महाशिवरात्री और बौद्ध संस्कृति का इतिहास…..डॉ परम आनंद

🌹महाशिवरात्री और बौद्ध संस्कृति का इतिहास🌹
🌻माघ अमावस्या निमित्त बुद्ध लेणियों पर ‘महाधम्म महोत्सव’🌻
       ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म ख़त्म करने के लिए उनके साहित्य जलाये, भिक्खुओं का कत्लेआम किया लेकिन बौद्ध लोगों द्वारा निर्माण की गई और परिपालित की जाने वाली पवित्र संस्कृतियों को वे नहीं मिटा सके. इसलिए महात्मा फुले, बाबासाहब आम्बेडकर, जवाहरलाल नेहरु, कांशीरामजी और सभी महापुरुषों ने देश की संस्कृति जतन पर विशेष जोर दिया है.
       लेकिन धम्म विरोधी ताकतें लेणी और स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों को नहीं मिटा सकी. बौद्ध लोगों के दरवाजों पर अंकित बुद्धप्रतिक ‘स्वस्तिक’ भी नहीं मिटा पाए. उन्होंने मूर्तियों की तोड़फोड़ की, उन्हें विद्रूप किया या फिर सिंदूर फासकर देवी देवता में परिवर्तित किया, लेकिन हर पूर्णिमा को बुद्ध लेणी और स्तूपों पर बुद्धवंदना को जाने वाले बौद्ध लोगों को नहीं रोक सकते थे. तब उन्होंने पूर्णिमाओं का इतिहास बदल दिया. बुद्ध की गुरुपूर्णिमा को उन्होंने व्यास की गुरुपूर्णिमा में तब्दील कर दिया. महाराष्ट्र में पंढरपुर को प्रतिवर्ष बोधिसत्व विट्ठल को वंदना करने जाने वाला आज का हिन्दू वारकरी भूल गया है कि उसके पूर्वजों द्वारा पाली जाने वाले बौद्ध धम्म की पवित्र परंपरा का अनुसरण कर रहा है, जो उसके बौद्ध पूर्वज भगवान् बुद्ध को जगतगुरु मानकर बड़ी ही श्रद्धा से प्रतिवर्ष आषाढ़ पूर्णिमा को बुद्ध को वंदना अर्पण करने पंढरपुर जाते थे. वारकरियों को ब्राह्मणों ने हिन्दू अर्थात मानसिक गुलाम बनाया है और आजका बौद्ध समाज भी यह इतिहास भूल गया है. गोदावरी नदी के उगम स्थान पर स्थित नासिक शहर का और गंगा नदी के तट स्थित प्रयाग का कुंभ मेला हर पांच और बारह साल के अंतराल में भरनेवाला बौद्ध मेला था. इस तथ्य को राजा हर्षवर्धन के दरबार के कवी बाणाभट्ट ने लिख रखा है. आज भी भारत के कई हिन्दू मंदिरों में मुंडन करने की प्रथा दिखाई देती है. वास्तव में भारत के लगभग सभी प्रसिद्द हिन्दू मंदिर बौद्ध विहार या स्थल हुआ करते थे, (इस तथ्य को स्वामी विवेकानंद ने भी विषद किया है), जहाँ भिक्खुओं की उपसंपदा होती थी और सामान्य जन सामनेर बनने के लिए मुंडन किया करते थे. इन मुंडन किये हुए बौद्धों को ही अन्य लोग मुंडे कहते थे जो महाराष्ट्र में एक विख्यात सरनेम या गोत्रनाम  है.
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       आजका बौद्ध हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझे इस परिस्थिति को ब्राहमणों ने वर्षों की मेहनत से अंजाम दिया है. बौद्ध भूल चूका है कि आजका हिन्दू, मुसलमान, क्रिश्चन, सिख ये सभी विगत काल के बौद्ध है. बौद्ध, मुस्लिम, सिख, हिन्दू इन सभी में सदैव वैर बनाए रखने के लिए ब्राह्मण पूरी तरह से सफल हुआ है और वह इस व्यवस्था को बनाये रखने के लिए वह सदैव प्रयासरत रहता है, क्योंकि अगर लोग आपसी बैर भूल गए तो वे सब एक हो जायेंगे और ब्राह्मणों के वर्चस्व को खतरा पहुँच सकता है. इस बैर को मिटाने का कार्य केवल बुद्ध अनुयायी ही कर सकते है. हिन्दू यदि देवी देवता की पूजा करता है तो इसमें उसका कोई दोष नहीं. बौद्धों को ध्यान में लेना होगा कि हिन्दुओं के मस्तिष्क से देवी देवता, अंधविश्वास, डर, रूढ़ियाँ दूर करने के लिए काफी संयम से प्रयत्न करने होंगे. बुद्धशासन प्रस्थापित करने के लिए वैचारिक परिवर्तन घटित करना होगा, यदि यह सच भी है तो भी, आजकी लड़ाई सांस्कृतिक लड़ाई है, इसे जानना होगा. ब्राह्मणों ने बौद्ध संस्कृति को विकृत कर ब्राह्मणीकरण किया है. उस बौद्ध संस्कृति को पुनः पुनर्स्थापित कर ब्राह्मनिकृत लोगो को जागृत करना होगा. इसका विचार करना होता कि, पंढरपुर, अयोध्या, उज्जैन, केदारनाथ, अम्बरनाथ को जाने वाले लोगों के झुंड को बंद करना ज्यादा संयुक्तिक है या उन्हें इन स्थलों का सच्चा इतिहास समझा देना ज्यादा संयुक्तिक है. निश्चित ही दूसरा विकल्प ही स्थाई और मजबूत होगा.
       उसीप्रकार इस बात का भी विचार करना होगा कि प्रतिवर्ष विजयादशमी को धम्मदिक्षा दिवस पर नागपुर और १ जानेवारी को भिमाकोरेगाव पर बढती जा रही गर्दी का क्या उपयोग है. प्राचीन काल में बौद्ध स्थलों पर वंदन करने जाने वाले भीड़ का ही रूपांतर आज हिन्दू तीर्थ स्थलों में हो गया है. ऐसे एतिहासिक स्थलों को जीवन में एक दो बार भेट देना उचित समझा जा सकता है या दिक्षाभुमी और चैत्यभुमी जैसी जगह पर किसी वर्ष जाकर नई पुस्तके ख़रीदने का उद्देश रखा जा सकता है, लेकिन प्रतिवर्ष वहाँ जाकर भीड़ में वृद्धी कर वार्षिक मेले में रूपांतर करवाना कितना संयुक्तिक है इसका विचार होना आवश्यक है. वहाँ जाकर वंदन करने की जिम्मेदारी समाज के नेताओं पर छोड़ देनी चाहिए (हम सामान्य लोग वहाँ जाते है इसलिए अम्बेडकरी कहलाने वाले नेता गर्दी का फायदा उठाने के उद्देश से भाषण देने का उपक्रम करते है). हम सामान्य लोगों ने अब इस विजयादशमी के दिन अपने ही परिसर में ८ वर्ष पूर्ण हुए बालक बालिकाओं को धम्मदीक्षा देने का कार्यक्रम परिपालित करना चाहिए. क्रिश्चन धर्म में ८ वर्ष के बालक की धम्मदीक्षा का कार्यक्रम कैमूनियन नाम से किया जाता है जो बौद्ध धम्म की देन है क्योकि भगवान् बुद्ध के संघ में राहुल की धम्मदीक्षा ८ वर्ष की उम्र में हुयी थी. धम्मदिक्षा का यह उत्सव बस्ती बस्ती में भव्य स्वरुप में मनाना चाहिए, जिससे सम्राट अशोक और डॉ बाबासाहब की धम्मदिक्षा स्मरण हो. उसीप्रकार १ जनवरी या ३१ दिसंबर की संध्या को अपने ही परिसर में विजयस्तंभ खड़ा करके नए वर्ष का उत्सव मनाये. उसपर भीमाकोरेगाव का इतिहास लिखा जाये. यह इसलिए जरुरी है ताकि अन्य धर्मियों को भी पेशवाओं की गुलामी से ‘भारत मुक्ति संग्राम’ का इतिहास पता चले. इसउपक्रम के बिना अन्य लोगों को भीमा कोरेगाव के ‘भारत मुक्ति संग्राम’ का इतिहास पता नहीं चलेगा.
       खैर, महाशिवरात्रि इस विषय पर आते है.
       हिन्दुओं के कालनिर्णय कैलेंडर का बारीकी से अवलोकन करने पर ध्यान में आया कि उन्होंने हर महीने की अमावस्या को ‘शिवरात्रि’ कहा है. उसीप्रकार हर शुक्ल-चतुर्थी को ‘विनायक चतुर्थी’, हर ‘शुक्ल-अष्टमी’ को ‘दुर्गाअष्टमी’, हर कृष्ण-चतुर्थी को ‘गणेश संकष्ट चतुर्थी’ और हर कृष्ण-अष्टमी को ‘काला-अष्टमी’ कहा है. बौद्ध धम्म के अभ्यासक जानते है कि बौद्ध धम्म में पूर्णिमा और अमावस्या को भिक्खुओं के उपोसथ हुआ करते थे. पूर्णिमा और अमावस्या को चिवर दान करने का नियम ‘विनय पिटक’ के अनुसार होता था. उसीप्रकार चतुर्थी और अष्टमी को भी उपोसथ हुआ करते थे. ये सारी धम्म परंपरायें आज भी बौद्ध धम्म में अस्तित्व में दिखाई देती है. इन दिनों पर उपवास के सिवाय भिक्खु संघ जमा होकर उन्होंने कोई पाप कर्म (विनय पिटक के निषिद्ध कर्म) किये होने का जाहिर रूप से स्विकार करते थे (देखे ‘बुद्ध और उनका धम्म’, पुस्तक ४, भाग-१,उपभाग-८). पूर्णिमा और अमावस्या को किये जाने वाले उपोसथ का विशेष महत्व था. बुद्ध के महापरिनिर्वान पश्चात पूर्णिमा और अमावस्या को भिक्खु और उपासक संघ बड़ी संख्या में बुद्ध लेणी और स्तूपों पर जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करने लगा था. बौद्ध धम्म की यह परंपरा आज भारत में बुद्ध धम्म लुप्त होने की वजह से नहीं दिखाई देती लेकिन भारत के बाहर सभी बौद्ध देशों में यह बड़े पैमाने पर पाई जाती है. यहाँ तक कि बौद्ध देशों में पूर्णिमा के दिन शासकीय अवकाश होता है क्योंकि वहां के लोग प्रत्येक पूर्णिमा को नजदीक के बौद्ध स्तूप या लेणी पर जाकर त्रिरात्नों को पुरे मनोभाव से नतमस्तक होते है.
