संविधान दिवस (26NOV) विशेषः भारत का भविष्य बना था संविधान…Adv. Nitin Meshram(सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता) [आम जनता और लालची बेरहम राजनीतिक/कॉरपोरेट लुटेरों के बीच सिर्फ संविधान खड़ा है, जिस दिन वो लोग इसे हटाने में कामयाब हो गए, तो फिर जनता गुलामी करने को मजबूर हो जायेगी, और तब कोई ईश्वर या भगवान् बचा नहीं पायेगा| सरकारी संस्थाओं का कमजोर होना व सेठों/धर्म का ताकतवर होते जाना बेहत चिंताजनक बात है]


ambedkar_5भारत का संविधान 26 नवंबर 1949 में स्वीकार किया गया. संविधान के मायने क्या होते हैं, शायद उस समय भारत के लोगों को यह पता नहीं था. लेकिन दुनिया में संविधान का महत्व स्थापित हो चुका था. अमेरिका में 1779 में संविधान बन चुका था. हालांकि यूनाइटेड किंगडम (यूके) में उस तरह का संविधान नहीं है लेकिन वहां MAGNA CARTA जैसी संवैधानिक अधिकारों की व्यवस्था कायम हो चुकी थी जिसके तहत राजा ने अपनी जनता के साथ अपने अधिकारों को बांट लिया था. वहां अब तक इसी तरह के कई सेटेलमेंट से बनी व्यवस्था कायम है और 15 जून 2015 में उसके MAGNA CARTA को 800 साल होने वाले हैं. संविधान असल में समूह में बंटे लोग जो राष्ट्र बनना चाहते हैं, को मानवीय अधिकार दिलाता है. इसके तहत लोगों के लिए स्वतंत्रता, बंधुता, न्याय और समानता की व्यवस्था कि निर्माण किया जाता है. यह सभी मनुष्यों को एक समान अधिकार देता है और मनुष्यों के बीच भेदभाव को अपराध भी घोषित करता है. 1950 के बाद विश्व के लगभग 50 देशों ने अपना संविधान बनाया. भारत उनमें सबसे पहले है. हालांकि यहां यह भी साफ करना जरूरी है कि आजादी का आंदोलन और भारत के संविधान का आपस में कोई संबंध नहीं है. दोनों अलग-अलग घटनाएं हैं. जब सन् 1928 में साइमन कमीशन का भारत में आगमन हुआ तो उस समय कंस्टीट्यूशनल सेलेटमेंट  की बात उठी, क्योंकि भारत एक विभाजित देश है और यह कई जातियों, धर्मों, रीति-रिवाजों, समुदायों और क्षेत्रों में बंटा हुआ है. ब्रिटिश लोग और भारत के लोग दोनों इस बात को जानते थे. संविधान निर्माण के जरिए इस बिखरे हुए लोगों के समुदाय को एक राष्ट्र करने की कोशिश की गई. हालांकि भारत इसमें कितना सफल हो पाया है, यह एक गंभीर बहस का मुद्दा है.

जब अंग्रेज भारत छोड़ कर जाने को तैयार हुए औकी प्रक्रिया शुरू हुई तो इससे पहले कंस्टीटयूशनल सेटेलमेंट की बात उठी. अंग्रेजों ने यह तय करना जरूरी समझा कि भारत को सत्ता के हस्तानांतरण के बाद भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ही लागू हो. इस पूरी प्रक्रिया में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर की प्रमुख भूमिका रही. अगर हम बाबासाहेब के संपूर्ण जीवन को देखें तो यह साफ होता है कि कंस्टीट्यूशन सेटेलमेंट को लेकर वह कितने गंभीर थे. बाबासाहेब इस बात को लेकर हमेशा सक्रिय रहें कि भारत में कंस्टीट्यूशनल सेटेलमेंट कैसे हो. उनका मानना था कि देश में सामाजिक क्रांति तभी स्थायी होगी जब उसे संवैधानिक गारंटी होगी. क्योंकि वह संविधान के जरिए देश में समानता स्थापित करना चाहते थे. वह चाहते थे कि जाति और जन्म के आधार पर किसी काम को करने की बाध्यता या फिर न करने की मनाही न हो. डॉ. आंबेडकर संविधान के जरिए इन चीजों को खत्म करना चाहते थे. वह चाहते थे कि संविधान के जरिए भारत से असमानता खत्म हो और समानता आए. लोगों को उनके मूलभूत अधिकार (फंडामेंटल राइट्स) को लेकर गारंटी मिले.

