NDTV के वरिष्ठ पत्रकार रविश कुमार जी ने दिल्ली पार्लियामेंट पर लगने वाला 14 अप्रैल डॉ अम्बेडकर जयंती का मेला अपने 48 मिनट के प्राइम टाइम में कवर किया था , इस वीडियो के देख कर आप समझ सकते हैं कितना विशाल और बढ़िया मेला लगता है, जरा देखो तो वीडियो दिल खुश हो जाएगा

हिंदू धर्म और विशेषकर ब्राह्मणवाद व श्रमणवाद(Buddhism) के साथ उसके रिश्तों के संबंध में कई भ्रांतियां हैं।आइये जाने हिन्दू और बौद्ध धम्म की ऐतिहासिक सच्चाई …राम पुनियानी


सिंधु नदी के पूर्व में स्थित इस भूभाग में जातिवाद व समावेशिता के बीच सदियों से संघर्ष चल रहा है
BY RAM PUNIYANI राम पुनियानी ON JANUARY 27, 2016 3 COMMENTSREAD THIS ARTICLE IN ENGLISH
हिंदू धर्म और विशेषकर ब्राह्मणवाद व श्रमणवाद के साथ उसके रिश्तों के संबंध में कई भ्रांतियां हैं। ‘हिंदुत्व’ शब्द ने इस भ्रांति में इज़ाफा ही किया है। हिंदुत्व, धर्म के नाम पर की जा रही राजनीति का नाम है।
‘हिंदू’ शब्द आठवीं सदी ईस्वी में अस्तित्व में आया। मूलत: यह एक भौगोलिक अवधारणा थी। इस शब्द को गढ़ा अरब देशों व ईरान के निवासियों ने, जो तत्समय भारतीय उपमहाद्वीप में आए। उन्होंने सिंधु नदी को विभाजक रेखा मानकर, उसके पूर्व में स्थित भूभाग को सिंधु कहना शुरू कर दिया। वे सिंधु का उच्चारण हिंदू करते थे और इसलिए सिंधु नदी के पूर्व में रहने वाले सभी निवासियों को वे हिंदू कहने लगे। उस समय, इस ‘हिंदू’ देश में कई धार्मिक परंपराएं थीं। आर्य-जो कई किस्तों में यहां आए-पहले घुमंतु और बाद में पशुपालक समाज बन गए। वे कभी भी राष्ट्र-राज्य नहीं थे, जैसा कि अब कहा जा रहा है। वेद और स्मृतियां, पशुपालक आर्य समाज के जीवन और उनकी विश्वदृष्टि का वर्णन करते हैं।
उस समय के सामाजिक तानेबाने का वर्णन ‘मनुस्मृति’ में किया गया है। पहले पदक्रम आधारित वर्ण व्यवस्था और बाद में जाति व्यवस्था, इस सामाजिक तानेबाने का मूल आधार थीं। ब्राह्मणों के वर्चस्व पर इस समाज में कोई प्रश्न नहीं उठाया जा सकता था और सामाजिक असमानता, इसका अभिन्न हिस्सा थी। दमित जातियों (दलितों) को अछूत माना जाता था और उनका एकमात्र कर्तव्य ऊँची जातियों की सेवा करना था। दूसरे वर्णों के अधिकार और सामाजिक स्थिति भी सुपरिभाषित थी। ऊँची जातियों के केवल अधिकार थे और दमित जातियों के केवल कर्तव्य। यह स्पष्ट ‘श्रम विभाजन’ था!
इस पृष्ठभूमि में, बौद्ध धर्म का उदय हुआ, जो अपने साथ समानता का संदेश लाया। समाज का बड़ा हिस्सा समानता के मूल्य से प्रभावित हुआ और उसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। आंबेडकर का मानना है कि बौद्ध धर्म का उदय, एक क्रांति थी। इसने सामाजिक समीकरणों को बदल दिया और जातिगत ऊँचनीच को चुनौती दी। उस समय ब्राह्मणवाद के समानांतर अन्य धार्मिक परंपराएं भी अस्तित्व में थीं। बौद्ध धर्म द्वारा जाति व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगाने के कारण, ब्राह्मणवादियों को अपनी रणनीति में परिवर्तन करना पड़ा। ब्राह्मणवाद ने आमजनों को बौद्ध धर्म के आकर्षण से मुक्त करने और अपने झंडे तले लाने के लिए कई धार्मिक अनुष्ठानों, सार्वजनिक समारोहों और उपासना पद्धतियों का आविष्कार किया। इसके बाद से इस धर्म को हिंदू धर्म कहा जाने लगा। जैसे-जैसे बौद्ध धर्म का प्रभाव बढ़ा, ब्राह्मण भूपतियों का नीची जातियों पर नियंत्रण कमज़ोर होता गया। शंकराचार्य के नेतृत्व में बौद्ध धर्म को वैचारिक चुनौती देने के लिए एक बड़ा आंदोलन शुरू हुआ। आंबेडकर इस आंदोलन को प्रतिक्रांति बताते हैं। बौद्ध धर्म पर इस हमले को पुष्यमित्र शुंग और शशांक जैसे तत्कालीन शासकों का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन के फलस्वरूप, बौद्ध धर्म, धरती के इस भूभाग से लुप्तप्राय हो गया और प्रकृति पूजा से लेकर अनिश्वरवाद तक की सारी धार्मिक परपंराएं, हिंदू धर्म के झंडे तले आ गईं। यह एक ऐसा धर्म था, जिसका न कोई पैगंबर था और ना ही कोई एक ग्रंथ। ब्राह्मणवाद ने जल्दी ही हिंदू धर्म पर वर्चस्व स्थापित कर लिया और अन्य धार्मिक परंपराओं को समाज के हाशिए पर खिसका दिया। यह वह समय था जब हिंदू को एक धर्म के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान मिली। हिंदू धर्म में दो मुख्य धाराएं थीं-ब्राह्मणवाद व श्रमणवाद। इन दोनों धाराओं के विश्वास, मूल्य और आचरण के सिद्धांत, परस्पर विरोधी थे।
