महाशिवरात्री और बौद्ध संस्कृति का इतिहास…..डॉ परम आनंद

🌹महाशिवरात्री और बौद्ध संस्कृति का इतिहास🌹
🌻माघ अमावस्या निमित्त बुद्ध लेणियों पर ‘महाधम्म महोत्सव’🌻
       ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म ख़त्म करने के लिए उनके साहित्य जलाये, भिक्खुओं का कत्लेआम किया लेकिन बौद्ध लोगों द्वारा निर्माण की गई और परिपालित की जाने वाली पवित्र संस्कृतियों को वे नहीं मिटा सके. इसलिए महात्मा फुले, बाबासाहब आम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरु, कांशीरामजी और सभी महापुरुषों ने देश की संस्कृति जतन पर विशेष जोर दिया है.
       लेकिन धम्म विरोधी ताकतें लेणी और स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों को नहीं मिटा सकी. बौद्ध लोगों के दरवाजों पर अंकित बुद्धप्रतिक ‘स्वस्तिक’ भी नहीं मिटा पाए. उन्होंने मूर्तियों की तोड़फोड़ की, उन्हें विद्रूप किया या फिर सिंदूर फासकर देवी देवता में परिवर्तित किया, लेकिन हर पूर्णिमा को बुद्ध लेणी और स्तूपों पर बुद्धवंदना को जाने वाले बौद्ध लोगों को नहीं रोक सकते थे. तब उन्होंने पूर्णिमाओं का इतिहास बदल दिया. बुद्ध की गुरुपूर्णिमा को उन्होंने व्यास की गुरुपूर्णिमा में तब्दील कर दिया. महाराष्ट्र में पंढरपुर को प्रतिवर्ष बोधिसत्व विट्ठल को वंदना करने जाने वाला आज का हिन्दू वारकरी भूल गया है कि उसके पूर्वजों द्वारा पाली जाने वाले बौद्ध धम्म की पवित्र परंपरा का अनुसरण कर रहा है, जो उसके बौद्ध पूर्वज भगवान् बुद्ध को जगतगुरु मानकर बड़ी ही श्रद्धा से प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को बुद्ध को वंदना अर्पण करने पंढरपुर जाते थे. वारकरियों को ब्राह्मणों ने हिन्दू अर्थात मानसिक गुलाम बनाया है और आजका बौद्ध समाज भी यह इतिहास भूल गया है. गोदावरी नदी के उगम स्थान पर स्थित नासिक शहर का और गंगा नदी के तट स्थित प्रयाग का कुंभ मेला हर पांच और बारह साल के अंतराल में भरनेवाला बौद्ध मेला था. इस तथ्य को राजा हर्षवर्धन के दरबार के कवी बाणाभट्ट ने लिख रखा है. आज भी भारत के कई हिन्दू मंदिरों में मुंडन करने की प्रथा दिखाई देती है. वास्तव में भारत के लगभग सभी प्रसिद्द हिन्दू मंदिर बौद्ध विहार या स्थल हुआ करते थे, (इस तथ्य को स्वामी विवेकानंद ने भी विषद किया है), जहाँ भिक्खुओं की उपसंपदा होती थी और सामान्य जन सामनेर बनने के लिए मुंडन किया करते थे. इन मुंडन किये हुए बौद्धों को ही अन्य लोग मुंडे कहते थे जो महाराष्ट्र में एक विख्यात सरनेम या गोत्रनाम  है.
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       आजका बौद्ध हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझे इस परिस्थिति को ब्राहमणों ने वर्षों की मेहनत से अंजाम दिया है. बौद्ध भूल चूका है कि आजका हिन्दू, मुसलमान, क्रिश्चन, सिख ये सभी विगत काल के बौद्ध है. बौद्ध, मुस्लिम, सिख, हिन्दू इन सभी में सदैव वैर बनाए रखने के लिए ब्राह्मण पूरी तरह से सफल हुआ है और वह इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए वह सदैव प्रयासरत रहता है, क्योंकि अगर लोग आपसी बैर भूल गए तो वे सब एक हो जायेंगे और ब्राह्मणों के वर्चस्व को खतरा पहुँच सकता है. इस बैर को मिटाने का कार्य केवल बुद्ध अनुयायी ही कर सकते है. हिन्दू यदि देवी देवता की पूजा करता है तो इसमें उसका कोई दोष नहीं. बौद्धों को ध्यान में लेना होगा कि हिन्दुओं के मस्तिष्क से देवी देवता, अंधविश्वास, डर, रूढ़ियाँ दूर करने के लिए काफी संयम से प्रयत्न करने होंगे. बुद्धशासन प्रस्थापित करने के लिए वैचारिक परिवर्तन घटित करना होगा, यदि यह सच भी है तो भी, आजकी लड़ाई सांस्कृतिक लड़ाई है, इसे जानना होगा. ब्राह्मणों ने बौद्ध संस्कृति को विकृत कर ब्राह्मणीकरण किया है. उस बौद्ध संस्कृति को पुनः पुनर्स्थापित कर ब्राह्मनिकृत लोगो को जागृत करना होगा. इसका विचार करना होता कि, पंढरपुर, अयोध्या, उज्जैन, केदारनाथ, अम्बरनाथ को जाने वाले लोगों के झुंड को बंद करना ज्यादा संयुक्तिक है या उन्हें इन स्थलों का सच्चा इतिहास समझा देना ज्यादा संयुक्तिक है. निश्चित ही दूसरा विकल्प ही स्थाई और मजबूत होगा.
       उसीप्रकार इस बात का भी विचार करना होगा कि प्रतिवर्ष विजयादशमी को धम्मदिक्षा दिवस पर नागपुर और १ जानेवारी को भिमाकोरेगाव पर बढती जा रही गर्दी का क्या उपयोग है. प्राचीन काल में बौद्ध स्थलों पर वंदन करने जाने वाले भीड़ का ही रूपांतर आज हिन्दू तीर्थ स्थलों में हो गया है. ऐसे एतिहासिक स्थलों को जीवन में एक दो बार भेट देना उचित समझा जा सकता है या दिक्षाभुमी और चैत्यभुमी जैसी जगह पर किसी वर्ष जाकर नई पुस्तके ख़रीदने का उद्देश रखा जा सकता है, लेकिन प्रतिवर्ष वहाँ जाकर भीड़ में वृद्धी कर वार्षिक मेले में रूपांतर करवाना कितना संयुक्तिक है इसका विचार होना आवश्यक है. वहाँ जाकर वंदन करने की जिम्मेदारी समाज के नेताओं पर छोड़ देनी चाहिए (हम सामान्य लोग वहाँ जाते है इसलिए अम्बेडकरी कहलाने वाले नेता गर्दी का फायदा उठाने के उद्देश से भाषण देने का उपक्रम करते है). हम सामान्य लोगों ने अब इस विजयादशमी के दिन अपने ही परिसर में ८ वर्ष पूर्ण हुए बालक बालिकाओं को धम्मदीक्षा देने का कार्यक्रम परिपालित करना चाहिए. क्रिश्चन धर्म में ८ वर्ष के बालक की धम्मदीक्षा का कार्यक्रम कैमूनियन नाम से किया जाता है जो बौद्ध धम्म की देन है क्योकि भगवान् बुद्ध के संघ में राहुल की धम्मदीक्षा ८ वर्ष की उम्र में हुयी थी. धम्मदिक्षा का यह उत्सव बस्ती बस्ती में भव्य स्वरुप में मनाना चाहिए, जिससे सम्राट अशोक और डॉ बाबासाहब की धम्मदिक्षा स्मरण हो. उसीप्रकार १ जनवरी या ३१ दिसंबर की संध्या को अपने ही परिसर में विजयस्तंभ खड़ा करके नए वर्ष का उत्सव मनाये. उसपर भीमाकोरेगाव का इतिहास लिखा जाये. यह इसलिए जरुरी है ताकि अन्य धर्मियों को भी पेशवाओं की गुलामी से ‘भारत मुक्ति संग्राम’ का इतिहास पता चले. इसउपक्रम के बिना अन्य लोगों को भीमा कोरेगाव के ‘भारत मुक्ति संग्राम’ का इतिहास पता नहीं चलेगा.
       खैर, महाशिवरात्रि इस विषय पर आते है.
       हिन्दुओं के कालनिर्णय कैलेंडर का बारीकी से अवलोकन करने पर ध्यान में आया कि उन्होंने हर महीने की अमावस्या को ‘शिवरात्रि’ कहा है. उसीप्रकार हर शुक्ल-चतुर्थी को ‘विनायक चतुर्थी’, हर ‘शुक्ल-अष्टमी’ को ‘दुर्गाअष्टमी’, हर कृष्ण-चतुर्थी को ‘गणेश संकष्ट चतुर्थी’ और हर कृष्ण-अष्टमी को ‘काला-अष्टमी’ कहा है. बौद्ध धम्म के अभ्यासक जानते है कि बौद्ध धम्म में पूर्णिमा और अमावस्या को भिक्खुओं के उपोसथ हुआ करते थे. पूर्णिमा और अमावस्या को चिवर दान करने का नियम ‘विनय पिटक’ के अनुसार होता था. उसीप्रकार चतुर्थी और अष्टमी को भी उपोसथ हुआ करते थे. ये सारी धम्म परंपरायें आज भी बौद्ध धम्म में अस्तित्व में दिखाई देती है. इन दिनों पर उपवास के सिवाय भिक्खु संघ जमा होकर उन्होंने कोई पाप कर्म (विनय पिटक के निषिद्ध कर्म) किये होने का जाहिर रूप से स्विकार करते थे (देखे ‘बुद्ध और उनका धम्म’, पुस्तक ४, भाग-१,उपभाग-८). पूर्णिमा और अमावस्या को किये जाने वाले उपोसथ का विशेष महत्व था. बुद्ध के महापरिनिर्वान पश्चात पूर्णिमा और अमावस्या को भिक्खु और उपासक संघ बड़ी संख्या में बुद्ध लेणी और स्तूपों पर जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करने लगा था. बौद्ध धम्म की यह परंपरा आज भारत में बुद्ध धम्म लुप्त होने की वजह से नहीं दिखाई देती लेकिन भारत के बाहर सभी बौद्ध देशों में यह बड़े पैमाने पर पाई जाती है. यहाँ तक कि बौद्ध देशों में पूर्णिमा के दिन शासकीय अवकाश होता है क्योंकि वहां के लोग प्रत्येक पूर्णिमा को नजदीक के बौद्ध स्तूप या लेणी पर जाकर त्रिरात्नों को पुरे मनोभाव से नतमस्तक होते है.
       इसप्रकार ‘अमावस्या-रात्रि’ यानि हिन्दू कैलेण्डर में लिखित प्रत्येक ‘शिव-रात्रि’ का बौद्ध धम्म में अनन्य साधारण महत्व है. वास्तव में ‘शिव’ यह संस्कृत शब्द है जो पाली के ‘सिव’ इस शब्द से निर्मित है. पाली भाषा में श, त्र, औ, उड़ता हुआ र (अर्थात ‘कर्म’ इस शब्द में का र), ण, ष, क्ष, ये अक्षर नहीं थे. पाली भाषा में से संस्कृत भाषा निर्माण करते समय पाणिनि ने ई पू २०० में इन अक्षरों की निर्मिती की. तब ‘सिव’ का ‘शिव’, ‘धम्म’ का धर्म’, ‘कम्म’ का ‘कर्म’, ‘भिक्खु’ का ‘भिक्षु’, ‘निब्बान’ का ‘निर्वाण’, इस तरह से शब्दों की निर्मिती हुयी. यही प्रक्रिया कालांतर में संस्कृत से मराठी और हिंदी भाषा के शब्दों के निर्माण में निभाई गई. पाली डिक्शनरी नुसार ‘सिव’ का अर्थ ‘मंगल या कल्याण’ होता है. बौद्ध धर्म में प्रत्येक अमावस्या को उपोसथ होने के कारण और विशेषतः शायद पूर्ण अंधकार होने की वजह से उस रात्रि को ‘मंगलरात्रि’ अर्थात ‘सिवरात्रि’ कहा गया. इसतरह ‘सिवरात्रि’ अर्थात ‘शिवरात्रि’ की रचना यह बौद्ध संस्कृति की ही देन है.
       ‘महाशिवरात्रि’ यह माघ महीने में होती है. माघ महीने की अमावस्या को ‘महाशिवरात्रि’ कहा गया है. इसका कारण यह है कि माघ महीने की पूर्णिमा को भगवान् बुद्ध ने वैशाली में एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी. वह घोषणा थी ३ माहपश्चात् बुद्ध का महापरिनिर्वान होना. इस घोषणा की वजह से भिक्खु और उपासक संघ दोनों ही बुरी तरह से व्यथित हो गए थे. और फिर १५ दिन के पश्चात् की अमावस्या को बड़ी संख्या में भिक्खु और उपासक संघ इकट्ठा  हुआ होगा. इस महासभा का विषय शोक के साथ ही, यह भी अवश्य ही होगा कि बुद्ध के पश्चात हमारा क्या होगा और संघ का किया जाये. इसलिए १५ दिन के बाद आने वाली इस अमावस्या का नाम ‘महाशिवरात्रि’ पड़ा ऐसा पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है. अन्यथा ब्राह्मणी ग्रंथों में प्रत्येक अमावस्या को ‘सिवरात्रि’ कहने का कोई संयुक्तिक कारण उपलब्ध नहीं है.
       भारत के १२ ज्योतिर्लिंग, यह बुद्ध स्तूपों के स्थल है. इसके सबूत कई संशोधकोने अपने शोधकार्यों में जाहिर किये है. बुद्ध लेणियों में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि को बौद्ध अनुयायी जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करता था. भारत से बौद्ध धर्म का उच्चाटन करने के बाद ब्राहमणों ने बौद्ध स्थलों को ब्राह्मणी देवी देवता में परिवर्तित कर दिया. बुद्ध मूर्ति को शिव का स्वरुप देना बहुत आसान था. और इस प्रकार कालांतर में बुद्ध स्तूपों को शिवलिंग घोषित कर दिया और बुद्ध लेणियों को ‘पांडव लेणी’ या ‘पांडव गुफा’ ऐसा नाम दे दिया. बौद्ध भिक्खुओं को बेदखल कर दिए जाने के बाद बौद्ध अस्तित्व पूरी तरह से नष्ट हो गया और ब्राह्मणों ने सारे निर्माण को ब्राह्मणी स्वरुप अर्थात हिन्दू स्वरुप दे दिया. बौद्ध उपासको और जनता को भी हिन्दू नाम दे दिया गया. लेकिन ये हिन्दू हुए लोग पूर्णिमा, अमावस्या, चतुर्थी और अष्टमी की वंदना की परम्परा को निभा रहे थे. इस परंपरा को ही ब्राहमणों ने गुप्त काल से पुराण, रामायण, महाभारत आदि लिखकर ब्राह्मणी अर्थात हिन्दू धर्म की परंपराओं में तब्दील कर दिया. इसतरह आज भी महाशिवरात्रि का उत्सव या मेला बहुसंख्या में बुद्ध लेणियों में दिखाई देता है.
       लेकिन वर्तमान बौद्ध जनता बुद्ध लेणी, स्तूप की चर्चा के आगे कुछ नहीं करती है. भावी पीढ़ी को बौद्ध धर्म का वैभवशाली और श्रद्धामय अस्तित्व जताने के लिए लेणी स्तूपों का संवर्धन करना प्रत्येक अम्बेडकरी अनुयायी की जिम्मेदारी है. अपने संस्कृति का जतन करना देश के नागरिकों का प्रथम कर्तव्य है, ऐसा हमारे महापुरुषों ने कहा है. महाशिवरात्रि और हर पूर्णिमा अमावस्या के दिन बौद्धों ने नजदीकी लेणी स्तूप पर जाकर वहाँ बौद्धों का अस्तित्व बनाए रखना जरुरी है. इसी माध्यम से भारत के सभी धर्मो की जनता को भारत की मूल संस्कृति अर्थात बौद्ध संस्कृति का इतिहास जताने की जिम्मेदारी बाबासाहब का अनुयायी निभा सकता है.
       महापुरुषों के आदेशों का पालन करने के उद्देश से ब्लिस ने २०१० से मुंबई की कोंड्वीटे (महाकाली) और कान्हेरी बुद्ध लेणी पर महाशिवरात्रि के दिन ही ‘महाधम्म उत्सव’ आयोजित करना शुरू किया है. इस अभियान में मुंबई के ही नहीं तो अन्य शहर के धम्मबंधू भी आकर अपना सहभाग जाहिर करते है. बौद्धों की इस क्रांति का फलित यानि कान्हेरी लेणी पर हिन्दुओं की संख्या १.५ लाख से २००० पर आ गई है. आने वाले सालों में वह और काम होती जाएगी. लेकिन मुंबई के उन १.५ लाख हिन्दू लोगों के मस्तिष्क में यह बात पूरी तरह से चली गई कि वे जिस जगह को शिव का स्थान समझ कर पूजा करने जाते थे और जिसे वे शिवलिंग समझते थे वह बुद्ध लेणी और बुद्ध स्तूप है. कोंद्विते लेणी पर तो अब कोई हिन्दू जाता ही नहीं. ये दोनों ही स्थल मुंबई शहर के सबसे प्राचीन स्थल है. मुंबई शहर के इन सबसे वैभवशाली और विशाल प्राचीन स्थल का बौद्ध अस्तित्व पुनः निर्माण करने में ब्लिस को सफलता मिली है. इन ५ सालों में  उस जगह पर बौद्धों की संख्या बढती गई है. लेकिन यह परंपरा निरंतर रखना जरुरी है अन्यथा फिर से ब्राह्मण उस जगह हो ब्राहमनीकृत करेगा और उन स्थलों की प्राचीनता के इतिहास का उपयोग हिन्दू धर्म को प्राचीन जाहिर करने और ब्राह्मणी वर्चस्व को बनाये रखने के लिए करेगा. जबतक ब्राह्मण भारत में है तब तक वह अपनी इस बदमाशी को बरकरार रखेगा. बाबासाहब ने भी इस बात को स्पष्ट किया था कि भारत इतिहास और कुछ न होकर ब्राहमणों और बौद्धों का संघर्ष है. इसलिए इतिहास के इस तथ्य से हमें सीख लेना जरुरी है.
       महाशिवरात्रि के इस महोत्सव में पुरातत्व और पोलिसो की मदत से हिन्दू भाविकों को बड़ी ही विनम्रता से बुद्ध स्थल का महत्व विशद किया जाता है. पुरे स्थल के परिसर में बौद्ध इतिहास के बैनर और पोस्टर्स लगाये जाते है. इतिहास के पर्चे बांटे जाते है. इस तरह से ब्लिस के अभियान को पुरे देश में कार्यान्वित किया जा रहा है.
पण्डितो नागार्य सिरी परमो आनंदो
(डॉ परम आनंद)
८८०५४६०९९९
राष्ट्रीय समन्वयक, भारत लेणी संवर्धन समिती (ब्लिस)

