वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन : धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देता महामानव| एक बार बस एक बार के लिए अपने ईश्वर, धर्म और धर्म ग्रन्थ से आगे बढ़ कर देखने जानने और सोचने की कोशिश तो करो, तुम्हारा ही भला होगा …आशीष श्रीवास्तव

12 फरवरी महान वैज्ञानीक चार्ल्स डार्विन का जन्मदिन है। यह उस महामानव का जन्मदिन है जिसने अपने समय की जैव विकास संबधित समस्त धारणाओं का झुठलाते हुये क्रमिक विकासवाद(Theory of Evolution) का सिद्धांत प्रतिपादित किया था।

जीवों में वातावरण और परिस्थितियों के अनुसार या अनुकूल कार्य करने के लिए क्रमिक परिवर्तन तथा इसके फलस्वरूप नई जाति के जीवों की उत्पत्ति को क्रम-विकास या विकासवाद (Evolution) कहते हैं। क्रम-विकास एक मन्द एवं गतिशील प्रक्रिया है जिसके फलस्वरूप आदि युग के सरल रचना वाले जीवों से अधिक विकसित जटिल रचना वाले नये जीवों की उत्पत्ति होती है। जीव विज्ञान में क्रम-विकास किसी जीव की आबादी की एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी के दौरान जीन में आया परिवर्तन है। हालांकि किसी एक पीढ़ी में आये यह परिवर्तन बहुत छोटे होते हैं लेकिन हर गुजरती पीढ़ी के साथ यह परिवर्तन संचित हो सकते हैं और समय के साथ उस जीव की आबादी में काफी परिवर्तन ला सकते हैं। यह प्रक्रिया नई प्रजातियों के उद्भव में परिणित हो सकती है। दरअसल, विभिन्न प्रजातियों के बीच समानता इस बात का द्योतक है कि सभी ज्ञात प्रजातियाँ एक ही आम पूर्वज (या पुश्तैनी जीन पूल) की वंशज हैं और क्रमिक विकास की प्रक्रिया ने इन्हें विभिन्न प्रजातियों मे विकसित किया है।

दुनिया के सभी धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि मानव सहित सृष्टि के हर चर और अचर प्राणी की रचना ईश्वर ने अपनी इच्छा के अनुसार की। प्राचीन पौराणिक ग्रंथों में उपलब्ध वर्णन से भी स्पष्ट होता है कि प्राचीनकाल में मनुष्य लगभग उतना ही सुंदर व बुद्धिमान था जितना कि आज है। पश्चिम की अवधारणा के अनुसार यह सृष्टि लगभग छह हजार वर्ष पुरानी है। यह विधाता द्वारा एक बार में रची गई है और पूर्ण है।

ऐसी स्थिति में किसी प्रकृति विज्ञानी (औपचारिक शिक्षा से वंचित) द्वारा यह प्रमाणित करने का साहस करना कि यह सृष्टि लाखों करोड़ों वर्ष पुरानी है, अपूर्ण है और परिवर्तनीय है-कितनी बड़ी बात होगी। इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। ईश्वर की संतान या ईश्वर के अंश मानेजाने वाले मनुष्य के पूर्वज वानर और वनमानुष रहे होंगे, यह प्रमाणित करनेवाले को अवश्य यह अंदेशा रहा होगा कि उसका हश्र भी कहीं ब्रूनो और गैलीलियो जैसा न हो जाए।

अनादि माने जानेवाले सनातन धर्म, जिसे हिंदू धर्म के नाम से भी जाना जाता है, में कल्पना की गई है कि ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की और मनु व श्रद्धा को रचा। आदिपुरुष व आदिस्त्री माने जाने वाले मनु और श्रद्धा को आज भी पूरे श्रद्धा व आदर से पूजा जाता है, क्योंकि हम सब इन्हीं की संतान माने जाते हैं। उसी तरह अति प्राचीन यहूदी धर्म, लगभग दो हजार वर्ष पुराने ईसाई धर्म और लगभग तेरह वर्ष पुराने इसलाम धर्म में आदम एवं हव्वा को आदिपुरुष और आदिस्त्री माना जाता है। उनका नाम भी आदर के साथ लिया जाता है, क्योंकि सभी इनसान उनकी ही संतान माने जाते हैं।

कालक्रम की गणना में विभिन्न धर्मों में अंतर है। सनातन धर्म की मान्यताओं के अनुसार, सृष्टि की रचना होती है, विकास होता है और फिर संहार (प्रलय) होता है। इसमें युगों की गणना का प्रावधान है और हर युग लाखों वर्ष का होता है, जैसे वर्तमान कलियुग की आयु चार लाख बत्तीस हजार वर्ष आँकी गई है।

पश्चिमी धर्मों(अब्राहमिक धर्मो) की मान्यताओं के अनुसार ईश्वर ने सृष्टि की रचना एक बार में और एक बार के लिए की है। उनके अनुसार मानव की रचना अधिक पुरानी नहीं है। लगभग छह हजार वर्ष पूर्व मनुष्य की रचना उसी रूप में हुई है जिस रूप में मनुष्य आज है। इसी तरह सृष्टि के अन्य चर-अचर प्राणी भी इसी रूप में रचे गए और वे पूर्ण हैं।

लेकिन मनुष्य की जिज्ञासाएँ कभी शांत होने का नाम नहीं लेती हैं। सत्य की खोज जारी रही। परिवर्तशील प्रकृति का अध्ययन उसने अपने साधनों के जरिए जारी रखा और उपर्युक्त मान्याताओं में खामियाँ शीघ्र ही नजर आने लगीं।

पूर्व में धर्म इतना सशक्त व रूढ़िवादी कभी नहीं रहा। समय-समय पर आर्यभट, ब्रह्मगुप्त, भास्कराचार्य जैसे विद्वानों ने जो नवीन अनुसंधान किए उन पर गहन चर्चा हुई। लोगों ने पक्ष और विपक्ष में अपने विचार स्पष्ट रूप से व्यक्त किए।

परंतु पश्चिम में धर्म अत्यंत शक्तिशाली था। वह रूढ़ियों से ग्रस्त भी था। जो व्यक्ति उसकी मान्यताओं पर चोट करता था उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ती थी। कोपरनिकस ने धार्मिक मान्यता पर पहली चोट की। उनका सिद्धांत उनकी पुस्तक मैग्नम ओपस के रूप में जब आया तो वे मृत्यु-शय्या पर थे और जल्दी ही चल बसे। ब्रूनो एवं गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ी। ब्रूनो को जिंदा जला दिया गया। गैलीलियो को लंबा कारावास भुगतना पड़ा। पर उनके ये बलिदान व्यर्थ नहीं गए। उन्होंने लोगों के ज्ञानचक्षु खोल दिए। अब लोग हर चीज को वैज्ञानिक नजरिए से देखने लगे।

उन्नीसवीं सदी के पहले दशक में प्रख्यात चिकित्सक परिवार में जनमे चार्ल्स डार्विन ने चिकित्सा का व्यवसाय नहीं चुना। हारकर उनके पिता ने उन्हें धर्माचार्य की शिक्षा दिलानी चाही, पर वह भी पूरी नहीं हो पाई। बचपन से ही प्राकृतिक वस्तुओं में रुचि रखनेवाले चार्ल्स को जब प्रकृति विज्ञानी के रूप में बीगल अनुसंधान जहाज में यात्रा करने का अवसर मिला तो उन्होंने अपने जीवन को एक नया मोड़ दिया।

treeसमुद्र से डरनेवाले तथा आलीशान मकान में रहनेवाले चार्ल्स ने पाँच वर्ष समुद्री यात्रा में बिताए और एक छोटे से केबिन के आधे भाग में गुजारा किया। जगह-जगह की पत्तियाँ, लकड़ियाँ पत्थर कीड़े व अन्य जीव तथा हडड्डियाँ एकत्रित कीं। उन दिनों फोटोग्राफी की व्यवस्था नहीं थी। अतः उन्हें सारे नमूनों पर लेबल लगाकर समय-समय पर इंग्लैंड भेजना होता था। अपने काम के सिलसिले में वे दस-दस घंटे घुड़सवारी करते थे और मीलों पैदल भी चलते थे। जगह-जगह खतरों का सामना करना, लुप्त प्राणियों के जीवाश्मों को ढूँढ़ना, अनजाने जीवों को निहारना ही उनके जीवन की नियति थी।
गलापागोज की यात्रा चार्ल्स के लिए निर्णायक सिद्ध हुई। इस द्वीप में उन्हें अद्भुत कछुए और छिपकलियाँ मिलीं। उन्हें विश्वास हो गया कि आज जो दिख रहा है, कल वैसा नहीं था। प्रकृति में सद्भाव व स्थिरता दिखाई अवश्य देती है, पर इसके पीछे वास्तव में सतत संघर्ष और परिवर्तन चलता रहता है।

ओरीजीन आफ स्पीसीज

ओरीजीन आफ स्पीसीज

चार्ल्स डार्विन ने जब 150वर्ष पूर्व “द ओरिजिन आफ़ स्पेशीज” का प्रकाशन किया था, तब उन्होने जानबूझकर जीवन की उत्त्पति के विषय को नजर अंदाज किया था। इसके साथ साथ अंतिम पैराग्राफ़ मे ‘क्रीयेटर’ (निर्माता) का जिक्र हमे इस बात का भी अहसास दिलाता है कि वे इस विषय पर किसी भी प्रतिज्ञा या दावे से झिझक रहे थे। यह कथन अकसर चार्ल्स डार्विन के संदर्भ मे सुनने मे आ जाता है। लेकिन उपरोक्त कथन सही नही है और सच यह है कि अंग्रेज प्रकृतिवादी डार्विन ने दूसरे कई दस्तावेजों मे इस बात पर विस्तार से चर्चा की‌है कि किस तरह पहले पूर्वज असितत्व मे आये होंगे।

“इस पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जीव, जीवन के किसी मौलिक रूप से अवतीर्ण या विकसित हुये है!”