ब्राह्मणवाद, जो जातिगत और लैंगिक पदक्रम पर आधारित था, ने अन्य सभी परंपराओं, जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमणवाद कहा जा सकता है, का दमन करना शुरू कर दिया। इन परंपराओं, जिनमें नाथ, तंत्र, सिद्ध, शैव, सिद्धांत व भक्ति शामिल थे, के मूल्य ब्राह्मणवाद की तुलना में कहीं अधिक समावेशी थे। श्रमणवाद में आस्था रखने वाले अधिकांश लोग समाज के गरीब वर्ग के थे और उनकी सोच व परंपराएं, ब्राह्मणवादी सिद्धांतों, विशेषकर जातिगत ऊँचनीच, की विरोधी थीं। बौद्ध और जैन धर्म में भी जातिगत पदानुक्रम नहीं हैं व इस अर्थ में वे भी श्रमणवादी परंपराएं हैं। परंतु जैन और बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म का भाग नहीं हैं, क्योंकि इन दोनों धर्मों के अपने पैगंबर हैं और उनमें व हिंदू धर्म में सुस्पष्ट विभिन्नताएं हैं।
इतिहासविद रोमिला थापर (”सिंडीकेडेट मोक्ष’’, सेमिनार, सितंबर 1985) लिखती हैं ”ऐसा कहा जाता है कि आज के हिंदू धर्म की जड़ें वेदों में हैं। परंतु वैदिक काल के घुमंतु कबीलों का चाहे जो धर्म रहा हो, वह आज का हिंदू धर्म नहीं था। इसका (आज का हिंदू धर्म) का उदय मगध-मौर्य काल में प्रारंभ हुआ…।’’
उन्नीसवीं सदी के बाद से, ब्राह्मणवाद के वर्चस्व में और वृद्धि हुई। चूंकि ब्रिटिश उपनिवेशवादियों के लिए विभिन्न स्थानीय परंपराओं और हिंदू धर्म के विविधवर्णी चरित्र को समझना मुश्किल था, इसलिए उन्होंने ब्राह्मणों का पथप्रदर्शन स्वीकार कर लिया और ब्राह्मणवाद को ही हिंदू धर्म मान लिया। धार्मिक मामलों में ब्रिटिश शासकों के सलाहकार वे ब्राह्मण थे, जो अंग्रेज़ों की नौकरी बजाते थे। ये ब्राह्मण अपने गोरे आकाओं को यह समझाने में सफल रहे कि भारत के बहुसंख्यक निवासियों के धार्मिक विश्वासों को समझने की कुंजी, ब्राह्मणवादी ग्रंथों में है। नतीजे में भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म को समझने के लिए ब्रिटिश केवल ब्राह्मणवादी ग्रंथों का इस्तेमाल करने लगे। इससे हिंदू धर्म पर ब्राह्मणवाद का चंगुल और मज़बूत हो गया और परस्पर विरोधाभासी मूल्यों वाली विविधवर्णी परंपराओं पर हिंदू धर्म का लेबल चस्पा कर दिया गया। और इस हिंदू धर्म में ब्राह्मणवाद का बोलबाला था। यही कारण है कि आंबेडकर ने हिंदू धर्म को ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र बताया।
ब्रिटिश शासन में उद्योगपतियों व आधुनिक, शिक्षित वर्ग के नए सामाजिक समूहों के उभार ने ज़मींदारों और पूर्व राजा महाराजाओं-जो ब्राह्मणों के हमराही थे-में असुरक्षा का भाव उत्पन्न किया। जैसे-जैसे यह लगने लगा कि देश में देर-सबेर समानता पर आधारित प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था लागू होगी, ये वर्ग और सशंकित व भयभीत होने लगे। राष्ट्रीय आंदोलन का उदय हुआ और साथ ही दलितबहुजन आंदोलन का भी। जोतिराव फुले और बाद में आंबेडकर ने इन मुक्तिदायिनी विचारधाराओं को मज़बूती दी। दलित बहुजनों में जागृति, ब्राह्मणवाद के लिए एक गंभीर चुनौती बनकर उभरने लगी। बुद्ध की शिक्षाएं, पूर्व शासकों, ब्राह्मणों और तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरा बन गईं। दलितबहुजन विचारधारा को आधुनिक शिक्षा और औद्योगीकरण से और बल मिला।
इस चुनौती से मुकाबला करने के लिए ज़मीदार-ब्राह्मण गठबंधन ने हिंदुत्व को अपना हथियार बनाया। उन्होंने पहले यह कहना शुरू किया कि दलितबहुजनों को शिक्षा प्रदान करना, ‘हमारे धर्म’ के विरूद्ध है। आगे चलकर उन्होंने अपने सामाजिक-राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए धर्म-आधारित राजनैतिक संगठनों का गठन किया। हिंदुत्व, दरअसल, नए कलेवर में हिंदू राष्ट्रवाद और ब्राह्मणवाद का राजनीतिक संस्करण है। ब्राह्मणवादी पहले हिंदू धर्म के नाम पर दलितबहुजनों का दमन करते थे। अब वे यही काम हिंदुत्व के नाम पर कर रहे हैं। सभी गैर-मुस्लिम व गैर-ईसाई परंपराओं जैसे बौद्ध धर्म, जैन धर्म व सिक्ख धर्म को हिंदुत्व में आत्मसात कर लिया गया है। यह हिंदू धर्म का राजनीतिकरण है और इसका धर्म से कोई लेनादेना नहीं है।
बुद्ध से लेकर मध्यकालीन भक्ति परंपरा और वहां से लेकर फुले और आंबेडकर के नेतृत्व में चले आंदोलनों तक, दलितबहुजन, वर्ण और जाति व्यवस्था का विरोध करते आए हैं। आज भाजपा-आरएसएस के सत्ता में आने से हिंदुत्ववादी खुलकर दमित जातियों के हित में उठाए जाने वाले कदमों का विरोध कर रहे हैं।
दलितबहुजन विचारधारा का विकास तीन प्रमुख चरणों में हुआ और इसके तीन प्रमुख विरोधी थे। बौद्ध धर्म का विरोध शंकराचार्य और तत्कालीन शासकों ने किया; मध्यकालीन संतों का विरोध ब्राह्मण पुरोहित वर्ग ने ब्रिटिश शासकों के सहयोग से किया; और फुले, आंबेडकर की विचारधारा का विरोध, राजनीतिक ब्राह्मणवाद या हिंदुत्व कर रहा है।
