आज खुद को दलित कहने कहलवाने वाले लोगों का जबरदस्त बौद्ध इतिहास काल रहा है जब भारत अपने सर्वोच्च गौरवमयी स्थिति में था आइये इस पोस्ट में उसी गौरवशाली बौद्ध काल में सम्राट अशोक महान के कुछ शिला लेखों का अध्ययन करते हैं ….http://bharatdiscovery.org

मौर्य सम्राट अशोक के इतिहास की सम्पूर्ण जानकारी उसके अभिलेखों से मिलती है। यह माना जाता है कि, अशोक को अभिलेखों की प्रेरणा ईरान के शासक ‘डेरियस‘ से मिली थी। अशोक के लगभग 40 अभिलेख प्राप्त हुए हैं। ये ब्राह्मी, खरोष्ठी और आर्मेइक-ग्रीक लिपियों में लिखे गये हैं। सम्राट अशोक के ब्राह्मी लिपि में लिखित सन्देश को सर्वप्रथम एलेग्जेंडर कनिंघम के सहकर्मी जेम्स प्रिंसेप ने पढ़ा था। अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है-

  1. शिलालेख
  2. स्तम्भलेख
  3. गुहालेख
  • शिलालेखों और स्तम्भ लेखों को दो उपश्रेणियों में रखा जाता है। 14 शिलालेख सिलसिलेवार हैं, जिनको चतुर्दश शिलालेख कहा जाता है। ये शिलालेख शाहबाजगढ़ी, मानसेरा, कालसी, गिरनार, सोपारा, धौली और जौगढ़ में मिले हैं। कुछ फुटकर शिलालेख असम्बद्ध रूप में हैं और संक्षिप्त हैं। शायद इसीलिए उन्हें लघु शिलालेख कहा जाता है। इस प्रकार के शिलालेख रूपनाथ, सासाराम, बैराट, मास्की, सिद्धपुर, जतिंगरामेश्वर और ब्रह्मगिरि में पाये गये हैं।
  • दूसरी श्रेणी के लघु शिलालेख बैराट[1], येरागुड़ी और कोपबाल में मिले हैं। दो अन्य लघु शिलालेख अभी हाल में ही अफ़गानिस्तान में – एक जलालाबाद में और दूसरा कंधार के निकट मिला है।
  • इसके अलावा सात लेख स्तम्भों पर उत्कीर्ण हैं, जिसके कारण वह स्तम्भ लेख के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये स्तम्भ लेख दिल्ली, इलाहाबाद, लौरिया – अरराज, लौरिया नंदनगढ़ और रामपुरवा में मिले हैं। कुछ स्तम्भों पर केवल एक एक लेख है, अत: उन्हें सात स्तम्भ लेखों के क्रम से अलग रखा गया है और वे लघुस्तम्भ लेख कहे जाते हैं। इस प्रकार के लघु स्तम्भलेख सारनाथ, साँही, रुम्मिनदेह और निग्लीव में मिले हैं।
  • अंतिम तीन लेख बराबर पहाड़ियों की गुफाओं में मिले हैं और उनको गुफालेखों के नाम से पुकारा जाता है।

शिलालेखों में अशोक

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मौर्यकाल के शिलाओं तथा स्तंभों पर उत्कीर्ण लेखों के अनुशीलन से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि अशोक का धम्म व्यावहारिक फलमूलक (अर्थात फल को दृष्टि में रखने वाला) और अत्यधिक मानवीय था। इस धर्म के प्रचार से अशोक अपने साम्राज्य के लोगों में तथा बाहर अच्छे जीवन के आदर्श को चरितार्थ करना चाहता था। इसके लिए उसने जहाँ कुछ बातें लाकर बौद्ध धर्म में सुधार किया वहाँ लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए विवश नहीं किया। वस्तुतः उसने अपने शासनकाल में निरन्तर यह प्रयास किया कि प्रजा के सभी वर्गों और सम्प्रदायों के बीच सहमति का आधार ढूंढा जाए और सामान्य आधार के अनुसार नीति अपनाई जाए।

  • सातवें शिलालेख में अशोक ने कहा, “सभी सम्प्रदाय सभी स्थानों में रह सकते हैं, क्योंकि सभी आत्मसंयम और भावशुद्धि चाहते हैं।”
  • बारहवें शिलालेख में उसने घोषणा की कि अशोक सभी सम्प्रदायों के गृहस्थ और श्रवणों का दान आदि के द्वारा सम्मान करता है। किन्तु महाराज दान और मान को इतना महत्त्व नहीं देते जितना इस बात को देते हैं कि सभी सम्प्रदाय के लोगों में सारवृद्धि हो, सारवृद्धि के लिए मूलमंत्र है वाकसंयम (वचो गुत्ति)। लोगों को अपने सम्प्रदाय की प्रशंसा तथा दूसरे सम्प्रदायों की निन्दा नहीं करनी चाहिए। लोगों में सहमति (समवाय) बढ़ाने के लिए धम्म महापात्र तथा अन्य कर्मचारियों को लगाया गया है।
  • अशोक पर यह आरोप लगाया गया है कि उसने अपने आदेश (लेख) केवल बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए खुदवाये हैं पर यह विचार न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि उसने सभी सम्प्रदायों को प्रकट रूप से सहायता दी।[3]

अशोक के चतुर्दश-शिलालेख या मुख्य शिलालेख निम्नलिखित स्थानों पर पाए जाते है :

  1. गिरनार : सौराष्ट्र, गुजरात राज्य में जूनागढ़ के पास। इसी चट्टान पर शक महाक्षत्रप रुद्रदामन ने लगभग 150 ई. में संस्कृत भाषा में एक लेख खुदवाया। बाद में गुप्त-सम्राट स्कंदगुप्त (455-67 ई.) ने भी यहाँ एक लेख अंकित करवाया। चंद्रगुप्त मौर्य ने यहाँ ‘सुदर्शन’ नाम के एक सरोवर का निर्माण करवाया था। रुद्रदामन तथा स्कंदगुप्त के लेखों में इसी सुर्दशन सरोवर के पुनर्निर्माण की चर्चा है।
  2. कालसी : देहरादून ज़िला, उत्तराखंड
  3. सोपारा : (प्राचीन सूप्पारक) ठाणे ज़िला, महाराष्ट्र। यहाँ से अशोक के शिलालेख के कुछ टुकड़े ही मिले हैं, जो मुंबई के प्रिन्स आफ वेल्स संग्रहालय में रखे हुए हैं।
  4. येर्रागुडी : कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश
  5. धौली : पुरी ज़िला, उड़ीसा
  6. जौगड़ : गंजाम ज़िला, उड़ीसा।
  • लघु-शिलालेख निम्न स्थानों पर पाए गए हैं:
  1. बैराट : राजस्थान के जयपुर ज़िले में। यह शिलाफलक कलकत्ता संग्रहालय में है।
  2. रूपनाथ: जबलपुर ज़िला, मध्य प्रदेश
  3. मस्की : रायचूर ज़िला, कर्नाटक
  4. गुजर्रा : दतिया ज़िला, मध्य प्रदेश।
  5. राजुलमंडगिरि : बल्लारी ज़िला, कर्नाटक।
  6. सहसराम : शाहाबाद ज़िला, बिहार
  7. गाधीमठ : रायचूर ज़िला, कर्नाटक।
  8. पल्किगुंडु : गवीमट के पास, रायचूर, कर्नाटक।
  9. ब्रह्मगिरि : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।
  10. सिद्धपुर : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।
  11. जटिंगा रामेश्वर : चित्रदुर्ग ज़िला, कर्नाटक।
  12. येर्रागुडी : कर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश
  13. दिल्ली : अमर कॉलोनी, दिल्ली
  14. अहरौरा : मिर्ज़ापुर ज़िला, उत्तर प्रदेश
  • ये सभी लघु-शिलालेख अशोक ने अपने राजकर्मचारियों को संबोधित करके लिखवाए हैं। अशोक ने सबसे पहले लघु-शिलालेख ही खुदवाए थे, इसलिए इनकी शैली उसके अन्य लेखों से कुछ भिन्न है।

अशोक के ब्राह्मी लेखों के कुछ नमूने दे रहे हैं- लिप्यंतर और अर्थ-सहित।

रुम्मिनदेई के अशोक-स्तंभ पर ख़ुदा हुआ यह लेख
ब्राह्मी लिपि में है और बाईं ओर से दाईं ओर को पढ़ा जाता है :

लिप्यंतर

  1. देवानं पियेन पियदसिन लाजिन वीसतिवसाभिसितेन
  2. अतन आगाच महीयिते हिद बुधे जाते सक्यमुनीति
  3. सिलाविगडभीचा कालापित सिलाथभे च उसपापिते
  4. हिद भगवं जातेति लुंमिनिगामे उबलिके कटे
  5. अठभागिये च

अर्थ :

  1. देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने (अपने) राज्याभिषेक के 20 वर्ष बाद स्वयं आकर इस स्थान की पूजा की,
  2. क्योंकि यहाँ शाक्यमुनि बुद्ध का जन्म हुआ था।
  3. यहाँ पत्थर की एक दीवार बनवाई गई और पत्थर का एक स्तंभ खड़ा किया गया।
  4. बुद्ध भगवान यहाँ जनमे थे, इसलिए लुम्बिनी ग्राम को कर से मुक्त कर दिया गया और
  5. (पैदावार का) आठवां भाग भी (जो राज का हक था) उसी ग्राम को दे दिया गया है

अशोक का गिरनार का प्रथम शिलालेख

लिप्यंतर

  1. इयं धंमलिपि देवानंप्रियेन
  2. प्रियदसिना राजा लेखापिता [।] इध न किं
  3. चि जीवं आरभित्पा प्रजूहितव्यं [।]
  4. न च समाजो कतव्यो [।] बहुकं हि दोसं
  5. समाजम्हि पसति देवानंप्रियो प्रियदसि राजा [।]
  6. अस्ति पि तु एकचा समाजा साधुमता देवानं
  7. प्रियस प्रियदसिनो राञो [।] पुरा महानसम्हि
  8. देवानंप्रियस प्रियदसिनो राञो अनुदिवसं ब
  9. हूनि प्राणसतसहस्त्रानि आरभिसु सूपाथाय [।]
  10. से अज यदा अयं धंमलिपि लिखिता ती एव प्रा
  11. णा आरभरे सूपाथाय द्वो मोरा एको मगो सो पि
  12. मगो न ध्रुवो [।] एते पि त्री प्राणा पछा न आरभिसरे [॥]