       इसप्रकार ‘अमावस्या-रात्रि’ यानि हिन्दू कैलेण्डर में लिखित प्रत्येक ‘शिव-रात्रि’ का बौद्ध धम्म में अनन्य साधारण महत्व है. वास्तव में ‘शिव’ यह संस्कृत शब्द है जो पाली के ‘सिव’ इस शब्द से निर्मित है. पाली भाषा में श, त्र, औ, उड़ता हुआ र (अर्थात ‘कर्म’ इस शब्द में का र), ण, ष, क्ष, ये अक्षर नहीं थे. पाली भाषा में से संस्कृत भाषा निर्माण करते समय पाणिनि ने ई पू २०० में इन अक्षरों की निर्मिती की. तब ‘सिव’ का ‘शिव’, ‘धम्म’ का धर्म’, ‘कम्म’ का ‘कर्म’, ‘भिक्खु’ का ‘भिक्षु’, ‘निब्बान’ का ‘निर्वाण’, इस तरह से शब्दों की निर्मिती हुयी. यही प्रक्रिया कालांतर में संस्कृत से मराठी और हिंदी भाषा के शब्दों के निर्माण में निभाई गई. पाली डिक्शनरी नुसार ‘सिव’ का अर्थ ‘मंगल या कल्याण’ होता है. बौद्ध धर्म में प्रत्येक अमावस्या को उपोसथ होने के कारण और विशेषतः शायद पूर्ण अंधकार होने की वजह से उस रात्रि को ‘मंगलरात्रि’ अर्थात ‘सिवरात्रि’ कहा गया. इसतरह ‘सिवरात्रि’ अर्थात ‘शिवरात्रि’ की रचना यह बौद्ध संस्कृति की ही देन है.
       ‘महाशिवरात्रि’ यह माघ महीने में होती है. माघ महीने की अमावस्या को ‘महाशिवरात्रि’ कहा गया है. इसका कारण यह है कि माघ महीने की पूर्णिमा को भगवान् बुद्ध ने वैशाली में एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी. वह घोषणा थी ३ माहपश्चात् बुद्ध का महापरिनिर्वान होना. इस घोषणा की वजह से भिक्खु और उपासक संघ दोनों ही बुरी तरह से व्यथित हो गए थे. और फिर १५ दिन के पश्चात् की अमावस्या को बड़ी संख्या में भिक्खु और उपासक संघ इकट्ठा  हुआ होगा. इस महासभा का विषय शोक के साथ ही, यह भी अवश्य ही होगा कि बुद्ध के पश्चात हमारा क्या होगा और संघ का किया जाये. इसलिए १५ दिन के बाद आने वाली इस अमावस्या का नाम ‘महाशिवरात्रि’ पड़ा ऐसा पूर्ण विश्वास के साथ कहा जा सकता है. अन्यथा ब्राह्मणी ग्रंथों में प्रत्येक अमावस्या को ‘सिवरात्रि’ कहने का कोई संयुक्तिक कारण उपलब्ध नहीं है.
       भारत के १२ ज्योतिर्लिंग, यह बुद्ध स्तूपों के स्थल है. इसके सबूत कई संशोधकोने अपने शोधकार्यों में जाहिर किये है. बुद्ध लेणियों में प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि को बौद्ध अनुयायी जाकर बुद्ध वंदना अर्पण करता था. भारत से बौद्ध धर्म का उच्चाटन करने के बाद ब्राहमणों ने बौद्ध स्थलों को ब्राह्मणी देवी देवता में परिवर्तित कर दिया. बुद्ध मूर्ति को शिव का स्वरुप देना बहुत आसान था. और इस प्रकार कालांतर में बुद्ध स्तूपों को शिवलिंग घोषित कर दिया और बुद्ध लेणियों को ‘पांडव लेणी’ या ‘पांडव गुफा’ ऐसा नाम दे दिया. बौद्ध भिक्खुओं को बेदखल कर दिए जाने के बाद बौद्ध अस्तित्व पूरी तरह से नष्ट हो गया और ब्राह्मणों ने सारे निर्माण को ब्राह्मणी स्वरुप अर्थात हिन्दू स्वरुप दे दिया. बौद्ध उपासको और जनता को भी हिन्दू नाम दे दिया गया. लेकिन ये हिन्दू हुए लोग पूर्णिमा, अमावस्या, चतुर्थी और अष्टमी की वंदना की परम्परा को निभा रहे थे. इस परंपरा को ही ब्राहमणों ने गुप्त काल से पुराण, रामायण, महाभारत आदि लिखकर ब्राह्मणी अर्थात हिन्दू धर्म की परंपराओं में तब्दील कर दिया. इसतरह आज भी महाशिवरात्रि का उत्सव या मेला बहुसंख्या में बुद्ध लेणियों में दिखाई देता है.
       लेकिन वर्तमान बौद्ध जनता बुद्ध लेणी, स्तूप की चर्चा के आगे कुछ नहीं करती है. भावी पीढ़ी को बौद्ध धर्म का वैभवशाली और श्रद्धामय अस्तित्व जताने के लिए लेणी स्तूपों का संवर्धन करना प्रत्येक अम्बेडकरी अनुयायी की जिम्मेदारी है. अपने संस्कृति का जतन करना देश के नागरिकों का प्रथम कर्तव्य है, ऐसा हमारे महापुरुषों ने कहा है. महाशिवरात्रि और हर पूर्णिमा अमावस्या के दिन बौद्धों ने नजदीकी लेणी स्तूप पर जाकर वहाँ बौद्धों का अस्तित्व बनाए रखना जरुरी है. इसी माध्यम से भारत के सभी धर्मो की जनता को भारत की मूल संस्कृति अर्थात बौद्ध संस्कृति का इतिहास जताने की जिम्मेदारी बाबासाहब का अनुयायी निभा सकता है.
       महापुरुषों के आदेशों का पालन करने के उद्देश से ब्लिस ने २०१० से मुंबई की कोंड्वीटे (महाकाली) और कान्हेरी बुद्ध लेणी पर महाशिवरात्रि के दिन ही ‘महाधम्म उत्सव’ आयोजित करना शुरू किया है. इस अभियान में मुंबई के ही नहीं तो अन्य शहर के धम्मबंधू भी आकर अपना सहभाग जाहिर करते है. बौद्धों की इस क्रांति का फलित यानि कान्हेरी लेणी पर हिन्दुओं की संख्या १.५ लाख से २००० पर आ गई है. आने वाले सालों में वह और काम होती जाएगी. लेकिन मुंबई के उन १.५ लाख हिन्दू लोगों के मस्तिष्क में यह बात पूरी तरह से चली गई कि वे जिस जगह को शिव का स्थान समझ कर पूजा करने जाते थे और जिसे वे शिवलिंग समझते थे वह बुद्ध लेणी और बुद्ध स्तूप है. कोंद्विते लेणी पर तो अब कोई हिन्दू जाता ही नहीं. ये दोनों ही स्थल मुंबई शहर के सबसे प्राचीन स्थल है. मुंबई शहर के इन सबसे वैभवशाली और विशाल प्राचीन स्थल का बौद्ध अस्तित्व पुनः निर्माण करने में ब्लिस को सफलता मिली है. इन ५ सालों में  उस जगह पर बौद्धों की संख्या बढती गई है. लेकिन यह परंपरा निरंतर रखना जरुरी है अन्यथा फिर से ब्राह्मण उस जगह हो ब्राहमनीकृत करेगा और उन स्थलों की प्राचीनता के इतिहास का उपयोग हिन्दू धर्म को प्राचीन जाहिर करने और ब्राह्मणी वर्चस्व को बनाये रखने के लिए करेगा. जबतक ब्राह्मण भारत में है तब तक वह अपनी इस बदमाशी को बरकरार रखेगा. बाबासाहब ने भी इस बात को स्पष्ट किया था कि भारत इतिहास और कुछ न होकर ब्राहमणों और बौद्धों का संघर्ष है. इसलिए इतिहास के इस तथ्य से हमें सीख लेना जरुरी है.
       महाशिवरात्रि के इस महोत्सव में पुरातत्व और पोलिसो की मदत से हिन्दू भाविकों को बड़ी ही विनम्रता से बुद्ध स्थल का महत्व विशद किया जाता है. पुरे स्थल के परिसर में बौद्ध इतिहास के बैनर और पोस्टर्स लगाये जाते है. इतिहास के पर्चे बांटे जाते है. इस तरह से ब्लिस के अभियान को पुरे देश में कार्यान्वित किया जा रहा है.
पण्डितो नागार्य सिरी परमो आनंदो
(डॉ परम आनंद)
८८०५४६०९९९
राष्ट्रीय समन्वयक, भारत लेणी संवर्धन समिती (ब्लिस)

