तथागत गौतम बुद्ध का ‘धम्म’ की अन्य धर्मों से बिलकुल अलग है, इसे धर्म न समझ लेना वरना बुद्धत्व और दुखो से मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाओगे


jano tabi manoइस संसार को किसने बनाया, यह एक सामान्य प्रशन है ,इस दुनिया को ईश्वर ने बनाय यह वैसा ही सामन्य सा उत्तर है

 इस सृष्टि रचयिता के कई नाम है , अलग प्रांत और देशानुसार अलग यदि यह पूछा जाये कि तथागत  गौतम बुद्ध ने ईशवर को सृष्टि कर्ता के रुप में स्वीकार किया तो उत्तर हैनही बुद्ध इश्वर नहीं हैं  वो तो मनो वैज्ञानिक हैं महामानव हैं दार्शनिक हैं चिकित्सक हैं समाज शास्त्री हैं क्रन्तिकारी हैं   बुद्ध ने कहा कि ईशवराश्रित धर्म कल्पनाश्रित है , इसलिये ऐसे धर्म का  मानव कल्याण में कोई उपयोग नही है बुद्ध ने इस प्रशन को ऐसे ही नही छोड दिया उन्होने इस प्रशन के नाना पहलूऒं पर विचार किया है

हिंदी के धर्म शब्द को पाली भाषा में धम्म कहते हैं, पर क्योंकि अन्य धर्मों और बौद्ध धर्म में बहुत ज्यादा फर्क है पर सारा मीडिया बौद्ध धर्म को अन्य धर्मों के समतुल्य खड़ा करने में लगा है ऐसे में जनसाधारण के लिए बौद्ध धम्म को सही से समझना बेहद मुश्किल हो जाता है|जब लोग बौद्ध विचारधारा को धर्म के रूप में नहीं धम्म के रूप में ग्रहण करेंगे तभि लबन्वित हो सक्ते है|आप कह सकते हो की शब्द से क्या फर्क पड़ता है, इससे वही फर्क पड़ता है जैसे हिंसक यज्ञ  भंग करने वाला भंगी आज अपशब्द हो गया है,बुद्धिमान व्यक्ति के लिए पंडित शब्द का प्रयोग,यूनिवर्स के लिए जातिसूचक शब्द  ब्रह्माण्ड  की संकपना, रक्षा करने वाले को राक्षश और राक्षश का आज मतलब है अधर्मी| शब्दों में बहुत बात होती है\ कोई ऐसे ही श्रेष्ठ नहीं है वो हर मोर्चे पर काम कर रहा होता है इतने बारेक मोर्चे पर भी काम किया जय जिसे हम कभी ध्यान ही नहीं दे पाते|टीवी के विज्ञापनों में भी केवल कुछ ही जातिसूचक उपनाम आते हैं,क्या ये जरूरी है,इतने बड़े देश में सिर्फ यही लोग हैं|क्या केवल नाम से काम नहीं चलेगा|खेर ये उनका संगर्ष है वो अपनी जगह सही हैं सवाल ये है की आप का संगर्ष क्या है ?

बुद्ध के धम्म‘ की परिभाषा हिदू धर्म , इस्लाम धर्म और ईसाई और यहूदी आदि धर्मों से बिलकुल अलग है ।अन्य  धर्मों  की तरह को बुद्ध विचारधारा को धर्म नही कहते अपितुधम्मकहते हैं   धर्म या मजहब से बुद्ध का कोई लेना देना नही ।धम्म से बुद्ध का अर्थ हैजीवन का शाशवत नियम ,जीवन का सनातन नियम इससे हिंदू , मुसलमान , ईसाई का कुछ लेना देना नही इसमें धर्म/मजहबों के झगडे का कोई संबध नही यह तो जीवन की बुनियाद में जो नियम काम कर रहा है , एस धम्मो सनंतनो, वह जो शशवत नियम है , बुद्ध उसकी बात करते हैं और जब बुद्ध कहते हैं : धम्म  की शरण मे जाओ , तो वे यह नही कहते कि किस धर्म की शरण मे बुद्ध कहते हैं कि धम्म जीवन जीने के बहतरीन सूत्र या नियम हैं ।ये  शशवत नियम क्या है ? उस सूत्र या  नियम की शरण मे जाओ उस नियम से विपरीत मत जाओ नही तो दुख पाओगे ऐसा नही कि कोई परमात्मा कही बैठा है कि जो तुमको दंड देगा कही कोई परमात्मा नही है बुद्ध के लिये संसार एक नियम है अस्तित्व एक नियम है ज्ब तुम उसके विपरीत जाते हो तो विपरीत जाने के कारण ही दुख पाते हो

