किसी ने कहा है की जिस कौम का इतिहास नही होता, उस कौम का कोई भविष्य नही होता, आज बहुजन समाज की बात करे तो भगवान बुद्ध के बाद दलित आंदोलन के अग्रदूत गुरू रविदास हुए है ।…… एडवोकेट कुशाल चौहान

sant ravidas” क्रांतिकारी रैदास ”🌀
🔹🔹🔹🔹🔹🔹लेखक कुशालचन्द्र एड्वोकेट
         किसी ने कहा है की जिस कौम का इतिहास नही होता, उस कौम का कोई भविष्य नही होता, आज बहुजन समाज की बात करे तो भगवान बुद्ध के बाद दलित आंदोलन के अग्रदूत गुरू रविदास हुए है ।
        गुरू रविदास का जन्म माघ सुदी 15 विक्रम संवत् 1460 मे मंडुआ डीह नामक एक गाँव मे रघुराम जी के घर हुआ इनकी माता का नाम करमा देवी था, उनका विवाह लोना देवी से साथ हुआ ।
         रैदासजी प्रारम्भ से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे उन्होने ब्राह्मणों के चारों वेदो का खण्डन किया तथा उन्हे व्यर्थ कि किताबें बताया साथ ही गुरू कबीर ने इन्ही वेदो को अधर्म के वेद बताया । उन्होने ब्राह्मण धर्म के सभी रीति-रिवाजों यज्ञ, श्राद्ध, मंदिरों मे पूजा पाठ, आदि हर ब्राह्मणी कर्मकाण्‍ड का तर्क के साथ खण्डन किया । उन्होने दलित समाज को चेताया की केवल दलित समाज के लोग ही असल मे भारत के शासक रहे है, सिन्धु सभ्यता अर्थात् दलित सभ्यता से लेकर मोर्य काल तक भारत पर केवल और केवल दलितों का शासन ही रहा है ।
        उन्होने दलितो को शिक्षा देना शुरू किया तथा उन्होने उप अक्षरों की गुरूमुखी लिपी बनाई तथा उसी लिपि मे अपनी बाणी की रचना की । रैदास की बाणियो से ही ऐसा आभास होता है कि रैदास ने ऐसे राज्य की स्थापना करना चाही जहा ऊचँ-नीच, शोषण आदि का कोई नाम नही हो ।
        गुरू रैदास ने उस जमाने मे विधवा मीरा को दीक्षा दी, जब भारत भर मे खासकर राजस्थान मे विधवा को पति की लाश के साथ जिन्दा जला दिया जाता था, इस सामाजिक कुरीति को ब्राह्मण धर्म का पूरा समर्थन हासिल था, तथा उस समय विधवा हो जाना सबसे बड़ा गुनाह था, चाहे इसमे पत्नि का कोई दोष नही हो ।
         गुरू रैदास ने उन अटकलो को भी खारिज किया, जिसमे उनके राम को दशरथ पुत्र राम कहा गया, उन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके राम वह राम नही है, जो दशरथ का पुत्र है । उनका राम तो उनकी अन्तर आत्मा है ।
         गुरू रैदास के वास्तव मे कोई गुरू नही थे, क्योकि किसी दलित को आज तक, इस भारत मे किसी ने अपना शिष्य नही माना, न ही शिक्षा दी, उन्हे हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिए शिक्षा से दुर रखा, इतिहास गवाह है कि लगभग किसी भी दलित संत का कोई गुरू नही रहा ।
         वाल्मिकी से लेकर डॉ. अम्बेडकर तक किसी भी दलित संत ने गुरू धारण नही किया । शरीरधारी गुरू धारण करने कि परम्परा मात्र ब्राह्मणो मे थी, जिस प्रकार भगवान बुद्ध ने किसी को गुरू नही बनाया, उसी प्रकार दलित संतो ने भी किसी को गुरू नही बनाया ।
         गुरू रैदास की वाणी मे बोद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । उनकी बाणी मे हिन्दू धर्म या उससे सम्बन्धित किसी भी वेदों का उपयोग नही मिलता है । उन्होने स्पष्ट कहा की किसी भी जाति या वर्ण विशेष मे जन्म लेने से कोई छोटा या बड़ा नही हो जाता है और उन्होने मंदिरों, अवतारो, त्रिमूर्ति, सभी को झूठ और धोखा बताया ।
         गुरू रैदास कहते है कि ”बिन देखे उपजे नही आशा, जो देखू सो होय विनाशा ” अर्थात जो दिखाई नही देता उसके प्रति भावना पैदा नही होती तथा जो दिखाई देता है वह नश्वर है, उसका अन्त होना निश्चित है, गुरू रैदास का यह श्लोक उन्हे भगवान बुद्ध के नजदीक ला देता है ।
         भगवान बुद्ध ने भी सृष्टिकर्ता ईश्वर के अस्तित्व से इंकार किया । गुरू रैदास के समकालीन तथा सहमित्र रहे गुरू कबीर कुछ ज्यादा ही मुखर शब्दों मे बोले कि ” अगर ईष्ट देव का नाम जपने से ही कुल फल मिलता हो तो रोटी-रोटी करने से पेट भर जाना चाहिये ।” उन्होने कहा कि केवल शुभ काम करने से ही भला होगा ।
         गुरू कबीर ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनोती देते हुए कुछ ज्यादा ही स्पष्ट कहा कि ‘‘जो तू बामण बामणी जाया, तो आण बाट क्यों नही आया’’ अर्थात् तू अगर बामणी के पैदा होने के कारण ही ब्राह्मण होने का दावा करता है तो तुझे आम आदमी की तरह माँ के गर्भ से पैदा नही होना चाहिये या बल्कि किसी अन्य रास्ते से पैदा होना चाहिये था ।
         गुरू रैदास और गुरू कबीर ने साथ मिलकर ब्राह्मणवादी सता के विरूद्ध आंदोलन चलाया और उनकी प्रखर आलोचना की, और दलित लोगों मे चेतना जागृत करने का कार्य किया ।
         गुरूनानक भी गुरू रैदास के समकालीन थे, वे गुरू रैदास से मिले भी थे तथा उनकी वाणी को साथ लेकर भी गये, वे गुरू रैदास से इतने अधिक प्रभावित थे, कि वे उनकी वाणी को स्‍वयं गाते भी थे । दशम् गुरू गोबिन्द सिंह ने अपने कार्यकाल मे समस्त भारत के सन्तों की वाणी को ‘‘गुरू ग्रन्थ साहिबा’’ मे संकलन किया । जिसमे गुरू रैदास के 41 पद को शामिल किया गया ।
        यह आम मान्यता है कि गुरू रैदास 100 वर्षो से भी ज्यादा जीए । अतः प्रश्न यह उठता है कि उन्होने सम्पूर्ण जीवनकाल में क्या मात्र 41 पद ही रच पायें । यह बात पूर्णत अविश्वसनीय लगता है कि, ऐसा माना जाता है कि गुरू नानक जब गुरू रैदास से मिले तब वे 41 पद को उनकी हत्या से पूर्व ही अपने साथ ले गये जिसका संकलन लगभग 150 वर्षो बाद ‘‘ गुरू ग्रन्थ साहिबा ’’ मे किया गया ।
         प्रश्‍न यह उठता है कि शेष बाणियाँ कहा गई । माननीय चन्द्रिका प्रसाद का मानना है की गुरू रैदास की हत्या करके उनकी चिता मे उनकी समस्त बाणीया उनके शरीर के साथ आग की भेंट चढा दी गई । अगर उनकी हत्या नही की गई होती तो उनकी बाणीया अवश्य मिलती ।
        प्रश्‍न यह भी है की यह नीच काम किसने किया, सीधा सा उत्तर है ऐसा काम उन्ही लोगों ने किया जिन्होंने उनके शरीर से ’’जनेऊ‘‘ निकाले थे । यह ब्राह्मणो व सामंतो ने बड़ी चतुराई से मिलकर एक षडयन्त्र के तहत जनेऊ दिखाने के बहाने उनके शरीर को राणा विक्रम सिंह चितोड़गढ़ के भरे दरबार मे गुरू रैदास का सीना चीर कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी और उनके पार्थिव शरीर को मेघवालों कि बस्ती मे भिजवा दिया गया, और यह कहलवा कर कि तुम्हारे गुरू ने भीतर का जनेऊ दिखाकर सभी को चकित कर दिया और स्वेच्छा से शरीर छोड़ दिया है । उनकी हत्या की खबर सुनते ही उनकी धर्मपत्नी लोना जी सदमे को बर्दाश्त न कर सकी और यह समाचार सुनते ही उनका देहान्त हो गया ।
        गुरू रैदास की हत्या के बारे मे लेखक सतनाम सिंह ने अपनी पुस्तक मे प्रमाणिक दस्तावेजो के साथ उल्लेख करते हुए कुछ महत्वपूर्ण कारण बताये है जिसमे गुरू रैदास द्वारा ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनोती देना, मीरा को दीक्षा देना, वेदो का खण्डन करना, दलितो मे राजनैतिक चेतना जाग्रत करना, राजमहल मे ब्राह्मणो के वर्चस्व को चुनोती देना आदि प्रमुख कारण रहे थे । साथ ही लेखक सतनाम सिंह ने गुरू रैदास की हत्या के घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया है ।
         वर्तमान समय मे गुरू रैदास के विचारो को अमली जामा पहनाने का कार्य करने वाले आधुनिक भारत के पितामाह डॉ. अम्बेडकर ने किया, जिसकी झलक आज के इस आधुनिक भारत के संविधान मे साफ दिखाई देता है ।
kushal
लेखक
कुशाल चौहान, एडवोकेट
बिरसा फुले अम्बेडकर एसोसिएशन राजस्थान
पेज की दर्शक संख्या : 2703