अर्थ

  1. यह धर्मलिपि देवताओं के प्रिय
  2. प्रियदर्शी राजा ने लिखाई। यहाँ (मेरे साम्राज्य में)
  3. कोई जीव मारकर हवन न किया जाए।
  4. और न समाज (आमोद-प्रमोद वाला उत्सव) किया जाए। क्योंकि बहुत दोष
  5. समाज में देवताओं का प्रिय प्रियदर्शी राजा देखता है।
  6. (परंतु) एक प्रकार के (ऐसे) समाज भी हैं जो देवताओं के
  7. प्रिय प्रियदर्शी राजा के मत में साधु हैं। पहले पाकशाला में-
  8. देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा की – प्रतिदिन कई
  9. लाख प्राणी सूप के लिए मारे जाते थे।
  10. किंतु आज जब यह धर्मलिपि लिखाई गई, तीन ही प्राणी
  11. मारे जाते- दो मयूर तथा एक मृग। और वह भी
  12. मृग निश्चित नहीं। ये तीन प्राणी भी बाद में नहीं मारे जाएंगे।

अशोक का गिरनार का द्वितीय शिलालेख

लिप्यंतर

  1. सर्वत विजितम्हि देवानंप्रियस पियदसिनो राञो
  2. एवमपि प्रचंतेषु यथा चोडा पाडा सतियपुतो केतलपुतो आ तंब-
  3. पंणी अंतियको योनराजा ये वा पि तस अंतियकस सामीपं
  4. राजानो सर्वत्र देवानंप्रियस प्रियदसिनो राञो द्वे चिकीछ कता
  5. मनुसचिकीछा च पसुचिकीछा च [।] ओसुढानि च यानि मनुसोपगानि च
  6. पसोपगानि च यत यत नास्ति सर्वत हारापितानी च रोपापितानि च [।]
  7. मूलानि च फलानि च यत तत्र नास्ति सर्वत हारापितानी च रोपापितानि च [।]
  8. पंथेसू कूपा च खानापिता व्रछा च रोपापिता परिभोगाय पसुमनुसानं [॥]

अर्थात

  1. देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने अपने राज्य में सब जगह और
  2. सीमावर्ती राज्य- चोड़, पांड्य, सतियपुत्र, केरलपुत्र तथा ताम्रपर्णी (श्रीलंका)- तक
  3. और अंतियोक यवनराज तथा उस अंतियोक के जो पड़ोसी राजा हैं,
  4. उन सबके राज्यों में देवताओं के प्रिय प्रियदर्शी राजा ने दो प्रकार की चिकित्सा का प्रबंध किया है-
  5. मनुष्यों की चिकित्सा के लिए और पशुओं की चिकित्सा के लिए।
  6. मनुष्यों और पशुओं के लिए जहां-जहां औषधियां नहीं थीं वहां-वहां लाई और रोपी गई हैं।
  7. इसी प्रकार, जहां-जहां मूल व फल नहीं थे वहां-वहां लाए और रोपे गए हैं।
  8. मार्गों पर मनुष्यों तथा पशुओं के आराम के लिए कुएं खुदवाए गए हैं और वृक्ष लगाए गए हैं।

अशोक का बराबर गुफ़ालेख (द्वितीय)

लिप्यंतर :

  1. लाजिना पियदसिना दुवा
  2. डसवसाभिसितेना इयं
  3. कुभा खलतिक पवतसि
  4. दिना (आजीवि) केहि

(अशोक के बराबर गुफ़ा के प्रथम और इस द्वितीय लेख में, लगता है, किसी ने बाद में ‘आजीविकेहि’ शब्द मिटाने की कोशिश की है। अशोक-पौत्र दशरथ के नागार्जुनी गुफ़ा के प्रथम लेख में भी ऐसा ही हुआ है।)
अर्थ:
द्वादश वर्ष से अभिषिक्त राजा प्रियदर्शी ने खलतिक पर्वत पर (स्थित) यह गुफ़ा आजीविको को प्रदान की।

 

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आज के दलित जो खुद को अज्ञानी समझते हैं उन्हीं के बौद्ध पूर्वजों ने संसार की सम्भवत: पहली लेखन कला “धम्मलिपि” या ब्राह्मी लिपि की खोज की और जनता को पढ़ना सिखाया| इसी लिपि से एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। बौद्ध सम्राट अशोक महान ने अपने लेखों की लिपि को ‘धम्मलिपि’ का नाम दिया है…http://bharatdiscovery.org

  • ब्राह्मी लिपि एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। प्राचीन ब्राह्मी लिपि के उत्कृष्ट उदाहरण सम्राट अशोक (असोक) द्वारा ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में बनवाये गये शिलालेखों के रूप में अनेक स्थानों पर मिलते हैं। नये अनुसंधानों के आधार 6 वीं शताब्दी ईसा पूर्व के लेख भी मिले है। ब्राह्मी भी खरोष्ठी की तरह ही पूरे एशिया में फैली हुई थी।
  • अशोक ने अपने लेखों की लिपि को ‘धम्मलिपि’ का नाम दिया है; उसके लेखों में कहीं भी इस लिपि के लिए ‘ब्राह्मी’ नाम नहीं मिलता। लेकिन बौद्धों, जैनों तथा ब्राह्मण-धर्म के ग्रंथों के अनेक उल्लेखों से ज्ञात होता है कि इस लिपि का नाम ‘ब्राह्मी’ लिपि ही रहा होगा।
  • हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में यह बात आम तौर से पाई जाती है कि जिस किसी भी चीज़ की उत्पत्ति कुछ अधिक प्राचीन या अज्ञेय हो उसके निर्माता के रूप में बड़ी आसानी से ‘ब्रह्मा’ का नाम ले लिया जाता है। संसार की अन्य पुरालिपियों की उत्पत्ति के बारे में भी यही देखने को मिलता है कि प्राय: उनके जनक कोई न कोई दैवी पुरुष ही माने गए हें। हमारे यहाँ भी ‘ब्रह्मा‘ को लिपि का जन्मदाता माना जाता रहा है, और इसीलिए हमारे देश की इस प्राचीन लिपि का नाम ब्राह्मी पड़ा है।
  • बौद्ध ग्रंथ ‘ललितविस्तर‘ में 64 लिपियों के नाम दिए गए हैं। इनमें पहला नाम ‘ब्राह्मी’ है और दूसरा ‘खरोष्ठी‘। इन 64 लिपि-नामों में से अधिकांश नाम कल्पित जान पड़ते हैं।
  • जैनों के ‘पण्णवणासूत्र’ तथा ‘समवायांगसूत्र’ में 16 लिपियों के नाम दिए गए हैं, जिनमें से पहला नाम ‘बंभी’ (ब्राह्मी) का है।
  • ‘भगवतीसूत्र’ में सर्वप्रथम ‘बंभी’ (ब्राह्मी) लिपि को नमस्कार करके (नमो बंभीए लिविए) सूत्र का आरंभ किया गया है।
  • 668 ई. में लिखित एक चीनी बौद्ध विश्वकोश ‘फा-शु-लिन्’ में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का उल्लेख मिलता है। इसमें लिखा है कि, ‘लिखने की कला का शोध दैवी शक्ति वाले तीन आचार्यों ने किया है; उनमें सबसे प्रसिद्ध ब्रह्मा है, जिसकी लिपि बाईं ओर से दाहिनी ओर को पढ़ी जाती है।’
  • इससे यही जान पड़ता है कि ब्राह्मी भारत की सार्वदेशिक लिपि थी और उसका जन्म भारत में ही हुआ किंतु बहुत-से विदेशी पुराविद मानते हैं कि किसी बाहरी वर्णमालात्मक लिपि के आधार पर ही ब्राह्मी वर्णमाला का निर्माण किया गया था।
  • ब्यूह्लर जैसे प्रसिद्ध पुरालिपिविद की मान्यता रही कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण फिनीशियन लिपि के आधार पर हुआ। इसके लिए उन्होंने एरण के एक सिक्के का प्रमाण भी दिया था।
  • एरण (सागर ज़िला, म.प्र.) से तांबे के कुछ सिक्के मिले हैं, जिनमें से एक पर ‘धमपालस’ शब्द के अक्षर दाईं ओर से बाईं ओर को लिखे हुए मिलते हैं। चूंकि, सेमेटिक लिपियां भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थीं, इसलिए ब्यूह्लर ने इस अकेले सिक्के के आधार पर यह कल्पना कर ली कि आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी सेमेटिक लिपियों की तरह दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। ओझा जी तथा अन्य अनेक पुरालिपिविदों ने ब्यूह्लर की इस मान्यता का तर्कयुक्त खंडन किया है। उस समय ओझा जी ने लिखा था, ‘किसी सिक्के पर लेख का उलटा आ जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि सिक्के पर उभरे हुए अक्षर सीधे आने के लिए सिक्के के ठप्पे में अक्षर उलटे खोदने पड़ते हैं, अर्थात जो लिपियां बाईं ओर से दाहिनी ओर लिखी जाती हैं उनके ठप्पों में सिक्कों की इबारत की पंक्ति का आरंभ दाहिनी ओर से करके प्रत्येक अक्षर उलटा खोदना पड़ता है, परंतु खोदनेवाला इसमें चूक जाए और ठप्पे पर बाईं ओर से खोदने लग जाए तो सिक्के पर सारा लेख उलटा आ जाता है, जैसा कि एरण के सिक्के पर पाया जाता है।’ साथ ही, ओझा जी ने लिखा था, ‘अब तक कोई शिलालेख इस देश में ऐसा नहीं मिला है कि जिसमें ब्राह्मी लिपि फ़ारसी की नाईं उलटी लिखी हुई मिली हो।’
  • यह 1918 के पहले की बात है।

