डा. अम्बेडकर ने अपने लेख ‘हेल्ड एट बे’ में लिखा है कि ‘जब सवर्ण और दलित मिलते हैं, तो वे मनुष्य से मनुष्य के रूप में नहीं मिलते, बल्कि परस्पर दो भिन्न समुदायों के रूप में या दो भिन्न राज्यों के नागरिकों के रूप में मिलते हैं।’ दुर्भाग्य से यह आज भी सच है। मूल लेख विस्थापन…कॅंवल भारती


विस्थापन
(कॅंवल भारती)
डा. आंबेडकर ने अपने लेख ‘हेल्ड एट बे’ में लिखा है कि ‘जब सवर्ण और दलित मिलते हैं, तो वे मनुष्य से मनुष्य के रूप में नहीं मिलते, बल्कि परस्पर दो भिन्न समुदायों के रूप में या दो भिन्न राज्यों के नागरिकों के रूप में मिलते हैं।’ दुर्भाग्य से यह आज भी सच है। यह यथार्थ सिर्फ गाॅंवों का ही नहीं है, शहरों का भी है। शहर में भी एक और शहर पीड़ितों, उपेक्षितों और दलितों का होता है। इस पृथक शहर के साथ किसी की कोई सहानुभूति नहीं होती है। हम कह सकते हैं कि वे सदैव अजनबियों की तरह जीते हैं। एक ही शहर में रहने वाले एक समुदाय के लोग सडक पार करते ही दूसरे समुदायों के लिए अजनबी हो जाते हैं। डा. आंबेडकर कहते हैं कि गाॅंवों में दलित जातियों के लोग इसलिए सामाजिक बहिष्कार के शिकार होते हैं, क्योंकि वे परम्परा के विरुद्ध खड़े होते हैं। सामाजिक बहिष्कार और अत्याचारों के कारण ही वे गाॅंव छोड़कर शहरों में जाकर बसते हैं। लेकिन यह पलायन गाॅंवों में ही नहीं होता, बल्कि शहरों में भी होता है। वह परिस्थिति बहुत पीड़ादायी होती है, न केवल विस्थापितों के लिए, बल्कि उनके प्रियों के लिए भी। एक बार बहुजन नायक कांशीराम ने दलित विस्थापितों पर बहुत ही सही सवाल उठाया था। उन्होंने कहा था कि भारत सरकार सिर्फ कश्मीरी पंडितों की चिन्ता करती है, जिन्होंने आतंकवाद से बचने के लिए विस्थापन किया था। वह उनके लिए दिल्ली में पुनर्वास मन्त्रालय कायम करती है, पर उसे उन लाखों विस्थापित दलितों की कभी चिन्ता नहीं हुई, जो दबंगों, सूदखोरों और मालिकों के आतंक से बचने के लिए अपनी जड़ों से उखड़ते हैं। क्या उनके लिए कोई मन्त्रालय सरकार ने कायम किया?


इस अध्याय में मैं इसी विस्थापन पर बात करुॅंगा, जिसकी यादें आज भी शूल सी चुभती है। अभी पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल क्षेत्र कैराना में कुछ हिन्दुओं के पलायन पर नेताओं ने बहुत होहल्ला मचाया था। उसके पीछे वोट की राजनीति थी। वोट की राजनीति तो सत्तर के दशक में भी थी, पर उसे दलितों की चिन्ता नहीं थी। उस समय मीडिया भी आज जैसा सशक्त नहीं था, और न उसके आज जैसे सामाजिक सरोकार थे। इसलिए, हमारी बस्ती के जाटवों का विस्थापन किसी के लिए भी चिन्ता का विषय नहीं बन सका था। आज आधी सदी के बाद मैं उसे इतिहास में दर्ज कर रहा हूॅं।