गौतम बुद्ध और परमात्मा के होने न होने की पहेली…..ओशो


buddha and GOD conceptबुद्ध यह नहीं कह रहे हैं कि परमात्मा नहीं है, इसे तुम खयाल रखना। बुद्ध इतना ही कह रहे हैं कि तुम जो भी परमात्मा गढ़ोगे, वह नहीं है। तुम जो भी गढ़ सकते हो, वह नहीं है। तुम्हारा गढ़ा हुआ परमात्मा नहीं है। तुम अपनी सब मूर्तियां खंडित कर डालो।

बुद्ध से बड़ा मूर्तिभंजक कोई भी नहीं हुआ।
बुद्ध परमात्मा—विरोधी नहीं हैं, परमात्मा के पक्ष में हैं इसीलिए विरोध है।
वे चाहते यह हैं कि तुम्हारी सब कल्पनाएं हट जाएं। तुम इतने नितांत अकेले छूट जाओ कि कुछ उपाय भागने का न रहे, कहीं और जाने का न रहे; कोई रास्ता न रह जाए अपने से दूर जाने का, तो तुम अपनी ही गहनता में, अपने ही स्वभाव में पाओगे उसे जिसे तुम अभी परमात्मा कहकर कल्पित करते हो। परमात्मा कल्पना नहीं है, आत्म—अनुभव है।
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यह परमात्मा तुम्हारा, यह कल्पना तुम्हारी, यह सपना तुम्हारा,
अब तुमने बड़ा गहरा धोखा देने की आयोजना की।
तुमने पाप किया तो तुम इसको कहते हो, तुम पतितपावन हो।
तुमने अपराध किया, तो तुम महा करुणावान हो।
तुम अंधेरे में भटक रहे हो, तो परमात्मा प्रकाश है।

तुम जो हो, ठीक तुम उससे विपरीत परमात्मा बनाते हो।
तुम जो चाहते हो, वह तुम परमात्मा में आरोपित कर लेते हो।
यह परमात्मा तुम्हारी कल्पना का विस्तार, प्रक्षेपण है।

बुद्ध कहते हैं, संसार में भी तुम दूसरे को पकड़े रहे, अब फिर तुमने दूसरे को पकड़ लिया। तुम स्व कब होओगे? तुम स्वयं कब बनोगे?

अप्प दीपो भव!
तुम अपने दीए खुद कब बनोगे?
तुम कब कहोगे कि दूसरा नहीं है, मैं ही हूं; और मुझे जो भी करना है इस मैं से ही करना है—नर्क बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है, स्वर्ग बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है। दुख पाना है तो भी मुझे ही नियंता होना पड़ेगा, आनंद पाना है तो भी मुझे ही यात्रा करनी होगी। मेरे अतिरिक्त कोई भी नहीं है।

इसलिए तो बुद्ध का धर्म भारत में बहुत दिन टिक न सका। क्योंकि यह सत्य पर इतना जोर देते हैं और हम कल्पनाशील लोग सत्य पर इतने जोर के लिए राजी नहीं। यह सत्य तो हमें खतरनाक मालूम होता है। हम बिना स्वप्न के जी ही नहीं सकते।

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‘परमात्मा’ शब्द ऐसे ही मार डाला गया। उसे इतना दुहराया लोगों ने कि अब उसमें कोई सार नहीं रहा। आज उसे कहने से कुछ भी प्रतिध्वनित नहीं होता। हृदय की वीणा का कोई तार नहीं छिड़ता। कोई कितना ही ‘परमात्मा, परमात्मा’ कहता रहे, तुम्हारे भीतर न तो हवा का कोई झोंका आता है, जो तुम्हें ताजगी से भर दे; न कोई अज्ञात की सुगंध उतरती है कि तुम पुलकित हो जाओ; न तुम्हारे पैरों में घूंघर बंध जाते हैं शब्द को सुनकर कि तुम नाचने लगो।

‘परमात्मा’ इतना बासा शब्द हो गया कि उससे कुछ भी नहीं होता। उससे तो साधारण शब्द भी ज्यादा सार्थक है। कोई कहे ‘नींबू’, तो कम से कम मुंह में थोड़ा पानी तो आता! कोई कह दे ‘आग’ तो कम से कम तुम भागते तो हो। घबड़ा तो जाते हो। लेकिन परमात्मा के साथ वैसी हालत हो गई, जैसी पुरानी बच्चों की कहानी (‘भेड़िया-भेड़िया।’) में है।

यह जो हम शब्दों का उपयोग करते हैं बिना जाने, बिना अनुभव किये, उनको सुन-सुनकर हम इतने आदी हो जायेंगे, कि उनसे हमारे भीतर कोई तरंग न उठेगी। उठ भी नहीं सकती। हर व्यक्ति को अपना परमात्मा खोजना पड़ता है, अपना शब्द खोजना पड़ता है, नये को खोजना पड़ता है जिससे हृदय नाच उठे। इसलिए दुनिया में इतने धर्मों का जन्म हुआ। अगर तुम इस बात को समझ सको, तो दुनिया में इतने धर्मों के जन्म का माौलिक कारण समझ में आ जायेगा।

 

आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र इस खोज पर धीरे-धीरे आता जा रहा है, कि एक ही बीमारी हो, तो भी एक दवा काम नहीं करती। क्योंकि बीमार अलग-अलग, उनका इतिहास अलग-अलग। इसलिए बहुत बार यह होता है, कि तुम बीमार हो, वही बीमारी है, सब सिंपटम वही हैं, निदान वही है, तुम्हें भी पेनिसिलिन दी जाती है; दूसरे आदमी के भी प्रतीक, सिंपटम वही हैं, रोग वही है, तुम बिलकुल रोग की दृष्टि से एक जैसे हो। यंत्रों की जांच, एक्सरे, खून की परीक्षा, सब बराबर एक जैसी हैं। जैसे तुम एक ही मरीज हो, दो नहीं। फिर भी एक को पेनिसिलिन ठीक करती है, दूसरे को मुश्किल में डाल देती है।

पहले चिकित्सा-शास्त्र बहुत हैरानी में था कि यह मामला क्या है? धीरे-धीरे समझ में आना शुरू हुआ कि दोनों का इतिहास अलग है। बीमारी एक है, लेकिन बीमारी की आत्मकथा अलग। दोनों अलग घरों में जन्मे, अलग तरह से बड़े हुए, अलग तरह के भोजन किए, अलग तरह का वातावरण रहा, अलग तरह का वंश, खून, हड्डी, मांस, सब अलग। बीमारी एक कैसे हो सकती है?

