जेएनयू में रोहित वेमुला कांड दोहराने की कोशिश कर रहा प्रशासन- निष्कासित छात्र|कन्हैया मामले पर आसमान सिर पर उठा लेने वाले चैनल बहुजन छात्रों के निष्कासन मामले पर खामोश क्यों? …National Dastak

जेएनयू पर लगातार यह आरोप लगते रहे हैं कि इस संस्थान में भी दलित-पिछड़े और आदिवासी तथा मुस्लिम छात्रों के साथ भेदभाव होता रहा है। जिसे लेकर समय-समय पर यहाँ के छात्र आन्दोलन भी करते रहे हैं।

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आपको इंटरेस्ट नहीं इन बातों में कोई नहीं कल को आपके भी बच्चे कॉलेज जाएंगे तब उनको भी ऐसे ही भेदभाव का सामना करना होगा, तब बाकि लोभ भी इंटरेस्ट नहीं लेंगे| अगर ऐसे मुद्दों पर सरे भारतवासी एकजुट नहीं होते तो वो दिन दूर नहीं पर पढ़ने पढने का अधिकार खतरे में होगा| अपने बच्चे का एडमिशन तो कराया होगा स्कूल में, एडमिशन फॉर्म में तीसरा कॉलम में जाती पूछते हैं हर स्कूल में, खासकर प्राइवेट स्कूल में, जानते हैं क्यों? पहले तो नहीं पूछते थे अभी क्यों पूछने लगे हैं| जागो देखो ब्राह्मणवाद तेज़ी से फ़ैल रहा है आपके आस पास| क्या आप में से कोई बताएगा की स्कूक कालेज के फॉर्म में जाती धर्म  पूछने का क्या मतलब है क्या जरूरत है ?

 

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BAAPSA : Birsa Ambedkar Phule Students’ Association

बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्मस्थान मध्यप्रदेश के महू रेलवे स्टेशन का नया नाम अब है:- ‘डॉ. अम्बेडकर नगर’, सभी भारतवासियों को मुबारकबाद|….National Dastak

रतलाम। मध्यप्रदेश के महू रेलवे स्टेशन का नाम भारतीय रेल द्वारा डॉ. आंबेडकर नगर घोषित किया गया और आधिकारिक पत्र भी पश्चिम रेल द्वारा जारी किया जा चुका है। संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म स्थान रहे महू के रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर कर ‘डॉ. अम्बेडकर नगर’ किया जाएगा। रेल प्रबंधक कार्यालय ने इस सम्बन्ध में एक आदेश पारित किया है।

आपको बता दें कि बाबासाहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर का जन्म महू में ही हुआ था। इसलिए उनकी याद में रेलवे ने महू रेलवे स्टेशन का नाम बदल कर ‘डॉ. अम्बेडकर नगर’ करने का फैसला लिया है। रतलाम के रेल प्रबंधक कार्यालय ने इस सम्बन्ध में एक नॉटिफिकेशन जारी किया है।

बहुजन लोगों को अपने महापुरुष या मसीह को पहचानने समझने में सदियों लग जाते हैं,तब तक देर भी हो जाती है, वो हमें छोड़ कर जा चुके होते हैं| जबकि ब्राह्मणवादी अपने भला करने वाले को उसके जीवन काल में ही पहचान लेते हैं, बल्कि सही बात तो ये है की उसके गद्दी पर बैठे रहते ही या उससे पहले ही पहचानकर उससे लाभ ले लेते हैं| कशी बहुजन दे अम्बेडकर के सक्रिय दिनों में उनको पहचान कर साथ दे देते तो अब तक तो आजाद हो गए होते |

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mahu-ambedkar

बुद्ध की तुलना में सभी महान धार्मिक गुरु बहुत छोटे पड़ जाते हैं।वे तुम्हें अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं,जबकि गौतम बुद्ध आपको स्वतंत्र कर देते हैं …OSHO

buddha-the-greatबुद्ध की तुलना में सभी महान धार्मिक गुरु बहुत छोटे पड़ जाते हैं। वे तुम्हें अपना अनुयायी बनाना चाहते हैं, वे चाहते हैं कि तुम एक निश्चित अनुशासन का पालन करो, वे चाहते हैं कि तुम्हारे तौर-तरीके, तुम्हारी नैतिकता, तुम्हारी जीवन शैली एक व्यवस्थित तरीके से हो। वे तुम्हें ढालकर कर एक सुन्दर जेल की कोठरी दे देते हैं।
बुद्ध पूरी तरह से स्वतंत्रता के लिए अकेले खड़े हैं। बिना स्वतंत्रता के व्यक्ति अपने परम रहस्य को नहीं जान सकता; जंजीरों में बंधा हुआ वह आकाश में अपने पंख फैला कर उस पार की यात्रा पर नहीं जा सकता। सभी धर्म व्यक्ति को जंजीरों से बांध कर, किसी तरह लगाम लगाए हुए उन्हें अपने वास्तविक स्वरुप में रहने की इजाजत नहीं देते अपितु वे उसे एक व्यक्तित्व और मुखोटे दे देते हैं- और इसे वे धार्मिक शिक्षा का नाम दे देते हैं।
बुद्ध कोई धार्मिक शिक्षा नहीं देते। वे केवल चाहते हैं कि जो भी हो, तुम सहज रहो। यही है तुम्हारा धर्म–अपनी सहजता में जीना। किसी मनुष्य ने आज तक स्वतंत्रता से इतना प्रेम नहीं किया। किसी मनुष्य ने आज तक मानवता से इतना प्रेम नहीं किया। वो केवल इसी कारण से अनुयायियों को स्वीकार नहीं करते क्योंकि किसी को अपना अनुयायी स्वीकार करने का अर्थ है उसकी गरिमा को नष्ट करना। उन्होंने केवल सह यात्रियों को स्वीकार किया। शरीर त्यागने से पहले उनका जो अंतिम वक्तव्य था, “मैं यदि कभी दोबारा लौटा तो तुम्हारा मैत्रेय बन कर लौटूंगा।” मैत्रेय का मतलब होता है मित्र।
भारत इस सरल से कारण के लिए गौतम बुद्ध को समझ नहीं पाया : वह समझता है कि मौन बैठना, बस होना मात्र कोई मूल्य नहीं रखता। तुम्हें कुछ करना होगा, तुम्हें प्रार्थना करनी होगी, तुम्हें मन्त्रजाप करने होंगे। तुम्हें किसी मंदिर में जा कर इंसान के ही बनाये हुए भगवान की पूजा करनी होगी। “तुम शांत बैठे-बैठे क्या कर रहे हो?”
और गौतम बुद्ध का सबसे बड़ा योगदान यह है कि : तुम अपनी शाश्वतता, अपनी लौकिक सत्ता को प्राप्त कर सकते हो अगर तुम बिना किसी उद्देश्य के, बिना किसी इच्छा के, और बिना किसी लालसा के शांत बैठ सको, बस अपने होने का आनंद लेते हुए–उस खाली अंतराल में जहां सहस्त्र कमल खिल उठते हैं।
गौतम बुद्ध अपने आप में एक श्रेणी है। सिर्फ कुछ ही लोगों ने उनको समझा है। यहां तक कि उन देशों में जहां बौद्ध धर्म एक राष्ट्रीय धर्म है–थाईलैंड, जापान, ताइवान–में यह एक बौद्धिक दर्शन बन गया है। झाजेन, मनुष्य का मौलिक योगदान–मिट गया है।
शायद तुम लोग ही केवल हो जो गौतम बुद्ध के निकटतम समकालीन हो। इस मौन में, इस शून्य में, इस मन से अ-मन की छलांग में, तुम एक अलग ही शून्य में प्रवेश कर जाते हो जो कि ना बाहर का है ना ही भीतर का। बल्कि दोनों के पार है।
मेरा सन्देश है: गौतम बुद्ध को समझने की कोशिश करो। वे सबसे सुन्दर लोगों में से हैं जिन्होंने इस धरती पर कदम रखा।
ऐच.जी वेल्स, ने अपने विश्व इतिहास में एक वाक्य लिखा है जो कि स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाने योग्य है। गौतम बुद्ध के बारे में लिखते हुए वह कहता है, “शायद गौतम बुद्ध ही सिर्फ ऐसे नास्तिक व्यक्ति है जो फिर भी बहुत ईश्वर स्वरूप है।”
उस प्रकाश में, उस संबोधि, और निर्वाण के क्षण में, उन्हें किसी भगवान के दर्शन नहीं हुए। सम्पूर्ण आस्तित्व दिव्य है; वहां अलग से कोई निर्माता नहीं है। पूरा आस्तित्व ही प्रकाश से ओत-प्रोत है, चेतना से ओत-प्रोत; इसलिए कोई भगवान नहीं है वरन वहां भगवत्ता है।
यह धार्मिक जगत में एक क्रान्ति है। बुद्ध ने भगवान-रहित धर्म का निर्माण किया। पहली बार भगवान धर्म का केंद्र नहीं है। मनुष्य, धर्म का केंद्र बन गया है, और मनुष्य का अंतरतम भगवत्ता हो गया है, जिसके लिए तुम्हे कहीं नहीं जाना है–तुमने केवल बाहर जाना बंद कर दिया। कुछ क्षणों के लिए अपने भीतर रहो। धीरे-धीरे अपने केंद्र में स्थिर होते हुए। जिस दिन तुम अपने केंद्र पर स्थिर हुए कि विस्फोट हो जाता है।
तो मेरा सन्देश है: गौतम बुद्ध को समझो, ना कि बौद्ध बन जाओ। उनका अनुसरण मत करो। उस समझ को अपनी प्रज्ञा द्वारा आत्मसात करो, बल्कि उसे अपना बन जाने दो। जिस क्षण भी वो तुम्हारी अपनी हो जाती है, वह तुम्हे रूपांतरित करने लगती है। तब तक वह गौतम बुद्ध की रही है, और उसमे पच्चीस सदियों का अंतर है। तुम बुद्ध के शब्दों को दोहराये चले जा सकते हो–वे सूंदर हैं परंतु वे तुम्हें उसको पाने में मदद ना कर सकेंगे जिसकी खोज में तुम हो।
जहां तक पुराने संतों का सवाल है करुणा पर गौतम बुद्ध का जोर एक बहुत ही नई घटना थी। गौतम बुद्ध ने ध्यान को अतीत से एक ऐतिहासिक विभाजन दिया है; उनसे पहले ध्यान अपने आप में पर्याप्त था, किसी ने भी ध्यान के साथ करुणा पर जोर नहीं दिया। और उसका कारण था की ध्यान संबुद्ध बनाता है, तुम्हें खिलावट देता है, ध्यान तुम्हारे होने की चरम अभिव्यक्ति है। इससे ज़्यादा तुम्हे और क्या चाहिए? जहां तक व्यक्ति का सम्बन्ध है, ध्यान पर्याप्त है। गौतम बुद्ध की महानता इस बात में समाहित है कि तुम ध्यान करने से पहले करुणा से परिचित हो जाओ। तुम अधिक प्रेमपूर्ण, अधिक दयावान, अधिक करुणावान हो जाओ।
इसके पीछे एक छिपा हुआ विज्ञान है। इससे पहले कि व्यक्ति संबुद्ध हो यदि उसके पास एक करुणा से भरा ह्रदय हो तो संभावना बनती है कि ध्यान के उपरान्त वह दूसरों को वही सौंदर्य, वही ऊंचाई, वही उत्सव जो उसने खुद हासिल किया है, पाने में मदद कर सके। गौतम बुद्ध ने संबोद्धि को संक्रामक बना दिया है। पर यदि कोई व्यक्ति महसूस करे कि वह घर लौट आया है, तो फिर किसी और की क्या चिंता लेनी?
बुद्ध ने पहली बार आत्मज्ञान को निस्वार्थ बनाया है; उन्होंने इसे सामाजिक जिम्मेदारी बनाया है। यह एक महान परिवर्तन है। लेकिन आत्मज्ञान से पहले करुणा सीख लेनी चाहिए। यदि इसे पहले सीखा ना गया तो आत्मज्ञान के उपरान्त कुछ भी सीखने को नहीं बचता। जब कोई अपने आप में उन्माद से भर जाता है तो करुणा तक उसकी खुद की प्रसन्नता में बाधा बन जाती है -उसके उन्माद में एक प्रकार का विघ्न पड़ जाता है… इसलिए सैकड़ों आत्मज्ञान को उपलब्ध हुए हैं परंतु सद्गुरु बहुत कम।
संबुद्ध हो जाने का मतलब जरूरी नहीं कि तुम सद्गुरु भी हो जाओ। सद्गुरु हो जाने का अर्थ यह के तुम मे अनंत करुणा है, और तुम अपने भीतर की उस परमशांति के सौंदर्य में अकेले जाने से शर्मिंदगी महसूस करते हो जो तुमने आत्मज्ञान द्वारा प्राप्त की है। तुम उन लोगो की मदद करना चाहते हो जो अंधे हैं, अन्धकार में हैं और अपने लिए मार्ग टटोल रहें हैं। उनकी मदद करना आनंददायी है, ना कि कोई बाधा।
असलियत में तो, जब तुम अपने आस-पास बहुत सारे लोगों को खिलते देखोगे; तो यह एक और ज्यादा समृद्ध आनंद बन जाता है; तुम एक बंजर जंगल में अकेले वृक्ष नहीं हो जो उग गया है, जहां कोई और वृक्ष नहीं उग रहा। जब तुम्हारे साथ सारा जंगल खिलता है तो आनंद हजारों गुना बढ़ जाता है; तुमने अपने आत्मज्ञान को दुनिया में क्रान्ति लाने के लिए उपयोग किया। गौतम बुद्ध केवल आत्मज्ञानी नहीं हैं, लेकिन एक आत्मज्ञानी क्रांतिकारी।
उनकी चिंता इस दुनिया के, लोगो के प्रति गहरी है। वे अपने शिष्यों को सिखाते थे की जब तुम ध्यान करो और उससे तुम्हे मौन और शान्ति मिले, तुम्हारे भीतर गहरे आनंद के बुलबुले उठने लगे तो; उसे रोको मत, उसे पुरे संसार में बांटो। और कोई चिंता ना लो, क्योंकि जितना तुम दोगे उतना ही तुम और देने के लिए सक्षम हो जाओगे। देने का भाव बहुत महत्व रखता है क्योंकि एक बार तुम्हे इस बात का पता चल जाए कि देने से तुम कुछ खोते नहीं बल्कि इसके विपरीत, यह तुम्हारे अनुभवों को कई गुना बढ़ा देता है। परंतु जिस व्यक्ति ने कभी करुणा नहीं जानी उसे देने के रहस्य का पता नहीं, उसे बांटने के रहस्य का पता नहीं।
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जोरबा टू बुद्ध : ओशो कहते हैं कि ‘जोरबा’ का अर्थ होता है- एक भोग-विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति और ‘बुद्धा’ का अर्थ निर्वाण पाया हुआ।…OSHO

