ईश्वर है या नहीं इस सवाल पर गौतम बुद्ध के जवाब ….ओशो “गहरे पानी पैठ


gulami dharm ishwarबुद्ध एक गांव में गए हैं। और एक आदमी ने पूछा, ईश्वर है? बुद्ध ने कहा, नहीं। और दोपहर दूसरे आदमी ने पूछा कि मैं समझता हूं ईश्वर नहीं है, आपका क्या खयाल है? बुद्ध ने कहा, है। और सांझ एक तीसरे आदमी ने पूछा कि मुझे कुछ पता नहीं, ईश्वर है या नहीं? बुद्ध ने कहा कि चुप ही रहो तो अच्छा है— न हां, न ना।

जो साथ में था भिक्षु वह बहुत घबड़ा गया, उसने तीनों उत्तर सुन लिए। रात उसने बुद्ध से कहा, मैं पागल हो जाऊंगा! सुबह आपने कहा, हां; दोपहर आपने कहा, नहीं; सांझ आपने कहा, न ही, न नहीं, मैं क्या समझूं? बुद्ध ने कहा, तुझे तो मैंने एक भी उत्तर नहीं दिया, जिनको दिए थे उनसे बात है; तुझसे कोई संबंध नहीं। तूने सुना क्यों? तूने जब पूछा ही नहीं था, तो तुझे उत्तर कैसे दिया जा सकता है? जिस दिन तू पूछेगा उस दिन तुझे उत्तर मिल जाएगा। पर उस आदमी ने कहा, मैंने सुन तो लिया! बुद्ध ने कहा, वे उत्तर दूसरों को दिए गए थे, और दूसरों की जरूरतों के अनुसार दिए गए थे। सुबह जिस आदमी ने कहा था कि ईश्वर है? वह आस्तिक था और चाहता था कि मैं भी उसकी ही में हां भर दूं। उसे कुछ पता नहीं ईश्वर के होने का, लेकिन सिर्फ अपने अहंकार को तृप्त करने आया था कि बुद्ध भी वही मानते हैं जो मैं मानता हूं। वह बुद्ध से भी अपनी स्वीकृति लेने, कनफमेंशन लेने आया था। तो मैंने उससे कहा, नहीं। मैंने उसकी जड़ों को हिला दिया। और उसे कुछ पता नहीं था, अन्यथा मुझसे पूछने क्यों आता? जिसे पता हो गया है वह कनफमेंशन नहीं खोजता। सारी दुनिया भी इनकार करे तो वह कहता है, इनकार करो, वह है; इनकार का कोई सवाल नहीं है। अभी वह पूछ रहा है, अभी वह पता लगा रहा है कि है? तो मुझे कहना पड़ा कि नहीं है। उसकी खोज रुक गई थी, वह मुझे शुरू कर देनी पड़ी। दोपहर जो आदमी आया था, वह नास्तिक था। वह मानता था कि नहीं है, उसे मुझे कहना पड़ा कि है। उसकी भी खोज रुक गई थी; वह भी मुझसे स्वीकृति लेने आया था अपनी नास्तिकता में। सांझ जो आदमी आया था, वह न आस्तिक था, न नास्तिक, उसे किसी भी बंधन में डालना ठीक न था, क्योंकि हां भी बांध लेता है, नहीं भी बांध लेता है। तो उससे कहा कि तू चुप रह जाना— न हां, न ना; तो पहुंच जाएगा। और तेरा तो सवाल ही नहीं है, उस भिक्षु से कहा, क्योंकि तूने अभी पूछा नहीं है।

धर्म बड़ी निजी बात है— जैसे प्रेम। और प्रेम में अगर कोई अपनी प्रेयसी को कुछ कहता है तो वह बाजार में चिल्लाने की बात नहीं है, वह नितांत वैयक्तिक है; और बाजार में कहते ही अर्थ उसका बेकार हो जाएगा। ठीक, धर्म के संबंध में कहे गए सत्य भी इतने ही पर्सनल, एक व्यक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्ति से कहे गए हैं, हवा में फेंके गए नहीं हैं।

इसलिए विवेकानंद बन जाएं तो जरूर पूछने आ जाना। लेकिन विवेकानंद पूछने नहीं आते कि पूछें या न पूछें।

मैं अभी एक गांव में गया, एक युवक आया और उसने कहा कि मैं आपसे पूछने आया हूं मैं संन्यास ले लूं? तो मैंने उससे कहा, जब तक तुझे पूछने जैसा लगे तब तक मत लेना, नहीं तो पछताएगा। और मुझे क्यों झंझट में डालता है? तुझे लेना हो ले, न लेना हो न ले। जिस दिन तुझे ऐसा लगे कि अब सारी दुनिया रोकेगी तो भी तू नहीं रुक सकता, उस दिन ले लेना, उसी दिन संन्यास आनंद बन सकता है, उसके पहले नहीं।

तो उसने कहा, और आप?