इसलिए पुराना सूत्र था चिकित्सा का–बीमारी का इलाज। अब वे कहते हैं–बीमार का इलाज। डोंट ट्रीट द डिजीज, ट्रीट द पेशंट। बड़ा कठिन है! क्योंकि तब तो हर मरीज को अलग से अध्ययन करना पड़ेगा। बीमारी काफी नहीं है, बीमारी के पीछे छिपे हुए व्यक्ति की खोज करनी पड़ेगी। और हर मरीज को विशिष्टता से देखना पड़ेगा।

क्योंकि कोई भी मनुष्य इकाई नहीं है। वह पृथक, निजी व्यक्तित्व है। वह एक स्वतंत्र अस्तित्व है। उसकी बीमारी, उसके प्रश्न, सब अलग हैं।

पंडित बीमारी देखता, प्रश्न देखता; ज्ञानी बीमार को देखता, प्रश्नकर्ता को देखता है। और उत्तर तब अलग होते हैं। इसलिए बड़ी कठिनाई है। ज्ञानियों के वचन को जब तुम इकट्ठा करोगे, तो बहुत असंगति पाओगे। क्योंकि तुम यह तो भूल ही जाओगे कि किसको ये उत्तर दिए गये थे? इसलिए तुम बुद्ध से ज्यादा असंगत आदमी न पा सकोगे। आज कुछ कहते, कल कुछ कहते, परसों कुछ कहते हैं। चालीस साल में अपने आप का इतना खंडन किया है उन्होंने कि बुद्ध के मरते ही अनेक स्कूल पैदा हो गये। अनेक संप्रदाय बन गये बुद्ध के वचनों पर। सभी ने अपने-अपने हिसाब से चुन लिए। और जो-जो बातें असंगत थीं, वे काट दीं। वे बाहर कर दीं।

गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित प्रेरणादायक कहानी :गौतम बुद्ध और अंतर्दृष्टि…OSHO

Buddha7चीजों को, जैसी वे दिखाई पड़ती हैं, उनको वैसी ही मत मान लेना। उनके भीतर बहुत कुछ है | एक आदमी मर जाता है। हमने कहा, आदमी मर गया। जिस आदमी ने इस बात को यही समझ कर छोड़ दिया, उसके पास अंतर्दृष्टि नहीं है| गौतम बुद्ध एक महोत्सव में भाग लेने जाते थे। रास्ते पर उनके रथ में उनका सारथी था और वे थे। और उन्होने एक बूढे आदमी को देखा। वह उन्होंने पहला बूढ़ा देखा।

जब गौतम बुद्ध का जन्म हुआ, तो ज्योतिषियों ने उनके पिता को कहा कि यह व्यक्ति बड़ा होकर या तो चक्रवर्ती सम्राट होगा और या संन्यासी हो जाएगा। उनके पिता ने पूछा कि मैं इसे संन्यासी होने से कैसे रोक सकता हूं ? तो उस ज्योतिषि ने बडी अद्भूत बात कही थी। वह समझने वाली है। उस ज्योतिषि ने कहा, अगर इसे संन्यासी होने से रोकना है, तो इसे ऐसे मौंके मत देना जिसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाए। पिता बहुत हैरान हुए – यह क्या बात हुई ? उनके पिता ने पूछा। ज्योतिषि ने कहा, इसको ऐसे मौंके मत देना कि अंतर्दृष्टि पैदा हो जाए। तो पिता ने कहा, यह तो बडा मुश्किल हुआ, क्या करेंगे ?

उस ज्योतिषी ने कहा कि इसकी बगिया में फूल कुम्हलाने के पहले अलग कर देना। यह कभी कुम्हलाया हुआ फूल न देख सके। क्योंकि यह कुम्हलाया हुआ फूल देखते ही पूछेगा, क्या फूल कुम्हला जाते हैं ? और यह पूछेगा, क्या मनुष्य भी कुम्हला जाते हैं ? और यह पूछेगा, क्या मैं भी कुम्हला जाऊंगा ? और इसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाएगी। इसके आस-पास बूढे लोगों को मत आने देना। अन्यथा यह पूछेगा, ये बूढे हो गए, क्या मैं भी बूढा हो जाऊंगा ? यह कभी मृत्यु को न देखे। पीले पत्ते गिरते हुए न देखे। अन्यथा यह पूछेगा, पीले पत्ते गिर जाते है, क्या मनुष्य भी एक दिन पीला होकर गिर जाएगा ? क्या मैं गिर जाऊंगा ? और तब इसमें अंतर्दृष्टि पैदा हो जाएगी।

पिता ने बडी चेष्टा की और उन्होंने ऐसी व्यवस्था की, कि बुद्ध के युवा होते-होते तक उन्होंने पीला पत्ता नहीं देखा, कुम्हलाया हुआ फूल नहीं देखा, बूढा आदमी नहीं देखा, मरने की कोई खबर नहीं सुनी। फिर लेकिन यह कब तक हो सकता था ? इस दुनिया में किसी आदमी को कैसे रोका जा सकता है कि मृत्यु को न देखे ? कैसे रोका जा सकता है कि पीले पत्ते न देखे ? कैसे रोका जा सकता है कि कुम्हलाये हुए फूल न देखे ?

लेकिन मैं आपसे कहता हूं, आपने कभी मरता हुआ आदमी नहीं देखा होगा, और कभी आपने पीला पत्ता नहीं देखा, अभी आपने कुम्हलाया फूल नहीं देखा। बुद्ध को उनके बाप ने रोका बहुत मुश्किल से, तब भी एक दिन उन्होंने देख लिया। आपको कोई नहीं रोके हुए है और आप नहीं देख पा रहे है। अंतर्दृष्टि नहीं है, नहीं तो आप संन्यासी हो जाते। यानी सवाल यह हैं, क्योंकि उस ज्योतिषि ने कहा था कि अगर अंतर्दृष्टि पैदा हुई तो यह संन्यासी हो जाएगा। तो जितने लोग संन्यासी नहीं है, मानना चाहिए, उन्हें अंतर्दृष्टि नहीं होगी।

खैर, एक दिन बुद्ध को दिखाई पड़ गया। वे यात्रा पर गए एक महोत्सव में भाग लेने और एक बूढा आदमी दिखाई पडा और उन्होंने तत्क्षण अपने साथी को पूछा, इस मनुष्य को क्या हो गया ?

उस साथी ने कहा , यह वृद्ध हो गया।
बुद्ध ने पूछा , क्या हर मनुष्य वृद्ध हो जाता है ?
उस साथी ने कहा, हर मनुष्य वृद्ध हो जाता है।
बुद्ध ने पूछा, क्या मेैं भी ?

उस साथी ने कहा, भगवन, कैसे कहूं!
लेकिन कोई भी अपवाद नहीं है। आप भी हो जाएंगे।
बुद्ध ने कहा, रथ वापस लौटा लो, रथ वापस ले लो।
सारथी बोला, क्यों ?
बुद्ध ने कहा, मैं बूढा हो गया।
यह अंतर्दृष्टि है। बुद्ध ने कहा, मैं बूढा हो गया।
अदभुत बात कही। बहुत अदभुत बात कही।

और वे लौट भी नहीं पाए कि उन्होंने एक मृतक को देखा
और बुद्ध ने पूछा, यह क्या हुआ ?
उस सारथी ने कहा, यह बुढापे के बाद दूसरा चरण है, यह आदमी मर गया।
बुद्ध ने पूछा, क्या हर आदमी मर जाता है ?
सारथी ने कहा, हर आदमी।
और बुद्ध ने पूछा, क्या मैं भी ?
और सारथी ने कहा, आप भी। कोई भी अपवाद नहीं है।
बुद्ध ने कहा, अब लोैटाओ या न लौटाओ, सब बराबर है।
साथी ने कहा, क्यों ?
बुद्ध ने कहा, मैं मर गया।

यह अंतर्दृष्टि है। चीजों को उनके ओर-छोर तक देख लेना। चीजें जैसी दिखाई पडें, उनको वैसा स्वीकार न कर लेना, उनके अंतिम चरण तक। जिसको अंतर्दृष्टि पैदा होगी, वह इस भवन की जगह खंडहर भी देखेगा। जिसे अंतर्दृष्टि होगी, वह यहां इतने जिंदा लोगों की जगह इतने मुर्दा लोग भी देखेगा-इन्हीं के बीच, इन्हीं के साथ। जिसे अंतर्दृष्टि होगी, वह जन्म के साथ ही मृत्यु को भी देख लेगा, और सुख के साथ दुःख को भी, और मिलन के साथ विछोह को भी।