zorba-to-buddhaजोरबा टू बुद्ध : ओशो कहते हैं कि ‘जोरबा’ का अर्थ होता है- एक भोग-विलास में पूरी तरह से डूबा हुआ व्यक्ति और ‘बुद्धा’ का अर्थ निर्वाण पाया हुआ।

जोरबा केवल शुरुआत है। यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो, तो तुम्हें कुछ बेहतर, कुछ उच्चतर, कुछ महत्तर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता, वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा, क्योंकि वे छोटे-छोटे, क्षुद्र अनुभव उकताने वाले हो जाएंगे। गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए, क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे।

पूरब ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि 29 वर्षों तक बुद्ध इस तरह जीए, जैसा कोई जोरबा कभी न जीया होगा। ओशो कहते हैं कि दरिद्र को ‘नारायण’ कहने से ही इस देश में दरिद्रता फैल गई है। यदि आप दरिद्रता और गरीबी को सम्मान देंगे तो आप कभी भी उससे मुक्त नहीं हो सकते। मेरा संन्यासी ऐसा होना चाहिए कि वह पहले धन पर ध्यान दे फिर ध्यान की चिंता करे। ओशो पर आरोप हैं कि वे सिर्फ अमीरों के गुरु हैं। उन्होंने पूंजीवाद को बढ़ावा दिया। उनके पास लगभग 100 रॉल्स रॉयस कारें थीं। वे कभी गरीबों और गरीबी का पक्ष नहीं लेते थे। ओशो कहते हैं कि दुखवादी नहीं, सुखवादी बनो।

सुखी रहने के सूत्र ढूंढो तो समृद्धि स्वत: ही आने लगेगी। ओशो कहते हैं कि किसी गांव में दस हजार गरीब हो और दो आदमी उनमें से मेहनत करके अमीर हो जाएं तो बाकी नौ हजार नौ सौ निन्यानवे लोग कहेंगे कि इन दो आदमियों ने अमीर होकर हमको गरीब कर दिया। और कोई यह नहीं पूछता कि जब ये दो आदमी अमीर नहीं थे तब तुम अमीर थे? तुम्हारे पास कोई संपत्ति थी, जो इन्होंने चूस ली। नहीं तो शोषण का मतलब क्या होता है? अगर हमारे पास था ही नहीं तो शोषण कैसे हो सकता है? शोषण उसका हो सकता है जिसके पास हो। अमीर के न होने पर हिन्दुस्तान में गरीब नहीं था? हां, गरीबी का पता नहीं चलता था। क्योंकि पता चलने के लिए कुछ लोगों का अमीर हो जाना आवश्यक है। तब गरीबी का बोध होना शुरू होता है। बड़े आश्चर्य की बात है, जो लोग मेहनत करें, बुद्धि लगाएं, श्रम करें और अगर थोड़ी-बहुत संपत्ति इकट्ठा कर लें तो ऐसा लगता है कि इन लोगों ने बड़ा अन्याय किया होगा। पूंजीवाद शोषण की व्यवस्था नहीं है। पूंजीवाद एक व्यवस्था है श्रम को पूंजी में कन्वर्ट करने की।

श्रम को पूंजी में रूपांतरित करने की व्यवस्था है। लेकिन जब आपका श्रम रूपांतरित होता है, जब आपको या मुझे दो रुपए मेरे श्रम के मिल जाते हैं तो मैं देखता हूं जिसने मुझे दो रुपए दिए उसके पास कार भी है, बंगला भी खड़ा होता जाता है। स्वभावत: तब मुझे खयाल आता है कि मेरा कुछ शोषण हो रहा है। और मेरे पास कुछ भी नहीं था उसका शोषण हुआ।

उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में विवादित जगह पर लगे एक पेड़ से एक दलित युवक का दातून तोड़ने के ‘जुर्म’ में कुछ कथित दबंगों ने कर दी दलित की हत्या, दो गिरफ़्तार…बीबीसी British Broadcasting Corporation (BBC)

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उत्तर प्रदेश के बांदा ज़िले में विवादित जगह पर लगे एक पेड़ से एक दलित युवक का दातून तोड़ना इलाक़े के ही कुछ कथित दबंगों को नागवार गुज़रा.

पुलिस के मुताबिक महुई गांव की इस घटना में दलित युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई और गोली लगने के कारण दो और लोग घायल हो गए.

बांदा के पुलिस अधीक्षक डॉक्टर श्रीपति मिश्र ने बीबीसी को बताया कि ये घटना रविवार सुबह की है और असल मामला ग्राम समाज की ज़मीन का है जिसे दोनों पक्ष अपना-अपना दावा करते हैं.

लिस अधीक्षक के मुताबिक, “लल्लू नाम का व्यक्ति विवादित ज़मीन पर लगे पेड़ से दातून तोड़ रहा था. अभियुक्तों ने उसे ऐसा करने से मना किया, और फिर उसके न मानने पर उस पर फ़ायरिंग शुरू कर दी.”

डॉक्टर श्रीपति मिश्र ने बताया कि मामले में पांच लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया है जिनमें से मुख्य अभियुक्त विश्राम सिंह समेत एक अन्य को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

उन्होंने बताया कि हत्या में इस्तेमाल हुई बंदूक को भी ज़ब्त कर लिया गया है.

पुलिस अधीक्षक के मुताबिक अभियुक्तों का आपराधिक रिकॉर्ड है.

पहले से ही इनके ख़िलाफ़ कई मुक़दमे दर्ज हैं. अन्य अभियुक्तों की तलाश में पुलिस कई जगह छापेमारी कर रही है लेकिन इलाक़े में तनाव बना हुआ है.

http://www.bbc.com/hindi/india-38435098?ocid=socialflow_facebook

 

 

(जो लोग अपने इतिहास,अपने महापुरुष को नहीं जानते न जानना चाहते हैं, न ही शिक्षा और  संगठन पर  संगर्ष करना चाहते हैं, ऐसे निकम्मे लोग ही आज दलित कहलाते हैं|इन्हीं लोगों को बुद्ध सोया हुआ बता कर जगाने की बात करते हैं| यही लोग जिन्दा तो है पर मरे सामान हैं शायद इसीलिए  इन्हीं लोगों के लिए मनुस्मृति में लिखा है की  गोह , उल्लू , कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है । )

