डॉ. सिद्धार्थ का यह आलेख ‘मनुवाद को चुनौती देते तीन महापुरूष’ ””दलित दस्तक”” मासिक पत्रिका के अप्रैल अंक की कवर स्टोरी है| अप्रैल महीना स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित आधुनिक भारत का सपना देखने वाले तीन महापुरूषों की जयंती का समय हैं. 9 अप्रैल (1893) को राहुल साकृत्यायन. 11 अप्रैल (1827) को जोतिबा फुले और 14 अप्रैल (1891) को बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर. आइये इन महापुरुषों के मनुवाद के बारे में विचार को देखते हैं….Dalit Dastak


मनुवाद को चुनौती देते तीन महापुरूष
Details Published on 27/04/2017 13:03:54 Written by डॉ. सिद्धार्थ
अप्रैल महीने का पहला पखवाड़ा स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित आधुनिक भारत का सपना देखने वाले तीन महापुरूषों की जयंती का समय हैं. 9 अप्रैल (1893) को राहुल साकृत्यायन. 11 अप्रैल (1827) को जोतिबा फुले और 14 अप्रैल (1891) को बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर. इन तीनों महापुरूषों के सपनों, दर्शन, विचारों, इतिहास दृष्टि, व्यक्तित्व और कृतित्व में बहुत कुछ साझा है, लेकिन साथ ही भिन्नता भी मौजूद है. सबसे पहले तो इन महापुरुषों के मनुवाद के बारे में विचार को देखते हैं.
हिन्दू धर्म की व्याख्या करते हुए बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर ने कहा था- “हिन्दू जिसे धर्म कहते हैं, वह कुछ और नहीं, आदर्शों और प्रतिबंधों की भीड़ है. हिन्दू धर्म वेदों व स्मृतियों, यज्ञ-कर्म, सामाजिक शिष्टाचार, राजनीतिक व्यवहार तथा शुद्धता के नियमों जैसे अनेक विषयों की खिचड़ी मात्र है. हिन्दुओं का धर्म बस आदेशों व निषेधों की संहिता के रूप में ही मिलता है और वास्तविक धर्म, जिसमें आध्यात्मिक सिद्धांतों का विवेचन हो, जो वास्तव में सर्वजनीन और विश्व के सभी समुदायों के लिए हर काम में उपयोगी हो, हिन्दुओं में पाया ही नहीं जाता. यदि थोड़े से सिद्धांत पाए भी जाते हैं तो हिन्दुओं के जीवन में उनकी कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं पायी जाती हैं. हिन्दुओं का धर्म ‘आदेशों और निषेधों’ का ही धर्म है. यह बात वेद और स्मृतियों में ‘धर्म’ शब्द के प्रयोग तथा व्याख्याकारों द्वारा उसकी व्याख्या से स्पष्ट है.
 तो क्या हिन्दू धर्म में ऐसा कोई सिद्धांत नहीं है, जिसके समक्ष आपस के तमाम भेदों के बावजूद नतमस्तक होना सभी हिन्दू, अपना कर्तव्य मानते हों? मुझे लगता है, ऐसा एक सिद्धांत है और वह है जाति का सिद्धांत’. ब्राह्मणवाद के जहर ने हिन्दू समाज को बर्बाद किया है. ”  हिन्दू धर्म के बारे में बाबासाहेब के ये कथन मनुवाद के अंदर की सड़ांध को सामने ले आते हैं. इसी तरह राहुल सांकृत्यायन ने भी मनुवादियों की धज्जियां उड़ाई है.
बकौल राहुल सांकृत्यायन- “मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना- इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना. अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमरा मुल्क पामाल क्यों हैं? पुराने इतिहास को छोड़ दिजिए, आज भी हिन्दुस्तान के शहरों और गांवों में एक मजहब वालों को दूसरे मजहब वालों के खून का प्यासा कौन बना रहा हैं? और कौन गाय खाने वालों को गोबर खाने वालों से लड़ा रहा है. असल बात यह है कि “ मजहब तो है सिखाता आपस में बैर रखना. भाई को सिखाता है भाई का खून पीना”. हिन्दुस्तानियों की एकता मजहबों के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर. कौए को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता. कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता. मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है. उसका मौत को छोड़कर दूसरा इलाज नहीं हैं.’