अंतर्दृष्टि आर-पार देखने की विधि है। और जिस व्यक्ति को सत्य जानना हो, उसे आर-पार देखना सीखना होगा। क्योंकि परमात्मा कहीं और नहीं है, जिसे आर-पार देखना आ जाए उसे यहीं परमात्मा उपलब्ध हो जाता है। वह आर-पार देखने के माध्यम से हुआ दर्शन है।

~ ओशो

गौतम बुद्ध के जीवन पर आधारित प्रेरणादायक कहानी :- सब्र का फल

india land of buddhaबात उस समय की है जब महामानव गौतम  बुद्ध विश्व भर में भ्रमण करते हुए बौद्ध धम्म  का प्रचार कर रहे थे और लोगों को ज्ञान दे रहे थे|

एक बार महामानव गौतम  बुद्ध अपने कुछ शिष्यों के साथ एक गाँव में भ्रमण कर रहे थे| उन दिनों कोई वाहन नहीं हुआ करते थे सो लोग पैदल ही मीलों की यात्रा करते थे| ऐसे ही गाँव में घूमते हुए काफ़ी देर हो गयी थी| बुद्ध जी को काफ़ी प्यास लगी थी| उन्होनें अपने एक शिष्य को गाँव से पानी लाने की आज्ञा दी| जब वह शिष्य गाँव में अंदर गया तो उसने देखा वहाँ एक नदी थी जहाँ बहुत सारे लोग कपड़े धो रहे थे कुछ लोग नहा रहे थे तो नदी का पानी काफ़ी गंदा सा दिख रहा था|

शिष्य को लगा की गुरु जी के लिए ऐसा गंदा पानी ले जाना ठीक नहीं होगा, ये सोचकर वह वापस आ गया| महामानव गौतम  बुद्ध को बहुत प्यास लगी थी इसीलिए उन्होनें फिर से दूसरे शिष्य को पानी लाने भेजा| कुछ देर बाद वह शिष्य लौटा और पानी ले आया| महामानव गौतम  बुद्ध ने शिष्य से पूछा की नदी का पानी तो गंदा था फिर तुम साफ पानी कैसे ले आए| शिष्य बोला की प्रभु वहाँ नदी का पानी वास्तव में गंदा था लेकिन लोगों के जाने के बाद मैने कुछ देर इंतजार किया| और कुछ देर बाद मिट्टी नीचे बैठ गयी और साफ पानी उपर आ गया|

बुद्ध यह सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और बाकी शिष्यों को भी सीख दी कि हमारा ये जो जीवन है यह पानी की तरह है| जब तक हमारे कर्म अच्छे हैं तब तक सब कुछ शुद्ध है, लेकिन जीवन में कई बार दुख और समस्या भी आते हैं जिससे जीवन रूपी पानी गंदा लगने लगता है| कुछ लोग पहले वाले शिष्य की तरह बुराई को देख कर घबरा जाते हैं और मुसीबत देखकर वापस लौट जाते हैं, वह जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाते वहीं दूसरी ओर कुछ लोग जो धैर्यशील होते हैं वो व्याकुल नहीं होते और कुछ समय बाद गंदगी रूपी समस्याएँ और दुख खुद ही ख़त्म हो जाते हैं|

तो मित्रों, इस कहानी की सीख यही है कि समस्या और बुराई केवल कुछ समय के लिए जीवन रूपी पानी को गंदा कर सकती है| लेकिन अगर आप धैर्य से काम लेंगे तो बुराई खुद ही कुछ समय बाद आपका साथ छोड़ देगी|

सभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की बधाई। लेकिन इस मौके पर मेरा एक सवाल है. 26 जनवरी को डा. अम्बेडकर को सम्मान क्यों नहीं?अगर किसी ब्राह्मणवादी ने संविधान लिखा होता क्या तब भी यही अनदेखी होती???…अशोक दास

ambedkar and rajendra samvidhanसभी मित्रों को गणतंत्र दिवस की बधाई। लेकिन इस मौके पर मेरा एक सवाल है. 26 जनवरी को डा. अम्बेडकर को सम्मान क्यों नहीं?…अशोक दास
तकरीबन ढाई दशक पहले आरपीआई के एक नेता ने संसद में यह प्रश्न उठाया था कि जिस तरह 15 अगस्त से पहले लाल किले पर झंडोत्तोलन के लिए जाते वक्त प्रधानमंत्री राजघाट पर महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि देते हैं, उसी तरह गणतंत्र दिवस 26 जनवरी के दिन राष्ट्रपति इंडिया गेट पर जाने से पहले संसद भवन स्थित संविधान निर्माता डा. भीमराव अम्बेडकर को याद क्यों नहीं करती?  सवाल सीधा और सपाट था सो सरकार ने भी इसका सीधा सा जवाब दे दिया. सरकार का कहना था कि इस मौके पर किसी भी राष्ट्रीय नेता को श्रद्धांजलि नहीं दी जाती, इसलिए डा. अम्बेडकर को भी सम्मानित नहीं किया जाता है.
जवाब आने के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया. इस बीच रतनलाल केन नाम के एक व्यक्ति इसके लिए लड़ते रहे, हर साल राष्ट्रपति को चिठ्ठी लिखते रहे. आरटीआई ने अब इन्हें नया हथियार दे दिया था और उनकी लड़ाई भी धारदार हो गई. लेकिन जब जवाब सरकार से मांगना हो और वह ना देना चाहे तो कोई सूचना का अधिकार भी कुछ नहीं कर सकता. खासतौर पर भारत जैसे देश में. सवाल है कि प्रधानमंत्री द्वारा गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने के पहले जब इंडिया गेट अमर जवान ज्योति पर सैनिकों को श्रद्धांजलि दी जा सकती है तो अपने कर्मवीरों और राष्ट्रनेताओं को जिन्होंने देश को संविधान दिया उनको क्यों भूल जाते हैं?
हालांकि आरटीआई के माध्यम से केन ने कई नई चीजें निकाली हैं, जो चौंकाने वाली है. रतनलाल के अपने तर्क हैं. अपनी मुहिम को जारी रखते हुए केन ने 13 दिसंबर 2011 को महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिख कर उनसे इस मामले में एनओसी की मांग की है. केन का कहना है कि हमें एनओसी दिया जाए कि सरकार हमारे इस मामले को सुलझाने में असफल रही है, ताकि हम इसे यूएनओ में उठा सके. हालांकि 13 दिसंबर के इस पत्र के इंतजार में वह अब तक हैं. जाहिर है उन्हें इसका जवाब नहीं मिला है. संविधान निर्माता बाबा साहेब डा. अम्बेडकर के बारे में सरकार के दृष्टिकोण का एक चौंकाने वाला यह पहलू भी सामने आया है कि सरकार डा. अम्बेडकर को जहां स्वतंत्रता सेनानी नहीं मानती, वहीं उनके संविधान निर्माता होने के सवाल पर चुप्पी साध लेती है. आरटीआई के माध्यम से केन ने गृह मंत्रालय से यह सवाल किया कि क्या डा. अम्बेडकर स्वतंत्रता सेनानी हैं? या फिर क्या वह संविधान निर्माता हैं? तो गृह मंत्रालय के डीओपीटी से जवाब आया कि डा. अम्बेडकर स्वतंत्रता सेनानियों के वर्ग में नहीं आतें, तो वहीं संविधान निर्माता मानने के बारे में उसने चुप्पी साध ली.
गांधी और अम्बेडकर के बीच आजादी के समय से ही उभरे मतभेद यहां भी साफ दिखाई देते हैं. यहीं से एक सवाल यह भी उठता है कि फिर महात्मा गांधी जी को किस नीति और नियम के तहत राष्ट्रपिता की उपाधि दी गई. गड़बड़झाला की सूचना यहां भी है. केन द्वारा गृह मंत्रालय से महात्मा गांधी के राष्ट्रपिता होने के संबंध में जानकारी मांगने पर 2002 में तात्कालिन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने जवाब दिया कि जैसे दूसरे लोग महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता कहते हैं, वैसे मैं भी कहता हूं लेकिन गृह मंत्रालय के रिकार्ड के मुताबिक आज तक महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता घोषित करने का कोई रिजोल्यूशन पास नहीं हुआ है. ना ही संविधान में ऐसा कोई अलंकरण देने की व्यवस्था है. सरकार किसी को ऐसा अलंकरण नहीं दे सकती. महात्मा गांधी के राष्ट्रपिता न होने के बावजूद सरकार उन्हें विशेष अलंकरण और स्वतंत्रता दिवस के पहले सम्मान देती है जबकि देश को संविधान देने वाले डा. भीमराव अम्बेडकर का नाम संविधान की संक्षिप्त रुपरेखा तक में नहीं है.
 इसके विपरीत्त महात्मा गांधी का वास्ता न तो संविधान निर्माण से था और न संविधान सभा से था, फिर भी उनका नाम और उनके फोटो संविधान के अंदर है. केन की मांग है कि संविधान निर्माता होने के कारण डा. अम्बेडकर को भी वाजिब सम्मान मिले. क्या इस गणतंत्र दिवस के मौके पर अपने संविधान का गुणगान करने वाली सरकार और राजनीतिक दल इस बारे में सोचेंगे?
अशोक दासashokdas-dastak
– लेखक मासिक पत्रिका “दलित दस्तक” और वेबसाइट www.dalitdastak.com के संपादक हैं।