चार्ल्स डार्विन ने सन 1859 मे द ओरिजिन आफ़ स्पेशीज मे यह कथन प्रकाशित किया था। डार्विन अपने सिद्धांत हेतु इस विषय के महत्व को लेकर पूर्णत: आश्वस्त थे। उनके पास रसायनो का जैविक घटको मे परिवर्तित हो जाने की घटना को ले कर आधुनिक भौतिक्तावादी तथा विकासवादी समझ व दृष्टि थी। खास बात यह है कि उनकी यह धारणा पास्चर के सहज पीढ़ी की धारण के विरोध मे किये जा रहे प्रयोगों के बावजूद बरकरार थी।

1859 में चार्ल्स डार्विन ने ‘ओरिजिन आफ स्पेसीज‘ नामक पुस्तक प्रकाशित करके विकासवाद का सिद्धांत प्रकाशित किया, जिसके मूल तत्व निम्नलिखित हैं-

  • इस विविधतापूर्ण दृश्य जगत का आरंभ एक सरल और सूक्ष्म एककोशीय भौतिक वस्तु (सेल या अमीबा) से हुआ है। यही एककोशीय वस्तु कालचक्र से जटिल होते-होते इस बहुमुखी विविधता में विकसित हुई है। जिसके शीर्ष पर मनुष्य नामक प्राणी स्थित है।
  • इस विविधता विस्तार की प्रक्रिया में सतत्‌ अस्तित्व के लिए संघर्ष चलता रहता है।
  • इस संघर्ष में जो दुर्बल हैं, वे नष्ट हो जाते हैं। जो सक्षम हैं वे बच जाते हैं। इसे प्राकृतिक चयन की प्रक्रिया कह सकते हैं।
  • प्राकृतिक चयन की इस प्रक्रिया में मानव का अवतरण बंदर या चिम्पाजी की प्रजाति से हुआ है अर्थात्‌ बंदर ही मानवजाति का पूर्वज है। वह ईश्वर पुत्र नहीं है, क्योंकि ईश्वर जैसी किसी अभौतिक सत्ता का अस्तित्व ही नहीं है। 1871 में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘दि डिसेंट आफ मैन‘ (मनुष्य का अवरोहण) शीर्षक देकर डार्विन ने स्पष्ट कर दिया मनुष्य ऊपर उठने की बजाय बंदर से नीचे आया है।
  • प्राकृतिक चयन से विभिन्न प्रजातियों के रूपांतरण अथवा लुप्त होने में लाखों वर्षों का समय लगा होगा।

डार्विन की इस प्रस्थापना ने यूरोप के ईसाई मस्तिष्क की उस समय की आस्थाओं पर जबरदस्त कुठाराघात किया। तब तक ईसाई मान्यता यह थी कि सृष्टि का जन्म ईसा से 4000 वर्ष पूर्व एक ईश्वर द्वारा हुयी थी। किंतु अब चार्ल्स लायल जैसे भूगर्भ शास्त्री और चार्ल्स डार्विन जैसे प्राणी शास्त्री सृष्टि की आयु को लाखों वर्ष पीछे ले जा रहे थे। इस दृष्टि से लायल और डार्विन की खोजों ने यूरोपीय ईसाई मस्तिष्क को बाइबिल की कालगणना की दासता से मुक्त होने में सहायता की।

डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से चर्च भले ही आहत हुआ हो और उसने डार्विन का कड़ा विरोध किया हो किंतु सामान्य यूरोपीय मानस बहुत उत्साहित और उल्लसित हो उठा। तब तक यूरोप की विज्ञान यात्रा देश और काल से आबद्ध भौतिकवाद की परिधि में ही भटक रही थी। भौतिकवाद ही यूरोप का मंत्र बन गया था। पूरे विश्व पर यूरोप का वर्चस्व छाया हुआ था। एशिया और अफ्रिका में उसके उपनिवेश स्थापित हो चुके थे। भापशक्ति के आविष्कार ने जिस औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया, स्टीमर आदि यातायात के त्वरित साधनों का आविष्कार किया, उससे यूरोप का नस्ली अहंकार अपने चरम पर था। ऐसे मानसिक वातावरण में डार्विन का प्राकृतिक चयन का सिद्धांत उनके नस्ली अहंकार का पोषक बनकर आया। अस्तित्व के सतत्‌ संघर्ष और योग्यतम की विजय के सिद्धांत को यूरोपीय विचारकों ने हाथों हाथ उठा लिया। एक ओर हर्बर्ट स्पेंसर और टी.एच.हक्सले जैसे नृवंश शास्त्रियों ने इस सिद्धांत को प्राणी जगत से आगे ले जाकर समाजशास्त्र के क्षेत्र में मानव सभ्यता की यात्रा पर लागू किया। तो कार्ल मार्क्स और एंजिल्स ने उसे अपने द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और वर्ग संघर्ष के सिद्धांत के लिए इस्तेमाल किया। जिस वर्ष डार्विन की ‘ओरिजन आफ स्पेसीज‘ पुस्तक प्रकाशित हुई उसी वर्ष मार्क्स की ‘क्रिटिक आफ पालिटिकल इकानामी‘ पुस्तक भी प्रकाश में आयी। डार्विन की पुस्तक को पूरा पढ़ने के बाद मार्क्स ने 19 दिसंबर, 1860 को एंजिल्स को पत्र लिखा कि यह पुस्तक हमारे अपने विचारों के लिए प्राकृतिक इतिहास का अधिष्ठान प्रदान करती है। 16 जनवरी, 1861 को मार्क्स ने अपने मित्र एफ.लास्सेल को लिखा कि

‘डार्विन की पुस्तक बहुत महत्वपूर्ण है और वह इतिहास से वर्ग संघर्ष के लिए प्राकृतिक-वैज्ञानिक आधार प्रदान करने की दृष्टि से मुझे उपयोगी लगी है।‘

1871 में ‘दि डिसेंट आफ मैन‘ पुस्तक प्रकाशित होते ही उसके आधार पर एंजिल्स ने लेख लिखा, ‘बंदर के मनुष्य बनने में श्रम का योगदान‘ (दि रोल आफ लेबर इन ट्रांसफार्मेशन आफ एज टु मैन)। मार्क्स पर डार्विन के विचारों का इतना अधिक प्रभाव था कि वह अपनी सुप्रसिद्ध कृति ‘दास कैपिटल‘ का एक खंड डार्विन को ही समर्पित करना चाहता था, किंतु डार्विन ने 13 अक्तूबर, 1880 को पत्र लिखकर इस सम्मान को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उसे मार्क्स की पुस्तक के विषय का कोई ज्ञान नहीं था।

इस महामानव को शत शत नमन।
श्रोत : इंटरनेट।विकीपीडीया
चार्ल्स डार्विन की आत्मकथा

नोट : यह लेख मौलिक नही है। यह लेख इंटरनेट पर उपलब्ध श्रोतो पर आधारित है।

source:

चार्ल्स डार्विन : धार्मिक मान्यताओं को चुनौती देता महामानव

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वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया गया है. सम्मान समारोह में उन्होंने यह वक्तव्य दिया|एक एक शब्द में गहरा मतलब है,वर्तमान और भविष्य की चिंता है,राजनीतिक संकट की चेतावनी है, काश लोग समझ सकते|विडियो लिंक भी है अगर पढ़ना न चाहे तो सुन तो लो,अब भी शायद वक़्त है| |…http://thewirehindi.com

एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त हैं. वे पत्रकार नहीं हैं, सरकार के सेल्समैन हैं. जब भी जनादेश आता है पत्रकारों को क्यों लगता है कि उनके ख़िलाफ़ आया है. क्या वे भी चुनाव लड़ रहे थे? क्या जनादेश से पत्रकारिता को प्रभावित होने की ज़रूरत है?

रवीश कुमार. (फोटो साभार: ट्विटर)

(वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार को पहले कुलदीप नैयर पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित किया गया है. सम्मान समारोह में उन्होंने यह वक्तव्य दिया.) 

