता और स्वतंत्रता की औकात मुलम्मे से ज्यादा नहीं होगी।
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समयबुद्धा पूर्णिमा धम्म संघायन: ये एक जीवन सूत्र है की जिसकी लाठी उसी की भैस होती है | तर्क और कुतर्क या सच और झूठ में वही जीतता है जिसके साथ हिंसा शक्ति खड़ी हो इसीलिए इतिहास वर्तमान और भविष्य भी शक्तिशाली का होता है

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बचपन में स्कूल की कक्षा में जब किसी दबंग छात्र के पास तथ्यों और तर्कों का जवाब नहीं होता था तब वो अपने आत्मस्वाभिमान की रक्षा के लिए हाथापाई मार पीट का इस्तेमाल करके तर्कशील छात्र को चुप करा देता था| ये बचपन के खेल लगते थे पर गौर से देखा जाए तो ये हर लेवल पर हो रहा है, मतलब ये एक जीवन सूत्र है की तर्क और कुतर्क या सच और झूठ में वही जीतता है जिसके साथ हिंसा शक्ति खड़ी हो|

इतिहास वर्तमान और भविष्य भी शक्तिशाली का होता है

इतिहास हमेशा से दो तरह का होता है एक सच्चा इतिहास दूसरा विजेता द्वारा लिखवाया गया इतिहास| इतिहास विजेता ही लिखवाते हैं, जो हार गए मर गए उनके सही और न्यायवादी होने से क्या होता है, विजेता तो खुद को ही सही लिखवाएगा|ऐसे ही महाभारत के “सुयोधन और शुषाशन”, दुर्योधन और दुशाशन नहीं हो गए| इस तरह हम कह सकते हैं की जो इतिहास हम पढ़ते हैं वो सम्पूर्ण नहीं होता, न होता हो न सही जीवन तो फिर भी चल रहा है, मतलब सच्चा इतिहास कुछ भी हो व्याहारिक इतिहास वही है जो विजेता लिखवा जाए| इतना ही नहीं इतिहास में छेड़छाड़ और अपने मन मुताबिक बदलाव दबाव और उभार अदि ये सब राजनीतिक दाव पेच हैं| सबसे बड़ी बात की जो इतिहास राजा का है वही इतिहास प्रजा का कैसे हो सकता है और उसमें भी उस ज़माने की स्त्रियों का इतिहास उसकी तो कोई बात ही नहीं होती| क्या आपके लिए ये समझ पाना बहुत मुश्किल है की हारने वाली पक्ष की महिलाओं की क्या दुर्दशा होती होगी, पर वो सब तो इतिहास से गायब होता है| खेर मतलब साफ़ है इतिहास केवल शक्तिशाली का होता है |

वर्तमान में देखो , अपने चारो और देखो कौन सुखी है, व्यक्तिगत कर्मफल को अगर छोड़ दिया जाए तो आप पाओगे की जो शक्तिशाली है वो ही सुखी है| जो शक्तिशाली कौमे हैं , क्या आपने सुना की किसी ने उनको पीटा, बेइज्जत किया, या न्याय नहीं मिला या बलात्कार की घटना अदि कभी सुना|अपनी गली से लेकर गांव-मोहल्ले से लेकर जिला-राज्ये और देश तक हर जगह केवल उसी की चलती है जो शक्तिशाली हो| अमेरिका की दुनिया में इसलिए नहीं चलती की उसका नाम अमेरिका है बल्कि इसलिए की वो सबसे शक्तिशाली देश है |थाने में एक दलित थानेदार और सवर्ण हवलदार में से किसकी चलती है क्या आपको नहीं पता |मतलब साफ़ है केवल एक व्यक्ति का शक्तिशाली होना काफी नहीं है, उसके पीछे कौन लोग खड़े है मतलब वो किस कौम से आता है उसकी शक्ति से ही व्यक्ति की शक्ति का पता चलता है

ये तो कोई मूर्ख भी समझ सकता है की जिसके पास शक्ति होगी उसके पास ही धन और धरती होगी| मतलब वही अपने भविष्य, और दूसरों के भविष्य का फैसला कर सकता है| प्रकृति जिसे लोग ईश्वर कहते हैं ने सबके लिए ये धरती बनाई थी तब ऐसा क्यों की की कुछ जमीनदर हैं कुछ भूमिहीन मजदूर | सब शक्ति का खेल है | शाशन भी शक्ति के भय से चलता है |

ऐसे में यदि गरीब जनता को कोई गौतम बुद्ध और धम्म के नाम पर अहिंसा का पाठ या सहते जाना पढाये तो मुझे तो ये दबंगों की साजिश लगती है- कमजोर को कमजोर रखने की| यही एकमात्र मामला हैं जहाँ मैं गौतम बुद्ध से सहमत नहीं हूँ, मैंने अपने गौतम बुद्ध के हाथ से भीख का कटोरा छीन के फेक दिया है और उनके एक हाथ में ज्ञान भरी किताब और दुसरे हाथ में हतियार पकड़ा दिया है |मैं ऐसे बुद्ध को मानता हूँ, सम्राट अशोक महान न होते तो गौतम बुद्ध की बात हम तक भी न पहुची होती, सब जानते हैं की सम्राट अशोक की हिंसा शक्ति के कारन उन्हें ब्राह्मणवादी चंड अशोक बुलाया करते थे |