ब्राह्मी व्यंजनों के साथ स्वर-मात्राएं जोड़ने की व्यवस्था

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  • 1929 में अनु घोष को एर्रगुडी (कुर्नूल ज़िला, आंध्र प्रदेश) में अशोक का एक लघु-शिलालेख मिला, जिसे बाद में दयाराम साहनी ने 1933 में प्रकाशित किया। इस लेख की कुल 23 पंक्तियों में से 8 पंक्तियां – 2,4,6,9,11,13,14, और 23 वीं पंक्तियां- दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी गई हैं। पुरालिपियों में यह एक अद्भुत उदाहरण है। पहली पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर, फिर दूसरी पंक्ति दाईं ओर से बाईं ओर, फिर तीसरी पंक्ति बाईं ओर से दाईं ओर…. इसी तरह का सिलसिला यदि सारे लेख में चलता रहे, तो इस प्रकार की लेखन-प्रणाली को ‘ब्यूस्त्रफीदान’, अर्थात बैलों द्वारा हल जोतने की विधि कहा जाता है। यूनानी लिपि के आरंभिक लेख इसी प्रणाली के देखने को मिलते हैं। किन्तु एर्रगुडी के इस ब्राह्मी लेख को ‘ब्यूस्त्राफीदान’ प्रणाली में लिखा हुआ भी नहीं मान सकते; क्योंकि इसमें एक के बाद हर दूसरी पंक्ति नियमत: दाईं ओर से बाईं ओर को नहीं लिखी गई है। फिर भी, डिरिंजेर[1] ने इस लेख के आधार पर सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यूनानी लिपि की तरह आरंभ में ब्राह्मी लिपि भी दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जाती थी। यदि केवल यह सिद्ध करने के लिए कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण दाईं ओर से बाईं ओर को लिखी जानेवाली किसी विदेशी लिपि के आधार पर हुआ है।
  • श्रीलंका में इस प्रकार के कई लेख मिलते हैं, परंतु ये अशोक के बाद के हैं और जान पड़ता है कि इनके लिखनेवालों को ब्राह्मी लिपि का यथार्थ ज्ञान भी नहीं था। आंध्र प्रदेश के भट्टिप्रोलु-लेखों में भी ब्राह्मी के कुछ अक्षर उलटे लिखे हुए मिलते हैं। चालुक्य काल का एक लेख तो नीचे से ऊपर को भी लिखा हुआ मिलता है! इन अपवादात्मक लेखों के आधार पर कोई यदि यह सिद्ध करने का प्रयत्न करे कि ब्राह्मी लिपि विदेशी लिपि के आधार पर बनाई गई है, तो उसे हठधर्मी ही कहा जाएगा।
  • बहुत-से विद्वान मानते हैं कि किसी सेमेटिक वर्णमाला के आधार पर ही ब्राह्मी संकेतों का निर्माण हुआ है। लेकिन इसमें भी मतभेद हैं। कुछ लोग उत्तरी सेमेटिक को ब्राह्मी का आधार मानते हैं, कुछ दक्षिणी सेमेटिक को, और कुछ फिनीशियन तथा आरमेई लिपि को। चूंकि आरमेई लिपि का प्रचार भारत के पश्चिमोत्तर प्रदेश तक था, इसलिए डिरिंजेर का मत है कि आरमेई के आधार पर ही ब्राह्मी का निर्माण हुआ। आज प्राय: सभी विद्वान यह बात स्वीकार करते हैं कि खरोष्ठी का निर्माण आरमेई लिपि के आधार पर हुआ है, किंतु यह संभव नहीं है कि ब्राह्मी लिपि भी आरमेई के आधार पर बनाई गई हो।

रुम्मिनदेई के अशोक-स्तंभ पर ख़ुदा हुआ यह लेख ब्राह्मी लिपि में है और बाईं ओर से दाईं ओर को पढ़ा जाता है

  • इसके बारे में ओझाजी ने लिखा है, ‘ब्राह्मी लिपि के न तो अक्षर फिनीशियन या किसी अन्य लिपि से निकले हैं और न उसकी बाईं ओर से दाहिनी ओर को लिखने की प्रणाली किसी और लिपि से बदलकर बनाई गई है। यह भारतवर्ष के आर्यों का अपनी खोज से उत्पन्न किया हुआ मौलिक आविष्कार है। इसकी प्राचीनता और सर्वांग सुंदरता से चाहे इसका कर्त्ता ब्रह्मा देवता माना जाकर इसका नाम ब्राह्मी पड़ा, चाहे साक्षर-समाज ब्राह्मणों की लिपि होने से यह ब्राह्मी कहलायी हो, पर इसमें संदेह नहीं कि इसका फिनिशियन से कुछ भी संबंध नहीं है।’
  • एडवर्ड टॉमस का भी यह मत है कि ‘ब्राह्मी अक्षर भारतवासियों के ही बनाए हुए हैं और उनकी सरलता से उनके बनाने वालों की बड़ी बुद्धिमानी प्रकट होती है।’
  • कनिंघम भी मानते हैं कि ब्राह्मी लिपि का निर्माण भारतवासियों ने ही किया है।
  • आर. शाम शास्त्री ने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि देवताओं की उपासना के लिए जिन सांकेतिक चिह्नों का उपयोग होता था, उन्हीं से ब्राह्मी लिपि के अक्षरों का निर्माण हुआ है।
  • जगमोहन वर्मा ने 1913-15 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में ब्राह्मी लिपि के बारे में कुछ लेख थे, जिनमें उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया था कि वैदिक चित्रलिपि या उससे निकली किसी सांकेतिक लिपि से ब्राह्मी लिपि निकली है।
  • लेकिन शास्त्री और वर्मा के ये दोनों सिद्धांत किसी ठोस प्रमाण पर आधारित नहीं हैं, इसलिए इन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता।
  • यही अधिक संभव जान पड़ता है कि सिंधु लिपि से ही ब्राह्मी का विकास हुआ है। वस्तुत: सिंधु लिपि में और ब्राह्मी लिपि के उपलब्ध लेखों में लगभग एक हज़ार वर्षों का अंतर है। सिंधु लिपि के संकेतों में और ब्राह्मी लिपि के संकेतो में कुछ साम्य भी देखने को मिलता है।
  • संभव है कि 1000 ई. पू. के आसपास सिंधु लिपि के आधार पर किसी ‘प्राक्-ब्राह्मी’ लिपि का निर्माण किया गया हो और आगे चलकर इसी का परिष्कार होने पर ब्राह्मी लिपि अस्तित्व में आई हो।
  • सिंधु लिपि का स्वरूप भी अक्षरमालात्मक प्रतीत होता है। उसमें भी मूलाक्षरों के साथ स्वरों की मात्राओं का रूप देखने को मिलता है। साथ ही, संयुक्ताक्षर भी देखने को मिलते हैं।
  • कुछ विद्वान तो यह भी आशा रखते हैं कि सिंधु लिपि में शायद ‘आद्य संस्कृत’ भाषा की खोज हो जाए

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सम्राट अशोक महान द्वारा इस्तेमाल में लाइ गयी बौद्धों को लिपि “ब्राह्मी लिपि” का उद्भव – एक विश्लेषण …..गोविंद कुमार मीना M.A बौद्ध  अध्ययन  (अशोक ने अपने लेखों की लिपि को ‘धम्मलिपि’ का नाम दिया है)

ब्राह्मी एक प्राचीन लिपि है जिससे कई एशियाई लिपियों का विकास हुआ है। देवनागरी सहित अन्य दक्षिण एशियाई, दक्षिण-पूर्व एशियाई, तिब्बती तथा कुछ लोगों के अनुसार कोरियाई लिपि का विकास भी इसी से हुआ था।

इथियोपियाई लिपि पर ब्राह्मी लिपि का स्पष्ट प्रभाव है।

उत्पत्ति

अभी तक माना जाता था कि ब्राह्मी लिपि का विकास चौथी से तीसरी सदी ईसा पूर्व में मौर्यों ने किया था, पर भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के ताजा उत्खनन से पता चला है कि तमिलनाडु और श्रीलंका में यह ६ठी सदी ईसा पूर्व से ही विद्यमान थी।

अशोक स्तम्भ पर ब्राह्मी लिपि

देशी उत्पत्ति का सिद्धान्त

कई विद्वानों का मत है कि यह लिपि प्राचीन सरस्वती लिपि (सिन्धु लिपि) से निकली, अतः यह पूर्ववर्ती रूप में भारत में पहले से प्रयोग में थी। सरस्वती लिपि के प्रचलन से हट जाने के बाद संस्कृत लिखने के लिये ब्रह्मी लिपि प्रचलन मे आई। ब्रह्मी लिपि में संस्कृत मे ज्यादा कुछ ऐसा नहीं लिखा गया जो समय की मार झेल सके। प्राकृत/पाली भाषा मे लिखे गये मौर्य सम्राट अशोक के बौद्ध उपदेश आज भी सुरक्षित है। इसी लिये शायद यह भ्रम उपन्न हुआ कि इस का विकास मौर्यों ने किया।

यह लिपि उसी प्रकार बाँई ओर से दाहिनी ओर को लिखी जाती थी जैसे, उनसे निकली हुई आजकल की लिपियाँ। ललितविस्तर में लिपियों के जो नाम गिनाए गए हैं, उनमें ‘ब्रह्मलिपि’ का नाम भी मिला है। इस लिपि का सबसे पुराना रूप अशोक के शिलालेखों में ही मिला है।

बौद्धों के प्राचीन ग्रंथ ‘ललितविस्तर‘ में जो उन ६४ लिपियों के नाम गिनाए गए हैं जो बुद्ध को सिखाई गई, उनमें ‘नागरी लिपि’ नाम नहीं है, ‘ब्राह्मी लिपि’ नाम हैं। ‘ललितविस्तर’ का चीनी भाषा में अनुवाद ई० स० ३०८ में हुआ था। जैनों के ‘पन्नवणा सूत्र’ और ‘समवायांग सूत्र’ में १८ लिपियों के नाम दिए हैं जिनमें पहला नाम बंभी (ब्राह्मी) है। उन्हीं के भगवतीसूत्र का आरंभ ‘नमो बंभीए लिबिए’ (ब्राह्मी लिपि को नमस्कार) से होता है।

सबसे प्राचीन लिपि भारतवर्ष में अशोक की पाई जाती है जो सिंध नदी के पार के प्रदेशों (गांधार आदि) को छोड़ भारतवर्ष में सर्वत्र बहुधा एक ही रूप की मिलती है। जिस लिपि में अशोक के लेख हैं वह प्राचीन आर्यो या ब्राह्मणों की निकाली हुई ब्राह्मी लिपि है। जैनों के ‘प्रज्ञापनासूत्र’ में लिखा है कि ‘अर्धमागधी‘ भाषा जिस लिपि में प्रकाशित की जाती है वह ब्राह्मी लिपि है’। अर्धमागधी भाषा मथुरा और पाटलिपुत्र के बीच के प्रदेश की भाषा है जिससे हिंदी निकली है। अतः ब्राह्मी लिपि मध्य आर्यावर्त की लिपि है जिससे क्रमशः उस लिपि का विकास हुआ जो पीछे ‘नागरी’ कहलाई। मगध के राजा आदित्यसेन के समय (ईसा की सातवीं शताब्दी) के कुटिल मागधी अक्षरों में नागरी का वर्तमान रूप स्पष्ट दिखाई पड़ता है। ईसा की ९वीं और १०वीं शताब्दी से तो नागरी अपने पूर्ण रूप में लगती है। किस प्रकार अशोक के समय के अक्षरों से नागरी अक्षर क्रमशः रूपांतरित होते होते बने हैं यह पंडित गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने ‘प्राचीन लिपिमाला’ पुस्तक में और एक नकशे के द्वारा स्पष्ट दिखा दिया है।

ब्राह्मी लिपि की विशेषताएँ

  • यह बाँये से दाँये की तरफ लिखी जाती है।
  • यह मात्रात्मक लिपि है। व्यंजनों पर मात्रा लगाकर लिखी जाती है।
  • कुछ व्यंजनों के संयुक्त होने पर उनके लिये ‘संयुक्ताक्षर’ का प्रयोग (जैसे प्र= प् + र)
  • वर्णों का क्रम वही है जो आधुनिक भारतीय लिपियों में है। यह वैदिक शिक्षा पर आधारित है