उम्र हो गई है तो सोचा कुछ लिखकर लाते हैं. वरना मूड और मौका कुछ ऐसा ही था कि बिना देखे बोला जाए. ख़ासकर एक ऐसे वक़्त में जब राजनीति तमाम मर्यादाओं को ध्वस्त कर रही है, अपमान के नए-नए मुहावरे गढ़ रही है.

एक ऐसे वक़्त में जब हमारी सहनशीलता कुचली जा रही है ठीक उसी वक़्त में ख़ुद को सम्मानित होते देखना दीवार पर टंगी उस घड़ी की तरफ़ देखना है जो टिक-टिक करती है. टिक-टिक करने वाली घड़ियां ख़त्म हो गई हैं.

इसलिए हमने आहट से वक़्त को पहचानना बंद कर दिया है, इसलिए हमें पता नहीं चलता कि हमारे बगल में कब कौन-सा ख़तरनाक वक़्त आकर बैठ गया है. हम बेपरवाह हो गए हैं.

हमारी संवेदनशीलता ख़त्म होती जा रही है कि वो सुई चुभाते जा रहे हैं और हम उस दर्द को बर्दाश्त करते जा रहे हैं. हम सब आंधियों के उपभोक्ता बन गए हैं, कनज़्यूम करने लगे हैं.

जैसे ही शहर में तूफान की ख़बर आती है. बारिश से गुड़गांव या दिल्ली डूबने लगती है या चेन्नई डूबने लगती है, हम मौसम समाचार देखने लगते हैं. मौसम समाचार पेश करने वाली अपनी शांत और सौम्य आवाज़ से हम सबको धीरे-धीरे आंधियों और तूफान के कन्ज़्यूमर में बदल रही होती है और हम आंधी के गुज़र जाने का बस इंतज़ार कर रहे होते हैं.

अगली सुबह पता चलता है कि सड़क पर आई बाढ़ में एक कार फंसी थी और उसमें बैठे तीन लोग पानी भर जाने से दम तोड़ गए दुनिया से.

मरना सिर्फ़ श्मशान या कब्रिस्तान में दफ़न कर देना या जला देना नहीं है. मरना वो डर भी है जो आपको बोलने से, आपको लिखने से, आपको कहने से और सुनने से डराता है. हम मर गए हैं. हम उसी तरह के कन्ज़्यूमर में बदलते जा रहे हैं जो मौसम समाचार पेश करने वाली एंकर चाहती है. हम सबको इम्तेहान के एक ऐसे कमरे में बिठा दिया गया है, जहां समय-समय पर फ्लाइंग स्क्वाड या उड़न दस्तों की टोली धावा बोलती रहती है.

वो कभी आपकी जेब की तलाशी लेती है, कभी आपके पन्ने पलटकर देखती है. आप जानते हैं कि आप चोरी नहीं करते हैं लेकिन हर थोड़े-थोड़े समय के बाद उड़न दस्तों की टोली आकर उस दहशत को फिर से फैला जाती है.

आपको लगता है कि अगले पल आपको चोर घोषित कर दिया जाएगा. आपको लगता है कि ऐसा नहीं हो रहा है तो आसपास नज़र उठाकर देखिए कि कितने लोगों को मुक़दमों में फंसाया जा रहा है.

ये वही फ्लाइंग स्क्वाड हैं जो आते हैं आपकी जेब की तलाशी लेते हैं और वे कभी चोर को नहीं पकड़ते लेकिन आपको चोर बनाए जाने का डर आपके भीतर बिठा देते हैं.

तो मुक़दमे, दरोगा, इनकम टैक्स आॅफिसर… ये सब आज कल बहुत सक्रिय हो गए हैं. इनकी भूमिका पहले से कहीं ज़्यादा सक्रिय है और न्यूज़ एंकर हमारे समय का सबसे बड़ा थानेदार है.

वो हर शाम को एक लॉकअप में बदल देता है और जहां विपक्ष, विरोध की आवाज़ या वैकल्पिक आवाज़ उठाने वालों की वो धुलाई करता है उस हाजत (जेल) में बंद करके. अभी तक आप फर्स्ट डिग्री, थर्ड डिग्री, फेक डिग्री में फंसे हुए थे वो आराम से हर शाम थर्ड डिग्री अप्लाई करता है.

वो एंकर आपके समय का सबसे बड़ा गुंडा है और मुझे बहुत ख़ुशी है कि उसी समय में जब मीडिया चैनलों के एंकर गुंडे हो गए हैं… वो नए तरह के बाहुबली हैं तो इसी समाज में कुछ ऐसे भी लोग हैं जो एंकर को सम्मानित करने का जोख़िम भी उठा रहे हैं.

आने वाला समाज और इतिहास जब ये आंधी और तूफान गुज़र जाएगा और एंकर को गुंडे और उनकी गुंडई की भाषा और भाषा की गुंडई उस पर लिख रहा होगा तो आप लोग इस शाम के लिए याद किए जाएंगे कि आप लोग एक एंकर का सम्मान कर रहे हैं.

ये शाम इतनी भी बेकार नहीं जाएगी. हां, आप जनादेश नहीं बदल सकते हैं, पर वक़्त का आदेश अगर वो भी है तो ये भी है. शुक्रिया गांधी शांति प्रतिष्ठान का, इस पुरस्कार में पत्रकारों को पसीना है. अपने पेशे की वजह से कुछ भी मिल जाए तो समझिए दुआ कुबूल हुई.

हम सब कुलदीप नैयर साहब का आदर करते रहे हैं. करोड़ों लोगों ने आपको पढ़ा है सर! आपने उस सीमा पर जाकर मोमबत्तियां जलाई हैं जिसके नाम पर इन दिनों रोज़ नफरत फैलाई जा रही है.

इस मुल्क में उस मुल्क नाम इस मुल्क के लोगों को बदनाम करने के लिए लिया जा रहा है. शायद वक़्त रहते गुज़रे ज़माने ने आपकी मोमबत्तियों की अहमियत नहीं समझी होगी. उसकी रोशनी को हम सबने मिलकर थामा होता तो वो रोशनी कुछ लोगों के जुनून का नहीं ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की समझ का उजाला बनती.

हमने तब भी यही ग़लती की अब भी यही ग़लती कर रहे हैं. मोहब्बत की बात कितने लोग करते हैं. मुझे तो शक़ है इस ज़माने में लोग मोहब्बत भी करते हैं. ये सोचकर डर जाता हूं कि एंटी रोमियो दस्ते के लोगों को किसी से प्रेम हो गया तो क्या होगा? प्रेम की तड़प में वे किसी पुराने कुर्ते की तरह चराचरा कर फट जाएंगे. दुआ करूंगा कि एंटी रोमियो दस्ते को कभी किसी से प्यार न हो. प्रार्थना करूंगा कि उन्हें कम से कम किशोर कुमार के गाने सुनने की सहनशक्ति मिले.

शेक्सपीयर के कहानी के नायक के ख़िलाफ़ ये जनादेश आया है आपकी यूपी में. हम रोमियो की आत्मा की शांति के लिए भी प्रार्थना करते हैं. आप सब जीवन में कभी किसी से मोहब्बत की है तो अपनी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना कीजिएगा.

उम्मीद करता हूं कि अमेरिका के किसी चुनाव में प्रेमचंद के नायकों के ख़िलाफ़ भी कभी कोई जनादेश आएगा. क्या पता आ भी गया हो. एंटी होरी, एंटी धनिया दल नज़र आएंगे.

अनुपम मिश्र जी हमारे बीच नहीं हैं, हमने इस सच का सामना वैसे ही कर लिया है जैसे समाज ने उनके नहीं होने का सामना उनके रहते ही कर लिया था. काश मैं ये पुरस्कार उनके सामने लेता, उनके हाथों से.

जब भी कहीं कोई साफ़ हवा शरीर को छूती है, कहीं पानी की लहर दिखती है मुझे अनुपम मिश्र याद आते हैं. वे एक ऐसी भाषा बचा कर गए हैं जिसके सहारे हम बहुत कुछ बचा सकते हैं.

प्रतिक्रिया में हमारी भाषा हिंसक न हो जाए, इसकी चिंता दुनिया के सामने कोई मिसाल नहीं बनेगी, उसके लिए ज़रूरी है हम फिर से अपनी भाषा को साफ़ करें. अपने अंदर की निर्मलता कई तरह की मलिनताओं से दब गई है. इसलिए ज़रूरी है कि हम अपनी भाषा और विचारों को थोड़ा-थोड़ा संपादित करें. अपने भीतर सब सही नहीं है उनका संपादन करें.

हम संभावनाओं का निर्माण नहीं करते हैं. वो कहां बची हुई है, किस-किस में बची है, किस-किस ने बचाई है, उसकी तलाश कर रहे हैं. ऐसे लोगों के भीतर की जो संभावनाएं हैं वो अब मुझे कभी-कभी कातर लगती हैं.

हम कब तक बचे हुए की चिंता में जीने का स्वाद भी भूल रहे हैं, बचाने का हौसला खो दे रहे हैं. अपने अकेले की संभावनाओं को दूसरों से जोड़ के चल… अंतर्विरोधों का रामायण पाठ बहुत हो गया. जिससे मिलता हूं वो किसी न किसी अंतर्विरोध का अध्यापक लगता है.