शायद ही कोई जनपक्षधर और वैज्ञानिक भौतिकवादी विचारों से लैस व्यक्ति इस बाते से इंकार करे कि आज का भारत दो मनुष्य विरोधी संस्कृतियों के चंगुल में जकड़ा छटपटा रहा है. इसमें पहली संस्कृति का नाम हिन्दू संस्कृति है, जबकि दूसरी का नाम विश्वव्यापी पतनशील पूंजी की संस्कृति है. एक को महान भारतीय संस्कृति के नाम पर पुर्नस्थापित किया जा रहा है तो दूसरी को सबके विकास के नाम पर स्थापित किया गया है. दोनों का आपस में पूर्ण मेल हो गया है. दोनों एक दूसरे को शक्ति और समर्थन दे रहे हैं. दोनों का अस्तित्व एक दूसरे पर टिका है. दोनों ने लगभग भारतीय जीवन को पोर-पोर नियंत्रण में ले लिया है.
 अब हिन्दू संस्कृति के नुमाईंदों ने भारतीय राजसत्ता पर भी लगभग पूर्ण नियंत्रण कर लिया है और राजसत्ता पर पहले काबिज पूंजी की संस्कृति के समर्थकों ने इनका जोरदार खैरमकदम किया है. दो टूक शब्दों में कहा जाए तो भारत में ब्रिटिश सत्ता के उप उत्पाद के तौर शुरू हुई और आजादी के आंदोलन के साथ जोर पकड़ने वाली, भारत के आधुनिकीकरण की परियोजना आजादी के लगभग सत्तर सालों बाद पूरी तरह असफल या पराजित हो गई है. इस पराजय या असफलता को आधुनिकीकरण के मूल तत्वों देश की संप्रभुता, जनसंप्रभुता, वर्ण-जाति व्यवस्था, जातिवादी पितृसत्ता, धर्म निरपेक्षता, उत्पादन संबंधों-संपत्ति संबंधों और नई सृजित होने वाली संपत्ति के न्यायपूर्ण बंटवारे के संदर्भ में समझा जाना चाहिए.
 भारतीय पुर्नजागरण, सुधार आंदोलन और आजादी के आंदोलन के दौरान ही आधुनिकीकरण की परियोजना के बीज पड़े थे. लेकिन एक ऐसी धारा भी थी जो आधुनिकीकरण की पूरी परियोजना के ही विरोध में थी और देश को हिन्दू राष्ट्र में तब्दील करना चाहती थी. उस शक्ति का नाम ही राष्ट्रीय सेवक संघ (संघ) है, जिसे अब जाकर सफलता मिली है. देश में पूरब से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण उसने अपना पांव पसार लिया है और उसके अनुषांगिक संगठन भाजपा ने अपार बहुमत के साथ देश की राजसत्ता पर भी कब्जा कर लिया है तथा उसके अन्य विविध आनुषांगिक संगठनों का देश की विभिन्न औपचारिक एवं अनौपचारिक संस्थाओं पर कब्जा हो गया है. आधुनिकता के विविध मूल तत्वों में से किन तत्वों का प्रतिनिधित्व जोतिबा फुले, बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन करते थे, और आज का भारत उस संदर्भ में कहां खड़ा हैं, इसका जायजा लेने से पहले एक सरसरी नजर आधुनिकता के अन्य तत्वों और उनके हश्र डाल लेना जरूरी है.
रही बात आधुनिकता की दो मह्त्वपूर्ण परियोजनों वर्ण-जाति और जातिवादी पितृसत्ता से मुक्ति अर्थात बर्बर मध्युगीन मानसिकता से भारतीयों की मुक्ति का प्रश्न, जो फुले, अंबेडकर और राहुल सांकृत्यायन के हमले का मुख्य केंद्र था. उस पर इन नायको का संदर्भ लेते हुए हम विस्तार से बात करेंगे.
