पुराने ब्राह्मणवादी संविधान मनुस्मृति में जाती देखकर दंड देने की व्यस्था थी,शूद्र तो तड़पाकर मार दो ब्राह्मण तो अधिक से अधिक देश निकाला| इस अमानवीय न्याय व्यस्था की जगह इंडियन पीनल कोड IPC नमक सामान न्याय व्यस्था देने वाले लार्ड मेकाले के जन्मदिन 25 अक्टूबर को बहुजन समाज उन्हें कुछ इस तरह याद किया …National Dastak


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लार्ड मैकाले के जन्मदिन पर उनके योगदान को लेकर सोशल साइट्स पर पर बहस तेज़ हो गयी है. विदित हो की सदियों से इस देश में मनुस्मृति व्यवस्था लागू रही है. जाति क्रमानुसार पर दंड व्यवस्था निर्धारित की गयी थी. साथ ही अंग्रेजी के आगमन की वजह से मनुवादी भाषा संस्कृत का वर्चस्व टूट गया और बड़ी संख्या में बहुजन शिक्षित होने लगे. ये बात भी दीगर है की मैकाले का उद्देश्य वो नहीं था जो हो गया. पर जो हुआ है उसका जश्न मनाया ही जाना चाहिए. 25 अक्टूबर को उनका जन्मदिन था। इस मौके पर लोगों ने अपने विचार शेयर किए हैं…
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा है…
आज़ाद भारत के पहले आतंकवादी नाथूराम गोडसे को जिनकी वजह से फाँसी हुई.
मैकाले से भारतीय प्रभु वर्ग की नफ़रत इसलिए नहीं है कि उन्होंने इंग्लिश एजुकेशन को बढ़ावा दिया। आप जानते ही हैं कि इंग्लिश एजुकेशन का सबसे ज़्यादा लाभ सवर्ण ही उठा रहे हैं।
मैकाले से दिक़्क़त किसी और बात के लिए है।
भारत के पहले लॉ कमीशन के चेयरमैन होने के नाते मैकाले ने इंडियन पीनल कोड (IPC) बनाया, जिससे तमाम जातियों और समुदायों (ब्रिटिश लोग भी) के लिए समान अपराध के लिए समान दंड का प्रावधान किया.
इस वजह से न तो वे ब्रिटिशर्स के बीच लोकप्रिय हुए, न उन जातियों के बीच, जिनके लिए IPC से पहले लागू दंड विधान, अपेक्षाकृत नर्म थे.
समान अपराध के लिए अलग अलग जातियों को अलग अलग दंड दिए जाने का मैकाले ने अंत कर दिया.
मिसाल के तौर पर IPC न होता तो नाथूराम गोडसे को फाँसी नहीं होती, क्योंकि वह ब्राह्मण था.
एक लिंक शेयर करते हुए दिलीप मंडल लिखते हैं…
जो लोग भी कहें कि मैकाले ने यह कहा था, वह कहा था, भारत में कोई भी भिखारी नहीं देखा टाइप बातें, तो अगर वह आदमी पढ़ सकता है तो यह पढ़ा दीजिए कि मैकाले ने भारतीय शिक्षा के बारे में यह कहा था। बाक़ी सब गप है। दीक्षित जी की फ़ैक्टरी से निकला है।
आंबेडकर फुले युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ ओम सुधा लिखते हैं- 
और इस तरह मैकाले ने मनु की पुंगी बजा दी थी..
आज की तारीख में ” मनु की औलाद” इस सदी की सबसे गन्दी गाली है. किसी घनघोर संघी को भी मनु औलाद कहके देखियेगा. कैसे भड़क जाएगा. मरने मारने पर उतारू हो आएगा.ये सब ऐसे ही नहीं हो गया. कभी मनुस्मृति इस देश का सबसे पवित्र ग्रन्थ था. वो किताब मनु स्मृति ही है जिसने देश में भारत में वर्ण व्यवस्था को पुष्पित-पल्लवित किया. हम सब इस बात से भिग्य हैं की तमाम धर्म ग्रन्थ बहुजन-स्त्री विरोधी हैं. ऋग्वेद के दसवें मंडल के पुरुसूक्त में ही सबसे पहले वर्णव्यवस्था की नीव रखे जाने का वर्णन मिलता है. जिसमे वर्णित है की ब्राह्मणों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से , राजपूतों की बाजू , विषयों की जंघा और शूद्रों की पैर से हुयी है. कालांतर में महामना ज्योतिबा फुले ने इन ग्रंथों की तार्किक तरीके से बघिया उधेर कर रख दी.
लार्ड मैकाले जिंदाबाद..
सिंह बलदेव महतो लिखते हैं…
ब्राह्मणी शिक्षा पद्धति के समर्थक यह बताने का कष्ट करेंगे कि पेशवा शासन के काल में किस राजा के यहां कोई अहीर, कुर्मी, सैनी, भंगी, चमार, मोची, बैरवा, रैगर, भांभी, कोली, धोबी, मीणा, नाई, कुम्हार, खाती या इसी प्रकार कोई एससी, एसटी या ओबीसी समुदाय का व्यक्ति मंत्री, पेशकार, महामंत्री या सलाहकार रहा हो?
पुणे के पेशवा शासन के काल के भारत के गुरुकुलों में ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के बच्चे को प्रवेश ही नहीं दिया जाता था. महिलाओ की शिक्षा नहीं थी. 1818 में देश में 2% लोग साक्षर थे. ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय में एक भी व्यक्ति साक्षर नहीं था.
ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन ने सन 1835 ई. में भारत के लिये एक विधि आयोग का गठन किया था, जिसका अध्यक्ष बना कर लॅार्ड मैकाले को भारत भेजा गया. इसी वर्ष लार्ड मैकाले ने भारत में नई शिक्षा नीति की नींव रखी. 6 अक्टूबर 1860 को लॅार्ड मैकाले द्वारा लिखी गई भारतीय दण्ड संहिता लागू हुई और मनुस्मृति का विधान खत्म हुआ.
ओबीसी, एससी और एसटी के बच्चो के लिए शिक्षा के द्वार लार्ड मेकोले की नयी शिक्षा नीति लागु होते ही खुले और पिछड़ेवर्गों के बच्चे का ब्राह्मणों के बच्चे के साथ शिक्षा में स्पर्धा का प्रारम्भ हुवा. इसीलिए राजीव दीक्षित जैसे जातिवादी प्रचारकों लार्ड मेकोले के विरोधी रहे है.
तुलसी राम कनौजिया ने लिखा….
आज आधुनिक भारत की नींव रखने वाले लार्ड मैकाले का जन्मदिन है जिन्होंने भारत मे अंग्रेजी शिक्षा के साथ-साथ यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान, प्रजातंत्र, न्यायपालिका, मनुष्यों की समानता आदि विचारों की नीव रखी और हमें यहाँ के पाखंडियों द्वारा फैलाए गए अंधविश्वासों से किसी सीमा तक मुक्ति दिलाई.