के.सी वैरी (Kenneth Wheare) नाम के एक संवैधानिक विशेषज्ञ ने मार्डन कांस्टीट्यूशन नाम से एक किताब लिखी है. उन्होंने यह किताब 1950 के बाद बने कई देशों के संविधान का अध्ययन करने के बाद लिखी है. किताब में उसने बताया है कि आखिर किसी देश को संविधान की जरूरत क्यों पड़ती है? उन्होंने तीन परिस्थितियों में संविधान की जरूरत बताया. पहली स्थिति के तौर पर उनका कहना है कि किसी देश में सामाजिक क्रांति के बाद जब आजादी मिलती है और सत्ता किसी एक के हाथ से निकल कर दूसरे के पास जाती है तो इस क्रम में कई बदलाव आते हैं. तब आप पहले के नियम-कानून को मानते नहीं है और आपके पास नए नियम-कानून होते नहीं है. ऐसी स्थिति में जिन चीजों को आप चाहते हैं उन्हें संवैधानिक वैद्यता (Sanctity) की जरूरत होती है. संविधान को लेकर दूसरी स्थिति तब होती है कि जब किसी देश को दूसरे देश की गुलामी से मुक्ति मिलती है. इसी क्रम में तीसरी स्थिति यह होती है कि अगर किसी देश में पहले से ही संवैधानिक लोकतंत्र था पर उसमें कोई संकट आ गया और उसने काम करना बंद कर दिया. इन तीनो पस्थितियों में संविधान की जरूरत होती है. भारत के संदर्भ में बात करें तो यहां दो स्थितियां एक साथ थी. भारत में सामाजिक क्रांति कामयाब हो रही थी, वहीं दूसरी ओर देश अंग्रेजों की गुलामी से आजाद हो रहा था. संवैधानिक तौर पर भारत में जाति और वर्ण जैसी व्यस्था और मनुस्मृति के तहत बनाए गए कानून के खत्म होने का वक्त आ गया था. शाहूजी महाराज, जोतिबा फुले, नारायणा गुरु और बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के माध्यम से देश में जो सामाजिक क्रांति आई थी, उसे अपनी एक पहचान चाहिए थी. इन दोनों स्थितियों में भारत में भी संविधान की जरूरत थी. हालांकि यहां यह कहना ज्यादा सही होगा कि भारत में राजनीतिक क्रांति की बजाय सामाजिक क्रांति की वजह से संविधान बना है. क्योंकि जो लोग राजनीतिक क्रांति में सक्रिय थे वो नहीं चाहते थे कि भारत में संविधान हो. वह बिना संविधान के ही भारत देश को चलाना चाहते थे. लेकिन भारत में सामाजिक क्रांति के कारण इतने ज्यादा मजबूत थे कि राजनीतिक लोग चाह कर भी संविधान निर्माण को रोक नहीं पाएं. डॉ. आंबेडकर के लगातार सक्रिय रहने के कारण ब्रिटिशर्स भी भारत में मौजूद सामाजिक असमानताओं को समझ चुके थे और संविधान के पक्ष में थे. इस तरह से भारत का संविधान बनने की प्रक्रिया पर मुहर लगी.

इन सारी चीजों की वजह से 9 अगस्त 1946 को 296 सदस्यों की संविधान सभा बनी. देश का विभाजन होने के कारण इसमें से 89 सदस्य चले गए. इस तरह भारतीय संविधान सभा में 207 सदस्य बचे और इसकी पहली बैठक में सिर्फ 207 सदस्य ही उपस्थित थे.