अगर आप राजनीति में विकल्प खोजना चाहते हैं तो अंतर्विरोधों को सहेजना सीखिए. बहुतों को उनके समझौतों ने और अधमरा कर दिया है. आज जो भी समय है उसे लाने में उनकी भी भूमिका है, जिनके पास बीते समय में कुछ करने की जवाबदेही थी.

उन लोगों ने धोख़ा दिया. बीते समय में लोग संस्थानों में घुसकर उन्हें खोखला करने लगे. चंद मिसालों को छोड़ दें तो घुन का प्रवेश उनके दौर में शुरू हुआ. विकल्प की बात करने वालों का समाज से संवाद समाप्त हुआ.

समाज भी बदलाव के सिर्फ़ एक ही एजेंट को पहचानता है, राजनीतिक दल. बाकी एजेंटों पर भी राजनीति ने कब्ज़ा कर लिया है. इसलिए राजनीति से भागने का अब कोई मतलब नहीं. अगर कोई एक साल के काम को सौ साल में करना चाहता है तो अलग बात है.

जब अच्छे फेल होते हैं तभी जनता बुरों के साथ जोख़िम उठाती है. हर बार हारती है लेकिन अगली बार किसी बड़े राजनीतिक दल पर ही दांव लगाती है. गांधीवादी, आंबेडकरवादी, समाजवादी, वामपंथी और जो छूट गए हैं वे तमाम वादी. आंधियां जब भी आती हैं तब इन्हीं के पेड़ जड़ से क्यों उखड़ जाते हैं. बोनसाई का बागीचा बनने से बचिए.

आप सभी के राजनीतिक दलों को छोड़कर बाहर आने से राजनीतिक दलों का ज़्यादा पतन हुआ है. वहां परिवारवाद हावी हुआ, कॉरपोरेट हावी हुआ. सांप्रदायिकता से डरने की शक्ति न पहले थी और न अब है.

ये उनके लिए अफ़सोस हम क्यों कर रहे हैं? अगर ख़ुद के लिए है तो सभी को ये चुनौती स्वीकार करनी चाहिए. मैंने राजनीति को कभी अपना रास्ता नहीं माना लेकिन जो लोग इस रास्ते पर आते हैं उनसे यही कहता हूं, राजनीतिक दलों की तरफ़ लौटिए, इधर-उधर मत भागिए.

सेमिनारों और सम्मेलनों से बाहर निकलने का वक़्त आ गया है. वे अकादमिक विमर्श की जगहें हैं, ज़रूरी जगहें हैं लेकिन राजनीतिक विकल्प की नहीं हैं. राजनीतिक दलों में फिर से प्रवेश का आंदोलन करना पड़ेगा. फिर से उन दलों की तरफ लौटिए और संगठनों पर कब्ज़ा कीजिए. वहां जो नेता बैठे हैं वे नेतृत्व के लायक नहीं हैं उन्हें हटा दीजिए.

ये डरपोक लोग हैं… बेईमानी से भर चुके लोग हैं… उनके बस की बात नहीं है. उनकी कायरता, उनके समझौते समाज को दिन-रात तोड़ने का काम कर रहे हैं. एक छोटी से चिंगारी आती है उनके समझौतों के कारण सब कुछ जलाकर चली जाती है.

हम सब के पास अब भी इतना मानव संसाधन बचा हुआ है और इस कमरे में जितने भी लोग हैं वे भी काफी हैं कि हम राजनीति को बेहतर बना सकते हैं.

पत्रकारिता के लिए पुरस्कार मिल रहा है. उस पर भी चंद बात कहना चाह रहा हूं.

मुझे ये बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि आज पत्रकारिता पर कोई संकट नहीं है. ये पत्रकारिता का स्वर्ण युग चल रहा है. राजधानी से लेकर जिला संस्करणों के संपादक इस आंधी में खेत से उड़कर छप्पर पर पहुंच गए हैं. अब जाकर उन्हें पत्रकार होने की सार्थकता समझ में आई है. क्या हम नहीं देख रहे थे कि कई दशकों से पत्रकारिता संस्थान सत्ता के साथ विलीन होने के लिए कितने प्रयास कर रहे थे. जब वे होटल के लाइसेंस ले रहे थे, मॉल के लाइसेंस ले रहे थे, खनन के लाइसेंस ले रहे थे तब वे इसी की तो तैयारी कर रहे थे.

मीडिया को बहुत भूख लगी हुई है. विकल्प की पत्रकारिता को छोड़ अब विलय और विलीन होने की पत्रकारिता का दौर है. सत्तारूढ़ दल की विचारधारा उस विराट के समान है जिसके सामने ख़ुद को बौना पाकर पत्रकार समझ रहा है कि वो भगवान कृष्ण के मुख के सामने खड़ा है.

भारत की पत्रकारिता या पत्रकारिता संस्थान इस वक़्त अपनी प्रसन्नता के स्वर्ण काल में भी हैं. आपको यकीन न हो तो कोई भी अख़बार या कोई भी न्यूज़ चैनल देखिए. आपको वहां उत्साह और उल्लास नज़र आएगा. उनकी ख़ुशी पर झूमिए तो अपनी तकलीफ़ कम नज़र आएगी.

सूटेड-बूटेड एंकर अपनी आज़ादी गंवाकर इतना हैंडसम कभी नहीं लगे. एंकर सरकार की तरफदारी में इतनी हसीन कभी नहीं लगीं. न्यूज़ रूम रिपोर्टरों से ख़ाली हैं.

न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट में अच्छे पत्रकारों को भर्ती करने की जंग छिड़ी है जो वॉशिंगटन के तहखानों से सरकार के ख़िलाफ़ ख़बरों को खोज लाए, ऐसी प्रतियोगिता है वहां. मैं न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट की बदमाशियों से भी अवगत हूं. उसी ख़राबे में ये भी सुनने को मिल रहा है. भारत के न्यूज़ रूम से पत्रकार विदा किए जा रहे हैं. सूचना की आमद के रास्ते बंद हैं. ज़ाहिर है धारणा ही हमारे समय की सबसे बड़ी सूचना है.

एंकर पार्टी प्रवक्ता में ढलने और बदलने के लिए अभिशप्त हैं. वे पत्रकार नहीं हैं, सरकार के सेल्समैन हैं. जब भी जनादेश आता है पत्रकारों को क्यों लगता है कि उनके ख़िलाफ़ आया है. क्या वे भी चुनाव लड़ रहे थे? क्या जनादेश से पत्रकारिता को प्रभावित होने की ज़रूरत है?

मगर कई पत्रकार इसी दिल्ली में कनफ्यूज़ घूम रहे हैं कि यूपी के बाद अब क्या करें? आप बिहार के बाद क्या कर रहे थे? आप सतहत्तर के बाद क्या कर रहे थे? आप सतहत्तर के पहले क्या कर रहे थे? 1947 के पहले क्या कर रहे थे और 2025 के बाद क्या करेंगे?

इसका मतलब है कि पत्रकार अब पत्रकारिता को लेकर बिल्कुल चिंतित नहीं है. इसलिए काम न करने की तमाम तकलीफ़ों से आज़ाद आज के पत्रकारों की ख़ुशी आप नहीं समझ सकते, आपके बस की बात नहीं है.

आप पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं. जाकर देखिए वे कितने प्रसन्न हैं, कितने आज़ाद महसूस कर रहे हैं किसी श्मशान, किसी राजनीतिक दल और सरकार में विलीन होकर. उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना आप नाप नहीं सकते.

प्रेस रिलीज़ तो पहले भी छाप रहे थे, फर्क़ यही आया है कि अब गा भी रहे हैं. इसको लेकर वे रोज़ गाते हैं. कोई मुंबईवाला ही कर सकता है इस तरह का काम लेकिन अब हम टेलीविजन वाले कर रहे हैं. चाटुकारिता का एक इंडियन आइडल आप कराइए. पत्रकारों को बुलाइए कि कौन किस हुकूमत के बारे में सबसे बढ़िया गा सकता है. अगली बार उसे भी सम्मानित कीजिए. ज़रूरी है कि वक़्त रहते हम ऐसे चाटुकारों का भी सम्मान करें.

अगर आपको लड़ना है तो अख़बार और टीवी से लड़ने की तैयारी शुरू कर दीजिए. पत्रकारिता को बचाने की मोह में फंसे रहने की ज़िद छोड़ दीजिए. पत्रकार नहीं बचना चाहता. जो थोड़े-बहुत बचे हुए हैं उनका बचे रहना बहुत ज़रूरी नहीं.

उन्हें बेदख़ल करना बहुत मुश्किल भी नहीं है. मालूम नहीं कि कब हटा दिया जाऊं. राह चलते समाज को बताइए कि इसके क्या ख़तरे हैं. न्यूज़ चैनल और अख़बार राजनीतिक दल की नई शाखाएं हैं.

