पैरेलल सिनेमा का दुखिया चमार (सदगति-1981) मतलब दिग्गज महानतम अभिनेता ओम पूरी के निधन पर उनको अंतिम नमस्कार, ओम मणि पद्मे हूँ |RIP बहुजन जाग्रति मिशन में ओम पूरी जी जा योगदान सदा याद किया जाता रहेगा|…समयबुद्धा


om-puri-dukhiya-chamar-of-sadgati-mooviesadgatiपैरेलल सिनेमा का दुखिया चमार (सदगति-1981) मतलब दिग्गज महानतम अभिनेता ओम पूरी के निधन पर उनको अंतिम नमस्कार, ओम मणि पद्मे हूँ |इस दुखद मौके पर पैरेलल सिनेमा की यादें ताज़ा हो गयीं, आईये जाने कैसे पैरेलल सिनेमा वास्तव में बहुजन सिनेमा था, जो धन की ताकत के आगे टिक न पाया|

एक जमाना था जब एंटी ब्राह्मणवादी सेंटीमेंट भारत में चरम पर था,क्या राजनीती क्या सिनेमा सब जगह बहुजन अपनी पकड़ बना लेना चाहते थे, राजनीती में मंडल कमीशन वो मोड़ था जो कई पिछड़े राजनीतिज्ञों को सामने लाया|सत्तर अस्सी के दसक में अम्बेडकरवाद के चलते पढ़ा लिखा वर्ग खूब जागरूक हो गया था जिन्होंने बहुजन उत्थान में बहुत योगदान दिया, जागरूक होना अब भी जारी है, अब गरीब अनपढ़ और युवा भी अम्बेडकरवाद से तेजी से जुड़ रहे हैं| सिनेमा भी इस जनचेतना से कैसे अछूता रहता, नाना पाटेकर,श्री ओम पूरी, नसीरूदीन शाह, स्मिता पाटिल,सबाना आज़मी, सत्यजीत रे अदि अनेकों लोगों ने इस जनचेतना में ही अपना हुनर निखारा|

 

भारत के  बहुजन (एससी/एसटी/ओबीसी/माइनॉरिटीज) और उनका जीवन की कहानी और उनके दुःख मुख्य सिनेमा से गायब था,मुख्य सिनेमा में तो केवल अमीर और सुन्दर लोगों की कहानियां चाहिए हुई थी| तो एससी/एसटी/ओबीसी/माइनॉरिटीज लोगों की कहानी लेकर आया  बहुजन सिनेमा, जिसे ब्राह्मणवादी मीडिया ने पैरेलल सिनेमा बताया और इस बात का खूब प्रचार किया की ये फिल्मे आर्ट फिल्मे होती हैं इनसे पैसा नहीं कमाया जाता, पर बिमा धन के कोई हेतु नहीं चलता |और परिणाम ये निकल की पैरेलल सिनेमा का पतन हो गया|

यहाँ मैं दो फिल्मों का उल्लेख करना चाहूँगा एक ओम पूरी अभिनीत फिल्म  “सदगति 1981”, दूसरी नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म “दीक्षा 1991” | ये फिल्मे मैंने बचपन में दूरदर्शन पर देखी थी, अब ऐसी फिल्मे कहीं प्रसारित होती मालूम नहीं पड़ती शायद मीडिया में ब्राह्मणवादी वर्चस्व के  बढ़ जाने के कारन होगा|

ओम पूरी जी द्वारा अभिनीत  फिल्म  सदगति 1981 में बनी हिन्दी भाषा की फिल्म है की बोलीवुड की फ़िल्म है जिसके निर्देशक सत्यजित राय हैं। ये फिल्म हिंदी के मशहूर लेखक श्री प्रेमचंद की कहानी सदगति पर आधारित है। इस फिल्म में मशहूर आर्टिस्ट ओम पुरी, स्मिता पाटिल और मोहन अगासे ने मुख्य भूमिका निभाई है।इस फिल्म में दिखाया गया है की कैसे मानसिक रूप से गुलाम व्यक्ति ब्राह्मणवाद से अपना शोषण होने देता है और शोषण सहते सहते मर जाता है। मानसिक गुलामी दिनिया की सभी गुलामियों में सबसे बुरी गुलामी है जो की मर जाने से भी बुरी है।ये फिल्म इन्टरनेट पूरी व् सही प्रिंट में उपलब्ध है, आप वहां से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते है, लिंक निम्न प्रकार से है :