 हमारे देश में बहुत सारे लोगों से यह समझने में भारी भूल हुई कि जाति और पितृसत्ता दो भिन्न श्रेणियां है और समाधान अलग –अलग तरीकों से होगा. जबकि फुले, अम्बेडकर और काफी हद तक राहुल सांकृत्यायन भी यह अच्छी तरह समझते और मानते थे कि हिन्दू संस्कृति के दो प्राण तत्व हैं- जाति और जातिवादी पितृसत्ता. इन लोगों का स्पष्ट तौर पर मानना था कि  वर्णों और जातियों को तभी कायम रखा जा सकता है और उनकी पवित्रता-शुद्धता को तभी बनाए रखा जा सकता है; जब स्त्रियों की यौननिकता पर पूर्ण नियंत्रण किया जाए. हमारे तीनों नायक इस बात पर जोर देते हैं कि हिन्दुओं की मूल्य व्यवस्था, संस्कारों और सोचने के तरीके का केंद्र बिंदु जाति की रक्षा और स्त्री की योनिकता पर पूर्ण नियंत्रण है. इसी बात को लोहिया के शब्दों में कहें तो ‘ हिन्दुओं का दिमाग जाति और योनि के कटघरे में कैद है.’
 जाति और पितृसत्ता के बीच क्या संबंध है. इस बात को आधुनिक युग में जिस व्यक्तित्व ने सबसे पहले समझा, वे थे– फूले दंपत्ति जोतिबा फुले और सावित्री बाई फूले. जाति/ वर्ण के साथ स्त्री की स्थिति को जोड़कर देखने का जहां बड़े इतिहासकारों ने नहीं के बराबर प्रयास किया, वहीं जाति- व्यवस्था की दलित चिंतकों-सुधारकों ने जो समझ विकसित की और जमीनी स्तर पर जो कार्य किया उसमें स्त्री की पराधीनता और जाति के बीच का गठबंधन स्पष्ट होकर सामने आया. ज्योतिबा फुले ने शूद्रों, अति-शूद्रों और स्त्रियों को ब्राह्मणों द्वारा खड़ी की गई व्यवस्था में शोषित- उत्पीड़ित की तरह देखा. फुले ने जाति और स्त्री प्रश्न को एक ही सिक्के के दो पहलू के रूप में देखा और दोनों को अपने संघर्ष का निशाना बनाया.
 हिन्दू समाज व्यवस्था को उसकी समग्रता में समझने और बदलने की कोशिशों और जाति को भौतिक संसाधनों, ज्ञान और जेंडर-संबंधों के जटिल तानेबाने के तहत समझ विकसित करने के फुले के प्रयासों के कारण गेल ओमवेट ने उन्हें जाति का पहला ऐतिहासिक भौतिकवादी सिद्धांतकार कहा है. जाति और जातिवादी पितृसत्ता के बीच से संबंधों को रेखांकित करते हुए अम्बेडकर कहते है कि ‘जाति- व्यवस्था के लिए सजातीय विवाह और स्त्रियों की यौनिकता के नियंत्रण के लिहाज से ऊंची जातियों खासकर ब्राह्मणों में सती, बलात् विधवापन्, बाल-विवाह जैसे अस्त्र ईजाद किए गए.
 जो जाति ब्राह्मणों के नजदीक हैं उन्होंने स्त्री पर ये तीनों ही कायदे लाद रखे हैं. जो उनसे तनिक दूर हैं उन्होंने विधवापन और बाल विवाह अपना रखा है; जो और भी दूर हैं उन्होंने बाल-विवाह अपना रखा है और जो सबसे दूर हैं वे जाति के नियमों में आस्था बनाए रख कर जाति- व्यवस्था के परिचालन में सहयोग करते रहे हैं.’ हिन्दू धर्म ग्रंथों, मिथकों, स्मृतियों, पुराणों आदि ने शूद्र और स्त्री को एक ही श्रेणी में रखा.