दमित जातियों (दलितबहुजन) की गैर-ब्राह्मणवादी परंपराएं, विद्रोह और प्रतिरोध की परंपराएं हैं, जिनकी भाषा, संदर्भ के साथ बदलती रही हैं। आज उनका मुकाबला उस विचारधारा से है, जो उन्हें हिंदुत्व के नाम पर कुचलना चाहती है। वह अलग-अलग तरीकों से दलितबहुजनों के हितों पर चोट करने का प्रयास कर रही है।

ब्राह्मणवादी लोग पूरी कोशिश करेंगे कि बहुजन समाज को अम्बेडकर साहित्य से दूर रखा जाए और पूजा-पाठ गीत-संगीत में उलझा दिया जाए। गीत संगीत मान सम्मान समाज की जाग्रति के लिए जरूरी है पर ये शुरुआत है यहाँ रुकना नहीं है हमारा भला पूजने गाने बजाने में नहीं होगा बल्कि उनकी विचारधारा जानने मानने और उसपर चलने से होगा …भुवनेश

विश्व के महानतम मानवतावादी महाज्ञानी महापुरुष बोधिसत्व बाबा साहब डॉ आंबेडकर महान की १२६वी जयंती पर हार्दिक शुभकामनायें

ब्राह्मणवादी लोग पूरी कोशिश करेंगे कि बहुजन समाज को अम्बेडकर साहित्य से दूर रखा जाए और पूजा-पाठ गीत-संगीत में उलझा दिया जाए। गीत संगीत मान सम्मान समाज की जाग्रति के लिए जरूरी है पर ये शुरुआत मात्र है यहाँ रुकना नहीं है हमारा भला पूजने गाने बजाने में नहीं होगा बल्कि उनकी विचारधारा जानने मानने और उसपर चलने से होगा …भुवनेश

जब *अंबेडकर जयंती* आती है, तो पूरा बहुजन समाज *भीममय* हो जाता है और पार्कों में, मैदानों में “जय भीम” के नारे गूंजने लगते हैं – और फिर यही लोग पूरे *364* दिन जाकर सो जाते हैं, जब चुनाव आता है तो फिर जाग जाते हैं। पार्कों और मैदानों में भीड़भाड़ इकट्ठी हो जाती है, जैसे रामलीला में होती है। अगर आप सिर्फ घूमने-फिरने आए हैं, तो फिर ऐसी भीड़ का कोई मतलब नहीं।
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ऐसे सिर्फ टाइम पास हो सकता है, खुद के दिल को तसल्ली दी जा सकती है – मगर कुछ बदलाव नहीं हो सकता, कोई क्रांति नहीं हो सकती।
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मेरा निवेदन है कि आप लोग अंबेडकर की जय करने, अंबेडकर की मूर्ति के सामने अगरबत्ती जलाने के बजाए – अंबेडकर के विचार और उनके उद्देश्य के बारे में पढे। तभी मिशन को कुछ मदद मिलेगी, वरना ब्राह्मणवादियों ने तो अंबेडकर को बहुजन समाज से छीनने की मुहिम शुरू कर दी है।
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यहाँ हम अंबेडकर जयंती की तैयारी कर रहे हैं और वहाँ भाजपा UP मार ले गयी।
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ब्राह्मणवादी लोग पूरी कोशिश करेंगे कि बहुजन समाज को अम्बेडकर साहित्य से दूर रखा जाए और पूजा-पाठ में उलझा दिया जाए। गीत-संगीत के कार्यक्रम भी शुरू हो चुके हैं।
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अम्बेडकर के सामने अगरबत्ती जलाओ, माल्यार्पण करो, पूजा शुरू कर दो, भीम चालीसा तो लिख ही दी गई है। कभी जाकर बौद्ध विहार की हालत देखिये। पूरे साल में अंबेडकर जयंती के अवसर पर बौद्ध विहार में सफाई अभियान चलता है।

सही बात कही है किसी ने, अगर किसी महापुरुष के विचारों की हत्या करनी हो, कहीं उंसके विचार लोगों तक न पहुँच पाये और उसका मिशन आगे न बढ़ पाये – तो उस महापुरुष की पूजा करना शुरू कर दो, उसके मंदिर बनाओ, उसकी मूर्तियाँ बनाओ।
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महापुरुष के शरीर की हत्या उसकी असली हत्या नहीं है – असली हत्या तो है उसके विचारों को फैलने से, लोगों तक पहुँचने से रोक देना।
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*जय भीम – नीला सलाम*
|| भवतु सब्बमंगलं ||

समयबुद्धा मिशन की टीम की तरफ से विश्व के महानतम मानवतावादी महाज्ञानी महापुरुष बोधिसत्व बाबा साहब डॉ आंबेडकर महान की १२६वी जयंती पर हार्दिक शुभकामनायें | बाबासाहब डाॅ. अंबेडकर यह विश्व के एकमात्र ऐसे महान पुरुष हैं जिन्होंने 35 से अधिक विषयों का गंभीर अध्ययन और शोधकार्य किया

*विश्वरत्न बाबासाहब डाॅ. अंबेडकर यह विश्व के एकमात्र ऐसे महान पुरुष हैं जिन्होंने 35 से अधिक विषयों का गंभीर अध्ययन और शोधकार्य किया।*
*1) अर्थशास्त्र (Economics)*
*2) काॅमर्स (Commerce)*
*3) समाजशास्त्र (Sociology)*
*4) इतिहास (History)*
*5) भारत विद्या (Indology)*
*6) आचार निती (Ethics)*
*7) नृतत्वशास्त्र (Anthropology)*
*8) मिलिट्री साइंस (Military Science)*
*9) राजनितीशास्त्र (Political Science)*
*10) नैतिक दर्शन (Moral Philosophy)*
*11) पुरातत्व (Archeology)*
*12) कानून (Law)*
*13) संविधान (Constitution)*
*14) न्याय (Justice)*
*15) धर्म (Religion)*
*16) कृषि (Agriculture)*
*17) जलमार्ग (Navigation)*
*18) सिंचाई (Irrigation)*
*19) मानव अधिकार (Human Right)*
*20) पत्रकारिता (Journalism)*