बहुजन समाज, वोट की ताकत को समझे अन्यथा पतन निश्चित है। …..लेखक – एड्वोकेट कुशालचन्द्र

gujrat dalit protestबहुजन समाज, वोट की ताकत को समझे अन्यथा पतन निश्चित है। 🔸🔸🔸🔸🔸🔸लेखक – कुशालचन्द्र एड्वोकेट
🔹हमारा वोट ही, हमारी ताकत है यह लोकतन्त्र में सबसे बड़ी ताकत वाला हथियार है।
🔹यदि हमने इसे सही तरीके से उपयोग नही किया तो यह हथियार, हमारे खिलाफ भी उतनी ही ताकत से काम करेगा जैसा की हम उसे उपयोग कर सकते है।
🔹वोट की ताकत से ही हमारा वजुद है।
🔹जब – जब शासक वर्ग ब्राह्मण पर संकट आता है तो बीजेपी कांग्रेस कॉम्युनिट्स सभी एक हो जाते है और जब भी सत्ता के संघर्ष की बात आती है तो सबसे पहले एक्टिव हो जाते है और चुनाव आते ही कई बरसाती पॉलिटिशियन तैयार हो जाते है।
👎आज अधिकतर मिडिया (समाचार पत्र व् टीवी चैनल) तक ब्राह्मणवादी पार्टियो को जिताने के काम में लगा हुआ है दैनिक भास्कर इसका उदाहरण है जिसने उत्तरप्रदेश में बहनजी और अखलेश् के खिलाफ खुलम-खुला प्रचार कर रहा है।
🔹हमें भी यह समझने की जरूरत है की यदि चुनाव हो रहे है तो हम देश – दुनिया में कहि भी हो, हमारे लोगो के लिये संघर्ष/प्रचार – प्रसार करना चाहिए ।।
🔹आज पंजाब में चुनाव हो रहा है 1500 NRI आम आदमी (ब्राह्मण बनिया) कार्यकर्ता AAP के लिये प्रचार कर रहे है इसी तरह BJP के कई उद्योगपति राजनीतिज्ञ बन गए है बीजेपी के लिये प्रचार कर रहे है और वोट की ताकत को अपने खेमे में ट्रांसफर कर रहे है।
यही वोट की ताकत जो कल तक आपकी थी उसे वे अपनी तरफ ले जाकर अपने ही फायदे/हितों के लिये, आपके अधिकारो के खिलाफ काम में ले रहे है।
ऐसा आज तक होता आया है तभी तो उन्होंने देखते देखते
🔘पदोन्नति आरक्षण की हत्या कर दी।
🔘सरकारी सेक्टर को अन्धाधुन्ध तरीके से निजीकरण किया है जिससे सरकारी नोकरियो में आरक्षण तेजी से समाप्त हो रहा है।
🔘शिक्षण संस्थाओ का निजीकरण किया जा रहा है जिससे केवल धनवान व्यक्ति ही पढ़ सके। गरीबो को अनपढ़ रखा जा सके।
🔘कांग्रेस – बीजेपी ने राजनेतिक रूप से भी sc st obc minority को कैद कर रखा।
🌀यह सब वोट की ताकत से ही सम्भव हुआ है।
🔸हमें अपनी वोट ताकत को हमारे अधिकारो की सुरक्षा के लिये सही तरीके से उपयोग करने की जरूरत है।
🌀आज उत्तरप्रदेश में चुनाव हो रहे है हमे भी ‘आयरन लेडी बहन मायावती” को सपोर्ट करने की जरूरत है।
🌀आज देश में sc st obc minority की एक मात्र आवाज़ बहन मायावती जी है हमे उसे दिन रात एक करके उन्हें जैसे भी सम्भव हो, उनके पक्ष में माहोल बनाने की जरूरत है क्योकि हवाओ से राज आते है और चले भी जाते है।
🔹इसके लिये आर्टिकल/लेख/ब्लॉग/टिप्पणी लिखने की जरूरत है।
🔹सोशल मिडिया पर बहनजी के अच्छे कार्यो की जानकारी जनता तक पहुचाने और प्रचार प्रसार करने की जरूरत है।
🔹गत वर्षो में जिस तरह बहनजी ने sc st obc minority की जोरदार तरीके से पैरवी की है उनसे यह देश की सर्वमान्य नेता बनकर उभरी है चाहे वह
🔸पदोन्नति में आरक्षण मामला हो , 🔸रोहित वेमुला केस, 🔸गुजरात का ऊना केस, 🔸अखलात – दादरी मामला, 🔸बीफ केस, 🔸मानवीय अधिकारो के हनन के मामले, 🔸महिलाओ के खिलाफ अत्याचार के मामले हो। जबरदस्त पैरवी की है।
☸जिसके कारण अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्टेलिया, जर्मनी, कनाडा दुनियाभर से बहनजी को समर्थन मिल रहा है जिसे जनता तक पहुचाने की जरूरत है।
🌀यदि हमने अपनी जिम्मेवारी नही उठाई तो वह दिन दूर नही, जब शोषण गुलामी सांप्रदायिक खतरे आपके दरवाजे पर दस्तक दे।
🌀जाग जाए और वोट की ताकत को समझे और बहनजी को मजबूत करे ताकि आने वाले 5 वर्षो में किसी की हिम्मत नही जो आपकी तरफ आँख उठाकर भी बात करे।।
🌀हमें बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की उस कहि हुए बात को याद रखना चाहिए की “यह मेरा पिछड़ा बहुजन समाज  (sc st obc minority) यदि एक हो जाए तो यह ब्राह्मण ‘गोविन्द वल्लभ पंत उत्तरप्रदेश तत्कालीन मुख्यमंत्री’ आपके जूते के फीते खोलने में अपनी शान महसूस करेगे।।
अपने मनभेद भुलाये, समझे – जागे – जगाये और लग जाए बाबा साहब के मिशन में।।
जय भीम – जय भारत – जय सविधान
कुशालचन्द्र एड्वोकेट🌀🌀🌀🌀🌀
M.A., M.COM., LL.M., D.C.L.L., I.D.C.A., C.A. Inter.
बिरसा फुले अम्बेडकर एसोसिएशन राजस्थान।।

ताकतवर बनने के लिए 7 प्रकार का बल जुटाना पड़ता है,इन 7 बलों पर हमें भी विचार करना होगा,जो निम्न प्रकार से हैं।….भैरूलाल नामा

dalit fighter buddhist
*हम लोग अब निम्न प्रकार मिशन अम्बेडकर  को आगे बढ़ाएंगे।*
           शिक्षा के अभाव में मति(बुद्धि)गई, मति के अभाव में नीति गई,नीति के अभाव में गति(विकास की रफ्तार) गई, गति के अभाव में वित्त (धन)गया। और वित्त के अभाव में शुद्र समाज मनुवादियों का  गुलाम बनकर रह गया और ये सब शिक्षा के अभाव में हुआ। यह कहना था सच्चे राष्ट्रपिता महामानव ज्योतिराव फुले का।आज भी मनुवादी लोगों का कहना है कि इन बेवकूफ, मूर्ख शूद्रों को टका देदो लेकिन ज्ञान(शिक्षा) मत दो।जबकि बाबा साहब अम्बेडकर का कहना था कि शिक्षा अति महत्वपूर्ण है और उन्होंने पढ़े लिखे लोगों को जिम्मेदारी सौंपी थी कि समाज को शिक्षित करो, संगठित करो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो, उनका यह भी कहना था कि अधिकार मांगने से नहीं मिलते हैं उन्हें तो छिना जाता है और छिनने के लिए सामने वाले से अधिक ताकतवर बनना पड़ता है।
   ताकतवर बनने के लिए 7 प्रकार का बल जुटाना पड़ता है,इन 7 बलों पर हमें भी विचार करना होगा,जो निम्न प्रकार से हैं।
1,बाहुबल( पोष्टिक एवं संतुलित भोजन लेना, नशा एवं धूम्रपान छोड़ना, आलस्य को त्यागना।)
2,अशस्त्र बल( आत्म सुरक्षा के लिए)
3,शस्त्र बल(सरकार से लाईसेंस लेकर आत्म सुरक्षा के लिए)
4, बुद्धि बल( अच्छी और पूर्ण शिक्षा प्राप्त करना।)
5,धनबल(सभी को रोजगार दिलाना।)
6,जनबल(समाज के लोगों द्वारा एक साथ मिलकर एक रणनीति तैयार करना।)
7, मनोबल( भाग्य को नकारना और अपने कर्म पर विश्वास करना।)
उपरोक्त सभी प्रकार के बल प्राप्त करने के लिए बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा स्थापित सामाजिक संगठन समता सैनिक दल की विद्यार्थी विंग एक जोरदार तरीके से अभियान शुरू करने जा रही है जो कि निम्न प्रकार होगा।
शिक्षित करो। संगठित करो। संघर्ष करो
 अंबेडकर शिक्षा केंद्र की स्थापना।
   जैसा कि आप सभी जानते हैं कि  बाबा साहब अम्बेडकर ने  18 डिग्रियां हासिल कर  विश्व के सबसे अधिक शिक्षित एवं सर्वश्रेष्ठ विद्वान बने,उन्हें विश्व की महा शक्ति अमेरिका द्वारा भी ज्ञान का प्रतीक घोषित किया जा चुका है एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के संविधान को लिखकर उन्होंने अपनी विद्वता को सिद्ध करके  भी दिखा दिया था ।  बाबा साहेब का मानना था कि समाज को शिक्षित करना सबसे महत्वपूर्ण काम है,क्योंकि शिक्षा से ज्ञान मिलता है, ज्ञान से व्यक्ति विद्वान बनता है तथा विद्वान व्यक्ति को सभी जगह सम्मान मिलता है तथा शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों को जान सकते हैं और उनके लिए संघर्ष करने के लिए समाज का नेतृत्व कर सकेंगे ।  बाबा साहेब का कहना था कि सौ वर्ष  अपमान भरे जीवन से   सम्मानपूर्वक दो दिन का जीवन जीना बेहतर है,एवं शिक्षा इसमें बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, शिक्षा शेरनी का वो दुध है जिसे कोई भी पियेगा तो वह दहाड़ेगा एवं शेर की तरह दहाड़ने वाले का अपमान करने की कोई भी हिम्मत नहीं जुटा पाता है।  इसीलिये बाबा साहब का बार बार यही कहना था कि यदि आप मेरा सच्चा सम्मान करना चाहते हो तो समाज को शिक्षित करो
बाबा साहेब की विचारधारा को जन जन तक पहुँचाने के लिए आप बामसेफ एंव RMS से जुङकर समाज मे जागृति का काम करे ।
जय भीम जय मूलनिवासी
भैरूलाल नामा

क्या “दलित” शब्द के साथ “साहित्य” संभव है?क्या दलित शब्द का इस्तेमाल आंबेडकरवादी विचारधारा के अनुरूप है, क्या स्वयं डा. आंबेडकर इस शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में थे|… ईश कुमार गंगानिया