चूॅंकि हिन्दू समाज व्यवस्था में दलित-पिछड़ी जातियों के सारे कामधन्धे पैतिृक हैं, इसलिए हमारी बस्ती के जाटव दूध या सब्जी बेचने जैसा कोई काम नहीं कर सकते थे, क्योंकि अगर वे ऐसा करते, तो कोई भी उनसे यह सामान नहीं खरीदता। इसी का फायदा कारखाना-मालिक और साहूकार उठाते थे। मैं पीछे लिख चुका हूॅं कि कारखाना-मालिक कारीगरों को उधार में कच्चा माल देकर अपने कारखाने में ही उनसे जूते तैयार करवाते थे, और वही जूते वे उनसे खरीदकर, अपना उधार काटकर जो बचता था, उन्हें दे देते थे। कच्चा माल और जूते की कीमत कारखाना-मालिक ही तय करते थे। इस जाल में सारा लाभ मालिकों को ही मिलता था, कारगरों के हाथ में उतना पैसा भी नहीं आता था, जिससे वे हफ्ते भर की दाल-रोटी चला लेते, या घर की कोई और जरूरत पूरी कर लेते। शोषण के इस जाल को वे इस खूबसूरती से बुनते थे कि उन भोले-भाले कारीगरों का उसे समझना मुश्किल था। फिर भी किसी प्रकार दाल-रोटी तो उनकी चल जाती थी, एकाध वक्त चूल्हा नहीं भी जलता था, तो उसे वे भगवान की मर्जी मानकर सब्र कर लेते थे, परन्तु इसके सिवा भी जीवन-निर्वाह की जरूरतें थीं, हारी-बीमारी थी, तीज-त्यौहार थे, बरसात से पहले घर की मरम्मत और बच्चों के शादी-ब्याह की चिन्ता थी। हालांकि बच्चों की पढ़ाई-लिखाई उन गरीबों की भी चिन्ता में नहीं थी, पर जिनकी चिन्ता में थी, उनके लिए तो और भी मुश्किल होता था। इन सारी जरूरतों को वे कर्ज लेकर पूरा करते थे, जो वे बनियों से लेते थे या अपने कारखाना-मालिकों से। कुछ लोग दोनों से कर्ज लेते थे। और उनकी पूरी जिन्दगी उस कर्ज को चुकाते हुए ही गुजर जाती थी। वे बनिए का ब्याज देते रहते थे, और कारखाना-मालिक का तो जाल ही इतना मजबूत था कि वे उसमें बॅंधे रहते थे। ऐसे लोग इज्जत की नहीं, जिल्लत की जिन्दगी जीते थे। कारखाने का मालिक और बनिए का मुनीम उनके साथ गारी-गुफ्तारी से लेकर मारपीट तक करता था।
यह उन्नीस सौ पैंसठ से सत्तर के बीच का समय रहा होगा। शहर में जूतों के एक नए कारखाने का उदय हुआ। यह कारखाना पुरानागंज के इशरत अली खाॅं ने अपनी कोठी के नजदीक कुम्हारों में खोला था। यहाॅं तक मुझे याद है, वह उस वक्त या तो रामपुर नगरपालिका के चेयरमैन थे, या भूतपूर्व हो चुके थे। लोग कहते थे कि वह स्मगलिंग का धंधा करते थे। खैर, शटर लगे एक बड़े से हाल में उनका कारखाना था। शटर हालांकि खुला रहता था, पर जब गिराते, तो सारे कारीगर अन्दर बन्द हो जाते थे। उनमें न कोई खिड़की थी, न कोई छोटा दरवाजा था। इसलिए उस स्थिति में उनके बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। कारखाने में अच्छी मजदूरी और एडवान्स रुपयों का लालच देकर कुछ कारीगरों को लाया गया था, जिनमें हमारी बस्ती से नत्थूलाल, उनके बेटे रामकिशोर और मेरे पिता भी काम करने चले गए थे। कुछ दिनों तक तो सब ठीक-ठाक रहा, पर जल्दी ही इशरत अली खाॅं के बेटों और मैनेजर का थर्ड डिग्री व्यवहार कारीगरों के साथ शुरु हो गया। मैं दोपहर में अपने पिता को रोटी देने जाता था। एक दिन मैंने देखा कि अन्दर एक कारीगर मुर्गा बना हुआ है और उसके ऊपर दो ईंटें रखी हुई हैं। मैं उस समय 14-15 साल का रहा होऊॅंगा, स्कूल में ऐसे दृश्य देख चुका था, इसलिए किसी के मुर्गा बनने का मतलब अच्छी तरह जानता था। मैं डर गया। पिता ही नहीं, वहाॅं के सभी कारीगरों के चेहरों पर डर साफ दिखाई दे रहा था। पिता ने मुझसे रोटी का कटोरदान नहीं लिया, और मुझे