बाबासाहेब अम्बेडकर ने विस्तार से हिन्दू समाज में स्त्री की स्थिति और जाति/ वर्ण के पितृसत्ता से संबंधों को समझा और उसे तोड़ने की कोशिश की. उन्होंने अपनी किताब ‘हिन्दू नारी उत्थान और पतन’ में तथ्यों-तर्कों से यह प्रमाणित किया कि बौद्ध धर्म के अन्दर स्त्रियों को बराबरी का अधिकार प्राप्त था और स्त्रियों को पराधीनता और दोयम दर्जे की स्थिति में ब्राह्मणवाद ने डाला. राहुल सांकृत्यायन अपनी विविध किताबों में स्त्री-पुरूष के बीच पूर्ण बराबरी की हिमायत करते हैं और भोजपुरी के अपने नाटक ‘मेहररूअन की दुर्दशा’ में स्त्री पराधीनता के विविध रूपों पर कड़ा प्रहार करते हैं.
 भारत की आधुनिकता की परियोजना के इन महानायकों के साझा तत्वों पर विचार करते हैं तो पाते हैं कि हिन्दू संस्कृति, ब्राहमणवादी मूल्य व्यवस्था, संस्कारों, परंपराओं, वर्ण-जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और इसका समर्थन करने वाले ईश्वरी अवतारों, धर्मग्रन्थों और इनके रचयिता ऋषियों-महाऋषियों पर निर्णायक प्रहार किया है. फुले की किताब ‘गुलामगिरी’, ‘ तृतीय रत्न’, अम्बेडकर ने अपनी किताब ‘जाति का उच्छेद’ सहित अन्य किताबों में और राहुल ने अपनी किताब ‘तुम्हारी क्षय’ में वर्ण-जाति व्यवस्था पर  तीखा हमला बोला है. यह सभी एक स्वर से स्वीकार करते थे कि हिन्दुओं के धर्म, ईश्वर, मूल्यव्यवस्था में बुनियादी तौर पर ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बेहतर मानव समाज के निर्माण में मददगार हो. तीनों जातिवाद और ब्राह्मणवादी मूल्य व्यस्था के समूल उच्छेद के पक्ष में थे. इसके बरक्स किस चीज की स्थापना की जाए, इस बारे में तीनों के दृष्टिकोण में भिन्नता थी.
आज की चुनौतियों, कार्यभारों और इन व्यक्तित्वों के ऐतिहासिक योगदानों के संदर्भ में इनका मूल्यांकन करने के लिए जरूरी है कि इनके व्यक्तित्व की विशिष्टताओं और इनके बीच की भिन्नताओं को भी रेखांकित किया जाए. इसके लिए संक्षेप में ही सही इन तीनों का अलग विश्लेषण, आंकलन और मूल्यांकन किया जाए. ध्यान रहे कि तीनों इतिहास और परंपरा से बहुत कुछ ग्रहण करते हैं. विभिन्न व्यक्तियों का इनके ऊपर प्रभाव है लेकिन इस सब के बावजूद तीनों स्वतंत्रचेता व्यक्तित्व हैं. सबसे पहले जोतिबा फुले को लेते हैं.
 जोतिबा फुले आधुनिक भारत के पहले व्यक्तित्व हैं जिन्होंने ब्राह्मणवाद पर निर्णायक हमला बोला और ब्राह्मणवाद की गुलामी, अवमानना, अपमान, लांक्षना, उपेक्षा और शोषण- उत्पीड़न के शिकार शूद्रों, अन्त्यजों और स्त्रियों की मुक्ति और पूर्ण बरावरी का आह्वान किया तथा उसके लिए आजीवन संघर्ष किया. फुले का जन्म शूद्र वर्ण की माली जाति में हुआ था. उनके जन्म (1827 ) के नौ वर्ष पहले (1818) ही पेशवाओं के शासन का खात्मा अंग्रेजों ने अन्त्यजों और शूद्रों के सहयोग से किया था. हम सभी जानते हैं कि पेशवाई शासन एक खुला ब्राह्मणवादी शासन था, जिसमें मनु-याज्ञवल्क्य की स्मृतियों को अक्षरशः लागू करने की कोशिश की गई थी. अंग्रेजों ने पेशवाई का तो अन्त कर दिया था, लेकिन सामाजिक, धार्मिक सांस्कृति जीवन में ब्राह्मणवादी परंपरा और मूल्य व्यवस्था कायम थी.