25 दिसंबर मनुस्मृति दहन दिवस पर विशेष:- मनुस्मृति पर “ओशो” के विचार… OSHO

मनुस्मृति पर “ओशो” के विचार…
manusmriti dahan
मनु की स्मृति पढ़ने जैसी है। मनु की स्मृति से ज्यादा अन्यायपूर्ण शास्त्र खोजना कठिन है, क्योंकि कोई न्याय जैसी चीज ही नहीं है। मनुस्मृति हिंदुओं का आधार है- उनके सारे कानून, समाज-व्यवस्था का। अगर एक ब्राह्मण एक शूद्र की लड़की को भगाकर ले जाये तो कुछ भी पाप नहीं है। यह तो सौभाग्य है शूद्र की लड़की का। लेकिन अगर एक शूद्र, ब्राह्मण की लड़की को भगाकर ले जाये तो महापाप है। और हत्या से कम, इस शूद्र की हत्या से कम दंड नहीं। यह न्याय है!!! और इसको हजारों साल तक लोगों ने माना है। जरूर मनाने वाले ने बड़ी कुशलता की होगी।
कुशलता इतनी गहरी रही होगी, जितनी कि फिर दुनिया में पृथ्वी पर दुबारा कहीं नहीं हुई। ब्राह्मणों ने जैसी व्यवस्था निर्मित की भारत में, ऐसी व्यवस्था पृथ्वी पर कहीं कोई निर्मित नहीं कर पाया, क्योंकि ब्राह्मणों से ज्यादा बुद्धिमान आदमी खोजने कठिन हैं। बुद्धिमानी उनकी परंपरागत वसीयत थी। इसलिये ब्राह्मण शूद्रों को पढ़ने नहीं देते थे क्योंकि तुमने पढ़ा कि बगावत आई। स्त्रियों को पढ़ने की मनाही रखी क्योंकि स्त्रियों ने पढ़ा कि बगावत आई। स्त्रियों को ब्राह्मणों ने समझा रखा था, पति परमात्मा है। लेकिन पत्नी परमात्मा नहीं है!!! यह किस भांति का प्रेम का ढंग है ? कैसा ढांचा है ? इसलिये पति मर जाये तो पत्नी को सती होना चाहिये, तो ही वह पतिव्रता थी। लेकिन कोई शास्त्र नहीं कहता कि पत्नी मर जाये तो पति को उसके साथ मर जाना चाहिये, तो ही वह पत्नीव्रती था। ना, इसका कोई सवाल ही नहीं।
पुरुष के लिये शास्त्र कहता है कि जैसे ही पत्नी मर जाये, जल्दी से दूसरी व्यवस्था विवाह की करें। उसमें देर न करें। लेकिन स्त्री के लिये विवाह की व्यवस्था नहीं है। इसलिये करोड़ों स्त्रियां या तो जल गईं और या विधवा रहकर उन्होंने जीवन भर कष्ट पाया। और यह बड़े मजे की बात है, एक स्त्री विधवा रहे, पुरुष तो कोई विधुर रहे नहीं; क्योंकि कोई शास्त्र में नियम नहीं है उसके विधुर रहने का। तो भी विधवा स्त्री सम्मानित नहीं थी, अपमानित थी।
होना तो चाहिये सम्मान, क्योंकि अपने पति के मर जाने के बाद उसने अपने जीवन की सारी वासना पति के साथ समाप्त कर दी। और वह संन्यासी की तरह जी रही है। लेकिन वह सम्मानित नहीं थी। घर में अगर कोई उत्सव-पर्व हो तो विधवा को बैठने का हक नहीं था। विवाह हो तो विधवा आगे नहीं आ सकती। बड़े मजे की बात है; कि जैसे विधवा ने ही पति को मार डाला है!!! इसका पाप उसके ऊपर है। जब पत्नी मरे तो पाप पति पर नहीं है, लेकिन पति मरे तो पाप पत्नी पर है!!! अरबों स्त्रियों को यह बात समझा दी गई और उन्होंने मान लिया। लेकिन मानने में एक तरकीब रखनी जरूरी थी कि जिसका भी शोषण करना हो, उसे अनुभव से गुजरने देना खतरनाक है और शिक्षित नहीं होना चाहिये। इसलिये शूद्रों को, स्त्रियों को शिक्षा का कोई अधिकार नहीं।
तुलसी जैसे विचारशील आदमी ने कहा है कि ”शूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधकारी।” इनको अच्छी तरह दंड देना चाहिये। इनको जितना सताओ, उतना ही ठीक रहते हैं। ”शूद्र, ढोल, पशु, नारी…’ ढोल का भी उसी के साथ-जैसे ढोल को जितना पीटो, उतना ही अच्छा बजता है; ऐसे जितना ही उनको पीटो, जितना ही उनको सताओ उतने ही ये ठीक रहते हैं। यही धारा थी। इनको शिक्षित मत करो, इनके मन में बुद्धि न आये, विचार न उठे। अन्यथा विचार आया, बगावत आई। शिक्षा आई, विद्रोह आया।
विद्रोह का अर्थ क्या है ? विद्रोह का अर्थ है, कि अब तुम जिसका शोषण करते हो उसके पास भी उतनी ही बुद्धि है, जितनी तुम्हारे पास। इसलिये उसे वंचित रखो।
—बिन बाती बिन तेल-(झेन कथा)

बहुजनों के त्यौहार ‘मनुस्मृति दहन दिवस 25 दिसंबर पर सभी भारतवासियों को हार्दिक शुष्कामनाएं| आज ही के दिन हमारे मसीहा बोधिसत्व डॉ अम्बेडकर ने मनुस्मृति जैसे अमानवीय, अन्यायी और दमनकारी ब्राह्मणवादी संविधान को जलाकर भारतवासियों को आज़ाद किया था(मूल लेख “मनुस्मृति” दहन दिवस)….एस आर दारापुरी

मनुस्मृति दहन दिवस
manusmriti jalai kyon gayi
 25 दिसम्बर का दिन  दलितों के लिए ” मनुस्मृति दहन दिवस” के रूप में  अति महतवपूर्ण दिन  है।  इस दिन ही  सन 1927 को  ” महाड़ तालाब” के महा संघर्ष के अवसर पर  डॉ. बाबा साहेब भीम राव अम्बेडकर ने खुले तौर पर मनुस्मृति जलाई थी। यह ब्राह्मणवाद के विरुद्ध दलितों के संघर्ष की  अति महतवपूर्ण  घटना है। अतः इसे गर्व से याद किया जाना चाहिए।
 डॉ. आंबेडकर के मनुस्मृति जलाने  के कार्यक्रम को विफल करने के लिए सवर्णों ने यह तै किया था कि उन्हें इस के लिए कोई भी जगाह न मिले परन्तु एक फत्ते खां नाम के मुसलमान ने उन्हें  इस कार्य हेतु अपनी निजी ज़मीन उपलब्ध करायी थी। उन्होंने यह भी रोक लगा दी थी कि आन्दोलनकारियों को स्थानीय स्तर पर खाने पीने तथा ज़रूरत की अन्य कोई भी चीज़ न मिल सके। अतः सभी वस्तुएं बाहर से ही लानी पड़ी थीं। आन्दोलन में भाग लेने वाले स्वयं सेवकों को इस  अवसर पर पांच बातों  की शपथ लेनी थी:-
1. मैं जन्म  आधारित चातुर्वर्ण में विशवास नहीं रखता  हूँ।
2. मैं जाति  भेद में विशवास नहीं रखता हूँ।
3. मेरा विश्वास है कि जातिभेद हिन्दू धर्म  पर कलंक है और मैं इसे ख़तम करने की कोशिश  करूँगा।
4. यह मान कर कि कोई भी उंचा – नीचा  नहीं है, मैं  कम से कम हिन्दुओं में आपस में खान पान में कोई प्रतिबन्ध नहीं मानूंगा।
5. मेरा विश्वास है कि दलितों का मंदिर, तालाब और दूसरी सुविधाओं में सामान अधिकार है।
डॉ. आंबेडकर दासगाओं बंदरगाह से पद्मावती बोट द्वारा आये थे क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं बस वाले उन्हें ले जाने से इन्कार न कर दें।
कुछ लोगों ने बाद में कहा कि डॉ आंबेडकर ने मनुस्मृति  का निर्णय बिलकुल अंतिम समय में लिया क्योंकि कोर्ट के आदेश और कलेक्टर के मनाने पर महाड़  तालाब से पानी पीने का प्रोग्राम रद्द करना पड़ा था। यह बात सही नहीं है क्योंकि मीटिंग के  पंडाल के सामने ही मनुस्मृति को जलाने के लिए पहले से ही वेदी बनायीं गयी थी। दो दिन से 6 आदमी इसे तैयार करने में लगे हुए थे। एक गड्डा जो 6 इंच गहरा और डेढ़ फुट वर्गाकार था  खोद गया था जिस में चन्दन की लकड़ी रखी गई थी। इस के चार किनारों पर  चार पोल गाड़े गए थे जिन पर तीन बैनर टाँगे गए थे जिन पर लिखा था:
1. मनुस्मृति  दहन स्थल
2. छुआ -छुत का नाश हो और
3. ब्राह्मणवाद को दफ़न करो।
25 दिसम्बर, 1927 को 9 बजे इस पर मनुस्मृति को एक एक पन्ना फाड़ कर डॉ आंबेडकर, सहस्त्रबुद्धे और अन्य 6 दलित साधुओं द्वारा जलाया गया।
पंडाल में केवल गाँधी जी की ही एकल फोटो थी। इस से ऐसा प्रतीत होता कि डॉ आंबेडकर और दलित लीडरोँ का तब तक गाँधी जी से मोहभंग नहीं हुआ था।
मीटिंग में बाबा  साहेब का ऐतहासिक भाषण हुआ था। उस भाषण के मुख्य बिंदु निम्नलिखित लिखित थे:-
हमें यह समझाना चाहिए कि हमें इस तालाब से पानी पीने  से क्यों रोक गया है। उन्होंने चतुर्वर्ण की व्याख्या की और घोषणा की कि हमारा संघर्ष चातुर्वर्ण को नष्ट करने का है और यही हमारा समानता के लिए संघर्ष का पहला कदम है। उन्होंने इस मीटिंग की तुलना 24 जनवरी, 1789 से की जब लुइस 16वें ने फ्रांस के जन प्रतिनिधियों की मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में राजा  और रानी मारे गए थे, उच्च वर्ग के लोगों को परेशान  किया गया था और कुछ मारे भी गए थे। बाकी  भाग गए और अमिर लोगों की सम्पति ज़ब्त कर ली गयी थी तथा इस से 15 वर्ष का लम्बा गृह युद्ध शुरू हो गया था। लोगों ने इस क्रांति के महत्त्व को नहीं समझा है। उन्होंने फ्रांस की क्रांति के बारे में विस्तार से बताया।  यह क्रांति केवल फ्रांस के लोगों  की खुशहाली का प्रारंभ ही नहीं था,  इस से पूरे यूरोप और विशव में क्रांति आ गयी थी।
तत्पश्चात उन्होंने कहा कि  हमारा उद्देश्य न केवल छुआ -छुत को समाप्त करना है बल्कि इस की जड़ में  चातुर्वर्ण को भी समाप्त करना है। उन्होंने आगे कहा कि किस तरह पैट्रीशियनज़  ने धर्म के नाम पार प्लेबिअन्स को बेवकूफ बनाया था। उन्होंने ललकार कर कहा था कि  छुअछुत का मुख्य कारण अंतरजातीय विवाहों पर प्रतिबन्ध है जिसे हमें तोडना है। उन्होंने उच्च वर्णों से इस “सामाजिक क्रांति” को शांतिपूर्ण ढंग से होने देने, शास्त्रों  को नकारने और न्याय के सिद्धांत को स्वीकार करने की अपील की। उन्होंने उन्हें अपनी तरफ से पूरी तरह से शांत रहने का आश्वासन दिया। सभा में चार प्रस्ताव पारित किये गए  और समानता की घोषणा की गयी। इस के बाद मनुस्मृति जलाई गयी जैसा  कि ऊपर अंकित किया गया है।
ब्राह्मणवादी मीडिया में इस पर बहुत तगड़ी प्रतिक्रिया हुयी। एक अखबार ने उन्हें “भीम असुर” कहा। डॉ आंबेडकर ने कई लेखों में मनुस्मृति के जलाने को जायज़ ठहराया। उन्होंने उन लोगों का उपहास किया और कहा कि उन्होंने मनुस्मृति को पढ़ा नहीं है और कहा कि हम इसे कभी भी स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने उन लोगों का ध्यान दलितों पर होने वाले अत्याचार की ओर खींचते  हुए कहा कि वे लोग मनुस्मृति पर चल रहे हैं जो  यह कहते हैं कि यह तो चलन में नहीं है, इसे क्यों महत्व देते हो। उन्होंने आगे पूछा कि अगर यह पुराणी हो गयी है तो फिर आप को किसी द्वारा  इसे जलाने  पर आपात्ति क्यों होती है? जो लोग यह कह रहे थे कि मनुस्मृति जलाने  से दलितों को क्या मिलेगा इस पर उन्होंने उल्टा पूछा कि  गान्धी  जी को विदेशी वस्त्र जलाने से क्या मिला? “ज्ञान प्रकाश” जिसने खान  और मालिनी के विवाह के बारे में छापा  था को जला कर क्या मिला? न्युयार्क में मिस मेयो की ” मदर इंडिया ” पुस्तक जला कर क्या मिला? राजनैतिक सुधारों को लागू करने के बनाये गए “साइमन कमीशन” का बाईकाट करने से क्या मिला? यह सब विरोध दर्ज कराने के तरीके थे ऐसा ही हमारा भी मनुस्मृति के विरुद्ध था।
उन्होंने आगे घोषणा की अगर दुरभाग्य से मनुस्मृति जलाने  से ब्राह्मणवाद ख़त्म नहीं होता तो हमें या तो ब्राह्मणवाद से ग्रस्त लोगों को जलाना पड़ेगा या फिर हिन्दू धर्म छोड़ना पड़ेगा। आखिरकार बाबा साहेब को  हिन्दू को त्याग कर बौद्ध धम्म वाला रास्ता अपनाना पड़ा। मनुस्मृति का चलन आज भी उसी तरह से है। अतः दलितों को मनुस्मृति दहन दिवस मना कर तब तक जलाना पड़ेगा जब तक चातुर्वर्ण ख़त्म नहीं हो जाता
S R DARAPURI
एस आर दारापुरी
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25 दिसंबर मनुस्मृति दहन दिवस पर विशेष:- दलितों-पिछड़ों(मूलनिवासी) और स्त्रियों के शोषण को वैधता दिलाने का दर्शन है ब्राह्मणवाद का लिखित विधान/संविधान :- ‘मनुस्मृति’…डॉ.मुकेश कुमार