68 वे गणतन्त्र दिवस की बधाई लेकिन हम लोगों को आत्म मंथन की जरूरत है ,भारत का सविधान महज सविधान नही यह बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की विरासत है,सविधान का सबसे ज्यादा फायदा समाज के दबे कुचले, शोषित, पीड़ित, आदिवासी, पिछड़े, महिला को मिला… एड्वोकेट कुशालचन्द्र

ambedkar-samvidhan sadhye68 वे गणतन्त्र दिवस की बधाई लेकिन
मन्थन करे ??
☸आज से ठीक 68 वर्ष पूर्व भारत एक सवैधानिक भारत बना। भारत के हजारो साल के इतिहास में पहली बार है की भारत एक लिखित सविधान द्वारा शासित हो रहा है।
☸भारत का सविधान महज सविधान नही यह बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर की विरासत है।
☸सविधान लागू होते ही देश में हजारो वर्षो से चली आ रही, रूढ़िवादी और ब्राह्मणवादी परम्पराये तुरन्त ही शून्य हो गयी। एक लाइन में अम्बेडकर ने उन्हें समाप्त कर दिया जो हमे हजारो सालो से गुलाम बनाये रखी थी।
☸सविधान का सबसे ज्यादा फायदा समाज के दबे कुचले, शोषित, पीड़ित, आदिवासी, पिछड़े, महिला को मिला ।
☸समाज के सभी वर्ग वो चाहे महिला हो या पुरुष, हिन्दू हो या मुस्लिम, सिख या ईसाई या बोद्ध सभी समान सवैधानिक रूप से मानवीय अधिकार मिले।।
☸हजारो सालो से शोषित वर्ग को बाबा साहब ने शिक्षा, नोकरी, राजनेतिक आरक्षण और सम्पूर्ण मानवीय अधिकार दिए।।
☸भारत की महिलाओ के लिये बाबा साहब एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने महिला अधिकारो के लिये क्रांतिकारी काम किया ।
☸महिला मताधिकार की मांग अंग्रेजो के सामने रखी और जब सविधान लिखने की बारी आयी तो उन्होंने तुंरत वे सारे अधिकार महिलाओ को दे दिए जिससे वह सदियो से वंचित थी। सभी तरह की समानता का अधिकार।
☸महिला अधिकारो का क्रांतिकारी कानून हिन्दू कोड बिल को पास करने में प्रधानमन्त्री जवाहर लाल नेहरू ने आनाकानी की तो उन्होंने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।।
☸अब प्रश्न यह उठता है की इतने सारे अधिकारो का हम फायदा तो उठा रहे है लेकिन बदले में हम क्या अदा कर रहे है।
☸हमारी अहसान फरामोश पीढ़ी के कारण हमे मिले आरक्षण और मानवीय अधिकार,  आजादी के बाद निरन्तर कम हो रहे है और आज भी हम सरकार से नोकरी मागने की लाइन में खड़े है अथार्त् हमारे पास और कोई विकल्प नही है जो हमारे मानसिक दिवालियेपन को दर्शाता है।
☸डॉ अम्बेडकर आंदोलन को आज थर्ड और फ़ोर्थ ग्रेड कर्मचारी चला रहे है और फर्स्ट ग्रैड कर्मचारी सरकार का दामाद बना बेठा है।
☸कुछ पढ़े लिखे कर्मचारी मिशन को आगे ले जाने का प्रयास कर रहे है लेकिन वे सफल तब – तक नही हो सकते है जब तक की वे सरकारी नोकर है। हमें इस सन्दर्भ में डॉ अम्बेडकर को पढ़ना चाहिये की, आखीर डॉ अम्बेडकर स्थायी सरकारी दामाद क्यों नही बने।।
☸अगर यही हाल रहा तो बहुत जल्दी भारत में मनुवादियों का सविधान लागू हो जाएगा। आज भारतीय सविधान पर “सविधान के विरोधियो” मनुवादियों, ब्राह्मणवादियों का कब्जा है। अब केवल उत्तरप्रदेश जीतना बाकी है यही यू पी जीता तो आगे का रास्ता तय करने में ज्यादा समय नही लगेगा।।
☸ध्यान रहे कानून को मिटाना तो आसान है लेकिन उसे बनाना बहुत कठिन कार्य है। अब अम्बेडकर पैदा होने वाले नही है। इसका जीता जागता उदाहरण “पदोन्नति आरक्षण” है आज केवल कागजो में दिखाई दे रहा है जो कल तक हमे मिलता था।।
☸हमारे जागने का समय आ गया है हमे सविधान और अपने अधिकारो की रक्षा वेसे ही करनी होगी जेसी हम अपने बच्चों की परवरिश करते है यदि हम तन – मन – धन से नही जुटे तो बाबा साहब द्वारा दिलाये सारे अधिकार ” पदोन्नति आरक्षण” की तरह कागजी बन जायेगे।।
☸हमें हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिये आजादी की लडाई लड़नी होगी अन्यथा वे गुलाम हो जायेगी। इसके लिये हमे बाबा साहब की विरासत अथार्त् हमारी आजादी का दस्तावेज सविधान को बचाना होगा।
☸आज सविधान पर संकट है जो बहुत ही गम्भीर है। हमे जागने और जगाने की जरूरत है।
☸☸☸☸गणतन्त्र दिवस की बहुत बहुत बधाई।
 kushal
कुशालचन्द्र एड्वोकेट
बिरसा फुले अम्बेडकर एसोसिएशन, राजस्थान।
Social and Political Activist🌀🌀🌀🌀

हम भारतीय हैं , पहले और आखिर में। डॉ बी. आर. अम्बेडकर

भोले बहुजन लोग अपनी आज़ादी की परिभाषा भी ब्राह्मणों से सीखते हैं| वरना सच तो ये है की १५ अगस्त को अंग्रेजी सरकार से सत्ता है हस्तांतरण ब्राह्मण बहुल  सरकार को हुआ था,तो आज़ादी ब्राह्मणवादियों को मिली थी| पर २६ जनवरी को जब संविधान लागू हुआ और बहुजनों की भी संपत्ति रखने, पढ़ने लिखने कमाने खाने और समानता से न्याय पाने के हक़ मिला तब इन लोगों को सही मायने में आज़ादी मिली , बहुजनो के लिए तो २६ जनवरी आज़ादी का दिन हैambedkar on 26 janhum bharatiye hain ambedkar

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अनुसंधान (research) ;- सम्भवत: शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े ही बुद्ध के गृह त्याग का सच था ।

buddh-yuddh-chod-gayeअनुसंधान (research) ;- सम्भवत: शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े ही बुद्ध के गृह त्याग का सच था ।

आज का विषय ;- बौद्ध धम्म साहित्य में विरोधियों ने जबरदस्त मिलावट की है। उदाहरण तैार पर गौतम बुद्ध ने ‘घर त्याग की घटना’ इसका कारन वह कहानी नहीं है जिसमे बुद्ध ने वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे बल्कि युद्ध को टालने की कोशिश थी |

1 ) ;- माना जाता है कि बुद्ध के गृह त्याग के पीछे वह कहानी है जिसमे बुद्ध ने वृद्ध मनुष्य , रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर विचलित हो चले थे और उसी के फ़लस्वरुप उन्होने गृह त्याग किया ।

2 ) ;- यह कितना तर्क संगत लगता है जब कि उनके पिता माँ और उनके राज्य के मंत्री गण स्वयं वृद्ध हो चले थे क्या वह कभी बीमार नही पडे थे।