जो जिस भाषा में समझता है उसे उसी भाषा में समझाना पड़ता है, दबंगों के सामने आपका ज्ञान काम न आएगा आपका लट्ठ काम आएगा | नहीं मानते तो आजमा कर देख लो ,कुछ अपवादों का रोना मत रोना, मैं मैजोरिटी केस की बात कर रहा हूँ| आज ही मैं टीवी में बच्चो के कार्टून देखे, उसमे भी वही देवता और राक्षशों का युद्ध, सन्देश यही था की छल से राक्षशों को मार डालो दया न करना|राजा अपने बेटे को तलवार चलना सिखाता है पर किसान हल चलना, तो ये समझना मुश्किल नहीं की किसका क्या भविष्य होगा| मतलब कौन अपने बच्चों की क्या शिक्षा देकर बड़ा कर रह है, वही भविष्य होगा| हमारे लोग कहते हैं क्या आप भी पुरानी बातें लेकर बैठ जाते हैं, टीवी पर राक्षश-देव जैसी बात इनको सही लगती है पर अम्बेडकरवाद पुरानी बात लगती है|मैं जितना सोचता हूँ उतना ही अहसास पक्का होता जाता है की हर व्यक्ति/कौम अपनी दुर्दशा की खुद जिम्मेदार है, दूसरे तो बस मौके का फायदा उठाते हैं|

अब सवाल ये उठता है की शक्ति मिलेगी कैसे, क्या ज्यादा खाने से,क्या ज्यादा कसरत से, क्या ज्यादा पढ़ने से, ये सब तो व्यक्तिगत शक्ति पाने के तरीके हैं| ऐसे बहुत दे शारीरिक और बौद्धिक शक्तिशाली लोगों को आप किसी न किसी की चाकरी करते हुए देखोगे | तो फिर क्या करें? अरे भाई आपको ये समझना होगा की शक्ति दो प्रकार की होती है एक व्यक्तिगत दूसरी संघ (संघटन या कौम) की शक्ति| संगठन शक्ति से राजनीती होती है और ‘राजनीतिक विजेता’ ही तय करता है को किसी का भूत भविष्य और वर्तमान क्या होगा |जैसे जीने के लिए खाना जरूरी है वैसे ही जीने के लिए राजनीती जरूरी है|जो तुमको कहते हैं राजनीती बुरी चीज़ है वही खूब करते हैं,तुम भी खूब करो, करो अगर जीना है तो करो अगर अपना भूत वर्तमान और भविष्य बदलना है तो|

बाबा साहेब ने कहा है की जिसे बढ़ना है उसे लड़ना होगा और जिसे लड़ना है उसे पहले पढ़ना होगा,यहाँ ध्यान दो बाबा साहब में पढ़ना और लड़ना दोनों शब्द कहे हैं |बाबा साहब ने जो भी कुछ हमारे लिए किया उसके पीछे अंग्रेजों की शक्ति का योगदान पहचानना क्या ज्यादा मुश्किल है|

नोट : अकारण हिंसा नहीं करनी चाहिए, अन्यथा पतन निश्चित है, पर जब वक्त आपसे हिंसा की मांग करे तब पीठ दिखाने से भी पतन निश्चित है

आप सभी को धम्म क्रांति/वापसी दिवस की हार्दिक शुभकामनायें, आज 14अक्टूबर को ही सन 1956 में डा बी.आर. अम्बेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों समेत सार्वजानिक जलसा करके बौद्ध धर्मं में लौटने की दीक्षा ली थी| इसी अवसर पर उन्होंने अपने अनुयायियों के लिए जो 22 प्रतिज्ञाएँ तय की थी वो इस पोस्ट में प्रस्तुत हैं

 

ambedkar-savita fl15conversion_8_j_2387425g nagpur-deekshaडा बी.आर. अम्बेडकर ने  बौद्ध धर्मं में लौटने  के अवसर पर,14 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के भव्य धार्मिक इमारतें, मीडिया प्रचार,संगीत, खुसबू धुआं, भीड़ ढोल नगाड़े में इतना आकर्षण है की हमारा भोला भला व्यक्ति भटक सकता है ये बात डॉ आंबेडकर अच्छी  तरह जानते थे इसीलिए उन्होंने इन प्रतिज्ञाओं की जरूरत महसूस हुई होगी| पर ये  भी सच है की इन प्रतिज्ञाओं की जड़ और इतिहास जाने बिना लोग इनको जानकर भी मान नहीं पाते, उन्हें ये प्रितिग्य अजीब तो लगती हैं पर कभी इनकी जड़ तक पहुचने की कोशिश नहीं करते, और हिन्दू दलित बने रहते हैं |उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.ये 22 प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं.  प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:

  1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
  4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
  5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
  6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
  7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
  8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
  9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
  10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
  11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
  12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
  13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
  14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
  15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
  16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
  17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
  18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
  19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
  20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
  21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
  22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.                                              डा बी.आर. अम्बेडकर