कानून के ज्ञान की ताकत और महत्व समझो ,सुप्रीम कोर्ट के केवल एक छोटे से निर्णय से  आरक्षण कोटे SC/ST की 9000 MBBS सीट्स का नुकसान हो गया है,मेरी राय है जिन बच्चों का सलेक्शन mbbs में नही हुआ है उन्हें लॉ करवाये ओर वकील बनाये।…एडवोकेट कुशालचंद्र राजस्थान।

✴   कानून का महत्व,✴
🔔सुप्रीम कोर्ट के केवल एक छोटे से निर्णय से
🔔आरक्षण कोटे की 9000 MBBS सीट्स का नुकसान हो गया है।
🌀यह कानून का महत्व है।। यदि इन बुद्धिजीवी स्टूडेंट्स या इनके परेंट्स को ज्ञात या ज्ञान होतो
मेरी राय है जिन बच्चों का सलेक्शन mbbs में नही हुआ है उन्हें लॉ करवाये ओर वकील बनाये।
ताकि जो आरक्षण अभी तक खत्म नही हुआ है उसे भविष्य में बचाया जा सके।
मेरा मानना है कि जीवन जीने का अधिकार कानून देता हूँ, डॉक्टर नही।
आज जो 9000 आरक्षित बच्चे डॉक्टर नही बन पाएंगे। वह भी कानून का प्रभाव है और जो बन रहे है वे भी कानून की देंन है।
🌀डॉ बाबा साहब अम्बेडकर को पढ़े, ध्यान रहे – बाबा साहब इकोनॉमिक्स में डॉक्टरेट करने के बाद बेरिस्टर अथार्त वकील बने थे, क्योकि वे जानते थे, कानून के ज्ञान के बिना हमारी पढाई ओर पैसा, हमारा आत्मसम्मान नही बचा सकता।।
कानून की शिक्षा वो हथियार है जिससे सवैधानिक रूप से हम दुश्मनो का मुकाबला कर सकते है।
🌀विचार करे।।
हमारी ताकत हमारे सरक्षण के लिये बने कानून है जिसकी सुरक्षा के लिये इंटेलिजेंट सुप्रीम कोर्ट लॉयर होने चाहिए।
🌀आरक्षित वर्ग के आत्मसम्मान की रक्षा,  कानून की शिक्षा के बिना सम्भव नही, यह सच्चाई है कोई माने या न माने।।
🌀सविधान हमारी ताकत है उसकी रक्षा कानून के विद्वान बने , बिना सम्भव नही।।
🔔सहमत हो तो शेयर करे।
विचार परिवर्तन , सभी परिवर्तनों का मूल है।
जय भीम – जय सविधान
कुशालचंद्र एडवोकेट राजस्थान।
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आरक्षण मुद्दा : सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले की वजह से बहुजन(SC/ST/OBC) बच्चे खतरे में हैं, (इसके अनुसार आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार चाहे सबसे ज्यादा नंबर ले आए लेकिन वह सिर्फ आरक्षित कोटे में ही नौकरी पाएगा यानि सवर्णों के लिए 50.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था मुक़र्रर कर दी गई है.)…चिंतित बरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल

सीबीएसई ने नीट में सवर्णों छात्रों को आऱक्षित कर दिया है. इसे लेकर एक व्यापक बहस शुरू हो चुकी है. इस कदम को आरक्षण खत्म करने की शुरूआत के तौर पर देखा जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद सीबीएसई ने देशभर में इसे लागू कर दिया है. इसके अनुसार आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार चाहे सबसे ज्यादा नंबर ले आए लेकिन वह सिर्फ आरक्षित कोटे में ही नौकरी पाएगा यानि सवर्णों के लिए 50.5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था मुक़र्रर कर दी गई है.

इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार दिलीप मंडल ने लिखा है…

 

अपने बच्चों को बचाओ!

SC, ST, OBC के ख़िलाफ़ आज़ादी के बाद का यह सबसे बड़ा फ़ैसला है, लेकिन हम चुप हैं, क्योंकि हम एक मरे हुए समाज के नागरिक हैं! यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं है।बाबा साहेब ने कारवाँ को जहाँ तक पहुँचाया था, वह पीछे जा रहा है.आने वाली पीढ़ी हमें गालियाँ देंगी कि हम कितने रीढविहीन थे.

क़लम की नोक पर एक झटके में SC, ST, OBC के नौ हज़ार स्टूडेंट्स इस साल डॉक्टर बनने से रह जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि 50.5% सीटों पर SC, ST, OBC का कोई नहीं आ सकता. जनरल मेरिट में टॉपर हो तो भी नहीं.

केंद्र सरकार इसके ख़िलाफ़ अपील करने की जगह, तत्परता से इसे लागू कर रही है.मामला सिर्फ़ मेडिकल का नहीं है. आगे चलकर यह आदेश इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और यूपीएससी और पीसीएस तक आएगा. कई राज्यों में यह पहले से लागू है. लाखों स्टूडेंट्स पर असर पड़ेगा.