एक आदमी नशे में डांवाडोल चलता है और अपना घुंटना फ़ोड लेता है तो ऐसा नही है कि परमात्मा ने शराब पीने का उसे दंड दिया बुद्ध के यह बातें बचकानी लगती हैं वह आदमी स्वयं ही गिरा क्योंकि वह गुरुतवाकर्षण के नियम के विरुद्ध जा रहा था उसकी शराब उसके लिये दंड बन गई गुरुतवाकर्षण का नियम है कि तुम अगर डांवाडोल हुये, उलटे सीधे चले तो गिरोगे ही क्योंकि धरती का केंद्र अपनी और खीचता है  जो नियम के साथ चलते हैं उन्हें नियम संभाल लेता है और जो नियम के विपरीत चलते हैं वे अपने हाथ स्वयं ही गिर पडते हैं

भगवान्बुद्ध जिसे धम्म  कहते हैं वह धर्म /मजहब या रीलीजिन से सर्वाथा अलग है जहाँ मजहब या रीलीजन व्यक्तिगत चीज है वही दूसरी ओर धम्म एक समाजिक वस्तु है वह प्रधान रुपसे और आवशयक रुप से सामाजिक है  धम्म का मतलब है सदाचरण , जिस का अर्थ है जीवन के सभी क्षेत्रों में एक आदमी का दूसरे आदमी के प्रति अच्छा व्यवहार इससे स्पस्ट है कि यदि कही परस्पर दो आदमी भी साथ रहते हों तो चाहे चाहे उन्हें धम्म के लिये जगह बनानी पडेगी दोनॊ में से एक भी बचकर नही जा सकता जब कि यदि कही एक आदमी अकेला हो तो उसे किसी धर्म की आवशकता नही धम्म की  नहीं  ये तो जनसँख्या नियंत्रण और व्यस्था के नियम  होते हैं  

 धम्म क्या है ?  धम्म  की आवशयकता क्यूं है ? भगवान्बुद्ध के अनुसार  धम्म  के दो प्रधान तत्व हैंप्रज्ञा और करुणा ।प्रज्ञा का अर्थ है बुद्धि ( निर्मल बुद्धि या विवेक ) भगवान्बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धर्म के दो स्तम्भों में से एक माना है , क्योंकि वह नही चाहते थे किमिथ्या विशवासों ;’ के लिये कोई जगह बचे

करुणा कया है ? और किसके लिये ? करुंणा का अर्थ है दया , प्रेम और मैत्री इसके बगैर तो समाज जीवित रह सकता है और तो समाज की उन्नति हो सकती है प्रज्ञा और करुणा का अलौकिक मिश्रण ही तथागत का  धम्म  है

समयबुद्धा ने कहा है 

“धम्म क्या है अगर इसका एक वाक्य में उत्तर देना हो तो मैं यही कहूँगा की ये ऐसा मार्ग या तरीका है जिससे  मनुष्य में ऐसी मानसिक योग्यता उत्पन्न हो जाती है जिसके बाद वो अपनी बुद्धि को समय और परिस्थिथि के हिस्साब से सही इस्तेमक करके दुखों से मुक्त जीवन जी सकता है, इतना ही नहीं वो संसार का सर्वज्ञ न्यायकर्ता बन सकता है|बुद्ध का ‘धम्म’ को अन्य धर्मो के  सामान न समझना ये काफी अलग है।  इसे श्रद्धा और भक्ति से नहीं बुद्धि और समझ से पाओगे। ये किसी सम्प्रदाए विशेष के लिए ही नहीं है सम्पूर्ण मानवता के लिए है। ” 

3 thoughts on “तथागत गौतम बुद्ध का ‘धम्म’ की अन्य धर्मों से बिलकुल अलग है, इसे धर्म न समझ लेना वरना बुद्धत्व और दुखो से मुक्ति प्राप्त नहीं कर पाओगे

  1. सही कहा है । धम्म सम्प्रदाय नहीं सारे दु:खो से मुक्ती पाने की नैसर्गिक शिक्षा है ।ईसे आचरण करने से ही परिणाम मिलता है ।

  2. हाँ यह बेहद बढ़िया लेख है. दोस्तों बुद्ध स्वयं कहते है की वह ईश्वर या ऐसे किसी भी काल्पनिक भगवानो पर विशवास नहीं करते तब दोस्तों हमें भी यह समझना चाहिए की सिद्धार्थ गौतम बुद्ध कोई भगवान् नहीं है तो हम उन्हें ‘भगवान् बुद्ध’ कहके क्यों बुलाएं? हम उन्हें तथागत या सीधे-सीधे गौतम बुद्ध ही कहके बुला सकते है. हम मानते है की भगवान का अर्थ ‘राजा, प्रजा की रक्षा करने वाला होता है’ लेकिन हिन्दू कल्पना से ‘भगवान्’ का अर्थ जादू, कर्मकांड, ईश्वर, बलि माँगने वाला होता है जिसकी लोग पूजा करते है. बुद्ध और डॉ. आंबेडकर इन कल्पनाओं से ऊपर उठ चुके है इसलिए भगवान का इस्तेमाल ना करे . चूँकि भोली और अनपढ़ जनता भगवान का अर्थ कर्मकांड से जोड़ते है. कृपया इसपर विचार करे. कोई त्रुटी हो तो संपर्क करे.
    जय भीम

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