आप सभी से अनुरोध है की फेसबुक पर वर्तमान मूलविासी गुरु, पत्रकार एव मार्गदर्शक श्री दिलीप सी मंडल को फॉलो या ज्वाइन जरूर करें हर रोज उनके ज्ञानवर्धक वचन आँखें खोलने के लिए काफी हैं https://www.facebook.com/dilipc.mandal

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विशेषकर आपकी राजनैतिक समझ को ऐसा विकसित करेगी की आप सही राजनैतिक फैसले ले सकने में सक्षम होंगे , ये ऐसा एंटीवायरस होगा जो ब्राह्मणवादी प्रोपगंडा के वायरस को आपके दिमाग में जाने ही नहीं देगा

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बौद्ध धम्म पर सवाल जवाब : जब गौतम बुद्ध ने पूजा पाखंड ब्राह्मणवाद के खिलाफ आंदोलन चलाया था तो बौद्ध लोग उनकी पूजा क्यों करते हैं ?… Team SBMT

गौतम बुद्ध के अनुयायी उनको को प्रसन्न करने के लिए, उनसे कुछ मांगने के लिए, स्वर्ग के लालच और नरक के भय से डरकर पूजा नहीं करते हैं.बल्कि सच ये है की पूजा ही नहीं करते वो उनकी वंदना करते हैं, उनकी वंदना बुद्ध के प्रति आभार प्रकट करने के लिए होती है, ठीक वैसे जैसे आप अपने स्कूल के शिक्षक का आभार प्रकट करें | स्कुलो में शिक्षक हमें पढाते हैं, जिसके लिए उनको वेतन मिलता है, हम उनको नमस्कार करके तथा चरण-स्पर्श करके अपना आभार और आदर प्रकट करते हैं, आभार प्रकट न करना अशिष्टता माना जाता है|

गौतम बुद्ध तो ऐसे आनोखे शिक्षक थे, जो बुद्धत्व प्राप्ति के बाद पैंतालिस वर्षो तक धम्म्चारिका करते रहे और लोगो को धम्म सिखाते रहे. वह चाहते तो बुद्धत्व प्राप्ति के बाद किसी आश्रम में या हिमालय पर जाकर शेष जीवन निर्वाण का आनंद लेते हुए बिता सकते थे. लेकिन उन्होंने अनंत करुना और मैत्री के साथ लोगो को धम्म बांटा . अगर वो ऐसा नहीं करते तो आज यह अदभुत धम्म कैसे मिलता ?

…..इसलिए धम्म मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक व्यक्ति भागवान बुद्ध के प्रति कृतज्ञता से भर उठाता है और उसी कृतज्ञता और आभार को प्रकट करने के लिए पूजा करता है. बुद्ध का ज्ञान इतना प्रभावी है की, आज भी बैज्ञानिक युग में उतना ही प्रभाव है, जितना की भागवान बुद्ध ने २६०० वर्ष पहले उपदेशित किया था……

तथागत बुद्ध ने अपने उपदेशो में सबसे बड़ी बात कही है की किसी बात को इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी है, या किसी साधू संत ने कही है, किसी बात को इसलिए भी मत मानो की आपको प्रिय लगने वाले किसी व्यक्ति ने कही है. किसी भी बात को मानने से पहले उसे तर्क की कसौटी पर कास कर देखो की वह स्वं के हित के साथ मानवमात्र के हित में है या नहीं अर्थात किसी व्यक्ति या वर्ग के हित के लिए किसी दुसरे व्यक्ति या वर्ग का अहित करना घोर सामाजिक अन्याय है .

बुद्ध ने अपने अनुयाईयो को जबरदस्त स्वत्रन्त्रता दी है जो किसी और धर्म प्रवर्तक ने नहीं दी| संसार के किसी भी धर्म के प्रवर्तक ने अपने मत को जाच परख करने की किसी भी प्रकार की स्वतंत्रता नही दी है संसार के सारे धर्मो में बुद्ध ने ही अपने मत को जांच परख करने के बाद ही अपनाने या स्वीकार करने की स्वतंत्रता दी है ये उनके**बुद्ध धम्म** के अपने अनुयायियों की लिए दिमाक को खुला रखने का महान सन्देश है .