3 ) ;-कहानी तर्कसंगत नहीं लगती । हाँलाकि इसे ही प्रचलित कहानियों मे माना गया है । डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन के अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है। फ़िर यह उल्लेख बार – बार क्युं पाया जाता है ।
डा. कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखे थे।

अत्त्द्ण्डा भवं जातं , जनं पस्सच मेषकं।
संवेनं कित्त्यिस्सामि यथा संविजितं मया ॥ १ ॥
फ़न्दमानं पजं दिस्वा मच्छे अप्पोदके यथा ।
अज्जमज्जेहि व्यारुद्धे दिस्वा मं भयमाविसि ॥२॥
समन्तसरो लोको, दिसा सब्बा समेरिता ।
इच्छं भवन्मत्तनो नाद्द्सासिं अनोसितं ।
ओसाने त्वेव व्यारुद्धे दिस्वा अरति अहु ॥३॥

4 ) ;-अर्थ :‘‘शस्त्र धारण मतलब – मुझमें वैराग्य मे भय उत्पन्न हुआ अपर्याप्त पानी में जैसे मछलियां छटपटाती हैं वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा सब दिशाएं काँप रही थी ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।

5 ) ;-महामाया कोलीय वंश की राजकुमारी थीं। मतलब बुद्ध का ननिहाल। घर राज्य त्यागना बुद्ध का (कोलीय वंश ननिहाल) से युद्ध को रोकना।

6 ) ;-संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया।

 

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कुछ कहावतें याद आ गयी

– हाथ पर हाथ धार के बैठे रहने से कुछ नहीं होता, आओ संगर्ष करें
– शांति से वही जी सकते हैं जो युद्ध के लिए तैयार हों
– युद्ध में हार ही किसी भी कौम के दलितीकरण का मुख्य कारन होता है

– अपनी पोल खुद ही उघाड़ना
– कबूतर पर जब बिल्ली हमला करती है तो वो आँखे बंद कर के सोचता है की बिल्ली अब नहीं है

-लातों की देवी बातों से नहीं मानती

 

पैरेलल सिनेमा का दुखिया चमार (सदगति-1981) मतलब दिग्गज महानतम अभिनेता ओम पूरी के निधन पर उनको अंतिम नमस्कार, ओम मणि पद्मे हूँ |RIP बहुजन जाग्रति मिशन में ओम पूरी जी जा योगदान सदा याद किया जाता रहेगा|…समयबुद्धा

om-puri-dukhiya-chamar-of-sadgati-mooviesadgatiपैरेलल सिनेमा का दुखिया चमार (सदगति-1981) मतलब दिग्गज महानतम अभिनेता ओम पूरी के निधन पर उनको अंतिम नमस्कार, ओम मणि पद्मे हूँ |इस दुखद मौके पर पैरेलल सिनेमा की यादें ताज़ा हो गयीं, आईये जाने कैसे पैरेलल सिनेमा वास्तव में बहुजन सिनेमा था, जो धन की ताकत के आगे टिक न पाया|

एक जमाना था जब एंटी ब्राह्मणवादी सेंटीमेंट भारत में चरम पर था,क्या राजनीती क्या सिनेमा सब जगह बहुजन अपनी पकड़ बना लेना चाहते थे, राजनीती में मंडल कमीशन वो मोड़ था जो कई पिछड़े राजनीतिज्ञों को सामने लाया|सत्तर अस्सी के दसक में अम्बेडकरवाद के चलते पढ़ा लिखा वर्ग खूब जागरूक हो गया था जिन्होंने बहुजन उत्थान में बहुत योगदान दिया, जागरूक होना अब भी जारी है, अब गरीब अनपढ़ और युवा भी अम्बेडकरवाद से तेजी से जुड़ रहे हैं| सिनेमा भी इस जनचेतना से कैसे अछूता रहता, नाना पाटेकर,श्री ओम पूरी, नसीरूदीन शाह, स्मिता पाटिल,सबाना आज़मी, सत्यजीत रे अदि अनेकों लोगों ने इस जनचेतना में ही अपना हुनर निखारा|

 

भारत के  बहुजन (एससी/एसटी/ओबीसी/माइनॉरिटीज) और उनका जीवन की कहानी और उनके दुःख मुख्य सिनेमा से गायब था,मुख्य सिनेमा में तो केवल अमीर और सुन्दर लोगों की कहानियां चाहिए हुई थी| तो एससी/एसटी/ओबीसी/माइनॉरिटीज लोगों की कहानी लेकर आया  बहुजन सिनेमा, जिसे ब्राह्मणवादी मीडिया ने पैरेलल सिनेमा बताया और इस बात का खूब प्रचार किया की ये फिल्मे आर्ट फिल्मे होती हैं इनसे पैसा नहीं कमाया जाता, पर बिमा धन के कोई हेतु नहीं चलता |और परिणाम ये निकल की पैरेलल सिनेमा का पतन हो गया|

यहाँ मैं दो फिल्मों का उल्लेख करना चाहूँगा एक ओम पूरी अभिनीत फिल्म  “सदगति 1981”, दूसरी नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म “दीक्षा 1991” | ये फिल्मे मैंने बचपन में दूरदर्शन पर देखी थी, अब ऐसी फिल्मे कहीं प्रसारित होती मालूम नहीं पड़ती शायद मीडिया में ब्राह्मणवादी वर्चस्व के  बढ़ जाने के कारन होगा|

ओम पूरी जी द्वारा अभिनीत  फिल्म  सदगति 1981 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है की बोलीवुड की फ़िल्म है जिसके निर्देशक सत्यजित राय हैं। ये फिल्म हिंदी के मशहूर लेखक श्री प्रेमचंद की कहानी सदगति पर आधारित है। इस फिल्म में मशहूर आर्टिस्ट ओम पुरी, स्मिता पाटिल और मोहन अगासे ने मुख्य भूमिका निभाई है।इस फिल्म में दिखाया गया है की कैसे मानसिक रूप से गुलाम व्यक्ति ब्राह्मणवाद से अपना शोषण होने देता है और शोषण सहते सहते मर जाता है। मानसिक गुलामी दिनिया की सभी गुलामियों में सबसे बुरी गुलामी है जो की मर जाने से भी बुरी है।ये फिल्म इन्टरनेट पूरी व् सही प्रिंट में उपलब्ध है, आप वहां से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते है, लिंक निम्न प्रकार से है :

नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म “दीक्षा 1991”  में बनी हिन्दी भाषा  की बोलीवुड  फ़िल्म है जिसके निर्देशक अरुण कॉल हैं। ये फिल्म कन्नड़ भाषा के लेखक श्री यु0 आर0 अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित है।इस फिल्म को 1992 का बेहतरीन फिल्म का रास्ट्रीय पुरुस्कार एव 1992 का फिल्मफेर बेस्ट क्रिटिक अवार्ड मिला है ,इतना ही नहीं ये फिल्म 1993 में अन्तर्रराष्ट्रिय फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म के  निर्माता हैं National Film Development Corporation of इंडिया.इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं नाना पाटेकर ,मनोहर सिंह विजय कश्यप, राजश्री सावंत अदि हैं । इस फिल्म में बहुजन गुलाम युवक कोगा (नाना पाटेकर) ब्राह्मणवादी ज्ञान से प्रभावित होकर उसे सीखना चाहता है पर जब वो इसको पास से देखता और अनुभव करता है तो उसे अमानवीयता और धर्मिक अत्याचार,शोषण,बेइज़्ज़ती,गोर जातिवाद ही दिखाई पड़ता है ।ये फिल्म इन्टरनेट पर पूरी व् सही प्रिंट में उपलब्ध है, आप वहां से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते है, लिंक निम्न प्रकार से है :

 

पैरेलल/बहुजन सिनेमा के पतन के कारन:

पहला कारन तो धन की कमी ही होगा|ये जीवन सूत्र होता है की किसी भी कार्य को सफल होने के लिए दो चीज़ें चाहिए होतीं है एक विचारधारा दूसरा धन, यहाँ विचारधारा की कमी नहीं थी पर जब धन ही नहीं होगा तो फिर कुछ नहीं हो पाता|पैरेलल सिनेमा के दिग्गजों ने कमरशल सिनेमा के ऑफर स्वीकारे और धीरे धीरे बहुजन सिनेमा गर्त में चला गया|