बहुजन समाज, वोट की ताकत को समझे अन्यथा पतन निश्चित है। …..लेखक – एड्वोकेट कुशालचन्द्र

gujrat dalit protestबहुजन समाज, वोट की ताकत को समझे अन्यथा पतन निश्चित है। 🔸🔸🔸🔸🔸🔸लेखक – कुशालचन्द्र एड्वोकेट
🔹हमारा वोट ही, हमारी ताकत है यह लोकतन्त्र में सबसे बड़ी ताकत वाला हथियार है।
🔹यदि हमने इसे सही तरीके से उपयोग नही किया तो यह हथियार, हमारे खिलाफ भी उतनी ही ताकत से काम करेगा जैसा की हम उसे उपयोग कर सकते है।
🔹वोट की ताकत से ही हमारा वजुद है।
🔹जब – जब शासक वर्ग ब्राह्मण पर संकट आता है तो बीजेपी कांग्रेस कॉम्युनिट्स सभी एक हो जाते है और जब भी सत्ता के संघर्ष की बात आती है तो सबसे पहले एक्टिव हो जाते है और चुनाव आते ही कई बरसाती पॉलिटिशियन तैयार हो जाते है।
👎आज अधिकतर मिडिया (समाचार पत्र व् टीवी चैनल) तक ब्राह्मणवादी पार्टियो को जिताने के काम में लगा हुआ है दैनिक भास्कर इसका उदाहरण है जिसने उत्तरप्रदेश में बहनजी और अखलेश् के खिलाफ खुलम-खुला प्रचार कर रहा है।
🔹हमें भी यह समझने की जरूरत है की यदि चुनाव हो रहे है तो हम देश – दुनिया में कहि भी हो, हमारे लोगो के लिये संघर्ष/प्रचार – प्रसार करना चाहिए ।।
🔹आज पंजाब में चुनाव हो रहा है 1500 NRI आम आदमी (ब्राह्मण बनिया) कार्यकर्ता AAP के लिये प्रचार कर रहे है इसी तरह BJP के कई उद्योगपति राजनीतिज्ञ बन गए है बीजेपी के लिये प्रचार कर रहे है और वोट की ताकत को अपने खेमे में ट्रांसफर कर रहे है।
यही वोट की ताकत जो कल तक आपकी थी उसे वे अपनी तरफ ले जाकर अपने ही फायदे/हितों के लिये, आपके अधिकारो के खिलाफ काम में ले रहे है।
ऐसा आज तक होता आया है तभी तो उन्होंने देखते देखते
🔘पदोन्नति आरक्षण की हत्या कर दी।
🔘सरकारी सेक्टर को अन्धाधुन्ध तरीके से निजीकरण किया है जिससे सरकारी नोकरियो में आरक्षण तेजी से समाप्त हो रहा है।
🔘शिक्षण संस्थाओ का निजीकरण किया जा रहा है जिससे केवल धनवान व्यक्ति ही पढ़ सके। गरीबो को अनपढ़ रखा जा सके।
🔘कांग्रेस – बीजेपी ने राजनेतिक रूप से भी sc st obc minority को कैद कर रखा।
🌀यह सब वोट की ताकत से ही सम्भव हुआ है।
🔸हमें अपनी वोट ताकत को हमारे अधिकारो की सुरक्षा के लिये सही तरीके से उपयोग करने की जरूरत है।
🌀आज उत्तरप्रदेश में चुनाव हो रहे है हमे भी ‘आयरन लेडी बहन मायावती” को सपोर्ट करने की जरूरत है।
🌀आज देश में sc st obc minority की एक मात्र आवाज़ बहन मायावती जी है हमे उसे दिन रात एक करके उन्हें जैसे भी सम्भव हो, उनके पक्ष में माहोल बनाने की जरूरत है क्योकि हवाओ से राज आते है और चले भी जाते है।
🔹इसके लिये आर्टिकल/लेख/ब्लॉग/टिप्पणी लिखने की जरूरत है।
🔹सोशल मिडिया पर बहनजी के अच्छे कार्यो की जानकारी जनता तक पहुचाने और प्रचार प्रसार करने की जरूरत है।
🔹गत वर्षो में जिस तरह बहनजी ने sc st obc minority की जोरदार तरीके से पैरवी की है उनसे यह देश की सर्वमान्य नेता बनकर उभरी है चाहे वह
🔸पदोन्नति में आरक्षण मामला हो , 🔸रोहित वेमुला केस, 🔸गुजरात का ऊना केस, 🔸अखलात – दादरी मामला, 🔸बीफ केस, 🔸मानवीय अधिकारो के हनन के मामले, 🔸महिलाओ के खिलाफ अत्याचार के मामले हो। जबरदस्त पैरवी की है।
☸जिसके कारण अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, ऑस्टेलिया, जर्मनी, कनाडा दुनियाभर से बहनजी को समर्थन मिल रहा है जिसे जनता तक पहुचाने की जरूरत है।
🌀यदि हमने अपनी जिम्मेवारी नही उठाई तो वह दिन दूर नही, जब शोषण गुलामी सांप्रदायिक खतरे आपके दरवाजे पर दस्तक दे।
🌀जाग जाए और वोट की ताकत को समझे और बहनजी को मजबूत करे ताकि आने वाले 5 वर्षो में किसी की हिम्मत नही जो आपकी तरफ आँख उठाकर भी बात करे।।
🌀हमें बाबा साहब डॉ अम्बेडकर की उस कहि हुए बात को याद रखना चाहिए की “यह मेरा पिछड़ा बहुजन समाज  (sc st obc minority) यदि एक हो जाए तो यह ब्राह्मण ‘गोविन्द वल्लभ पंत उत्तरप्रदेश तत्कालीन मुख्यमंत्री’ आपके जूते के फीते खोलने में अपनी शान महसूस करेगे।।
अपने मनभेद भुलाये, समझे – जागे – जगाये और लग जाए बाबा साहब के मिशन में।।
जय भीम – जय भारत – जय सविधान
कुशालचन्द्र एड्वोकेट🌀🌀🌀🌀🌀
M.A., M.COM., LL.M., D.C.L.L., I.D.C.A., C.A. Inter.
बिरसा फुले अम्बेडकर एसोसिएशन राजस्थान।।

ताकतवर बनने के लिए 7 प्रकार का बल जुटाना पड़ता है,इन 7 बलों पर हमें भी विचार करना होगा,जो निम्न प्रकार से हैं।….भैरूलाल नामा

dalit fighter buddhist
*हम लोग अब निम्न प्रकार मिशन अम्बेडकर  को आगे बढ़ाएंगे।*
           शिक्षा के अभाव में मति(बुद्धि)गई, मति के अभाव में नीति गई,नीति के अभाव में गति(विकास की रफ्तार) गई, गति के अभाव में वित्त (धन)गया। और वित्त के अभाव में शुद्र समाज मनुवादियों का  गुलाम बनकर रह गया और ये सब शिक्षा के अभाव में हुआ। यह कहना था सच्चे राष्ट्रपिता महामानव ज्योतिराव फुले का।आज भी मनुवादी लोगों का कहना है कि इन बेवकूफ, मूर्ख शूद्रों को टका देदो लेकिन ज्ञान(शिक्षा) मत दो।जबकि बाबा साहब अम्बेडकर का कहना था कि शिक्षा अति महत्वपूर्ण है और उन्होंने पढ़े लिखे लोगों को जिम्मेदारी सौंपी थी कि समाज को शिक्षित करो, संगठित करो और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करो, उनका यह भी कहना था कि अधिकार मांगने से नहीं मिलते हैं उन्हें तो छिना जाता है और छिनने के लिए सामने वाले से अधिक ताकतवर बनना पड़ता है।
   ताकतवर बनने के लिए 7 प्रकार का बल जुटाना पड़ता है,इन 7 बलों पर हमें भी विचार करना होगा,जो निम्न प्रकार से हैं।
1,बाहुबल( पोष्टिक एवं संतुलित भोजन लेना, नशा एवं धूम्रपान छोड़ना, आलस्य को त्यागना।)
2,अशस्त्र बल( आत्म सुरक्षा के लिए)
3,शस्त्र बल(सरकार से लाईसेंस लेकर आत्म सुरक्षा के लिए)
4, बुद्धि बल( अच्छी और पूर्ण शिक्षा प्राप्त करना।)
5,धनबल(सभी को रोजगार दिलाना।)
6,जनबल(समाज के लोगों द्वारा एक साथ मिलकर एक रणनीति तैयार करना।)
7, मनोबल( भाग्य को नकारना और अपने कर्म पर विश्वास करना।)
उपरोक्त सभी प्रकार के बल प्राप्त करने के लिए बाबा साहब अम्बेडकर द्वारा स्थापित सामाजिक संगठन समता सैनिक दल की विद्यार्थी विंग एक जोरदार तरीके से अभियान शुरू करने जा रही है जो कि निम्न प्रकार होगा।
शिक्षित करो। संगठित करो। संघर्ष करो
 अंबेडकर शिक्षा केंद्र की स्थापना।
   जैसा कि आप सभी जानते हैं कि  बाबा साहब अम्बेडकर ने  18 डिग्रियां हासिल कर  विश्व के सबसे अधिक शिक्षित एवं सर्वश्रेष्ठ विद्वान बने,उन्हें विश्व की महा शक्ति अमेरिका द्वारा भी ज्ञान का प्रतीक घोषित किया जा चुका है एवं विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के संविधान को लिखकर उन्होंने अपनी विद्वता को सिद्ध करके  भी दिखा दिया था ।  बाबा साहेब का मानना था कि समाज को शिक्षित करना सबसे महत्वपूर्ण काम है,क्योंकि शिक्षा से ज्ञान मिलता है, ज्ञान से व्यक्ति विद्वान बनता है तथा विद्वान व्यक्ति को सभी जगह सम्मान मिलता है तथा शिक्षित व्यक्ति अपने अधिकारों को जान सकते हैं और उनके लिए संघर्ष करने के लिए समाज का नेतृत्व कर सकेंगे ।  बाबा साहेब का कहना था कि सौ वर्ष  अपमान भरे जीवन से   सम्मानपूर्वक दो दिन का जीवन जीना बेहतर है,एवं शिक्षा इसमें बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, शिक्षा शेरनी का वो दुध है जिसे कोई भी पियेगा तो वह दहाड़ेगा एवं शेर की तरह दहाड़ने वाले का अपमान करने की कोई भी हिम्मत नहीं जुटा पाता है।  इसीलिये बाबा साहब का बार बार यही कहना था कि यदि आप मेरा सच्चा सम्मान करना चाहते हो तो समाज को शिक्षित करो
बाबा साहेब की विचारधारा को जन जन तक पहुँचाने के लिए आप बामसेफ एंव RMS से जुङकर समाज मे जागृति का काम करे ।
जय भीम जय मूलनिवासी
भैरूलाल नामा

