अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद के ऊपर दलितवाद का हावी होना बहुत ज्यादा चिंताजनक है,तथाकथित “दलित चिंतक/ नेता” दलितवाद फैला रहे हैं ,इनको मंच माला और माइक की लत लग चुकी है, ये कोई असरदार संगर्ष करने की बजाये केवल कौम को कमजोर साबित करने में लगे हैं|ब्राह्मणवाद को अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद से खतरा है पर दलितवाद उनके हक़ में हैं…S.Prem


dalit tyagoअम्बेडकरवाद और बुद्धवाद के ऊपर दलितवाद का हावी होना बहुत ज्यादा चिंताजनक है,तथाकथित “दलित चिंतक/ नेता” दलितवाद फैला रहे हैं ,इनको मंच माला और माइक की लत लग चुकी है, ये कोई असरदार संगर्ष करने की बजाये केवल कौम को कमजोर साबित करने में लगे हैं|ब्राह्मणवाद को अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद से खतरा है पर दलितवाद उनके हक़ में हैं…S.Prem

विचारधारा के बिना कोई भी आंदोलन कभी भी जनांदोलन नहीं बन सकता ऐसा आंदोलन एक स्वयं सेवी संस्था के रूप में पैदा होकर दो चार मीटिंग आठदस सम्मलेन आयोजित करके समय के अंधकार में खो जाता है !

बहुजन संगठनों की वर्तमान स्थिति विचारधारा बिना रोज मरते संगठनो से तो अलग है लेकिन उनके पास अम्बेडकरवाद के नाम पर दलितवाद की विचारधारा है जिसे वह केवल sc वर्ग तक ही सिमट कर रह जाते हैं इसमें इन बहुजन राजनैतिक/सामाजिक संगठनों का निजी स्वार्थ छिपा होता है !

मंच माला और माइक की लत लग चुकी है इन संगठनों के नेताओं को वे कभी भी बड़ा नहीं सोच सकते , ऐसे संगठनों के पास मुद्दों की भी कमी होती है वे केवल दलितवाद के प्रचार द्वारा OBC से दुरी बढ़ा रहे हैं उनके पास नेतृत्व की कमी है नेताओं की कमी है लेकिन पहुँच और संसाधनों का अभाव कतई नहीं हैं क्योंकि मोटा पैसा चन्दा मिलता है इनको !

इन संगठनों की सार्थकता तभी है जब यह निस्वार्थ भाव से अम्बेडकरवादी विचारधारा के प्रचार प्रसार और विस्तार के लिए ईमानदारी से काम करें , दलितवाद से बाहर निकलकर obc को भी साथ मिलाये बल्कि उन्हें नेतृत्व प्रदान करें अलग अलग बहुजन संगठनों में तालमेल बिठाने के प्रयास होने चाहिए उनकी कार्यप्रणाली को अधिक से अधिक लोकतांत्रिक बनाने के लिए संयुक्त इकाइयों का गठन किया जा सकता है इन सभी अलग अलग संगठनों पर नियंत्रण के लिए एक केंद्रीय इकाई का गठन भी होना चाहिए !

इस तरह हम अधिक तेजी से आगे बढ़ सकते हैं वर्ना वो दिन दूर नहीं जब अलग अलग संगठनों को अलग अलग ही बेमौत मार दिया जायेगा और हम देखते रह जायेंगे !!

बहुजनों की दयनीय स्थिति का प्रचारप्रसार ही दलितवाद है जबकि इससे उभरने के उपाय और संगर्ष ही अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद है | ब्राह्मणवादी मीडिया भी तो यही काम करता है दलित अगर पिटता है तो वो राष्ट्रीय खबर होती है पर अगर संगर्ष करता है या पीट देते है तो ये मीडिया उस खबर को छिपा देते हैं| यही है दलितवाद जो तथाकथित दलित चिंतक कर रहे हैं, क्या आप समझ पाएंगे की ये लोग भी ब्राह्मणवादी मीडिया का ही काम कर रहे हैं कौम का भला नहीं|
अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद के ऊपर दलितवाद का हावी होना बहुत ज्यादा चिंताजनक है

-शकील प्रेम

2 thoughts on “अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद के ऊपर दलितवाद का हावी होना बहुत ज्यादा चिंताजनक है,तथाकथित “दलित चिंतक/ नेता” दलितवाद फैला रहे हैं ,इनको मंच माला और माइक की लत लग चुकी है, ये कोई असरदार संगर्ष करने की बजाये केवल कौम को कमजोर साबित करने में लगे हैं|ब्राह्मणवाद को अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद से खतरा है पर दलितवाद उनके हक़ में हैं…S.Prem

  1. thank you veri much sahi kah rahe ho aap aisi hi vichardhara ko apnana hoga aise hi kaam karna hoga tabhi bahujano ka vikas hoga aur ajadi milegi namo buddhay jay moolnivasi jai bheem .

  2. शकील भाई मैंने आपकी पुस्तक ‘धर्म एक अफीम’ पढ़ी है | बेहतरीन किताब है | मेरा मानना है कि समस्या तब अति है जब किसी भी आंदोलनधर्मी वैचारिकी के साथ वाद लग जाता है | अम्बेडकरवाद और बुद्धवाद का मामला भी इससे अलग नहीं है

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