एंकर किसी राजनीतिक दल में उसके महासचिव से ज़्यादा प्रभावशाली है. राजनीतिक दल बनने के लिए बनाने के लिए भी आपको इन नए राजनीतिक दलों से लड़ना पड़ेगा. नहीं लड़ सकते तो कोई बात नहीं. जनता की भी ऐसी ट्रेनिंग हो चुकी है कि लोग पूछने आ जाते हैं कि आप ऐसे सवाल आप क्यों पूछते हैं?

स्याही फेंकने वाले प्रवक्ता बन रहे हैं और स्याही से लिखने वाले प्रोपेगेंडा कर रहे हैं. ये भारतीय पत्रकारिता को प्रोपेगेंडा काल है. मगर इसी वर्तमान में हम उन पत्रकारों को कैसे भूल सकते हैं जो संभावनाओं को बचाने में जहां-तहां लगे हुए हैं.

मैं उनका अकेलापन समझ सकता हूं. मैं उनका अकेलापन बांट भी सकता हूं. भले ही उनकी संभावनाएं समाप्त हो जाएं लेकिन आने वाले वक़्त में ऐसे पत्रकार दूसरों के लिए बड़ा उपकार कर रहे हैं.

ज़िलों से लेकर दिल्ली तक कई पत्रकारों को देखा है जूझते हुए. उनकी ख़बर भले ही न छप रही हों लेकिन उनके पास ख़बरें हैं. समाज ने अगर इन पत्रकारों का साथ नहीं दिया तो नुकसान उस समाज का होगा. अगर समाज ने पत्रकारों को अकेला छोड़ दिया तो एक दिन वो अपना एकांत और अकेलापन नहीं झेल पाएगा. तो ज़रूरत है बताकर, आंख से आंख मिलाकर उस समाज को बोलने के लिए कि आप जो हमें अकेला छोड़ रहे हैं और आप जो हमें गालियां दे रहे हैं… आप ये काम हमें हटाने के लिए नहीं अपना वज़ूद मिटाने के लिए कर रहे हैं.

आप उन लोगों से इस तकलीफ के बारे में पूछिए जो आज भी न्यूज़ रूम में हैं और टेलीविजन के न्यूज़ एंकर को आज भी रोज़ दस चिट्ठियां आती हैं. हाथ से लिखी हुई आती हैं. उनकी ख़बरें जब नहीं होती होंगी तो वे किस तकलीफ से गुज़रते होंगे और कहां-कहां लिखते होंगे.

ये समाज पत्रकारों को गाली दे रहा है, ऐसे लोगों की तकलीफ को और बढ़ा रहा है. वे अपने ही हिस्से में जो बेचैन हैं उनकी बेचैनियों को उनकी बेचैनियों के साथ उन्हें मार देने की योजना में वो शामिल हो रहा है.

…तो कई बार समाज भी ख़तरनाक हो जाता है.

बहरहाल जो भी पत्रकारिता कर रहा है, जितनी भी कर रहा है, उसके प्रति मैं आभार व्यक्त करता हूं. जब भी सत्ता की चाटुकारिता से ऊबे हुए या धोख़ा खाए पत्रकारों की नींद टूटेगी और जब वे इस्तेमाल के बाद फेंक दिए जाएंगे उन्हें ऐसे ही लोग आत्महत्या से बचाएंगे.

तब उन्हें लगेगा कि ये वो कर गया है ये मुझे भी करना चाहिए. इसी से मैं बचूंगा. इसलिए जितना हो सकता है संभावनाओं को बचा कर रखिए. अपने समय को उम्मीद और हताशा के चश्मे से मत देखिए.

हम उस पटरी पर है जिस पर रेलगाड़ी का इंजन बिल्कुल सामने है. उम्मीद और हताशा के सहारे आप बच नहीं सकते. उम्मीद ये है कि रेलगाड़ी मुझे नहीं कुचलेगी और हताशा ये है कि अब तो ये मुझे कुचल ही देगी. वक़्त बहुत कम है और इसकी रफ्तार बहुत तेज़ है.

आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया.

source:

http://thewirehindi.com/4103/journalist-ravish-kumar-speech-in-kuldeep-nayar-journalism-award-ceremony/

क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे? Advocate Kushal Chander

क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे?

एक महत्वपूर्ण कबीरपंथी सज्जन से मुलाक़ात का किस्सा सुनिए. एक गाँव में किसी काम से गया था, उसी सिलसिले में मालवा के दलितों के बीच फैले कबीरपंथ से परिचय हुआ. एक घर के बड़े से आँगन में कबीर पर गाने वाले और कबीर पर बोलने वाले एक सज्जन बैठे थे और आसपास बैठे गरीब दलित सुन रहे थे. मैं और मेरे एक मित्र कबीर की वाणी में सामाजिक क्रान्ति के सूत्र खोजने के मन से उन सज्जन से प्रश्न पूछ रहे थे.

आसपास बैठे दलित गरीब चुपचाप सुन रहे थे. बात निकली तो लोगों ने शेयर किया कि सब पञ्च तत्व के बने हैं, सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और सबमे एक ही खुदा का नूर है आत्मा परमात्मा की ही औलाद है और भेदभाव सब इंसान के बनाये हुए हैं, सबका खून लाल है, सबको मरकर वहीं जाना है… इत्यादि इत्यादि … फिर कुछ जागरूक लोगों ने बताया कि भाई जब तक ये प्रवचन चलता है तब तक सभी यह मानते हैं … उसके बाद आश्रम या सत्संग घर से निकलते ही दीवार के ठीक एक फुट दूर ही एकदूसरे के हाथ का छुआ खाना-पीना बंद हो जाता है और सब वापस कबीरपंथ या राधास्वामी या साहेब या सतनाम या बंदगी छोड़कर वर्णाश्रम के खोल में वापस लौट आते हैं.

चर्चा के दौरान लोग आते जाते हुए प्रवचनकार सज्जन के पैर छूते रहे और कबीर की वाणी में आये गुरु गोविंग दोउ खड़े काके लागु पांय, मैं तो राम की लुगइया, रस गगन गुफा में अजर झरे, सुन्न महल, कुण्डलिनी और षड्चक्र और न जाने क्या क्या चल रहा था. लेकिन बार बार पूछने पर भी ये बात कोई नहीं करना चाहता कि आप लोगों के इलाके में हैण्ड पम्प क्यों नहीं है? आपके बच्चों को स्कूल में पढने क्यों नहीं दिया जाता? आपके युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? आपके बर्तनों को कुवें से लात मारकर क्यों फेंक दिया जाता है? आपकी स्त्रीयों को आसान शिकार क्यों समझा जाता है? इन प्रश्नों पर कबीर की तरफ से उत्तर दिए गये हैं लेकिन वे उत्तर कबीरपंथ से गायब हैं. कबीरपंथियों ने जिस कबीर को रचा है वह सिर्फ आत्मा परमात्मा और मोक्ष की बात करता है. ठीक उसी तरह जैसे भारतीय ध्यानियों ने जिस बुद्ध को रचा है वह सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण की बात करता है समाज की कोई बात नहीं करता.

क्या इन कबीरपंथियों ने कबीर को गलत समझा है? या ये सिलेक्टिव ढंग से कबीर को जिस तरह से रख रहे हैं उसमे कोई गलती है? या क्या यह कहा जा सकता है कि कबीर ने खुद ही कुछ गलती की है? ये बड़े प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढना बड़ा मुश्किल है लेकिन एक सावधान नजर से देखें तो इनका उत्तर मिलता है. आइये उस उत्तर में प्रवेश करें. कबीर हो या बुद्ध हों, उनकी वाणी में कोई भी बात हो या कैसी भी समझाइश दी गयी हो, उसका अनुवाद या भावार्थ सीधे सीधे क्या जनता तक पहुँच रहा है? क्या उनके साहित्य में मिलावट करने वालों ने मिलावट के बाद उसकी व्याख्या का अधिकार दूसरों को दिया है? या यह एकाधिकार खुद ही अपने पास सुरक्षित रख लिया है? कबीर के बारे में दावे से कहा जा सकता है कि उनके काव्य को जिस तरह से अनुदित किया गया है और उनके चुने गये प्रतीकों और बिंबों में जिस तरह से वेदान्तिक अर्थ डाले गये हैं उससे कबीर अपने ही लोगों के लिए खतरनाक बना दिए गये हैं.

अगर कबीरपंथी अपनी रविवारीय बैठक में आत्मा परमात्मा और बंकनाल, सुन्न महल और राम की भक्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार और राजनीति पर कब बात करेंगे? अपने शोषण के मुद्दों पर या अपने जीवन के जरुरी मुद्दों पर कब बात करेंगे? हफ्ते भर जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक दिन या एक शाम मिलती है जिसमे समाज के असल मुद्दों पर कोई सार्थक बात की जा सकती है. लेकिन उसमे भी आत्मा परमात्मा का भूत छाया रहता है. गाँव के युवा इन बातों को अव्वल तो सुनते ही नहीं या सुनते भी हैं तो वे भक्त बनकर बैठते हैं, हाथ जोड़कर गर्दन हिलाते हुए हुंकारा देते रहते हैं. कबीर के साथ भी समाज में बदलाव की कोई बात नहीं हो रही है. बल्कि समाज में बदलाव की बात को अध्यात्म के जहर में दबाया जा रहा है. यह एक चमत्कार है.