क्या “दलित” शब्द के साथ “साहित्य” संभव है?क्या दलित शब्द का इस्तेमाल आंबेडकरवादी विचारधारा के अनुरूप है, क्या स्वयं डा. आंबेडकर इस शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में थे|… ईश कुमार गंगानिया

MUMBAI  buddh press agitation3
क्या “दलित” शब्द के साथ “साहित्य” संभव है?
ईश कुमार गंगानिया यह स्पष्ट कर रहे हैं कि क्या दलित शब्द का इस्तेमाल आंबेडकरवादी विचारधारा के अनुरूप है, क्या स्वयं डा. आंबेडकर इस शब्द के इस्तेमाल के पक्ष में थे
मैं आंबेडकरी वैचारिकी यानी आंबेडकवाद और ‘दलित’ शब्‍द के प्रयोग और ‘दलित’ शब्‍द को केन्‍द्र में रखकर अस्तित्‍व में आए दलित साहित्‍य को लेकर एक अजीब प्रकार के द्वंद्व से गुजर रहा हूं। संभवत: यह द्वंद्व  आंबेडकर और दलित साहित्‍य के अंत: संबंध को समझने में हमारी मदद करें। दरअसल, मुझे ‘दलित’ शब्‍द आंबेडकरवाद या आंबेडकर-वैचारिकी का हिस्‍सा नहीं लगता। मेरी स्‍पष्‍ट मान्‍यता है कि ‘दलित’ शब्‍द किसी भी समाज की गरिमामय अस्मिता कभी नहीं हो सकता। जहां तक मेरा अल्‍प अध्‍ययन का मामला है, बाबा साहब ने ‘दलित’ शब्‍द को अपने समाज की अस्मिता (आईडेटिटी) बनाने का आह्वान कभी नहीं किया।
दलित’ शब्द के प्रयोग का स्वयं बाबा साहब ने तर्कयुक्त आधार पर खंडन किया था, जो उनके सम्पूमर्ण वाड़़्मय संख्या चार के पृष्ठ 228 पर ‘नामकरण’ शीर्षक से कुछ इस प्रकार अंकित है-‘‘जिन जातियों को इस समय ‘दलित वर्ग’ कहा जाता है, उन्हें इस शब्द पर काफी आपत्ति है…यह शब्द  यह धारणा पैदा करता है कि ‘दलित वर्ग’ एक निम्न और असहाय समुदाय है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर प्रांत में उनमें अनेक सुसम्पन्न और सुशिक्षित लोग हैं और समूचे समुदाय में अपनी आवश्यकताओं के प्रति चेतना जागृत हो रही है। उसके मानस में भारतीय समाज में सम्मानजनक दर्जा प्राप्त करने की प्रबल लालसा पैदा हो गई है और वह उसे प्राप्ते करने के लिए भागीरथ प्रयास कर रहा है। इन सब कारणों के आधार पर ‘दलित वर्ग’ शब्द अनुपयुक्त और अनुचित है।…दलित वर्गों के प्रतिनिधि के नाते मैं बिना किसी संकोच के कह सकता हूं कि जब तक और बेहतर नाम न मिल जाए तब तक अस्पृश्य वर्ग को अधिक व्यापक शब्द ‘बाह्य जातियों’ या बहिष्कृत जातियों के नाम से पुकारा जाए, न कि दलित वर्गों के नाम से।’’ गौरतलब यह भी है कि कुछ बुद्धिजीवी इसे मूलनिवासी/आंबेडकरवादी समाज जैसी और भी कई नई-नई पहचान दिलाने के लिए संघर्षरत हैं।
आज भी बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका अपने आपको दलित और अपने द्वारा रचित साहित्‍य को ‘दलित साहित्‍य’ कहे जाने के लिए जिद पर है। इस कड़ी में कांचा इलैया, जो एक बडे चिंतक है, का उल्‍लेख किया जा सकता है-‘‘अब खुद धर्म का इतिहास भी अपने अंत पर पहुंच रहा है। हमारे लिए जरूरी है कि अपने समग्र समाज का दलितीकरण करें। दलितीकरण ही सारे भारतीय समाज में एक नए समतावादी भविष्‍य की स्‍थापना करेंगा।’’ (मैं हिन्‍दू क्‍यों नहीं हूं, पृ. 104) यदि इस टिप्‍पणी पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो समस्‍त समाज का दलितीकरण जरूरी है। प्रश्‍न यह भी है कि समग्र समाज का दलितीकरण कैसे होगा? क्‍या उन्हें (गैर-दलितों का) अन्‍य विभिन्‍न प्रकार की निम्‍न जातियों में बांटा जाएगा? क्‍या उनका आर्थिक, सामाजिक, बौद्धिक व राजनीतिक रूप से दलन किया जाएगा? क्‍या उन पर विभिन्‍न स्‍तर पर निर्योग्‍यताएं थोपी जाएंगी? क्‍या कांचा इलैया का तात्‍पर्य यह है कि ऐसा करने से पूरा समाज समान रूप से दलित हो जाए यानी यही समग्र समाज के दलितीकरण की प्रक्रिया है? क्‍या कांचा इलैया का समता का यही पैमाना होगा? इतनी मगजपच्‍ची करने के बाद भी यह मेरी समझ से बाहर है कि दलितीकरण की प्रक्रिया देखने व अनुभव करने में कैसी होगी और इससे कैसे भारतीय समाज में नए समतावादी भाविष्‍य की स्‍थापना होगी। कांचा इलैया साहब को यह ठीक-ठीक स्‍पष्‍ट करना चाहिए। इस प्रकार की सोच अम्‍बेडकरवादी नहीं, दलितवादी (हीनताबोधी) महसूस होती है।
इस कड़ी में वी टी राजशेखर जैसे प्रखर चिंतक, जो इंग्लिश की पत्रिका ‘दलित वायस’ भी निकालते हैं, का उल्‍लेख किया जा सकता है-‘‘दलित होने, इस प्राचीन धरती के मूलनिवासी होने में गर्व महसूस करो। आओ सिर ऊंचा करके चलें। दलित संस्‍कृति पर गर्व करें। जो काला है वह सुंदर है।’’ (दलित वॉयस, खंड-8, अंक 16, जून 1-15, 1988) मुझे इस देश का मूलनिवासी होने पर तो गर्व है और इसमें सिर ऊंचा करने वाली बात स्‍वाभाविक ही है। लेकिन दलित होने पर कैसे गर्व किया जा सकता है?
यह भी बड़े प्रबल दावे के साथ कहा जाता है कि दलित साहित्‍य आंबेडकरी विचारधारा पर आधारित साहित्‍य है। परिणामस्‍वरूप, बाबा साहब की वैचारिकी के मद्देनजर हिन्‍दूवाद का विरोध जमकर हो रहा है। बौद्ध धम्‍म को समाज का धर्म बनाने की काफी जद्दोजहद हो रही है। जातिविहीन व समतमामूलक समाज की बात भी खूब होती है। नारी अस्मिता और सशक्तिकरण भी मुख्‍यधारा की लड़ाई के रूप में प्रमुखता के साथ मौजूद है। कविताओं, कहानियों, उपन्‍यासों व आत्‍मकथाओं में शोषण-उत्‍पीड़न के हथकंडों पर खूब बात हो रही है यानी शोषक और शोषित की तस्‍वीर इस साहित्‍य के माध्‍यम से बिल्‍कुल स्‍पष्‍ट हो रही है। इस साहित्‍य में आक्रोश इतना बढ़ गया है कि कुछ लोग आक्रोश को इस साहित्‍य की प्रमुख प्रवृत्ति व साहित्‍य के सौंदर्य के रूप में आनिवार्यता प्रदान करने में बढ़ चढ़कर हिस्‍सा लेते हैं। गौरतलब है कि आक्रोश में विवेक नहीं रहता और इसमें रचनात्‍मकता का भी ह्रास होता है। इसलिए मुझे लगता है कि आक्रोश की अपेक्षा हमें अपने तर्क गंभीरता व जिम्‍मेदारी से रखने चाहिए। मैं यह भी मानता हूं कि ‘दलित’ शब्‍द और इससे जुड़े साहित्‍य के लिए ‘दलित साहित्‍य’ के पैरोकारों की कमी नहीं है। लेकिन फिर भी मेरी दृष्टि में यह आधा सच है, पूरा नहीं।
मैं यह मानकर चलता हूं कि आजकल दलन/अत्‍याचार उन पर अधिक होते हैं जो दलितपन के दायरे से बाहर निकलने या इससे बाहर झांकने की कोशिश करते हैं। जिन्‍होंने दलन का आत्‍मसात कर लिया हो उसके लिए दलन व शोषण और उत्पीड़न  का कोई खास अर्थ ही नहीं रह जाता। न वह इसका प्रतिकार ही करता है और न ही इससे पीडि़त ही महसूस करता है। साफ है कि वह इसे नियति मानकर चलता है। मुझे दलित साहित्‍य के पैरोकारों का अपने आपको ‘दलित’ की परिधि में कैद रखना यानी अपनी वास्‍तविक व गरिमामय अस्मिता की तलाश के प्रति निष्‍क्रिय/उदासीन जैसे बने रहना अपनी मौजूदा स्थिति से आत्‍मसात करने जैसा ही लगता है।
आंबेडकरवाद की कसौटी पर प्रो. तुलसीराम की आत्‍मकथा ‘मुर्दहिया’ को देखें तो इसमें आक्रोश है, एक प्रकार से पूरे सिस्‍टम से बगावत है और इस बगावत के केन्‍द्र में स्‍वयं व्‍यक्ति है। इससे जो हासिल होने वाला है वह स्‍वयं के लिए है, किसी और के लिए नहीं। प्रो. तुलसीराम द्वारा सारे भूत-प्रेत और अंधविश्‍वासी परंपरओं को तोड़ना आंबेडकरवादी/आंबेडकवाद की विचारधारा के पुख्‍ता प्रमाण है़। पढाई के लिए घर-परिवार वालों से चोरी से कस्‍बे में भाग जाना। ये तरीके ऐसे आक्रोश के हैं जो स्‍वयं के आगे बढ़ने लिए जरूरी हैं, दूसरों की टांग खींचने वाले नहीं। बाबा साहब का पूरा जीवन ऐसे ही कारनामों से भरा पड़ा है। अपनी बड़ी लाईन खींचकर आगे बढ़ना ही बाबा साहब ही लाईन है। यही समाज में व्‍यक्ति को स्‍वीकार्य व आदरणीय बनाती है। ऐसे दर्शन के दम पर ही तो बाबा साहब आज दुनिया के 100 श्रेष्‍ठतम बुद्धिमानों की श्रेणी में सम्‍मानजनक पोजिशन में मौजूद हैं। आज जरूरत भी इसी की है। आंबेडकरवादी ऐसी ही सोच ने बेहद मामूली, अभावग्रस्‍त और असीम समस्‍याओं से ग्रस्‍त बालक को जेएनयू का प्रो. तुलसीराम बना दिया।
dalit tyago
इसके विपरीत हमारे प्रखर विद्वान डा. धर्मवीर जी हैं, जो अपने आपको डा. आंबेडकर का बालक बताते हैं। उन्होंने  आईएएस जैसे बड़े पद को सुशोभित किया और कुछ समय पहले तक बहुत ही उम्‍दा, गंभीर व काबिल-ए-तारीफ लेखन भी किया। लेकिन आजकल डा. धर्मवीर तथागत बुद्ध और डा. आंबेडकर के चिंतन-दर्शन की जड़ों में मट्ठा डालकर अपने आधे-अधूरे आजीवक दर्शन की बुनियाद रखने की कोशिश में हैं। उनकी अपनी विद्वत मंडली तथाकथित उनकी आत्‍मकथा ‘मेरी पत्‍नी और भेडि़या’, उनके जार चिंतन और कबीर को आजीवक दर्शन की बैसाखी बनाने पर तुले हैं। ये कभी ‘आजीवक’ को दलित धर्म और कभी किसी अन्‍य ‘दलित धर्म की खोज’ की बात करते है। डा. धर्मवीर के इस उपक्रम की तुलना हिन्‍दूवाद के कट्टरवादी उस आन्‍दोलन से की जा सकती है जिसमें वे ‘हिन्‍दू’ को कभी धर्म कहते है, कभी सिंधु घाटी से उपजा बताते हैं, कभी इसे हिन्‍दी से जोड़ते हैं, कभी इसे हिन्‍दुत्‍व कहते हैं, कभी हिन्‍दू राष्‍ट्रवाद कहते हैं, कभी जीवनशैली कहते हैं और न जाने क्‍या-क्‍या कहते हैं लेकिन अंतत: वही ढाक के तीन पात।
यह सिक्‍के का एक पहलू हैं। आंबेडकरवादी साहित्‍य में हम शोषण-उत्‍पीड़न के विभिन्न पक्षों की बात करते हैं और इसके लिए जिम्‍मेदार लोगों को अपनी वैचारिक स्‍वतंत्रता के अधिकार की बदौलत स्‍वाभाविक रूप से कठघरे में खड़ा करते हैं। ले‍किन अनेक मामलों में हम दूसरों को कठघरे में खड़ा करते समय खुद ही दलितपन के शिकार नजर आते हैं। आंबेडकरवादी कवि ब्राह्मणवादी संस्कृति को कभी ‘परायी-संस्कृति’ या ‘मुर्दा-संस्कृति’ कहता है तो कभी उसे ‘रखैल-संस्कृति’ या ‘कुत्ता-संस्कृति’ के रूप में चिहिंत करता है। क़ुछ ऐसे कवि भी हैं जो कोढ़ी संस्‍कृति यानी हिन्‍दूवादी अपसंस्‍कृति को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि इसे तुम्‍हीं संभालों। यह कोढ़ी व अग्राह्या संस्‍कृति के नकार की सूझबूझ व शक्तिऐसे कवियों को बुद्ध व बाबा साहब के दर्शन व उनकी 22 प्रतिज्ञओं की बदौलत मिलती है। इसमें सम्‍यक निर्णय दलितवाद का नहीं बल्कि अम्‍बेडकरवाद का लक्षण है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जो कहानियों, कविताओं व उपन्‍यासों से दिए जा सकते हैं।