MUMBAI  buddh press agitation3
क्या “दलित” शब्द के साथ “साहित्य” संभव है?
ईश कुमार गंगानिया यह स्पष्ट कर रहे हैं कि क्या दलित शब्द का इस्तेमाल आंबेडकरवादी विचारधारा के अनुरूप है, क्या स्वयं डा. आंबेडकर इस शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में थे
मैं आंबेडकरी वैचारिकी यानी आंबेडकवाद और ‘दलित’ शब्‍द के प्रयोग और ‘दलित’ शब्‍द को केन्‍द्र में रखकर अस्तित्‍व में आए दलित साहित्‍य को लेकर एक अजीब प्रकार के द्वंद्व से गुजर रहा हूं। संभवत: यह द्वंद्व  आंबेडकर और दलित साहित्‍य के अंत: संबंध को समझने में हमारी मदद करें। दरअसल, मुझे ‘दलित’ शब्‍द आंबेडकरवाद या आंबेडकर-वैचारिकी का हिस्‍सा नहीं लगता। मेरी स्‍पष्‍ट मान्‍यता है कि ‘दलित’ शब्‍द किसी भी समाज की गरिमामय अस्मिता कभी नहीं हो सकता। जहां तक मेरा अल्‍प अध्‍ययन का मामला है, बाबा साहब ने ‘दलित’ शब्‍द को अपने समाज की अस्मिता (आईडेटिटी) बनाने का आह्वान कभी नहीं किया।
दलित’ शब्द के प्रयोग का स्वयं बाबा साहब ने तर्कयुक्त आधार पर खंडन किया था, जो उनके सम्पूमर्ण वाड़़्मय संख्या चार के पृष्ठ 228 पर ‘नामकरण’ शीर्षक से कुछ इस प्रकार अंकित है-‘‘जिन जातियों को इस समय ‘दलित वर्ग’ कहा जाता है, उन्हें इस शब्द पर काफी आपत्ति है…यह शब्द  यह धारणा पैदा करता है कि ‘दलित वर्ग’ एक निम्न और असहाय समुदाय है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर प्रांत में उनमें अनेक सुसम्पन्न और सुशिक्षित लोग हैं और समूचे समुदाय में अपनी आवश्यकताओं के प्रति चेतना जागृत हो रही है। उसके मानस में भारतीय समाज में सम्मानजनक दर्जा प्राप्त करने की प्रबल लालसा पैदा हो गई है और वह उसे प्राप्ते करने के लिए भागीरथ प्रयास कर रहा है। इन सब कारणों के आधार पर ‘दलित वर्ग’ शब्द अनुपयुक्त और अनुचित है।…दलित वर्गों के प्रतिनिधि के नाते मैं बिना किसी संकोच के कह सकता हूं कि जब तक और बेहतर नाम न मिल जाए तब तक अस्पृश्य वर्ग को अधिक व्यापक शब्द ‘बाह्य जातियों’ या बहिष्कृत जातियों के नाम से पुकारा जाए, न कि दलित वर्गों के नाम से।’’ गौरतलब यह भी है कि कुछ बुद्धिजीवी इसे मूलनिवासी/आंबेडकरवादी समाज जैसी और भी कई नई-नई पहचान दिलाने के लिए संघर्षरत हैं।
आज भी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका अपने आपको दलित और अपने द्वारा रचित साहित्‍य को ‘दलित साहित्‍य’ कहे जाने के लिए जिद पर है। इस कड़ी में कांचा इलैया, जो एक बडे चिंतक है, का उल्‍लेख किया जा सकता है-‘‘अब खुद धर्म का इतिहास भी अपने अंत पर पहुंच रहा है। हमारे लिए जरूरी है कि अपने समग्र समाज का दलितीकरण करें। दलितीकरण ही सारे भारतीय समाज में एक नए समतावादी भविष्‍य की स्‍थापना करेंगा।’’ (मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूं, पृ. 104) यदि इस टिप्‍पणी पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो समस्‍त समाज का दलितीकरण जरूरी है। प्रश्‍न यह भी है कि समग्र समाज का दलितीकरण कैसे होगा? क्‍या उन्हें (गैर-दलितों का) अन्‍य विभिन्‍न प्रकार की निम्‍न जातियों में बांटा जाएगा? क्‍या उनका आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक व राजनीतिक रूप से दलन किया जाएगा? क्‍या उन पर विभिन्‍न स्‍तर पर निर्योग्‍यताएं थोपी जाएंगी? क्‍या कांचा इलैया का तात्‍पर्य यह है कि ऐसा करने से पूरा समाज समान रूप से दलित हो जाए यानी यही समग्र समाज के दलितीकरण की प्रक्रिया है? क्‍या कांचा इलैया का समता का यही पैमाना होगा? इतनी मगजपच्‍ची करने के बाद भी यह मेरी समझ से बाहर है कि दलितीकरण की प्रक्रिया देखने व अनुभव करने में कैसी होगी और इससे कैसे भारतीय समाज में नए समतावादी भाविष्‍य की स्‍थापना होगी। कांचा इलैया साहब को यह ठीक-ठीक स्‍पष्‍ट करना चाहिए। इस प्रकार की सोच अम्‍बेडकरवादी नहीं, दलितवादी (हीनताबोधी) महसूस होती है।
इस कड़ी में वी टी राजशेखर जैसे प्रखर चिंतक, जो इंग्लिश की पत्रिका ‘दलित वायस’ भी निकालते हैं, का उल्‍लेख किया जा सकता है-‘‘दलित होने, इस प्राचीन धरती के मूलनिवासी होने में गर्व महसूस करो। आओ सिर ऊंचा करके चलें। दलित संस्‍कृति पर गर्व करें। जो काला है वह सुंदर है।’’ (दलित वॉयस, खंड-8, अंक 16, जून 1-15, 1988) मुझे इस देश का मूलनिवासी होने पर तो गर्व है और इसमें सिर ऊंचा करने वाली बात स्‍वाभाविक ही है। लेकिन दलित होने पर कैसे गर्व किया जा सकता है?
यह भी बड़े प्रबल दावे के साथ कहा जाता है कि दलित साहित्‍य आंबेडकरी विचारधारा पर आधारित साहित्‍य है। परिणामस्‍वरूप, बाबा साहब की वैचारिकी के मद्देनजर हिन्‍दूवाद का विरोध जमकर हो रहा है। बौद्ध धम्‍म को समाज का धर्म बनाने की काफी जद्दोजहद हो रही है। जातिविहीन व समतमामूलक समाज की बात भी खूब होती है। नारी अस्मिता और सशक्तिकरण भी मुख्‍यधारा की लड़ाई के रूप में प्रमुखता के साथ मौजूद है। कविताओं, कहानियों, उपन्‍यासों व आत्‍मकथाओं में शोषण-उत्‍पीड़न के हथकंडों पर खूब बात हो रही है यानी शोषक और शोषित की तस्‍वीर इस साहित्‍य के माध्‍यम से बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट हो रही है। इस साहित्‍य में आक्रोश इतना बढ़ गया है कि कुछ लोग आक्रोश को इस साहित्‍य की प्रमुख प्रवृत्ति व साहित्‍य के सौंदर्य के रूप में आनिवार्यता प्रदान करने में बढ़ चढ़कर हिस्‍सा लेते हैं। गौरतलब है कि आक्रोश में विवेक नहीं रहता और इसमें रचनात्‍मकता का भी ह्रास होता है। इसलिए मुझे लगता है कि आक्रोश की अपेक्षा हमें अपने तर्क गंभीरता व जिम्‍मेदारी से रखने चाहिए। मैं यह भी मानता हूं कि ‘दलित’ शब्‍द और इससे जुड़े साहित्‍य के लिए ‘दलित साहित्‍य’ के पैरोकारों की कमी नहीं है। लेकिन फिर भी मेरी दृष्टि में यह आधा सच है, पूरा नहीं।
मैं यह मानकर चलता हूं कि आजकल दलन/अत्‍याचार उन पर अधिक होते हैं जो दलितपन के दायरे से बाहर निकलने या इससे बाहर झांकने की कोशिश करते हैं। जिन्‍होंने दलन का आत्‍मसात कर लिया हो उसके लिए दलन व शोषण और उत्पीड़न  का कोई खास अर्थ ही नहीं रह जाता। न वह इसका प्रतिकार ही करता है और न ही इससे पीडि़त ही महसूस करता है। साफ है कि वह इसे नियति मानकर चलता है। मुझे दलित साहित्‍य के पैरोकारों का अपने आपको ‘दलित’ की परिधि में कैद रखना यानी अपनी वास्‍तविक व गरिमामय अस्मिता की तलाश के प्रति निष्‍क्रिय/उदासीन जैसे बने रहना अपनी मौजूदा स्थिति से आत्‍मसात करने जैसा ही लगता है।
आंबेडकरवाद की कसौटी पर प्रो. तुलसीराम की आत्‍मकथा ‘मुर्दहिया’ को देखें तो इसमें आक्रोश है, एक प्रकार से पूरे सिस्‍टम से बगावत है और इस बगावत के केन्‍द्र में स्‍वयं व्‍यक्ति है। इससे जो हासिल होने वाला है वह स्‍वयं के लिए है, किसी और के लिए नहीं। प्रो. तुलसीराम द्वारा सारे भूत-प्रेत और अंधविश्‍वासी परंपरओं को तोड़ना आंबेडकरवादी/आंबेडकवाद की विचारधारा के पुख्‍ता प्रमाण है़। पढाई के लिए घर-परिवार वालों से चोरी से कस्‍बे में भाग जाना। ये तरीके ऐसे आक्रोश के हैं जो स्‍वयं के आगे बढ़ने लिए जरूरी हैं, दूसरों की टांग खींचने वाले नहीं। बाबा साहब का पूरा जीवन ऐसे ही कारनामों से भरा पड़ा है। अपनी बड़ी लाईन खींचकर आगे बढ़ना ही बाबा साहब ही लाईन है। यही समाज में व्‍यक्ति को स्‍वीकार्य व आदरणीय बनाती है। ऐसे दर्शन के दम पर ही तो बाबा साहब आज दुनिया के 100 श्रेष्‍ठतम बुद्धिमानों की श्रेणी में सम्‍मानजनक पोजिशन में मौजूद हैं। आज जरूरत भी इसी की है। आंबेडकरवादी ऐसी ही सोच ने बेहद मामूली, अभावग्रस्‍त और असीम समस्‍याओं से ग्रस्‍त बालक को जेएनयू का प्रो. तुलसीराम बना दिया।
dalit tyago
इसके विपरीत हमारे प्रखर विद्वान डा. धर्मवीर जी हैं, जो अपने आपको डा. आंबेडकर का बालक बताते हैं। उन्होंने  आईएएस जैसे बड़े पद को सुशोभित किया और कुछ समय पहले तक बहुत ही उम्‍दा, गंभीर व काबिल-ए-तारीफ लेखन भी किया। लेकिन आजकल डा. धर्मवीर तथागत बुद्ध और डा. आंबेडकर के चिंतन-दर्शन की जड़ों में मट्ठा डालकर अपने आधे-अधूरे आजीवक दर्शन की बुनियाद रखने की कोशिश में हैं। उनकी अपनी विद्वत मंडली तथाकथित उनकी आत्‍मकथा ‘मेरी पत्‍नी और भेडि़या’, उनके जार चिंतन और कबीर को आजीवक दर्शन की बैसाखी बनाने पर तुले हैं। ये कभी ‘आजीवक’ को दलित धर्म और कभी किसी अन्‍य ‘दलित धर्म की खोज’ की बात करते है। डा. धर्मवीर के इस उपक्रम की तुलना हिन्‍दूवाद के कट्टरवादी उस आन्‍दोलन से की जा सकती है जिसमें वे ‘हिन्‍दू’ को कभी धर्म कहते है, कभी सिंधु घाटी से उपजा बताते हैं, कभी इसे हिन्‍दी से जोड़ते हैं, कभी इसे हिन्‍दुत्‍व कहते हैं, कभी हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद कहते हैं, कभी जीवनशैली कहते हैं और न जाने क्‍या-क्‍या कहते हैं लेकिन अंतत: वही ढाक के तीन पात।
यह सिक्‍के का एक पहलू हैं। आंबेडकरवादी साहित्‍य में हम शोषण-उत्‍पीड़न के विभिन्न पक्षों की बात करते हैं और इसके लिए जिम्‍मेदार लोगों को अपनी वैचारिक स्‍वतंत्रता के अधिकार की बदौलत स्‍वाभाविक रूप से कठघरे में खड़ा करते हैं। ले‍किन अनेक मामलों में हम दूसरों को कठघरे में खड़ा करते समय खुद ही दलितपन के शिकार नजर आते हैं। आंबेडकरवादी कवि ब्राह्मणवादी संस्कृति को कभी ‘परायी-संस्कृति’ या ‘मुर्दा-संस्कृति’ कहता है तो कभी उसे ‘रखैल-संस्कृति’ या ‘कुत्ता-संस्कृति’ के रूप में चिहिंत करता है। क़ुछ ऐसे कवि भी हैं जो कोढ़ी संस्‍कृति यानी हिन्‍दूवादी अपसंस्‍कृति को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि इसे तुम्‍हीं संभालों। यह कोढ़ी व अग्राह्या संस्‍कृति के नकार की सूझबूझ व शक्तिऐसे कवियों को बुद्ध व बाबा साहब के दर्शन व उनकी 22 प्रतिज्ञओं की बदौलत मिलती है। इसमें सम्‍यक निर्णय दलितवाद का नहीं बल्कि अम्‍बेडकरवाद का लक्षण है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो कहानियों, कविताओं व उपन्‍यासों से दिए जा सकते हैं।
इस कड़ी में यह चर्चा करना भी जरूरी महसूस हो रहा कि जो कुछ भी दलित समाज के व्‍यक्ति के द्वारा लिखा जाता है, क्‍या उसे दलित साहित्‍य या आंबेडकर वैचारिकी का हिस्‍सा मान लिया जाना चाहिए। वैसे यह दावा अक्‍सर दलित साहित्‍यकारों द्वारा किया जाता रहा है कि दलित साहित्‍य केवल दलित ही लिख सकता है। मैं इन दोनों स्थितियों से असहमति व्‍यक्‍त करने को विवश हूं। डा. विजय सोनकर शास्‍त्री का ऐपीसोड मुझे आंबेडकरवादी विचारधारा पर आधारित साहित्‍य कतई नहीं लगता। नीचे वर्णित ऐपीसोड के आधार पर देखें तो डा. शास्‍त्री का दलित समाज से संबंधित होना उसके साहित्‍य को दलित साहित्‍य व अम्‍बेडकरी वैचारिक पर खरा उतरने में मदद नहीं करता।
आंबेडकर वैचारिकी यानी आंबेडकरवाद को समझने के लिए समाज में व्‍याप्‍त निजद्वैतवाद (फिसीपैरस) यानी वैचारिक दोगलापन की प्रवृत्ति को समझना पड़ेगा। इसको समझने के लिए हमको विजय सोनकर शास्‍त्री की दलितों के प्रति भूमिका को भी समझना होगा। गौरतलब है कि डा. विजय सोनकर शास्‍त्री वर्तमान में भाजपा सांसद ही नहीं हैं अपितु एस सी/एस टी कमीशन के चेयरमैन भी रह चुके हैं। मूल बात यह है कि ये भाजपा की ओर से दलितों के प्रतिनिधि हैं। ये लगभग पांच वर्षों से ‘दलित आन्‍दोल पत्रिका’ भी निकाल रहे रहे हैं जिसमें बाबा साहब का बड़ा-बड़ा फोटो भी अक्‍सर होता है।
वे 07.09.2014 को एनडीएमसी कन्‍वैंशन सेंटर में अपनी तीन पुस्‍तकों “हिन्‍दू खटीक जाति”, “हिन्‍दू चर्मकार जाति” और “हिन्‍दू वाल्‍मीकि जाति” का लोकार्पण आरएसएस चीफ माननीय भागवत जी से कराते हैं और स्‍टेटमैंट देते हैं-‘‘हिन्‍दू उपजातियों की संख्‍या हजारों में कैसे पहुंच गई, यह अपने आप में शोध का विषय है। आज की अछूत जातियां पूर्व कट्टर और बहादुर जातियां थीं। विदेशी आक्रांताओं के अत्‍याचारों को सहते हुए उन्‍होंने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया, बल्कि मैला ढोने जैसे कर्म को स्‍वीकार किया। तब उनसे ज्‍यादा कट्टर हिन्‍दू कौन हो सकता है?’’
उपरोक्‍त टिप्‍पणी हमें आंबेडकरवादी वैचारिकी यानी आंबेडकरवादी मानदंड, जिसे मैं डा. आंबेडकर का विखंडन का सिद्धांत (थ्‍यौरी ऑफ डीकंशट्रक्‍शन) भी कहता हूं, पर परखने को बाध्‍य करती है। ऐसा करने पर हम पाते हैं कि यह टिप्‍पणी हिन्‍दूवाद के निजद्वैतवाद (फिसीपैरस कैरेक्‍टर) यानी विचारों के दोगलेपन पर आधारित है। इस बात पर कैसे यकीन किया जा सकता है कि आरएसएस जैसा हिन्‍दूवाद को समर्पित संगठन जिसके पास धार्मिक कट्टरवादी बुद्धिजीवियों की बड़ी जमात है और जो हिन्‍दूवाद के इतिहास और इसकी संस्‍कृति के संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे करता है, को यह पता न हो कि हजारों जातियां कैसे बनीं। यदि उसे सचमुच पता नहीं तो उसे हिन्‍दुओं और राष्‍ट्र के खैरख्‍वाह बनने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए। लेकिन मेरी यह प्रबल मान्‍यता है कि आरएसएस को सब पता है। इसका प्रमाण वे अपने अगले वाक्‍य में यह कहकर दे देते हैं कि ‘आज की अछूत जातियां पूर्व कट्टर और बहादुर जातियां थीं।’ और ‘उन्‍होंने विदेशी आक्रांताओं के अत्‍याचारों को सहते हुए अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया, बल्कि मैला ढोने जैसे कर्म को स्‍वीकार किया।’ इतना ही नहीं, अंत में यह निष्‍कर्ष निकाल लिया कि ‘उनसे ज्‍यादा कट्टर हिन्‍दू कौन हो सकता है।’
वैसे अब प्रमाणों की कमी नहीं है जो पुख्‍ता करते हैं कि आज का वर्चस्‍ववादी व वर्णवादी समाज ही है, जिसने अतीत में आर्य के रूप में इस देश के मूलनिवासियों को मैला ढोने, मवेशियों का चमड़ा उतारने और घृणित से घृणित कार्य को स्‍वीकार करने के अतिरिक्‍त समाज में रहने का अन्‍य कोई विकल्‍प ही नहीं छोड़ा। आरएसएस चीफ का यहां अछूतों के अन्‍य घृणित पेशों की बात न करके सिर्फ मैला ढोने की बात करना मुझे लगता है कि यह वाल्मिकियों को जैसे तथाकथित दलित खैमें से अलग करना है। दूसरे, वे वाल्मीकि जाति के संबंध में यह टिप्‍पणी करके कि ‘वे वीर-बहादुर जाति रहें हैं और विदेशी आक्रांता यानी मुसलमानों ने उन्‍हें इस घृणित कार्य में झोंका है’ के माध्‍यम से एक तीर से कई शिकार करते नजर आते हैं। ऐसा कहकर एक ओर वे यह संदेश दे रहे हैं कि दलित व अछूतों में वाल्‍मीकि ही ‘वीर-बहादुर’ जाति हैं और संभवत: अन्‍य दलित व अछूत ‘वीर-बहादुर’ नहीं हैं। दूसरी ओर वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि इस मैला प्रथा की दलदल में झोंकने का काम मुस्‍लमानों ने किया है, हिन्‍दुओं की इसमें कोई भूमिका नहीं है। तीसरे, इस वक्‍तव्‍य का एक अर्थ यह भी निकलता है कि वाल्‍मीकियों को कट्टर हिन्‍दू होने का ही एहसास नहीं कराया जा रहा बल्कि उन्‍हें भावी साम्‍प्रदायिक दंगों/टकराव की स्थिति निपटने के लिए उनकी भूमिका भी तैयार की जा रही है। यह अलग बात है कि डा. विजय सोनकर ‘हिन्‍दू खटीक जाति’, ‘हिन्दू  चर्मकार जाति’ और ‘हिन्‍दू वाल्‍मीकि जाति’ नामक पुस्‍तक लिखकर तीनों जातियों को कट्टर हिन्‍दू घोषित करने की मुहिम चला रहे हैं। लेकिन आरएसएस चीफ की उपरोक्‍त टिप्‍पणी सिर्फ मैला ढोने वालों को ही वीर-बहादुर और कट्टर हिन्‍दू कहा है।
संभवत: आरएसएस चीफ‍ यह संदेश देना चाह रहे हैं कि धर्मांतरण कभी नहीं करना चाहिए चाहे उसके लिए कितनी भी बड़ी कीमत क्‍यों न चुकानी पड़े। इसका सीधा-सा मतलब यह हुआ कि चाहे कितने भी निम्‍न स्‍तर के कार्य अछूत कर रहे हैं और कितनी भी जिल्‍लत व शोषण-उत्‍पीडन वे झेल रहे हैं, उन्‍हें अपने हिन्‍दू धर्म की रक्षा की खातिर इसका आत्‍मसात कर लेना चाहिए। दूसरे, डा. अम्‍बेडकर की तरह बुद्ध धम्‍म के अंगीकार (धर्मांतरण) का हिस्‍सा उन्‍हें नहीं बनना चाहिए। यही अप्रत्‍यक्ष संदेश आरएसएस चीफ ईसाई व इस्‍लाम में धर्मांतरण के संबंध में अछूतों को देते नजर आते हैं। यदि इस हिन्‍दू कट्टरवाद की मुहिम को अम्बेडकरवाद के विरुद्ध  देखा जाए तो अनुचित नहीं होना चाहिए। निस्‍संदेह आरएसएस चीफ की एक तीर से कई निशाने साधने की यह अदा काबिल-ए-तारीफ है और डा. विजय सोनकर साहब का इस मुहिम का हिस्‍सा होना भी आज के इस अवसरवादी युग की बड़ी देन कहा जाना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में सर-संघचालक कहते हैं-‘‘हम आरक्षण का समर्थन करते हैं। जब तक समाज में असमानता रहेगी, आरक्षण जरूरी है। समाज में उच्च स्थान पाना दलित जातियों का हक है और उच्च जातियाँ ऐसा करती हैं तो कोई अहसान नहीं करेंगी। उन्होंने कहा कि दलितों ने एक हजार साल तक कष्ट सहा है। उनकी स्थिति ठीक करने के लिये हमें सौ साल तक मुश्किल झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये।’’ यह स्‍टेटमैंट स्‍टेज से गूंजा नहीं कि टी वी व समाचार पत्रों की सुर्खिया बन गया कि आरएसएस चीफ ने आरक्षण को जायज ठहराया है, इसका समर्थन किया। सभी दलित और गैर-दलित हल्‍कों में भी यह चर्चा का विषय बना। अच्‍छा है चर्चा होनी चाहिए। मैं भी इस पर चर्चा करना जरूरी समझ रहा हूं। इसलिए यहां चर्चा कर रहा हूं कि आरएसएस चीफ के इस स्‍टेटमैंट में भी मुझे निजद्वैतवाद नजर आ रहा है यानी कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना जैसा कुछ है। लेकिन इस स्‍टेटमेंट का अगला हिस्‍सा-‘दलितों ने एक हजार साल तक कष्ट सहा है। उनकी स्थिति ठीक करने के लिये हमें सौ साल तक मुश्किल झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये।’, चीफ के स्‍टेटमैंट का यह उत्तरार्ध इस स्‍टेटमैंट के पूर्वार्ध को भी संदिग्‍ध बना देता है। बाद वाले इस स्‍टेटमैंट में आरएसएस चीफ द्वारा अछूतों के 3500 वर्षों से भी अधिक के शोषण-उत्‍पीड़न को घटाकर 1000 तक सीमित करना तर्कयुक्‍त नहीं है। वे 1000 वर्ष के शोषण-उत्‍पीड़न की पूर्ति 100 वर्ष के आरक्षण से करना चाहते हैं।
आरएसएस चीफ भी यही घालमेल करते नजर रहे हैं। आरएसएस चीफ के हिडन ऐजेंडे के अनुसार यदि हम आरक्षण की समय सीमा तय करें तो यह सिर्फ 20 वर्ष ही बचती है। क्‍योंकि 1935 से शुरु 100 वर्ष 2035 में पूरे होते हैं। चूंकि अब 2016 की शुरुआत है यानी आरएसएस चीफ हमारे लिए आरक्षण सिर्फ 19 वर्ष तक देने की बात कर रहे हैं। वैसे न तो आरएसएस चीफ यह तय करने की कोई ऑर्थोटी हैं और न ही हम, इसलिए इस विषय पर हमारे लिए किसी मोल-भाव का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। लेकिन यहां मामला नीयत का है और इरादे का भी। मुझे दोनों ही संदिग्‍ध नजर आते हैं।
आंबेडकर वैचारिकी और दलित साहित्‍य के अंत:संबंध की परख करते हुए मुझे पुन: ‘दलित’ शब्‍द पर लौटना प्रासांगिक महसूस हो रहा है ताकि आम्‍बेडकर वैचारिकी के तहत इसकी परख हो सके। ‘दलित’ शब्द एक विशेषण है, कोई संज्ञा नहीं है और इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जीवन के हर स्तर पर हो रहे शोषण-उत्पीड़न के चलते ही इस देश के मूल-निवासियों को सैंकड़ों अपमानजनक जातियों के साथ-साथ अस्पृश्य, अछूत, अंत्यज, चांडाल जैसी विभिन्न संज्ञाओं से गुजरना पड़ा है। ‘दलित’ शब्द भी इसी श्रेणी में आता है। यह सब हम पर थोपा हुआ है, जो किसी भी विवेकशील समाज के लिए अस्मिता का परिचायक नहीं हो सकता। आम्‍बेडकर वैचारिकी इस बात पर फोकस करने को विवश करती है कि हम उस इंसानी अस्मिता की तलाश करें जहां से मौजूदा स्थिति में पहुंचाने वाले षडयंत्रों, हिंसक नरसंहारों और निरंतर चले आ रहे शोषण-उत्पीड़न की शुरुआत होती है। मौजूदा अध्ययन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि तथाकथित दलित इस देश के मूलनिवासी हैं और ये लोकायत/चार्वाक संस्कृति के संवाहक यानी आजीवक हैं जो अपनी आजीविका मेहनत से कमाते हैं अर्थात श्रमजीवी हैं, शांति-प्रिय हैं और उच्च नैतिक मूल्यों का अनुपालन इनकी प्रमुख ऐतिहासिक चारित्रिक विशेषता है। जो विद्वान ‘दलित’ शब्द को अस्मिता के रूप में अंगीकार करने के लिए बाजिद हैं, मुझे लगता है कि वे अपनी मूल अस्मिता की तलाश के लिए मशक्कत से बचते हैं और धारा के विरुद्ध तैरने का साहस नहीं रखते। यह कहना अतिश्‍योक्ति नहीं होगा कि डा. आंबेडकर की वैचारिकी यानी अम्‍बेडकरवाद का संबंध केवल साहित्‍य तक सीमित नहीं बल्कि समाज, राष्‍ट्र व पूरी मानवता के साथ इसका घनिष्‍ठ अंत:संबंध है।