*21) शासन (Administration)*
*22) संघठन (Organisation)*
*23) श्रमिक समस्याएँ (Labour Problems)*
*24) औद्योगिक समस्याएँ (Industrial Problems)*
*25) बांध अभियांत्रिकी (Dam Engineering)*
*26) भाषा विज्ञान (Science of Language)*
*27) पिछड़ी, अनुसूचित जाती व जनजातीय समस्याएँ (Backwards, Sheduled Caste and Sheduled Teibes Problems)*
*28) शिक्षा पद्धति (Education System)*
*29) जनगणना (Census)*
*30) भूमिसीमा (Land Holdings)*
*31) परिवार नियोजन (Family Planing)*
*32) ज्यूरिसप्रुडेंस (Jurisprudence)*
*33) अध्यात्मविद्या (Theology)*
*34) व्यवसायी कानून (Mercantine Law)*
*35) नृवंश विद्या (Ethrology)*
*36) चरित्रशास्त्र (Ethology)*
*37) अमेरिकी रेलों का अर्थशास्त्र (Economics of American Railways)*
*38) अमेरिकी इतिहास (American History)*
*39) भूगोल (Geography)…*
TARA CHAND: *बधाई. हो उस. देश को, उस देश के राष्ट्पति को जो सात समन्दर पार रहते हुए भी, उस देश के न होते हुए ईमानदारी  से सर्वे कराया । जो कार्य भारतीय सरकार को करना चाहिए था, पर नही किया ।*
वह कार्य *अमेरिका* ने कर दिखाया ।
*🗽अमेरिका🗽*
के विश्व प्रसिद्ध
*🏤कोलंबिया यूनिवर्सिटी🏤*
*मेँ मुख्य दरवाजे के अंदर कि ओर उन का फोटो लगाया हुआ है।*
👉 *point note down*
वहाँ ऐसा लिखा हैं,
*”हमे गर्व है कि, ऐसा छात्र हमारी यूनिवर्सिटी से पढकर गया है .. और उसने भारत का संविधान लिखकर उस देश पर बड़ा उपकार किया है !”*
👉 *कोलंबिया यूनिवर्सिटी के 3⃣0⃣0⃣ साल पूरे होने के उपलक्ष्य मेँ, पूरे 3⃣0⃣0⃣ सालो मेँ इस यूनिवर्सिटी से सबसे होशियार छात्र कौन रहा? इसका सर्वे किया गया! उस सर्वे मे 6 नाम सामने आए , उसमे नं. 1⃣ पर नाम था*
👉 *के सम्मान मेँ कोलंबिया यूनिवर्सिटी के मुख्य दरवाजे पर, उनकी कांस्य प्रतिमा लगायी गयी, उस मूर्ती का अनावरण अमेरिकन राष्ट्रपती बराक ओबामा के करकमलो   से किया गया!*
*उस मूर्ती के नीचे लिखा गया है*
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     *”सिम्बॉल ऑफ नॉलेज”*
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        यानि ज्ञान का प्रतीक
      *”सिम्बॉल ऑफ नॉलेज”*
*— डॉ. भीमराव अंबेडकर जी —*
को सत सत नमन!!
इस मैसेज को इतना फैला दो ताकी हर भारतीय को पता चलें
🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳🇮🇳
*”Dr. B. R. Ambedkar”*
 *करें कि देश मे हर व्यक्ति बाबा साहब के बारे मे जान सकें….*
प्रश्न 1- डॉ अम्बेडकर का जन्म कब हुआ था
उत्तर- 14 अप्रैल 1891
प्रश्न 2- डॉ अम्बेडकर का जन्म कहां हुआ था
उत्तर- मध्य प्रदेश  इंदौर के  महू छावनी  में हुआ था
प्रश्न 3- डॉ अम्बेडकर के पिता का नाम क्या था
उत्तर- रामजी मोलाजी सकपाल था
प्रश्न 4- डॉ अम्बेडकर की माता का नाम क्या था
उत्तर- भीमा बाई
प्रश्न5- डॉ अम्बेडकर के पिता का क्या करते थे
उत्तर- सेना मैं सूबेदार थे
प्रश्न 6- डॉ अम्बेडकर की माता का देहांत कब  हुआ था
उत्तर-1896
प्रश्न 7- डॉ अम्बेडकर की माता के  देहांत के वक्त उन कि आयु क्या थी
उत्तर- 5  वर्ष
प्रश्न8- डॉ अम्बेडकर किस जाती से थे
उत्तर- महार जाती
प्रश्न 9- महार जाती को कैसा माना जाता था
उत्तर- अछूत (निम्न वर्ग )
प्रश्न10- डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं कहां बिठाया जाता था
 उत्तर- क्लास के बहार
प्रश्न 11- डॉ अम्बेडकर को स्कूल मैं पानी कैसे पिलाया जाता था
 उत्तर- ऊँची जाति का व्यक्ति ऊँचाई से पानी उनके हाथों परडालता था
प्रश्न12- बाबा साहब का विवाह कब और किस से हुआ
 उत्तर- 1906 में रमाबाई से
प्रश्न 13- बाबा साहब ने मैट्रिक परीक्षा कब पास की
उत्तर- 1907 में
प्रश्न 14- डॉ अम्बेडकर के बंबई विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने से क्या हुवा
उत्तर- भारत में कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य बन गये
प्रश्न 15- गायकवाड़ के महाराज ने डॉ अंबेडकर को पढ़ने कहां भेजा
 उत्तर- कोलंबिया विश्व विद्यालय न्यूयॉर्क अमेरिका भेजा
प्रश्न 16- बैरिस्टर के अध्ययन के लिए बाबा साहब कहां और कब गए
 उत्तर- 11 नवंबर 1917 लंदन में
प्रश्न 17- बड़ौदा के महाराजा ने डॉ आंबेडकर को अपने यहां किस पद पर रखा
उत्तर- सैन्य सचिव पद पर
प्रश्न 18- बाबा साहब ने सैन्य सचिव पद को क्यों छोड़ा
उत्तर- छुआ छात के कारण
प्रश्न 19- बड़ौदा रियासत में बाबा साहब कहां ठहरे थे
उत्तर- पारसी सराय में
प्रश्न 20- डॉ अंबेडकर ने क्या संकल्प लिया
उत्तर- जब तक इस अछूत समाज की कठिनाइयों को समाप्त ने कर दूं तब तक चैन से नहीं बैठूंगा
प्रश्न 21- डॉ अंबेडकर ने कौनसी पत्रिका निकाली