Friday, March 20, 2015

ब्राह्मी लिपि का उद्भव :- एक विश्लेषण

सभ्यता की प्रगति में लेखन कला का अभूतपूर्व योगदान है । मानव समाज को नई दिशा देने में लिपि का अविष्कार बहुत महत्वपूर्ण है । इसी के कारण मनुष्य के लिए यह संभव हो सका है कि वह अपने ज्ञान का सर्जन, संरक्षण और संवर्धन करता रहे, अपने  अनुभवों, विचारों और कल्पनाओं को मूर्त एवं स्थायी रूप दे सके । जिस तरह से लेखन की परम्परा की शुरुआत हुई, उस शुरुआत का इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है । लिपि मनुष्य का एक महान अविष्कार है । जब से पुराने लेख मिलते है तब से मानव इतिहास के शुरुआत माना जाता है । मुख्यतः पुराने लेखों के आधार पर ही प्रामाणिक इतिहास की रचना की जाती हैं।

पुरातनकाल में हमारे देश में इतिहास के ग्रंथ कम लिखे गए या जो लिखे गए उनमें आमूल-चूल परिवर्तन करके नष्ट कर दिया गया, किन्तु फिर भी हमारे देश में अनेक ऐसे पुरालेख मिले हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि भारत का इतिहास गौरवशाली व महत्वपूर्ण था । जो यह दर्शाता है कि हमारी इस भारत भूमि पर अनेक ऐसे ऐतिहासिक महामानवों ने जन्म लिया था। तथा उनके द्वारा अनेक ऐसे कार्य किए गए, जो इतिहास के पन्नो में स्वर्णिम अक्षरों से लिखे गए । इसी कार्य में लिपि का अविष्कार एक बहुत बड़ी  खोज है  । जिससे व्यक्ति ने अपनी बातों को दीर्घकालीन समय तक दूसरी पीढ़ीयों तक हस्तांतरित किया । ब्राह्मी लिपि को वर्तमान समय में हमारे समक्ष   प्रकट करने का श्रेय अंग्रेज़ अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1837 ई. को जाता है । उन्होंने ही सर्वप्रथम ‘साँची के स्तूप’ पर अंकित ब्राह्मी अक्षरों में ‘ दानं ’ शब्द को पढ़ा तथा इसी शब्द के आधार पर जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि कि वर्णमाला तैयार की । इसलिए हमें अंग्रेज़ अधिकारियों का शुक्रगुजार होना चाहिए । जिनकी  अथक मेहनत परिश्रम से हम हमारी राष्ट्रीय विरासत से रूबरू हो पाये ।

ब्राह्मी लिपि :-

भारतीय ऐतिहासिक परम्पराओं में ब्राह्मी के उद्भव का मुख्य कारण यह माना जाता है कि उत्तर-वैदिक काल के मुख्य देवता  ब्रह्मा के द्वारा इस लिपि को आविष्कृत किया गया । ब्राह्मी लिपि की उत्पति को लेकर अनेक विद्वानों में मतभेद है । कोई विद्वान इसे भारतीय उत्पति कहता है तो कोई विद्वान इसे विदेशी लिपि सिद्ध करने का प्रयास करते हैं । ब्राह्मी लिपि उत्पति के मुख्य उद्गम स्थल निम्न है ।

  1. स्वदेशी उत्पति के पोषक सिद्धान्त  ।
  2. विदेशी उत्पति के पोषक सिद्धान्त  ।

स्वदेशी उत्पति के पोषक सिद्धान्त :-

           इस सिद्धान्त के अंतर्गत भारतीय विद्वानों ने ब्राह्मी लिपि को भारतीय मूल की सिद्ध करने का प्रयास किया हैं । विश्व की सम्पूर्ण लिपियों का अध्ययन करने पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते है कि लिपि का अविष्कारकर्ता मिथक बनाकर किसी देवता के आधार पर जोड़ दिया गया । इसी प्रकार भारतीय परंपरा में “ ब्राह्मी लिपि  ”  को ब्रह्मा से जोड़ा गया कि ब्रह्मा ने ही इस लिपि की खोज की उसी के नाम के आधार पर इसका नाम ‘ब्राह्मी’ पड़ा ।

बौद्ध धर्म ग्रंथ “ ललित विस्तर ” में 64 लिपियों का वर्णन मिलता है उसमें प्रथम लिपि में ब्राह्मी का उल्लेख हैं । इसी प्रकार जैन ग्रंथ “ समवायांग सूत्र ” में उल्लेख है कि आदिनाथ ने अपनी पुत्री को पढ़ाने के लिए लिपि का अविष्कार किया था, उनकी पुत्री का नाम ‘ बम्भी ” था और उसी के नाम के आधार पर ब्राह्मी का नामकरण हुआ ।

ब्राह्मी लिपि को स्वदेशी सिद्ध करने की अनेक विद्वानों ने पुरजोर कोशिश की हैं ।

इस लिपि के स्वदेशी होने के लिए लासेन एवं एडवर्ड थॉमस ने ब्राह्मी की उत्पति का श्रेय द्रविड़ों को दिया है । द्रविड़ प्रजाति आर्यों के भारत आक्रमण से पूर्व भारत में निवास करते थे, और इस द्रविड़ों की स्थिति काफी अच्छी थी । वे आर्यों से काफी उन्नत अवस्था में थे । इस समृद्धाव्स्था के कारण अपनी सभ्यता के इतिहास को सुरक्षित रखने के लिए लिपि का अविष्कार किया । किन्तु यह बात भी स्पष्ट नहीं होती क्योंकि भारतीय द्रविड़ जातियाँ दक्षिण भारत में निवास करती थी तथा आर्यों का मूल स्थान उत्तर भारत था । तथा द्रविड़ों की मूल भाषा तमिल थी । इसलिए यह तर्क करना स्पष्ट रूप से सही प्रतीत नहीं होता है ।

भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक कनिंघम ने भी लिपि के बारे में अपनी राय दी है । उन्होंने बताया कि ब्राह्मी लिपि का उद्भव लिपि का प्रारंभिक स्वरूप चित्र लिपि से संभवतया हुआ होगा, क्योंकि ब्राह्मी अक्षरों के प्रत्येक समूह का नाम मानव शरीर के विभिन्न अंगों के नाम पर रखा गया । जो आरंभ में चित्र प्रतीक का चित्रण करते थे । किन्तु वे इस बात का समर्थन करते है कि ब्राह्मी लिपि का जन्म भारत में हुआ किन्तु साथ ही वे यह स्वीकारते है कि भारतीयों ने लिपि कि योजना मिस्त्रवासियों से अवश्य ली होंगी ।

जॉन डाऊसन ब्राह्मी लिपि को भारतीय लिपि मानते है । इस स्थान पर वे अपना तर्क देते है, कि इस लिपि की उत्पति गंगा नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में हुई तथा इसी स्थान से इसका चहुंमुखी विकास हुआ, यह लिपि विशेषताओं से परिपूर्ण होने के कारण यह विश्व में अपना विशेष स्थान रखती है । इस लिपि की खास विशेषता यह थी कि यह दोनों तरफ से लिखी जाती थी ।

“ डॉ. जगमोहन वर्मा ब्राह्मी लिपि को वैदिक चित्र लिपि या उससे मिलती-जुलती हुई ‘सांकेतिक-लिपि’बताते है । ”

विदेशी उत्पति के सिद्धान्त :-

          ब्राह्मी लिपि की उत्पति को कई सारे विद्वानों ने विदेशी लिपि पर आधारित माना है । उन्होंने अपने तर्कों के माध्यम से ब्राह्मी को विदेशी लिपि के समन्वय से उत्पन्न माना है ।

  1. यूनानी उत्पत्ति :-
  2. सेमेटिक मूल से उत्पति :-
  3. यूनानी उत्पत्ति :-

ब्राह्मी लिपि की उत्पति के बारे में कुछ यूरोपीय विद्वानों का विचार है कि ब्राह्मी की उत्पत्ति यूनानी वर्णो से हुई है । मूलर, सेनार्ट, प्रिंसेप और विल्सन ने अपने तर्कों के माध्यम से ब्राह्मी को विदेशी लिपि स्वीकार करने पर तर्क दिया है । इन विद्वानों द्वारा ऐसी संभावना व्यक्त की गई कि भारत पर आक्रमण होने के पश्चात लोगों का संस्कृतिकरण होने के पश्चात भारतीयों ने लिपि ज्ञान सीखा और यह लिपि ज्ञान यूनानियों से संबंधित था यह तर्क पूरी तरह से कसौटी पर खरा नहीं उतरता हैं । क्योंकि भारत तथा यूनान के संबंध सिकंदर के आक्रमण से पूर्व लिपि ज्ञान से परिचित थे ।

एक दूसरा तर्क कि फोनेशियन व्यापारियों द्वारा यह लिपि भारत में आई किन्तु यह बात भी ज्यादा प्रामाणिक नहीं प्रतीत होती है , क्योंकि फोनेशियन लोग भारतीय मूल के ही थे । ऋग्वेद में उन्हें पणि’(भारतीय आदिवासी ) कहा गया हैं। और ये व्यापार करते हुए भूमध्य सागर के तट पर बस गये थे । और इसी स्थान पर उन्होंने अपनी लिपि का विकास किया । उसके पश्चात जब यूनानियों ने भारत पर आक्रमण किया तो यूनानियों ने उन फोनेशियन लोगों से लिपि ज्ञान लिया तथा उसके पश्चात यूनानियों ने भारतीय लोगों को लिपि ज्ञान सिखाया हो ।

  1. सेमेटिक मूल :-

सन 1806 ई. में सर विलियम जोन्स ने ब्राह्मी की उत्पति के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया, उन्होंने ब्राह्मी लिपि को सेमेटिक मूल से विकसित लिपि माना, किन्तु सेमेटिक मूल को लेकर विद्वानों के विचारों में असमानताएँ हैं। सेमेटिक मूल को निम्न भागों में विभक्त किया गया हैं।

  1. उत्तरी सेमेटिक मूल :-

इस मत को सर्वप्रथम व्यक्त करने का श्रेय मुख्यतः डॉ. बूलर को जाता है । बूलर महोदय ने आगे स्पष्टीकरण दिया है । “ सीधे प्राचीन उत्तरी सेमेटिक वर्णों से जिनका फोनेशिया से लेकर मेसोपोटामिया तक समान रूप दिखलाई देता हैं ।”

          ‘ पाल गोल्डस्मिथ का मत है की ब्राह्मी लिपि फिनिशियन से निकली, उनके अनुसार फिनिशियन से लंका लिपि के वर्ण निकले और उन्हीं वर्णों के अनुसार ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ ।