इस कड़ी में यह चर्चा करना भी जरूरी महसूस हो रहा कि जो कुछ भी दलित समाज के व्‍यक्ति के द्वारा लिखा जाता है, क्‍या उसे दलित साहित्‍य या आंबेडकर वैचारिकी का हिस्‍सा मान लिया जाना चाहिए। वैसे यह दावा अक्‍सर दलित साहित्‍यकारों द्वारा किया जाता रहा है कि दलित साहित्‍य केवल दलित ही लिख सकता है। मैं इन दोनों स्थितियों से असहमति व्‍यक्‍त करने को विवश हूं। डा. विजय सोनकर शास्‍त्री का ऐपीसोड मुझे आंबेडकरवादी विचारधारा पर आधारित साहित्‍य कतई नहीं लगता। नीचे वर्णित ऐपीसोड के आधार पर देखें तो डा. शास्‍त्री का दलित समाज से संबंधित होना उसके साहित्‍य को दलित साहित्‍य व अम्‍बेडकरी वैचारिक पर खरा उतरने में मदद नहीं करता।
आंबेडकर वैचारिकी यानी आंबेडकरवाद को समझने के लिए समाज में व्‍याप्‍त निजद्वैतवाद (फिसीपैरस) यानी वैचारिक दोगलापन की प्रवृत्ति को समझना पड़ेगा। इसको समझने के लिए हमको विजय सोनकर शास्‍त्री की दलितों के प्रति भूमिका को भी समझना होगा। गौरतलब है कि डा. विजय सोनकर शास्‍त्री वर्तमान में भाजपा सांसद ही नहीं हैं अपितु एस सी/एस टी कमीशन के चेयरमैन भी रह चुके हैं। मूल बात यह है कि ये भाजपा की ओर से दलितों के प्रतिनिधि हैं। ये लगभग पांच वर्षों से ‘दलित आन्‍दोल पत्रिका’ भी निकाल रहे रहे हैं जिसमें बाबा साहब का बड़ा-बड़ा फोटो भी अक्‍सर होता है।
वे 07.09.2014 को एनडीएमसी कन्‍वैंशन सेंटर में अपनी तीन पुस्‍तकों “हिन्‍दू खटीक जाति”, “हिन्‍दू चर्मकार जाति” और “हिन्‍दू वाल्‍मीकि जाति” का लोकार्पण आरएसएस चीफ माननीय भागवत जी से कराते हैं और स्‍टेटमैंट देते हैं-‘‘हिन्‍दू उपजातियों की संख्‍या हजारों में कैसे पहुंच गई, यह अपने आप में शोध का विषय है। आज की अछूत जातियां पूर्व कट्टर और बहादुर जातियां थीं। विदेशी आक्रांताओं के अत्‍याचारों को सहते हुए उन्‍होंने अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया, बल्कि मैला ढोने जैसे कर्म को स्‍वीकार किया। तब उनसे ज्‍यादा कट्टर हिन्‍दू कौन हो सकता है?’’
उपरोक्‍त टिप्‍पणी हमें आंबेडकरवादी वैचारिकी यानी आंबेडकरवादी मानदंड, जिसे मैं डा. आंबेडकर का विखंडन का सिद्धांत (थ्‍यौरी ऑफ डीकंशट्रक्‍शन) भी कहता हूं, पर परखने को बाध्‍य करती है। ऐसा करने पर हम पाते हैं कि यह टिप्‍पणी हिन्‍दूवाद के निजद्वैतवाद (फिसीपैरस कैरेक्‍टर) यानी विचारों के दोगलेपन पर आधारित है। इस बात पर कैसे यकीन किया जा सकता है कि आरएसएस जैसा हिन्‍दूवाद को समर्पित संगठन जिसके पास धार्मिक कट्टरवादी बुद्धिजीवियों की बड़ी जमात है और जो हिन्‍दूवाद के इतिहास और इसकी संस्‍कृति के संरक्षण को लेकर बड़े-बड़े दावे करता है, को यह पता न हो कि हजारों जातियां कैसे बनीं। यदि उसे सचमुच पता नहीं तो उसे हिन्‍दुओं और राष्‍ट्र के खैरख्‍वाह बनने का कोई नैतिक अधिकार नहीं होना चाहिए। लेकिन मेरी यह प्रबल मान्‍यता है कि आरएसएस को सब पता है। इसका प्रमाण वे अपने अगले वाक्‍य में यह कहकर दे देते हैं कि ‘आज की अछूत जातियां पूर्व कट्टर और बहादुर जातियां थीं।’ और ‘उन्‍होंने विदेशी आक्रांताओं के अत्‍याचारों को सहते हुए अपना धर्म परिवर्तन नहीं किया, बल्कि मैला ढोने जैसे कर्म को स्‍वीकार किया।’ इतना ही नहीं, अंत में यह निष्‍कर्ष निकाल लिया कि ‘उनसे ज्‍यादा कट्टर हिन्‍दू कौन हो सकता है।’
वैसे अब प्रमाणों की कमी नहीं है जो पुख्‍ता करते हैं कि आज का वर्चस्‍ववादी व वर्णवादी समाज ही है, जिसने अतीत में आर्य के रूप में इस देश के मूलनिवासियों को मैला ढोने, मवेशियों का चमड़ा उतारने और घृणित से घृणित कार्य को स्‍वीकार करने के अतिरिक्‍त समाज में रहने का अन्‍य कोई विकल्‍प ही नहीं छोड़ा। आरएसएस चीफ का यहां अछूतों के अन्‍य घृणित पेशों की बात न करके सिर्फ मैला ढोने की बात करना मुझे लगता है कि यह वाल्मिकियों को जैसे तथाकथित दलित खैमें से अलग करना है। दूसरे, वे वाल्मीकि जाति के संबंध में यह टिप्‍पणी करके कि ‘वे वीर-बहादुर जाति रहें हैं और विदेशी आक्रांता यानी मुसलमानों ने उन्‍हें इस घृणित कार्य में झोंका है’ के माध्‍यम से एक तीर से कई शिकार करते नजर आते हैं। ऐसा कहकर एक ओर वे यह संदेश दे रहे हैं कि दलित व अछूतों में वाल्‍मीकि ही ‘वीर-बहादुर’ जाति हैं और संभवत: अन्‍य दलित व अछूत ‘वीर-बहादुर’ नहीं हैं। दूसरी ओर वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि इस मैला प्रथा की दलदल में झोंकने का काम मुस्‍लमानों ने किया है, हिन्‍दुओं की इसमें कोई भूमिका नहीं है। तीसरे, इस वक्‍तव्‍य का एक अर्थ यह भी निकलता है कि वाल्‍मीकियों को कट्टर हिन्‍दू होने का ही एहसास नहीं कराया जा रहा बल्कि उन्‍हें भावी साम्‍प्रदायिक दंगों/टकराव की स्थिति निपटने के लिए उनकी भूमिका भी तैयार की जा रही है। यह अलग बात है कि डा. विजय सोनकर ‘हिन्‍दू खटीक जाति’, ‘हिन्दू  चर्मकार जाति’ और ‘हिन्‍दू वाल्‍मीकि जाति’ नामक पुस्‍तक लिखकर तीनों जातियों को कट्टर हिन्‍दू घोषित करने की मुहिम चला रहे हैं। लेकिन आरएसएस चीफ की उपरोक्‍त टिप्‍पणी सिर्फ मैला ढोने वालों को ही वीर-बहादुर और कट्टर हिन्‍दू कहा है।
संभवत: आरएसएस चीफ‍ यह संदेश देना चाह रहे हैं कि धर्मांतरण कभी नहीं करना चाहिए चाहे उसके लिए कितनी भी बड़ी कीमत क्‍यों न चुकानी पड़े। इसका सीधा-सा मतलब यह हुआ कि चाहे कितने भी निम्‍न स्‍तर के कार्य अछूत कर रहे हैं और कितनी भी जिल्‍लत व शोषण-उत्‍पीडन वे झेल रहे हैं, उन्‍हें अपने हिन्‍दू धर्म की रक्षा की खातिर इसका आत्‍मसात कर लेना चाहिए। दूसरे, डा. अम्‍बेडकर की तरह बुद्ध धम्‍म के अंगीकार (धर्मांतरण) का हिस्‍सा उन्‍हें नहीं बनना चाहिए। यही अप्रत्‍यक्ष संदेश आरएसएस चीफ ईसाई व इस्‍लाम में धर्मांतरण के संबंध में अछूतों को देते नजर आते हैं। यदि इस हिन्‍दू कट्टरवाद की मुहिम को अम्बेडकरवाद के विरुद्ध  देखा जाए तो अनुचित नहीं होना चाहिए। निस्‍संदेह आरएसएस चीफ की एक तीर से कई निशाने साधने की यह अदा काबिल-ए-तारीफ है और डा. विजय सोनकर साहब का इस मुहिम का हिस्‍सा होना भी आज के इस अवसरवादी युग की बड़ी देन कहा जाना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में सर-संघचालक कहते हैं-‘‘हम आरक्षण का समर्थन करते हैं। जब तक समाज में असमानता रहेगी, आरक्षण जरूरी है। समाज में उच्च स्थान पाना दलित जातियों का हक है और उच्च जातियाँ ऐसा करती हैं तो कोई अहसान नहीं करेंगी। उन्होंने कहा कि दलितों ने एक हजार साल तक कष्ट सहा है। उनकी स्थिति ठीक करने के लिये हमें सौ साल तक मुश्किल झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये।’’ यह स्‍टेटमैंट स्‍टेज से गूंजा नहीं कि टी वी व समाचार पत्रों की सुर्खिया बन गया कि आरएसएस चीफ ने आरक्षण को जायज ठहराया है, इसका समर्थन किया। सभी दलित और गैर-दलित हल्‍कों में भी यह चर्चा का विषय बना। अच्‍छा है चर्चा होनी चाहिए। मैं भी इस पर चर्चा करना जरूरी समझ रहा हूं। इसलिए यहां चर्चा कर रहा हूं कि आरएसएस चीफ के इस स्‍टेटमैंट में भी मुझे निजद्वैतवाद नजर आ रहा है यानी कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना जैसा कुछ है। लेकिन इस स्‍टेटमेंट का अगला हिस्‍सा-‘दलितों ने एक हजार साल तक कष्ट सहा है। उनकी स्थिति ठीक करने के लिये हमें सौ साल तक मुश्किल झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये।’, चीफ के स्‍टेटमैंट का यह उत्तरार्ध इस स्‍टेटमैंट के पूर्वार्ध को भी संदिग्‍ध बना देता है। बाद वाले इस स्‍टेटमैंट में आरएसएस चीफ द्वारा अछूतों के 3500 वर्षों से भी अधिक के शोषण-उत्‍पीड़न को घटाकर 1000 तक सीमित करना तर्कयुक्‍त नहीं है। वे 1000 वर्ष के शोषण-उत्‍पीड़न की पूर्ति 100 वर्ष के आरक्षण से करना चाहते हैं।
आरएसएस चीफ भी यही घालमेल करते नजर रहे हैं। आरएसएस चीफ के हिडन ऐजेंडे के अनुसार यदि हम आरक्षण की समय सीमा तय करें तो यह सिर्फ 20 वर्ष ही बचती है। क्‍योंकि 1935 से शुरु 100 वर्ष 2035 में पूरे होते हैं। चूंकि अब 2016 की शुरुआत है यानी आरएसएस चीफ हमारे लिए आरक्षण सिर्फ 19 वर्ष तक देने की बात कर रहे हैं। वैसे न तो आरएसएस चीफ यह तय करने की कोई ऑर्थोटी हैं और न ही हम, इसलिए इस विषय पर हमारे लिए किसी मोल-भाव का कोई प्रश्‍न ही नहीं उठता। लेकिन यहां मामला नीयत का है और इरादे का भी। मुझे दोनों ही संदिग्‍ध नजर आते हैं।
आंबेडकर वैचारिकी और दलित साहित्‍य के अंत:संबंध की परख करते हुए मुझे पुन: ‘दलित’ शब्‍द पर लौटना प्रासांगिक महसूस हो रहा है ताकि आम्‍बेडकर वैचारिकी के तहत इसकी परख हो सके। ‘दलित’ शब्द एक विशेषण है, कोई संज्ञा नहीं है और इस हकीकत से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि जीवन के हर स्तर पर हो रहे शोषण-उत्पीड़न के चलते ही इस देश के मूल-निवासियों को सैंकड़ों अपमानजनक जातियों के साथ-साथ अस्पृश्य, अछूत, अंत्यज, चांडाल जैसी विभिन्न संज्ञाओं से गुजरना पड़ा है। ‘दलित’ शब्द भी इसी श्रेणी में आता है। यह सब हम पर थोपा हुआ है, जो किसी भी विवेकशील समाज के लिए अस्मिता का परिचायक नहीं हो सकता। आम्‍बेडकर वैचारिकी इस बात पर फोकस करने को विवश करती है कि हम उस इंसानी अस्मिता की तलाश करें जहां से मौजूदा स्थिति में पहुंचाने वाले षडयंत्रों, हिंसक नरसंहारों और निरंतर चले आ रहे शोषण-उत्पीड़न की शुरुआत होती है। मौजूदा अध्ययन के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि तथाकथित दलित इस देश के मूलनिवासी हैं और ये लोकायत/चार्वाक संस्कृति के संवाहक यानी आजीवक हैं जो अपनी आजीविका मेहनत से कमाते हैं अर्थात श्रमजीवी हैं, शांति-प्रिय हैं और उच्च नैतिक मूल्यों का अनुपालन इनकी प्रमुख ऐतिहासिक चारित्रिक विशेषता है। जो विद्वान ‘दलित’ शब्द को अस्मिता के रूप में अंगीकार करने के लिए बाजिद हैं, मुझे लगता है कि वे अपनी मूल अस्मिता की तलाश के लिए मशक्कत से बचते हैं और धारा के विरुद्ध तैरने का साहस नहीं रखते। यह कहना अतिश्‍योक्ति नहीं होगा कि डा. आंबेडकर की वैचारिकी यानी अम्‍बेडकरवाद का संबंध केवल साहित्‍य तक सीमित नहीं बल्कि समाज, राष्‍ट्र व पूरी मानवता के साथ इसका घनिष्‍ठ अंत:संबंध है।