manusmritiदलितों-पिछड़ों(मूलनिवासी) और स्त्रियों के शोषण को वैधता दिलाने का दर्शन है ब्राह्मणवाद का लिखित विधान/संविधान :- ‘मनुस्मृति’
आज मनुस्मृति दहन दिवस है. आज ही के दिन 25 दिसंबर 1927 को अपने एक ब्राह्मण मित्र सहस्रबुद्धे के सुझाव पर बाबा साहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने मनुस्मृति जलाकर ब्राह्मणवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई का शंखनाद किया था. ब्राह्मणवाद जाति-वर्ण आधारित विषमतमूलक समाज व्यवस्था का दर्शन है. ब्राह्मणवाद दलितों-पिछड़ों-स्त्रियों के शोषण को वैधता दिलाने का दर्शन है और मनुस्मृति इसकी आचार संहिता है. इसे जलाते हुए बाबा साहब ने इस आचार संहिता की वैधता को ही चुनौती प्रदान कर दी थी. धर्म-समाज की जकड़बंदी को कायम रखने में धर्मशास्त्रों व आचार संहिताओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है.

मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक के तमाम निर्णायक घड़ी में और लोक व्यवहार में भी इसकी भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता है. इस रूप में ब्राह्मणवाद आज भी जिन्दा है और राष्ट्रीय जीवन को प्रभावित कर रहा है. आज भी वह दलित-बहुजनों-स्त्रियों का खून चूस रहा है. रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या, अख़लाक़-मिन्हाज अंसारी के कत्ल से लेकर नजीब को गायब करने तक में इसकी भूमिका देखी जा सकती है. गुजरात के ऊना में दलितों की हत्या से लेकर देश के हर कोने में दलित उत्पीड़न का सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है. जिससे यह साबित होता है कि ब्राह्मणवाद आज भी जिन्दा है. और इसके खिलाफ लड़ाई की जरूरत आज भी बनी हुई है. ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई का अर्थ यथास्थितिवादी समाज वयवस्था को बदलने की लड़ाई है. यह दलितों-शोषितों-वंचितों-स्त्रियों के हक़-अधिकार की लड़ाई है.

समता के मूल्यों के आधार पर समाज को रचने-गढ़ने की लड़ाई है. यह लड़ाई आज भी जारी है. ऊना से लेकर उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, बिहार, मध्य प्रदेश और दिल्ली-हरियाणा, महाराष्ट्र, राजस्थान हर जगह जारी है. यह लड़ाई बीजेपी शासित राज्यों में भी जारी है और गैर बीजेपी शासित राज्यों में भी जारी है. यह लड़ाई साम्प्रदायिक फासीवाद के खिलाफ से होते हुए कॉर्पोरेट फासीवाद तक के विरुद्ध हर मोर्चे पर जारी है. खनिज लूट के खिलाफ आदिवासियों की हर लड़ाई, भूमि अधिग्रहण के खिलाफ किसानों की देश के विभिन्न हिस्सों में चल रही लड़ाइयों में भी पूंजीवाद से संश्रयबद्ध ब्राह्मणवाद के खिलाफ लड़ाई के तत्व निहित है.

भूमि अधिकार के लिये, भूमि सुधार के लिये गुजरात से लेकर भागलपुर के दलितों-वंचितों द्वारा भूमि के सवाल पर नये सिरे से लड़ी जा रही लड़ाई भी ब्रह्मणवाद के खिलाफ ही तो है. विश्वविद्यालय कैंपसों में जातिगत आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ, आरक्षण में किये जा रहे घपले-घोटालों के खिलाफ दलित-बहुजन छात्रों द्वारा लड़ी जा रही लड़ाइयां भी उम्मीद पैदा कर रही हैं. सत्ता के बर्बर हमलों से हमारे लोग लहूलुहान हो रहे हैं, किंतु हौसले पस्त होने के बजाय बुलन्द ही होते जा रहे हैं.

आइये बाबा साहब द्वारा आज से 90 वर्ष पूर्व शुरू की गई इस लड़ाई के अधूरे कार्यभार को पूरा करते हुए समतामूलक समाज बनाने का आज फिर से संकल्प व्यक्त करें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक डॉ.मुकेश कुमार न्याय मंच से जुड़े हैं. इस आलेख में दी गई किसी भी सूचना की सटीकता, संपूर्णता, व्यावहारिकता अथवा सच्चाई के प्रति ‘नेशनल स्लोगन ‘ उत्तरदायी नहीं है। इस आलेख में सभी सूचनाएं ज्यों की त्यों प्रस्तुत की गई हैं। )

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डॉ.मुकेश कुमार

http://nationalslogan.com/2016/12/25/dr-mukesh-kumar-opinion-on-manusmriti-combustion-day/
http://www.nationaldastak.com/story/view/opinion-about-manusmariti

धर्मशास्त्र,मनुस्मृति,महाकाव्ये और हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘….Dr ओम सुधा

धर्मशास्त्र,मनुस्मृति,महाकाव्ये और हिन्दू नारी का उत्थान और पतन ‘ओम सुधा

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प्राचीन काल की नारी की स्थिति से तुलना करने पर हमें दिखाई देता है कि आज की नारी घोर पतन की स्थिति में पहुँच गयी है. राजनीति में उनके योगदान के सम्बन्ध में भले ही कुछ संदेह हो, परन्तु बौद्धिक तथा सामाजिक क्षेत्र में उन्होंने ‘बहुत ही ऊँचा स्थान’ प्राप्त कर रखा था, इसमें कोई संदेह नहीं. अथर्ववेद में आये इस प्रंसग से कि ब्रह्मचर्य-काल पूरा करने के उपरान्त कन्या विवाह के योग्य मानी जाये, यह स्पष्ट होता है कि उस काल की नारी उपनयन की भी अधिकारिणी थी. श्रोत-सूत्र से हमें विदित होता है कि स्त्रियों को वेदाध्ययन कराया जाता था और वे वेद-मन्त्रों का उच्चारण कर सकती थी।और सबसे बड़ा प्रमाण तो पाणिनि का अष्टाध्यायी है, जिससे सिद्ध होता है कि स्त्रियाँ गुरुकुल में रहकर वेदों की विभिन्न शाखाओं का अध्ययन करती थी तथा मीमांसा में पारंगत होती थी. पंतजलि का ‘महाभाष्य’ हमें बताता है कि स्त्रियाँ उस समय आचार्य भी थी और कन्याओं को वेद पढ़ाती थी. पुरुषों के साथ धर्म,दर्शन,अभ्यास आदि गूढ़ विषयों पर स्त्रियों के शास्त्राथों के उदाहरण भी कम नहीं है. जनक और सुलभा,याज्ञवल्क्य और गार्गी, याज्ञवल्क्य और मैत्रेयी तथा शंकराचार्य और विद्धाधरी के शास्त्रार्थ यह दर्शाते है कि मनुस्मृति के पहले के युग में स्त्रियाँ ज्ञान व शिक्षा के क्षेत्र में, उच्चतम शिखर पर पहुँच सकती थी.