मुझे नहीं मालूम कि समाज की नींद कैसे खुलेगी. हमारे पॉलिटिकल क्लास की चिंताओं में यह कैसे शामिल हो पाएगा.जो नेता इस मुद्दे को उठाएगा, उस पर फ़ौरन भ्रष्टाचार का केस लग जाएगा. क्या हम उस नेता के साथ खडें होंगे? अगर नहीं, तो कोई नेता जोखिम क्यों लेगा?

मात्र पाँच हज़ार लोग भी सड़कों पर आ जाएँ, सारे लोग अपने जनप्रतिनिधियों पर दबाव डालें, तो आपके समाज के लाखों बच्चों का भविष्य बच जाएगा.

लेकिन क्या आप अपने बच्चों को बचाना चाहते हैं?

इस साल के नए नियमों की वजह से नौ हज़ार से अधिक SC, ST, OBC के स्टूडेंट्स का MBBS और BDS में दाख़िला नहीं होगा।

नए नियमों की घोषणा खुद केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने की है, जिसे इंडियन एक्सप्रेस और टाइम्स ऑफ इंडिया समेत भारत के हर अखबार और वेबसाइट ने छापा।

नया नियम यह है कि जिसने जिस कटेगरी में फ़ॉर्म भरा है, उसे उसी कटेगरी से सीट मिलेगी, चाहे वह जनरल मेरिट का टॉपर ही क्यों न हो। यह सवर्ण जातियों का 50.5% आरक्षण है।

इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला सरकार दे रही है। अगर ऐसा कोई आदेश है भी तो सरकार को रिव्यू पिटीशन डालना चाहिए। मेरे हिसाब से यह नियम की गलत व्याख्या है।

अगर इसे मान लिया गया तो इसे तमाम एडमिशन और नौकरियों में लागू कर दिया जाएगा।

इसका आर्थिक पक्ष यह है कि एक स्टूडेंट अगर मेडिकल कोचिंग पर पाँच लाख रुपए ख़र्च करता है तो 9,000 SC, ST, OBC के 450 करोड़ रुपए पानी में गए।

जिसे आप ईश्वर कहते हो उसे बौद्ध “प्रकृति/Nature” कहते हैं, इसके अपने नियम हैं जो सब धर्म वालों के लिए सामान हैं ,उदाहरण के लिए अगर भगवान् के एक भक्त को और एक नास्तिक को किसी गहरी नदी में फेंक दिया जाय, तो क्या होगा?तो वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है।…Devendra Dev

अगर भगवान् के एक भक्त को और एक नास्तिक को किसी गहरी नदी में फेंक दिया जाय, तो क्या होगा?

तो वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है।

अगर इन दोनों में से एक हिन्दू और एक मुसलमान हो, तो भी वही जिंदा बचेगा जिसे तैरना आता है।

अल्लाह और ईश्वर अपने नियम को नहीं तोड़ता।
क्योंकि
अल्लाह और ईश्वर का अपना कोई धर्म या मजहब नहीं है।

यानी वह ना हिन्दू है ना मुसलमान।

अगर कोई आपको ऐसा बता रहा है कि सिर्फ आपके अल्लाह या आपके ईश्वर में यकीन करने वाले को जन्नत या स्वर्ग मिलेगा तो आपको ऐसा बताने वाला आपको बेवकूफ बना रहा है।

मैं भी पहले पूजा पाठ करता था।

तब मैं काफी डरा हुआ और अपने दिमाग में अँधेरा महसूस करता था।

जब से मैंने विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचना शुरू किया,

मन से ईश्वर का डर खत्म होने लगा, सभी सवालों के जवाब मिलने लगे, दिमाग के अँधेरे खत्म होने लगे,

अब मैं बहुत खुश और सुलझा हुआ महसूस करता हूँ,

अब मुझे ना किसी धर्म वाले से नफरत होती है और ना किसी की जाति की वजह से उसे छोटा या बड़ा मानता हूँ।

विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचने की वजह से मुझे अब सभी इंसान एक जैसे लगने लगे हैं।

अब देशों की सीमाओं के भीतर कुढ़ते हुए, पड़ोसी देश से नफरतों से भरे हुए, दुसरे धर्म वालों को गालियाँ देते हुए, जातिवाद से भरे हुए लोगों को देख कर मुझे बहुत दया आती है।

मुझे महसूस होता है कि यह सब बेचारे बीमार लोग हैं।

अब मैं विज्ञान और तर्क के आधार पर सोचता हूँ तो मुझे लगता है कि पेड़, नदी, जानवर,पहाड़ और मैं सब एक ही हैं।

अब मैं आसपास की दुनिया और प्रकृति से ज्यादा लगाव महसूस करता हूँ।

सत्य जानना ही इंसान का धर्म है।

विज्ञान और तर्क ही सत्य को जानने का तरीका है।

जो लोग यह माने बैठे हैं कि जिस मजहब और धर्म में जन्म हो गया वही सबसे अच्छा और सच्चा है तो वह सबसे नासमझ लोग हैं।

यकीन मानिए, जब तक हम इन पुराने अंधे विश्वासों से आज़ाद नहीं होंगे, ना युद्ध बंद होंगे, ना शांति आयेगी, ना नफरतें खत्म होंगी।

जय भीम, जय संविधान।