” क्रांतिकारी रैदास ”…. एड्वोकेट कुशालचन्द्र

sant ravidas

किसी ने कहा है की जिस कौम का इतिहास नही होता, उस कौम का कोई भविष्य नही होता, आज बहुजन (बहुजन (बहुजन (दलित))) समाज की बात करे तो भगवान बुद्ध के बाद बहुजन (बहुजन (दलित)) आंदोलन के अग्रदूत गुरू रविदास हुए है ।

गुरू रविदास का जन्म माघ सुदी 15 विक्रम संवत् 1460 मे मंडुआ डीह नामक एक गाँव मे रघुराम जी के घर हुआ इनकी माता का नाम करमा देवी था, उनका विवाह लोना देवी से साथ हुआ ।

रैदासजी प्रारम्भ से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे उन्होने ब्राह्मणों के चारों वेदो का खण्डन किया तथा उन्हे व्यर्थ कि किताबें बताया साथ ही गुरू कबीर ने इन्ही वेदो को अधर्म के वेद बताया । उन्होने ब्राह्मण धर्म के सभी रीति-रिवाजों यज्ञ, श्राद्ध, मंदिरों मे पूजा पाठ, आदि हर ब्राह्मणी कर्मकाण्‍ड का तर्क के साथ खण्डन किया । उन्होने बहुजन (बहुजन (दलित)) समाज को चेताया की केवल बहुजन (बहुजन (दलित)) समाज के लोग ही असल मे भारत के शासक रहे है, सिन्धु सभ्यता अर्थात् बहुजन (बहुजन (दलित)) सभ्यता से लेकर मोर्य काल तक भारत पर केवल और केवल बहुजन (बहुजन (दलित))ों का शासन ही रहा है ।