भारतीय इतिहास इस बात को निर्विवाद रूप से सिद्ध कर देता है कि एक युग ऐसा था, जिसमे स्त्रियाँ अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थी. डॉ.काशी प्रसाद जायसवाल की पुस्तक ‘हिन्दू राजतंत्र’ के अनुसार राजाओं के राज्याभिषेक में प्रमुख भाग लेने वाले रत्नों में रानी भी एक होते थी. और जिस प्रकार राजा अन्य रत्नों का अर्चन –वंदन करता था, उसी प्रकार रानी का भी करता था. यही नहीं, अपनी प्रधान रानी के अतिरिक्त अपनी नीची जातियों की पत्नियों की भी वह सम्मान पूजा करता था. इसी प्रकार अभिषेक के पश्चात राजा श्रेणियों की प्रमुख महिला का भी वंदन करता था!विश्व के इतिहास की दृष्टी से भी नारियों की उपर्युक्त स्थिति अत्यंत गौरवपूर्ण थी. इस स्थिति में उनके पतन के लिए कौन दोषी ठहराया जा सकता है ? निश्चय ही इसका श्रेय हिन्दुओं के विधायक मनु को प्राप्त है, इसमे की कोई गुन्जाइश नहीं है. प्रमाण-स्वरूप स्त्रियों के सम्बन्ध में,मनुस्मृति के कुछ विधान प्रस्तुत किये जा रहे है:

स्वभाव एष नारीणां नराणामिहदूषणम .
अतोर्थान्न प्रमाद्यन्ति, प्रमदासु विपश्चित:
अविद्वामसमलं लोके,विद्वामसमापि वा पुनः
प्रमदा द्युतपथं नेतुं काम क्रोध वाशानुगम
मात्रस्वस्त्रदुहित्रा वा न विविक्तसनो भवेत्
बलवान इन्द्रिय ग्रामो विध्दांसमपि कर्षति !
अर्थात:-पुरुषों को अपने जाल में फंसा लेना तो स्त्रियों का स्वभाव ही है! इसलिए समझदार लोग स्त्रियों के साथ होने पर चौकन्ने रहते है, क्योंकि पुरुष वर्ग के काम क्रोध के वश में हो जाने की स्वाभाविक दुर्बलता को भड़काकर स्त्रियाँ, मूर्ख ही नहीं विध्द्वान पुरुषों तक को विचलित कर देती है! पुरुष को अपनी माता,बहन तथा पुत्री के साथ भी एकांत में नहीं रहना चाहिए,क्योंकि इन्द्रियों का आकर्षण बहुत तीव्र होता है और विद्वान भी इससे नहीं बच पाते .

नैता रूपं परीक्षन्ते नासां वयसि संस्थिति:
सुरूपं व विरूपं वा,पुत्रनित्येव भुजन्ते
पौंश्चल्याच्चलचित्ताच्च, नैस्नेह्याच्च स्वभावतः
रक्षिता यत्नतोअपीह भर्तुष्वेता विकुवते
एवं स्वभावं ज्ञात्वाअअसां प्रजापति निसर्गजम
परमं यत्नमातिष्ठेत्पुरुषों रक्षणं प्रति
श्य्यासनमलंकारं कामं क्रोधं अनार्जवम
द्रोहभावं कुचर्या च स्त्रीभ्यो मनुरकल्पयत !
अर्थात:- पुरुषों में स्त्रियाँ न तो रूप का विचार करती है, न उसकी आयु की परवाह करती है!सुरूप हो अथवा कुरूप,जैसा भी पुरुष मिल जाये उसी के साथ भोग-रत हो जाती है. सदा पुरुष-संग की इच्छा रखने वाली,चंचल-चित्त तथा स्वभाव से निष्ठुर होने के कारण,कितने भी यत्न से क्यों न रखी जाये, स्त्रियाँ पतियों के प्रति निष्ठावान नहीं रह जाती है. ये दुर्गुण स्त्रियों में सृष्टि के आदि काल से ही विधमान है, अत:पुरुष को बड़े यत्न से रक्षा करनी चाहिए।सृष्टिकर्ता ने,नारी की रचना करते समय ही उसमे अपनी शय्या,आसन,आभूषण,के प्रति मोह तथा काम,क्रोध,बेईमानी,द्वेष -भाव एवं चरित्रहीनता से दुर्गुण कूट-कूट कर भर दिये .

मनु की दृष्टि में स्त्रियों का क्या स्थान था, वह उपर्युक्त उदाहरणों से स्पष्ट है. स्त्रियों के प्रति मनु के विधान का यह एक नमूनामात्र है. मनु के विचार से स्त्रियों को किसी भी दशा में स्वतंत्र नहीं होने देना चाहिए, यथा:

अस्वतंत्रता: स्त्रियः कार्या: पुरुषै स्वैदिर्वानिशम
विषयेषु च सज्जन्त्य: संस्थाप्यात्मनो वशे
पिता रक्षति कौमारे भर्ता यौवने
रक्षन्ति स्थाविरे पुत्र,न स्त्री स्वातान्त्रयमर्हति
सूक्ष्मेभ्योपि प्रसंगेभ्यः स्त्रियों रक्ष्या विशेषत:
द्द्योहिर कुलयो:शोक मावहेयुररक्षिता:
इमं हि सर्ववर्णानां पश्यन्तो धर्ममुत्तमम
यतन्ते भार्या भर्तारो दुर्बला अपि
अर्थात:- पुरुषों को अपने घर की सभी महिलाओं को चौबीस घंटे नियन्त्रण में रखाना चाहिए और विषयासक्त स्त्रियों को तो विशेष रूप से वश में रखना चाहिए! बाल्य काल में स्त्रियों की रक्षा पिता करता है! यौवन काल में पति तथा वृधावस्था में पुत्र उसकी रक्षा करता है! इस प्रकार स्त्री कभी भी स्वतंत्रता की अधिकारिणी नहीं है! स्त्रियों के चाल ढाल में ज़रा भी विकार आने पर उसका निराकरण करनी चाहिये ! क्योंकि बिना परवाह किये स्वतंत्र छोड़ देने पर स्त्रियाँ दोनों कुलों (पति व पिता ) के लिए दुखदायी सिद्ध हो सकती है! सभी वर्णों के पुरुष इसे अपना परम धर्म समझते है! और दुर्बल से दुर्बल पति भी अपनी स्त्री की यत्नपूर्वक रक्षा करते है!

बालया वा युवत्या वा वृदध्या वापि योषिता
न स्वतंत्रयेन कर्तव्यं किंचित्कार्य गृहेश्वपी
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पानि ग्राहस्य यौवने
पुत्राणां भर्तारि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतंत्रताम !
पित्र भर्त्र सुतैर्वापी नेच्छेद्विरहमात्मनः
एषां हि विरहेण स्त्री गर्ह्ये कुर्यादुभे कुले!
अर्थात: स्त्री को, चाहे वह बालिका हो, युवती हो अथवा वृध्दा हो, अपने घर में भी कोई कार्य स्वंतंत्रतापूर्वक नहीं करनी चाहिए. बाल्यावस्था में अपने पिता के,यौवनावस्था में अपने पति के और पिता के न रहने पर उसे अपने पुत्रों के अधीन बन कर रहना चाहिए कभी भी स्वतंत्र नहीं रहना चाहिए।स्त्री को अपने पिता,पति और पुत्रों से अलग कभी नहीं होना चाहिए. ऐसी स्वच्छंद स्त्रियाँ निश्चय ही दोनों (पिता व पति)के कुलों की भी बदनामी कराती है. मनु के विधान में स्त्रियों को पति से सम्बन्ध –विच्छेद (तलाक) का अधिकार नहीं है:

एतावानेव पुरुषो यज्जयात्मा प्रजेति ह
विप्रा: प्राहुस्तथा चैतद्धोभर्ता सा स्मृतांगना
अर्थात: स्त्री और पुरुष मिलकर एक व्यक्तित्व बनाते है. विप्रों का कथन है कि जो पति है वही पत्नी है.

पति-पत्नी के रूप में स्त्री-पुरुष के अविच्छेद-सम्बन्ध-संबंधी मनु के विधान को बहुत से हिन्दू बड़ी श्रधा से देखते है और यह समझते है कि विवाह-सम्बन्ध चूंकि आत्मा का मिलन होता है,इसलिए मनु ने उसे अविच्छेद बताया है, परन्तु मनु का विधान यहीं तक सीमित होता,तो कोई बात न थी. आश्चर्य तो यह है कि वह अविच्छेदता केवल स्त्री के लिए है, पुरुष के लिए नही।यह विधान स्त्री को तो पुरुष से बांधकर रखता है, परन्तु पुरुष को पूरी स्वतंत्रता प्राप्त है! इस विधान में पुरुष स्त्री को छोड़ने का अधिकार ही नहीं, उसको बेचने का भी अधिकारी है! यदि कोई बंधन है, तो यह है कि स्त्री स्वतंत्र नहीं हो सकती, भले ही वह बेच दी जाए या त्याग दी जाये! देखिये इस सम्बंध में मनु की व्यवस्था:

न निष्क्रय विसर्गाभ्यांभर्तुभार्या विमुच्यते
एवम धर्म विजानीम: प्राकप्रजापति निर्मितं!
अर्थात: पति द्वारा त्याग दिये जाने तथा किसी दूसरे के हाथ बेच दी जाने पर भी कोई स्त्री दूसरे की पत्नी नहीं कहीं जा सकती।उसके विवाहित पति का उस पर आजन्म अधिकार बना रहेगा.

इससे बढ़कर भी राक्षसी मनोवृति कोई हो सकती है,इसमें संदेह है, परन्तु स्मृतिकार मनु का उद्देश्य तो बौद्ध -काल में स्त्रियों को मिली स्वतंत्रता का अपरहण करना था. उन्हें अपने विधान के औचित्य अथवा अनौचित्य से क्या लेना देना था?उन्हें तो स्त्रियों की स्वतंत्रता से सिर में पीड़ा हो रही थी और इस पीड़ा के निवारण का एक ही उपचार,स्त्रियों की स्वतंत्रता का अपहरण था, उन्होंने किया. धन सम्पति के विषय में मनु ने पत्नी को एक दास से अधिक नहीं समझा,यथा:

भार्या पुत्रश्य दासश्य त्रय एवाधना: स्मृता:
यत्ते समधीगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम !
अर्थात :- स्त्री-पुत्र तथा दास की अपनी कोई धन-संपत्ति नहीं होती है! जो कुछ ये कमाते है, वह इनका अपना न होकर पति,पिता और स्वामी का ही माना जाएगा! आगे चलकर मनुस्मृति कार ने विधवा पर दया करके, उसे निम्नलिखित अधिकार दिये है:
१.यदि स्वर्गीय पति संयुक्त परिवार का सदस्य था तो विधवा को गुजारा मिल सकता है!
२.यदि मृत पति अलग होकर रहता था,तो उसकी सम्पति में विधवा का हक तो है, परन्तु व्यवस्था व नियंत्रण में स्त्री का कोई हाथ नहीं रहेगा!

भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्राता च सोदर:
प्रप्तापराधास्ता डया: स्यू र …. वा वेणुदलेन वा !
अर्थात:- पत्नी,पुत्र, दास, शिष्य तथा अपने रक्त-सम्बन्ध का भाई यदि अपराध करे, तो उसे रस्सी या फाटे बांस से मारा जा सकता है !इसप्रकार मनु के विधान में स्त्री को शारीरिक दंड देने का अधिकार भी पति को दिया गया है. इसके अतिरिक्त मनु के विधान में स्त्रियों को ज्ञान प्राप्त करने अथवा वेदाध्ययन का अधिकार नहीं दिया गया है.