इसमें बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर पहली बार 9 दिसंबर 1946 को बंगाल से चुनकर आए. इसके तुरंत बाद भारत का विभाजन हो गया, जिसके बाद बाबासाहेब जिस संविधान परिषद की सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे उसे पाकिस्तान को दे दिया गया. इस तरह बाबासाहेब का निर्वाचन रद्द हो गया. यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि विभाजन के वक्त जिस तरह डॉ. आंबेडकर के प्रतिनिधित्व वाले हिस्से को पाकिस्तान को दे दिया गया, उसे भी तमाम जानकारों ने कांग्रेस की साजिश करार दिया है. यह इसलिए किया गया ताकि डॉ. आंबेकर संविधान सभा में नहीं रह पाएं. हालांकि इन साजिशों को दरकिनार करते हुए बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर दुबारा 14 जुलाई 1947 को चुन कर आएं. यहां बाबासाहेब के दुबारा संविधान सभा में चुने जाने को लेकर लोगों में यह भ्रम है कि कांग्रेस ने उन्हें सपोर्ट किया. जबकि हकीकत कुछ और है और ऐसा कह कर सालों से लोगों को गुमराह किया जा रहा है. इतिहास और सच्चाई यह है कि अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर संविधान सभा (Constituent Assembly) में नहीं होते तो भारत का संविधान नहीं बन पाता. मान्यवर कांशी राम साहब ने भी इस बात को कहा है. दूसरी बात, डॉ. आंबेडकर जब 14 जुलाई 1947 को दुबारा चुन कर के आएं, उसके बाद ही यह घोषणा हुई कि 15 अगस्त को अंग्रेज भारत को सत्ता का हस्तानांतरण करेंगे. असल में डॉ. आंबेडकर जब पहली बार संविधान सभा में चुन कर आएं और विभाजन के बाद अपने निर्वाचन क्षेत्र के पाकिस्तान में चले जाने के कारण संविधान सभा का हिस्सा नहीं रहे, उस वक्त यूनाइटेड किंगडम (यूके) की पार्लियामेंट में इंडियन कांस्टीटूएंट असेंबली का बहुत कड़ा विरोध हुआ. और विरोध को दबाने के लिए नेहरू को यूके के नेताओं को समझाने के लिए ब्रिटेन जाना पड़ा था. इस विरोध की गंभीरता को इससे भी समझा जा सकता है कि कद्दावर नेता चर्चिल ने यहां तक कह दिया कि भारतीय लोग संविधान बनाने के लायक नहीं हैं. इन लोगों को आजादी देना ठीक नहीं होगा. दूसरी बात, ब्रिटिशर्स अल्पसंख्यकों के हितों को लेकर काफी गंभीर थे. तात्कालिक स्थिति में यूके पार्लियामेंट का कहना था कि अगर भारत में कंस्टीट्यूशनल सेटेलमेंट होता है तो इसमें अल्पसंख्यकों के हितों की गारंटी नहीं होगी. क्योंकि बाबासाहेब का कहना था कि शेड्यूल कॉस्ट और शेड्यूल ट्राइब नहीं हैं. खासतौर पर अछूत हिन्दू नहीं है. बाबासाहेब ने इसको साबित करते हुए अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए सेपरेट सेफगार्ड ( अलग विशेषाधिकार) की बात कही थी. बाबासाहेब की इस बात पर यूके के पार्लियामेंट में बहुत लंबी बहस हुई थी. इस बहस से यह स्थिति पैदा हो गई थी कि अगर भारत में अधिकार के आधार पर, बराबरी के अधिकार पर अल्पसंख्यकों (इसमें एससी, एसटी भी थे) के अधिकारों का सेटेलमेंट नहीं होगा तो भारत का संविधान नहीं बन पाएगा और इसे वैद्यता नहीं मिलेगी. और अगर संविधान नहीं बनेगा तो फिर भारत को आजादी (तथाकथित) नहीं मिलेगी. ऐसी स्थिति में बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर को बाम्बे से चुनकर लाना कांग्रेस और पूरे देश की मजबूरी हो गई थी. यहां एक तथ्य यह भी कहा जाता है कि बैरिस्टर जयकर ने डॉ. आंबेडकर के लिए अपना त्यागपत्र दिया था. जबकि ऐसा नहीं है, बल्कि कांग्रेस के कुछ अगड़े नेताओं के साथ मतभेद होने के कारण जयकर ने इन सारी बातों से पहले ही अपना इस्तीफा दे दिया था.