यही बुद्ध के साथ हो रहा है. भारतीय पंडितों और बाबाओं ने जिस तरह से बुद्ध को “अनुभव” “ध्यान” और “निर्वाण” जैसी बातों में लपेटा है उससे बुद्ध की क्रान्ति लगभग खत्म सी हो गयी है. लोग भूल ही गये हैं कि बुद्ध ने जहर की त्रिमूर्ति – आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारकर एक नयी भौतिकवादी जीवन दृष्टि दी है जो परलोक को खत्म करके समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को संभव बनाता है. स्वयं बुद्ध की परम्परा में घुसे वेदान्तियों ने जैसा महायान खड़ा किया उसने बुद्ध को और बौद्ध धर्म को इस देश से उखाड़ फेंका और फिर से परलोकी अन्धविश्वास का धर्म यहाँ फ़ैल गया. भारत के बाहर भी जो बौद्ध धर्म है वह महायानी अंधविश्वास और स्थानीय समझौतों की खिचडी से बना हुआ है. इस तरह के परलोक्वादी और समझौतावादी बौद्ध धर्म को अंबेडकर ने सिरे से खारिज किया है.

लेकिन अब सवाल ये है कि क्या अंबेडकर को भी कबीर और बुद्ध की तरह खत्म कर दिया जाएगा? जिस तरह कबीर और बुद्ध की धारा को परलोक और मोक्ष की चादर में लपेटकर खत्म किया गया है, क्या उसी तरह अंबेडकर को खत्म करना संभव है? मेरा उत्तर है कि अंबेडकर को पचाना और उन्हें नष्ट करना असंभव है. बुद्ध और कबीर का साहित्य नष्ट कर दिया गया, उनके नाम पर झूठे सूत्र और साखियाँ लिखकर उनके मूल सन्देश को समाप्त कर दिया गया है. ब्रिटिश खोजियों और राहुल सांस्कृत्यायन की खोज के पहले लोग बुद्ध को और उनके साहित्य को जानते भी नहीं थे. हजारों साल तक बुद्ध और उनका साहित्य लुप्त रहा, जो मिला है उसमे भी वेदांती मिलावट है. इस मिलावट का महिमामंडन करने के लिए ओशो रजनीश और अन्य वेदांती बाबाओं ने बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती बनाकर पेश किया है.

लेकिन अंबेडकर का पूरा नहीं तो लगभग अधिकाँश साहित्य हमारे पास है. उनकी जीवनी और उनका कर्तृत्व हमारे पास सुरक्षित है. उनके द्वारा महायान और हीनयान दोनों को अस्वीकार करते हुए “नवयान” की रचना करना और हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय हमारे पास है. उनकी बाईस प्रतिज्ञाएँ हमारे पास हैं. अब हमें कोई डर नहीं कि अंबेडकर की वाणी में या उनके लेकहं में मिलावट की जा सके. डर सिर्फ इस बात का है कि हमारे ही लोग उन्हें पढ़ना समझना बंद करके उनकी पूजा न करने लगें. अंबेडकर के दुश्मन यही चाहते हैं कि हम अंबेडकर को पढ़ना छोड़ दें और उन्हें पूजना शुरू कर दें. अगर यह होता है तो अंबेडकर भी हमसे छीन लिए जायेंगे.

अगर हम बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर को खोने नहीं देना चाहते हो हमें अंबेडकर को घर घर तक उनके मूल साहित्य और विश्लेषण के साथ पहुंचाना होगा. उनकी लिखी बाईस प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले लोगों को समझाना होगा. कम से कम भारत के गरीबों को समझाना होगा कि अंबेडकर ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी गणेश, राम कृष्ण, आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म और इश्वर सहित आत्मा तक को नकारा है और इनसे तथा पूजा पाठ और भक्ति आदि से दूर रहने की सलाह दी है. हमारे युवाओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, आज हम उसी दौर में जी रहे हैं जिस तरह के दौर में अतीत में बुद्ध और कबीर को षड्यंत्रकारियों ने खत्म किया था. इस षड्यंत्र में हम अंबेडकर को नहीं फंसने देंगे, आइए यह संकल्प लें और अंबेडकर को खुद समझते हुए दूसरों को भी समझाएं.

 

डॉ. आंबेडकर की राजनीति, राजनैतिक पार्टी एवं सत्ता की अवधारणा….- एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

डॉ. आंबेडकर की राजनीति, राजनैतिक पार्टी एवं सत्ता की अवधारणा

– एस.आर. दारापुरी, राष्ट्रीय प्रवक्ता, आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट

साथियो! जैसा कि आप अवगत हैं कि वर्तमान दलित राजनीति एक बहुत बड़े संकट में से गुज़र रही है. हम लोगों ने देखा है कि पहले बाबासाहेब द्वारा स्थापित रेडिकल रिपब्लिकन पार्टी कैसे व्यक्तिवाद, सिद्धांतहीनता और अवसरवाद का शिकार हो कर बिखर चुकी है. इसके बाद बहुजन के नाम पर शुरू हुयी दलित राजनीति कैसे सर्वजन के गर्त में समा गयी है.  इस समय दलितों के सामने एक राजनीतिक शून्यता की स्थिति पैदा हो गयी है. मेरे विचार में इस संकट के समय में सबसे पहले हमें डॉ. आंबेडकर के राजनीति, राजनेता, राजनैतिक सत्ता और राजनीतिक पार्टी के सम्बन्ध में विचारों का पुनर अध्ययन करना चाहिए और उसे वर्तमान परिपेक्ष्य में समझ कर एक नए रेडिकल विकल्प का निर्माण करना चाहिए. इसी ध्येय से इस लेख में डॉ. आंबेडकर के राजनैतिक पार्टी, राजनेता और सत्ता की अवधारणा के बारे में विचारों को संकलित कर प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि इन माप-दंडों पर वर्तमान दलित राजनीति और राजनेताओं का आंकलन करके एक नया विकल्प खड़ा किया जा सके.

  1. “राजनीति वर्ग चेतना पर आधारित होनी चाहिए. जो राजनीति वर्ग चेतना के प्रति सचेत नहीं है वह ढोंग है.”
  2. “केवल राजनीतिक आदर्श रखना ही काफी नहीं है. इन आदर्शों को विजयी बनाना भी ज़रूरी है. परन्तु आदर्शों की विजय एक संगठित पार्टी द्वारा ही संभव है न कि व्यक्तियों द्वारा.”
  3. एक राजनैतिक पार्टी एक सेना की तरह होती है. इसके ज़रूरी अंग हैं:-
  • एक नेता जो एक सेनापति जैसा हो.
  • एक संगठन जिस में (1) सदस्यता, (2) एक ज़मीनी योजना (3) अनुशासन हो.
  • इसके सिद्धांत और नीति ज़रूर होनी चाहिए.
  • इसका प्रोग्राम या कार्य योजना होनी चाहिए.
  • इस की रणनीति और कौशल होना चाहिए यानि कि कब क्या करना है तथा लक्ष्य तक कैसे पहुंचना है, की योजना होनी चाहिए.”
  1. “किसी भी पार्टी में कभी भी न बिकने वाला इमानदार नेतृत्व का बहुत महत्त्व है. उसी प्रकार पार्टी के विकास के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का होना भी बहुत ज़रूरी है.”
  2. “एक राजनैतिक पार्टी का काम केवल चुनाव जीतना ही नहीं होता है. एक राजनैतिक पार्टी का काम लोगों को राजनीतिक तौर से शिक्षित करने, उद्देलित करने और संगठित करने का होता है.”
  3. “आप के नेता बहुत योग्य होने चाहिए. आप के नेताओं का साहस और बौद्धिकता किसी भी पार्टी के सर्वोच्च नेता की टक्कर की होनी चाहिए.”
  4. शैड्युल्ड कास्ट्स फेडरशन के एजंडा के बारे में बोलते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था:-
  5. “आज हमारा मुख्य काम जनता में वर्ग चेतना पैदा करना है और तब वर्तमान विरोधी नेतृत्व अपने आप ध्वस्त हो जायेगा.
  6. राजनीतिक आज़ादी जीतने के लिए शोषकों और शोषितों का गठजोड़ ज़रूरी हो सकता है परन्तु शोषकों और शोषितों के गठजोड़ से समाज के पुनर्निर्माण हेतु साँझा पार्टी बनाना जनता को धोखा देना है.
  7. पूंजीपतियों और ब्राह्मणों के हाथ में राजनीतिक सत्ता देने से उन की प्रतिष्ठा बढ़ेगी. इस के विपरीत दलितों और पिछड़ों के हाथ में सत्ता देने से राष्ट्र की प्रतिष्ठा बढ़ेगी और यह भौतिक समृद्धि बढ़ाने में सहायक होगा.
  8. राजनीतिक सत्ता सामाजिक प्रगति की चाबी है और दलित संगठित होकर सत्ता पर कब्ज़ा करके अपनी मुक्ति प्राप्त कर सकते हैं. राजनीतिक सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए.
  9. “राजनीतिक सत्ता का मुख्य ध्येय सामाजिक और आर्थिक सुधार करना होना चाहिए.”
  10. “हमें पिछड़ों और आदिवासियों के साथ गठजोड़ करना चाहिए क्योंकि उन की स्थिति भी दलितों जैसी ही है. उनमें फिलहाल राजनीतिक चेतना की कमी है.”
  11. नायक पूजा के खिलाफ:

“असीमित प्रशंसा के रूप में नायक पूजा एक बात है. नायक की आज्ञा मानना एक बिलकुल अलग तरह की नायक पूजा है. पहली में कोई बुराई नहीं है परन्तु दूसरी बहुत घातक है. पहली प्रकार की नायक पूजा व्यक्ति की बुद्धि और कार्य स्वतंत्रता का हनन नहीं करती है. दूसरी व्यक्ति को पक्का मूर्ख बना देती है. पहली से देश का कोई नुक्सान नहीं होता है. दूसरी प्रकार की नायक पूजा तो देश के लिए पक्का खतरा है.”