” क्रांतिकारी रैदास ”…. एड्वोकेट कुशालचन्द्र

sant ravidas

किसी ने कहा है की जिस कौम का इतिहास नही होता, उस कौम का कोई भविष्य नही होता, आज बहुजन (बहुजन (बहुजन (दलित))) समाज की बात करे तो भगवान बुद्ध के बाद बहुजन (बहुजन (दलित)) आंदोलन के अग्रदूत गुरू रविदास हुए है ।

गुरू रविदास का जन्म माघ सुदी 15 विक्रम संवत् 1460 मे मंडुआ डीह नामक एक गाँव मे रघुराम जी के घर हुआ इनकी माता का नाम करमा देवी था, उनका विवाह लोना देवी से साथ हुआ ।

रैदासजी प्रारम्भ से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे उन्होने ब्राह्मणों के चारों वेदो का खण्डन किया तथा उन्हे व्यर्थ कि किताबें बताया साथ ही गुरू कबीर ने इन्ही वेदो को अधर्म के वेद बताया । उन्होने ब्राह्मण धर्म के सभी रीति-रिवाजों यज्ञ, श्राद्ध, मंदिरों मे पूजा पाठ, आदि हर ब्राह्मणी कर्मकाण्‍ड का तर्क के साथ खण्डन किया । उन्होने बहुजन (बहुजन (दलित)) समाज को चेताया की केवल बहुजन (बहुजन (दलित)) समाज के लोग ही असल मे भारत के शासक रहे है, सिन्धु सभ्यता अर्थात् बहुजन (बहुजन (दलित)) सभ्यता से लेकर मोर्य काल तक भारत पर केवल और केवल बहुजन (बहुजन (दलित))ों का शासन ही रहा है ।

उन्होने बहुजन (बहुजन (दलित))ो को शिक्षा देना शुरू किया तथा उन्होने उप अक्षरों की गुरूमुखी लिपी बनाई तथा उसी लिपि मे अपनी बाणी की रचना की । रैदास की बाणियो से ही ऐसा आभास होता है कि रैदास ने ऐसे राज्य की स्थापना करना चाही जहा ऊचँ-नीच, शोषण आदि का कोई नाम नही हो ।

गुरू रैदास ने उस जमाने मे विधवा मीरा को दीक्षा दी, जब भारत भर मे खासकर राजस्थान मे विधवा को पति की लाश के साथ जिन्दा जला दिया जाता था, इस सामाजिक कुरीति को ब्राह्मण धर्म का पूरा समर्थन हासिल था, तथा उस समय विधवा हो जाना सबसे बड़ा गुनाह था, चाहे इसमे पत्नि का कोई दोष नही हो ।

गुरू रैदास ने उन अटकलो को भी खारिज किया, जिसमे उनके राम को दशरथ पुत्र राम कहा गया, उन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके राम वह राम नही है, जो दशरथ का पुत्र है । उनका राम तो उनकी अन्तर आत्मा है ।

गुरू रैदास के वास्तव मे कोई गुरू नही थे, क्योकि किसी बहुजन (बहुजन (दलित)) को आज तक, इस भारत मे किसी ने अपना शिष्य नही माना, न ही शिक्षा दी, उन्हे हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिए शिक्षा से दुर रखा, इतिहास गवाह है कि लगभग किसी भी बहुजन (बहुजन (दलित)) संत का कोई गुरू नही रहा ।

वाल्मिकी से लेकर डॉ. अम्बेडकर तक किसी भी बहुजन (बहुजन (दलित)) संत ने गुरू धारण नही किया । शरीरधारी गुरू धारण करने कि परम्परा मात्र ब्राह्मणो मे थी, जिस प्रकार भगवान बुद्ध ने किसी को गुरू नही बनाया, उसी प्रकार बहुजन (बहुजन (दलित)) संतो ने भी किसी को गुरू नही बनाया ।

गुरू रैदास की वाणी मे बोद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । उनकी बाणी मे हिन्दू धर्म या उससे सम्बन्धित किसी भी वेदों का उपयोग नही मिलता है । उन्होने स्पष्ट कहा की किसी भी जाति या वर्ण विशेष मे जन्म लेने से कोई छोटा या बड़ा नही हो जाता है और उन्होने मंदिरों, अवतारो, त्रिमूर्ति, सभी को झूठ और धोखा बताया ।

गुरू रैदास कहते है कि ”बिन देखे उपजे नही आशा, जो देखू सो होय विनाशा ” अर्थात जो दिखाई नही देता उसके प्रति भावना पैदा नही होती तथा जो दिखाई देता है वह नश्वर है, उसका अन्त होना निश्चित है, गुरू रैदास का यह श्लोक उन्हे भगवान बुद्ध के नजदीक ला देता है ।

भगवान बुद्ध ने भी सृष्टिकर्ता ईश्वर के अस्तित्व से इंकार किया । गुरू रैदास के समकालीन तथा सहमित्र रहे गुरू कबीर कुछ ज्यादा ही मुखर शब्दों मे बोले कि ” अगर ईष्ट देव का नाम जपने से ही कुल फल मिलता हो तो रोटी-रोटी करने से पेट भर जाना चाहिये ।” उन्होने कहा कि केवल शुभ काम करने से ही भला होगा ।

गुरू कबीर ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनोती देते हुए कुछ ज्यादा ही स्पष्ट कहा कि ‘‘जो तू बामण बामणी जाया, तो आण बाट क्यों नही आया’’ अर्थात् तू अगर बामणी के पैदा होने के कारण ही ब्राह्मण होने का दावा करता है तो तुझे आम आदमी की तरह माँ के गर्भ से पैदा नही होना चाहिये या बल्कि किसी अन्य रास्ते से पैदा होना चाहिये था ।

गुरू रैदास और गुरू कबीर ने साथ मिलकर ब्राह्मणवादी सता के विरूद्ध आंदोलन चलाया और उनकी प्रखर आलोचना की, और बहुजन (बहुजन (दलित)) लोगों मे चेतना जागृत करने का कार्य किया ।

गुरूनानक भी गुरू रैदास के समकालीन थे, वे गुरू रैदास से मिले भी थे तथा उनकी वाणी को साथ लेकर भी गये, वे गुरू रैदास से इतने अधिक प्रभावित थे, कि वे उनकी वाणी को स्‍वयं गाते भी थे । दशम् गुरू गोबिन्द सिंह ने अपने कार्यकाल मे समस्त भारत के सन्तों की वाणी को ‘‘गुरू ग्रन्थ साहिबा’’ मे संकलन किया । जिसमे गुरू रैदास के 41 पद को शामिल किया गया ।

यह आम मान्यता है कि गुरू रैदास 100 वर्षो से भी ज्यादा जीए । अतः प्रश्न यह उठता है कि उन्होने सम्पूर्ण जीवनकाल में क्या मात्र 41 पद ही रच पायें । यह बात पूर्णत अविश्वसनीय लगता है कि, ऐसा माना जाता है कि गुरू नानक जब गुरू रैदास से मिले तब वे 41 पद को उनकी हत्या से पूर्व ही अपने साथ ले गये जिसका संकलन लगभग 150 वर्षो बाद ‘‘ गुरू ग्रन्थ साहिबा ’’ मे किया गया ।

प्रश्‍न यह उठता है कि शेष बाणियाँ कहा गई । माननीय चन्द्रिका प्रसाद का मानना है की गुरू रैदास की हत्या करके उनकी चिता मे उनकी समस्त बाणीया उनके शरीर के साथ आग की भेंट चढा दी गई । अगर उनकी हत्या नही की गई होती तो उनकी बाणीया अवश्य मिलती ।

प्रश्‍न यह भी है की यह नीच काम किसने किया, सीधा सा उत्तर है ऐसा काम उन्ही लोगों ने किया जिन्होंने उनके शरीर से ’’जनेऊ‘‘ निकाले थे । यह ब्राह्मणो व सामंतो ने बड़ी चतुराई से मिलकर एक षडयन्त्र के तहत जनेऊ दिखाने के बहाने उनके शरीर को राणा विक्रम सिंह चितोड़गढ़ के भरे दरबार मे गुरू रैदास का सीना चीर कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी और उनके पार्थिव शरीर को मेघवालों कि बस्ती मे भिजवा दिया गया, और यह कहलवा कर कि तुम्हारे गुरू ने भीतर का जनेऊ दिखाकर सभी को चकित कर दिया और स्वेच्छा से शरीर छोड़ दिया है । उनकी हत्या की खबर सुनते ही उनकी धर्मपत्नी लोना जी सदमे को बर्दाश्त न कर सकी और यह समाचार सुनते ही उनका देहान्त हो गया ।

गुरू रैदास की हत्या के बारे मे लेखक सतनाम सिंह ने अपनी पुस्तक मे प्रमाणिक दस्तावेजो के साथ उल्लेख करते हुए कुछ महत्वपूर्ण कारण बताये है जिसमे गुरू रैदास द्वारा ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनोती देना, मीरा को दीक्षा देना, वेदो का खण्डन करना, बहुजन (बहुजन (दलित))ो मे राजनैतिक चेतना जाग्रत करना, राजमहल मे ब्राह्मणो के वर्चस्व को चुनोती देना आदि प्रमुख कारण रहे थे । साथ ही लेखक सतनाम सिंह ने गुरू रैदास की हत्या के घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया है ।

वर्तमान समय मे गुरू रैदास के विचारो को अमली जामा पहनाने का कार्य करने वाले आधुनिक भारत के पितामाह डॉ. अम्बेडकर ने किया, जिसकी झलक आज के इस आधुनिक भारत के संविधान मे साफ दिखाई देता है ।

लेखक

कुशाल चौहान, एडवोकेट
मोबाइल 94142 44616
बिरसा फुले अम्बेडकर एसोसिएशन राजस्थान
पेज की दर्शक संख्या : 2703

फेसबुक पर एक लाख प्लस फोल्लोवेर्स होने पर दिलीप सी मंडल एव समस्त बहुजन भाइयों को हार्दिक मंगलकामनाएं *दिलीप मंडल की जुबानी अपनी कहानी* आप सभी से अनुरोध है की फेसबुक पर वर्तमान मूलविासी गुरु, पत्रकार एव मार्गदर्शक श्री दिलीप सी मंडल को फॉलो या ज्वाइन जरूर करें हर रोज उनके ज्ञानवर्धक वचन आँखें खोलने के लिए काफी हैं https://www.facebook.com/dilipc.mandal

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*दिलीप मंडल की जुबानी अपनी कहानी*

आज शायद पहली बार मेरी अपनी कहानी.

जब मैं पत्रकारिता में आया तो हर दिन कम से कम दस अखबार पढ़ता था.

*क्योंकि मेरे नाम के पीछे (सरनेम जो जाति बयां करता है) जो लगा है, उसके साथ अगर मैं अपने साथ वालों से दोगुनी जानकारी न रखता, तो मुझे बराबर का भी न माना जाता.*

बाकी लोग न पढ़कर भी जानकार माने जाने का सुख ले सकते थे.

उनका ज्ञानी होना स्वयंसिद्ध था.

*यह उनके टाइटिल में था. पिता के टाइटिल में था.*

जनसत्ता, कोलकाता में जब मैं काम करता था, तो न्यूज डेस्क पर सबके बराबर काम करता था.

यानी आठ से दस घंटे.

लेकिन इसके अलावा, ऑफिस आने से पहले, मैं हर रोज तीन-चार घंटे की रिपोर्टिंग अलग से करता था.

इसके अलावा ए़डिट पेज के लिए लेख भी लिखता था.

डेस्क के लोग आम तौर पर यह नहीं करते थे.

मैं हर रिपोर्टिंग दिन करता था. मेरा वर्किग आवर औरों से डेढ़ गुना था.

इस वजह से कम सोता था. यह मेरी च्वाइस थीं. वरना, मेरा भी काम सिर्फ ऑफिस वर्क से चल जाता.

*लेकिन मुझे सिर्फ काम नहीं चलाना था. सबके कम उम्र में संपादक बनना था.*

यह सब इसलिए बता रहा हूं कि

*अगर आप SC, ST, OBC हैं तो बाकियों के बराबर होने से काम नहीं चलेगा. औरों से दोगुना तक ज्यादा मेहनत करेंगे, उनसे बेहतर करेंगे, तब कहीं बराबर के माने जाएंगे.*

आपका ज्ञान, आपका पांडित्य स्वयंसिद्ध नहीं है.

*हर दिन उसे साबित करना पड़ेगा. बराबर होने से आपका काम नहीं चलने वाला. आपको ज्यादा करना होगा.*

इंडिया टुडे का पहला मैनेजिंग एडिटर होने के बावजूद, या तमाम शीर्ष पदों पर होने के बावजूद मेरा टैलेंट स्वयंसिद्ध नहीं है.

मीडिया की सबसे पॉपुलर किताब लिखने के बावजूद मेरी प्रतिभा स्वयंसिद्ध नहीं है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के लिए मेरा चैप्टर लिखना भी मुझे टैलेंटेड कहे जाने के लिए काफी नहीं है.

शायद मैं भारत का अकेला संपादक रहा, जिसने प्रिंट, टीवी और वेब तीनों जगह काम किया.

*पढ़ाया, किताबें लिखीं, देश भर की यूनिवर्सिटी में लैक्चर दिए, लेकिन आज भी मुझे अक्सर साबित करना पड़ता है कि मुझे मास कम्युनिकेशन की समझ है.*

इसलिए अब भी मैं नियमित लाइब्रेरी में पाया जाता हूं.

*मुझे आज भी साबित करना पड़ता है कि मुझे अपना काम आता है.*

इससे मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ है.

हमेशा अप-टू-डेट रहना पड़ता है. बहुत पढना पड़ता है, तो इसमें समस्या क्य़ा है?

यह तो अच्छी बात है.

है कि नहीं?

*दिलीप सी मंडल की फेसबुक वाल से*

 

chautha khamba dilip mandal

बौद्ध धम्म कोई धर्म नहीं हैं दोनों में फर्क है, इस फर्क को समझें बिना आप बौद्ध धम्म के सार को नहीं पा सकते , आईये समझें धम्म क्या है ….facebook page बुद्धकथाएँ

DHAMMA or DHARMAधम्म क्या है ?
धम्म पाली भाषा का एक शब्द है जैसे संस्कृत में धर्म वैसे पाली में धम्म.
परंतु महामानव गौतम बुद्ध का धम्म यह ब्राह्मण धर्म से बिलकुल अलग है ब्राह्मण धर्म आत्मा और परमात्मा पर आधारित है पर बुद्ध का धम्म विज्ञान पर जिस में आत्मा और परमात्मा के आस्तित्व को नकार दिया गया है ,इस लिए कुछ लोग बौद्ध धम्म को नास्तिको का धम्म भी कहते है
धर्म इंसान को देवतो के आस्तित्व को विशवास करने को मजबूर करता है ; पर बुद्ध का धम्म इंसान को आंतरिक मनोबल प्रदान करता है
धम्म मतलब सामाजिक विज्ञान. धम्म मतलब सामाजिक क्रांती. धम्म मतलब सामाजिक बंधुत्व, धम्म मतलब सामाजिक आत्म-सम्मान!
लोग धर्म को मानाने वाले हो सकते है लेकीन धम्म को मानाने वाले नहीं हो सकते क्योंकि धम्म इंसान को विज्ञानवादी बना देता है . धम्म का पालन करने वालो का दिमाग खुल जाता है अर्थात धम्म का पालन करने वाला यह जनता है की क्या उस के लिए अच्छा है और क्या बुरा वो आँख बंद कर किसी किताब का पालन नहीं करता क्यों की बुद्ध ने यह सिखाया ही नहीं है, बुद्ध का धम्म किसी किताब में कैद नहीं है क्यों बुद्ध ने बौद्ध धम्म को मानाने वाले लोगो को कोई किताब नहीं दी जिस से धम्म सीख जाये यह तो बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद संघ ने बुद्ध के उपदेशो को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें किताबो में संगृहीत करने की कोशिश की ,बुद्ध तो यह स्वयंम कहते थे की धार्मिक किताबो में समय के साथ कुछ ऐसे बाते जुड़ जाती है ,जो उस समय के हिसाब से अनुकूल नहीं है या फिर उन्हें किसी के द्वारा स्वयं के लाभ के लिए धार्मिक किताबो में जोड़ दिया गया है ,इस लिए धार्मिक किताब में लिखी हर बात को अपनी बुद्धि से परखो यह है बुद्ध का धम्म, धम्म से नैतिकता पर आधारित समाज की रचना होती है ,धम्म से लोग जागृत होते है,वह अन्याय सहन नहीं करते क्योंकी उन के पास सम्यक दृष्टी होती है बल्कि वह . अन्याय के विरुद्ध लड़ने को तैयार होते है . बंधु-भाव निर्माण होता है . प्रेम-जीव के प्रति. प्रेम का निर्माण होता है और इस प्रेम से समाज संरक्षित होता है
धम्म के कारन लोग समाज के उद्धार के लिए सतर्क और कार्यरत रहते है धम्म का पालन करने वाले लोग हमेशा सामाजिक अभ्यास करते है और जब कभी समता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व को कोई तत्व हानि पहुचते है तब वह सम्यक दृष्टि का इस्तेमाल करते हुए बुद्ध के तत्व को समाज में पुनः स्थापित करने के लिए जान लगा देते है
धर्म मतलब धर्म के लिए कुछ भी ,धर्म गर्व रखना सिखाता है ,पूजा पाठ करना सीखता है ,जाति पलना सीखता है ,व्रत सिखाता है ,जो चीज़ जो स्वयंम के स्वार्थ के लिए है वह सब सिखाता है और मनुष्यता तो भुला के केवल धर्म सिखाता है
उसी प्रकार धम्मांधता मतलब बौद्ध-धम्म के लिए कुछ भी करना ,अंद्धश्रद्धालु हो के पुजा-पाठ करना , धम्म तो सीखना पर धम्म का पालन न करना (धम्म को मानते है; धम्म की नही मानते), आपस में भेदभाव करना ,गुटो का निर्माण करना ,स्वयंम के स्वार्थ के लिए समाज को धोखा देना , बौद्ध धम्म पर गर्व करना ,बुद्ध को ईश्वर मान कर उन की पूजा करना ,बौद्ध-धम्म के बारे में जो बुरा बोलता है उस का अज्ञान न मिटा के उस पर प्रहार करना ,किसी दुसरे धर्म के लोगो पर बौद्ध धम्म लादना धम्मांधता है
ऐसा झूठा धम्म या धर्म को पालने वाले स्वयंम को ऊँचा समझते है ,अज्ञानी लोगो को गुलाम समझते है ,उन्हें लगता है की वह धम्म का पालन कर रहे है इस लिए वह महान है ,और जो धम्म का पालन नहीं कर रहे वह मुर्ख है ,ऐसा सोचना समाज के लिए घातक है ,धोखादायी है , अगर तुम धम्म को पालते हो तो दुसरो का अति इस को सहना सीखना होगा उस के लिए पर्यटन करना होगा ,लोगो को खुद को हीन समझने दे कर तुम धम्म का अपमान कर रहे हो,सामाजिक भेदभाव पाल कर तुम धम्म का अपमान कर रहे हो,फिर दूसरे धर्मो में और तुम्हारे धम्म में क्या अंतर है
बौद्ध-धम्म में ऐसा कुछ करना गलत है , . धम्म मतलब बौद्ध लोगो की अस्मिता वह धम्म बदनाम हो ऐसे काम नहीं करने चाहिए
धम्म मनुष्य के लिए है ,मनुष्य धम्म के लिए नहीं है ऐसा बाबा साहेब ने कहा है
बुद्ध ने भी कभी अपना धम्म किसी पर नहीं लादा,पहले उसे खुद पर परखा फिर दुसरो को सिखाया
बौद्ध धम्म तर्क करने लगता है ,समाज के लिए जो सही है वह करना सिखाता है ,समाज का अज्ञान दूर करना है यह बताता है दुसरो को ज्ञानी बनाना यह सिखाता है
समाज के कल्याण के लिए जो कुछ करता है वह धम्म है
बौद्ध धम्म मतलब अन्याय के विरुद्ध लड़ाई ,अधम्म मतलब समाज पर होने वाले अर्थिक, मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक शोषण. इस शोषण के विरुद्ध, या इस अन्याय के विरुद्ध अगर हम नहीं लड़े तो हमारे बौद्ध होने का क्या मतलब ?
धम्म एक वैचारिक लड़ाई है ,. धम्म बताता है बुद्धि की में शरण जा! बुद्धि का उपयोग कर के समाज में क्या बुराई है यह पता चलता है और उस को सुधरने का उपाय भी आता है
. धम्म बताता है की धम्म की शरण में लोक-कल्याण के मार्ग पर चलो . धम्म बताता है संघटित रहो मतलब समाज की रक्षा करो ; न्याय और समता के लिए संघर्ष करो .
“Give a man a Fish, and you feed him for a day; show him how to catch fish, and you feed him for a lifetime”.
इस उक्ति में ही धम्म है ,एक व्यक्ति को आप दान करो वह धर्म है ,लेकिन एक व्यक्ति को उस की आजीविका के लिए कुछ काम सीखना , उस में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का निर्माण करना ,उसे जीवन भर भीख न मागते हुए .सम्यक मार्ग पे चलते हुए उस के जीवन भर पेट भरने का प्रबोधन देना यही धम्म है