यानि बाबासाहेब को दुबारा चुनकर लाना पूरे देश की मजबूरी हो गई थी. क्योंकि अगर बाबासाहेब को चुनकर नहीं लाया जाता तो देश का संविधान नहीं बन पाता और ऐसी स्थिति में भारत को आजादी मिलने में और वक्त लग सकता था. हालांकि ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास संविधान लिखने वाला कोई दूसरा नहीं था. बल्कि इसमें तथ्य यह है कि अगर बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर कांस्टीट्यूशनल असेंबली में नहीं होते तो भारत के अछूतों के अधिकारों का संवैधानिक सेटेलमेंट होने की बात नहीं मानी जाती और इससे भारत के संविधान को मान्यता नहीं मिलती. भारत को बड़े लोकतंत्र के तौर पर भी दर्जा नहीं मिल पाता. क्योंकि तब यह माना जाता कि संविधान में भारत के बड़े वर्ग (एससी/एसटी) के अधिकारों और स्वतंत्रता की बात संविधान में नहीं है. यह बात इससे भी साबित होती है क्योंकि एच. एल ट्राइव नाम के एक अमेरिकी संवैधानिक विशेषज्ञ ने कंस्टीट्यूशनल च्वाइसेस नाम की किताब लिखी है. उसमें उसका यह कहना है कि जब संविधान बनता है और उसमें बराबरी की बात होती है तो यह बराबरी दो तरह की होती है. एक कानूनी बराबरी होती है और दूसरी असली बराबरी होती है. जो कानूनी बराबरी होती है वो लोगों को समानता का अधिकार देती है.

भारतीय संविधान के तीन लक्ष्य माने जाते हैं. साथ ही इसकी तीन चुनौतियां भी हैं. संविधान का पहला लक्ष्य और चुनौती सामाजिक क्रांति है. दूसरा लक्ष्य एवं चुनौती राजनैतिक क्रांति है. इसी संदर्भ में तीसरा सबसे महत्वपूर्ण कारक अल्पसंख्यक अधिकारों का सेटलमेंट है. जिस सामाजिक क्रांति की बदौलत भारत के संविधान का निर्माण हुआ, उसमें शाहूजी महाराज, जोतिबा फुले, नारायणा गुरु, बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर का बहुत बड़ा योगदान था. इन तमाम महापुरुषों के संघर्षों के बाद बाबासाहेब आंबेडकर के जरिए भारत में जो सामाजिक क्रांति आई, वह एकमात्र कारण है जिससे भारत के संविधान का निर्माण हुआ. यह नहीं होता तो भारत का संविधान नहीं होता. और अगर संविधान नहीं होता तो लोगों के मूलभूत अधिकारों की गारंटी भी नहीं होती. यानि बोलने की, लिखने की, अपनी मर्जी से पेशा चुनने की, संगठन खड़ा करने की, मीडिया चलाने की आजादी नहीं होती. जातिगत भेदभाव को गलत नहीं माना जाता, छूआछूत को कानून में अपराध घोषित नहीं किया जाता.

भारतीय लोगों को संविधान की जरूरत थी. संविधान की जरूरत इसलिए थी क्योंकि उनको एक राष्ट्र बनना था. संविधान के निर्माण के लिए कई समितियां बनी थी. इसमें से बाबासाहेब ड्राफ्टिंग कमेटी के चेयरमैन और एडवाइजरी कमेटी, फंडामेंटल राइट सबकमेटी, माइनारिटी कमेटी और यूनियन कंस्टीट्यूशन कमेटी के सदस्य थे. भारतीय संविधान का इतिहकार Granville Austin ने एक किताब लिखी है, जिसमें उसने डॉ. अंबेडकर को भारतीय संविधान सभा का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति माना है. भारतीय संविधान एक बहुत लंबी प्रक्रिया के बाद बना. 30 अगस्त 1947 को इसकी पहली बैठक हुई. संविधान बनाने के लिए कंस्टीटूएंट असेंबली को 141 दिन का काम करना पड़ा. शुरुआती दौर में इसमें 315 आर्टिकल पर विचार किया गया था. 8 शेड्यूल डिस्कस किए गए थे. ड्राफ्टिंग कमेटी ने 343 आर्टिकल पर विचार किया, 13 आर्टिकल शेड्यूल किया. इसमें 7635 संशोधनों का प्रस्ताव किया गया था, जिसमें 2473 संशोधन संविधान सभा में लाए (मूव किए) गए. 395 आर्टिकल और 8 शेड्यूल के साथ भारत के लोगों ने भारत के संविधान को अपने प्रिय मुक्तिदाता बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर के जरिए 26 नवंबर 1949 को भारत को सुपुर्द किया. आज भारत के संविधान में 448 आर्टिकल हैं. असल में नंबरों के हिसाब से यह आज भी 395 ही है लेकिन बीच-बीच में यह (1) (2) या फिर (a) और (b) के जरिए बढ़ता रहा है. यह 22 हिस्सों में विभाजित है और इसके 12 शेड्यूल हैं. संविधान बनने के बाद अब तक संसद के सामने 120 संशोधन लाए गए लेकिन इसमें से 98 संशोधन ही स्वीकार किए गए.