****** बुद्ध दीघ निकाय १/१३मे अपने शिष्य कलामों उपदेश देते हुए कहते है ………..

;- ” हे कलामों , किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की वह तूम्हारे सुनने में आई है , किसी बात को केवल ईसलिए मत मानो कि वह परंपरा से चली आई है -आप दादा के जमाने से चली आई है , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो की वह धर्म ग्रंथो में लिखी हुई है , किसी बातको केवल इसलिए मत मानो की वह न्याय शास्त्र के अनुसार है किसी बात को केवल इसलिए मत मानो की उपरी तौर पर वह मान्य प्रतीत होतीहै , किसि बात को केवल इसलिए मत मानो कि वह हमारे विश्वास या हमारी दृष्टी के अनुकूल लागती है,किसि बात को इसलिए मत मनो की उपरीतौर पर सच्ची प्रतीत होती है किसीबात को इसलिए मत मानो की वह किसी आदरणीय आचार्य द्वारा कही गई है . कालामों ;- फिर हमें क्या करना चाहिए …….???? बुद्ध ;- …..कलामो , कसौटी यही है कीस्वयं अपने से प्रश्न करो कि क्याये बात को स्वीकार करना हितकर है…..???? क्या यह बात करना निंदनीय है …??? क्या यह बात बुद्धिमानों द्वारा निषिद्ध है , क्या इस बात से कष्ट अथवा दुःख ; होता है कलमों, इतना ही नही तूम्हे यह भी देखना चाहिए कि क्या यह मत तृष्णा, घृणा ,मूढता ,और द्वेष की भावना की वृद्धि में सहायक तो नहीहै , कालामों, यह भी देखना चाहिए किकोई मत -विशेष किसी को उनकी अपनी इन्द्रियों का गुलाम तो नही बनाता, उसे हिंसा में प्रवृत्त तोनही करता , उसे चोरी करने को प्रेरित तो नही करता , अंत में तुम्हे यह देखना चाहिए कि यह दुःख; के लिए या अहित के लिए तो नही है ,इन सब बातो को अपनी बुद्धि से जांचो, परखो और तूम्हे स्वीकार करने लायक लगे , तो ही इसे अपनाओ…….

जनता के खून चूसने वाले जिन राजे रजवाड़ों से भारत के संविधान ने पीछा छुड़वाया और वोट द्वारा अपना राजा चुनने और हटाने का अधिकार दिया ,उन्हीं राजा की तारीफों में मीडिया लगा पड़ा है |अब दिन रात सामंतवाद,जमींदार,जातिवादी और राजाओं पर फिल्मे नाटक बना रहे हैं और लोगों के मन में राजे रजवाड़ों के लिए जगह बना रहे हैं|बाहुबली 2 पर सुनील यादव की राय