उन्होने बहुजन (बहुजन (दलित))ो को शिक्षा देना शुरू किया तथा उन्होने उप अक्षरों की गुरूमुखी लिपी बनाई तथा उसी लिपि मे अपनी बाणी की रचना की । रैदास की बाणियो से ही ऐसा आभास होता है कि रैदास ने ऐसे राज्य की स्थापना करना चाही जहा ऊचँ-नीच, शोषण आदि का कोई नाम नही हो ।

गुरू रैदास ने उस जमाने मे विधवा मीरा को दीक्षा दी, जब भारत भर मे खासकर राजस्थान मे विधवा को पति की लाश के साथ जिन्दा जला दिया जाता था, इस सामाजिक कुरीति को ब्राह्मण धर्म का पूरा समर्थन हासिल था, तथा उस समय विधवा हो जाना सबसे बड़ा गुनाह था, चाहे इसमे पत्नि का कोई दोष नही हो ।

गुरू रैदास ने उन अटकलो को भी खारिज किया, जिसमे उनके राम को दशरथ पुत्र राम कहा गया, उन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके राम वह राम नही है, जो दशरथ का पुत्र है । उनका राम तो उनकी अन्तर आत्मा है ।

गुरू रैदास के वास्तव मे कोई गुरू नही थे, क्योकि किसी बहुजन (बहुजन (दलित)) को आज तक, इस भारत मे किसी ने अपना शिष्य नही माना, न ही शिक्षा दी, उन्हे हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिए शिक्षा से दुर रखा, इतिहास गवाह है कि लगभग किसी भी बहुजन (बहुजन (दलित)) संत का कोई गुरू नही रहा ।

वाल्मिकी से लेकर डॉ. अम्बेडकर तक किसी भी बहुजन (बहुजन (दलित)) संत ने गुरू धारण नही किया । शरीरधारी गुरू धारण करने कि परम्परा मात्र ब्राह्मणो मे थी, जिस प्रकार भगवान बुद्ध ने किसी को गुरू नही बनाया, उसी प्रकार बहुजन (बहुजन (दलित)) संतो ने भी किसी को गुरू नही बनाया ।

गुरू रैदास की वाणी मे बोद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है । उनकी बाणी मे हिन्दू धर्म या उससे सम्बन्धित किसी भी वेदों का उपयोग नही मिलता है । उन्होने स्पष्ट कहा की किसी भी जाति या वर्ण विशेष मे जन्म लेने से कोई छोटा या बड़ा नही हो जाता है और उन्होने मंदिरों, अवतारो, त्रिमूर्ति, सभी को झूठ और धोखा बताया ।

गुरू रैदास कहते है कि ”बिन देखे उपजे नही आशा, जो देखू सो होय विनाशा ” अर्थात जो दिखाई नही देता उसके प्रति भावना पैदा नही होती तथा जो दिखाई देता है वह नश्वर है, उसका अन्त होना निश्चित है, गुरू रैदास का यह श्लोक उन्हे भगवान बुद्ध के नजदीक ला देता है ।

भगवान बुद्ध ने भी सृष्टिकर्ता ईश्वर के अस्तित्व से इंकार किया । गुरू रैदास के समकालीन तथा सहमित्र रहे गुरू कबीर कुछ ज्यादा ही मुखर शब्दों मे बोले कि ” अगर ईष्ट देव का नाम जपने से ही कुल फल मिलता हो तो रोटी-रोटी करने से पेट भर जाना चाहिये ।” उन्होने कहा कि केवल शुभ काम करने से ही भला होगा ।

गुरू कबीर ने ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनोती देते हुए कुछ ज्यादा ही स्पष्ट कहा कि ‘‘जो तू बामण बामणी जाया, तो आण बाट क्यों नही आया’’ अर्थात् तू अगर बामणी के पैदा होने के कारण ही ब्राह्मण होने का दावा करता है तो तुझे आम आदमी की तरह माँ के गर्भ से पैदा नही होना चाहिये या बल्कि किसी अन्य रास्ते से पैदा होना चाहिये था ।

गुरू रैदास और गुरू कबीर ने साथ मिलकर ब्राह्मणवादी सता के विरूद्ध आंदोलन चलाया और उनकी प्रखर आलोचना की, और बहुजन (बहुजन (दलित)) लोगों मे चेतना जागृत करने का कार्य किया ।

गुरूनानक भी गुरू रैदास के समकालीन थे, वे गुरू रैदास से मिले भी थे तथा उनकी वाणी को साथ लेकर भी गये, वे गुरू रैदास से इतने अधिक प्रभावित थे, कि वे उनकी वाणी को स्‍वयं गाते भी थे । दशम् गुरू गोबिन्द सिंह ने अपने कार्यकाल मे समस्त भारत के सन्तों की वाणी को ‘‘गुरू ग्रन्थ साहिबा’’ मे संकलन किया । जिसमे गुरू रैदास के 41 पद को शामिल किया गया ।

यह आम मान्यता है कि गुरू रैदास 100 वर्षो से भी ज्यादा जीए । अतः प्रश्न यह उठता है कि उन्होने सम्पूर्ण जीवनकाल में क्या मात्र 41 पद ही रच पायें । यह बात पूर्णत अविश्वसनीय लगता है कि, ऐसा माना जाता है कि गुरू नानक जब गुरू रैदास से मिले तब वे 41 पद को उनकी हत्या से पूर्व ही अपने साथ ले गये जिसका संकलन लगभग 150 वर्षो बाद ‘‘ गुरू ग्रन्थ साहिबा ’’ मे किया गया ।

प्रश्‍न यह उठता है कि शेष बाणियाँ कहा गई । माननीय चन्द्रिका प्रसाद का मानना है की गुरू रैदास की हत्या करके उनकी चिता मे उनकी समस्त बाणीया उनके शरीर के साथ आग की भेंट चढा दी गई । अगर उनकी हत्या नही की गई होती तो उनकी बाणीया अवश्य मिलती ।

प्रश्‍न यह भी है की यह नीच काम किसने किया, सीधा सा उत्तर है ऐसा काम उन्ही लोगों ने किया जिन्होंने उनके शरीर से ’’जनेऊ‘‘ निकाले थे । यह ब्राह्मणो व सामंतो ने बड़ी चतुराई से मिलकर एक षडयन्त्र के तहत जनेऊ दिखाने के बहाने उनके शरीर को राणा विक्रम सिंह चितोड़गढ़ के भरे दरबार मे गुरू रैदास का सीना चीर कर उनकी जीवन लीला समाप्त कर दी और उनके पार्थिव शरीर को मेघवालों कि बस्ती मे भिजवा दिया गया, और यह कहलवा कर कि तुम्हारे गुरू ने भीतर का जनेऊ दिखाकर सभी को चकित कर दिया और स्वेच्छा से शरीर छोड़ दिया है । उनकी हत्या की खबर सुनते ही उनकी धर्मपत्नी लोना जी सदमे को बर्दाश्त न कर सकी और यह समाचार सुनते ही उनका देहान्त हो गया ।

गुरू रैदास की हत्या के बारे मे लेखक सतनाम सिंह ने अपनी पुस्तक मे प्रमाणिक दस्तावेजो के साथ उल्लेख करते हुए कुछ महत्वपूर्ण कारण बताये है जिसमे गुरू रैदास द्वारा ब्राह्मणवादी व्यवस्था को चुनोती देना, मीरा को दीक्षा देना, वेदो का खण्डन करना, बहुजन (बहुजन (दलित))ो मे राजनैतिक चेतना जाग्रत करना, राजमहल मे ब्राह्मणो के वर्चस्व को चुनोती देना आदि प्रमुख कारण रहे थे । साथ ही लेखक सतनाम सिंह ने गुरू रैदास की हत्या के घटनाक्रम का विस्तार से वर्णन किया है ।

वर्तमान समय मे गुरू रैदास के विचारो को अमली जामा पहनाने का कार्य करने वाले आधुनिक भारत के पितामाह डॉ. अम्बेडकर ने किया, जिसकी झलक आज के इस आधुनिक भारत के संविधान मे साफ दिखाई देता है ।

लेखक

कुशाल चौहान, एडवोकेट
मोबाइल 94142 44616
बिरसा फुले अम्बेडकर एसोसिएशन राजस्थान
पेज की दर्शक संख्या : 2703

फेसबुक पर एक लाख प्लस फोल्लोवेर्स होने पर दिलीप सी मंडल एव समस्त बहुजन भाइयों को हार्दिक मंगलकामनाएं *दिलीप मंडल की जुबानी अपनी कहानी* आप सभी से अनुरोध है की फेसबुक पर वर्तमान मूलविासी गुरु, पत्रकार एव मार्गदर्शक श्री दिलीप सी मंडल को फॉलो या ज्वाइन जरूर करें हर रोज उनके ज्ञानवर्धक वचन आँखें खोलने के लिए काफी हैं https://www.facebook.com/dilipc.mandal

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*दिलीप मंडल की जुबानी अपनी कहानी*

आज शायद पहली बार मेरी अपनी कहानी.

जब मैं पत्रकारिता में आया तो हर दिन कम से कम दस अखबार पढ़ता था.

*क्योंकि मेरे नाम के पीछे (सरनेम जो जाति बयां करता है) जो लगा है, उसके साथ अगर मैं अपने साथ वालों से दोगुनी जानकारी न रखता, तो मुझे बराबर का भी न माना जाता.*

बाकी लोग न पढ़कर भी जानकार माने जाने का सुख ले सकते थे.

उनका ज्ञानी होना स्वयंसिद्ध था.

*यह उनके टाइटिल में था. पिता के टाइटिल में था.*

जनसत्ता, कोलकाता में जब मैं काम करता था, तो न्यूज डेस्क पर सबके बराबर काम करता था.

यानी आठ से दस घंटे.

लेकिन इसके अलावा, ऑफिस आने से पहले, मैं हर रोज तीन-चार घंटे की रिपोर्टिंग अलग से करता था.

इसके अलावा ए़डिट पेज के लिए लेख भी लिखता था.

डेस्क के लोग आम तौर पर यह नहीं करते थे.