इस पूरी प्रक्रिया में विशेष यह है कि भारत ने जो संविधान बनाया उससे भारत के नागरिकों को मूलभूत अधिकार मिले. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस समता, बंधुता, भेदभाव मुक्त भारत के उद्देश्यों को लेकर भारत का संविधान बना क्या वह हमें हासिल हो पाया है?  इस प्रश्न के आलोक में देखें तो यह हमें सौ फीसदी तो हासिल नहीं हो पाया है लेकिन यह कहा जा सकता है कि भारत के संविधान ने देश में चमत्कार (Miracle) कर के दिखाया है. दुनिया में जितना बड़ा चमत्कार पहले कभी नहीं हुआ, वह भारत में हुआ. देश का संविधान इसकी वजह बना. अगर विभिन्न देशों से तुलना कर के देखें तो इंग्लैंड के लोगों को भी अधिकार टुकड़ों में मिले. इंग्लैंड की महिलाओं को सबसे पहले 1920 में वोटिंग का अधिकार मिला. इसी तरह अमेरिका का संविधान 1779 में ही बन गया था लेकिन वहां के संविधान में ब्लैक लोगों को नागरिकता नहीं थी. 1865 में जब अमेरिकी संविधान में 13वां संशोधन लाया गया तब अमेरिका के काले लोगों को नागरिकता मिली. यहां यह बताना जरूरी है कि अमरिकी सुप्रीम कोर्ट ने 1857 में काले लोगों को ड्रेड स्टॉक ( Dred Scott) केस में अमरिकी नागरिक मानने से इंकार कर दिया था. इस परिपेक्ष्य में अब्राहम लिंकन 1863 में 13वें संशोधन का प्रारूप लेकर आएं, जिससे काले लोगों को अमरिकी नागरिकता हासिल हुई. भारत का संविधान बनने तक अमेरिकी संविधान में वहां के ब्लैक का मामला पूरी तरह सुलझा नहीं था. 1965 में जाकर अमेरिका में ब्लैक का मामला कुछ हद तक सुलझ पाया. जबकि दूसरी ओर भारत के संविधान में सबसे पहले यह घोषित किया गया कि सभी मनुष्य समान हैं. जाति, धर्म, जन्म, वर्ण, वर्ग, स्थान आदि से परे देश के सभी मनुष्यों को बराबर माना गया. संविधान में साफ तौर पर लिखा गया कि भारत भूमि पर सर्व मनुष्य मात्र समान है. संविधान ने सबको एक सूत्र में पिरोते हुए सभी को ‘भारतीय’ माना और ‘हिन्दुस्तान’ नाम को मिटा दिया. (हिन्दुस्तान पेट्रोलियम जैसे नाम भी असंवैधानिक हैं.)