 

राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर – तीन अध्ययन लेखक – कँवल भारती प्रथम संस्करण – जनवरी 2007

राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर : संदर्भ बौद्धधर्म …..कँवल भारती 

ambedkar making buddhis
भारत में आधुनिक बौद्धधर्म तीन महान व्यक्तियों का ऋणी है। यानी, जिस बौद्धधर्म को ब्राह्मणवाद ने भारत की धरती से खदेड़ दिया था, उन्नीसवीं शताब्दी में उसका पुनरुद्धार तीन महान लोगों ने किया। ये महान लोग थे- अनागरिक धर्मपाल, महापंडित राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर। धर्मपाल श्री लंका के थे। वे 1891 में भारत आये थे और यहां सारनाथ और बोधगया की दुर्दशा देख कर उनके उद्धार के लिये यहीं रुक गये थे। उन दिनों बौद्धों के तीर्थ स्थल ब्राह्मण महन्तों के कब्जे में थे। लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ कर उन्होंने कई बौद्ध मन्दिरों को ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त कराये और बौद्धों को सौंपे थे। सारनाथ में उन्हीं के नेतृत्व में खुदाई कार्य किया गया था और उसी खुदाई के परिणाम स्वरूप आज के धम्मेख स्तूप का अस्तित्व सामने आया था। बोध गया का मन्दिर बौद्धों को सौंपे जाने की लड़ाई भी उन्होंने ही लड़ी थी, जो अभी तक जारी है। यही धर्मपाल जी 1893 में शिकागो में होने वाली विश्वधर्म संसद में स्वामी विवेकानन्द को अपने साथ लेकर गये थे। धर्मपाल जी दर्शन और इतिहास के लेखक नहीं थे, पर भारत में प्राचीन बौद्ध स्थलों को खोजने और उनका पुनरुद्धार करने का एक मात्र श्रेय उन्हीं को जाता है।1

आधुनिक भारत में बौद्धधर्म के पुनरुद्धार पर जब भी चर्चा चलती है, तो धर्मपाल जी का नाम राहुल और आंबेडकर से पहले आता है। धर्मपाल जी ने यदि बौद्ध स्तूपों, विहारों और मन्दिरों का उद्धार और निर्माण कराया, तो राहुल सांकृत्यायन को लुप्त बौद्ध साहित्य की खोज करने का श्रेय जाता है। उन्होंने तिब्बत की यात्रा की और वहां से 18 खच्चरों पर लाद कर बौद्ध साहित्य भारत लाये, जो पटना के संग्रहालय में आज भी सुरक्षित है। यह साहित्य तिब्बती भाषा में है, जिसका उन्होंने संस्कृत और फिर हिन्दी में अनुवाद किया। आज हिन्दी में अधिकांश त्रिपिटक राहुल जी की ही देन है। यदि राहुल जी ने यह महत्वपूर्ण कार्य न किया होता, तो भारत में हिन्दी में बौद्ध साहित्य का सचमुच अभाव होता। लेकिन बौद्ध साहित्य और विहारों का तब तक कोई महत्व नहीं है, जब तक उनकी सुरक्षा के लिये आस्थावान बौद्ध समुदाय का अस्तित्व न हो। भारत में बौद्ध समुदाय के अभाव की पू£त डा. बाबासाहेब आंबेडकर ने की। उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में बौद्धधर्म में धर्मान्तरण करकेे लाखों दलितों को बौद्धधर्म में दीक्षित होने की प्रेरणा दी। इसी प्रेरणा के परिणाम स्वरूप आज भारत में बौद्धों की संख्या लगभग दस लाख है।
rahul_sankrityayan_1893-1963

2

राहुल सांकृत्यायन सनातनी हिन्दू साधु (रामोदार स्वामी) के रूप में घुमक्कड़ी करते हुए, आर्य समाजी हो गये थे। एक आर्य समाजी के रूप में वे वेद और निराकार ईश्वर में सारी समस्याओं का हल देखते थे। इस सम्बन्ध में उनके विचार इस प्रकार थे- ‘‘उस समय मैं आर्य समाज के गर्मदली विचारों का समर्थक था, इसके सिवाय वेद के ईश्वरीय होने में किसी की आपत्ति को मैं सहन करने के लिये तैयार न था। वेद में रेल, तार, विमान की बातें मुझे सच्ची मालूम होतीं, यद्यपि अभी तक मैंने उनकी पूरी छानबीन न की थी। आर्य समाजी को अपने लिये हिन्दू कहना मैं शर्म की बात समझता था। आर्य धर्म हिन्दूधर्म से उतना ही दूर है, जितना ईसाई और इस्लामधर्म, यह मैं बराबर कहा करता। भारत पर आर्यधर्म का विशेष अधिकार है। उसकी उन्नति और स्वतन्त्रता आर्यधर्म और एक जातीयता की स्थापना से ही हो सकती है, इसके साथ मैं यह भी समझता था कि आज यद्यपि सभी धर्मानुयायियों का एक हो जाना असम्भव मालूम होता है, किन्तु आर्यधर्म की सत्यता को रोका नहीं जा सकता। विज्ञान के साथ कुछ झूठे विज्ञान भी संसार में खोटे सिक्कों की भांति चल रहे हैं, ऐसे ही झूठे विज्ञानों में डा£वन के विकासवाद को भी मैं समझता था। जब पंडित आत्माराम अमृतसरी की विकासवाद के खण्डन पर लिखी गयी पुस्तक मिली, तो मुझे बड़ी खुशी हुई।’’2 वे आर्यसमाज के सिद्धान्त को ध्रुव सत्य और दयानन्द के एक-एक वाक्य को वेदवाक्य मानते थे।3
ये विचार 22 वर्ष के एक तरुण (1915) के थे, पर 27 वर्ष के होते-होते बौद्धधर्म को जानने की जिज्ञासा उनमें पैदा हो गयी थी। उन्हीं के शब्दों में, (1921) ‘‘आर्य समाज का प्रभाव रहने से सिद्धान्त में मैं द्वैतवादी हो रामानुज का समर्थक रहा। इसी दार्शनिक ऊहापोह में बौद्ध दर्शन के लिये अधिक जिज्ञासा उत्पन्न हो गयी, रामानुज और शंकर की ओर से, अन्ततः वर्णाश्रम धर्म का श्राद्ध करके दार्शनिक खंडन द्वारा ही बौद्धों का विरोध किया जाता था। और दार्शनिक सिद्धान्तों में रामानुजीय शंकर को प्रच्छन्न बौद्ध कहते थे, फिर बौद्ध दर्शन क्या है, इधर ध्यान जाना जरूरी था, और पूर्वपक्ष के तौर पर उद्धृत कुछ वाक्यों से मेरी तृप्ति नहीं हो सकती थी।’’4
यह जिज्ञासा और तृप्ति 34 वर्ष की अवस्था में तब पूरी हुई, जब वे (1927) लंका गये और वहां के विद्यालंकार विहार में 19 मास तक रहे। वहां उन्हें पाली त्रिपिटक में बुद्ध वचनों को पढ़ने का अवसर मिला। उस मनः स्थिति का वर्णन उन्होंने इन शब्दों में किया है- ‘‘फिर राख में छिपे अंगारों या पत्थरों से ढँके रत्न की तरह बीच-बीच में आते बुद्ध के चमत्कारिक वाक्य मेरे मन को बलात् अपनी ओर खींच लेते थे। जब मैंने कालामों को दिये गये बुद्ध के उपदेश- किसी ग्रन्थ, परम्परा, बुजुर्ग का ख्याल कर उसे मत मानो, हमेशा खुद निश्चय करके उस पर आरूढ़ हो- को सुना, तो हठात् दिल ने कहा- यहां है एक आदमी, जिसका सत्य पर अटल विश्वास है, जो मनुष्य की स्वतन्त्र बुद्धि के महत्व को समझता है। जब मैंने मज्झिम निकाय में पढ़ा- बेड़े की भाँति मैंने तुम्हें धर्म का उपदेश किया है, वह पार उतरने के लिये है, सिर पर ढोये-ढोये फिरने के लिये नहीं; तो मालूम हुआ, जिस चीज को मैं इतने दिनों से ढूँढ़ता फिर रहा था, वह मिल गयी।’’5
अब ईश्वर और वेद भी उनसे छूट गये थे। मन की इस दशा पर उन्होंने आगे लिखा है- ‘‘अब मेरे आर्य सामाजिक और जन्मजात विचार छूट रहे थे। अन्त में, इस सृष्टि का कत्र्ता भी है, सिर्फ इस पर मेरा विश्वास रह गया था। किन्तु अब तक मुझे यह नहीं मालूम था कि मुझे बुद्ध और ईश्वर में से एक को चुनने की चुनौती दी जायगी। मैंने पहिले पहिल कोशिश की, ईश्वर और बुद्ध दोनों को एक साथ ले चलने की, किन्तु उस पर पग-पग पर आपत्तियां पड़ने लगीं। दो-तीन महीने के भीतर ही मुझे यह प्रयत्न बेकार मालूम होने लगा। ईश्वर और बुद्ध साथ नहीं रह सकते, यह साफ हो गया, और यह भी स्पष्ट मालूम होने लगा कि ईश्वर सिर्फ काल्पनिक चीज है, बुद्ध यथार्थवक्ता हैं। तब, कई हफ्तों तक हृदय में एक दूसरी बेचैनी पैदा हुई- मालूम होता था, चिरकाल से चला आता एक भारी अवलम्ब लुप्त हो रहा है। किन्तु मैंने हमेशा बुद्ध को अपना पथप्रदर्शक बनाया था, और कुछ ही समय बाद उन काल्पनिक भ्रान्तियों और भीतियों का ख्याल आने से अपने भोलेपन पर हँसी आने लगी। अब मुझे डा£वन के विकासवाद की सच्चाई मालूम होने लगी, अब माक्र्सवाद की सच्चाई हृदय और मष्तिष्क में पेबस्त जान पड़ने लगी।’’6
इस प्रकार राहुल जी 1915 से 1927 तक आर्य समाजी रहे। पर, लंका में रहते ही वे बुद्ध के अनुयायी हो गये थे। उनमें तिब्बत जाकर बौद्ध साहित्य को खोज कर लाने की भी जिज्ञासा पैदा हो गयी थी। अतः तिब्बत में सवा वर्ष बिताने के बाद, जब वे 1930 में दूसरी बार लंका गये, तो वे विधिवत उपसम्पदा लेकर बौद्धधर्म में प्रब्रजित हो गये थे। अपनी प्रब्रज्या का वर्णन उन्होंने इन शब्दों में किया है- ‘‘उपसम्पदा के लिये कांडी जाने से पहले विद्यालंकार विहार में नायकपाद के उपाध्यायत्व में मेरी प्रब्रज्या (22 जून) हुई। मैं लंका में रामोदार स्वामी के नाम से प्रसिद्ध था, और लंका छोड़ने से पूर्व ही अपने गोत्र को जोड़कर अपने को रामोदार सांकृत्यायन बना चुका था। मैं समझता था, यही नाम बना रहेगा, क्योंकि इस नाम से मैं साहित्यिक क्षेत्र में अवतीर्ण हो चुका था, किन्तु प्रब्रज्या संस्कार शुरु होने के चन्द ही मिनट पहले नायकपाद की आज्ञा हुई नये नामकरण की। समय होता, तो मैं समझाने की कोशिश करता, किन्तु अब कुछ करना आज्ञा भंग होता। नाम शायद एकाध और पेश किये गये थे, किन्तु मैंने रामोदार के ‘रा’ की साम्यता के देखते हुए राहुल नाम का प्रस्ताव किया और वह स्वीकृत हुआ। इस प्रकार राहुल सांकृत्यायन के नाम से मैं प्रब्रजित (श्रामणेर) हुआ।’’7
ऊपर राहुल जी का वक्तव्य बताता है कि उन्हें बुद्ध के दर्शन ने इतना प्रभावित किया कि न केवल डा£वन के विकासवाद में उनको सच्चाई नजर आने लगी थी, बल्कि माक्र्सवाद की सच्चाई भी उनके हृदय और मस्तिष्क में पेबस्ता जान पड़ने लगी थी। उस समय तक वे समाजवादी व्यवस्था के महत्व को समझने लगे थे और बद्ध उन्हें स्वतन्त्रता, समानता और करुणा (भ्रातृत्व) के समर्थक एवं जनतन्त्र के पक्षधर के रूप में दिखायी देने लगे थे। वे बुद्ध के प्रजातांत्रिक विचारों से बहुत ज्यादा प्रभावित हुए थे। उन्होंने एक जगह लिखा है- ‘‘बुद्ध का जन्म एक प्रजातन्त्र (शाक्य) में हुआ था, और मृत्यु भी एक प्रजातन्त्र (मल्ल) ही में हुई। प्रजातन्त्र प्रणाली उनको कितनी प्रिय थी, यह इसी से मालूम है कि अजातशत्रु के साथ अच्छा सम्बन्ध होने पर भी उन्होंने उसके विरोधी वैशाली के लिच्छवियों की प्रशंसा करते हुए राष्ट्र को अपराजित रखने वाली (ये) सात बातें बतलायीं- (1) बराबर एकत्रित हो सामूहिक निर्णय करना, (2) निर्णय के अनुसार कर्तव्य को एक हो करना, (3) व्यवस्था (कानून और विनय) का पालन करना, (4) वृद्धों का सत्कार करना, (5) स्त्रियों पर जबरदस्ती नहीं करना, (6) जातीय धर्म का पालन करना, (7) धर्माचार्यों का सत्कार करना।’’8
लेकिन राहुल माक्र्सवादी दर्शन का भी इस काल में बराबर अध्ययन कर रहे थे और बुद्ध का विचार-स्वतान्त्रय इस अध्ययन में उनकी सहायता कर रहा था। इसलिये, उन्होंने बौद्धधर्म का द्वन्द्वात्मक अध्ययन किया और वे माक्र्सवाद की ओर मुड़ गये। हालांकि, बुद्ध और उनके धर्म के प्रति उनका अनुराग कभी खत्म नहीं हुआ था, पर भिक्षुवेश उन्होंने त्याग दिया था।9 भदन्त बोधानन्द के प्रति अपने संस्मरण लेख में इसका जिक्र उन्होंने इन शब्दों में किया है- ‘‘त्रिपिटक में कुछ अधिक प्रवेश करते ही वेद, ईश्वर और आर्यसमाज ने साथ छोड़ दिया, मैं अनीश्वरवादी नास्तिक बन गया। बुद्ध और उनकी शिक्षाओं के प्रति मेरा अनुराग हो गया। उसके बाद तो कोई धर्म मुझे आकृष्ट नहीं कर सका। बुद्ध से अगली मंजिल में माक्र्स मुझे मिले। भौतिकवाद मेरा दर्शन हो गया। पर, बुद्ध के मधुर व्यक्तित्व का आकर्षण मेरे मन से कभी नहीं गया।’’10
राहुल की जीवन-यात्रा एक स्थान या एक विचार पर स्थिर रहने वाली नहीं थी। वे ऐसे प्रगतिशील थे, जो खूंटे से बँधकर नहीं रह सकते थे। अतः बौद्धधर्म के प्रति अपने लगाव के भविष्य को वे जानते थे। इसलिये, जब अनागारिक धर्मपाल ने उन्हें धर्म प्रचारक बनाने के लिये उन पर दबाव डालने के लिये कई पत्र लिखे, तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। उस स्थिति का वर्णन करते हुए उन्होंने अपनी ‘जीवन यात्रा’ में लिखा है- ‘‘कोई समय था कि जब मैं धर्मप्रचारक बनने का तीव्र अनुरागी था, लेकिन अब अवस्था बिल्कुल बदल गयी थी। बौद्धधर्म के साथ भी मेरा कच्चे धागे का ही सम्बन्ध था। हाँ बुद्ध के प्रति मेरी श्रद्धा कभी कम नहीं हुई। मैं उन्हें भारत का सबसे बड़ा विचारक मानता रहा हूँ और मैं समझता हूँ कि जिस वक्त दुनिया के धर्म का नामोनिशान न रह जायगा, उस वक्त भी लोग बड़े सम्मान के साथ बुद्ध का नाम लेंगे।’’11 उन्होंने आगे लिखा है- ‘‘मैंने उनके वचनों के पढ़ने के बाद समझा कि वह भी दुनिया के साम्यवादी बनने का सपना देखते थे।’’12
राहुल ने बुद्ध के धर्म का बेड़े की तरह पार उतरने के लिये ही उपयोग किया। वे विचारों से माक्र्सवादी हो चुके थे, पर अभी भिक्षुवेश उन्होंने नहीं त्यागा था। उसका उपयोग उन्होंने लन्दन, नेपाल और बौद्ध देशों की यात्राओं के लिये किया और उसके बाद भिक्षुवेश भी त्याग दिया था।
 वे सामन्तवाद और पूंजीवाद की चक्की में पिस रही आम जनता की मुक्ति के दृष्टिकोण से धर्म को देखने लगे थे। इस दृष्टिकोण से बौद्धधर्म के भी अनेक सिऋान्तों से उनकी असहमति बन गयी थी। वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि बुद्ध तत्कालीन समाज व्यवस्था में हस्तक्षेप नहीं करना चाहते थे।13 उनका मत था कि ‘‘(बुद्ध ने) दुःख और उसकी जड़ को समाज में न ख्याल कर व्यक्ति में देखने की कोशिश की। भोग की तृष्णा के लिये, राजाओं, क्षत्रियों, ब्राह्मणों, वैश्यों, सारी दुनिया को झगड़ते मरते-मारते देख भी उस तृष्णा को व्यक्ति से हटाने की कोशिश की।’’14
बुद्ध के क्षणिकवाद के दर्शन से राहुल जी सहमत थे, पर उनकी टिप्पणी थी कि इस क्षणिकवाद को उन्होंने समाज की आ£थक व्यवस्था पर लागू नहीं किया था।15 वे इसका कारण बताते हैं कि ऐसा उन्होंने राजाओं और सेठों को अप्रसन्न करने के उद्देश्य से नहीं किया। वे लिखते हैं- ‘‘पुरोहित वर्ग के कूटदंत, सोणदंत जैसे धनी प्रभुताशाली ब्राह्मण उनके (बुद्ध के) अनुयायी बनते थे, राजा लोग उनकी आवभगत के लिये उतावले दिखायी पड़ते थे। उस वक्त का धन कुबेर व्यापारी-वर्ग तो उससे भी ज्यादा उनके सत्कार के लिये अपनी थैलियाँ खोले रहता था, जितने कि आज के भारतीय महासेठ गाँधी के लिये। दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम भारत के साथ व्यापार के महान केन्द्र कौशाम्बी के तीन भारी सेठों ने तो विहार बनवाने में होड़ सी कर ली थी। सच तो यह है कि बुद्ध के धर्म को फैलाने में राजाओं से भी अधिक व्यापारियों ने सहायता की। यदि बुद्ध तत्कालीन आ£थक व्यवस्था के खिलाफ जाते, तो यह सुभीता कहाँ से हो सकता था।’’16