नाना पाटेकर अभिनीत फिल्म “दीक्षा 1991”  में बनी हिन्दी भाषा  की बोलीवुड  फ़िल्म है जिसके निर्देशक अरुण कॉल हैं। ये फिल्म कन्नड़ भाषा के लेखक श्री यु0 आर0 अनंतमूर्ति के उपन्यास पर आधारित है।इस फिल्म को 1992 का बेहतरीन फिल्म का रास्ट्रीय पुरुस्कार एव 1992 का फिल्मफेर बेस्ट क्रिटिक अवार्ड मिला है ,इतना ही नहीं ये फिल्म 1993 में अन्तर्रराष्ट्रिय फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित की गई थी। इस फिल्म के  निर्माता हैं National Film Development Corporation of इंडिया.इस फिल्म के मुख्य कलाकार हैं नाना पाटेकर ,मनोहर सिंह विजय कश्यप, राजश्री सावंत अदि हैं । इस फिल्म में बहुजन गुलाम युवक कोगा (नाना पाटेकर) ब्राह्मणवादी ज्ञान से प्रभावित होकर उसे सीखना चाहता है पर जब वो इसको पास से देखता और अनुभव करता है तो उसे अमानवीयता और धर्मिक अत्याचार,शोषण,बेइज़्ज़ती,गोर जातिवाद ही दिखाई पड़ता है ।ये फिल्म इन्टरनेट पर पूरी व् सही प्रिंट में उपलब्ध है, आप वहां से मुफ्त में डाउनलोड कर सकते है, लिंक निम्न प्रकार से है :

 

पैरेलल/बहुजन सिनेमा के पतन के कारन:

पहला कारन तो धन की कमी ही होगा|ये जीवन सूत्र होता है की किसी भी कार्य को सफल होने के लिए दो चीज़ें चाहिए होतीं है एक विचारधारा दूसरा धन, यहाँ विचारधारा की कमी नहीं थी पर जब धन ही नहीं होगा तो फिर कुछ नहीं हो पाता|पैरेलल सिनेमा के दिग्गजों ने कमरशल सिनेमा के ऑफर स्वीकारे और धीरे धीरे बहुजन सिनेमा गर्त में चला गया|

इसका दूसरा मुख्य कारन जो मैं समझता हूँ की जनता “दुःख” नहीं देखना चाहती,सवर्ण तो चाहेंगे ही क्यों बहुजन भी अपने जीवन से ही दुखी हैं वो और दुःख क्या देखेंगे|बहुजन जनता के दुखी जीवन का चित्रण जब बहुजन ही नकारेंगे तो फिर कौन उसे पोसेगा| इसीलिए फिर अशील/दोअर्थी  संगीत  डांस,लहंगा घुमाना, दारूबाजी, मंदिरबाजी,धन वैभव,राजनीती दबंगई, अदि परोसा जाने लगा और यही चल रहा है|बहुजन अपनी दुर्दशा के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं|

 

तीसरा कारन इस सिनेमा में गंभीर सामग्री, यथार्थवाद और प्रकृतिवाद, समय की सामाजिक राजनैतिक जलवायु पर आधारित तथ्यों और पटकथा पर गहरी नजर और समझ चाहिए थी, जबकि  आम गरीब जनता या बहुजनों को मुश्किल तत्यों को समझने में नहीं मनोरंजन में रुचि होती है| ये बिलकुल बौद्ध धम्म की ही तरह है, जो जनता को वही बताता है जो जनता के हित में हो पर उसमे कोई मनोरंजन नहीं इसलिए जनता उसे अस्वीकारती रहती है| स्कूटी शिक्षा की बजाये मौजमस्ती, दावती की जगह चाट-चट्टो हमेशा ही चुने जाते है,चाहे इनसे नुक्सान ही क्यों न हो|

 

विकिपीडिया के अनुसार :

“समानांतर/पैरेलल सिनेमा एक भारतीय सिनेमा है, ये लोकप्रिय हिंदी सिनेमा जो कीआज बॉलीवुड के रूप में जाना जाता है  उसके एक विकल्प के रूप में 1950 के दशक में पश्चिम बंगाल राज्य में शुरु हुआ एक फिल्म आंदोलन है।

ये इटली के नेओरेअलिस्म आंदोलन  से प्रेरित था जिसमे इटली में आम गरीब जनता की कहानियों को सिनेमा में उतरा गया, इसको इटली सिनेमा का स्वर्णिम काल कहा जाता है|समानांतर सिनेमा  फ्रेंच न्यू वेव और जापानी नई लहर से पहले शुरू हुआ और 1960 के दशक की भारतीय नई लहर या पैरेलल सिनेमा के लिए एक अग्रदूत साबित हुआ। आंदोलन शुरू में बंगाली सिनेमा के नेतृत्व में और इस तरह के सत्यजीत रे, मृणाल सेन, ऋत्विक घटक, तपन सिन्हा और दूसरों के रूप में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित फिल्म निर्माताओं का उत्पादन किया गया था। बाद में यह भारत और बांग्लादेश के अन्य फिल्म उद्योगों में प्रसिद्धि प्राप्त की।इसमें बहुत ही गंभीर सामाजिक पृष्टभूमि को चित्रित किया जाता था|

बहुजन जाग्रति मिशन में ओम पूरी जी जा योगदान सदा याद किया जाता रहेगा| आपकी देह का अंत हुआ  है आपकी आवाज़ और कर्म सदा भारतवासियों को सचेत और जागरूक रखेंगे

अश्रुपूर्ण श्रधांजलि

…समयबुद्धा

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इस विषय में वर्तमान युग के महानतम भारतवासी पत्रकार एव जागृत बौद्ध श्री दिलीप सी मंडल जी का पक्ष इस प्रकार है:

 

 

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