संविधान बनने के पूर्व भारत के दो-ढ़ाई हजार साल के इतिहास को देखने पर यह बात असंभव मालूम पड़ती है. लेकिन डॉ. आंबेडकर और भारत के संविधान के कारण यह संभव हो पाया. यह इसकी पहली देन है. संविधान की जो दूसरी देन है, वह यह कि जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण, भाषा, स्थान, लिंग आदि जो-जो चीजें भारत के लोगों को बांटती थी, संविधान ने इस आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी और असंवैधानिक घोषित कर दिया. साथ ही मनु द्वारा बनाए हिन्दू धर्म के सारे नियमों को अपराध घोषित कर दिया. संविधान के निर्माण के बाद जो तीसरी खास बात हुई, वह यह थी कि जिन लोगों ने इस देश पर शासन करने का सपना तक नहीं देखा था, संविधान के अधिकार मिलने के बाद इसे हकीकत में पूरा कर दिखाया. जिस देश में रानी के पेट से ‘राजा’ पैदा होता था, उस देश में ‘संविधान’ से राजा पैदा होने लगा. इस तरह से संविधान ने भारत के भविष्य का निर्माण किया है.

हालांकि भारत के पास इतना सुंदर संविधान होने के बावजूद भी वह एक बड़े संकट से गुजर रहा है. क्योंकि संविधान के जरिए सामाजिक क्रांति का जो लक्ष्य रखा गया था, वह उद्देश्य अब तक हासिल नहीं हो पाया है. दूसरा, संविधान के जरिए जिस राजनीतिक लोकतंत्र को हासिल करने का भरोसा जताया गया था, वह भी अभी अधर में ही है. तीसरा जो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य है वह यह है कि भारत में जो वंचित तबका (डिस्क्रीमिनेटेड कम्यूनिटी) है, उसका सेटेलमेंट नहीं हो पाया है. क्योंकि जो गरीब हैं वह उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं (अपवाद छोड़कर) जो वंचित हैं. जो अशिक्षित हैं वह उसी वर्ग से ताल्लुक रखते हैं जो वंचित हैं. 99 फीसदी मामलों में जिन महिलाओं का जबरन शोषण होता है, वह भी इसी डिस्क्रीमिनेटेड कम्यूनिटी से ताल्लुक रखती हैं. यह अपने आप में बहुत बड़ी समस्या है. हाल ही में संविधान के जरिए शिक्षा का, काम का और भोजन का अधिकार दिया गया है लेकिन इस तरह की योजनाएं इसलिए कारगर नहीं हैं क्योंकि इसे लागू करने वाले लोग ईमानदार नहीं हैं. 25 नवंबर 1949 को बाबासाहेब ने संविधान सभा में भाषण देते हुए कहा था कि संविधान कितना भी अच्छा हो वह अपने आप लागू नहीं होता है, उसे लागू करना पड़ता है. ऐसे में जिन लोगों के ऊपर संविधान लागू करने की जिम्मेदारी होती है, यह उन पर निर्भर करता है कि वो संविधान को कितनी ईमानदारी और प्रभावी ढ़ंग से लागू करते हैं. असल में भारतीय संविधान के सही ढ़ंग से लागू न हो पाने की वजह से सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले भारत के लोगों का विकास प्रभावित होने लगा है. यह तकरीबन रूक सा गया है. आज दुनिया में 7 बिलियन लोग हैं. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र ने एक बेहतर विश्व बनाने का सपना देखा है. हालांकि वह ऐसा करने में तब तक कामयाब नहीं हो सकता जब तक वो भारत के 120 करोड़ (एक बिलियन से ज्यादा) की आबादी की समस्याओं को हल नहीं कर देते. ऐसे में संयुक्त राष्ट्र का जो सपना है कि दुनिया में समता हो, बंधुत्व हो, एकता तो, महिलाओं और दलितों की समस्या खत्म हो जाए तो इसमें वह तब तक सफल नहीं हो सकते जब तक की भारत की समस्या खत्म नहीं हो जाती. यदि दुनिया को समता, बंधुत्व, गरीबी मुक्त, अशिक्षा मुक्त करना है, दुनिया को अगर मानवतावादी जगह बनानी है तो भारत में भारत के संविधान को सही तरीके से लागू करना होगा. दुनिया के लोगों ने जो सपना देखा है वह तब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक भारत का संविधान कामयाब नहीं होता. यानि भारत के संविधान की कामयाबी ही दुनिया को कामयाबी के रास्ते पर ले जाने में सक्षम है. इसे उस रूप में लागू करना होगा, जिस रूप में इसे लागू करने का सपना बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर ने देखा था.

– लेखक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हैं.

 

http://www.dalitdastak.com/news/ambedkar-make-constitution-was-made-future-of-india–2671.html

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