गौतम बुद्ध और परमात्मा के होने न होने की पहेली…..ओशो



buddha and GOD conceptबुद्ध यह नहीं कह रहे हैं कि परमात्मा नहीं है, इसे तुम खयाल रखना। बुद्ध इतना ही कह रहे हैं कि तुम जो भी परमात्मा गढ़ोगे, वह नहीं है। तुम जो भी गढ़ सकते हो, वह नहीं है। तुम्हारा गढ़ा हुआ परमात्मा नहीं है। तुम अपनी सब मूर्तियां खंडित कर डालो।

बुद्ध से बड़ा मूर्तिभंजक कोई भी नहीं हुआ।
बुद्ध परमात्मा—विरोधी नहीं हैं, परमात्मा के पक्ष में हैं इसीलिए विरोध है।
वे चाहते यह हैं कि तुम्हारी सब कल्पनाएं हट जाएं। तुम इतने नितांत अकेले छूट जाओ कि कुछ उपाय भागने का न रहे, कहीं और जाने का न रहे; कोई रास्ता न रह जाए अपने से दूर जाने का, तो तुम अपनी ही गहनता में, अपने ही स्वभाव में पाओगे उसे जिसे तुम अभी परमात्मा कहकर कल्पित करते हो। परमात्मा कल्पना नहीं है, आत्म—अनुभव है।
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यह परमात्मा तुम्हारा, यह कल्पना तुम्हारी, यह सपना तुम्हारा,
अब तुमने बड़ा गहरा धोखा देने की आयोजना की।
तुमने पाप किया तो तुम इसको कहते हो, तुम पतितपावन हो।
तुमने अपराध किया, तो तुम महा करुणावान हो।
तुम अंधेरे में भटक रहे हो, तो परमात्मा प्रकाश है।

तुम जो हो, ठीक तुम उससे विपरीत परमात्मा बनाते हो।
तुम जो चाहते हो, वह तुम परमात्मा में आरोपित कर लेते हो।
यह परमात्मा तुम्हारी कल्पना का विस्तार, प्रक्षेपण है।

बुद्ध कहते हैं, संसार में भी तुम दूसरे को पकड़े रहे, अब फिर तुमने दूसरे को पकड़ लिया। तुम स्व कब होओगे? तुम स्वयं कब बनोगे?

अप्प दीपो भव!
तुम अपने दीए खुद कब बनोगे?
तुम कब कहोगे कि दूसरा नहीं है, मैं ही हूं; और मुझे जो भी करना है इस मैं से ही करना है—नर्क बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है, स्वर्ग बनाना है तो भी स्व से ही बनाना है। दुख पाना है तो भी मुझे ही नियंता होना पड़ेगा, आनंद पाना है तो भी मुझे ही यात्रा करनी होगी। मेरे अतिरिक्त कोई भी नहीं है।

इसलिए तो बुद्ध का धर्म भारत में बहुत दिन टिक न सका। क्योंकि यह सत्य पर इतना जोर देते हैं और हम कल्पनाशील लोग सत्य पर इतने जोर के लिए राजी नहीं। यह सत्य तो हमें खतरनाक मालूम होता है। हम बिना स्वप्न के जी ही नहीं सकते।

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‘परमात्मा’ शब्द ऐसे ही मार डाला गया। उसे इतना दुहराया लोगों ने कि अब उसमें कोई सार नहीं रहा। आज उसे कहने से कुछ भी प्रतिध्वनित नहीं होता। हृदय की वीणा का कोई तार नहीं छिड़ता। कोई कितना ही ‘परमात्मा, परमात्मा’ कहता रहे, तुम्हारे भीतर न तो हवा का कोई झोंका आता है, जो तुम्हें ताजगी से भर दे; न कोई अज्ञात की सुगंध उतरती है कि तुम पुलकित हो जाओ; न तुम्हारे पैरों में घूंघर बंध जाते हैं शब्द को सुनकर कि तुम नाचने लगो।

‘परमात्मा’ इतना बासा शब्द हो गया कि उससे कुछ भी नहीं होता। उससे तो साधारण शब्द भी ज्यादा सार्थक है। कोई कहे ‘नींबू’, तो कम से कम मुंह में थोड़ा पानी तो आता! कोई कह दे ‘आग’ तो कम से कम तुम भागते तो हो। घबड़ा तो जाते हो। लेकिन परमात्मा के साथ वैसी हालत हो गई, जैसी पुरानी बच्चों की कहानी (‘भेड़िया-भेड़िया।’) में है।