 उत्तर- मूक नायक
प्रश्न 22- बाबासाहेब वकील कब बने
 उत्तर- 1923 में
प्रश्न 23- डॉ अंबेडकर ने वकालत कहां शुरु की
उत्तर- मुंबई के हाई कोर्ट से
प्रश्न 24- अंबेडकर ने अपने अनुयायियों को क्या संदेश दिया
उत्तर- शिक्षित बनो संघर्ष करो संगठित रहो
प्रश्न 25- बाबा साहब ने बहिष्कृत भारत का प्रकाशन कब आरंभकिया
उत्तर- 3 अप्रैल 1927
प्रश्न 26- बाबासाहेब लॉ कॉलेज के प्रोफ़ेसर कब बने
उत्तर- 1928 में
प्रश्न 27- बाबासाहेब मुंबई में साइमन कमीशन के सदस्य कब बने
उत्तर- 1928 में
प्रश्न 28-  बाबा साहेब द्वारा विधानसभा में माहर वेतन बिल पेश कब हुआ
उत्तर- 14 मार्च 1929
प्रश्न 29- काला राम मंदिर मैं अछुतो के प्रवेश के लिए आंदोलन कब किया
 उत्तर- 03 मार्च 1930
प्रश्न 30- पूना पैक्ट किस किस के बीच हुआ
उत्तर- डॉ आंबेडकर और महात्मा गांधी
प्रश्न 31- महात्मा गांधी के जीवन की भीख मांगने बाबा साहब के पास कौनआया
उत्तर- कस्तूरबा गांधी
प्रश्न 32- डॉ  अम्बेडकर को गोल मेज कॉन्फ्रंस का निमंत्रण कब मिला
उत्तर- 6 अगस्त 1930
प्रश्न 33- डॉ अम्बेडकर ने पूना समझौता कब किया
उत्तर- 1932
प्रश्न 34- अम्बेडकर को सरकारी लॉ कॉलेज का प्रधानचार्य नियुक्त कियागया
उत्तर- 13 अक्टूबर 1935 को,
प्रश्न 35- मुझे पढे लिखे लोगोँ ने धोखा दिया ये शब्द बाबा साहेब ने कहां कहे थे       उत्तर- आगरा मे 18 मार्च 1956
प्रश्न 36- बाबा साहेब के पि. ए. कोन थे
उत्तर- नानकचंद रत्तु
प्रश्न 37- बाबा साहेब ने अपने अनुयाइयों से क्या कहा था
उत्तर- इस करवा को मै बड़ी मुस्किल से यहाँ तक लाया हु !
इसे आगे नहीं ले जा सकते तो पीछे मत जाने देना
प्रश्न 38- देश के  पहले कानून मंत्री कौन थे
 उत्तर- डॉ अम्बेडकर
प्रश्न 39- स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना किस ने की
उत्तर- डॉ अम्बेडकर
प्रश्न 40- डॉ अंबेडकर ने भारतीय संविधान कितने समय में लिखा
 उत्तर- 2 साल 11 महीने 18 दिन
प्रश्न 41- डा बी.आर. अम्बेडकर ने  बौद्ध धर्मं कब और कहा अपनाया
उत्तर- 14 अक्टूबर 1956,  दीक्षा भूमि,   नागपुर
प्रश्न 42- डा बी.आर. अम्बेडकर ने  बौद्ध धर्मं कितने लोगों के साथ अपनाया
 उत्तर- लगभग 10 लाख
प्रश्न 43- राजा बनने के लिए रानी के पेट की जरूरत नहीं,
तुम्हारे वोट की जरूरत है ये शब्द किस के है
 उत्तर- डा बी.आर. अम्बेडकर
प्रश्न 44- डा बी.आर. अम्बेडकर के दुवारा लिखित महान पुस्तक का क्या नाम है
उत्तर- दी बुद्ध एंड हिज धम्मा
प्रश्न 45- बाबा साहेब को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया
उत्तर-भारत रत्न

आज सुबह टाइम्स ऑफ़ इंडिया अखबार पढ़ा , कमाल की बात है आज डॉ आंबेडकर 126वी जयंती पर पूरे अखबार में बाबा साहब की एक भी तस्वीर नहीं है| खेर आपके लिए व्हाट्सअप ब्लॉग फेसबुक अदि पर शेयर करने की लिए प्रस्तित है कुछ फोटो….टीम समयबुद्धा मिशन

जातिवाद ब्राह्मणवादियों के लिए अवसर है और शूद्रों के लिए अभिशाप,जब शीर्ष पद उच्च जातीय लोगों को देते है तब यह जातिवाद नहीं होता लेकिन जब आप ऊँगली उठाओगे तो आप जातिवादी हो जाओगे !… बोधसत्व भाई एस0 प्रेम

जातिवाद क्या है ?
लोकतंत्र में सब बहुमत का खेल है हिन्दू हित की बात कर बहुमत हासिल करने वाले लोग पदों की बंदरबाट में जब शीर्ष पद उच्च जातीय लोगों को देते है तब यह जातिवाद नहीं होता लेकिन जब आप ऊँगली उठाओगे तो आप जातिवादी हो जाओगे !
बीजेपी शाषित राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सूचि में कितने ओबीसी हैं ? केंद्रीय मंत्रिमंडल की सूचि देख लीजिए वहां भी केवल उच्च जाती ही मिलेगी उनके इस दोगलेपन पर सवाल उठाते ही आप जातिवादी हो जाओगे लेकिन वे फिर भी “हिन्दू” ही रहेंगे और तुमसे ज्यादा राष्ट्रवादी भी !
वो आपको बार बार बताएँगे की राम ने सबरी के बेर खाये लेकिन आप शम्बूक की बात करते ही जातिवादी हो जाओगे !
वे हिन्दू के नाम पर ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य ही रहेंगे लेकिन आप ओबीसी दलित आदिवासी की बात करते ही जातिवादी घोसित कर दिए जाओगे !
वे शुद्धिकरण करवाएंगे फिर भी जातिवादी नही होंगे और आप सवाल उठाते ही जातिवादी हो जाओगे !
वे तुम्हे नौकरियों से बाहर करेंगे और तुम नौकरियों की बात करते ही जातिवादी हो जाओगे !
वे शोषण और अत्याचार करेंगे तुम न्याय और संविधान की बात करते ही जातिवादी हो जाओगे !
वे तुम्हें हिन्दू बनाएंगे लेकिन खुद कभी हिन्दू नहीं बनेंगे वे तुम्हारे बच्चों को हिन्दू बनाएंगे लेकिन अपने बच्चों को विदेश भेजेंगे !
वे तुम्हारे बच्चो को संस्कृत पढ़ाएंगे लेकिन अपने बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाएंगे !
 वे रामायण गीता मनुस्मृति के नियमों को कठोरता से लागू करने का भरपूर प्रयत्न करेंगे लेकिन आप आरक्षण की बात करते ही जातिवादी हो जाओगे !
वे तुम्हे आपस में लड़ाएंगे पाखंडों में फंसायेंगे फिर भी देशभक्त रहेंगे और तुमने अगर इनके षड्यंत्रों को समझ लिया तो देशद्रोही जातिवादी साबित कर दिये जाओगे !
जातिवाद उनके लिए अवसर है और शूद्रों के लिए अभिशाप…
-S प्रेम

मानतावादी मसीहा बाबा साहब डॉ आंबेडकर के 126वि जयंती पर विशेष लेख :- दुनिया में सर्वश्रैष्ठ बाबा साहेब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर’….कुशाल चन्द्र एडवोकेट

‘‘दुनिया में सर्वश्रैष्ठ : बाबा साहेब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर’’
      आज हम डॉ. अम्बेडकर के एक ऐसे चमत्कार और उस दौर की बात कर रहे है जो समय उन्होने न्यूयार्क, अमेरिका में 1913 से 1916 के बीच कोलम्बिया युनिवर्सिटी में बिताया ।
      ऐसा डॉ. अम्बेडकर और बड़ोदा महाराज के बीच हुऐ करार से सम्भव हो पाया जिसके अन्तर्गत 10 वर्षों तक रियासत की सेवा करने का करार । जिसके तहत डॉ. अम्बेडकर को उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका भेजना तय हुआ । बीसवीं शताब्दी में डॉ. अम्बेडकर ऐसे प्रथम श्रेणी के राजनेताओं में पहले व्यक्ति थे । जिन्होने अमेरिका जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की ।
      जून 1916 में उनके द्वारा किये गये शोध ‘‘नेशनल डिविडेन्ड इन इण्डिया ए हिस्टोरिक एण्ड ऐनेलेटिक स्टेडी’’ पर शोध विश्वविद्यालय में प्रस्तुत किया । जिस पर डॉ. अम्बेडकर को (डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी) पी. एच. डी. की उपाधि से सम्मानित किया गया । डॉ. अम्बेडकर कि इस सफलता से प्रेरित होकर ‘‘कला संकाय के प्राध्यापकों और विद्यार्थीयों’’ ने एक विशेष भोज देकर डॉ. अम्बेडकर का सम्मान किया जो महान व्यक्ति अब्राहन लिंकन व वांशिगटन की परम्परा का अनुसरण था । ‘‘इस शोध प्रबंध में डॉ. अम्बेडकर ने बिट्रिश सरकार द्वारा भारत के आर्थिक शोषण की एक नंगी तस्वीर दुनिया के सामने रखी जो आज एक ऐतिहासिक दस्तावेज है’’ ।
      डॉ. अम्बेडकर द्वारा सामाजिक न्याय व समता के संबंध में भारतीय दलित समाज के लिए उनके द्वारा किये गये ‘‘सविधान निर्माण’’ की उपलब्धि से प्रभावित होकर ‘‘कोलम्बिया विश्वविद्यालय न्यूयार्क, अमेरिका ने जून 1952 में’’ डॉ. अम्बेडकर को ‘‘डॉक्टर ऑफ लॉ’’ की मानद उपाधि प्रदान की ।
      इस कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय न्यूयार्क अमेरिका ने जिसकी स्थापना वर्ष 1754, के 250 वर्ष (1754 से 2004) पूरे होने के उपलक्ष में वर्ष 2004 मे अपने 250 वर्ष के पूर्व विद्यार्थीयों मेसे, ऐसे 100 पूर्व विद्यार्थीयों Columbians ahead of their time, (shorted list of Notable persons) को चुना गया जिन्होने दुनिया में महान कार्य किये और जो अपने – अपने क्षेत्र में महान रहे, ‘‘ जिसमें 1 मात्र भारतीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर व 3 अमेरिका के राष्ट्रपति, थॉडोर रूजवेल्ट, फ्रेकलिन रूजवेल्ट, डोविट एसनहॉवर, 6 अलग- अलग देशों के राष्‍ट्रपति व प्रधानमंत्री जिसमें राष्ट्रपतियों में जार्जिया के मिखैल साकाश्वीली, इथोपिया के थामस हेनडीक, प्रधानमंत्री में इटली के गियूलिनो अमाटो, अफगानिस्तान के अब्दुल जहीर , चीन के तंग शोयी, और पोलेण्ड के प्रधानमंत्री शामील है, तथा कई मंत्री, 40 से अधिक नोबल पुरस्कार विजेता, अमेरिकन सुप्रीम कोर्ट के प्रथम मुख्य न्यायाधीश, 8 अन्य सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश, 22 से अधिक अमेरिकी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, 5 कोलम्बिया विश्वविद्यालय के संस्थापक पितामह, 16 फोरर्चून कम्पनियों के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, सर्वाधिक धनवान व्यक्तियों में शामिल वारेन बफेट, फिलोशोफर जॉन डेव (डॉक्टर अम्बेडकर के गुरू), कई पुलीत्जर पुरस्कार विजेता, ऑस्कर पुरस्कार विजेता, फिल्म मेकर, पत्रकार, इतिहासकार, कवि, पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, चिकित्सक, गीतकार, लेखक, शिक्षाविद्, खिलाडी, गवर्नर, आई.बी.एम. के संस्थापक आदि महान विभूतियां शामिल है ।
      कोलम्बियां युनिवर्सिटी में ऐसे 100 पूर्व विद्यार्थीयों के लिये एक स्मारक बनाया गया जिस पर इन 100 महान विभूतियों के नाम लिखे गये । इन सभी सम्मानित 100 पूर्व विद्यार्थीयों के नाम को सही क्रम में लगाने के लिए वहां कि विद्वानों की एक कमेटी बनाई गई । उस कमेटी ने भारतीय संविधान के रचयिता तथा आधुनिक भारत के संस्थापक पितामह बाबा साहेब डॉ. बी. आर. अम्बेडकर का नाम प्रथम नम्बर (1) पर रखा ।