बर्नेल का मत है कि फिनिशियन से अरमाइक लिपि तथा इससे ब्राह्मी लिपि का जन्म हुआ ।

  1. दक्षिण  सेमेटिक :-

टेलर, ड़ीक और कैनन महोदय ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति दक्षिण सेमेटिक मूल से मानते है । किन्तु भारत और भूमध्य सागर के मध्य में अरब सागर की स्थिति होने के कारण भारत और अरब के सम्बन्धों को माना जा सकता है किन्तु भारत पर इस्लाम आक्रमण से पूर्व भारत अरब संबंधों की बात स्पष्ट नहीं  हो पाती है, इस प्रकार यह मत भी उचित नहीं मालूम पड़ता है ।

iii.            फोनेशियन मूल से उत्पत्ति :-

          ब्राह्मी लिपि तथा फोनेशियन वर्णों के कुछेक वर्णों में साम्यता नज़र आती है जैसे ट, थ, ठ, झ, क,और ग वर्णों में थोड़ी साम्यता नज़र आती है । किन्तु जिस समय भारत में ब्राह्मी लिपि उद्भूत हुई उस समय हमें भारत और फ़िनीशिया के लोगों के संबंधो का साक्ष्य हमें नहीं मिलता हैं ।

भाषा तथा लिपि के प्रसिद्ध विद्वानों की महत्वपूर्ण खोजों एवं अनवरत चलने वाले शोध से भी स्पष्ट नहीं हो पाया है किन्तु यह बात स्पष्ट होती है कि ब्राह्मी लिपि की उत्पत्ति भारत में हुई, तथा भारतीयों ने इसे अपनी अवश्यकता के अनुसार जन्म दिया । विश्व की सभी लिपियों के अविष्कार के पीछे कुछ मिथक जोड़कर उसे स्थायियत्व प्रदान करने की कोशिश की गई थी, किन्तु हम यह जानते है कि लिपि का अविष्कार अपने आप में एक बहुत बड़ी श्रेष्ठता रखता है । अपने विचारों तथा भावों को लिखित स्वरूप प्रदान करने में लिपि का बहुत महत्वपूर्ण योगदान होता हैं । संभवतया लिपि का अविष्कार अपने आप में महत्वपूर्ण था और कोई इसे नष्ट न कर दे या इसका विकास चरमसीमा पर हो इसलिए इसके पीछे ब्रह्मा का मिथक जोड़ा गया ।

इस प्रकार हम अपनी कल्पना कि समझ को थोड़ा बढ़ाकर सभी बातों को अपने तर्क की कसौटी पर रखकर उतारेंगे तो स्पष्टतया यह बात हमारे समक्ष उजागर होगी कि लिपि का संज्ञान भारतीयों को था और उन्होंने ही     लिपि का अविष्कार किया, विदेशी लिपि से इसका संबंध जोड़ना प्रायः निरर्थक प्रतीत होता है ।

गोविंद कुमार मीना

M.A बौद्ध  अध्ययन

MGAHV WARDHA

 

संदर्भ – सूची

1)      पाण्डेय राजबली – भारतीय पुरालिपि (2004) लोकभारती प्रकाशन  25-A, महात्मा गांधी मार्ग,इलाहाबाद -1

2)      मुले गुणाकर- भारतीय लिपियों की कहानी (1974) राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली

3)      मुले गुणाकर – अक्षर बोलते हैं , (2005) यात्री प्रकाशन दिल्ली – 110094

4)      मिश्र नरेश – नागरी लिपि (1999) मोनू  प्रकाशन दिल्ली, 110032

http://gk1991.blogspot.in/2015/03/1837.html

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने बौद्ध धम्म से प्रेरित भारत के संविधान में नागरिकों के ये मूल कर्तव्य 51A तय किये हैं …बोधिसत्व एसo जाटव

नागरिकों के मूल कर्तव्य 1976 में सरकार द्वारा गठित स्वर्णसिंह समिति की सिफारिशों पर, 42वें संशोधन द्वारा संविधान में जोड़े गए थे।[19][99] मूल रूप से संख्या में दस, मूल कर्तव्यों की संख्या 2002 में 86वें संशोधन द्वारा ग्यारह तक बढ़ाई गई थी, जिसमें प्रत्येक माता-पिता या अभिभावक को यह सुनिश्चित करने का कर्तव्य सौंपा गया कि उनके छः से चौदह वर्ष तक के बच्चे या वार्ड को शिक्षा का अवसर प्रदान कर दिया गया है।[52] अन्य मूल कर्तव्य नागरिकों को कर्तव्यबद्ध करते हैं कि संविधान सहित भारत के राष्ट्रीय प्रतीकों का समेमान करें, इसकी विरासत को संजोएं, इसकी मिश्रित संस्कृति का संरक्षण करें तथा इसकी सुरक्षा में सहायता दें। वे सभी भारतीयों को सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देने, पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, वैज्ञानिक सोच का विकास करने, हिंसा को त्यागने और जीवन के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करने के कर्तव्य भी सौंपते हैं।[100] नागरिक इन कर्तव्यों का पालन करने के लिए संविधान द्वारा नैतिक रूप से बाध्य हैं। हालांकि, निदेशक सिद्धांतों की तरह, ये भी न्यायोचित नहीं हैं, उल्लंघन या अनुपालना न होने पर कोई कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती।[99][101] ऐसे कर्तव्यों का उल्लेख मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा तथा नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिज्ञापत्र जैसे अंतर्राष्ट्रीय लेखपत्रों में है, अनुच्छेद 51ए भारतीय संविधान को इन संधियों के अनुरूप लाता है।[99]

अब कम ही बच्चे खतरनाक वातावरण में कार्यरत हैं, लेकिन गैर खतरनाक नौकरियों में उनका रोजगार, घरेलू नौकर के रूप में प्रचलन, कई आलोचकों और मानव अधिकार अधिवक्ताओं की नजरों में संविधान की भावना का उल्लंघन करता है। एक करोड़ पैंसठ लाख से अधिक बच्चे रोजगार में हैं।[102] सरकारी अधिकारियों और राजनीतिज्ञों में मौजूद भ्रष्टाचार के स्तर के अनुसार 2005 में भारत 159 देशों की सूची में 88वें स्थान पर था।[103] वर्ष 1990-1991 को बीआर अम्बेडकर की स्मृति में “सामाजिक न्याय वर्ष” घोषित किया गया था।[104] सरकार चिकित्सा एवं अभियांत्रिकी पाठ्यक्रमों के अनुसूचित जाति एवं जनजाति के छात्रों को निशुल्क पाठ्यपुस्तकें प्रदान करती है। 2002-2003 के दौरान रुपये 4। 77 करोड़ (477 लाख) इस उद्देश्य के लिए जारी किए गए थे।[105] अनुसूचित जातियों और जनजातियों को भेदभाव से बचाने के लिए, सरकार ने ऐसे कृत्यों के लिए कड़े दंडों का प्रावधान करते हुए 1995 में अत्याचार निवारण अधिनियम अधिनियमित किया था।[106]

1948 का न्यूनतम मजदूरी अधिनियम सरकार को संपूर्ण आर्थिक क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की न्यूनतम मजदूरी तय करने का अधिकार देता है।[107] उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 1986 उपभोक्ताओं को बेहतर सुरक्षा प्रदान करता है। अधिनियम का उद्देश्य उपभोक्ताओं की शिकायतों का सरल, त्वरित और सस्ता समाधान प्रदान करना और जहां उपयुक्त पाया जाए राहत और मुआवजा दिलाना हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें] समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976 महिलाओं और पुरुषों दोनों को समान कार्य के लिए समान वेतन प्रदान करता है।[108] सम्पूर्ण ग्रामीण रोजगार योजना (यूनिवर्सल ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम) 2001 में ग्रामीण गरीबों को लाभदायक रोजगार प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। कार्यक्रम पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से कार्यान्वित किया गया था।[109]

निर्वाचित ग्राम परिषदों का एक तंत्र पंचायती राज के नाम से जाना जाता है, यह लगभग भारत के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में लागू है।[110] पंचायती राज में प्रत्येक स्तर पर कुल सीटों की संख्या की एक तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षित की गई हैं, बिहार के मामले में आधी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हैं।[111][112] जम्मू एवं काश्मीर तथा नागालैंड को छोड़ कर सभी राज्यों और प्रदेशों में न्यायपालिका को कार्यपालिका से अलग कर दिया गया है।[105] भारत की विदेश नीति निदेशक सिद्धांतों से प्रभावित है। भारतीय सेना द्वारा संयुक्त राष्ट्र के शांति कायम करने के 37 अभियानों में भाग लेकर भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ के शांति प्रयासों में सहयोग दिया है।[113]

सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन राजनैतिक दलों और विभिन्न धार्मिक समूहों के बड़े पैमाने पर विरोध के कारण हासिल नहीं किया जा सका है। शाह बानो मामले (1985-1986) ने भारत में एक राजनीतिक तूफान भड़का दिया था जब सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक मुस्लिम महिला शाह बानो जिसे 1978 में उसके पति द्वारा तलाक दे दिया गया था, सभी महिलाओं के लिए लागू भारतीय विधि के अनुसार अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने की हकदार थी। इस फैसले ने मुस्लिम समुदाय में नाराजगी पैदा कर दी जिसने मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू करने की मांग की और प्रतिक्रिया में संसद ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को उलटते हुए मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986 पारित कर दिया।[114] इस अधिनियम ने आगे आक्रोश भड़काया, न्यायविदों, आलोचकों और नेताओं ने आरोप लगाया कि धर्म या लिंग के बावजूद सभी नागरिकों के लिए समानता के मूल अधिकार की विशिष्ट धार्मिक समुदाय के हितों की रक्षा करने के लिए अवहेलना की गई थी। फैसला और कानून आज भी गरम बहस के स्रोत बने हुए हैं, अनेक लोग इसे मूल अधिकारों के कमजोर कार्यान्वयन का एक प्रमुख उदाहरण बताते हैं।

मूल कर्तव्य

51क. मूल कर्तव्य[1]

भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह-

  • (क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;
  • (ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे;
  • (ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे;
  • (घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;
  • (ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म. भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभाव से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुंद्ध है;
  • (च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे;
  • (छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणि मात्र के प्रति दयाभाव रखे;
  • (ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;
  • (झ) सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;
  • (ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू ले;
  • [(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करे।]

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने बौद्ध धम्म से प्रेरित भारत के संविधान में राज्य के लिए जो नीति निदेशक सिद्धांत Directive Principals तय किये हैं वो इस प्रकार हैं…..बोधिसत्व एसo जाटव

मूल अधिकार, राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्य[1] भारत के संविधान के अनुच्छेद हैं जिनमें अपने नागरिकों के प्रति राज्य के दायित्वों और राज्य के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।इन अनुच्छेदों में सरकार के द्वारा नीति-निर्माण तथा नागरिकों के आचार एवं व्यवहार के संबंध में एक संवैधानिक अधिकार विधेयक शामिल है। ये अनुच्छेद संविधान के आवश्यक तत्व माने जाते हैं, जिसे भारतीय संविधान सभा द्वारा 1947 से 1949 के बीच विकसित किया गया था।