तुरन्त रोटी वापस ले जाने के लिए कह दिया। उस दिन मैं उन्हें खाना खिलाए बिना ही लौट आया था। लेकिन रास्तेभर मेरे दिमाग में यही चलता रहा कि वह कौन था, जो मुर्गा बना हुआ ईंटों का दर्द झेल रहा था? भैये भाई या हाजी जी के कारखानों में शोषण का जाल तो था, पर वहाॅं इस तरह का हिंसक अत्याचार नहीं था। यहाॅं अगर चार रुपए की दिहाड़ी थी, औरएक कारीगर अगर पूरे दिन में अपर के साथ दो जोड़ी और बिना अपर के चार जोड़ी जूते बनाता था, तो एक जोड़ी जूते पर मालिक का एक रुपया ही मानव-श्रम पर खर्च होता था। अगर कोई कारीगर एडवान्स लेने के बाद किसी दिन काम पर नहीं आता था, तो उसे जबरदस्ती पकड़कर लाया जाता था, भले ही उसकी तबीयत ठीक न हो। कोई कारीगर अगर कई दिन नहीं आता था, या मालिकों के दुव्र्यवहार से डरकर काम छोड़ देता था, तो उसे पकड़वाकर टार्चर किया जाता था। ऐसा ही एक टार्चर दिल दहला देने वाला था। वह कारीगर आज दुनिया में नहीं है, इसलिए मैं उसका नाम नहीं लूॅंगा। उसने उनसे सौ रुपए एडवान्स लिए थे। एक महीने काम करके कुछ रुपए उसने कटवा दिए थे, फिर भी कुछ बाकी रह गए थे। इसी बीच वहाॅं का माहौल इतना डरावना हो गया था कि उसने डरकर काम छोड़ दिया। इस अपराध की उसे भारी सजा दी गई। उसे पकड़कर कारखाने में लाया गया, और मुर्गा बनाकर उसके नीचे मोमबत्ती जला दी गई। जब मोमबत्ती की लौ उसके चूतड़ को जलाने लगी, तो उसकी चीखें शटरबन्द हाल के अन्दर से बाहर तक जा रहीं थीं। पर, राह चलते किसकी हिम्मत थी कि वह शटर खुलवा कर देखता कि अन्दर क्या हैवानियत चल रही थी?
इस अत्याचार ने जाटवों के दिलों पर जख्म तो कर दिए थे, परन्तु उनमें विरोध करने का साहस नहीं था। वे अगर पुलिस में भी शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत कर लेते, तो, भले ही ताकत के सामने वे हार जाते, पर इतिहास बना जाते। मेरे पिता ने बताया था कि उस घटना के बाद, फिर कोई कारीगर वहाॅं काम करने नहीं गया था, और वह कारखाना कुछ समय बाद बन्द हो गया था।
इस घटना के कुछ दिन बाद ही नत्थूलाल और उनका परिवार एक रात बीस गज की अपनी खपरैल को छोड़कर पंजाब चला गया था। उनके चार बच्चे थे, जिनमें दो लड़कियाॅं-विमला और शकुन्तला, और दो लड़के-रामकिशोर और सुरेश थे। बस्ती के रिश्ते से वह हमारे चच्चा लगते थे, पर हमारी माॅं की तरफ से उनकी पत्नी बिरमा हमारी मौसी थीं। बस्ती में सबसे दयनीय स्थिति इसी परिवार की थी। रामकिशोर मेरा हमउम्र था, और सुरेश एकाध साल छोटा था। हम साथ खेलते थे, घण्टों बतियाते थे। रामकिशोर में बाॅंसुरी बजाने का गुण था। पता नहीं, उसने उसे कब और कहाॅं बजाना सीखा था, पर मस्त बजाता था। मैं तब दसवीं कर चुका था, या दसवीं में पढ़ रहा था। मुझे उन सबके जाने की खबर सुबह मिली। तब मुझे इस बात का इल्म नहीं था कि वे सब हमेशा के लिए चले गए हैं और अब कभी लौटकर नहीं आयेंगे। मैं कई दिन तक सदमे में रहा था। रामकिशोर और सुरेश के चेहरे दिलदिमाग से हटते ही नहीं थे। मुझे रामकिशोर की बाॅंसुरी याद आती थी। मैं यही सोचता रहता था कि अब वह पंजाब में अपने नए