बाहुबली 2 पर सुनील यादव की राय—
राजाओं की झूठी शान और वचन के प्रतिबद्धता के लिए हजारों दलित पिछड़ों को गाजर मुली की तरह कटवा देनी वाली बाहुबली कोई पहली फिल्म नहीं है। इससे पहले राजाओं के झूठी गौरव गाथाओं में उनके दरबारी भांड कवियों ने हजारो पृष्ठ खर्च किए जा चुके हैं और हिंदी सिनेमा में 50 से ऊपर फिल्में बनाई जा चुकी है।
बाहुबली 2 फिल्म के विषय के संबंध में कुछ बिंदु-
1- यह एक जाति विशेष की वीरता का झूठा महिमामंडन के साथ उसके अहम कुंठा की चरम स्थिति वाली फिल्म है।
2- यह हिंदू धार्मिक प्रतीकों ग्लोरोफाई करके जनता को पागल बनाने वाली फिल्म है।
3- राजमाता शिवगामी देवी के कडक दिशानिर्देश से बाहर आकर देखेंगे तो ये नितांत स्त्री विरोधी फिल्म है।अमरेन्द्र बाहुबली का “पुत्र” ही होगा जिसे महेंद्र बाहुबली बोला जाएगा यह पहले से ही पता था क्योंकि पुत्र ही पैदा करवाना था।
4- ‘हम ग्वाल हैं साहब हम तो गाय चराते हैं हमें लड़ना कहाँ आएगा’- एक छोटा सा यह सीन है इस फिल्म में इसकी दो परिणति को हम देख सकते हैं पहला ग्वालों को सेना के रूप में प्रयोग करना और उन्हे अपने अहम की तुष्टि वाली लड़ाईयों में गाजर मूली की तरह काट देना और उनकी शहादत को अपनी झूठी गौरव गाथाओं में दफन कर देने के साथ इतिहास से उठाकर बाहर फेंक देना । जहां भारतीय इतिहास राजपूताना के वीरगाथाओ से लेकर स्वतन्त्रता आंदोलन तक के इतिहास से दलित पिछड़ो लड़ाकों को इतिहास से बहिष्कृत कर दिया है वहीं यह फिल्म भी इसे इसी रूप में प्रस्तुत करती है।
5- कटप्पा एक गुलाम है यह पूरी फिल्म बताती है पर कट्टपा एक योद्धा है इसकी बात कम होती है। वैसे भी कटप्पा जैसे गुलामों की वीरता और तेजस्विता अपने राजाओं के अहम और व्यक्तिगत आकांक्षाओं के बीच दफनाई जाती रहीं है यही गुलाम की नियति है ।
6- आज के भारत में बाहुबली 2 जैसी फिल्में जाति गौरव के नए पैमाने विकसित करती हैं और सहारनपुर जैसी घटनाओं को जन्म देती है ।

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उत्तर प्रदेश में अम्बेडकरवादी जातियों पर बढ़ते अत्याचार और दंगों के कारन दलितों का हिन्दू धर्म छोड़कर अन्य धर्मों में जाने का फैसला, नदी में डुबाई अपने घर में राखी हिन्दू देवी देवताओं की मूर्ती तस्वीरें

हिंदू धर्म छोड़ रहे दलितों को मनाने के लिए दसनामी अखाड़े की नई चाल, दलितों को बनाएगी नागा साधु

http://www.nationaldastak.com/story/view/new-move-of-dasnami-akhada-for-dalits

Hundreds of Naga Sadhus gathered in the compound of Maya Devi Temple, befoe going in a procession to take a holy dip in the ganges.
Sadhus gather here and perform all kind of feats, to show off their warrior skills, with their weapons, which include sticks, tridents, swords and spears.
Kumbh Mela, 2010, Haridwar, Uttarakhand.

10-may-2017 के वैशाख पूर्णिमा या बुद्ध जयंती पर समयबुद्धा कि विशेष धम्म देशना:- “आइए जाने गौतम बुद्ध ने ऐसा क्या कह दिया ऐसा क्या कर दिया की सदियों बाद भी लोग उनको मन से चाहते हैं ”…समयबुद्धा

*आखिर बुद्ध ने ऐसा क्या कहा, मानवता को ऐसा क्या दिया कि कोई भी सहज और सरल व्यक्ति बिना किसी दबाव के बुद्धानुयाई बनने को स्वत: सहमत होने लगता है। मेरी विनम्र दृष्टि में इसके निम्न प्रमुख कारण हैं:—*

*1. धर्म मानव का स्वभाव है :* बुद्ध कहते हैं, धर्म सिद्धान्त नहीं, ?मानव स्वभाव है। मानव के भीतर धर्म रात—दिन बह रहा है। ऐसे में सिद्धान्तों से संचालित किसी भी धर्म को धर्म कहलाने का अधिकार नहीं। उसे धर्म मानने की जरूरत ही नहीं है। धर्म के नाम पर किसी प्रकार की मान्यताओं को ओढने या ढोने की जरूरत ही नहीं है। अपने आप में मानव का स्वभाव ही धर्म है।