3

लेनिन के इस सिद्धान्त को कि धर्म व्यक्ति का निजी मामला है या उसे निजी मामला होना चाहिए, हम आम आदमी पर तो लागू कर सकते हैं, पर विशिष्ट व्यक्ति पर इस सिद्धान्त को लागू नहीं किया जा सकता और लागू किया जाना चाहिए भी नहीं, क्योंकि विशिष्ट व्यक्ति या वह व्यक्ति, जिससे लाखों करोड़ों लोग प्रेरणा लेते हों, जिसके अनुयायी हों, अगर वह धर्मगुरु नहीं है और दुनिया को बदलने की शिक्षा देता है, तो वह, धर्म को अपना निजी मामला नहीं बना सकता। राहुल सांकृत्यायन एक धर्मगुरु या धर्मप्रचारक की भूमिका त्याग कर दुनिया को बदलने की भूमिका में उतरे थे, तो धर्म को देखने की उनकी दृष्टि वही नहीं रह गयी थी, जो एक सनातनी और आर्य समाजी प्रचारक की होती है। वे लाखों दीन-दुखियों के हित में धर्म के सिद्धान्तों को अलौकिक नहीं, लौकिक आधार पर परखने लगे थे। इसलिये जनता के सामाजिक और आ£थक शोषण पर जीवित रहने वाले धर्म उनके लिये घृणास्पद थे।
डा. आंबेडकर भी धर्म को अछूतों की दृष्टि से देखते थे। वे हिन्दूधर्म का विरोध इसी आधार पर करते थे कि वह सामाजिक अलगाववाद का समर्थन करता है और मानवता के एक विशाल समुदाय को समस्त मानवाधिकारों से वंचित रखता है। वे दलितों के साथ अमानवीय व्यवहार करने की शिक्षा देने वाले हिन्दूधर्म को धर्म के नाम पर कलंक मानते थे।17 उन्होंने लिखा है, ‘‘अछूतों की समस्या का सीधा सम्बन्ध हिन्दुओं के सामाजिक व्यवहार से है। अस्पृश्यता तभी मिटेगी, जब हिन्दू अपनी मनोवृत्ति बदलेंगे। समस्या यह है कि वह कौन सा तरीका है, जिससे हिन्दू जीवन-शैली को भुला दें। यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं है कि कोई समूचा राष्ट्र अपनी बंधी-बंधायी जीवन-शैली को त्याग दे। हिन्दू जिस जीवन-शैली के आदी हैं, वह ऐसी है, जिसे उनका धर्म प्रमाणित करता है। अतः उनकी जीवन-शैली को बदलना उनके धर्म को बदलने जैसा ही है।’’18
यहां आंबेडकर स्पष्ट रूप से इस मत के हैं कि हिन्दूधर्म को सुधारा नहीं जा सकता, उसे छोड़ा जा सकता है।19 उन्होंने हिन्दूधर्म में सुधार के लिये लम्बे समय तक संघर्ष किया, पर उन्हें सफलता नहीं मिली और अन्ततः उन्हें हिन्दूधर्म को छोड़ने की घोषणा करनी पड़ी। उन्होंने 1935 में (15 अक्टूबर) बम्बई में कहा, ‘‘हमने अभी यह तय नहीं किया है कि कौन सा धर्म हम अपनायेंगे, पर यह हमने तय कर लिया है कि हिन्दूधर्म हमारे लिये अच्छा नहीं है।’’20
यह निर्णय आंबेडकर ने कवीथा काण्ड के प्रतिरोध में लिया था। पूना-पैक्ट के तीन साल बाद 1935 में यह काण्ड हुआ। बम्बई सरकार ने उस समय सार्वजनिक स्कूलों में अछूतों के बच्चों को प्रवेश देने के आदेश जारी किये थे। 8 अगस्त 1935 को कवीथा गांव के अछूत अपने चार बच्चों को स्कूल में दाखिल कराने के लिये ले गये। इसके विरोध में सभी हिन्दुओं ने अपने बच्चों को स्कूल से हटा लिया और रात में घात लगा कर अछूतों की बस्ती पर डंडों, भालों और तलवारों से हमला कर दिया। बाद में हिन्दुओं ने सभी अछूतों का सामाजिक बहिष्कार भी कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि अछूत पीने के पानी तक के लिये तरस गये। इसके विरुद्ध अछूतों ने मजिस्ट्रेट के यहां मुकदमा दायर कर दिया। इस घटना ने अछूतों में दहशत भर दी। वल्लभ भाई पटेल हिन्दुओं को यह समझाने गये कि वे अछूतों पर जुल्म न करें, पर उन्होंने उनकी एक न सुनी। गांधी जी ने अछूतों को यह सलाह दी कि वे गांव छोड़ दें।21 इस प्रकार, इस संघर्ष में अछूतों को ही दबाया गया। आंबेडकर लिखते हैं कि जब भी हिन्दू अराजकता पर उतर आते हैं, तो अछूत हमेशा ही असहाय हो जाते हैं।22
 आंबेडकर की घोषणा की प्रतिक्रिया में गांधी ने नासिक में कहा कि धर्म कोई मकान या वस्त्र नहीं है, जिसे बदला जा सके, धर्म आदमी का जरूरी अंग है। इसका उत्तर आंबेडकर ने इन शब्दों में दिया, ‘‘मैं गांधी जी से सहमत हूँ कि धर्म जरूरी है, परन्तु मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ कि आदमी को अपने उस पुश्तैनी धर्म से चिपटा रहना चाहिए, जो उसके लिये घृणास्पद हो, अपमानजनक हो और उसे आगे बढ़ने की कोई प्रेरणा न देता हो।’’23 उन्होंने आगे कहा कि कवीथा में जो हुआ, वह अनोखी घटना नहीं है, वह हिन्दुओं के पुश्तैनी धर्म में मौजूद व्यवस्था पर आधारित है।24 इस धर्म को दलितों को छोड़ना ही होगा।25
राहुल के सामने उनका कोई जातीय समाज नहीं था, जिसे वे बदलना चाहते थे। वे ब्राह्मण थे, पर ब्राह्मणों को सुधारने या उनकी मुक्ति के (किसी कार्यक्रम के) दायित्व से मुक्त थे। किन्तु आंबेडकर इस दायित्व से मुक्त नहीं थे। उनके सामने उनका विशाल अछूत समाज था, जिसे हिन्दुओं और उनके धर्म ने मानवीय गरिमा और अधिकारों से वंचित करके रखा था। इसलिये, आंबेडकर आरम्भ से ही इस खोज में रहे कि धर्म का अर्थ क्या है, हिन्दूधर्म से अछूत समुदाय का क्या सम्बन्ध है? और कोई दूसरा धर्म उनकी स्थिति को बदल सकता है या नहीं?
राहुल भले ही यह नहीं देख सके थे कि ब्राह्मण हिन्दूधर्म और उसकी व्यवस्था को क्यों पसन्द करते थे और क्यों उसमें कोई सुधार नहीं चाहते थे? किन्तु, आंबेडकर ने यह अच्छी तरह देख लिया था कि हिन्दुओं की वर्णव्यवस्था ब्राह्मणों के लिये स्वर्ग की व्यवस्था है, जिसमें वे सबसे श्रेष्ठ और सबसे पूज्य बने हुए हैं। वे यह भी देख रहे थे कि हिन्दू अछूतों पर इसलिये अत्याचार नहीं करते हैं कि वे क्रूर हैं, बल्कि इसलिये करते हैं, क्योंकि उनका धर्म उन्हें ऐसा करने की शिक्षा देता है।26 एक स्थान पर आंबेडकर ने लिखा है, ‘‘हिन्दू चाहे स्त्री हो या पुरुष, वह जो कुछ करता है, धर्म के अनुसार करता है। वह खाता धर्म के अनुसार है, पीता धर्म के अनुसार है, नहाता धर्म के अनुसार है, पहनता धर्म के अनुसार है, उसका जन्म धर्म के अनुसार होता है, विवाह धर्म के अनुसार होता है और धर्म के अनुसार ही उसे जलाया जाता है। उसके सारे कार्य धर्मानुसार होते हैं। धर्मनिरपेक्षता के दृष्टिकोण से येे काम गलत हो सकते हैं, पर ये इसलिये पापपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि ये धर्म द्वारा स्वीकृत हैं। इसलिये यदि कोई हिन्दू पाप का अभियुक्त होता है, तो वह गर्व से कहता है कि यदि मैं पाप करता हूँ तो पाप भी धर्म के अनुसार कर रहा हूँ।’’27
आंबेडकर अपने अध्ययन में इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि अछूतों के लिये हिन्दूधर्म इसलिये अमानवीय है, क्योंकि अछूत हिन्दू समाज के अंग नहीं हैं। दूसरे शब्दों में वे हिन्दूधर्म के बाड़े से बाहर के हैं। आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘हिन्दुओं और अछूतों के बीच क्या सम्बन्ध है, इसकी सटीक व्याख्या बम्बई के एक सम्मेलन में सनातनी हिन्दुओं के नेता ऐनापुरे शास्त्री ने की है। उन्होंने कहा कि हिन्दुओं के साथ अछूतों का सम्बन्ध वैसा ही है, जैसा किसी मनुष्य का उसके जूतों के साथ होता है। आदमी जूते पहनता है, इस दृष्टि से वह मनुष्य के साथ है और कहा जा सकता है कि वह मनुष्य के हैं। लेकिन जूते शरीर का अंग नहीं है, क्योंकि जिन दो चीजों को किसी इकाई से अलग किया जा सकता है, उन्हें उस इकाई का अंग नहीं कहा जा सकता।’’28
 आंबेडकर की दृष्टि में यह एक अत्यन्त सटीक उपमा थी।29 उनके पास इसका मजबूत आधार भी है। उनके अनुसार, अछूत वर्णव्यवस्था के अंग नहीं है। वे उसके बाहर के हैं, अर्थात् अवर्ण हैं। वे लिखते हैं, ‘‘हिन्दू विधान के निर्माता मनु ने अपने नियम में कहा है कि वर्ण केवल चार हैं और पांचवाँ वर्ण नहीं होगा। मनु अछूतों को उस भवन में प्रवेश दिलाने को तैयार नहीं थे, जिसे प्राचीन हिन्दुओं ने वर्णव्यवस्था में विस्तार कर उसे पांच वर्णों के लिये बनाना चाहा था। मनु ने अछूतों को वर्ण बाह्य कह कर वर्णव्यवस्था से बाहर रखा है। आदिम और जरायम पेशा जातियों के विरुद्ध हिन्दू समाज में प्रवेश के लिये कोई निश्चित वर्जना नहीं है। वे कालान्तर में उसके सदस्य बन सकते हैं। फिलहाल वे हिन्दू समाज से जुड़े हैं और उसके बाद वे उसमें घुलमिल सकते हैं तथा उसका अंग बन सकते हैं। लेकिन अछूतों की स्थिति अलग है। हिन्दू समाज में उनके विरुद्ध निश्चित वर्जना है। उसके सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है। उन्हें अलग-थलग ही रहना होगा और वे हिन्दू समाज का अंग न हैं और न बन सकते हैं।’’30 वे अन्यत्र कहते हैं हिन्दू भी यह जानते हैं कि अछूत उनके समाज के अंग नहीं हैं। यही कारण है कि हिन्दुओं में नैतिक दृष्टि से अछूतों के प्रति कोई चिन्ता या ममत्व नहीं होता है।’’31
 आंबेडकर की सबसे बड़ी चिन्ता थी कि अछूत अनेकों जातियों-उपजातियों में विभाजित हैं और उनके बीच मौजूद सामाजिक भेदभाव उन्हें एक नहीं होने देता। हिन्दू समाज में ब्राह्मण एक वर्ग है, क्षत्रिय एक वर्ग है और वैश्य एक वर्ग है। प्रत्येक वर्ग में अनेक जातियाँ होने के बावजूद उनके बीच सामाजिक अलगाव नहीं है, वरन् रोटी-बेटी का सम्बन्ध है। इनमें से प्रत्येक वर्ग में अपनी ही जाति में विवाह व£जत है। (मिश्रा-मिश्रा में नहीं, शुक्ला में विवाह करेगा।) किन्तु यही वर्ण चेतना शूद्रों और अछूतों में नहीं है, जिसके कारण उनमें सामाजिक एकता का सदैव अभाव रहता है।
इसलिये आंबेडकर ऐसे धर्म की तलाश में थे, जो निम्न जातियों को एक वर्ग में संगठित कर दे और उनका सांस्कृतिक विकास करे। वे इस मत के नहीं थे, जैसा कि कुछ लोग मानते हैं कि धर्म समाज के लिये आवश्यक नहीं है। वे जीवन और सामाजिक आचरण के लिये धर्म को आवश्यक मानते थे।32 वे कहते थे कि धर्म अफीम नहीं है, जैसा कि कुछ लोगों द्वारा कहा जाता है। पर, वे धर्म के नाम पर पाखण्ड को स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं थे।33 वे कहते थे कि आदमी सिर्फ रोटी खाकर जीवित नहीं रह सकता। उसके पास एक मन भी है, जिसे विचार के लिये आहार चाहिए। यह आहार उसे धर्म से ही मिलता है। धर्म ही उसे आशावादी बनाता है और आगे बढ़ने की शक्ति देता है।34 उनकी दृष्टि में धर्म और दासता दो परस्पर विरोधी चीजें थीं। कोई भी धर्म, जो आदमी को दास बनाता है, वह उनके लिये धर्म नहीं था।35
आंबेडकर ने अपने सिद्धान्त के आधार पर सभी धर्मों पर विचार किया- न केवल ईसाई और इस्लाम धर्मों पर, बल्कि आर्य समाज और सिख धर्म के बारे में भी।36 मई 1936 में कोलम्बो से एक इटैलियन बौद्ध भिक्षु लोकनाथ ने भारत आकर आंबेडकर से भेंट की और उन्हें इस बात पर सहमत करने की कोशिश की कि यदि अछूत लोग बौद्धधर्म ग्रहण कर लेते हैं, तो वे समाज में नैतिक, धा£मक और सामाजिक रूप से उच्चतर स्तर प्राप्त कर लेंगे। यद्यपि आंबेडकर ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया था,37 पर बौद्धधर्म के प्रति उनमें सम्मान का भाव पहले ही से था।38
इस विषय पर आंबेडकर का अध्ययन निरन्तर चल रहा था। वे अस्पृश्यता के उद्गम के ऐतिहासिक आधार को भी देखना चाहते थे, ताकि जिस धर्म को वे स्वीकार करें, उसमें अछूतों की ऐतिहासिक संगति भी बैठ सके। शीघ्र ही उन्होंने अपना एक लम्बा साक्षात्कार ‘दि बाम्बे क्राॅॅनिकल’ को दिया, जो उसके 24 फरवरी 1940 के अंक में प्रकाशित हुआ।39 इस साक्षात्कार में उन्होंने रहस्योद्घाटन किया कि वैदिक काल में और उसके बाद शताब्दियों तक अस्पृश्यता का अस्तित्व नहीं मिलता है। इसका बहुत बाद में उद्गम हुआ और इसका सम्बन्ध बौद्धधर्म के बाद परिवर्तनों से पैदा हुई परिस्थितियों से है। उन्होंने उस युग का उल्लेख किया, जब कुछ लोग अपने ऋषि आधारित जीवन के लिये एक जगह बस गये थे, पर बहुत से दूसरे लोग अपने पशुओं के चारे के लिये जगह-जगह घूमते रहते थे। बसे हुए किसानों को अपनी भूमि, मकान और फसल की सुरक्षा घुमन्तु लोगों से करनी होती थी। इससे बचने और शान्ति पूर्ण जीवन जीने के लिये उन्होंने कुछ घुमन्तु लोगों की सेवाएं लीं। उन्हें कुछ जमीनें और घर देकर गांव के बाहर बसा दिया और उनको गांव की सुरक्षा का काम सौंप दिया। वे पीढि़यों तक इस काम को करते रहे। गांव के भीतर और गांव के बाहर किनारों पर रहने वाले इन लोगों के बीच सामान्य मानवीय सम्बन्ध थे- किसी तरह की अस्पृश्यता नहीं थी।40 तब, अस्पृश्यता कैसे पैदा हुई? आंबेडकर कहते हैं कि इसके लिये भारत में बौद्धधर्म के उदय को देखना होगा।
आंबेडकर के अनुसार, भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ, जब बौद्धधर्म ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीत लिया था। देश की जनता और सारा व्यापारी वर्ग बौद्धधर्म में चला गया था। ब्राह्मणवाद का पतन हो गया था, जो शताब्दियों से राज कर रहा था। बुद्ध ने तीन शिक्षाएं दीं- सामाजिक समानता की, वर्णव्यवस्था के उन्मूलन की और अहिंसा के सिद्धान्त की, जिसमें धर्म के नाम पर पशु बलि व£जत थी। आंबेडकर ने कहा कि उस समय तक ब्राह्मण शाकाहारी नहीं हुए थे, वे गौओं और अन्य पशुओं की बलि देते थे और उनका मांस खाते थे। जब बुद्ध ने बलि का निषेध किया और गाय को ऋषि और दूध के लिये उपयोगी पशु बताते हुए उसकी सुरक्षा की शिक्षा दी, तो जनता ने उसे अपना लिया। तब, ब्राह्मणों के सामने शाकाहारी बनने के सिवा कोई चारा नहीं था41
आगे आंबेडकर लिखते हैं कि ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को बौद्धधर्म में जाने से रोकने के मकसद से उन्हें समानता का दर्जा देने की पेशकश की और दोनों ने मिलकर वैश्य और शूद्रों को रोकने के लिये उन दो पुलिस वालों की तरह काम किया, जो कैदी के दोनों तरफ खड़े होकर उसे भागने से रोकते हैं।42 अब गाय पवित्र हो गयी थी और उसकी बलि देने की प्रथा समाप्त हो गयी थी। बहुत सारी बुद्ध शिक्षाएं हिन्दूधर्म में समाहित कर लीं गयी थीं। जो जनता बौद्धधर्म में चली गयी थी, वह भी धीरे-धीरे वापिस आने लगी थी। बुद्ध की जो सबसे बड़ी शिक्षा ब्राह्मणों ने स्वीकार नहीं की, वह थी समानता की शिक्षा और वर्णव्यवस्था का उन्मूलन। पर, उन्होंने यह जरूर किया कि कुछ समय के लिये क्षत्रियों को अपने समान दर्जा दिया और ब्राह्मण देवताओं को हटा कर उनके स्थान पर क्षत्रिय देवताओं को स्थापित कर उनके साथ अन्य समयानुकूल समझौते कर लिये।43
 आगे आंबेडकर कहते हैं, न तो बुद्ध ने और न ब्राह्मणों ने मृतक पशु के मांस को खाने पर रोक लगायी थी। रोक सिर्फ जीवित गाय का वध करने पर थी। पर, आज के अछूतों का एक बड़ा अपराध यह है कि वे गरीबों में सबसे गरीब और सामाजिक रूप से सबसे निचले स्तर के होने के कारण बौद्धधर्म में लम्बे समय तक बने रहे और मृतक पशु का मांस खाते रहे। उनको सुधारने के लिये एक बड़ी शक्ति की जरूरत थी, जो उनके लिये लम्बे समय तक काम करती। पर ऐसा कोई काम तो नहीं हुआ, उलटे, सामाजिक बहिष्कार और अस्पृश्यता उन पर लागू कर दी गयी।44
आंबेडकर का निष्कर्ष था कि उनकी मृतक गाय का मांस खाने की आदत ही उनके शोषण का कारण बनी। यही वह चीज थी, जिससे स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं को उनसे घृणा हुई। इसी वजह से उस पूरे वर्ग पर अस्पृश्यता थोप दी गयी। यह वास्तव में वह दण्ड था, जो ब्राह्मणों ने उन्हें बौद्धधर्म में बने रहने के लिये दिया था, जबकि अन्य लोगों ने बौद्धधर्म छोड़ दिया था। आंबेडकर कहते हैं कि इसलिये शिक्षा और स्वतन्त्रता तथा सामाजिक समानता के सभी आधुनिक विचारों के बावजूद आज तक अस्पृश्यता बनी हुई है।45
 आंबेडकर ने अपने इस शोध को ‘दि अनटचेबिल्स’ नाम से प्रकाशित कराया, जो अछूतपन के ऐतिहासिक आधार को रेखांकित करने वाली एक महत्वपूर्ण पुस्तक के रूप में च£चत है। यह सिद्ध करने के बाद कि आज के अछूत किसी समय बौद्ध थे, उनका बौद्धधर्म में जाने का रास्ता आसान हो गया था। अतः आंबेडकर ने 2 मई 1950 को नयी दिल्ली में, बुद्ध जयन्ती के अवसर पर भारत के अछूतों से बौद्धधर्म ग्रहण करने की अपील की।46 इस अपील पर दूसरे दिन 15 अछूतों ने दिल्ली में बौद्धधर्म ग्रहण किया।47 इस अवसर पर, डा. आंबेडकर ने हिन्दी में तीस मिनट का संक्षिप्त व्याख्यान दिया था, जिसमें उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में पुनः बौद्धधर्म का उदय होगा। उन्होंने आगे कहा कि न राम और न ही कृष्ण बुद्ध का मुकाबला करते हैं, बुद्ध के बराबर कोई भगवान नहीं है और न आगे ऐसा कोई महान धर्मगुरु और शास्ता पैदा होगा।48 6 जून 1950 को उन्होंने कोलम्बो में कहा था, ‘‘यह आम धारणा बन गयी है कि बौद्धधर्म भारत से लुप्त हो गया है। मैं मानता हूँ कि यह भौतिक रूप में लुप्त हुआ है, पर एक अमूर्त (बौद्धिक) शक्ति के रूप में यह अभी भी अस्तित्व में है।’’49
 आंबेडकर ने देश के बहुत से भागों में जाकर अछूतों की सभाएं कीं और उन्हें बौद्धधर्म के विषय में जानकारी दी। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह बौद्धधर्म के विस्तार के लिये सम£पत कर दिया था।50 अन्ततः उन्होंने 14 अक्टूबर 1956 को विजया दशमी के दिन नागपुर में अपने लाखों अनुयायियों के साथ पूज्य महास्थविर चन्द्रमणि जी के नेतृत्व में बौद्धधर्म की दीक्षा ली और भारत में बौद्धधर्म के पुनरुद्धार का झण्डा गाड़ दिया। बाद में, उन्होंने बाइबिल और कुरान की तरह बौद्धों के लिये भी एक धर्मग्रन्थ की रचना की, जो ‘बुद्ध और उनका धम्म’ नाम से प्रसिद्ध है।