      इस स्मारक का अनावरण अमेरिकी राष्ट्रपति और नोबल पुरस्कार विजेता बराक ओबामा ने किया, यह स्मारक आज भी कोलम्बिया विश्वविद्यालय के केम्पस में शान से खड़ा है ।
      वर्तमान में कोलम्बिया विश्वविद्यालय ने अपनी इस सूची में ओर कई नाम जोडने का फैसला किया है जिसमें वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति व नोबल पुरस्कार विजेता बराक हुसैन ओबामा भी शामिल है तथा ओर भी कई नाम इसमें जोडे जा रहे है ।
      जबकि भारत में इस दलित विरोधी मीडीया में न तो कोई खबर है न ही कोई आवाज, एक सर्वे के अनुसार http://www.whopopular,indianleadarandpolitician की वेबसाइट में डॉ. अम्बेडकर नं. 1 रहे है । आज भी इन्टरनेट पर दुनिया में सबसे ज्यादा सर्च किये जाने वाले महान व्यक्तियों में शामिल है ।
      वर्ष 2011 मे आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्धारा बीते 10 हजार वर्षो में विश्व में ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाले दुनिया की महान विभूतियों का एक सर्वे किया गया जो “The maker of the universe” शिर्षक के अन्तर्गत 100 महान विभूतियों को चुना गया जिसमें भगवान गोतम बुद्ध को प्रथम स्थान तथा भारतीय संविधान के रचयिता डॉ बाबा साहेब अम्बेडकर को चोथा स्थान मिला ।
      विश्व कि महान विभुतियों मे टॉप 10 में चोथा स्थान, 122 करोड भारतीयों के लिए गर्व की बात है , और यह भी कहा गया कि समय के साथ साथ डॉ अम्बेडकर के विचार प्रासंगिक होते जा रहे है ।
      अगस्त 2012, मे सी एन एन आई बी. एन. चेनल द्वारा द ग्रेटेस्ट इण्डियन शो आयोजित किया गया, जिसमे महानतम भारतीय का चुनाव किया गया । इस चुनाव मे 100 भारतीयो को सूचिबद्व किया, जिसमे से शीर्ष 10 भारतीयो को चुना गया ।
      जिसके लिए दुनियाभर से ऑनलाइन वोटिंग के आधार पर मोबाइल मिस्डकॉल, इन्टरनेट द्वारा वोटिंग की गई । जिसमे सर्वाधिक मत डॉ बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर को ही मिले, और उन्होने ग्रेटेस्ट इण्डियन की दौड़ मे सबको पीछे छोड़ दिया । शो मे कुल 80,97,243 वोट दिये गये, जिसमे डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को 19,91,734, के अतिरिक्त अब्दुल कलाम आजाद 13,74,431, सरदार पटेल 5,58,835, अटल बिहारी वाजपेयी 1,67,378, मदर टेरेसा 92,645, जे.आर.डी. टाटा 50,407 सचिन तेंदुलकर 47,706, इन्दिरा गांधी 17,641, लता मंगेशकर 11,520, जवाहर लाल नेहरू 9,920 मत मिले ।
      जिसमे जनता ने सर्वाधिक 25 प्रतिशत वोट, लगभग 20 लाख, अकेले डॉ. बी.आर. अम्बेडकर को दिये गये, जबकि इस महानतम भारतीय चुनने की प्रक्रिया मे मोहनदास करमचन्द गांधी को अलग रखा गया । उन्हे बिना वोटिंग पहले ही महानतम भारतीय मान लिया गया । आप समझ सकते है कि यह मिडिया की करतूत है । शायद उन्हे महान भारतीय न चुने जाने का डर रहा होगा, अन्यथा वे ऐसा नही करते, क्योकि ( बिना वोटिंग ) बिना चुनाव के ही, किसी को प्रथम मान लेना, स्पष्टतः पक्षपातपूर्ण रवैये को दर्शाता है, क्योकि आप समझ सकते है कि देश के पहले प्रधानमन्त्री 10 वे नम्बर पर है, और वोटिंग मे उनका प्रतिशत, दशमलव 10 प्रतिशत है । जो एक प्रतिशत से भी बहुत कम है ।
      जिस तरह का सक्रिय मीडिया हमारे देश में है यह हमारी लिए बहुत अच्छी बात है । लेकिन दलितों की खबरे आते ही पता नहीं इसकी सक्रियता कहा चली जाती है, ऐसा बर्ताव करता है , कि जैसे कि कुछ हुआ ही नहीं हो । उसी दलित विरोधी भावना को दोहराते हुए , उसने डॉक्टर अम्बेडकर के इस कारनामें को दबाने का प्रयास किया, जो मिडीया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह खडा करता है , जिस टी.आर.पी. के लिए यह छोटी सी खबर को सनसनीखेज बनाने वाला , और छोटे से मुददे को बवन्डर बनाने वाला यह मीडिया , दलित खबर में इसकी यह कार्यकुशलता पता नहीं कहा खो जाती है । उच्च वर्ग की एक छोटी सी खबर का जिस प्रकार सीधा प्रसारण किया जाता है जैसे कि वह देश की सबसे बडी खबर हो । आज मीडियाकर्मी इस महान व्यक्ति के द्वारा बनाये गये संविधान से प्राप्त अधिकारों की बात करते है लेकिन जिस प्रकार इनके साथ भेदभाव करते है यह उनकी हिन भावना की धोतक है ।
      सम्पूर्ण भारत मे एक मात्र महाराष्ट्र के मुख्य समाचार पत्र सामना ने 9 नवम्बर 2011 को इस ऐतिहासिक खबर को मुख पृष्ठ पर स्थान दिया । नहीं तो जो व्यक्ति भारत से इकलोता होने के साथ साथ ऐसे महान लोगों की पंक्ति में आगे खडा हो, जिसकी छोटी सी हलचल सुर्खिया बन जाती हो । यह हमारे देश के 121 करोड लोगों के लिए एक बहुत बडे गर्व की बात है ओर जो 250 वर्षो के सर्वे के आधार पर उसे चुना गया हो इससे बडा चमत्कार कोई नहीं हो सकता, ना ही ऐसा भविष्य में होने की संभावना है । चूंकि वह दलित है इसलिए उसका जितेजी शोषण किया और उनके मरने के बाद भी यह दलित विरोधी मीडिया व लोग शोषण करने से नहीं चुकते ।