 फुले एक ऐसे परिवार में पैदा हुए थे, जो आर्थिक दृष्टि से संपन्न था और अछूत नहीं माना जाता था. लेकिन उस जाति को द्विजों की बरावरी करने का अधिकार नहीं था, जिसके चलते उन्हें सामाजिक अपमान का भी सामना करना पड़ा. लेकिन अछूतों और स्त्रियों के पक्ष में निर्णायक तौर पर खड़े होने के चलते उनके परिवार ने उन्हें उनकी पत्नी सावित्रीबाई फुले सहित घर से बेघर कर दिया. उसके बाद का उनका पूरा जीवन अन्त्यजों, शूद्रों और स्त्रियों के लिए संघर्ष करते बीता. इस दौरान उन्हें पग-पग पर ब्राह्मणवादियों से जूझना पड़ा. जाति और किसानों के प्रश्न पर बाल गंगाधर तिलक जैसे महारथी से टकराना पड़ा. जिनके स्वराज का अर्थ द्विजों, मर्दों और उच्च वर्गों के लिए स्वराज था. तिलक अंग्रेज सरकार द्वारा किसानों के पक्ष में जमींदारों और साहूकारों के लगान और सूद में थोड़ी सी भी कटौती के पक्ष में नहीं थे, जिसकी कोशिश जोतिबा फुले ने की थी. उन्होंने अछूतों और स्त्रियों के लिए पहला स्कूल खोला यह दुनिया जानती है. ब्राह्मणी विधवाओं के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह खोला. व्यापक गरीब किसानों के दर्द को अपनी किताब ‘ किसान का कोड़ा’ में व्यक्त किया और आजीवन उनके लिए संघर्ष करते रहे.
 फुले का विजन अत्यन्त व्यापक था. थापस पेन की किताब ‘राइट्स ऑफ मैन’ का उनके उपर गहरा प्रभाव था. अमेरिका में काले गोरों के संघर्ष में वे कालों का पक्ष लेते और वहां से अपने संघर्षों की प्रेरणा भी ग्रहण करते. पेशवाई की तुलना में अंग्रेजों की उदारता उन्हें आकर्षित करती थी. जो लोग इस बात के लिये उनकी आलोचना करते हैं कि वे अंग्रेजों के पक्ष में खड़े थे और 1857 के संघर्ष में भारतीयों का साथ नहीं दिया, वे लोग इस बात का जवाब नहीं देते हैं कि क्या उन्हें अन्तिम पेशवा नाना साहब की वापसी का यानी पेशवाई या ब्राह्मणशाही की पुर्नस्थापना का समर्थन करना चाहिए था या कि उसके बाद तिलक का समर्थन करना चाहिए था, जो जाति और जातिवादी पितृसत्ता का पुरजोर समर्थन करते थे और हर प्रकार के सामाजिक सुधारों के विरोधी थे.
 फुले ने धर्म और ईश्वर का निषेध तो नहीं किया लेकिन उनकी ईश्वर विषयक कल्पना पूर्णतः निर्गुण, निराकार थी. ठीक कबीर जैसी. उनका मानना था कि ईश्वर ने किसी को ऊंच या नीच नहीं बनाया हैं और उसकी खोज करना भी व्यर्थ है. वे एक पूर्णमानवतावादी और समतावादी थे. वे भारतीय पुर्नजागरण की निम्म जातीय और निम्न वर्गीय परंपरा के जनक थे.
बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर एक अछूत महार जाति में 14 अप्रैल 1891 को जन्में जिन्होंने ब्राह्मणवादी हिन्दू संस्कृति को इस तरह चुनौती दिया कि हिन्दूओं के सबसे उदार रूप के समर्थक और पोषक महात्मा गांधी भी हिल गए और कह पड़े कि ‘ डॉ. अंबेडकर हिन्दुत्व के लिए सबसे बड़े चुनौती हैं.’ इतना ही नहीं उनकी सर्वोत्कृष्ट कृति ‘जाति का उच्छेद’ पढ़कर उनकी टिप्पणी थी कि कोई भी समाज-सुधारक इस किताब की अनदेखी नहीं कर सकता. वे आगे कहते हैं कि भविष्य में चाहे उन्हें किसी भी विशेषण से जोड़ा जाए, परन्तु डॉ. अम्बेडकर ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो समाज द्वारा भुलाये जा सकेगें.’
