संविधान की ‘समीक्षा’ बनाम संविधान की ‘सुरक्षा’…प्रो. रतन लाल


यह पोस्ट मेरी ओर से सफाई भी है और भारत में ‘दलित/सर्वहारा’ मुक्ति की चुनौतियों को समझने का अल्प प्रयास भी है. इसलिए पहले सफाई:

पिछले डेढ़ वर्ष से ही सोशल मीडिया पर एक्टिव हुआ हूँ. अपने अल्प-ज्ञान से थोड़ा बहुत लिखने का प्रयास करता रहता हूँ. आपके कमेंट्स मेरी समझ को बढ़ाने ऑक्सीजन का काम करते रहते हैं, लेकिन मेरे कुछ मित्रों को मेरे बारे में कुछ गलतफहमी हुई है. मैं न तो कोई बड़ा सिद्धांतकार हूँ और न ही नेता. पारिवारिक और व्यवसायिक जीवन से जो समय बचता है, थोड़ा-बहुत लिख लेता हूँ और यदा-कदा प्रगतिशील आन्दोलनों में भागीदारी भी कर लेता हूँ. इसलिए आपके सभी सवालों का जवाब देने में और सभी समस्यायों का समाधान ढूँढने में असहाय और असमर्थ महसूस करता हूँ.

प्रसिद्द समाजशास्त्री हैबरमॉस ने कहा है कि अब दुनिया Mono-Causal होगी, अर्थात् किसी एक मुद्दे के इर्द-गिर्द आन्दोलन का स्वरुप तय होगा और फिर विस्तार. जैसे – बीजेपी ‘राम-राम’ करते-करते आज सबसे बड़ी ‘राष्ट्रवादी’ पार्टी बन है है और मिथकीय राम उनके ‘राष्ट्र’ का पर्याय. इस बात को थोड़ा सरल तरीके से समझने की कोशिश करता हूँ. मान लीजिए पानी में लोहा काटना हो तो कैसे कटता है, वेल्डिंग मशीन तो पानी में जा नहीं सकता? लोहे को पानी की धार से ही काटा जाता है, अर्थात पानी के concentration लेवल को बढ़ाकर. शायद आन्दोलन में भी यही फार्मूला लागू होगा, या होता है. इसलिए जो साथी दुनिया की सारी समस्यायों का एक साथ समाधान करना चाहते हैं, उन्हें उनका प्रयास मुबारक.

बहरहाल, प्रसिद्द इतिहासकार D.D. Kosambi ने लिखा है, “मार्क्सवाद इतिहास का पर्याय नहीं, इतिहास को   समझने की एक विधि है.” लेनिन ने मार्क्स को अपने काल और परिस्थिति के अनुसार पढ़ा, माओ ने भी अपनी काल और परिस्थिति के अनुसार मार्क्स को पढ़ा– नतीजा सामने है. बाद की स्थितियों पर अभी मैं नहीं जाना चाहता, लेकिन यह तो सत्य है कि लेनिन और माओ ने क्रांति को ज़मीन पर उतारा. अब यक्ष प्रश्न यह है कि भारत के ‘क्रांतिकारियों’ ने मार्क्स को भारत की परिस्थितियों के अनुसार ज़मीन पर उतारा– शायद नहीं! क्या वे वर्ग, जाति, जेंडर, और ‘संस्कृति’ के संबंधों में ‘शक्ति’ के ‘सम्बन्ध’ और ‘खेल’ को समझ पाए– शायद  नहीं. इस विषय पर कभी विस्तार से!

अब प्रश्न है, कैसे हो बदलाव? दुनिया भर में क्रांतियों का इतिहास बतलाता है कि इन क्रांतियों की वैचारिक अगुआई बुद्धिजीवी वर्ग ने की है. यदि मार्क्सवादी शब्दावली में कहें तो बुर्जुआ वर्ग ने नेतृत्व प्रदान किया है. लेकिन क्या भारत में दलितों, आदिवासियों या ‘पिछड़ों’ का वह वर्ग तैयार हुआ है– शायद नहीं! आज़ादी के बाद आरक्षण के द्वारा थोड़ा बहुत जो लोग पढ़ पाए, वे अधिकारी, डॉक्टर और इंजिनियर बने. पहली पीढ़ी थी, घर-परिवार संभालना इत्यादि में ही जीवन गुजर गई. फिर व्यवसायिक सेंसर और अपने बड़े अधिकारीयों एवं नेताओं के ‘मनुवादी’ आतंक ने उन्हें हमेशा डर के साए में  ही रखा. इसलिए संभव है मजबूरन उन्हें ‘चुप्पी’ बनाए रखना पड़ा.  आखिर यह बौद्धिक जमात कहाँ से आएगा?

विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों ही बौद्धिक निर्माण के केंद्र हैं. लेकिन एक साजिश के तहत विश्वविद्यालयों और शोध संस्थान से इस पूरे ‘जमात’ को बाहर रखा गया. अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में 1997 में और पिछड़ा वर्ग के लिए 2007 में आरक्षण लागू किया गया. लेकिन  क्या इन वर्गों को इन संस्थानों में समुचित प्रतिनिधित्व मिला? यक़ीनन नहीं, अभी भी पर्याप्त हेरा-फेरी है. फिर भी कुछ लोग शिक्षण संस्थानों में आये हैं. लेकिन ज्यादातर लोग पहली पीढ़ी के ही हैं, इसलिए घर-परिवार इत्यादि की उलझनें तो हैं ही, ‘मनुवादी’ सोच वाले प्रिंसिपल, वाईस-चांसलर, डायरेक्टर का आतंक अलग से. इसलिए ज्यादातर लोग डर के मारे अपने संस्थान में ही नहीं बोल पाते, व्यवस्था पर क्या बोलेंगे?

हाँ, यह बात जरुर है कि अब कुछ लोगों ने लिखना-पढ़ना, व्यवस्था पर प्रश्न उठाना शुरू कर दिया है. लेकिन समस्या यह है कि जैसे दुनिया का हर ‘क्रांतिकारी’ अपने को ज्यादा ‘क्रांतिकारी’ और दूसरे को प्रति-क्रांतिकारी समझता है, उसी तरह से वंचितों की यह छोटी सी ‘बौद्धिक’ जमात, आपस में ही एक दूसरे से बड़ा ‘सिद्धान्तकार’ और ‘क्रांतिकारी’ साबित करने में लगा हुआ है. ऐसे ज्यादातर ‘बुद्धिजीवी’ चाहते है कि इन्हें हर जगह मुख्य अतिथि के रूप में बुलाया जाय, TA, DA भी मिले, ज़मीन बंगला भी हो और लोग इन्हें ही सबसे बड़े ‘क्रांतिकारी’ समझें.

जनाब, जिस दिन आप एक कार्यकर्ता बनकर लोगों के लिए दरी बिछाना शुरू कर देंगे, जेब से कुछ पैसा ढीला करना शुरू कर देंगे, स्थितियां जरुर बदलेंगी. मैं आशावादी हूँ, इतना तो स्पष्ट है विचार मंथन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है. विश्वविद्यालयों में बढ़ते प्रतिनिधित्व और लगातार दमन इस बात का प्रतीक है कि परंपरागत सोच वालों को दर्द होना शुरू हो गया है. रोहित वेमुला ही ‘आत्म-हत्या’, और देश भर के विश्वविद्यालयों में ‘परम्पगत’ मानसिकता पर सवाल उठाने वाले शिक्षकों और छात्रों का दमन अकारण नहीं है.

अब थोड़ी सी चर्चा संविधान की:

संविधान को लेकर आजकल दो तरह की चर्चाएँ आम हैं: पहला, ‘संघ परिवार’ बार-बार संविधान की समीक्षा की बात कर रहा है और दूसरा देश में कई संगठन हैं जो संविधान बचाओ आन्दोलन चला रहे हैं. अब प्रश्न है कि संविधान समीक्षा के क्या निहितार्थ हैं? क्या इसके प्रजातंत्रीय और संघीय स्वरुप को बदल कर ‘हिंदूवादी’, मनुवादी संविधान बनाने की मंशा है? मैं समझता कोई भी दस्तावेज़, ‘सम्पूर्ण’ और ‘पवित्र’ नहीं होता. काल, परिस्थित और परिवर्तन के अनुसार उस दस्तावेज़ में भी परिवर्तन/संशोधन होते हैं. भारत के संविधान में लगातार संशोधन का होना भी इस बात का प्रमाण है.

हाँ, यदि संघ-परिवार, संविधान की समीक्षा कर उसे ‘हिंदूवादी’ स्वरुप में बदलने का प्रयास कर रहा है, तो उसका विरोध करने की जरुरत है. कम से कम यह तो प्रयास करने की जरुरत है कि संविधान हमें जो मौलिक और अन्य अधिकार देता है उसकी रक्षा हो सके.
अंत में,

आखिर कौन घबराता है ‘समीक्षा’ से? 

समीक्षा तो इस बात कि होनी चाहिए कि आज़ादी के सत्तर साल बाद भी संविधान की प्रस्तावना में उल्लिखित स्वतंत्रता, समता, बंधुता और न्याय क्यों नहीं प्राप्त किया जा सका है? देश में अमीरी और गरीबी की खाई क्यों बढ़ती जा रही है? चालीस प्रतिशत से ज्यादा लोग गरीबी रेखा के नीचे क्यों है? अल्पसंख्यक, दहशत में क्यों है? संसाधनों में समुचित भागीदारी क्यों नहीं हुई है?

देश के तमाम संसाधन – अर्थ, राजनीति, अफसरशाही, न्यायपालिका, शिक्षा – कुछ परिवारों और समुदायों के नियंत्रण में क्यों है? यदि संविधान की ‘समीक्षा’ इस दिशा में हो तो स्वागत है, नहीं तो………संघर्ष जारी रहे!!! जय भीम!!!!

नोट: भाषा मर्यादित रखें, परिवर्तन धैर्य का काम है, थोड़ा धैर्य रखें और ईमानदार प्रयास जारी रखें!
source: http://www.nationaldastak.com/story/view/-constitution-review-versus-his-security

   

prof-ratan-lal

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s