अमन्त्रिका तू कार्येयं स्त्रीणां भावृदशेषत:
संस्कारार्थ शरीरस्य यथाकालं यथा क्रमम्
अर्थात :-निर्धारित कालक्रम के अनुसार स्त्रियों के जो संस्कार किये जायें, उनमे वेद-मन्त्रों का पाठ न किया जाये।ब्राह्मण संस्कृति में यज्ञ –कर्म धर्म ही आत्मा माना गया है,परन्तु मनु ने स्त्रियों को इस धर्म-कार्य से भी वंचित रखा है।इस संबन्ध में उनका आदेश निन्मलिखित है:

न वै कन्या न युवतिर्नाल्प विद्धो बा बालिश:
होता स्यादग्निहोत्रस्य नर्तोनासंस्कृतस्तथा!
नरके हि पतन्त्येते जुह्वतः स च यस्य तत
तस्माद्वैता न कुशलो होता स्याद्वेदपरागः
अर्थात:- कन्याएँ युवतियां,थोड़ा पढ़े -लिखे लोग,कुपढ,बीमार अथवा संस्कार-रहित व्यक्ति यज्ञ के होता न बनाये जायें, वरना होता और यजमान दोनों नरकगामी होंगे।धर्म लाभ से स्त्रियों को वंचित रखने के लिए उनको स्वयं तो यज्ञ करने के लिए अयोग्य ठहराया है,मनु ने ब्राह्मणों पर भी बंधन लगा दिया कि वे भी स्त्रियों के लिए यज्ञ न करे. इस प्रकार न स्वयं यज्ञ कर सकती है, न ब्राह्मणों के द्वारा करा सकती है. ब्राह्मणों पर रोक लगाने के लिए मनु ने निम्नलिखित विधान बनाया :

न श्रोति यतते ग्रामयाजिकृते तथा
स्त्रिया क्लीबेन च हते भुन्जीत ब्राह्मण:क्वचित्
अश्लीलमेतत्साधूनां यत्र जुह्वत्यमी हवि:
प्रतीप मेतद्देवानां तस्मात्तत्परिवर्जयेत!
अर्थात:- जिस यज्ञ में श्रोत्रिय आचार्य न हो, जिसमे समस्त ग्राम अध्वर्यु हो तथा जिसमे स्त्री व नपुंसक होता हो,ऐसे यज्ञ को अश्लील माना जाता है,ब्राह्मण ऐसे यज्ञ में भोजन न करे .

और अब जरा स्त्रियों के लिए मनु द्वारा निर्धारित जीवन-आदर्श को भी देखिए:

यस्मैदद्धपित्तात्तात्वेनां भ्राता चानुमते पितु:
तं शुश्रुषेत जीवन्तं संस्थितं च न लंघयेत
विशील: कामवृत्तो वा गुनैर्वा परिवर्जित:
उपचर्य:स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पति:
नास्ति स्त्रीणां प्रथग्यज्ञों न व्रतं नीप्युपोषितम
पतिं शुश्रुषते येन तेन स्वर्गे महीयते
अर्थात :-स्त्री का पिता अथवा पिता की सहमति से इसका भाई जिस किसी के साथ उसका विवाह कर दे,जीवन-पर्यन्त वह उसकी सेवा में रत रहे और पति के न रहने पर भी पति की मर्यादा का उल्लंघन कभी न करे।स्त्री का पति दु:शील, कामी तथा सभी गुणों से रहित हो तो भी एक साध्वी स्त्री को उसकी सदा देवता के सामान सेवा व पूजा करनी चाहिये।स्त्री को अपने पति से अलग कोइ यज्ञ,व्रत या उपवास नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उन्हें अपने पति की सेवा-शुश्रुषा से ही स्वर्ग प्राप्त हो जाता है. यहाँ पर मनु की उन व्यवस्थाओं को दे देना भी उपयुक्त रहेगा, जिन्हें स्त्रियों के लिए हिन्दू, अत्यंत श्रेष्ठ व अनुकरणीय आदर्श घोषित करते है:

अनृतादृतुकाले च मंत्र्संस्कारकृत्पति:
सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषिच:
सदा प्रह्ष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तया
अर्थात:-विधिवत मन्त्रों द्वारा गृहीत पति,स्त्री के लिए हर काल व ऋतु में सुखदायक है. लोक-परलोक दोनों में उससे सुख ही मिलता है. अत: उसे सदैव प्रसन्निचत्त रहना चहिएऔर गृह -कार्य को दक्षतापूर्वक करते हुए व घर के बर्तन आदि को साफ़ रखे तथा खर्च में मितव्ययिता बरते. और आगे दिये जा रहे श्लोक में स्त्रियों के वध को एक हल्का अपराध (उप-पातक)बताकर मनु ने स्त्रियों की जड़ता पर मुहर ही लगा दी :
धान्य कुप्य पशुस्तेयं मद्यप स्त्री-निषेवणम
स्त्री शूद्र विटक्षत्र वधो नास्तिक्यं चोपपातकम !

पिछले दिनों पटना में मनु का पुतला जलाया गया
अर्थात:- धान्य,कुप्य,पशुओं की चोरी, मद्दपान करने वाली स्त्री से प्रसंग, नास्तिकता तथा स्त्री,शूद्र,वैश्य तथा क्षत्रिय का वध करना,ये सब उप-पातक है. इस श्लोक में शूद्र,वैश्य व क्षत्रियों के वध को उप-पातक की बात तो समझ में आ सकती है,क्योंकि मनु ब्राह्मण के वध को महापातक और उसकी तुलना में अन्य वर्ण के लोगों के वध को मामूली पातक ठहराना चाहते थे, लेकिन इसके साथ सभी वर्णों के पूरे स्त्री समाज को घसीट लेना यही सिद्ध करता है की स्त्रियों के पूरे वर्ग को हेय दृष्टि से देखते थे।इन उद्धरणों के उपरान्त भी कोई संदेह कर सकता है की भारत में स्त्रियों के अध्:पतन का कारण स्मृतिकार मनु नहीं थे ?अधिकांश लोग इस तथ्य को जानते हुए भी दो बातों से अभिज्ञ प्रतीत होते है. वे यहीं नहीं जानते की इसमें मनु का योगदान क्या है? स्त्रियों के प्रति मनुस्मृति में दी गई व्यवस्थाएओं कोई नयी या मनु की इजाद की हुई नहीं है. ये सब ब्राह्मण एवं ब्राह्मणवाद की विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है. मनुस्मृति के पूर्व ये सब विचार सामाजिक मान्यताओं के रूप में विद्धमान थे. मनुस्मृति में केवल उन सब मान्यताओं के रूप परिवर्तन करके धर्म-शास्त्र तथा राज्य-विधान बना दिया गया .

दूसरी बात, जो प्राय: लोग नहीं जानते, यह है कि मनुस्मृति में आखिर स्त्रियों और शूद्रों पर इतनी अयोग्यताएं क्यों थोपी गयीं ?इसका स्पष्ट कारण है यही है कि बौद्ध –काल में समाज में दो वर्ग(स्त्रियाँ- शूद्र)बुद्ध-धर्म में अधिक श्रद्धा रखते थे और बड़ी संख्या में बुद्ध –धर्म को ग्रहण कर रहे थे,जिसके कारण ब्राह्मण धर्म की नींव ही हिली जा रही थी।अत: अपने धर्म की रक्षा के लिए मनुस्मृतिकार स्त्रियों का झुकाव बुद्ध-धर्म की ओर से मोड़ना चाहते थे।यही कारण है की मनु ने स्त्रियों पर इतनी पाबंदियां लगा दी की वह सदा के लिए पंगु हो जाये. प्रमाण– स्वरूप देखिये :
वृथा संकर जातानां प्रव्रज्यासु च तिष्ठताम
आत्मन्स्त्यागिनाम चैव निवर्तेतोदकक्रिया
पाषंडमाश्रितानाम च चरंतीनाम च कामतः
गर्भ भतृदृर्हाम चैव सुरापीनाम च योषिताम

अर्थात:-वर्ण-संकर,संन्यासी व आत्मघाती लोगों की पिण्डोदक क्रिया आवश्यक नहीं! इसी प्रकार उन स्त्रियों की भी पिण्डोदक क्रिया न की जाये, जो पाखंडी सम्प्रदाय का अनुसरण करती हों, स्वेच्छाचारिणी,गर्भपात,पतिघात तथा सुरापान करने वाली हो. इस व्यवस्था के लक्ष्य अन्य के अतिरिक्त निन्मलिखित दो लोग भी बनाये गये है:
१.प्रव्रज्यासु तिष्ठताम,और
२.पाखण्डमाश्रीतानां योषितां

पहला शिकार प्रव्रज्या लेने वाले लोगों से तात्पर्य बौद्ध परिव्राजकों से है, जो गृह-त्याग कर संस्यासी का जीवन व्यतीत करते थे, दूसरी ओर पाखंडी सम्प्रदाय के संकेत से निश्चय ही स्मृतिकार मनु का अभिप्राय बुद्ध-धर्म से है। इस प्रकार एक प्रकार से मनु ने यह प्रबंध कर दिया कि किसी परिवार का जो स्त्री या पुरुष बुद्ध-धर्म का अनुयायी बने, उसकी पिंडोदकक्रिया न की जाये।इसका प्रभाव यह पड़ता था की भयवश कोई स्त्री-पुरुष बुद्ध –धर्म ग्रहण ही नहीं करता और यदि कर लेता, तो परिवार के अन्य सदस्य उसे त्याग देते।स्मृतिकार मनु बुद्ध-धर्म के सबसे बड़े विरोधी थे और उनका विचार था कि यदि घर-घर में बुद्ध –धर्म का प्रवेश रोकना है,तो स्त्री समाज को अपनी मुट्ठी में रखना आवश्यक है. यही कारण है कि उन्होंने स्त्रियों पर इतने अधिक बंधन व अयोग्यताएं थोप दी. इससे सिद्ध हो जाता है कि नारियों के अधो:पतन का उतरदायित्व मनु पर है, न की बुद्ध पर.