 गांधी की यह बात पूरी तरह से सही साबित हुई. आज बाबा साहेब भीमराव अम्बेडकर हजारों वर्षों से पराधीनता और अपमान की आग में झुलसते दलितों के मसीहा बन चुके हैं और उनके विचारों से नाइत्तेफाकी रखने वाले भी विविध कारणों से उनका नाम लेने और उन्हें स्वीकार करने को आतुर और विवश हैं. हिन्दुस्तान की समस्याओं की भीतरी तहों को जानने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात से इंकार नहीं कर पायेगा कि भविष्य के किसी भी खूबसूरत भारत की रचना का रास्ता अम्बेडकर से भी गुजर कर जायेगा.
 कौन सी मूल चीज है जो डॉ. अम्बेडकर को महानायक बना देती हैं?  बिना संदेह वह है अम्बेडकर का यह मानना कि अगर किसी एक चीज ने भारतीय समाज को एक पतनशील समाज में परिवर्तित कर दिया और उसे जिन्दा कौम की जह मुर्दा कौम में तब्दील कर दिया है तो उसका नाम है- ‘जाति व्यवस्था’. जाति की सर्वव्यापी विनाशक भूमिका के संर्दभ में बाबासाहेब अम्बेडकर लिखते हैं कि “इसमें कोई संदेह नहीं है कि जाति आधारभूत रूप से हिन्दुओं का प्राण है, लेकिन हिन्दुओं ने सारा वातावरण गंदा कर दिया है और सिख, मुस्लिम और क्रिश्चियन सभी इससे पीड़ित हैं.’’ वे मेहनतकश श्रमिकों की एकता के पुरजोर समर्थक थे, लेकिन इस बात से दुखी थे कि जाति ने श्रमिकों को विभाजित कर रखा है.
 वे लिखते है कि “भारत की जाति व्यवस्था की एक और विशेषता यह है कि यह श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को एक दूसरे की अपेक्षा ऊंच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी अन्य समाज में नहीं पाया जाता है.’ उन्होंने वामपंथियों को स्पष्ट चेतावनी देते हुए कहा था कि जाति एक ऐसा राक्षस है, जो आपका रास्ता काटेगा जरूर. जब तक आप इस राक्षस को नहीं मारते, तब तक आप न तो कोई राजनीतिक सुधार कर सकते हैं और न हीं कोई आर्थिक सुधार कर सकते हैं.
 अम्बेडकर एक मुक्कमल चिन्तक, सामाजिक क्रान्तिकारी के साथ-साथ राजनेता भी रहे हैं. राजनीतिक व्यवस्था के तौर पर वे उदारवादी लोकतंत्र के समर्थक हैं. आर्थिक व्यवस्था के तौर पर राज्य नियंत्रित पूंजीवाद के समर्थक हैं या ज्यादा से ज्यादा राजकीय समाजवाद के समर्थक हैं. वे कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग धंधों के राष्ट्रीयकरण का समर्थन करते हैं. एक अनीश्वरवादी समतावादी धर्म के रूप में बौद्ध धर्म की पैरवी करते हैं.
 इन दोनों के विपरीत राहुल सांकृत्यायन (9 अप्रैल 1893) का जन्म गाय पट्टी (काउ बेल्ट) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. वह वेदांती, आर्य समाजी होते हुए बौद्ध मतावलंबी बने. विद्रोही चेतना, न्यायबोध और जिज्ञासा वृति ने उन्हें पूरी तरह से ब्राह्मणवादी जातिवादी हिन्दू संस्कृति के खिलाफ खड़ा कर दिया. फुले और अम्बेडकर की तरह उन्हें जातिवादी अपमान का सामना तो नहीं करना पड़ा, लेकिन सनातनी हिन्दुओं की लाठियां जरूर खानी पड़ी. राहुल सांकृत्यायन अपने अपार शास्त्र ज्ञान और जीवन अनुभवों के चलते हिन्दुओं को सीधे ललकारते थे. उनकी पतनशीलता और गलाजत को उजागर करते थे. उन्होंने अपनी किताबों में विशेषकर ‘तुम्हारी क्षय’ में हिन्दुओं के समाज, धर्म, भगवान, सदाचार और जात-पांत की क्षय में हिंदुओं के अमानवीय चेहरे को बेनकाब किया है.