मूल अधिकारों को सभी नागरिकों के बुनियादी मानव अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के भाग III में परिभाषित ये अधिकार नस्ल, जन्म स्थान, जाति, पंथ या लिंग के भेद के बिना सभी पर लागू होते हैं। ये विशिष्ट प्रतिबंधों के अधीन अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत सरकार द्वारा कानून बनाने के लिए दिशानिदेश हैं। संविधान के भाग IV में वर्णित ये प्रावधान अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन जिन सिद्धांतों पर ये आधारित हैं, वे शासन के लिए मौलिक दिशानिदेश हैं जिनको राज्य द्वारा कानून तैयार करने और पारित करने में लागू करने की आशा की जाती है।

मौलिक कर्तव्यों को देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने तथा भारत की एकता को बनाए रखने के लिए भारत के सभी नागरिकों के नैतिक दायित्वों के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के चतुर्थ भाग में वर्णित ये कर्तव्य व्यक्तियों और राष्ट्र से संबंधित हैं। निदेशक सिद्धांतों की तरह, इन्हें कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

 

इतिहास

इन्हें भी देखें: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एवं भारतीय संविधान सभा

मूल अधिकारों और निदेशक सिद्धांतों का मूल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में था, जिसने स्वतंत्र भारत के लक्ष्य के रूप में समाज कल्याण और स्वतंत्रता के मूल्यों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया।[2] भारत में संवैधानिक अधिकारों का विकास इंग्लैंड के अधिकार विधेयक, अमेरिका के अधिकार विधेयक तथा फ्रांस द्वारा मनुष्य के अधिकारों की घोषणा से प्रेरित हुआ।[3] ब्रिटिश शासकों और उनकी भारतीय प्रजा के बीच भेदभाव का अंत करने के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी (INC)) के एक उद्देश्य के साथ-साथ नागरिक अधिकारों की मांग भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। आईएनसी (INC) द्वारा 1917 से 1919 के बीच अपनाए गए संकल्पों में इस मांग का स्पष्ट उल्लेख किया गया था।[4] इन संकल्पों में व्यक्त की गई मांगों में भारतीयों को कानूनी रूप से बराबरी का अधिकार, बोलने का अधिकार, मुकदमों की सुनवाई करने वाली जूरी में कम से कम आधे भारतीय रखने, रीजनीतिक शक्ति तथा ब्रिटिश नागरिकों के समान हथियार रखने का अधिकार देना शामिल था।[5]

प्रथम विश्व युद्ध के अनुभवों, 1919 के असंतोषजनक मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधारों सुधार और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एम। के। गांधी उभरते प्रभाव के कारण नागरिक अधिकारों के लिए मांगें तय करने के संबंध में उनके नेताओं के दृष्टिकोण में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। उनका ध्यान भारतीयों और अंग्रेजों के बीच समानता का अधिपकार मांगने से हट कर सभी भारतीयों के लिए स्वतंत्रता सुनिश्चित करने पर केंद्रित हो गया।[6] 1925 में एनी बीसेंट द्वारा तैयार किए गए भारत के राष्ट्रमंडल विधेयक में सात मूल अधिकारों की विशेष रूप से मांग की गई थी – व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विवेक की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एकत्र होने की स्वतंत्रता, लिंग के आधार पर भेद-भाव न करने, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग की स्वतंत्रता।[7] 1927 में, कांग्रेस ने उत्पीड़न के खिलाफ निगरानी प्रदान करने वाले अधिकारों की घोषणा के आधार पर, भारत के लिए स्वराज संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति के गठन का संकल्प लिया। 1928 में मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में एक 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया। अपनी रिपोर्ट में समिति ने सभी भारतीयों के लिए की मूल अधिकारों की गारंटी सहित अनेक सिफारिशें की थीं। ये अधिकार अमेरिकी संविधान और युद्ध के बाद यूरोपीय देशों द्वारा अपनाए गए अधिकारों से मिलते थे तथा उन में से कई 1925 के विधेयक से अपनाए गए थे। इन प्रावधानों के अनेकों को बाद में मूल अधिकारों एवं निदेशक सिद्धांतों सहित भारत के संविधान के विभिन्न भागों में ज्यों का त्यों शामिल कर लिया गया था।[8]

1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कराची अधिवेशन में शोषण का अंत करने, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने और भूमि सुधार लागू करने के घोषित उद्देश्यों के साथ स्वयं को नागरिक अधिकारों तथा आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के प्रति समर्पित करने का एक संकल्प पारित किया। इस संकल्प में प्रस्तावित अन्य नए अधिकारों में राज्य के स्वामित्व का निषेध, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, मृत्युदंड का उन्मूलन तथा तथा आवागमन की स्वतंत्रता शामिल थे।[9] जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किए गए संकल्प के मसौदे, जो बाद में कई निदेशक सिद्धांतों का आधार बना, में सामाजिक सुधार लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य पर डाली गई और इसी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन पर समाजवाद तथा गांधी दर्शन के बढ़ते प्रभाव के चिह्न दिखाई देने लगे थे।[10] स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में 1930 के दशक के समाजवादी सिद्धांतों की पुनरावृत्ति दिखाई देने के साथ ही मुख्य ध्यान का केंद्र अल्पसंख्यक अधिकार – जो उस समय तक एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था – बन गए जिन्हें 1945 में सप्रू रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया था। रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने पर जोर देने के अलावा “विधायिकाओं, सरकार और अदालतों के लिए ऐचरण के मानक” निर्धारित करने की भी मांग की गई थी।[11]

अंग्रेजी राज के अंतिम चरण के दौरान, भारत के लिए 1946 के कैबिनेट मिशन ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के भाग के रूप में भारत के भारत के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए संविधान सभा का एक मसौदा तैयार किया।[12] ब्रिटिश प्रांतों तथा राजसी रियासतों से परोक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों से बनी भारत की संविधान सभा ने दिसंबर 1946 में अपनी कार्यवाही आरंभ की और नवंबर 1949 में भारत के संविधान का मसौदा पूर्ण किया।[13] कैबिनेट मिशन की योजना के मुताबिक, मूल अधिकारों की प्रकृति और सीमा, अल्पसंख्यकों की रक्षा तथा आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिए सलाह देने हेतु सभा को सलाह देने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन होना था। तदनुसार, जनवरी 1947 में एक 64 सदस्यीय सलाहकार समिति का गठन किया गया, इनमें से ही फरवरी 1947 में मूल अधिकारों पर जे। बी। कृपलानी की अध्यक्षता में एक 12 सदस्यीय उप-समिति का गठन किया गया।[14] उप समिति ने मूल अधिकारों का मसौदा तैयार किया और समिति को अप्रैल 1947 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करदी और बाद में उसी महीने समिति ने इसको सभा के सामने प्रस्तुत कर दिया, जिसमें अगले वर्ष तक बहस और चर्चाएं हुईं तथा दिसंबर 1948 मे अधिकांश मसौदे को स्वाकार कर लिया गया।[15] मूल अधिकारों का आलेखन संयुक्त राष्ट्र महासंघ द्वारा मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार करने, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की गतिविधियों[16] के साथ ही साथ अमेरिकी संविधान में अधिकार विधेयक की व्याख्या में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों से प्रभावित हुआ था।[17] निदेशक सिद्धांतों का मसौदे, जिसे भी मूल अधिकारों पर बनी उप समिति द्वारा ही तैयार किया गया था, में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समाजवादी उपदेशों का समावेश किया गया था और वह आयरिश संविधान में विद्यमान ऐसे ही सिद्धांतों से प्रेरित था।[18] मौलिक कर्तव्य बाद में 1976 में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए थे।[19]

 

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत

संविधान के चतुर्थ भाग में सन्निहित राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों, में संविधान की प्रस्तावना में प्रस्तावित आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र की स्थापना हेतु मार्गदर्शन के लिए राज्य को निदेश uदिए गए हैं।[76] वे संविधान सभा द्वारा भारत में परिकल्पित सामाजिक क्रांति के लक्ष्य रहे मानवीय और समाजवादी निदेशों को बताते हैं।[77] राज्य से यह अपेक्षा की गई है कि हालांकि ये प्रकृति में न्यायोचित नहीं हैं, कानून और नीतियां बनाते समय इन सिद्धांतों को ध्यान में रखा जाएगा। निदेशक सिद्धांतों को निम्नलिखित श्रेणियों के अंतर्गत वर्गीकृत किया जा सकता है: वे आदर्श जिन्हें प्राप्त करने के लिए राज्य को प्रयास करने चाहिएं; विधायी और कार्यकारी शक्तियों के प्रयोग के लिHKïए निदेश और नागरिकों के अधिकार जिनकी सुरक्षा करना राज्य का लक्ष्य होना चाहिए।[76]

न्यायोचित न होने के बावजूद निदेशक सिद्धांत राज्य पर एक रोक का काम करते हैं; इन्हें मतदाताओं एवं विपक्ष के हाथों में एक मानदंड के रूप में माना गया है जिससे वे चुनाव के समय सरकार के कार्यप्रदर्शन को माप सकें।[78] अनुच्छेद 37, यह बताते हुए कि निदेशक सिद्धांत कानून की किसी भी अदालत में प्रवर्तनीय नहीं हैं, उन्हें “देश के शासन के लिए बुनियादी” घोषित करता है और विधान के मामलों में इन्हें लागू करने का दायित्व भी राज्य पर डालता है।[79] इस प्रकार वे संविधान के कल्याणकारी राज्य के मॉडल पर जोर देने का काम करते हैं और सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय को स्वीकार करते हुए लोगों के कल्याण को प्रोत्साहन देने के लिए, साथ ही अनुच्छेद 38 के अनुसार आय असमानता से लड़ने और व्यक्तिगत गरिमा को सुनिश्चित करने के लिए राज्य के सकारात्मक कर्तव्यों पर जोर देते हैं।[80][81]

अनुच्छेद 39 राज्य द्वारा अपनाई जाने वाली नीतियों के कुछ सिद्धांत तय करता है, जिनमें सभी नागरिकों के लिए आजीविका के पर्याप्त साधन प्रदान करना, स्त्री और पुरुषों के लिए समान कार्य के लिए समान वेतन, उचित कार्य दशाएं, कुछ ही लोगों के पास धन तथा उत्पादन के साधनों के संकेंद्रन में कमी लाना और सामुदायिक संसाधनों का “सार्वजनिक हित में सहायक होने” के लिए वितरण करना शामिल हैं।[82] ये धाराएं, राज्य की सहायता से सामाजिक क्रांति लाकर, एक समतावादी सामाजिक व्यवस्था बनाने तथा एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करने के संवैधानिक उद्देश्यों को चिह्नांकित करती हैं और इनका खनिज संसाधनों के साथ-साथ सार्वजनिक सुविधाओं के राष्ट्रीयकरण को समर्थन देने के लिए उपयोग किया गया है।[83] इसके अलावा, भूसंसाधनों के न्यायसंगत वितरण के सुनिश्चित करने के लिए, संघीय एवं राज्य सरकारों द्वारा कृषि सुधारों और भूमि पट्टों के कई अधिनियम बनाए गए हैं।[84]

