सवर्णों में गरीबी के बल पर आरक्षण देने की बात अन्याय है, उनमे सामान स्तर पर कंप्टीशन होता है जिसमे क़ाबलियत नहीं वो पीछे रह जाता है|बहुजनों को तो दबाया,सताया,वंचित और प्रताड़ित रखा गया इसलिए उनको विशेष न्याय/प्रतिनिधित्व/आरक्षण की जरूरत है,आरक्षण गरीबी हटाओ प्रोग्राम नहीं है बल्कि वंचितों को न्याय देने की प्रक्रिया है|लेख-कोटे में कोटा…श्रीकांत सतदेवे


*कोटे में कोटा*
general arakshanसवर्णो में पढ़ लिखकर उन्हि के बिरादरी में कुछ लोग आगे निकल गए और कुछ पीछे (ग़रीब) रह गए। लेकिन उसमें अमिर सवर्णो का कोई दोष नही है। क्योंकि उनमें समान स्तर (level) पर स्पर्धा हुई थी। किसीको दबाया नहीं गया था, सबको समान मौका मिला था। जिसने उसका फायदा उठाया, जिसकी काबिलियत थी वह आगे निकल गया। जिनके साथ अन्याय ही नहीं हुआ उन्हें न्याय (आरक्षण) कैसे दिया जा सकता है! लेकिन अवर्णों (sc st obc) के बारे में ऐसा नहीं था। उन्हें दबाया गया, वंचित रखा गया, उनका उत्पिडन किया गया। इसलिए उनको विशेष अवसर, न्याय, आरक्षण देना चाहिए। मतलब जिनके साथ अन्याय हुआ उनको न्याय मिलना चाहिए।
      Sc St Obc कोई जाती नहीं है। यह सामाजिक और शैक्षणिक स्तर के आधार पर निर्धारित वर्ग है। इसलिए आरक्षण से जातिवाद बढ़ता है यह ग़लत है, क्योंकि आरक्षण वर्ग आधारित है जाती आधारित नहीं। बाबासाहब ने जब आरक्षण दिलाया तब इन वर्गोका स्तर लगभग समान था। बाबासाहब की प्रेरणा से कुछ लोग पढ़ने लिखने लगे, उनको आरक्षण से नोकारिया मिली। लेकिन कुछ लोग इसके लिए तैयार नहीं थे, वे जाती धर्म आधारित काम करने में ही धन्यता मानते थे, या किसीकी काबिलियत कम थी। समान स्तर पर स्पर्धा होकर कोई आगे निकल गया उसे दोषी नहीं कह सकते। सवर्णो को यदि कहे की तुम जापानी, चायनीज से स्पर्धा करो तो नहीं कर पाएंगे। शुरू में तो वह अंग्रेजो से भी स्पर्धा नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने अंग्रेजो से छूट (relaxation) मांगे इसके दस्तावेज है। और यह स्वाभाविक है, इंसान अपनेही समाज (स्तर) में स्पर्धा कर सकता है, और होना भी चाहिए। इसी तरह अवर्ण अपनेही तीन गुटों में स्पर्धा कर रहे है। हा बाबासाहब जैसा कोई अपवाद ही इतने निचले स्तर से निकलकर  दुनिया के उच्चतम विद्वानों में एक हो सकता है।
        मेरे दादा मजदुर थे, मेरे पिता क्लर्क बने, मैं इंजीनियर बना। मै चाहूंगा कि मेरा लड़का आईएएस, पायलट बने। मेरे समाज के गरीब बच्चे यह सोच भी नहीं सकते। क्योंकि उनके पास ट्रेनिंग और पैसा नहीं है। मेरा बच्चा जितने होशियारी (smartness) से यह ड्यूटी निभा पायेगा, गरीबका बच्चा नहीं निभा पायेगा। फिर आप लोग ही कहोगे की न जाने कैसे भोंदू आ जाते है! यदि जनरल में बच्चे को भेजु तो मौखिक में उसे उडाने की पूरी गारंटी है। यदि न भेजू तो यह पद खाली रहेंगे और ओपन को जायेंगे। IIT आईआईएम में ऐसे कितने सीटे खाली रहती है। तो मुझे उसे आरक्षण में ही भेजना पड़ेगा। इससे मै हमारे ग़रीब का हक मार रहा हूँ, ऐसा हरगिज नहीं होता। हमारे ग़रीब को भी इससे कोई ऐतराज नहीं है, क्योंकि वह जानते है कि यह लोग हमारे समाज में सही स्पर्धा (healthy competetion) से आगे बड़े है। जिनको पुरे आरक्षण नीति से दिक्कत है, वही यह सवाल उठाते हैं। लेकिन समाज स्तर में ही स्पर्धा होती है, और समाज धिरे धिरे ही आगे बढ़ता है। सवर्णो के साथ भी ऐसे ही हुआ था। मद्रास में अंग्रेजो ने उच्च शिक्षा विद्यालय खोला तो द्वितीय श्रेणी cut off था। लेकिन भारतीय बच्चे नहीं मिल पा रहे थे, तो ब्राम्हणोने cut off तृतीय श्रेणी करवाया। 40% से शुरू करने वाला हमारा समाज आज 90% तक पहुच गया है। कुछ सालों में सवर्णो के बराबर भी आ जायेगा, क्योंकि सवर्ण 100% के ऊपर तो नहीं जा सकते।
