एक ऐसा भी युग गुजर है जब पिटाई से बचने के लिए अछूत(सामाजिक बहिष्कृत) बना दिए गए भारतवादी लोग अपने सरे शरीर पर “राम ” का नाम गुदवा लेते थे| आज भी ऐसे कुछ लोग बचे हैं छत्तीसगढ़ के जमगहन गांव में रहते हैं 76 साल के महेतर राम टंडन…..कुलदीप सरदार


‘गाल पर राम का नाम तो थप्पड़ कैसे मारोगे बाबू?

पीके फिल्म में मार से बचने के लिए आमिर द्वारा देवी देवता का स्टीकर गाल पे लगाने की प्रेरणा शायद यही से मिली हो
अक्सर देखा गया है की जहाँ कहीं भी सीढ़ियों पर लोगों के थूकने की सम्भावना होती है तो उनको रोकने के लिए देवी देवताओं की टाइल लगा देते हैं

Mahettar Ram Tandon, 76, a follower of Ramnami Samaj, who has tattooed the name of the Hindu god Ram on his full body, poses for a picture inside his house in the village of Jamgahan, in the eastern state of Chhattisgarh, India, November 17, 2015. "It was my new birth the day I started having the tattoos," Tandon said. "The old me had died." "The young generation just don't feel good about having tattoos on their whole body," he added. "That doesn't mean they don't follow the faith." REUTERS/Adnan Abidi  PICTURE 9 OF 31 - SEARCH "RAMNAMI" FOR ALL IMAGES TPX IMAGES OF THE DAY      - RTX2205I

Mahettar Ram Tandon, 76, a follower of Ramnami Samaj, who has tattooed the name of the Hindu god Ram on his full body, poses for a picture inside his house in the village of Jamgahan, in the eastern state of Chhattisgarh, India, November 17, 2015. “It was my new birth the day I started having the tattoos,” Tandon said. “The old me had died.” “The young generation just don’t feel good about having tattoos on their whole body,” he added. “That doesn’t mean they don’t follow the faith.” REUTERS/Adnan Abidi PICTURE 9 OF 31 – SEARCH “RAMNAMI” FOR ALL IMAGES TPX IMAGES OF THE DAY – RTX2205I

ramnami-7-600x397

‘राम नाम के हीरा मोती लूट सके तो लूट’

लेकिन पॉलिटिकल फरमे में कोई हल्का व्यंग्यकार कह दे कि ‘राम नाम के वोट हैं काफी, लूट सके तो लूट’, तो गलत नहीं होगा. राजनीति में राम के डेब्यू के बाद से उनकी भक्ति पर बड़े-बड़े दावे किए गए हैं. लेकिन आपको बताते हैं उनके बारे में, जो एक समय सबसे बड़े राम भक्त कहलाते थे और इसमें कहीं कोई राजनीति नहीं थी.

ये है हिंदुस्तान का ‘रामनामी’ समुदाय. इस समुदाय के लोग पूरे शरीर पर, यहां तक कि जीभ और होठों पर भी ‘राम नाम’ गोदवा लेते थे. शरीर पर राम नाम का टैटू (गोदना), रामनामी चादर, मोरपंख की पगड़ी और घुंघरू इनकी पहचान थी. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भक्ति और गुणगान ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद था. भजन गाते और मस्त रहते. यह ऐसी संस्कृति थी, जिसमें राम नाम को कण-कण में बसाने की परपंरा रही. पूर्वी मध्य प्रदेश, झारखंड के कोयला क्षेत्र और छत्तीसगढ़ में फैले रामनामी समुदाय ने एक सदी तक इस अनूठी परंपरा को बचाए रखा. फिर कई वजहों से उनकी संख्या घटती चली गई.

लंबे समय तक ये बदलाव की हवा से अछूते और आदिम रीति-रिवाजों और परंपराओं से जकड़े हुए रहे. लेकिन बाद के दौर में नई पीढ़ी इन परंपराओं से बचने लगी. रायगढ़, रायपुर और बिलासपुर जिले के रामनामियों में दो दशक पहले ही आधुनिकता ने पैठ बनानी शुरू कर दी थी. पक्की सड़कों, डाक और बिजली के खंभों के जरिये वे शहरों से जुड़ गए और फिर उनकी प्राथमकिताएं बदल गईं. पूरे शरीर पर राम नाम गोदने की परंपरा तो अब लगभग खत्म ही हो चुकी है.

अछूत होने की निशानी बन गया गोदना फिर भी इस परंपरा की कहानी आकर्षित करती है. दरअसल इस आस्था की जड़ें ऐतिहासिक छुआछूत और जातीय भेदभाव में हैं. कभी अटूट निष्ठा का प्रतीक रहा इनका गोदना इनके अछूत (दलित) होने की पहचान बन गया था.

अक्टूबर 1992 में ‘इंडिया टुडे’ के एक अंक में इन पर स्टोरी छपी थी. इस स्टोरी में रामनामी समुदाय के गजानंद प्रसाद बंजारा कहते हैं कि राम नाम गोदवाने, रामनामी चादर और पंखों की पगड़ी से उनकी जाति पता चलती है और वे पिछड़ी जातियों से होने वाले बुरे बर्ताव के शिकार बन जाते है. बहुत संभव है कि इस जातीय पहचान से बचने के लिए भी बहुत सारे लोगों ने राम नाम गोदवाना छोड़ दिया हो.

कहा जाता है कि 19वीं सदी के आखिर में हिंदू सुधार आंदोलन के दौरान इन लोगों ने ब्राह्मणों के रीति-रिवाज अपना लिए. इससे ब्राह्मणों का गुस्सा भड़क उठा. उनके गुस्से से त्रस्त रामनामियों ने सचमुच राम नाम की शरण ली. वे उन दीवारों के पीछे जा छिपे, जिन पर राम नाम अंकित था. जब ये दीवारें भी ब्राह्मणों की प्रताड़ना से उन्हें नहीं बचा पाईं तो उन्होंने शरीर पर राम नाम गोदाने को आखिरी हथियार के तौर पर अपनाया कि शायद यह कोई चमत्कार दिखाए.

माना जाता है कि छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा के चारपारा गांव में एक दलित युवक परसराम ने 1890 के आसपास रामनामी संप्रदाय की स्थापना की. इसे भक्ति आंदोलन से जोड़ा जाता है, लेकिन इसे सामाजिक और दलित आंदोलन के रूप में देखने वालों की संख्या भी कम नहीं है.

http://www.thelallantop.com/tehkhana/ramnami-community-who-tattoo-their-whole-body-with-the-name-of-lord-ram/

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s