*2. मानो मत, जानो :* बुद्ध कहते हैं, अपनी सोच को मानने के बजाय जानने की बनाओ। इस प्रकार बुद्ध वैज्ञानिक बन जाते हैं। अंधविश्वास और पोंगापंथी के स्थान पर बुद्ध मानवता के बीच विज्ञान को स्थापित करते हैं। बुद्ध ने धर्म को विज्ञान से जोड़कर धर्म को अंधभक्ति से ऊपर उठा दिया। बुद्ध ने धर्म को मानने या आस्था तक नहीं रखा, बल्कि धर्म को भी विज्ञान की भांति सतत खोज का विषय बना दिया। कहा जब तक जानों नहीं, तब तक मानों नहीं। बुद्ध कहते हैं, ठीक से जान लो और जब जान लोगे तो फिर मानने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि जानने के बाद तो मान ही लोगे। बुद्ध वैज्ञानिक की तरह से धर्म की बात कहते हैं। इसीलिए बुद्ध नास्तिकों को भी प्रिय हैं।

*3. परम्परा नहीं मौलिकता :* बुद्ध मौलिकता पर जोर देते हैं, पुरानी लीक को पीटने या परम्पराओं को अपनाने पर बुद्ध का तनिक भी जोर नहीं है। इसीलिये बुद्ध किसी भी उपदेश या तथ्य को केवल इस कारण से मानने को नहीं कहते कि वह बात वेद या उपनिषद में लिखी है या किसी ऋषी ने उसे मानने को कहा है। बुद्ध यहां तक कहते हैं कि स्वयं उनके/बुद्ध के द्वारा कही गयी बात या उपदेश को भी केवल इसीलिये मत मान लेना कि उसे मैंने कहा है। बुद्ध कहते हैं कि इस प्रकार से परम्परा को मान लेने की प्रवृत्ति अन्धविश्वास, ढोंग और पाखण्ड को जन्म देती है। बुद्ध का कहना है कि जब तक खुद जान नहीं लो किसी बात को मानना नहीं। यह कहकर बुद्ध अपने उपदेशों और विचारों का भी अन्धानुकरण करने से इनकार करते हैं। विज्ञान भी यही कहता है।

*4. दृष्टा बनने पर जोर :* बुद्ध दर्शन में नहीं उलझाते, बल्कि उनका जोर खुद को, खुद का दृष्टा बनने पर है। बुद्ध दार्शनिकता में नहीं उलझाते। बुद्ध कहते हैं कि जिनके अन्दर, अपने अन्दर के प्रकाश को देखने की प्यास है, वही मेरे पास आयें। उनका अभिप्राय उपदेश नहीं ध्यान की ओर है, क्योंकि ध्यान से अन्तरमन की आंखें खुलती हैं। जब व्यक्ति खुद का दृष्टा बनकर खुद को, खुद की आंखों से देखने में सक्षम हो जाता है तो वह सारे दर्शनों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सत्य को देखने में समर्थ हो जाता है। इसलिये बुद्ध बाहर के प्रकाश पर जोर नहीं देते, बल्कि अपने अन्दर के प्रकाश को देखने की बात कहते हैं। अत: खुद को जानना उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

*5. मानवता सर्वोपरि :* बुद्ध कहते है-सिद्धांत मनुष्य के लिये हैं। मनुष्य सिद्धांत के लिये नहीं। बुद्ध के लिये मानव और मानवता सर्वोच्च है। इसीलिय बुद्ध तत्कालीन वैदिक वर्णव्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था को भी नकार देते हैं, क्योंकि बुद्ध की दृष्टि में सिद्धान्त नहीं, मानव प्रमुख है। मानव की आजादी उनकी प्राथमिकता है। बुद्ध कहते हैं, वर्णव्यवस्था और आश्रम-व्यवस्था मानव को गुलाम बनाती है। अत: बुद्ध की दृष्टि में वर्णव्यवस्था, आश्रम-व्यवस्था जैसे मानव निर्मित सिद्धान्त मृत शरीर के समान हैं। जिनको त्यागने में ही बुद्धिमता है। यहां तक कि बुद्ध की नजर में शासक का कानून भी उतना मूल्यवान नहीं है, जितना मनुष्य है। यदि कानून सहज मानव जीवन में दखल देता है, तो उस कानून को अविलम्ब बदला जाना जरूरी है।