Dr OM SudhaDr Om Sudha

(लेखक दलित एक्टिविस्ट और अंबेडकर फुले युवा मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)
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ब्राहमणवाद को दार्शनिक चुनौती देने वाले हिंदी के यशस्वी रचनाकार व आलोचक श्री मुद्राराक्षस जी (21 जून, 1933-13 जून, 2016) की सुप्रसिद्ध आलोचना पुस्तक “धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ” का पुनरावलोकन इस आर्टिकल में प्रस्तुत है…शंभु गुप्त

mudrarakshas-buddhist-writerब्राहमणवाद को दार्शनिक चुनौती
हिंदी के यशस्वी रचनाकार व आलोचक मुद्राराक्षस (21 जून, 1933-13 जून, 2016) का मूल नाम सुभाषचंद्र था। वे न सिर्फ भारत के वंचित तबकों के समाज और संस्कृति के चित्रण तथा उन पर हुए हमलों के प्रतिकार के लिए प्रतिबद्ध थे, बल्कि स्वयं की सामाजिक पहचान को लेकर भी सचेत थे। अपनी कुछ किताबों में उन्होंने अपना परिचय ‘ओबीसी लेखक’ के रूप में प्रकाशित करवाया था। उनकी सुप्रसिद्ध आलोचना पुस्तक ‘धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ’ का पुनरावलोकन कर रहे हैं…शंभु गुप्त
मुद्राराक्षस की पुस्तक ‘धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ’ का अवलोकन
मुद्राराक्षस की बहुत बेहतरीन, विवेक पर लगातार रन्दा चलाने वाली, सदैव ज़रूरी और प्रासंगिक किताब है, ‘धर्मग्रन्थों का पुनर्पाठ’; जिसके अब तक कई संस्करण आ चुके हैं। यह किताब प्रमाणित करती है कि मुद्राजी का अध्ययन-चिन्तन कितना व्यापक, गहरा और अग्रगामी दृष्टि से सम्पन्न था।
इस पुस्तक की पहली और लगभग सर्वोपरि विषेशता यह है कि यह आद्यंत बहुत ही सावधानी, प्रमाणिकता और निर्भीकता के साथ लिखी गई है। हवा में कुछ नहीं है, बल्कि कहना यह चाहिए कि हज़ारों सालों की ब्राह्मणवादी हवाबाज़ी को बहुत गहरे और विस्तार में जाकर निर्मूल किया गया है। मुद्राजी इसमें रामविलास शर्मा से टकराते हैं और उनके वेद, महाभारत सम्बन्धी अध्ययन की चिन्दियाँ बिखेर देते हैं। रामविलासजी से टकराने का साहस और विषद अध्ययन हिन्दी में इक्का-दुक्का लोगों के पास ही रहा है। मुद्राजी के विवेचन में प्रामाणिकता, तुर्षी और अकाट्यता इसलिए आई क्योंकि उन्होंने सन्दर्भित समस्त ग्रन्थों की सीधे मूल प्रतियाँ, मूल किताबें देखी थीं और तब उस मूल पाठ का पुनर्पाठ-दरअसल असल पाठ-प्रस्तुत किया। (धर्मग्रंथों का पुनर्पाठ, साहित्य उपक्रम, संस्करण 2009; पृ. 221)।
इस पुस्तक की दूसरी बड़ी विषेशता यह है कि यह संदर्भित धर्मग्रन्थों का पाठ करते हुए उनके रचनाकाल की राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इत्यादि स्थितियों, परिस्थितियों का अनिवार्यत: ध्यान रखकर चली है। तत्कालीन स्थितियों परिस्थितियों के मद्देनज़र उन्हें समझा-समझाया गया है। मुद्राजी ने इस पुस्तक में एक जगह लिखा है-‘‘वेद पढ़ते या उसके अनुवाद उद्धृत करते समय उस काल की सम्पूर्ण सांस्कृतिक, सामाजिक स्थिति देखनी चाहिए जो वेदेतर तमाम साहित्यों में मिलती है।’’ (वही, पृ.190)। इसका एक परिणाम तो यह हुआ है कि समय-सापेक्ष इतिहास-दृष्टि निर्मित हो सकी और दूसरा और बड़ा अग्रगामी परिणाम यह हुआ कि परम्परा में अंतर्व्याप्त ब्राह्मणतन्त्रीय सर्वसत्तवाद, चालाकियों, दुरभिसन्धियों, धूर्तताओं, लम्पटताओं, अहमन्यताओं इत्यादि के लगभग अबूझ-से चेहरे एकदम साफ़ और खरे उभरते दिखाई दिए, कि पाठक की आँखे जैसे भड़भड़ाकर खुल जाएँ! जैसे इतिहास का और अतीत का कच्चा नंगा चिट्ठा पटपटाकर हमारे सामने खुलने लगे और हम गश खाते-खाते यक़ायक़ स्तम्भित हो लें! यह किताब एक निर्मम आरी की तरह हमारी अब तक की सारी पूर्वावधारणओं को बेतरह काटती चलती है। हमें इसका अन्देशा तो था और इससे पहले भी इस तरह की बातें देखने सुनने में आई थीं, लेकिन हिन्दी के एक रचनात्मक लेखक की ओर से यह पहली और शायद एकमात्र किताब है, जो हमारे यहाँ के कथित धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, महाख्यानात्मक ग्रन्थों का ऐसा खुलकर असल रहस्योद्घाटन करती हो! आचार्य नामवर सिंह और इनके सम्प्रदाय के लोग देखें कि ‘दूसरी परम्परा’ की खोज कैसे की जाती है!
मुझे नहीं पता कि हिन्दी के किसी अन्य लेखक, चिन्तक ने हिन्दी भाषा के विषय में इस तरह की कोई आत्मनिरीक्षणात्मक और इतिहासपुष्ट टिप्पणी की हो;  अब तक तो हमें यही सिखाया-पढ़ाया गया है कि हिन्दी आमजन की, संघर्षचेतना की भाषा रही है, पर यह एक बिल्कुल ही नई बात है, जो मुद्राराक्षस कहते हैं-‘‘हिन्दी भाषा का जन्म भी ब्राह्मण साम्प्रदायिकता और पूर्वग्रह से ही हुआ था।’’(वही, पृ0 221) इस एक निष्कर्ष से अन्य निष्कर्ष प्रभावित हों, यह स्वाभाविक ही है।
मुद्राजी ने इस पुस्तक में हमारे यहाँ के धर्मग्रन्थों के पुनर्पाठ के माध्यम से हमारे यहाँ की धार्मिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक आदि लगभग समस्त परम्पराओं का पुनर्पाठ प्रस्तुत किया है और हमें चुनौती दी है कि हम देखें कि हमारे यहाँ किस तरह का वैचारिक, भावमूलक, अकादमिक घालमेल मूल रचना और उसके निर्वचन में किए जाते रहने की शैतान की आँत जैसी लम्बी दुराग्रही और दुष्टतापूर्ण और हिंसक परम्परा रही है। मुद्राजी ऐसा दरअसल इसलिए कर पाए कि उनका प्रस्थान-बिन्दु ही यह रहा है कि किसी रचना के पीछे का मक़सद क्या रहा हो सकता है? वह किन लोगों, किस वर्ग-समूह को सम्बोधित है? वह इन लोगों की आकांक्षाओं, मंशाओं के हित में क्या शिल्प-प्रविधि अपनाती है; इत्यादि। मुद्राजी बात यहाँ प्राचीन साहित्य के रचनाकाल के निर्धारण की कर रहे हैं लेकिन प्रकारान्तर से वे इन रचनाओं की समकालीनता की पड़ताल का सिलसिला ही जारी रखे हुए हैं: ‘‘हमारी नजर से भारत की प्राचीन किताबों के लेखनकाल का सबसे निर्णायक तत्व होना चाहिए रचना की सामाजिक सांस्कृतिक जरूरत। रचना अपने समय के किन लोगों की कौन-सी उम्मीदें पूरी करती है और इस काम में वह रचना किन तत्वों को इस्तेमाल में लाती है।’’ (वही, पृ. 212)।
मुद्राजी का भारत की पुरानी किताबों की समकालीनता की पड़ताल का यह सिलसिला अनवरत और ताल ठोंकू अन्दाज़ में इस किताब में चलता है। समकालीनता के साथ-साथ आने वाले समय में किस पर इनका कैसा क्या प्रभाव था, किसको इनसे क्या-क्या फ़ायदा-नुकसान हुआ, इसका भी हिसाब वे लेते चले हैं। वेद से लेकर ब्राह्मण ग्रन्थों तक लगातार एक ही लक्ष्य इन लोगों का रहा; ब्राह्मण तन्त्र की स्थापना और सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक वर्चस्व का निर्माण। इस सम्बन्ध में इस पुस्तक के कुछ सूत्र वाक्य निम्नानुसार लिए जा सकते हैं-
1. ईसापूर्व, विशेषकर बुद्ध और उनसे पहले का समय भारतीय विचार परम्परा में दो हिस्सों में स्पष्ट रूप से बँटा देखा जा सकता है। एक पक्ष वह है जो तर्क, जिज्ञासा और शंका पर आधारित है और दूसरा वह, जो आस्था और उपासना पर केन्द्रित रहा है। उपासना और आस्था केन्द्रित साहित्य मुख्यतः ब्राह्मण साहित्य है। उपनिषद इसी परम्परा के दस्तावेज हैं। (वही, पृ. 88-89)। उपनिषदों का बयान बड़े बौद्धिक उत्साह के बावजूद ब्राह्मण पूजा या ब्राह्मण श्रेष्ठता पर ही समाप्त होता रहा है। (वही, पृ. 136)। उपनिषदों में उस समय तक विकसित समृद्ध विचार परम्परा से न सीधा टकराव है, न उसका खण्डन बल्कि अक्सर उपनिषदकार अच्छे चिन्तन के संकेत देने के बाद ब्राह्मण कर्मकाण्ड की अहमियत सिद्ध करने लग जाता है। (वही, पृ. 155)।
ब्राह्मण साहित्य को लेकर कोई भ्रम किसी को नहीं होना चाहिए। ब्राह्मण साहित्य का सीधा-सा मतलब है ब्राह्मण या ब्राह्मण तन्त्र के अनुयायियों, प्रवाचकों, प्रवक्ताओं द्वारा लिखा गया साहित्य। जिन्हें हम कथित तौर पर हिन्दू धर्म से जुड़ी रचनाएँ मानते-कहते आए हैं, वे लगभग सारी ही ऐसी ही हैं।
2. ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद, जहाँ सिर्फ ब्राह्मणों के घरेलू ग्रन्थ हैं, वहीं अथर्ववेद ब्राह्मणों द्वारा बाकी समाज को कैसे प्रभावित किया जाए, इसके उपयोग में आने वाली किताब है और वही हुआ भी। (वही, पृ. 100)। ईरान के उत्तर-पश्चिम के प्राचीन मीडियन लोगों की धर्म-पुस्तक जेन्दावेस्त और अथर्ववेद में गहरी समानताएँ है। दोनों ही कबीलाई ओझा चरित्र के ग्रन्थ हैं। (वही, पृ. 99)
3. मनुस्मृति में ऊपरी तौर पर व्यक्ति, परिवार और समाज के करने, न करने लायक काम गिनाए गए हैं। राजसत्ता और ब्राह्मण श्रेष्ठता पर सबसे ज्यादा विस्तार से लिखा गया है, पर इस किताब का मुख्य कथ्य समाज में जाति-व्यवस्था को मजबूत करना, स्त्री जातिमात्र को हीन सिद्ध करना है। संस्कारों पर विस्तार से लिखा जरूर दिखता है, पर वह भी ब्राह्मण तन्त्र को स्थापित करने की नीयत से किया गया है। (वही, पृ. 102)।