दोस्तों को जरूर सुनाता होगा। पर, मैं जानता हूॅं कि वह गुण अब उसमें यकीनन नहीं रहा होगा। गरीबों के शौक जितनी तेजी से शुरु होते हैं, उतनी ही तेजी से मर भी जाते हैं। कोई छह महीने के बाद नत्थूलाल पंजाब से अकेले लौटे, तो उनके चेहरे पर रौनक थी। बोलने का लहजा भी पंजाबी हो गया था। उनके चेहरे ही लग रहा था कि वे पंजाब में यहाॅं से बेहतर थे। उन्होंने अपनी बड़ी बेटी विमला का रिश्ता पीलीभीत में पकड़िया मुहल्ले में तय कर दिया था। गरीब घर था, और लड़का रिक्शा चलाता था। उसी शादी का न्यौता देने के लिए वह रामपुर आए थे। उनकी बेटी विमला इतनी खूबसूरत थी कि आज की अभिनेत्री साक्षी तंवर उसकी डुप्लीकेट लगती है। मेरे पिता ने कहा था, ‘नत्थू, तुम अपनी बेटी का भाग्य फोड़ि आये।’ उन्होंने जवाब में कहा था, ‘सब भाग्य का ही खेल है। जहाॅं भी जूड़ी का संजोग ले जाये।’ यह बातें जब मैं सुन रहा था, तो कौन जानता था कि मेरे पिता भी एक दिन इसी तरह मेरी बहिनों का भाग्य फोड़कर आयेंगे?’ कुछ देर के बाद मैंने नत्थूलाल से कहा, ‘चच्चा, रामकिशोर और सुरेश कैसे हैं? उनको साथ में क्यों नहीं लाए?’
उन्होंने उत्तर दिया, ‘बेटे वो तो भौत सई हैं। तुझे भौत याद करें हैं, पर अब उन पे बेटा टेम काॅं हैं।’
‘क्या अब भी बाॅंसुरी बजाता है वह?’ मैंने पूछा।
‘अरे अब काॅं? अब तो उसे टेम ई ना मिलता।’
‘मुझे याद करता है?’
वे बोले, ‘बेटा, याद तो तेरी मौसी भी करै है। पर अब याॅं रै का गया, जो वह आवे। चलते बखत पूछ रिया था कि अब तू कौन सी में है?’
बात सही थी। अब यहाॅं था क्या? सब कुछ तो खत्म हो गया था। 1979 में मैं ‘मूक भारत’ अखबार के सिलसिले में रमेश प्रभाकर के साथ पीलीभीत गया था, जहाॅं हमारी मुलाकात बहुत से लोगों से हुई थी। पकड़िया मुहल्ले में ही मुंशी रामस्वरूप बौद्ध से मिलना हुआ था। तभी याद आया था कि नत्थूलाल की लड़की विमला इसी मुहल्ले में ब्याही है। मैंने मुंशी जी से पूछताछ की, तो उसके घर का पता चल गया। मैं जब वहाॅं गया, कच्ची मिटटी का एक घर था, जिस पर खपरैल पड़ी थी, आॅंगन में ही रिक्शा खड़ा था। वहाॅं एक अधेढ़ उमर की औरत थी, वह उसकी सास थी। मैंने उससे कहा, ‘मैं रामपुर से आया हूॅं, विमला से मिलना है।’ उसने ‘कौन हो, कहाॅं से आए हो, क्या काम है’ जैसे बेतुके सवाल पूछकर बड़ी रूखाई से मना कर दिया, ‘नहीं है वह।’ मैं अपना सा मुॅंह लेकर वापिस आ गया। मैंने मुंशी रामस्वरूप जी को बताया। वह बोले, ‘हाॅं वह बहुत दुखी है।’ वह तो मुझे लग ही रहा था। पर वह अपने मायके में भी कौन सी सुखी थी? मुझे तुलसी बाबा की एक चैपई याद आ गई, जो उन्होंने पता नहीं किन परिस्थितियों में लिखी थी- ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं।’ आज उस घटना को लगभग पचास साल हो रहे हैं। वह परिवार रामपुर कभी नहीं लौटा। नत्थूलाल चैपाल द्वारे की जमीन के मुकदमे के सिलसिले में कभी-कभी रामपुर आ जाते थे। पर, कई साल हुए, वह भी दुनिया छोड़ गए।