मैंने कहा, मैं किसी से कभी पूछने नहीं गया। अपनी इस जिंदगी में तो किसी से पूछने नहीं गया। क्योंकि पूछना ही है तो अपने ही भीतर पूछ लेंगे, किसी से पूछने क्यों जाएंगे? और कोई कुछ भी कहे, उस पर भरोसा कैसे आएगा? दूसरे पर कभी भरोसा नहीं आ सकता। लाख उपाय करें, दूसरे पर भरोसा नहीं आ सकता।

अगर मैं कह भी दूं कि हां, ईश्वर है, क्या फर्क पड़ेगा? जैसा आपने किताब में पढ़ लिया कि रामकृष्ण ने कहा कि हां, है! और जैसा मैं तुझे देखता हूं उससे भी ज्यादा साफ उसे देखता हूं। क्या फर्क पड़ गया आपको? एक किताब और लिख लेना आप कि आपने पूछा था और मैंने कहा, हां है! और जैसा मैं आपको देखता हूं उससे भी ज्यादा साफ उसे देखता हूं। क्या फर्क पड़ेगा? एक किताब, दो किताब, हजार किताब में लिखा हो कि है, बेकार है, जब तक कि भीतर से न उठे कि है, तब तक कोई उत्तर दूसरे का काम नहीं दे सकता। ईश्वर के संबंध में उधारी न चलेगी। और सब संबंध में उधारी चल सकती है, ईश्वर के संबंध में उधारी नहीं चल सकती।

इसलिए मुझसे क्यों पूछते हैं? और मेरे हां और न का क्या मूल्य? अपने से ही पूछें। और अगर कोई उत्तर न आए तो समझ लें कि यही भाग्य है कि कोई उत्तर नहीं; फिर चुप होकर प्रतीक्षा करें, उसके साथ ही जीएं; अनुत्तर के साथ जीएं। किसी दिन आ जाएगा; किसी दिन उतर आएगा। और अगर पूछना ही आ जाए— ठीक पूछना आ जाए, राइट क्रेश्चनिंग आ जाए—तो सब उत्तर हमारे भीतर हैं; और ठीक पूछना न आए, तो हम सारे जगत में पूछते फिरे, कोई उत्तर काम का नहीं है।

और जब विवेकानंद जैसा आदमी रामकृष्ण से पूछता है, तो रामकृष्ण जो उत्तर देते हैं, वह रामकृष्ण का उत्तर थोडे ही विवेकानंद के काम पड़ता है। विवेकानंद इतनी प्यास से पूछते हैं कि जब वह रामकृष्ण का उत्तर आता है तो वह रामकृष्ण का नहीं मालूम पड़ता, वह अपने ही भीतर से आया हुआ मालूम पड़ता है। इसीलिए काम पड़ता है, नहीं तो काम नहीं पड़ सकता। जब हम बहुत गहरे में किसी से पूछते हैं, इतने गहरे में कि हमारा पूरा प्राण लग जाए दांव पर, तो जो उत्तर आता है, फिर वह हमारा अपना ही हो जाता है, वह दूसरे का नहीं होता; दूसरा फिर सिर्फ एक दर्पण हो जाता है। अगर रामकृष्ण ने यह कहा कि हां है, तो यह उत्तर रामकृष्‍ण का नहीं है। यह आथेंटिक बन गया, विवेकानंद को प्रामाणिक लगा, क्योंकि रामकृष्ण एक दर्पण से ज्यादा न मालूम पड़े; अपनी ही प्रतिध्वनि, बहुत गहरे अपने ही प्राणों का स्वर वहां सुनाई पड़ा।
ओशो

“गहरे पानी पैठ”

 

Advertisements

3 thoughts on “ईश्वर है या नहीं इस सवाल पर गौतम बुद्ध के जवाब ….ओशो “गहरे पानी पैठ

  1. Can you Please; load new video of Osho – on Varna- vyavastha, Castism,and Social status of people, available on face book and What’s App.Thank you.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s