अनुच्छेद 41-43 जनादेश राज्य को सभी नागरिकों के लिए काम का अधिकार, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा, मातृत्व राहत और एक शालीन जीवन स्तर सुरक्षित करने के प्रयास करने के अधिकार देते हैं।[85] इन प्रावधानों का उद्देश्य प्रस्तावना में परिकल्पित एक समाजवादी की राज्य की स्थापना करना है।[86] अनुच्छेद 43 भी राज्य को कुटीर उद्योगों को प्रोत्साहन देने की जिम्मेदारी देता है और इसको आगे बढ़ाते हुए संघीय सरकार ने राज्य सरकारों के समन्वय से खादी, हैंडलूम आदि को प्रोत्साहन देने के लिए अनेक बोर्डों की स्थापना की है।[87] अनुच्छेद 39ए के अनुसार राज्य को आर्थिक अथवा अन्य अयोग्यताओं पर ध्यान दिए बिना निशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करवाकर यह सुनिश्चित करना है कि सभी नागरिकों को न्याय प्राप्त करने के अवसर मिलें।[88] अनुच्छेद 43ए राज्य को उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में काम करने के लिए अधिकार देता है।[86] अनुच्छेद 46 के तहत, राज्य को अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों के हितों को प्रोत्साहन देने और उनके आर्थिक स्तर को ऊपर उठाने के लिए काम करने और उन्हें भैद-भाव तथा शोषण से बचाने का अधिकार दिया गया है। इस प्रावधान को प्रभावी बनाने के लिए दो संविधान संशोधनों सहित कई अधिनियम बनाए गए हैं।[89]

अनुच्छेद 44 देश में वर्तमान में लागू विभिन्न निजी कानूनों में विसंगतियों को दूर करके सभी नागरिकों के लिए समान नगगरिक संहिता बनाने के लिए राज्य को प्रोत्साहित करता है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रावधानों को लागू करने के लिए अनेक अनुस्मारक दिए जाने के बावजूद यह एक अंधपत्र होकर रह गया है।[90] अनुच्छेद 45 द्वारा मूल रूप में राज्य को 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को निशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने का अधिकार दिया गया था;[91] लेकिन बाद में 2002 में 86वें संविधान संशोधन के बाद इसे मूल अधिकार में परिवर्तित कर दिया गया है और छः वर्ष तक की आयु के बच्चों के बचपन की देखभाल सुनिश्चित करने का दायित्व राज्य पर डाला गया है।[52] अनुच्छेद 47 जीवन स्तर ऊंचा उठाने, सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार करने तथा स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नशीले पेय और दवाओं के सेवन पर रोक लगाने की प्रतिबद्धता राज्य को सौंपी गई है।[92] परिणाम के रूप में कई राज्यों में आंशिक या संपूर्ण निषेध लागू कर दिया गया है, लेकिन वित्तीय मजबूरियों ने इसको पूर्ण रूप से लागू करने से रोक रखा है।[93] अनुच्छेद 48 के द्वारा भी राज्य को नस्ल सुधार कर तथा पशुवध पर रोक लगा कर आधुनिक एवं वैज्ञानिक तरीके से कृषि और पशुपालन को संगठित करने की जिम्मेदारी दी गई है।[94] अनुच्छेद 48ए राज्य को पर्यावरण की रक्षा और वनों तथा वन्यजीवों के संरक्षण का आदेश देता है, जबकि अनुच्छेद 49 राष्ट्रीय महत्त्व के स्मारकों और वस्तुओं का संरक्षण सुनिश्चित करने का दायित्व राज्य को सौंपता है।[95] अनुच्छेद 50 के अनुसार राज्य को न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक सेवाओं में न्यायपालिका का कार्यपालिका से अलगाव सुनिश्चित करना है और संघीय कानून बनाकर इस उद्देश्य को प्राप्त कर लिया गया है।[96][97] अनुच्छेद 51 के अनुसार, राज्य को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के संवर्धन हेतु प्रयास करने चाहिएं तथआ अनुच्छेद 253 के द्वारा संसद को अंतर्राष्ट्रीय संधियां लागू करने के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया है।

 

बाबा साहब डॉ अम्बेडकर ने बौद्ध धम्म से प्रेरित भारत के संविधान में नागरिकों के ये मूल अधिकार दिए हैं :- 1-समानता का अधिकार 2-स्वतंत्रता का अधिकार 3-शोषण के खिलाफ अधिकार 4-धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार 5-सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार 6-संवैधानिक उपचारों का अधिकार…बोधिसत्व एसo जाटव

 

मूल अधिकार, राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व और मूल कर्तव्य[1] भारत के संविधान के अनुच्छेद हैं जिनमें अपने नागरिकों के प्रति राज्य के दायित्वों और राज्य के प्रति नागरिकों के कर्तव्यों का वर्णन किया गया है।इन अनुच्छेदों में सरकार के द्वारा नीति-निर्माण तथा नागरिकों के आचार एवं व्यवहार के संबंध में एक संवैधानिक अधिकार विधेयक शामिल है। ये अनुच्छेद संविधान के आवश्यक तत्व माने जाते हैं, जिसे भारतीय संविधान सभा द्वारा 1947 से 1949 के बीच विकसित किया गया था।

मूल अधिकारों को सभी नागरिकों के बुनियादी मानव अधिकार के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के भाग III में परिभाषित ये अधिकार नस्ल, जन्म स्थान, जाति, पंथ या लिंग के भेद के बिना सभी पर लागू होते हैं। ये विशिष्ट प्रतिबंधों के अधीन अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय हैं।

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत सरकार द्वारा कानून बनाने के लिए दिशानिदेश हैं। संविधान के भाग IV में वर्णित ये प्रावधान अदालतों द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, लेकिन जिन सिद्धांतों पर ये आधारित हैं, वे शासन के लिए मौलिक दिशानिदेश हैं जिनको राज्य द्वारा कानून तैयार करने और पारित करने में लागू करने की आशा की जाती है।

मौलिक कर्तव्यों को देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने तथा भारत की एकता को बनाए रखने के लिए भारत के सभी नागरिकों के नैतिक दायित्वों के रूप में परिभाषित किया गया है। संविधान के चतुर्थ भाग में वर्णित ये कर्तव्य व्यक्तियों और राष्ट्र से संबंधित हैं। निदेशक सिद्धांतों की तरह, इन्हें कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

 

इतिहास

इन्हें भी देखें: भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन एवं भारतीय संविधान सभा

मूल अधिकारों और निदेशक सिद्धांतों का मूल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में था, जिसने स्वतंत्र भारत के लक्ष्य के रूप में समाज कल्याण और स्वतंत्रता के मूल्यों को प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया।[2] भारत में संवैधानिक अधिकारों का विकास इंग्लैंड के अधिकार विधेयक, अमेरिका के अधिकार विधेयक तथा फ्रांस द्वारा मनुष्य के अधिकारों की घोषणा से प्रेरित हुआ।[3] ब्रिटिश शासकों और उनकी भारतीय प्रजा के बीच भेदभाव का अंत करने के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आईएनसी (INC)) के एक उद्देश्य के साथ-साथ नागरिक अधिकारों की मांग भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा थी। आईएनसी (INC) द्वारा 1917 से 1919 के बीच अपनाए गए संकल्पों में इस मांग का स्पष्ट उल्लेख किया गया था।[4] इन संकल्पों में व्यक्त की गई मांगों में भारतीयों को कानूनी रूप से बराबरी का अधिकार, बोलने का अधिकार, मुकदमों की सुनवाई करने वाली जूरी में कम से कम आधे भारतीय रखने, रीजनीतिक शक्ति तथा ब्रिटिश नागरिकों के समान हथियार रखने का अधिकार देना शामिल था।[5]

प्रथम विश्व युद्ध के अनुभवों, 1919 के असंतोषजनक मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधारों सुधार और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एम। के। गांधी उभरते प्रभाव के कारण नागरिक अधिकारों के लिए मांगें तय करने के संबंध में उनके नेताओं के दृष्टिकोण में उल्लेखनीय परिवर्तन आया। उनका ध्यान भारतीयों और अंग्रेजों के बीच समानता का अधिपकार मांगने से हट कर सभी भारतीयों के लिए स्वतंत्रता सुनिश्चित करने पर केंद्रित हो गया।[6] 1925 में एनी बीसेंट द्वारा तैयार किए गए भारत के राष्ट्रमंडल विधेयक में सात मूल अधिकारों की विशेष रूप से मांग की गई थी – व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विवेक की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, एकत्र होने की स्वतंत्रता, लिंग के आधार पर भेद-भाव न करने, अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा और सार्वजनिक स्थलों के उपयोग की स्वतंत्रता।[7] 1927 में, कांग्रेस ने उत्पीड़न के खिलाफ निगरानी प्रदान करने वाले अधिकारों की घोषणा के आधार पर, भारत के लिए स्वराज संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक समिति के गठन का संकल्प लिया। 1928 में मोतीलाल नेहरू के नेतृत्व में एक 11 सदस्यीय समिति का गठन किया गया। अपनी रिपोर्ट में समिति ने सभी भारतीयों के लिए की मूल अधिकारों की गारंटी सहित अनेक सिफारिशें की थीं। ये अधिकार अमेरिकी संविधान और युद्ध के बाद यूरोपीय देशों द्वारा अपनाए गए अधिकारों से मिलते थे तथा उन में से कई 1925 के विधेयक से अपनाए गए थे। इन प्रावधानों के अनेकों को बाद में मूल अधिकारों एवं निदेशक सिद्धांतों सहित भारत के संविधान के विभिन्न भागों में ज्यों का त्यों शामिल कर लिया गया था।[8]

1931 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने अपने कराची अधिवेशन में शोषण का अंत करने, सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने और भूमि सुधार लागू करने के घोषित उद्देश्यों के साथ स्वयं को नागरिक अधिकारों तथा आर्थिक स्वतंत्रता की रक्षा करने के प्रति समर्पित करने का एक संकल्प पारित किया। इस संकल्प में प्रस्तावित अन्य नए अधिकारों में राज्य के स्वामित्व का निषेध, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, मृत्युदंड का उन्मूलन तथा तथा आवागमन की स्वतंत्रता शामिल थे।[9] जवाहरलाल नेहरू द्वारा तैयार किए गए संकल्प के मसौदे, जो बाद में कई निदेशक सिद्धांतों का आधार बना, में सामाजिक सुधार लागू करने की प्राथमिक जिम्मेदारी राज्य पर डाली गई और इसी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन पर समाजवाद तथा गांधी दर्शन के बढ़ते प्रभाव के चिह्न दिखाई देने लगे थे।[10] स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम चरण में 1930 के दशक के समाजवादी सिद्धांतों की पुनरावृत्ति दिखाई देने के साथ ही मुख्य ध्यान का केंद्र अल्पसंख्यक अधिकार – जो उस समय तक एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका था – बन गए जिन्हें 1945 में सप्रू रिपोर्ट में प्रकाशित किया गया था। रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा करने पर जोर देने के अलावा “विधायिकाओं, सरकार और अदालतों के लिए ऐचरण के मानक” निर्धारित करने की भी मांग की गई थी।[11]