4

हमने देखा कि राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर दोनों बौद्धधर्म तक पहुंचे, पर अलग-अलग रास्तों से और अलग-अलग कारणों से। राहुल भारत में बौद्ध समाज नहीं बना पाये। पर, आंबेडकर ने इसी कमी को पूरा किया। लेकिन इस बात को लेकर दोनों एक मत के थे कि बौद्धधर्म हिन्दूधर्म का अंग नहीं है। राहुल की दृष्टि में बौद्ध हिन्दू नहीं थे।51 किन्तु, बुद्ध के जीवन, सिद्धान्तों और दर्शन के सम्बन्ध में दोनों विद्वानों के विचार समान नहीं हैं। उदाहरण के लिये आंबेडकर ने बुद्ध के जीवन और दर्शन को उसी रूप में स्वीकार नहीं किया, जिस रूप में वह परम्परा में मौजूद था। किन्तु, राहुल काफी हद तक परम्परा में प्रचलित बुद्ध के जीवन-दर्शन को ही स्वीकार करते हैं। बुद्ध के जन्म की इस कहानी पर राहुल और आंबेडकर एक मत हैं कि बुद्ध ने अपने जन्म के बारे में सोच कर यह तय किया कि कपिलवस्तु में राजा शुद्धोधन मेरे पिता होंगे और मेरी माता महामाया नामक देवी होंगी। तब उन्होंने महामाया को स्वप्न में आकर बताया कि क्या तुम मेरी माता बनना स्वीकार करोगी? उसका उत्तर था, बड़ी प्रसन्नता से। और उसी समय बोधिसत्त्व ने महामाया के गर्भ में प्रवेश किया।52
लेकिन बुद्ध ने गृहत्याग की कहानी पर राहुल के विचार परम्परागत हैं, जबकि आंबेडकर उसको तर्क की कसौटी पर कसते हैं और उसके मूल में राजनैतिक कारण मानते हैं। राहुल का वही (परम्परागत) मत है- ‘‘वृद्ध, रोगी, मृत और प्रव्रजित ;संन्यासीद्ध के चार दृश्यों को देखकर उनकी (सिद्धार्थ की) संसार से विरक्ति पक्की हो गयी और एक रात वह चुपके से घर से भाग निकले।’’53 राहुल भी घर छोड़कर भागे थे, अपने पिता, माँ और ब्याहता किसी का भी मोह उन्होंने नहीं पाला था। पर, आंबेडकर को बुद्ध का इस तरह पलायन करना ठीक नहीं लगा था। यह उनके गले भी नहीं उतरा था। वे लिखते हैं- ‘‘जिस समय सिद्धार्थ (बुद्ध) ने प्रव्रज्या (गृहत्याग) ग्रहण की, उस समय उनकी आयु 29 वर्ष की थी। यदि सिद्धार्थ ने इन्हीं तीन दृश्यों (वृद्ध, रोगी और मृतक) को देखकर प्रव्रज्या ग्रहण की, तो यह कैसे हो सकता है कि 29 वर्ष की आयु तक सिद्धार्थ ने कभी किसी बूढ़े, रोगी तथा मृत व्यक्ति को देखा ही न हो? ये जीवन की ऐसी घटनाएं हैं, जो रोज ही सैकड़ों, हजारों घटती रही हैं और सिद्धार्थ ने 29 वर्ष की आयु होने से पहले भी इन्हें देखा ही होगा। इस परम्परागत मान्यता को स्वीकार करना असम्भव है कि 29 वर्ष की आयु होने तक सिद्धार्थ ने एक बूढ़े, रोगी और मृत व्यक्ति को देखा ही नहीं था और 29 वर्ष की आयु होने पर ही प्रथम बार देखा। यह व्याख्या तर्क की कसौटी पर कसने पर खरी उतरती प्रतीत नहीं होती।’’54
डा. भदन्त आनन्द कौसात्यायन का मत है कि वृद्ध, रोगी और मृत व्यक्ति को देखकर गृहत्याग की मान्यता ‘‘वे अट्टकथाएँ हैं, जिन्हें बुद्धघोष तथा अन्य आचार्यों ने भगवान बुद्ध के एक हजार वर्ष बाद परम्परागत सिंहल अट्टकथाओं का आश्रय ग्रहण कर पाली भाषा में लिखा।’’55 उनके अनुसार त्रिपिटक के किसी भी ग्रन्थ में गृहत्याग के इस कथानक का कहीं उल्लेख नहीं है।56
आंबेडकर ने परम्परागत मान्यता के विरुद्ध ‘खुद्दक निकाय’ के ‘सुत्तनिपात’ के अट्ठकवग्ग में अत्तदण्डसुत्त की इन गाथाओं को बुद्ध के गृहत्याग का आधार बनाया- ‘‘शस्त्र धारण भयावह लगा। मुझमें वैराग्य उत्पन्न हुआ, यह मैं बताता हूँ। अपर्याप्त पानी मैं जैसे मछलियां छटपटाती हैं, वैसे एक-दूसरे से विरोध करके छटपटाने वाली प्रजा को देखकर मेरे मन में भय उत्पन्न हुआ। चारों ओर का जगत असार दिखायी देने लगा, सब दिशाएं काँप रही हैं, ऐसा लगा और उसमें आश्रय का स्थान खोजने पर निर्भय स्थान नहीं मिला, क्योंकि अन्त तक सारी जनता को परस्पर विरुद्ध हुए देखकर मेरा जी ऊब गया।’’57
आंबेडकर का मत है कि शाक्यों और कोलियों में रोहिणी नदी के पानी को लेकर झगड़े होते थे। शाक्य संघ ने कोलियों के विरुद्ध युद्ध का प्रस्ताव पारित किया, जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया। शाक्य संघ के नियम के अनुसार बहुमत के विरुद्ध जाने पर दण्ड का प्राविधान था। संघ ने तीन विकल्प रखे- (1) सिद्धार्थ सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लें, (2) फांसी पर लटक कर मरने या देश छोड़कर जाने का दण्ड स्वीकार करें या (3) अपने परिवार के लोगों का सामाजिक बहिष्कार और उनके खेतों की जब्ती के लिये राजी हों। संघ का बहुमत सिद्धार्थ के विरुद्ध था। सिद्धार्थ के लिये सेना में भर्ती होकर युद्ध में भाग लेने की बात को स्वीकार करना असम्भव था। अपने परिवार के सामाजिक बहिष्कार पर भी वह विचार नहीं कर सकते थे। अतः उन्होंने दूसरे विकल्प को स्वीकार किया और वे स्वेच्छा से देश त्याग कर जाने के लिये तैयार हो गये।58
राहुल सांकृत्यायन ने इसी परम्परागत मान्यता के साथ लिखा है कि सिद्धार्थ गौतम ने अपनी पत्नी और बच्चे को सोता हुआ छोड़कर चुपके से गृहत्याग किया था।59 किन्तु, आंबेडकर इस मान्यता से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार, उन्होंने पूरी तरह अपने पिता शुद्धोधन, अपनी माता प्रजापति गौतमी और पत्नी यशोधरा से सहमति और अनुमति लेकर घर से अभिनिष्क्रमण किया था।60 राहुल ने सिद्धार्थ की परिवार-विमुखता को गम्भीरता से नहीं लिया, शायद इसलिये कि वे स्वयं भी परिवार-विमुख थे। पर, आंबेडकर ने इसे बहुत गम्भीर प्रश्न माना था। उनकी दृष्टि में कोई भी व्यक्ति, जो परिवार-विमुख है, समाज-विमुख भी होगा, वह समाज-उन्मुख नहीं हो सकता। इसलिये आंबेडकर ने इस बात को रेखांकित करना ज्यादा जरूरी समझा कि सिद्धार्थ जैसा जनवादी और जागरूक व्यक्ति परिवार-विमुख कैसे हो सकता है? वह परिवार के सदस्यों को धोखा देकर घर छोड़ ही नहीं सकते थे। इस तरह के विश्वासघात की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती थी। आंबेडकर ने लिखा है कि जब सिद्धार्थ ने कपिलवस्तु छोड़ा, तो अनोमा नदी तक जनता उनके पीछे-पीछे आयी थी, जिसमें उनके पिता शुद्धोधन और उनकी माता प्रजापति गौतमी भी उपस्थित थे।61
वाराणसी के ऋषिपतन मृगदाव (सारनाथ) में पंच वर्गीय ब्राह्मण भिक्षुओं को दिया गया बुद्ध का पहला धर्मोपदेश ‘धर्मचक्र प्रवर्तन सूत्र’ के नाम से विख्यात है। इसमें बुद्ध ने चार आर्य सत्यों की शिक्षा दी है। पहला आर्य सत्य ‘दुख है’, दूसरा आर्य सत्य ‘दुख का कारण है’, तीसरा आर्य सत्य ‘दुख का निरोध है’, और चैथा आर्य सत्य ‘दुख निरोध का उपाय है।’62 दुख सत्य की व्याख्या करते हुए बुद्ध ने कहा है- ‘‘जन्म भी दुख है, बुढ़ापा भी दुख है, मरण, शोक, रूदन, मन की खिन्नता, हैरानगी दुख है। अप्रिय से संयोग भी, प्रिय से वियोग भी दुख है, इच्छा करके जिसे नहीं पाता, वह भी दुख है। संक्षेप में पांचों उपादान स्कन्ध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) दुख हैं।’’63 बुद्ध ने दुख का कारण तृष्णा को माना है और तृष्णा के निरोध (विनाश) को दुख का निरोध कहा है। तृष्णा से उपादान (वासना) पैदा होती है, उपादान से जन्म, जन्म से बुढ़ापा, मृत्यु, शोक आदि पैदा होते हैं। दुख-निरोध का मार्ग है, आर्य आष्टांगिक मार्ग, जो ये हैं- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वचन, सम्यक कर्म, सम्यक जीविका, सम्यक प्रयत्न, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि।64
 राहुल और आंबेडकर दोनों ने चार आर्य सत्यों पर अपने-अपने ढंग से विचार किया है। बुद्ध ने दुख सत्य की जो लौकिक-अलौकिक व्याख्या की है, उसे उसी रूप में राहुल ने भी स्वीकार नहीं किया है और आंबेडकर ने भी। राहुल लिखते हैं, ‘‘यहां उन्होंने (बुद्ध ने) दुख और उसकी जड़ को समाज में न ख्याल कर व्यक्ति में देखने की कोशिश की। भोग की तृष्णा के लिये राजाओं, क्षत्रियों, ब्राह्मणों, वैश्यों सारी दुनिया को झगड़ते, मरते-मारते देख भी उस तृष्णा को व्यक्ति से हटाने की कोशिश की। उनके मतानुसार मानो, काँटों से बचने के लिये सारी पृथ्वी को तो नहीं ढका जा सकता है, हाँ अपने पैरों को चमड़े से ढाँक कर काँटों से बचा जा सकता है। वह समय भी ऐसा नहीं था कि बुद्ध जैसे प्रयोगवादी दार्शनिक सामाजिक पापों को सामाजिक चिकित्सा से दूर करने की कोशिश करते। तो भी, वैयक्तिक सम्पत्ति की बुराइयों को वह जानते थे, इसीलिये जहाँ तक उनके अपने भिक्षु-संघ का सम्बन्ध था, उन्होंने उसे हटा कर भोग में पूर्ण साम्यवाद स्थापित करना चाहा।’’65
 राहुल ने बुद्ध के दुख-विनाश के मार्ग की भौतिकवादी व्याख्या की है। उनके अनुसार, ‘‘बुद्ध तत्कालीन आर्थिक व्यवस्था के खिलाफ इसलिये नहीं गये, क्योंकि बुद्ध के धर्म को फैलाने में राजाओं से भी अधिक व्यापारियों ने उनकी सहायता की थी।’’66
किन्तु डा. आंबेडकर ने इस तरह की भौतिक व्याख्या नहीं की है। उनका मत है कि बुद्ध ने परिनिर्वाण के बाद बुद्ध वचनों में ब्राह्मणों ने भारी हेर-फेर की है। उन्होंने बुद्ध और उनके वचनों को अपने अनुकूल बनाने का काम इसलिये किया, ताकि आम जनता के लिये वे दुष्कर हो जायें। उन्होंने बुद्ध वचनों को ही अलौकिक नहीं बनाया, वरन् बुद्ध को भी लोकोत्तर सत्ता का रूप दिया। जैसा कि भदन्त आनन्द कौसात्यायन का मत है, ‘‘भगवान बुद्ध के बारे में एक बात बड़े ही विश्वास के साथ कही जा सकती है कि वे कुछ नहीं थे, यदि उनका कथन बुद्धिसंगत, तर्क-संगत नहीं होता था।67 आंबेडकर ने इसी आधार पर बुद्ध वचनों को स्वीकार किया। उन्होंने स्वयं लिखा है कि जब हम पाली ग्रन्थों के आधार पर बुद्ध का जीवन चरित्र लिखने का प्रयास करते हैं, तो हमें यह कार्य सहज प्रतीत नहीं होता और उनकी शिक्षाओं की सुसंगत अभिव्यक्ति तो और भी कठिन हो जाती है।68 वे लिखते हैं कि बुद्ध की चर्या का लेखा-जोखा हमारे सामने कई ऐसी समस्याएं पैदा करता है, जिनका निराकरण यदि असम्भव नहीं, तो कठिन अवश्य है। इसलिये, उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि उन समस्याओं पर खुल कर विचार किया जाय। ऐसी उन्होंने चार समस्याओं को रेखांकित किया, जिनमें हम पहली समस्या बुद्ध के गृहत्याग पर ऊपर चर्चा कर चुके हैं। दूसरी समस्या चार आर्य सत्यों से उत्पन्न होती है। इस समस्या पर विचार करते हुए आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘जीवन स्वभावतः दुख है, यह सिद्धान्त जैसे बुद्धधर्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है। यदि जीवन भी दुख है, मरण भी दुख है, पुनरुत्पत्ति भी दुख है, तब तो सभी कुछ समाप्त है। न धर्म ही किसी आदमी को इस संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही। यदि दुख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी आदमी को दुख से मुक्ति दिलाने के लिये क्या कर सकते हैं, क्योंकि जन्म ही स्वभावतः दुखमय है? ये चारों आर्यसत्य, जिनमें प्रथम आर्यसत्य ही दुख-सत्य है, अबौद्धों द्वारा बौद्धधर्म ग्रहण किये जाने के मार्ग में बड़ी बाधा है। ये उनके गले आसानी से नहीं उतरते। ये सत्य मनुष्य को निराशावाद के गढ़े में ढकेल देते हैं। ये सत्य बुद्ध के धम्म को एक निराशावादी धर्म के रूप में उपस्थित करते हैं।’’69 आंबेडकर चार आर्यसत्यों को बुद्ध की मूल शिक्षा के विपरीत और परवर्ती भिक्षुओं द्वारा किया गया प्रक्षिप्तांश मानकर पूरी तरह अस्वीकार कर देते हैं।70