“यदि आप शुरू में ही नायक पूजा के विचार पर रोक नहीं लगायेंगे तो आप बर्बाद हो जायेंगे. किसी व्यक्ति को देवता बना कर आप अपनी सुरक्षा और मुक्ति के लिए एक व्यक्ति में विश्वास करने लगते हैं जिस का नतीजा होता है कि आप निर्भर रहने तथा अपने कर्तव्य के प्रति उदासीन रहने की आदत बना लेते हैं. यदि आप इन विचारों के शिकार हो जायेंगे तो राष्ट्रीय जीवन में आप लकड़ी के लट्ठे की तरह हो जायेंगे. आप का संघर्ष समाप्त हो जायेगा.”

  1. डॉ. आंबेडकर का अक्सर दोहराया जाने वाला नारा “राजनैतिक सत्ता सब समस्याओं की चाबी है” दलित नेताओं के हाथों नाकाम हो गया है. इसका मुख्य कारण उनका दलितों के सामजिक व् आर्थिक सश्क्तिकरण का कोई भी एजेंडा  न होना है. वास्तव में उनमें  ऐसी दृष्टि का सर्वथा अभाव  है. राजनीति की भूमिका पर  विचार प्रकट करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, “किसी भी राष्ट्र के जीवन में राजनीति ही सब कुछ नहीं होती है. हमें भारतीय समस्यायों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों का अध्ययन करना चाहिए और पददलित वर्गों की समस्यायों को हल करने के लिए अपने ढंग से प्रयास करना चाहिए.” परन्तु दलित नेताओं के लिए राजनैतिक सत्ता जीतना ही सब कुछ है. डॉ. आंबेडकर ने तो यह कहा था कि “सत्ता का इस्तेमाल समाज के विकास के लिए किया जाना चाहिए” परन्तु दलित नेताओं ने इस का इस्तेमाल समाज के लिए लगभग नगण्य परन्तु अपने लिए खूब  किया है.
  2. प्रशासन की भूमिका की व्याख्या करते हुए डॉ. आंबेडकर ने कहा था, “लोगों के कल्याण के लिए स्वच्छ प्रशासन ज़रूरी है. लोगों को रोटी और कपड़ा देने में कठिनाई हो सकती है परन्तु जनता को स्वच्छ प्रशासन देने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए.” परन्तु मायावती स्वच्छ प्रशासन देने में बिलकुल नाकाम रही है. उसके व्यक्तिगत भ्रष्टाचार की छूत  सरकार के सभी विभागों तक फ़ैल गयी थी. उसने इस कहावत को “सत्ता भ्रष्ट कर देती है और निरंकुश सत्ता निरंकुश रूप से भ्रष्ट कर देती है ” को पूरी तरह से सही सिद्ध कर दिया है. उसने उत्तर प्रदेश के लिए “चिंता जनक रूप से भ्रष्ट राज्य” की ख्याति  अर्जित कर  दी थी.
  3. डॉ. अम्बेडकर ने एक बार कहा था, “मेरे  विरोधी मेरे विरुद्ध सभी प्रकार के आरोप लगाते रहे हैं परन्तु कोई भी मेरे  चरित्र और सत्यनिष्ठा पर ऊँगली उठाने का साहस नहीं कर सका.” कितने  दलित नेता अपने लिए इस प्रकार का दावा कर  सकते हैं?
  4. स्वतंत्र मजदूर पार्टी की मीटिंग में डॉ. आंबेडकर  ने कहा था, “मजदूरों के दो दुश्मन हैं- एक पूंजीवाद और दूसरा ब्राह्मणवाद. उन्हें इन से कभी भी समझौता नहीं करना चाहिए.” परन्तु मायावती ने इन दोनों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है. ब्राह्मणवाद को सर्वजन के रूप में और पूंजीवाद को कारपोरेटीकरण  के रूप में.
  5. डॉ. आंबेडकर ने संघर्ष और ज़मीनी स्तर के सामाजिक एवं राजनीतिक आंदोलनों को बहुत महत्व दिया था. वास्तव में यह आन्दोलन ही उनकी राजनीति का आधार थे. परन्तु वर्तमान दलित पार्टियाँ संघर्ष न करके सत्ता पाने के आसान रास्ते तलाश करती हैं. बसपा इस का सब से बड़ा उदहारण है. डॉ. आंबेडकर का “शिक्षित करो , संघर्ष करो और संगठित करो ” का नारा दलित राजनीति का भी मूलमंत्र होना चाहिए.
  6. डॉ. आंबेडकर दलितों के लिए भूमि के महत्व को भली भांति जानते थे. उनका यह निश्चित मत था कि दलितों पर इस लिए अत्याचार होते हैं क्योंकि उनके पास ज़मीन नहीं है. इसी लिए उन्होंने आगरा के भाषण में कहा था, “मैंने अब तक जो कुछ भी किया है वह पढ़े लिखे दलितों के लिए ही किया है. परन्तु मैं अपने ग्रामीण भाईयों के लिए कुछ नहीं कर सका. अब मैं लाठी लेकर आगे आगे चलूँगा और सब को ज़मीन दिला कर ही दम लूँगा.”

बाबासाहेब ने अपने जीवन काल में कोंकण क्षेत्र में शैडयुल्ड कास्ट्स फेडरेशन के तत्वाधान में   भूमि आन्दोलन चलाया था और दलितों को गुलाम बना कर रखने वाली खोती प्रथा को समाप्त करने के लिए केस लड़ा था और जीता भी था. इसके बाद रिपब्लिकन पार्टी आफ इंडिया ने 1964-65 में पूरे देश में भूमि आन्दोलन चलाया था और इसमें 3 लाख से अधिक दलित जेल गए थे. इस के दबाव में कांग्रेस सरकार को आर.पी.आई की भूमि आबंटन, न्यूनतम मजदूरी एवं अन्य सभी मांगे माननी पड़ी थीं. परन्तु इस के बाद किसी भी दलित पार्टी अथवा दलित नेता ने दलितों के भूमि के मुद्दे को नहीं उठाया क्योंकि इसके लिए  संघर्ष करना पड़ता है जिस से वे डरते हैं. इतना ही नहीं मायावती उत्तर प्रदेश में चार बार मुख्य मंत्री बनी परन्तु उस ने भी एक बार (1995) को छोड़ कर भूमि आबंटन का कोई कार्यक्रम नहीं चलाया जब कि उत्तर प्रदेश में इस हेतु पर्याप्त भूमि उपलब्ध थी. इस का मुख्य कारण उसकी बहुजन की राजनीति छोड़ कर सर्वजन की राजनीति अपनाना था. यह सर्वविदित है कि सरकारी ज़मीन अधिकतर उच्च जातियों के अवैध कब्ज़े में थी परन्तु मायावती उनसे ज़मीन छीन कर उन्हें नाराज़ नहीं करना चाहती थी.

2011 की आर्थिक एवं सामाजिक जनगणना के अनुसार देश के देहात क्षेत्र में 42% परिवार भूमिहीनता तथा  हाथ की मजदूरी करने वाले हैं जो कि उनकी सब से बड़ी कमजोरी है. इनमें अगर दलित परिवारों को देखा जाये तो वह 70 से 80% हो सकते हैं. इस कारण दलित भूमिधारकों पर निर्भर हैं जिस कारण वे सभी प्रकार के अत्याचार सहने के लिए मजबूर हैं. इसी कारण दलितों के लिए भूमि का प्रश्न आज भी बहुत महत्वपूर्ण है.