 ‘तुम्हारी जात- पांत की क्षय’ में वह लिखते है कि हमारे देश को जिन बातों पर अभिमान है, उनमें जात- पात भी एक है. …पिछले हजार बरस के अपने राजनीतिक इतिहास को यदि हम लें तो मालूम होता है कि भारतीय लोग विदेशियों से जो पददलित हुए, उसका प्रधान कारण जाति-भेद था. जाति-भेद न केवल लोगों को टुकड़ों- टुकड़ों में बांट देता है, बल्कि साथ ही यह सबके मन में ऊंच- नीच का भाव पैदा करता है. ब्राह्मण समझता है कि हम बड़े हैं; राजपूत छोटे हैं. राजपूत समझता है कि हम बड़े हैं; कहार छोटे हैं. कहार समझता है कि हम बड़े हैं; चमार छोटे हैं. चमार किसी और को छोटा समझता है और फिर वह ‘छोटा व्यक्ति’ भी किसी और को छोटा कह ही लेता है.’
 राहुल सांकृत्यायन आधुनिकता की परियोजना के सभी तत्वों को अपने में समेटे हुए हैं. वे हिन्दू संस्कृति के मनुष्य विरोधी मूल्यों पर निर्णायक हमला तो करते ही हैं, वह यह भी मानते हैं कि मनुष्य को धर्म की कोई आवश्यकता नहीं हैं. इंसान वैज्ञानिक विचारों के आधार पर खूबसूरत समाज का निर्माण कर सकता है, एक बेहतर जिंदगी जी सकता है. सबसे बड़ी बात यह है कि वह उत्पादन संपत्ति संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन के हिमायती हैं. वह इस बात से पूरी तरह सहमत हैं कि भौतिक आधारों में क्रान्तिकारी परिवर्तन किए बिना राजनीतिक, सामाजिक-सांस्कृतिक संबंधों में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाया नहीं जा सकता है और जो परिवर्तन लाया जायेगा, उसे टिकाए रखना मुश्किल होगा.
 जाति के संबंध में भी उनकी यही धारणा थी. वे इस यांत्रिक और जड़सूत्रवादी सोच के विरोधी थे कि आधार में परिवर्तन से अपने आप जाति व्यवस्था टूट जाएगी. इसके साथ ही हिन्दी क्षेत्र में वो अकेले व्यक्ति थे जो ब्राह्मण होते हुए भी ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म-संस्कृति पर करारी चोट करते थे और भारत में सामंतवाद की विशिष्ट संरचना जाति को समझते थे और आधार और अधिरचना (जाति) दोनों के खिलाफ एक साथ निर्णायक संघर्ष के हिमायती थे. इस समझ को कायम करने में ब्राह्मण विरोधी बौद्ध धर्म के उनके गहन अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. उनकी तीन किताबें ‘बौद्ध दर्शन’,  ‘दर्शन- दिग्दर्शन’ और ‘वैज्ञानिक भौतिकवाद’ इस दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं.
 जो लोग भी दो पतनशील जीवन दर्शन के नाभिनाल संबंध पर निर्मित हो रहे हैं, आज के भारत की जगह स्वतंत्रता, समता और भाईचारे पर आधारित भारत का निर्माण करना चाहते है, उनके लिए इन तीनों व्यक्तित्व के सपनों, विचारों और कृतित्व को व्यापक तौर पर जानना, आत्मसात करना और प्रेरणा लेना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है.
– यह आलेख ””दलित दस्तक”” मासिक पत्रिका के अप्रैल अंक की कवर स्टोरी है। वहां से साभार प्रकाशित है।
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