यह जो हम शब्दों का उपयोग करते हैं बिना जाने, बिना अनुभव किये, उनको सुन-सुनकर हम इतने आदी हो जायेंगे, कि उनसे हमारे भीतर कोई तरंग न उठेगी। उठ भी नहीं सकती। हर व्यक्ति को अपना परमात्मा खोजना पड़ता है, अपना शब्द खोजना पड़ता है, नये को खोजना पड़ता है जिससे हृदय नाच उठे। इसलिए दुनिया में इतने धर्मों का जन्म हुआ। अगर तुम इस बात को समझ सको, तो दुनिया में इतने धर्मों के जन्म का माौलिक कारण समझ में आ जायेगा।

 

आधुनिक चिकित्सा-शास्त्र इस खोज पर धीरे-धीरे आता जा रहा है, कि एक ही बीमारी हो, तो भी एक दवा काम नहीं करती। क्योंकि बीमार अलग-अलग, उनका इतिहास अलग-अलग। इसलिए बहुत बार यह होता है, कि तुम बीमार हो, वही बीमारी है, सब सिंपटम वही हैं, निदान वही है, तुम्हें भी पेनिसिलिन दी जाती है; दूसरे आदमी के भी प्रतीक, सिंपटम वही हैं, रोग वही है, तुम बिलकुल रोग की दृष्टि से एक जैसे हो। यंत्रों की जांच, एक्सरे, खून की परीक्षा, सब बराबर एक जैसी हैं। जैसे तुम एक ही मरीज हो, दो नहीं। फिर भी एक को पेनिसिलिन ठीक करती है, दूसरे को मुश्किल में डाल देती है।

पहले चिकित्सा-शास्त्र बहुत हैरानी में था कि यह मामला क्या है? धीरे-धीरे समझ में आना शुरू हुआ कि दोनों का इतिहास अलग है। बीमारी एक है, लेकिन बीमारी की आत्मकथा अलग। दोनों अलग घरों में जन्मे, अलग तरह से बड़े हुए, अलग तरह के भोजन किए, अलग तरह का वातावरण रहा, अलग तरह का वंश, खून, हड्डी, मांस, सब अलग। बीमारी एक कैसे हो सकती है?

इसलिए पुराना सूत्र था चिकित्सा का–बीमारी का इलाज। अब वे कहते हैं–बीमार का इलाज। डोंट ट्रीट द डिजीज, ट्रीट द पेशंट। बड़ा कठिन है! क्योंकि तब तो हर मरीज को अलग से अध्ययन करना पड़ेगा। बीमारी काफी नहीं है, बीमारी के पीछे छिपे हुए व्यक्ति की खोज करनी पड़ेगी। और हर मरीज को विशिष्टता से देखना पड़ेगा।

क्योंकि कोई भी मनुष्य इकाई नहीं है। वह पृथक, निजी व्यक्तित्व है। वह एक स्वतंत्र अस्तित्व है। उसकी बीमारी, उसके प्रश्न, सब अलग हैं।

पंडित बीमारी देखता, प्रश्न देखता; ज्ञानी बीमार को देखता, प्रश्नकर्ता को देखता है। और उत्तर तब अलग होते हैं। इसलिए बड़ी कठिनाई है। ज्ञानियों के वचन को जब तुम इकट्ठा करोगे, तो बहुत असंगति पाओगे। क्योंकि तुम यह तो भूल ही जाओगे कि किसको ये उत्तर दिए गये थे? इसलिए तुम बुद्ध से ज्यादा असंगत आदमी न पा सकोगे। आज कुछ कहते, कल कुछ कहते, परसों कुछ कहते हैं। चालीस साल में अपने आप का इतना खंडन किया है उन्होंने कि बुद्ध के मरते ही अनेक स्कूल पैदा हो गये। अनेक संप्रदाय बन गये बुद्ध के वचनों पर। सभी ने अपने-अपने हिसाब से चुन लिए। और जो-जो बातें असंगत थीं, वे काट दीं। वे बाहर कर दीं।

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