      जिस देश में केवल खेल और मनोरंजन कराने वाले कई लोगों को कई डॉक्टरेट की मानद उपाधी दे दी जाती है जबकि डॉक्टर अम्बेडकर के मामले में इनका रवैया भेदभाव रहा था और रहा है ।
ऐसी ही भावना के चलते बडे दुख की बात है कि जनवरी 1952 में सम्पूर्ण भारत के एकमात्र विश्वविद्यालय में डॉक्टर अम्बेडकर के द्वारा संविधान निर्माण पर पर उन्हें डॉक्टर ऑफ लिटरेचर की उपाधि प्रदान की । यह दलित शोषण की भावना को दर्शाता है ।
      हालांकि मेरा इस पर कोई विवाद नहीं है, मुझे तो इस बात पर भी संदेह है कि जिस प्रकार कोलम्बिया विश्वविद्यालय व विकिपेडिया की वेबसाइट द्वारा डॉ. अम्बेडकर का नाम नोटेबल लोगों की लिस्ट में दबाने का प्रयास किया गया । हाईलाइट नहीं किया गया । मुझे तो इस पर भी संदेह है कि, एक भारतीय होने के कारण उनके साथ किसी भेदभाव से इंकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कोलम्बिया विश्वविद्यालय एक अमेरिकी विश्वविद्यालय है, डॉ. अम्बेडकर को जो सम्मान मिलना चाहिये उसे देने में वे बडा असहज महसूस कर रहे होगें, ।
      वैसा मेरा कोई विरोध नहीं है फिर भी जिस प्रकार वर्तमान अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को राष्ट्रपति बनते ही शांति के लिए नोबल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार से नवाजा गया । इससे आप इसकी विश्वसनीयता ओर अमेरिकी एकाधिकार को समझ सकते है ।
      डॉ. अम्बेडकर द्वारा सामाजिक न्याय व समतामूलक समाज के निर्माण में जो महान योगदान दिया । जिसके इतने बेहतरीन चौकाने वाले परिणाम आज हम देख रहे है । ऐसा उदाहरण दुनिया के इतिहास मे कहीं नहीं मिलता है ।
      जिसके फलस्वरूप आज दलितों की स्थिति में तीव्र गति से ऐतिहासिक सुधार हुआ है जिसके परिणामस्वरूप आज भारतीय समाज में दलितों की पहचान बनना प्रारम्भ हो गई है जिसे दलित विरोधी मिडीया दबाने का प्रयास कर रहा है ।
      यह डॉक्टर अम्बेडकर के योगदान का ही परिणाम है कि आज हम इस बिन्दु पर अपना पक्ष रख रहे है, इसमें कोई संदेह नहीं है, वे दुनिया में सर्वश्रैष्ठ थे, और सर्वश्रैष्ठ रहेगे ।
       प. मदन मोहन मालवीय ने बाबा साहेब के अपार ज्ञान को समझकर एक बार लाहौर में 1935 में कहा था कि वे ज्ञान के भंडार हैं । असीमित ज्ञान के धनी हैं । उनके विश्वास और हिन्दू पौराणिक मान्यता के अनुसार वे देवी सरस्वती के पुत्र हैं । उनका ज्ञान आगध है । उनके ज्ञान की कोई सीमा नही है । उन्होंने इसी अपरिमित ज्ञान के आधार पर समाज और धर्म को सुधारना चाहा है, परन्तु धर्म के ठेकेदारों पर इसका कोई असर नहीं पड़ा है अगर हिन्दू धर्म को जीवित रखना है तो डॉ. अम्बेडकर के विचारों को मानकर चलना होगा । उनके अगाध ज्ञान की जितनी प्रशंसा की जाए वह सब थोड़ी ही होगी । बाबा साहेब के केन्द्रिय सरकार ने एक्जीक्यूटिव सरकार बनने के उपलक्ष्य में 1944 में मालवीय जी ने हिंदू विश्वविधालय ( इस विश्वविधालय के संस्थापक स्वंय मालवीय जी थे ) में बाबा साहेब का स्वागत समारोह आयोजित किया । इस अवसर पर मालवीय जी ने कहा कि – ‘‘जिस ज्ञान पर ब्राह्यणों ने एक छत्र अधिकार कर रखा था उसे डाक्टर साहेब ने अपनी प्रकांड विद्वता से छिन्न-भिन्न कर दिया है । इन्होंने किसी भी ब्राह्यण विद्वान से ज्यादा ज्ञान अर्जित किया है । वे अपार, अगाध और असीम ज्ञान के भंडार है ।’’
      ‘‘इसी गहन अध्ययनशीलता के कारण उनके तर्क अकाट्य होते थे, मान्य और प्रमाणिक होते थे । उनके इसी अथाह ज्ञान के कारण उनके घोर विरोधी महात्मा गांधी जैसे लोग भी उनकी विद्वता पवित्रता और राष्ट्रधर्मिता को मानते थे ।’’
       महारानी एलिजाबेथ ने डॉ. अम्बेडकर के महापरिनिर्वाण पर कहा कि – ‘‘दुःख की बात है कि महामानव डॉ. अम्बेडकर का जन्म भारत में हुआ । यदि इनका जन्म किसी अन्य देश में हुआ होता तो इनको सर्वमान्य विश्वविभूति में मान मिलता । ’’
      बाबा साहब जैसी महान शख्सियत के महापरिनिर्वाण पर लन्दन टाइम्स ने कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया ‘‘भारत में ब्रिटिश शासन के अंतिम दिनों के राजनैतिक और सामाजिक इतिहास में डॉ. अम्बेडकर का नाम प्रमुखता से जगमगायेगा । उनका धीरज और दृढ़ निश्चय उनके चेहरे पर सदा झलकता था । उनकी बुद्धिमानी का सानी तीनों महाद्वीपों नहीं था, फिर भी उन्होंने अपनी बुद्धिमता का ढिंढ़ोरा नहीं पीटा । इसका कारण यह था कि उन्हें आडम्बर करना नहीं आता था । ’’
       यह इस बात को प्रमाणित करता है कि, बाबा साहेब न केवल इण्डिया मे बल्कि पूरी दुनिया मे सर्वश्रेष्ठ है । जिनके विचार, आजादी के हर बढते साल, के साथ-साथ, प्रासंगिकता होते चले जा रहे है ।
लेखक
कुशाल चन्द्र  एडवोकेट
M.A., M.COM., LLM.,D.C.L.L., I.D.C.A.,C.A. INTER–I,
अध्यक्ष, रैगर जटिया समाज सेवा संस्था, पाली (राज.)