इसका दूसरा मुख्य कारन जो मैं समझता हूँ की जनता “दुःख” नहीं देखना चाहती,सवर्ण तो चाहेंगे ही क्यों बहुजन भी अपने जीवन से ही दुखी हैं वो और दुःख क्या देखेंगे|बहुजन जनता के दुखी जीवन का चित्रण जब बहुजन ही नकारेंगे तो फिर कौन उसे पोसेगा| इसीलिए फिर अशील/दोअर्थी  संगीत  डांस,लहंगा घुमाना, दारूबाजी, मंदिरबाजी,धन वैभव,राजनीती दबंगई, अदि परोसा जाने लगा और यही चल रहा है|बहुजन अपनी दुर्दशा के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं|

 

तीसरा कारन इस सिनेमा में गंभीर सामग्री, यथार्थवाद और प्रकृतिवाद, समय की सामाजिक राजनैतिक जलवायु पर आधारित तथ्यों और पटकथा पर गहरी नजर और समझ चाहिए थी, जबकि  आम गरीब जनता या बहुजनों को मुश्किल तत्यों को समझने में नहीं मनोरंजन में रुचि होती है| ये बिलकुल बौद्ध धम्म की ही तरह है, जो जनता को वही बताता है जो जनता के हित में हो पर उसमे कोई मनोरंजन नहीं इसलिए जनता उसे अस्वीकारती रहती है| स्कूटी शिक्षा की बजाये मौजमस्ती, दावती की जगह चाट-चट्टो हमेशा ही चुने जाते है,चाहे इनसे नुक्सान ही क्यों न हो|

 

विकिपीडिया के अनुसार :

“समानांतर/पैरेलल सिनेमा एक भारतीय सिनेमा है, ये लोकप्रिय हिंदी सिनेमा जो कीआज बॉलीवुड के रूप में जाना जाता है  उसके एक विकल्प के रूप में 1950 के दशक में पश्चिम बंगाल राज्य में शुरु हुआ एक फिल्म आंदोलन है।

ये इटली के नेओरेअलिस्म आंदोलन  से प्रेरित था जिसमे इटली में आम गरीब जनता की कहानियों को सिनेमा में उतरा गया, इसको इटली सिनेमा का स्वर्णिम काल कहा जाता है|समानांतर सिनेमा  फ्रेंच न्यू वेव और जापानी नई लहर से पहले शुरू हुआ और 1960 के दशक की भारतीय नई लहर या पैरेलल सिनेमा के लिए एक अग्रदूत साबित हुआ। आंदोलन शुरू में बंगाली सिनेमा के नेतृत्व में और इस तरह के सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक, तपन सिन्हा और दूसरों के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फिल्म निर्माताओं का उत्पादन किया गया था। बाद में यह भारत और बांग्लादेश के अन्य फिल्म उद्योगों में प्रसिद्धि प्राप्त की।इसमें बहुत ही गंभीर सामाजिक पृष्टभूमि को चित्रित किया जाता था|

बहुजन जाग्रति मिशन में ओम पूरी जी जा योगदान सदा याद किया जाता रहेगा| आपकी देह का अंत हुआ  है आपकी आवाज़ और कर्म सदा भारतवासियों को सचेत और जागरूक रखेंगे

अश्रुपूर्ण श्रधांजलि

…समयबुद्धा

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इस विषय में वर्तमान युग के महानतम भारतवासी पत्रकार एव जागृत बौद्ध श्री दिलीप सी मंडल जी का पक्ष इस प्रकार है:

 

 

सावित्री बाई फूले जी के जन्मदिन 3 जनवरी (भारतवासी शिक्षक दिवस) की हार्दिक शुभकामनाएं|देश की पहली महिला शिक्षिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता एक ऐसी महिला जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरूद्ध अपने पति, ज्योतिबा फुले के के साथ मिलकर काम किया। ऐसी देश की पहली महिला शिक्षिका को हमारा शत-२ नमन….जयप्रकाश बौद्ध & प्रमिला बौद्ध

देश की प्रथम शिक्षिका, क्रांतिज्योति माता सावित्रीबाई फुले (January 3, 1831)

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देश की पहली महिला शिक्षिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता एक ऐसी महिला जिन्होंने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरूद्ध अपने पति, राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के के साथ मिलकर काम किया। ऐसी देश की पहली महिला शिक्षिका को हमारा शत-२ नमन…

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सावित्रीबाई फुले देश की पहली महिला अध्यापिका व नारी मुक्ति आंदोलन की पहली नेता थीं, जिन्होंने अपने पति राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के सहयोग से देश में महिला शिक्षा की नींव रखी। सावित्रीबाई फुले एक मूलनिवासी बहुजन परिवार में जन्मी महिला थीं, लेकिन उन्होंने उन्नीसवीं सदी में महिला शिक्षा की शुरुआत के रूप में घोर ब्राह्मणवाद के वर्चस्व को सीधी चुनौती देने का काम किया था। उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह, तथा विधवा-विवाह निषेध जैसी कुरीतियां बुरी तरह से व्याप्त थीं। उक्त सामाजिक बुराईयां किसी प्रदेश विशेष में ही सीमित न होकर संपूर्ण भारत में फैल चुकी थीं। महाराष्ट्र के महान समाज सुधारक, विधवा पुनर्विवाह आंदोलन के तथा स्त्री शिक्षा समानता के अगुआ राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले की धर्मपत्नी सावित्रीबाई ने अपने पति के सामजिक कार्यों में न केवल हाथ बंटाया बल्कि अनेक बार उनका मार्ग-दर्शन भी किया। लेकिन भारत के इतिहास फुले दंपति के कामों का सही लेखा-जोखा नहीं किया गया।

👉🏿भारत के पुरूष प्रधान समाज ने शुरु से ही इस तथ्य को स्वीकार नहीं किया कि नारी भी मानव है और पुरुष के समान उसमें भी बुद्धि है एवं उसका भी अपना कोई स्वतंत्र व्यक्तित्व है । उन्नीसवीं सदी में भी नारी गुलाम रहकर सामाजिक व्यवस्था की चक्की में ही पिसती रही। अज्ञानता के अंधकार, कर्मकांड, वर्णभेद, जात-पात, बाल-विवाह, मुंडन तथा सतीप्रथा आदि कुप्रथाओं से सम्पूर्ण नारी जाति ही व्यथित थी। ब्राह्मण व धर्मगुरू यही कहते थे, कि नारी पिता, भाई, पति व बेटे के सहारे बिना जी नहीं सकती। मनु स्मृति ने तो मानो नारी जाति के आस्तित्व को ही नष्ट कर दिया था। मनु ने देववाणी के रूप में नारी को पुरूष की कामवासना पूर्ति का एक साधन मात्र बताकर पूरी नारी जाति के सम्मान का हनन करने का ही काम किया। हिंदू-धर्म में नारी की जितनी अवहेलना हुई उतनी कहीं नहीं हुई। हिंदू शास्त्रों के अनुसार नारी और शुद्र को विद्या का अधिकार नहीं था और कहा जाता था कि अगर नारी को शिक्षा मिल जायेगी तो वह कुमार्ग पर चलेगी, जिससे घर का सुख-चैन नष्ट हो जायेगा। ब्राह्मण समाज व तथाकथित अन्य उच्चकुलीन समाज में सतीप्रथा से जुड़े ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें अपनी जान बचाने के लिये सती की जाने वाली स्त्री अगर आग के बाहर कूदी तो निर्दयता से उसे उठा कर वापिस अग्नि के हवाले कर दिया जाता था। अंततः अंग्रेज़ों द्वारा सतीप्रथा पर रोक लगाई गई। इसी तरह से ब्राह्मण समाज में बाल-विधवाओं के सिर मुंडवा दिये जाते थे और अपने ही रिश्तेदारों की वासना की शिकार स्त्री के गर्भवती होने पर उसे आत्महत्या तक करने के लिये मजबूर किया जाता था। उसी समय राष्ट्रपिता फुले एवं माता सावित्रीबाई फुले ने समाज की रूढ़ीवादी परम्पराओं से लोहा लेते हुये कन्या विद्यालय खोले।