  1. डॉ. आंबेडकर की दलित राजनेताओं और कार्यकर्ताओं से अपेक्षा

“ यदि किसी को राजनीति करनी हो, तो पहले उसे राजनीति का अच्छा अध्ययन करना चाहिए. अध्ययन के बगैर दुनिया में कुछ भी साधा नहीं जा सकता. हमारे प्रत्येक कार्यकर्त्ता को राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक प्रश्नों का बारीकी के साथ अध्ययन करना चाहिए. जिन्हें नेता बनना है, उन्हें नेता के कर्तव्य व नेता की जिम्मेदारी क्या होती है, इस बात की समझ होनी चाहिए. ह्मारे नेता की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है. दूसरे समाज के नेता की तरह हमारे समाज के नेता की स्थिति नहीं है. दूसरे नेता को सभा में जाना, लम्बे भाषण करना, तालियाँ बटोरना और अंत में गले में हार पहन कर घर आना, इतना ही काम करना रहता है. हमारे नेता के इतना करने मात्र से बात नहीं बनेगी. उसे अच्छी तरह अध्ययन करना, चिंतन करना, समाज की उन्नति के लिए दिन-रात दौड़-धूप करनी पड़ेगी. तब ही वह हमारे लोगों का भला कर पायेगा और ऐसा करने वाला ही हमारा सच्चा नेता होगा.” ( डॉ. आंबेडकर के प्रेरक भाषण (2014), सम्यक प्रकाशन, नयी दिल्ली. पृष्ठ- 100)

वैसे तो डॉ. आंबेडकर का लेखन बहुत विस्तृत है जिसे किसी एक विषय पर संकलित करना बहुत कठिन है. फिर भी मैंने उपरोक्त विषय पर उनके कुछ विचारों को संकलित कर प्रस्तुत करने का प्रयास किया है ताकि हम लोग उनका पुनर स्मरण करके वर्तमान दलित राजनीति के संकट से उबर सकें और नए राजनीतिक विकल्प का निर्माण कर सकें. इस सम्बन्ध में सभी अम्बेद्करवादियों और जनवादी, प्रगतिशील राजनीति के पक्षधर साथियों से अनुरोध है कि वे इस सम्बन्ध में अपने बहुमूल्य सुझाव अवश्य दें.

 

 

 

 

15 मार्च 2017 के दा ट्रिब्यून अख़बार के अनुसार पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल की पढाई में आरक्षण समाप्त कर दिया गया है ,खबर पढ़ने के लिए पेपर कटिंग यहाँ प्रस्तुत है नीचे लिंक भी दिया है | …The Tribune News

१५ मार्च २०१७ के दा ट्रिब्यून अख़बार के अनुसार पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल की पढाई  में आरक्षण समाप्त कर दिया गया है ,खबर पढ़ने के लिए पेपर कटिंग यहाँ प्रस्तुत है नीचे लिंक भी दिया है |

 

http://www.tribuneindia.com/news/haryana/no-quota-in-pg-medical-courses-this-year-govt/377096.html

 

 

चुनाव आयोग की वेबसाइट पर आपको भारतीय गणराज्य की गजट घोषणा मिलेगी। हर वोटिंग मशीन के साथ काग़ज़ की पर्ची पर दर्ज वोट सुरक्षित रखना होगा। 2013 का गजट है। उसी साल अक्टूबर में अमल में आया। लेकिन अब तक लागू नहीं हुआ।लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने काग़ज़ की पर्ची डालने और उसे सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था।….EVM repated FB post of Dilip C Mandal

1. चुनाव आयोग की वेबसाइट पर आपको भारतीय गणराज्य की यह गजट घोषणा मिलेगी। हर वोटिंग मशीन के साथ काग़ज़ की पर्ची पर दर्ज वोट सुरक्षित रखना होगा। 2013 का गजट है। उसी साल अक्टूबर में अमल में आया। लेकिन अब तक लागू नहीं हुआ।लोकतंत्र और चुनाव प्रक्रिया में लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने काग़ज़ की पर्ची डालने और उसे सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। लेकिन कोई है जो भारतीय लोकतंत्र की जड़ों में मट्ठा डाल रहा है।वह किसी एक पार्टी से बड़ा है।कौन है वह लोकतंत्र का दुश्मन?

2. घोटाला वग़ैरह मैं नहीं जानता। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट का केंद्र सरकार को आदेश है कि चुनाव आयोग को पैसे दे ताकि वह सभी बूथ पर मशीन के साथ काग़ज़ से भी वोट कराए, तो सिर्फ मशीन से वोट क्यों हो रहे हैं। पैसे क्यों नहीं दिए? 2013 का फ़ैसला है।

3. सुप्रीम कोर्ट का 2013 का आदेश है कि हर EVM के साथ पर्ची निकालने की मशीन लगाई जाए। इन पर्चियों को मतपेटी में सुरक्षित रखा जाए ताकि विवाद की स्थिति में वोट दोबारा गिने जा सकें।”From the materials placed by both the sides, we are satisfied that the “paper trail” is an indispensable requirement of free and fair elections. The confidence of the voters in the EVMs can be achieved only with the introduction of the “paper trail”.हर मशीन के साथ पर्ची निकालने पर 13,000 रुपए प्रति मशीन के हिसाब से 1690 करोड़ का ख़र्च आएगा। यह रक़म केंद्र सरकार के लिए कितनी मामूली है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइए कि मुंबई महानगरपालिका का इस साल का बजट 37,000 करोड़ रुपए है। लेकिन केंद्र सरकार ने 1690 करोड़ चुनाव आयोग को नहीं दिए।इसलिए चंद सीटों को छोड़कर पूरे चुनाव सिर्फ EVM पर होते हैं।यह है EVM घोटाला।बाक़ी तो सब लीला है।

4. सुप्रीम कोर्ट का 2013 का फ़ैसला है कि साफ़-सुथरे चुनाव तभी मुमकिन हैं, जब EVM में डाले गए हर वोट की पर्ची को सुरक्षित रखा जाए।यह मशीन और पेपर बैलेट की मिलीजुली व्यवस्था है।इसके लिए केंद्र सरकार से कहा गया कि चुनाव आयोग को रुपए दे।सरकार ने वह रक़म नहीं दी। ये है EVM घोटाला। इसके बाद तो जो है, सो लीला है।सिर्फ मशीन से हुए चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट ने अविश्वास जताया है।पढ़िए सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला।

5. EVM घोटाले पर भारत में बनी पहली डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म। कल अपलोड होने के बाद से अब तक इसे दो लाख 64 हज़ार स्मार्ट फ़ोन ओर कंप्यूटर पर देखा गया है।कई बार पहले इसे यूट्यूब डिलीट कर चुका है। लेकिन यह हर बार वायरल हो जाता है।

 

6. मीडिया EVM का बचाव ऐसे कर रहा है जैसे पॉकेटमार गिरोह के सदस्य पकड़े गए अपने साथी को बचाते हैं। चाहे इस चक्कर में इज़्ज़त ही क्यों न चली जाए।

7. दुनिया के पाँचवें सबसे विकसित देश नीदरलैण्ड में लोग 15-mar-2017  बैलेट पेपर पर मतदान कर रहे हैं। आज वहाँ मतदान है।अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे विकसित देश EVM से वोटिंग नहीं कराते।ह्यूमन डेवलपमेंट इंडेक्स पर भारत 130वें नंबर का देश है।

8. उत्तर भारत ने पिछले 50 साल में लोहिया, कांशीराम, चरण सिंह, रामस्वरूप वर्मा, जगदेव प्रसाद, वीपी सिंह, कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद, मायावती, मुलायम सिंह के नेतृत्व में मझोली, पिछड़ी और अनुसूचित जातियों का राजनीतिक उभार देखा।वे एक समय अच्छा लड़े। फिर कमज़ोरियाँ उभर आईं।सवर्ण जातियों ने अब जाकर इस तरह की राजनीति की काट ढूँढ ली है।यह प्रतिक्रांति है। इतिहास का अंत नहीं है।वे फिर आएँगे।

तख़्त गया ताज गया वंचित समाज गया >;’सर्वजन'< के चक्कर में बहुजन तेरा राज गया…S Prem

 

 

 

 

 

 

तख़्त गया ताज गया
वंचित समाज गया
सर्वजन के चक्कर में
बहुजन तेरा राज गया

वे सिर्फ अपने हित की सोचें
तुम सर्वजन के हित की सोचो
वे गधों को हाथी बनाये
तुम हाथी को गणेश बनाओ

सदियों के शोषित लोगों का
पंख गया परवाज गया
सर्वजन के चक्कर में
बहुजन तेरा राज गया

बाबा ने शिक्षा दिया
कांसी ने दिया सिंहासन
बहुजन को ज्ञान देती
वंचित को देती आसन

बहुजन के हित को
समझा ही नहीं
जाना ही नहीं
दुश्मन के पाखंडों को
तुमने पहचाना ही नहीं
जो घाव लगे थे सदियों के
उन्हें तुमने माना ही नहीं

बड़ी मुश्किल से बनाया था
वो पूरा जहाज गया
सर्वजन के चक्कर में
बहुजन तेरा राज गया

कथनी में कोई कमी नहीं
करनी में भी कोई दोष नहीं
वादों में तेरे सच्चाई
इरादों में भी कोई त्रुटि नहीं
सब दोष है तेरी संगत का
तू समझ न पाई चतुराई

सर्वजन के चक्कर में
वंचित समाज गया
तख़्त गया ताज गया
बहुजन तेरा राज गया

“S. प्रेम”