  सवर्ण यह भी भ्रम फैलाते हैं कि एक जाती को ही फायदा मिला दूसरी को नहीं और जातियों में झगड़ा लगाते है। अरे भाई तुमको किसने रोका था, सबको समान अवसर था। उलटे सवर्णो ने ही तुम्हे रोका, कहा कि जाती का काम नहीं करोगे तो पाप लगेगा, पढ़ लिख कर तुम अधर्म कर रहे हो। इससे तुम पीछे रह गए। जो आगे गए उन्होंने नाही तुम्हे दबाया नाही तुमसे छिना। तो उन्हें दोष देने में कोई मतलब ही नहीं है। यह सवर्ण तुम्हे भड़का रहे है, ताकि हम आपस में लढ़े, और उनका फायदा हो। जिन सवर्णों ने तुमको सिर पर मैला ढोने तक मजबूर कर दिया, आज अचानक उन्हें तुमसे इतनी हमदर्दी क्यों है!अभीभी बहुत बैकलोग है, अभीभी प्रत्तिनिधित्व 5% भी पूरा नहीं हुआ है। बहुत जगह बाकि है। आओ मिलजुलकर हमारा संवैधानिक हक हासिल करें। हमारे लोग ऊपर रहेंगे तो जाती आधार पर तो हमसे discrimination, victimisation, partiality तो नहीं होगी। यदि यह सब नहीं होता तो सबका बराबर प्रत्तिनिधित्व होता, उल्टा संख्याबल से बहुजन का ज्यादा होता।जैसा की जाती व्यवस्था नही होती तो बहुजन प्रत्तिनिधित्व सबसे ज्यादा होता, तो हमें आरक्षण से और प्रोमोशम में आरक्षण से जल्द से जल्द अपना प्रतिनिधित्व बना लेना चाहिए, ताकि फिरसे हमपर अन्याय अत्याचार न हो।आरक्षण का मुख्य उद्देश्य न्याय लेना, और प्रत्तिनिधित्व प्राप्त करना है। आरक्षण का उद्देश्य गरीबी हटाओ यह हरगिज नहीं है। जब यह न्याय वाली बात है, तो यह हमारा हक़ (right) बनता है। कल्याण welfare या भिक नहीं। तो आओ सब मिलकर जोर लगाये और अपना प्रत्तिनिधित्व हासिल करे।
       राजनीतिक आरक्षण से किसीको आपत्ति नहीं है, क्योंकि चुनके आने वाले पार्टीके गुलाम होते है। इसलिए सरकारे हर दस साल में इसे बढ़ाते है।बाबासाहब को ऐसा राजनितिक आरक्षण चाहिए भी नहीं था, लेकिन गांधीने बिचमे पचका कर दिया। नोकरी में आरक्षण से सबके पेट मे दर्द है, क्योंकि इससे हमारा समाज ऊपर उठ रहा है। और किसीकी माक्तेदारी ख़त्म हो रही है। जैसा की पहले कहा कि sc st obc जाती नहीं वर्ग class है। इससे यह आरोप भी ख़ारिज होता की आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है। वैसेही बाबासाहब ने चाहा की इन वर्गों में एकरूपता आना चाहिए और जाती का अंत होना चाहिए। यदि हम कोटा में किसी पीछे रह गई जाती को अलग से कोटा देते है, तो हम जातिवाद को बढ़ावा देते है। यह संविधान के मूल धारणा के विरुद्ध है। सुना है कि किसी स्वर्णने कोर्ट में ऐसी मांग की है। कोर्ट संविधान के विरुद्ध नहीं जा सकता।
श्रीकांत सतदेवे
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3 thoughts on “सवर्णों में गरीबी के बल पर आरक्षण देने की बात अन्याय है, उनमे सामान स्तर पर कंप्टीशन होता है जिसमे क़ाबलियत नहीं वो पीछे रह जाता है|बहुजनों को तो दबाया,सताया,वंचित और प्रताड़ित रखा गया इसलिए उनको विशेष न्याय/प्रतिनिधित्व/आरक्षण की जरूरत है,आरक्षण गरीबी हटाओ प्रोग्राम नहीं है बल्कि वंचितों को न्याय देने की प्रक्रिया है|लेख-कोटे में कोटा…श्रीकांत सतदेवे