 

संघप्रिय गौतम ने लिखा है…
आज लार्ड मैकाले का जन्म दिन मनाया गया
मैकाले के कारण ही बाबा साहेब पढ पाये और बाबा साहेब के कारण ही आज हम यहाँ हैं तो उनको नमन तो बनता ही है

 

सुशीला धुर्वे ने लिखा है…
यूँ कहें की लार्ड मैकाले ने सीधे सीधे .. मनु स्मृति को ही ध्वस्त कर दिया था
जहाँ भारत भूमि में शिक्छा सिर्फ आर्यों की बपौती थी …सुनने पर कान में पिघला शीसा और बोलने पर जीभ काट ली जाती थी ..अधिनियम १८१३ के तहत हमे शिक्छा का अधिकार दिया ……और आज हम फेसबुक के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान कर रहे हैं
जहाँ मनुवाद के तहत ब्राम्हण को सजा नही होती थी ..मैकाले के कारण १७७५ में भारत भूमि में पहले ब्राम्हण नन्द कुमार को फांसी दी गई ………….ब्राम्हण मन्दिरों में शूद्रों ..आदिवासियों की नर बली देते थे उस पर रोक लगाई
और सरकारी नौकरी पर जातिगत भेदभाव हटाया …..शिक्छा का माध्यम अंग्रेजी बनाने के कारण आज हम पुरे विश्व से जुड़े हैं
तो क्या हमे लार्ड मैकाले को …….सम्मान से याद नही करना चाहिए ?