 आंबेडकर की तीसरी समस्या आत्मा, कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त को लेकर है। किन्तु, पहले हम यह देखेंगे कि इस सम्बन्ध में राहुल सांकृत्यायन का मत क्या है? बुद्ध अनात्मवादी और अनीश्वरवादी थे। अर्थात् वे आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व को नहीं मानते थे। इस सम्बन्ध में ‘प्रतीत्य-समुत्पाद’ (क्षणिकवाद) बुद्ध का बहुत ही क्रान्तिकारी दर्शन है। पर, राहुल लिखते हैं, ‘‘तो भी इस क्रान्तिकारी दर्शन ने अपने भीतर से उन तत्वों (धर्म) को हटाया नहीं था, जो समाज की प्रगति को रोकने का काम देते हैं। पुनर्जन्म की यद्यपि बुद्ध ने नित्य आत्मा का एक शरीर से दूसरे शरीर में आवागमन के रूप में मानने से इनकार किया था, तो भी दूसरे रूप में परलोक और पुनर्जन्म को माना था। जैसे इस शरीर में जीवन विच्छिन्न प्रवाह (नष्ट-उत्पत्ति-नष्ट-उत्पत्ति) के रूप में एक तरह की एकता स्थापित किये हुए है, उसी तरह वह शरीरान्त में भी जारी रहेगा। पुनर्जन्म के दार्शनिक पहलू को और मजबूत करते हुए पुनर्जन्म का पुनर्जन्म प्रतिसन्धि के रूप में किया अर्थात् नाश और उत्पत्ति की संधि (श्रृंखला) से जुड़कर जैसे जीवन-प्रवाह इस शरीर में चल रहा है, उसी तरह उसकी प्रतिसन्धि (जुड़ना) एक शरीर से अगले शरीर में होती है। अविकारी ठोस आत्मा में पहले के संस्कारों को रखने का स्थान नहीं था, किन्तु क्षणपरिवर्तनशील तरल विज्ञान (जीवन) में उसके वासना या संस्कार के रूप में अपना अंग बनकर चलने में कोई दिक्कत न थी। क्षणिकता सृष्टि की व्याख्या के लिये पर्याप्त थी, किन्तु ईश्वर का काम संसार में व्यवस्था, समाज में व्यवस्था ;शोषित को विद्रोह से रोकने की चेष्टाद्ध कायम करना भी है। इसके लिये बुद्ध ने कार्य के सिद्धान्त को और मजबूत किया। आवागमन, धनी-निर्धन का भेद उसी कर्म के कारण है, जिसके कर्ता कभी तुम खुद थे, यद्यपि आज वह कर्म तुम्हारे लिये हाथ से निकला तीर है।’’71
राहुल आगे लिखते हैं, ‘‘बुद्ध के प्रतीत्य-समुत्पाद को देखने पर, जहां तत्काल प्रभुवर्ग भयभीत हो उठता, वहां प्रतिसंधि और कर्म का सिद्धान्त उन्हें बिल्कुल निश्चिन्त कर देता था। यही वजह थी, जो कि बुद्ध के झण्डे के नीचे हम बड़े-बड़े राजाओं, सम्राटों, सेठ-साहूकारों को आते देखते हैं, और भारत से बाहर लंका, चीन, जापान, तिब्बत में तो उनके धर्म को फैलाने में राजा सबसे पहले आगे बढ़े। वे समझते थे कि यह धर्म सामाजिक विद्रोह के लिये नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिति को स्थापित रखने के लिये बहुत सहायक साबित होगा।’’72 राहुल ने माक्र्सवादी दृष्टिकोण से बौद्ध दर्शन का अध्ययन किया था। इसलिये उन्होंने कहा, ‘‘वर्गदृष्टि से देखने पर बौद्धधर्म शासक वर्ग के एजेन्ट की मध्यस्थता जैसा था, वर्ग के मौलिक स्वार्थ को बिना हटाये वह अपने को न्याय-पक्षपाती दिखलाना चाहता था।’’73
डा. आंबेडकर ने बौद्धधर्म का अध्ययन इस दृष्टि से नहीं किया था। उनका देखने का नजरिया यह था कि बौद्धधर्म का उदय, उसका विकास और प्रभाव ब्राह्मणवाद के लिये घातक था। इसलिये, बौद्धधर्म को विकृत करने का काम ब्राह्मणवाद की विजय के लिये उन ब्राह्मणों ने किया था, जो छद्म रूप से बौद्धधर्म में चले गये थे। आत्मा, कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त भी उन्हीं छद्म बौद्धों की देन हैं। इसलिये आंबेडकर लिखते हैं, ‘‘बुद्ध ने आत्मा के अस्तित्व से इनकार किया। लेकिन साथ ही उन्होंने कर्म तथा पुनर्जन्म के सिद्धान्त का भी समर्थन किया है। प्रश्न पैदा हो सकता है कि आत्मा ही नहीं, तो कर्म कैसा? आत्मा ही नहीं, तो पुनर्जन्म कैसा? ये सचमुच टेढ़े प्रश्न हैं। बुद्ध ने ‘कर्म’ तथा ‘पुनर्जन्म’ शब्दों का प्रयोग किन विशिष्ट अर्थों में किया है? क्या बुद्ध ने इन शब्दों का किन्हीं ऐसे विशिष्ट अर्थों में प्रयोग किया, जो अर्थ उन अर्थों से सर्वथा भिन्न थे, जिन अर्थों में बुद्ध के समकालीन ब्राह्मण इन शब्दों का प्रयोग करते थे? यदि हां, तो वह अर्थभेद क्या था? अथवा, उन्होंने उन्हीं अर्थों में इन शब्दों का प्रयोग किया, जिन अर्थों में ब्राह्मण जन इनका प्रयोग करते थे? यदि हां, तो क्या ‘आत्मा’ के अस्तित्व को अस्वीकार करने तथा ‘कर्म’ और ‘पुनर्जन्म’ के सिद्धान्त को मान्य करने में भयानक असंगति नहीं है?’’74
आंबेडकर ने कर्म के सिद्धान्त को स्वीकार किया है, पर उसे कर्म के हिन्दू सिद्धान्त से अलग रखा है। उनका कहना है कि कर्म का बौद्ध सिद्धान्त और कर्म का हिन्दू सिद्धान्त न एक है और न एक हो सकता है। उन्होंने इस शाब्दिक मायाजाल से सावधान रहने की आवश्यकता पर जोर दिया है। उनके अनुसार, कर्म का हिन्दू सिद्धान्त शरीर से पृथक एक आत्मा पर निर्भर करता है, शरीर मरता है तो आत्मा उसके साथ नहीं मरती। आत्मा फुर्र से उड़ जाती है। किन्तु, बुद्ध के कर्म के सिद्धान्त का सम्बन्ध मात्र कर्म से है और वह भी वर्तमान जन्म के कर्म से।75
आबेडकर ने बुद्ध के पुनर्जन्म के सिद्धान्त की व्याख्या इस प्रकार की है, ‘‘बुद्ध के अनुसार चार भौतिक पदार्थ हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु। जब शरीर का मरण होता है, तो क्या वे भी मर जाते हैं? बुद्ध ने कहा कि ‘नहीं’। आकाश में जो समान भौतिक पदार्थ सामूहिक रूप से विद्यमान हैं, वे उनमें मिल जाते हैं। इस विद्यमान राशि में से जब इन चारों भौतिक पदार्थों का पुन£मलन होता है, तो पुनर्जन्म होता है।’’76 आगे आंबेडकर इस प्रश्न पर विचार करते हुए कि क्या मृत आदमी का ही पुनर्जन्म होता है, लिखते हैं, ‘‘यदि मृत आदमी के देह के सभी भौतिक अंश पुनः नये सिरे से मिलकर एक नये शरीर का निर्माण कर सकें, तभी यह मानना सम्भव है कि उसी आदमी का पुनर्जन्म हुआ। यदि भिन्न-भिन्न मृत शरीरों के अंशों के मेल से एक नया शरीर बना, तो यह पुनर्जन्म तो हुआ, लेकिन यह उसी आदमी का पुनर्जन्म नहीं हुआ।’’77 इस प्रकार, आंबेडकर ने बुद्ध के कर्म और पुनर्जन्म के सिद्धान्त को खारिज नहीं किया, वरन् उसकी वैज्ञानिक व्याख्या की, अलौकिक व्याख्या से बचते हुए, जो त्रिपिटक केे ग्रन्थों में मिलती है।
राहुल और आंबेडकर की वैचारिक असमानताएं इस कारण से हैं कि राहुल ने एक माक्र्सवादी आलोचक के रूप में धर्म की व्याख्या की है। वे इतिहास के आलोचक थे और भारत में समाजवादी व्यवस्था को स्थापित करने के स्वप्न द्रष्टा। किन्तु, डा. आंबेडकर इतिहास के आलोचक के साथ-साथ इतिहास के निर्माता भी थे। भारत में बौद्धधर्म का पुनरुद्धार और बौद्ध समाज का निर्माण उनकी सबसे बड़ी चिन्ता थी। बीसवीं सदी की वैज्ञानिक विचारधारा और माक्र्सवादी आ£थक व्याख्याओं की चुनौतियाँ भी उनके सामने थीं। राहुल धर्म को मनुष्य के लिये अनावश्यक कह सकते थे, पर आंबेडकर, जो बौद्धधर्म के पुनरुद्धारक होने जा रहे थे, धर्म को अनावश्यक कैसे ठहरा सकते थे? उन्होंने धर्म की भी धर्म, अधर्म और सद्धर्म के रूपों में व्याख्या की78 और बुद्ध वचनों को भी, जो विकृत हो चुके थे, झाड़-पोंछ कर तर्कसंगत और वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया। वे एक विशाल मानव समुदाय को अधा£मक बनाये जाने के पक्ष में नहीं जा सकते थे। नैतिक दृष्टि से भी किसी समुदाय का धर्म-विमुख होना उनके लिये अनुचित था। वे बौद्धधर्म को एक क्रान्ति मानते थे। उनके अनुसार, ‘‘यह उतनी ही महान क्रान्ति थी, जितनी कि फ्रान्स की क्रान्ति थी। यद्यपि यह धा£मक क्रान्ति के रूप में आरम्भ हुई, तथापि यह धा£मक क्रान्ति से बढ़कर थी। यह सामाजिक और राजनैतिक क्रान्ति बन गयी थी।’’79 वे लिखते हैं कि इस क्रान्ति के महत्व को तभी समझा जा सकता है, जब क्रान्ति से पहले के भारतीय समाज की भयानक स्थिति और सामाजिक, धा£मक और आध्यात्मिक रूप से निकृष्ट, विलासिता में डूबे हुए बुद्धकालीन आर्य समुदाय का चित्र आपके सामने होगा।80
सन्दर्भ :
 1. अंधकार में ज्योति (अनागरिक धर्मपाल का जीवनवृत्त तथा उपदेश), लेखक-महास्थविर    संघरक्षित, नौरफोक (इंगलैण्ड), अनुवादक- कँवल भारती, प्रकाशक-त्रिरत्न ग्रन्थमाला, पुने, संस्करण: 1991 (प्रथम)
 2. मेरी जीवन यात्रा, प्रथम खण्ड, राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण 1946, पृष्ठ 258
 3. वही, पृष्ठ 267
 4. वही, पृष्ठ 364
 5. वही, द्वितीय खण्ड, संस्करण 1950, पृष्ठ 7-8
 6. वही, पृष्ठ 8-9
 7. वही, पृष्ठ 106-07
 8. दर्शन-दिग्दर्शन- राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण 1998, पृष्ठ 393
 9. जिनका मैं कृतज्ञ- राहुल सांकृत्यायन, किताब महल, इलाहाबाद, संस्करण-1957, पृष्ठ 128
10. वही, पृष्ठ 127
11. मेरी जीवन यात्रा, द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 155-56
12. वही, पृष्ठ 156
13. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 393
14. वही, पृष्ठ 394
15. वही
16. वही
17. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-14, डा. आंबेडकर प्रतिष्ठान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार, नयी दिल्ली, संस्करण  जून 1998, पृष्ठ-1 (प्रस्तावना)
18. वही, खण्ड-10, संस्करण 1996, पृष्ठ 37
19 वही, पृष्ठ 66
20. सोर्स मेटेरियल आन डा. बाबा साहेब आंबेडकर एण्ड दि मूवमेन्ट आफ दि अनटचेबुल्स, वाल्यूम-1, शिक्षा विभाग, महाराष्ट्र सरकार, बम्बई, संस्करण प्रथम, दिसम्बर 6, 1982, पृष्ठ   135
21. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-10, पृष्ठ 173
22. वही
23. सोर्स मेटेरियल…… पृष्ठ 135
24. वही, पृष्ठ 136
25. वही, पृष्ठ 276-77
26. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-9, संस्करण द्वितीय 1998, पृष्ठ 144
27. डा. बाबा साहेब आंबेडकर- राइटिंगस एण्ड स्पीचेस, वाल्यूम-12, एजूकेशन डिपार्टमेंन्ट,    महाराष्ट्र गर्वनमंेन्ट, संस्करण पहला 1993, पृष्ठ 115
28. डा. आंबेडकर वाङमय, खण्ड-10, पृष्ठ 66
29. वही  30. वही
31. वही, खण्ड-9, पृष्ठ 156
32. धनंजय कीर, आंबेडकरः लाइफ एण्ड मिशन, पापुलर प्रकाशन, बम्बई, दूसरा संस्करण, 1961, पृष्ठ 58
33. वही, पृष्ठ 304 34. वही, पृष्ठ 499
35. वही, पृष्ठ 92
36. सोर्स मेटेरियल… पृष्ठ 139
37. वही, पृष्ठ 141-42
38. वही, पृष्ठ 422
39. वही, पृष्ठ 212
40. वही  41. वही, पृष्ठ 213
42. वही, पृष्ठ 214
43. वही  44. वही
45. वही
46. वही, पृष्ठ 366
47. वही
48. वही
49. वही, पृष्ठ 371
50. वही, पृष्ठ 410
51. मेरी जीवन यात्रा, द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 303
52. कृपया देखें, राहुल सांकृत्यायन की ‘बुद्धचर्या’ (भारतीय बौद्ध समिति, लखनऊ, संस्करण 1995) पृष्ठ 1-2, एवं डा. आंबेडकर की पुस्तक ‘बुद्ध और उनका धम्म’ (समता प्रकाशन, नागपुर, संस्करण उल्लेख नहीं) पृष्ठ 2-3
53. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 386 और ‘बुद्धचर्या’ भी देखें, पृष्ठ 6 से 12
54. बुद्ध और उनका धम्म, परिचय
55. वही, देखिए भदन्त आनन्द कौसात्यायन ;अनुवादकद्ध का नम्र निवेदन (पृष्ठ संख्या उल्लेख   नहीं)
56. वही
57. वही, यह भी देखें, ‘सुत्तनिपात’, मूलपाली तथा हिन्दी अनुवाद, भिक्षु धमरत्न, प्रकाशक    महाबोधि सभा, सारनाथ, बनारस, संस्करण प्रथम 1951, पृष्ठ 201
58. वही, पृष्ठ 14-17
59. बुद्धचर्या, पृष्ठ 9-10
60. बुद्ध और उनका धम्म, पृष्ठ 17-18
61. वही, पृष्ठ 19-20
62. कृपया देखें, मेरी पुस्तक ‘धम्मचक्कपवत्तन सुत्त’ (मूल, अनुवाद एवं व्याख्या), बोधिसत्त्व    प्रकाशन, रामपुर, दूसरा संस्करण 1997
63. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 389 (बुद्धचर्या, पृष्ठ 22)
64. वही, पृष्ठ 390 (बुद्धचर्या, पृष्ठ 23)
65. वही, पृष्ठ 394
66. वही
67. बुद्ध और उनका धम्म, नम्र निवेदन, पहला पृष्ठ
68. वही, परिचय
69. वही
70. वही
71. दर्शन-दिग्दर्शन, पृष्ठ 415
72. वही
73. वही, पृष्ठ 415-416
74. बुद्ध और उनका धम्म, नम्र निवेदन, दूसरा पृष्ठ
75. वही, पृष्ठ 160
76. वही, पृष्ठ 156
77. वही, पृष्ठ 157
78. वही, पृष्ठ 107 से 147 तक
79. डा. आंबेडकर सम्पूर्ण वाङमय, खण्ड-7, पृष्ठ 17
80. वही

राहुल सांकृत्यायन और डा. आंबेडकर – तीन अध्ययन
लेखक – कँवल भारती
प्रथम संस्करण – जनवरी 2007
प्रकाशक – साहित्य उपक्रम

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कँवल भारती

4 फ़रवरी 1953 को उत्तर प्रदेश [ भारत] में रामपुर जिले में एक दलित पैवार में जन्म. शिक्षा – M.A., प्रगतिशील – अम्बेडकरवादी विचारक. कवि, आलोचक और पत्रकार. हिंदी पत्रकारिता में दलित विमर्श के प्रतिष्ठापक. हिंदी में दलित इतिहास के लेखक. साहित्य, इतिहास, राजनीति और पत्रकारिता पर 40 पुस्तकें प्रकाशित.