मैं हर रिपोर्टिंग दिन करता था. मेरा वर्किग आवर औरों से डेढ़ गुना था.

इस वजह से कम सोता था. यह मेरी च्वाइस थीं. वरना, मेरा भी काम सिर्फ ऑफिस वर्क से चल जाता.

*लेकिन मुझे सिर्फ काम नहीं चलाना था. सबके कम उम्र में संपादक बनना था.*

यह सब इसलिए बता रहा हूं कि

*अगर आप SC, ST, OBC हैं तो बाकियों के बराबर होने से काम नहीं चलेगा. औरों से दोगुना तक ज्यादा मेहनत करेंगे, उनसे बेहतर करेंगे, तब कहीं बराबर के माने जाएंगे.*

आपका ज्ञान, आपका पांडित्य स्वयंसिद्ध नहीं है.

*हर दिन उसे साबित करना पड़ेगा. बराबर होने से आपका काम नहीं चलने वाला. आपको ज्यादा करना होगा.*

इंडिया टुडे का पहला मैनेजिंग एडिटर होने के बावजूद, या तमाम शीर्ष पदों पर होने के बावजूद मेरा टैलेंट स्वयंसिद्ध नहीं है.

मीडिया की सबसे पॉपुलर किताब लिखने के बावजूद मेरी प्रतिभा स्वयंसिद्ध नहीं है.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के लिए मेरा चैप्टर लिखना भी मुझे टैलेंटेड कहे जाने के लिए काफी नहीं है.

शायद मैं भारत का अकेला संपादक रहा, जिसने प्रिंट, टीवी और वेब तीनों जगह काम किया.

*पढ़ाया, किताबें लिखीं, देश भर की यूनिवर्सिटी में लैक्चर दिए, लेकिन आज भी मुझे अक्सर साबित करना पड़ता है कि मुझे मास कम्युनिकेशन की समझ है.*

इसलिए अब भी मैं नियमित लाइब्रेरी में पाया जाता हूं.

*मुझे आज भी साबित करना पड़ता है कि मुझे अपना काम आता है.*

इससे मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ है.

हमेशा अप-टू-डेट रहना पड़ता है. बहुत पढना पड़ता है, तो इसमें समस्या क्य़ा है?

यह तो अच्छी बात है.

है कि नहीं?

*दिलीप सी मंडल की फेसबुक वाल से*

 

chautha khamba dilip mandal

बौद्ध धम्म कोई धर्म नहीं हैं दोनों में फर्क है, इस फर्क को समझें बिना आप बौद्ध धम्म के सार को नहीं पा सकते , आईये समझें धम्म क्या है ….facebook page बुद्धकथाएँ

DHAMMA or DHARMAधम्म क्या है ?
धम्म पाली भाषा का एक शब्द है जैसे संस्कृत में धर्म वैसे पाली में धम्म.
परंतु महामानव गौतम बुद्ध का धम्म यह ब्राह्मण धर्म से बिलकुल अलग है ब्राह्मण धर्म आत्मा और परमात्मा पर आधारित है पर बुद्ध का धम्म विज्ञान पर जिस में आत्मा और परमात्मा के आस्तित्व को नकार दिया गया है ,इस लिए कुछ लोग बौद्ध धम्म को नास्तिको का धम्म भी कहते है
धर्म इंसान को देवतो के आस्तित्व को विशवास करने को मजबूर करता है ; पर बुद्ध का धम्म इंसान को आंतरिक मनोबल प्रदान करता है
धम्म मतलब सामाजिक विज्ञान. धम्म मतलब सामाजिक क्रांती. धम्म मतलब सामाजिक बंधुत्व, धम्म मतलब सामाजिक आत्म-सम्मान!
लोग धर्म को मानाने वाले हो सकते है लेकीन धम्म को मानाने वाले नहीं हो सकते क्योंकि धम्म इंसान को विज्ञानवादी बना देता है . धम्म का पालन करने वालो का दिमाग खुल जाता है अर्थात धम्म का पालन करने वाला यह जनता है की क्या उस के लिए अच्छा है और क्या बुरा वो आँख बंद कर किसी किताब का पालन नहीं करता क्यों की बुद्ध ने यह सिखाया ही नहीं है, बुद्ध का धम्म किसी किताब में कैद नहीं है क्यों बुद्ध ने बौद्ध धम्म को मानाने वाले लोगो को कोई किताब नहीं दी जिस से धम्म सीख जाये यह तो बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद संघ ने बुद्ध के उपदेशो को सुरक्षित रखने के लिए उन्हें किताबो में संगृहीत करने की कोशिश की ,बुद्ध तो यह स्वयंम कहते थे की धार्मिक किताबो में समय के साथ कुछ ऐसे बाते जुड़ जाती है ,जो उस समय के हिसाब से अनुकूल नहीं है या फिर उन्हें किसी के द्वारा स्वयं के लाभ के लिए धार्मिक किताबो में जोड़ दिया गया है ,इस लिए धार्मिक किताब में लिखी हर बात को अपनी बुद्धि से परखो यह है बुद्ध का धम्म, धम्म से नैतिकता पर आधारित समाज की रचना होती है ,धम्म से लोग जागृत होते है,वह अन्याय सहन नहीं करते क्योंकी उन के पास सम्यक दृष्टी होती है बल्कि वह . अन्याय के विरुद्ध लड़ने को तैयार होते है . बंधु-भाव निर्माण होता है . प्रेम-जीव के प्रति. प्रेम का निर्माण होता है और इस प्रेम से समाज संरक्षित होता है
धम्म के कारन लोग समाज के उद्धार के लिए सतर्क और कार्यरत रहते है धम्म का पालन करने वाले लोग हमेशा सामाजिक अभ्यास करते है और जब कभी समता ,स्वतंत्रता और बंधुत्व को कोई तत्व हानि पहुचते है तब वह सम्यक दृष्टि का इस्तेमाल करते हुए बुद्ध के तत्व को समाज में पुनः स्थापित करने के लिए जान लगा देते है
धर्म मतलब धर्म के लिए कुछ भी ,धर्म गर्व रखना सिखाता है ,पूजा पाठ करना सीखता है ,जाति पलना सीखता है ,व्रत सिखाता है ,जो चीज़ जो स्वयंम के स्वार्थ के लिए है वह सब सिखाता है और मनुष्यता तो भुला के केवल धर्म सिखाता है
उसी प्रकार धम्मांधता मतलब बौद्ध-धम्म के लिए कुछ भी करना ,अंद्धश्रद्धालु हो के पुजा-पाठ करना , धम्म तो सीखना पर धम्म का पालन न करना (धम्म को मानते है; धम्म की नही मानते), आपस में भेदभाव करना ,गुटो का निर्माण करना ,स्वयंम के स्वार्थ के लिए समाज को धोखा देना , बौद्ध धम्म पर गर्व करना ,बुद्ध को ईश्वर मान कर उन की पूजा करना ,बौद्ध-धम्म के बारे में जो बुरा बोलता है उस का अज्ञान न मिटा के उस पर प्रहार करना ,किसी दुसरे धर्म के लोगो पर बौद्ध धम्म लादना धम्मांधता है
ऐसा झूठा धम्म या धर्म को पालने वाले स्वयंम को ऊँचा समझते है ,अज्ञानी लोगो को गुलाम समझते है ,उन्हें लगता है की वह धम्म का पालन कर रहे है इस लिए वह महान है ,और जो धम्म का पालन नहीं कर रहे वह मुर्ख है ,ऐसा सोचना समाज के लिए घातक है ,धोखादायी है , अगर तुम धम्म को पालते हो तो दुसरो का अति इस को सहना सीखना होगा उस के लिए पर्यटन करना होगा ,लोगो को खुद को हीन समझने दे कर तुम धम्म का अपमान कर रहे हो,सामाजिक भेदभाव पाल कर तुम धम्म का अपमान कर रहे हो,फिर दूसरे धर्मो में और तुम्हारे धम्म में क्या अंतर है
बौद्ध-धम्म में ऐसा कुछ करना गलत है , . धम्म मतलब बौद्ध लोगो की अस्मिता वह धम्म बदनाम हो ऐसे काम नहीं करने चाहिए
धम्म मनुष्य के लिए है ,मनुष्य धम्म के लिए नहीं है ऐसा बाबा साहेब ने कहा है
बुद्ध ने भी कभी अपना धम्म किसी पर नहीं लादा,पहले उसे खुद पर परखा फिर दुसरो को सिखाया
बौद्ध धम्म तर्क करने लगता है ,समाज के लिए जो सही है वह करना सिखाता है ,समाज का अज्ञान दूर करना है यह बताता है दुसरो को ज्ञानी बनाना यह सिखाता है
समाज के कल्याण के लिए जो कुछ करता है वह धम्म है
बौद्ध धम्म मतलब अन्याय के विरुद्ध लड़ाई ,अधम्म मतलब समाज पर होने वाले अर्थिक, मानसिक, शैक्षणिक और सामाजिक शोषण. इस शोषण के विरुद्ध, या इस अन्याय के विरुद्ध अगर हम नहीं लड़े तो हमारे बौद्ध होने का क्या मतलब ?
धम्म एक वैचारिक लड़ाई है ,. धम्म बताता है बुद्धि की में शरण जा! बुद्धि का उपयोग कर के समाज में क्या बुराई है यह पता चलता है और उस को सुधरने का उपाय भी आता है
. धम्म बताता है की धम्म की शरण में लोक-कल्याण के मार्ग पर चलो . धम्म बताता है संघटित रहो मतलब समाज की रक्षा करो ; न्याय और समता के लिए संघर्ष करो .
“Give a man a Fish, and you feed him for a day; show him how to catch fish, and you feed him for a lifetime”.
इस उक्ति में ही धम्म है ,एक व्यक्ति को आप दान करो वह धर्म है ,लेकिन एक व्यक्ति को उस की आजीविका के लिए कुछ काम सीखना , उस में आत्मविश्वास और स्वाभिमान का निर्माण करना ,उसे जीवन भर भीख न मागते हुए .सम्यक मार्ग पे चलते हुए उस के जीवन भर पेट भरने का प्रबोधन देना यही धम्म है