 

बसंत वर्मा ने लिखा है…
लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति
1. इसका आधार तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार उत्पन्न आवश्यकतायें रहीं.
2. लॅार्ड मैकाले ने शिक्षक भर्ती की नई व्यवस्था की, जिसमें हर जाति व धर्म का व्यक्ति शिक्षक बन सकता था. तभी तो रामजी सकपाल (बाबा साहेब डॉक्टर अम्बेडकर के पिताजी) सेना में शिक्षक बने.
3. जो भी शिक्षा को ग्रहण करने की इच्छा और क्षमता रखता है, वह इसे ग्रहण कर सकता है.
4. इसमें धार्मिक पूजापाठ और कर्मकाण्ड के बजाय तार्किकता को महत्त्व दिया जाता है.
5. इसमें इतिहास, कला, भूगोल, भाषा-विज्ञान, विज्ञान, अभियांत्रिकी, चिकित्सा, भेशजी, प्रबन्धन और अनेक आधुनिक विद्यायें शामिल हैं.
6. इसका माध्यम प्रारम्भ में अंग्रेजी भाषा और बाद में इसके साथ-साथ सभी प्रमुख क्षेत्रीय भाषाएं हो गईं.
7. इसमें ज्ञान-विज्ञान, भूगोल, इतिहास और आधुनिक विषयों की प्रचुरता रहती है और अतिश्योक्ति पूर्ण या अविश्वसनीय बातों का कोई स्थान नहीं होता है.
8. इस नीति के तहत सर्व प्रथम 1835 से 1853 तक लगभग प्रत्येक जिले में एक स्कूल खोला गया. आज यही कार्य राज्य और केंद्र सरकारें कर रही हैं. साथ ही निजी संस्थाएं भी शामिल हैं.
9. भारत में स्वाधीनता आंदोलन खड़ा हुआ, उसमें लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा पद्धति का बहुत भारी योगदान रहा, क्योंकि जन सामान्य पढ़ा-लिखा होने से उसे देश-विदेश की जानकारी मिलने लगी, जो इस आंदोलन में सहायक रही.
10. यह विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में लागू होती आई है.
11. इसको ग्रहण करने में किसी तरह की कोई पाबन्दी नहीं रही, अतः यह जन साधारण और दलितों के लिये सर्व सुलभ रही. अगर शूद्रों और दलितों का भला किसी शिक्षा से हुआ तो वह लार्ड मैकाले की आधुनिक शिक्षा प्रणाली से ही हुआ. इसी से पढ़ लिख कर बाबासाहेब अम्बेडकर डॉक्टर बने.
12. इसमें तर्क को पूरा स्थान दिया गया है. धर्म अथवा आस्तिकता-नास्तिकता से इसका कोई वास्ता नहीं है.
13. यह गरीब भिखारी से लेकर राजा-महाराजा, सब के लिये सुलभ है.
14. इसमें सर्व वर्ण व सर्व धर्म समान हैं. आदिवासी और मूलनिवासी भी इसमें शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं. लेकिन जहां-जहां संकीर्ण मानसिकता वाले ब्राह्मणवादियों का वर्चस्व बढ़ा है, उन्होनें इसमें भी दलितों को शिक्षा से वंचित किया है.
15. इससे हम आधुनिक विश्व से सरलता से परिचित हो रहे हैं.
16. इसमें सभी जातियां, वर्ण और धर्म समान हैं.

http://www.nationaldastak.com/story/view/lord-macauley-birthday-social-media-reaction

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