*6. स्वप्नवादी नहीं, यथार्थवादी :* बुद्ध ने सपने नहीं दिखाये, हमेशा यथार्थ पर जोर दिया, मानने पर नहीं, जानने पर जोर दिया। ध्यान और बुद्धत्व को प्राप्त होकर भी बुद्ध ने अपनी जड़ें जमीन में ही जमाएं रखी। उन्होंने मानवता के इतिहास में आकाश छुआ, लेकिन काल्पनिक सिद्धान्तों को आधार नहीं बनाया। बुद्ध स्वप्नवादी नहीं बने, बल्कि सदैव यथार्थवादी ही बने रहे। यही वजह है कि बुद्ध का प्रकाश संसार में फैला।

*7. ईश्वर की नहीं, खुद की खोज :* बुद्धकाल वैदिक परम्पराओं से ओतप्रोत था। अत: अनेकों बार, अनकों लोगों ने बुद्ध से ईश्वर को जानने के बारे में पूछा। लोग जानने आते थे कि ईश्वर क्या है और ईश्वर को केसे पाया जाये? बुद्ध ने हर बार, हर एक को सीधा और सपाट जवाब दिया—व्यर्थ की बातें मत पूछो। पहले ध्यान में तो उतरो, पहले अपने अंतस की चेतना को तो समझो। पहले अपनी खोज तो करो। जब खुद को जान जाओगे तो ऐसे व्यर्थ के सवाल नहीं पूछोगे।

*8. अच्छा और बुरा, पाप और पुण्य :* बुद्ध किसी जड़ सिद्धान्त या नियम के अनुसार जीवन जीने के बजाय मानव को बोधपूर्वक जीवन जीने की सलाह देते हैं। बुद्ध कहते हैं, जो भी काम करें बोधपूर्वक करें, होशपूर्वक क्योंकि बोधपूर्वक किया गया कार्य कभी भी बुरा नहीं हो सकता। जितने भी गलत काम या पाप किये जाते हैं, सब बोधहीनता या बेहोशी में किये जाते हैं। इस प्रकार बुद्ध ने अच्छे और बुरे के बीच के भेद को समझाने के लिये बोधपूर्वक एवं बोधहीनता के रूप में समझाया। बुद्ध की दृष्टि में प्रेम, करुणा, मैत्री, होश, जागरूकता से होशपूर्वक बोधपूर्वक किया गया हर कार्य अच्छा, श्रृेष्ठ और पुण्य है। बुद्ध की दृष्टि में क्रोध, मद, बेहोशी, मूर्छा, विवेकहीनता से बोधहीनता पूर्वक किया गया कार्य बुरा, निकृष्ट और पाप है।

*9. कठिन नहीं सहजता :* बुद्ध जीवन की सहजता के पक्ष में हैं, न कि असहज या कठिन या दु:खपूर्ण जीवन जीने के पक्षपाती। बुद्ध कहते हैं, कोई लक्ष्य कठिन है इस कारण वह सही ही है और इसी कारण उसे चुनोती मानकर पूरा किया जाये। यह अहंकार का भाव है। इससे अहंकार का पोषण होता है। इससे मानव जीवन में सहजता, करुणा, मैत्री समाप्त हो जाते हैं। अत: मानव जीवन का आधार सहजता, सरलता, सुगमता है मैत्रीभाव और प्राकृतिक होना चाहिये।