4. कौटिल्य का अर्थशास्त्र और मनुस्मृति नामक धर्मशास्त्र, दोनों की भूमिका एक ही है और दोनो ही किताबें उस समाज और राजव्यवस्था का विवरण देती हैं, जिसमें ब्राह्मण सर्वोपरि रहे और सारी राजनीतिक, सामाजिक प्रक्रिया वैसे चले जैसा ब्राह्मण आदेश दे। (वही, पृ. 175)
5. सामान्यतः महाभारत सत्य-असत्य, न्याय-अन्याय जैसे मूल्य निर्धारणों की गाथा है, पर पूरी पुस्तक पर नजर डालने पर एक दूसरी ही बात सामने आती है।स्पष्टता दिख जाता है कि ब्राह्मण को सांस्कृतिक, सामाजिक इतिहास के शिखर पर होना, सिद्ध करना इस किताब का पहला बड़ा मक़सद है। भारत आने के बाद भारतीय समाज के जिस स्वरूप और इतिहास का सामना ब्राह्मण ने किया, उसकी वास्तविक छवि को मिटाना भी ब्राह्मण का दूसरा बड़ा उद्देश्य था। महाभारत द्वारा यही दोनो काम ब्राह्मण शिद्दत से करता है। (वही, पृ. 201)
6. गीता एक तरह से वेदान्त और भागवत का समन्वित रूप है। वेदान्त ही बड़ी आसानी से उन वल्लभाचार्य तक पहुँच जाता है जो भक्ति-आन्दोलन के सबसे बड़े और प्रखर प्रतिष्ठता थे। गीता और भागवत दोनों ग्रन्थ या तो एक-दूसरे के पूरक हैं या आपस में समन्वित होने पर भक्ति-दर्श्न बन जाते हैं। यह एक बड़ी वैचारिक भ्रान्ति है कि गीता एक सुव्यवस्थित दार्शनिक चिन्तन है। वस्तुतः यह कृष्ण-भक्ति को ही महिमामण्डित करने वाली एक रचना है। (वही, पृ.194-95)।
7. जिस तरह गीता का मुख्य उद्देश्य ब्राह्मण तन्त्र के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति है, ठीक उसी तरह महाभारत का मुख्य कथ्य ब्राह्मण तन्त्र की प्रतिष्ठा ही है। (वही, पृ. 206)।
इस पुस्तक के ‘गीता का पुनर्पाठ’ अध्याय पर अलग से विस्तार के साथ विचार की ज़रूरत है, जो पाँच उपबिन्दुओं में विभाजित है। इस अध्याय से गीता के बारे में हमारे कई भ्रम दूर हो सकते हैं। इनमें ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ इत्यादि प्रसिद्ध श्लोक की व्याख्या अद्भुत और ऐतिहासिक महत्व की है। (द्रष्टव्य, वही, पृ. 197)।
संस्कृत के रचनात्मक साहित्य के बारे में मुद्राजी जो टिप्पणियाँ करते हैं, वे भी अच्छी-ख़ासी खराद पर चढ़ी हुई-सी लगती हैं। मसलन यह कि ‘‘संस्कृत साहित्य, जो भास से शुरू होता है, मृच्छकटिकम् जैसे बिरले अपवाद को छोड़कर प्राचीन ब्राह्मणग्रन्थों, पुराणों और महाकाव्यों के कथानकों को लेकर ब्राह्मण संस्कृति और कर्मकाण्ड की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए लिखा गया।’’ (वही, पृ. 174)। इस क्रम में एक महत्वपूर्ण तथ्योद्घाटन इस साहित्य में स्त्री के उपस्थापन को लेकर किया गया है। जिसे कथित रूप से हम प्रेम कहते आए हैं, अपने वास्तविक प्ररूप में वह कुछ और ही है। मुद्राजी लिखते हैं-‘‘इस समूचे साहित्य का प्रमुख लक्ष्य शायद वात्स्यायन के कामसूत्र के प्रभाव में स्त्री-भोग को सबसे ज्यादा जगह देना रहा है। अगर देवियों का जिक्र भी है तो अभूतपूर्व यौन आनन्द के लिए, जैसे कुमार सम्भवम् या गीत गोविन्दम्।’’ (वही)। इस क्रम में सबसे दिलचस्प यह तथ्यानुसन्धान है, जो साहित्य की परिस्थिति-सापेक्षता की अवधारणा के तहत है-‘‘सम्भव है स्त्री को ब्राह्मण संस्कृति जैसे अत्यन्त नीचे के दर्जे पर रखती रही है, उसी तरह उसके नग्नतम भोग की भी समर्थक रही हो। आखिर अश्वमेध जैसे अनुष्ठानों में रानी के स्तर की स्त्री को लेकर भी ब्राह्मण जैसी नग्नता का आचरण करता रहा है, उसके चलते कविता में स्त्री के साथ यही सुलूक असामान्य नहीं कहा जा सकता।  शायद ब्राह्मण की यही कामलिप्सा संस्कृत भाषा के साहित्य में अश्लीलता की हद तक पहुँचकर व्यक्त होती है।’’ (वही)।
धर्मग्रन्थों के मार्फ़त प्राचीन काल में स्त्रियों की स्थिति पर विचार इस पुस्तक का एक प्रमुख एजेण्डा रहा है। न केवल स्त्री, बल्कि ब्राह्मण तन्त्र द्वारा ज़बर्दस्ती हाशिये पर धकेले गए भारतीय समाज के अन्य वर्गों-जिनमें शूद्र कही गई जातियाँ प्रमुख हैं-की नियति का भी पुनरवलोकन इस पुस्तक की केन्द्रीय चिन्ताओं में सर्वप्रमुख रहा है। इस सम्बन्ध में मुद्राजी के इन दो अभिमतों का उल्लेख लगभग अनिवार्य है। इनमें एक तो स्त्री और गैर-सवर्ण मूलवासी समाज के प्रति धर्मग्रन्थों के रवैये पर है और दूसरा शूद्र-समस्या के प्रति हमारे यहाँ के वामपन्थियों के रवैये और स्टैण्ड पर है-
ईसा से कोई छह-सात सदी पहले से लेकर उन्नीसवीं सदी के शुरू तक ब्राह्मण समुदाय लगातार इस दिशा में काम करता रहा। इन सभी धर्मग्रन्थों का मूल उद्देश्य समाज को व्यवस्थित करना बताया गया है। पर समाज को व्यवस्थित करने के तथाकथित उद्देश्य से लिखे गए इन धर्मग्रन्थों का मकसद रहा है स्त्री और गैर-सवर्ण मूलवासी समाज का खून चूसना और उनका बेजा लाभ उठाते हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को समृद्धि शिखर पर बनाए रखना। (वही, पृ. 118)।
वामपंथ ने भारतीय इतिहास के इस पहलू का सही भाष्य कभी नहीं किया। वामपन्थ शूद्र-समस्या को 90 फीसदी भारतीयों की नहीं, एक चौथाई समाज की समस्या मानकर चलता है। शूद्र की समस्या वामपन्थ सिर्फ अस्पृश्यता मानता है या एक धार्मिक सांस्कृतिक विकार। वामपन्थ नहीं देखता कि दस करोड़ लोगों के धर्मग्रन्थ बाकी सारे 90 करोड़ को शूद्र मानते हैं। वामपन्थ यह भी नहीं समझना चाहता कि शूद्र ही मजदूर हैं, यह हिन्दू धर्मग्रन्थ भी मानते हैं। शूद्र आदोलन ही वास्तविक मजदूर आन्दोलन है, यह न समझना वामपन्थ की सबसे बड़ी राजनीतिक असफलता है। (वही, पृ. 130)।
 इस पुस्तक में मुद्राजी प्रास्थानिक तौर पर इतिहासवेत्ताओं की इस बहुप्रचलित मान्यता का खण्डन करते हैं कि आर्य कहीं बाहर से आए थे। बल्कि इसके स्थान पर वे एक बिल्कुल नई और पर्याप्त तर्कसंगत स्थापना देते हैं कि दरअसल ब्राह्मण कहे जाने वाले लोग ही बाहर से आए थे। मुद्राजी की स्थापना यह भी है कि आर्य यहीं का कुलीन या लेजर क्लास था, जिस पर हिंसा और धार्मिक अन्धविश्वास और कर्मकाण्ड के ज़रिए बाहर से आए ब्राह्मणों ने अपना प्रभुत्व और वर्चस्व स्थापित किया। मुद्राजी की एक और मौलिक स्थापना यह है कि भारतीय भूभाग में शूद्र कोई नहीं था; ब्राह्मणों ने अपने प्रभुत्व में आए राजनीतिक, आर्थिक सत्ताधारियों के मार्फ़त उस समय के विशाल श्रमशील कामगार, किसान, दस्तकार वर्ग को शूद्र घोषित करते हुए उनके समस्त राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, और यहाँ तक कि न्यूनतम मानवाधिकार भी छीन लिए और उन्हें बेतरह जन्मजन्मान्तर तक भयावह हाशिए पर धकेल दिया। यह आकस्मिक नहीं है कि इस पुस्तक में बाहर से आकर यहाँ अपनी सर्वसत्ता स्थापित करने वाले ब्राह्मणों की तुलना बार-बार अँग्रेज़ों से की गई है। जैसे अँग्रेज़ों ने यहाँ प्रभुत्व स्थापित करते हुए संस्कृति को हथियार बनाया था, ठीक वही काम यहाँ आकर ब्राह्मणों ने किया। मुद्राजी लिखते हैं-‘‘भारत में शासन पर अधिकार हो जाने के बाद बर्तानिया स्थित अंग्रेज जाति ने अपनी सत्ता को मज़बूत करने के लिए संस्कृति को बड़ा साधन बनाया था। उसने धीरे-धीरे नाटक, साहित्य, शिक्षातन्त्र, राजतन्त्र, अर्थतन्त्र में सीधे हस्तक्षेप किया था। ठीक यही काम ब्राह्मण ने भारत में ईसवी सन् के आसपास शुरू किया। (वही, पृ.175)।
इस समीक्षा का समापन मुद्राजी द्वारा प्रयुक्त दो महत्वपूर्ण प्रत्ययों के उल्लेख के साथ किया जाना उपयुक्त होगा। इसमें एक है-‘सोशल डार्विनिज्म’ (वही, पृ. 150) तथा दूसरा है-‘समाज को नाबालिग बनाना’ (वही, पृ. 151)। ये दोनों ही प्रत्यय ‘उपनिषद् पुनरीक्षण’ शीर्षक अध्याय में प्रयुक्त हुए हैं और लगभग साथ-साथ आए हैं। ये दोनों काम ब्राह्मण ने किए। बीसवीं शताब्दी के मध्य में वामपन्थ-विरोधी अभियान के तहत पूँजीवादी व्यवस्था के पक्षकारों-सोशल डार्विनिस्ट विचारकों-द्वारा सामाजिक, आर्थिक समानता के विरुद्ध जो कुछ किया गया, बुद्ध पूर्व और बुद्ध युग के ब्राह्मण विचारकों ने भी ठीक यही किया। (वही, पृ. 150-51)। इसी विवेचन के क्रम में मुद्राजी ने नाबालिग शब्द का कुछ इस तरह इस्तेमाल किया-‘‘वेदोत्तर काल का ब्राह्मण समाज को इसी तरह नाबालिग रखना चाहता है। धर्मतन्त्र इस काम में उसकी सबसे बड़ी मदद करता है। गगग धर्मतन्त्र समाज को नाबालिग बनाने की सबसे बड़ी मशीन होता है।’’ (वही, पृ. 151)। नाबालिग कितना दुर्भाग्यपूर्ण शब्द है, हम समझ सकते हैं।
मुद्रराक्षस की यह किताब समय की निरन्तरता और समय-सापेक्षता की कसौटियों पर इतिहास के विज्ञ पुनरीक्षण और पुनर्लेखन का बेहतरीन उदाहरण है।
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