‘जाने वाले लौटकर नहीं आते, जाने वालों की याद आती है।’ दिवाकर राही ने यह शे’र किसी मशहूर शक्सीयत के दुनिया से गुजर जाने पर लिखा था, पर यह मुझे उन लोगों के सन्दर्भ में भी याद आता है, जो बस्ती से विस्थापित होने के बाद कभी नहीं आए, बस उनकी याद आती है I
(पूरा लेख कथाक्रम पत्रिका में )

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2 thoughts on “डा. अम्बेडकर ने अपने लेख ‘हेल्ड एट बे’ में लिखा है कि ‘जब सवर्ण और दलित मिलते हैं, तो वे मनुष्य से मनुष्य के रूप में नहीं मिलते, बल्कि परस्पर दो भिन्न समुदायों के रूप में या दो भिन्न राज्यों के नागरिकों के रूप में मिलते हैं।’ दुर्भाग्य से यह आज भी सच है। मूल लेख विस्थापन…कॅंवल भारती

  1. जब *अंबेडकर जयंती* आती है, तो पूरा बहुजन समाज *भीममय* हो जाता है और पार्कों में, मैदानों में “जय भीम” के नारे गूंजने लगते हैं – और फिर यही लोग पूरे *364* दिन जाकर सो जाते हैं, जब चुनाव आता है तो फिर जाग जाते हैं। पार्कों और मैदानों में भीड़भाड़ इकट्ठी हो जाती है, जैसे रामलीला में होती है। अगर आप सिर्फ घूमने-फिरने आए हैं, तो फिर ऐसी भीड़ का कोई मतलब नहीं।
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    ऐसे सिर्फ टाइम पास हो सकता है, खुद के दिल को तसल्ली दी जा सकती है – मगर कुछ बदलाव नहीं हो सकता, कोई क्रांति नहीं हो सकती।
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    मेरा निवेदन है कि आप लोग अंबेडकर की जय करने, अंबेडकर की मूर्ति के सामने अगरबत्ती जलाने के बजाए – अंबेडकर के विचार और उनके उद्देश्य के बारे में पढे। तभी मिशन को कुछ मदद मिलेगी, वरना ब्राह्मणवादियों ने तो अंबेडकर को बहुजन समाज से छीनने की मुहिम शुरू कर दी है।
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    यहाँ हम अंबेडकर जयंती की तैयारी कर रहे हैं और वहाँ भाजपा UP मार ले गयी।
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    ब्राह्मणवादी लोग पूरी कोशिश करेंगे कि बहुजन समाज को अम्बेडकर साहित्य से दूर रखा जाए और पूजा-पाठ में उलझा दिया जाए। गीत-संगीत के कार्यक्रम भी शुरू हो चुके हैं।
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    अम्बेडकर के सामने अगरबत्ती जलाओ, माल्यार्पण करो, पूजा शुरू कर दो, भीम चालीसा तो लिख ही दी गई है। कभी जाकर बौद्ध विहार की हालत देखिये। पूरे साल में अंबेडकर जयंती के अवसर पर बौद्ध विहार में सफाई अभियान चलता है।

    सही बात कही है किसी ने, अगर किसी महापुरुष के विचारों की हत्या करनी हो, कहीं उंसके विचार लोगों तक न पहुँच पाये और उसका मिशन आगे न बढ़ पाये – तो उस महापुरुष की पूजा करना शुरू कर दो, उसके मंदिर बनाओ, उसकी मूर्तियाँ बनाओ।
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    महापुरुष के शरीर की हत्या उसकी असली हत्या नहीं है – असली हत्या तो है उसके विचारों को फैलने से, लोगों तक पहुँचने से रोक देना।
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    *जय भीम – नीला सलाम*
    || भवतु सब्बमंगलं ||

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