*10. अंधानुकरण नहीं:* बुद्ध कहते हैं, मैंने जो कुछ कहा है हो सकता है, उसमें कुछ सत्य से परे हो! कुछ ऐसा हो जो सहज नहीं हो। मानव जीवन के लिये उपयुक्त नहीं हो और जीवन को सरल एवं सहज बनाने में बाधक हो, तो उसे सिर्फ इसलिये कि मैंने कहा है, मानना बुद्धानुयाई होने का सबूत नहीं है। सच्चे बुद्धानुयाई को संदेह करने और स्वयं सत्य जानने का हक है। अत: जो मेरा अंधभक्त है, वह बुद्ध कहलाने का हकदार नहीं।

NEWS: खुद को बाबा साहब अंबेडकर का दत्तक पुत्र बताने वाले कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सी0एस0 कर्णन ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। कर्णन ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश सहित 7 जजों को एससी/एसटी एक्ट का दोषी पाए जाने के बाद 5 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।…http://www.nationaldastak.com (टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार में ये खबर आयी है )

 

 

https://www.youtube.com/watch?v=VVyhML_9X_0

नई दिल्ली। खुद को बाबा साहब अंबेडकर का दत्तक पुत्र बताने वाले कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सीएस कर्णन ने ऐतिहासिक फैसला दिया है। कर्णन ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश सहित 7 जजों को एससी/एसटी एक्ट का दोषी पाए जाने के बाद 5 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।

उन्होंने पहली बार न्यायपालिका में नियुक्ति में करप्शन का मामला उठाया था। इसकी शिकायत उन्होंने पीएम मोदी को पत्र लिखकर की थी। इस शिकायत को सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों ने अपमान मानकर अवमानना का केस दर्ज कर लिया।

पढ़ें- जस्टिस कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के 7 जजों को दलित उत्पीड़न का दोषी पाया, 5 साल की कैद

कर्णन कई बार कह चुके हैं कि उन्हें दलित होने की वजह से परेशान किया जा रहा है। इस मामले पर सुनवाई करते हुए उन्होंने यह सजा सुनाई है। पढ़िए उनका पूरा फैसला……

देश में सर्वाधिक चर्चित कोलकाता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस कर्णन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायधीश सहित सात जजों को सजा सुनाई है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अवमानना के केस का सामना कर रहे कर्णन ने इन जजों को दलित उत्पीड़न का दोषी पाया है। कर्णन ने उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत दोषी पाए जाने पर पांच साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई है।

आपको बता दें कि कर्णन ने न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रधानमंत्री से शिकायत की थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस शिकायत को सकारात्मक तरीके से लेने की जगह इसे अपना अपमान मान लिया और जस्टिस कर्णन के खिलाफ कोर्ट की अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी।

http://www.nationaldastak.com/story/view/justice-karnan-sentences-sc-7-judges-to-5-years-http://www.nationaldastak.com/story/view/read-full-decision-of-justice-karnan

http://www.nationaldastak.com/story/view/justice-karnan-sentences-sc-7-judges-to-5-years-http://www.nationaldastak.com/story/view/read-full-decision-of-justice-karnan

वरिस्ट पत्रकार श्री दिलीप सी मंडल लिखते हैं :

आज़ादी के बाद पहली बार इस साल गर्मियों में सुप्रीम कोर्ट के लगभग सारे जज काम पर हैं। वरना सिर्फ वेकेशन बैंच काम करती है। लाखों केस पेंडिंग होने के बावजूद जज लंबी छुट्टी पर विदेश निकल लेते हैं।

इस बार ऐसा नहीं हुआ। जस्टिस कर्णन ने सात जजों के विदेश जाने पर रोक लगा दी है। हवाई अड्डों को आदेश है कि इन जजों को विदेश न जाने दें।

जज लोग विदेश जाना भूल गए।

यह उस जज का फ़ैसला है जिसने 25,000 से ज़्यादा फैसले सुनाए हैं।

कौन हैं CJI को सज़ा सुनाने वाले जस्टिस करनन?

http://www.bbc.com/hindi/india-39851320