  1. जय भीम !!!

    मैं वर्ष 2012 से गाजियाबाद में केन्द्रीय सरकारी कर्मचारी हूँ और DLF, भोपुरा,
    गाजियाबाद में रहता हूँ।

    मेरे घर में ही बाहर बरामदे में एक छोटा कमरा बनाने लायक जगह है। तो मैं एक
    कमरा बनाकर उसमें “बौद्ध साहित्य” नाम से बौद्ध और अम्बेडकर साहित्य की दुकान
    खोलना चाहता हूँ।

    मैं लगभग 1 साल से सम्यक प्रकाशन, गौतम बूक सेंटर आदि प्रकाशनों से अम्बेडकर
    साहित्य खरीदकर पढ़ता रहा हूँ और अब खुद भी इस काम में लगना चाहता हूँ। मैं तो
    सिर्फ शनिवार व रविवार को ही बैठ पाऊँगा, एक लड़का appoint कर दूंगा, वो संभाल
    लेगा।

    अब मुझे जरूरत है इसके लिए पैसों की। मैंने SBI Loan की सोची है। 2 लाख का लोन
    ले लूँ, 3 साल के लिए – तो 6836/- रुपए प्रतिमाह premium जाता रहेगा।

    पहले से मेरी family हमारी पढ़ाई-लिखाई का कर्ज़ चुकाने में लगी हुई है , जो अभी
    1.5 साल और चलेगा। इसलिए loan से बचना चाहता हूँ।

    यह भी मैं समझ चुका हूँ, कि व्यक्ति खुल कर तभी जी सकता है जब उस पर 1 रुपए का
    भी उधार न हो।

    इसमें मैं आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ, कि क्या loan लेना ठीक रहेगा या कोई और
    रास्ता निकालूँ

    धन्यवाद सहित ।

    भुवनेश कुमार

    2017-03-02 10:25 GMT+05:30 SAMAYBUDDHA’s Dhamm Deshna :

    > KSHMTABUDDHA posted: “*कोटे में कोटा* सवर्णो में पढ़ लिखकर उन्हि के बिरादरी
    > में कुछ लोग आगे निकल गए और कुछ पीछे (ग़रीब) रह गए। लेकिन उसमें अमिर सवर्णो
    > का कोई दोष नही है। क्योंकि उनमें समान स्तर (level) पर स्पर्धा हुई थी।
    > किसीको दबाया नहीं गया था, सबको समान मौका मिला था। जिसने”
    >

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