👉🏿इन्ही विषम परिस्थितियों मे सावित्रीबाई का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में नायगांव नामक छोटे से गॉव में हुआ। इनके पिता का नाम खंडोजी नवसे पाटिल और माँ का नाम लक्ष्मी था। १८४० में ९ वर्ष की अवस्था में उनका विवाह पूना के ज्योतिबा फुले के साथ हुआ। इसके बाद सावित्री बाई का जीवन परिवर्तन आरंभ हो गया। वह समय शूद्र, अति शूद्र और स्त्रियों के लिए नैराश्य और अंधकार का समय था। समाज में अनेक कुरीतियाँ फैली हुई थीं और नारी शिक्षा का प्रचलन नहीं था। विवाह के समय तक सावित्री बाई फुले की स्कूली शिक्षा नहीं हुई थी और ज्योतिबा फुले तीसरी कक्षा तक पढ़े थे। लेकिन उनके मन में सामाजिक परिवर्तन की तीव्र इच्छा थी। इसलिये इस दिशा में समाज सेवा का जो पहला काम उन्होंने प्रारंभ किया, वह था अपनी पत्नी सावित्रीबाई को शिक्षित करना। सावित्रीबाई की भी बचपन से शिक्षा में रुचि थी और उनकी ग्राह्य शक्ति तेज़ थी। भारत में नारी शिक्षा के लिये किये गये पहले प्रयास के रूप में राष्ट्रपिता फुले ने अपने खेत में आम के वृक्ष के नीचे विद्यालय शुरु किया। यही स्त्री शिक्षा की सबसे पहली प्रयोगशाला भी थी, जिसमें सगुणाबाई क्षीरसागर व सावित्री बाई विद्यार्थी थीं। उन्होंने खेत की मिटटी में टहनियों की कलम बनाकर शिक्षा लेना प्रारंभ किया। सावित्रीबाई ने देश की पहली भारतीय स्त्री-अध्यापिका बनने का ऐतिहासिक गौरव हासिल किया।

👉🏿सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने १ जनवरी सन १८४८ को पूना के बुधवारा पेठ में पहला बालिका विद्यालय खोला। यह स्कूल एक मराठी सज्जन भिंडे के घर में खोला गया था। सावित्रीबाई फुले इस स्कूल का प्रधानाध्यापिका बनीं। धर्म-पंडितों ने उन्हें अश्लील गालियां दी, धर्म डुबोने वाली कहा तथा कई लांछन लगाये, यहां तक कि उनपर पत्थर एवं गोबर तक फेंका गया। भारत में ज्योतिबा तथा सावि़त्री बाई ने शुद्र, अति शुद्र (मूलनिवासी बहुजन) एवं स्त्री शिक्षा का आंरभ करके नये युग की नींव रखी। इसी वर्ष उस्मान शेख के बाड़े में प्रौढ़-शिक्षा के लिए एक दूसरा स्कूल खोला गया। दोनों संस्थाएँ अच्छी चल निकलीं। दबी-पिछड़ी जातियों के बच्चे, विशेषरूप से लड़कियाँ बड़ी संख्या में इन पाठशालाओं में आने लगीं। इससे उत्साहित होकर देख ज्योतिबा दम्पति ने अगले ४ वर्षों में ऐसे ही १८ स्कूल विभिन्न स्थानों में खोले।

👉🏿सावित्री-ज्योतिबा दम्पति ने अब अपना ध्यान बाल-विधवा और बाल-हत्या पर केन्द्रित किया. उन्होंने विधवा विवाह की परंपरा प्रारंभ की और २९ जून १८५३ में बाल-हत्या प्रतिबंधक-गृह की स्थापना की. इसमें विधवाएँ अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और यदि शिशु को अपने साथ न रख सकें तो उन्हें यहीं छोड़कर भी जा सकती थीं। इस अनाथालय की सम्पूर्ण व्यवस्था सावित्रीबाई फुले सम्भालती थी और बच्चों का पालन पोषण माँ की तरह करती थीं। ज्योतिबा-दम्पति संतानहीन थे। उन्होंने १८७४ में काशीबाई नामक एक विधवा ब्राहमणी के नाजायज बच्चे को गोद लिया। यशवंतराव फुले नाम से यह बच्चा पढ़लिखकर डाक्टर बना और आगे चलकर फुले दम्पति का वारिस भी।
👉🏿उनका ध्यान खेत-खलिहानों में काम करने वाले अशिक्षित मजदूरों की ओर भी गया। १८५५ में ऐसे मजदूरों के लिए फुले दंपत्ति ने रात्रि-पाठशाला खोली. उस समय अस्पृश्य जातियों के लोग सार्वजानिक कुएँ से पानी नहीं भर सकते थे १८६८ में अतः उनके लिये फुले दंपत्ति ने अपने घर का कुआँ खोल दिया। सन १८७६-७७ में पूना नगर आकाल की चपेट में आ गया। उस समय सावित्री बाई और ज्योतिबा दम्पति ने ५२ विभिन्न स्थानों पर अन्न-छात्रावास खोले और गरीब जरूरतमंद लोगों के लिये मुफ्त भोजन की व्यवस्था की।

👉🏿ज्योतिबा ने स्त्री समानता को प्रतिष्ठित करने वाली नई विवाह विधि की रचना की। उन्होंने नये मंगलाष्टक (विवाह के अवसर पर पढ़े जाने वाले मंत्रा) तैयार किए। वे चाहते थे कि विवाह विधि में पुरुष प्रधान संस्कृति के समर्थक और स्त्री की गुलामगिरी सिद्ध करने वाले जितने मंत्र हैं, वे सारे निकाल दिए जाएँ। उनके स्थान पर ऐसे मंत्र हों जिन्हें वर-वधू आसानी से समझ सकें। ज्योतिबा के मंगलाष्टकों में वधू वर से कहती है -‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों को है ही नहीं। इस बात की आज शपथ लो कि स्त्री को उसका अधिकार दोगे और उसे अपनी स्वतंत्रता का अनुभव करने दोगे। ’’ यह आकांक्षा सिर्फ वधू की ही नहीं, गुलामी से मुक्ति चाहने वाली हर स्त्री की थी।

👉🏿कहते हैं – एक और एक मिलकर ग्यारह होते हैं। ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले ने हर स्तर पर कंधे से कंधा मिलाकर काम किया और कुरीतियों, अंध श्रद्धा और पारम्पारिक अनीतिपूर्ण रूढ़ियों को ध्वस्त कर गरीबों – शोषितों के हक में खड़े हुए। १८४० से १८९० तक पचास वर्षो तक ज्योतिबा और सावित्रीबाई ने एक प्राण होकर समाज सुधार के अनेक कामों को पूरा किया।

👉🏿२८ नवंबर १८९० को ज्योतिबा फुले के परिनिर्वाण के बाद सावित्रीबाई ने बड़ी मजबूती के साथ इस आन्दोलन की जिम्मेदारी सम्भाली और सासवड, महाराष्ट्र के सत्य-शोधक समाज के अधिवेशन में ऐसा भाषण दिया जिसने दबे-पिछड़े लोगों में आत्म-सम्मान की भावना भर दी। सावित्रीबाई का दिया गया यह भाषण उनके प्रखर क्रन्तिकारी और विचार-प्रवर्तक होने का परिचय देता है।

👉🏿१८९७ में जब पूना में प्लेग फैला तब वे अपने पुत्र के साथ लोगों की सेवा में जुट गई. सावित्रीबाई की आयु उस समय ६६ वर्ष की हो गई थी फिर भी वे निरंतर श्रम करते हुए तन-मन से लोगों की सेवा में लगी रही। इस कठिन श्रम के समय उन्हें भी प्लेग ने धर दबोचा और १० मार्च १८९७ में उनका परिनिर्वाण हो गया।
आज उस महान विरांगना, भारत की महान एवं प्रथम नारी शिक्षिका  ,परम पूज्यनिया माता सवित्री बाई फूले का जन्म दिन है आइये  हमसब मिल कर संकल्प लें  कि इनके विचारों को जन जन तक पहुँचायेगे और फुले ,अम्बेडकर के सपनो का भारत बनाएंगे ।आप सभी को इस अवसर पर हार्दिक मंगल कामना, सादर 🙏नमो बुद्धाय🙏 जय भीम🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
जयप्रकाश बौद्ध
प्रान्तीय उपाध्यक्षABAKKA
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
प्रमिला बौद्ध
जिला महासचिव
विश्व बौद्ध महासंघ गाजीपुर

 

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