अंग्रेजी राज के अंतिम चरण के दौरान, भारत के लिए 1946 के कैबिनेट मिशन ने सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया के भाग के रूप में भारत के भारत के लिए संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए संविधान सभा का एक मसौदा तैयार किया।[12] ब्रिटिश प्रांतों तथा राजसी रियासतों से परोक्ष रूप से चुने हुए प्रतिनिधियों से बनी भारत की संविधान सभा ने दिसंबर 1946 में अपनी कार्यवाही आरंभ की और नवंबर 1949 में भारत के संविधान का मसौदा पूर्ण किया।[13] कैबिनेट मिशन की योजना के मुताबिक, मूल अधिकारों की प्रकृति और सीमा, अल्पसंख्यकों की रक्षा तथा आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के लिए सलाह देने हेतु सभा को सलाह देने के लिए एक सलाहकार समिति का गठन होना था। तदनुसार, जनवरी 1947 में एक 64 सदस्यीय सलाहकार समिति का गठन किया गया, इनमें से ही फरवरी 1947 में मूल अधिकारों पर जे। बी। कृपलानी की अध्यक्षता में एक 12 सदस्यीय उप-समिति का गठन किया गया।[14] उप समिति ने मूल अधिकारों का मसौदा तैयार किया और समिति को अप्रैल 1947 तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करदी और बाद में उसी महीने समिति ने इसको सभा के सामने प्रस्तुत कर दिया, जिसमें अगले वर्ष तक बहस और चर्चाएं हुईं तथा दिसंबर 1948 मे अधिकांश मसौदे को स्वाकार कर लिया गया।[15] मूल अधिकारों का आलेखन संयुक्त राष्ट्र महासंघ द्वारा मानव अधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को स्वीकार करने, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग की गतिविधियों[16] के साथ ही साथ अमेरिकी संविधान में अधिकार विधेयक की व्याख्या में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों से प्रभावित हुआ था।[17] निदेशक सिद्धांतों का मसौदे, जिसे भी मूल अधिकारों पर बनी उप समिति द्वारा ही तैयार किया गया था, में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समाजवादी उपदेशों का समावेश किया गया था और वह आयरिश संविधान में विद्यमान ऐसे ही सिद्धांतों से प्रेरित था।[18] मौलिक कर्तव्य बाद में 1976 में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए थे।[19]

मूल अधिकार

संविधान के भाग III में सन्निहित मूल अधिकार, सभी भारतीयों के लिए नागरिक अधिकार सुनिश्चित करते हैं और सरकार को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने से रोकने के साथ नागरिकों के अधिकारों की समाज द्वारा अतिक्रमण से रक्षा करने का दायित्व भी राज्य पर डालते हैं।[20] संविधान द्वारा मूल रूप से सात मूल अधिकार प्रदान किए गए थे- समानता का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, शोषण के विरुद्ध अधिकार, धर्म, संस्कृति एवं शिक्षा की स्वतंत्रता का अधिकार, संपत्ति का अधिकार तथा संवैधानिक उपचारों का अधिकार।[21] हालांकि, संपत्ति के अधिकार को 1978 में 44वें संशोधन द्वारा संविधान के तृतीय भाग से हटा दिया गया था।[22][note 2]

मूल अधिकारों का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा समाज के सभी सदस्यों की समानता पर आधारित लोकतांत्रिक सिद्धांतों की रक्षा करना है।[23] वे, अनुच्छेद 13 के अंतर्गत विधायिका और कार्यपालिका की शक्तियों की परिसीमा के रूप में कार्य करते हैं[note 3]और इन अधिकारों का उल्लंघन होने पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तथा राज्यों के उच्च न्यायालयों को यह अधिकार है कि ऐसे किसी विधायी या कार्यकारी कृत्य को असंवैधानिक और शून्य घोषित कर सकें।[24] ये अधिकार राज्य, जिसमें अनुच्छेद 12 में दी गई व्यापक परिभाषा के अनुसार न केवल संघीय एवं राज्य सरकारों की विधायिका एवं कार्यपालिका स्कंधों बल्कि स्थानीय प्रशासनिक प्राधिकारियों तथा सार्वजनिक कार्य करने वाली या सरकारी प्रकृति की अन्य एजेंसियों व संस्थाओं के विरुद्ध बड़े पैमाने पर प्रवर्तनीय हैं।[25] हालांकि, कुछ अधिकार – जैसे कि अनुच्छेद 15, 17, 18, 23, 24 में – निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी उपलब्ध हैं।[26] इसके अलावा, कुछ मूल अधिकार – जो अनुच्छेद 14, 20, 21, 25 में उपलब्ध हैं, उन सहित – भारतीय भूमि पर किसी भी राष्ट्रीयता वाले व्यक्ति पर लागू होते हैं, जबकि अन्य – जैसे जो अनुच्छेद 15, 16, 19, 30 के अंतर्गत उपलब्ध है – केवल भारतीय नीगरिकों पर लागू होते हैं।[27][28]
मूल अधिकार संपूर्ण नहीं होते तथा वे सार्वजनिक हितों की रक्षा के लिए आवश्यक उचित प्रतिबंधों के अधीन होते हैं।[25] 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार के मामले में[note 4] सर्वोच्च न्यायालय ने अपने 1967 के पूर्व निर्णय को रद्द करते हुए निर्णय दिया कि मूल अधिकारों में संशोधन किया जा सकता है, यदि इस तरह के किसी संशोधन से संविघान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन होता हो, तो न्यायिक समीक्षा के अधीन।[29] मूल अधिकारों को संसद के प्रत्येक सदन में दो तिहाई बहुमत से पारित संवैधानिक संशोधन के द्वारा बढ़ाया, हटाया जा सकता है या अन्यथा संशोधित किया जा सकता है।[30] आपात स्थिति लागू होने की स्थिति में अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर शेष मूल अधिकारों में से किसी को भी राष्ट्रपति के आदेश द्वारा अस्थाई रूप से निलंबित किया जा सकता है।[31] आपातकाल की अवधि के दौरान राष्ट्रपति आदेश देकर संवैधानिक उपचारों के अधिकारों को भी निलंबित कर सकते हैं, जिसके परिणामस्वरूप सिवाय अनुच्छेद 20 व 21 के किसी भी मूल अधिकार के प्रवर्तन हेतु नागरिकों के सर्वोच्च न्यायालय में जाने पर रोक लग जाती है।[32] संसद भी अनुच्छेद 33 के अंतर्गत कानून बना कर, उनकी सेवाओं का समुचित निर्वहन सुनिश्चित करने तथा अनुशासन के रखरखाव के लिए भारतीय सशस्त्र सेनाओं और पुलिस बल के सदस्यों के मूल अधिकारों के अनुप्रयोग को प्रतिबंधित कर सकती है।[33]

समानता का अधिकार

समानता का अधिकार संविधान की प्रमुख गारंटियों में से एक है। यह अनुच्छेद 14-16 में सन्निहित हैं जिसमें सामूहिक रूप से कानून के समक्ष समानता तथा गैर-भेदभाव के सामान्य सिद्धांत शामिल हैं,[34] तथा अनुच्छेद 17-18 जो सामूहिक रूप से सामाजिक समानता के दर्शन को आगे बढ़ाते हैं।[35] अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, इसके साथ ही भारत की सीमाओं के अंदर सभी व्यक्तियों को कानून का समान संरक्षण प्रदान करता है।[note 5] इस में कानून के प्राधिकार की अधीनता सबके लिए समान है, साथ ही समान परिस्थितियों में सबके साथ समान व्यवहार।[36] उत्तरवर्ती में राज्य वैध प्रयोजनों के लिए व्यक्तियों का वर्गीकरण कर सकता है, बशर्ते इसके लिए यथोचित आधार मौजूद हो, जिसका अर्थ है कि वर्गीकरण मनमाना न हो, वर्गीकरण किये जाने वाले लोगों में सुगम विभेदन की एक विधि पर आधारित हो, साथ ही वर्गीकरण के द्वारा प्राप्त किए जाने वाले प्रयोजन का तर्कसंगत संबंध होना आवश्यक है।[37]

अनुच्छेद 15 केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्म स्थान, या इनमें से किसी के ही आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है। अंशतः या पूर्णतः राज्य के कोष से संचालित सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों या सार्वजनिक रिसोर्ट में निशुल्क प्रवेश के संबंध में यह अधिकार राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी प्रवर्तनीय है।[38] हालांकि, राज्य को महिलाओं और बच्चों या अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति सहित सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है। इस अपवाद का प्रावधान इसलिए किया गया है क्योंकि इसमें वर्णित वर्गो के लोग वंचित माने जाते हैं और उनको विशेष संरक्षण की आवस्यकता है।[39] अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के संबंध में अवसर की समानता की गारंटी देता है और राज्य को किसी के भी खिलाफ केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है। किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों का सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनुश्चित करने के लिए उनके लाभार्थ सकारात्मक कार्रवाई के उपायों के कार्यान्वयन हेतु अपवाद बनाए जाते हैं, साथ ही किसी धार्मिक संस्थान के एक पद को उस धर्म का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के लिए आरक्षित किया जाता है।[40]

अस्पृश्यता की प्रथा को अनुच्छेद 17 के अंतर्गत एक दंडनीय अपराध घोषित कर किया गया है, इस उद्देश्य को आगे बढ़ाते हुए नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है।[35] अनुच्छेद 18 राज्य को सैन्य या शैक्षणिक विशिष्टता को छोड़कर किसी को भी कोई पदवी दे्ने से रोकता है तथा कोई भी भारतीय नागरिक किसी विदेशी राज्य से कोई पदवी स्वीकार नहीं कर सकता। इस प्रकार, भारतीय कुलीन उपाधियों और अंग्रेजों द्वारा प्रदान की गई और अभिजात्य उपाधियों को समाप्त कर दिया गया है। हालांकि, भारत रत्न पुरस्कारों जैसे, भारतरत्न को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस आधार पर मान्य घोषित किया गया है कि ये पुरस्कार मात्र अलंकरण हैं और प्रप्तकर्ता द्वारा पदवी के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।[41][42]

स्वतंत्रता का अधिकार

संविधान के निर्माताओं द्वारा महत्वपूर्ण माने गए व्यक्तिगत अधिकारों की गारंटी देने की दृष्टि से स्वतंत्रता के अधिकार को अनुच्छेद 19-22 में शामिल किया गया है और इन अनुच्छेदों में कुछ प्रतिबंध भी शामिल हैं जिन्हें विशेष परिस्थितियों में राज्य द्वारा व्यक्तिगं स्वतंत्रता पर लागू किया जा सकता है। अनुच्छेद 19 नागरिक अधिकारों के रूप में छः प्रकार की स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है जो केवल भारतीय नागरिकों को ही उपलब्ध हैं।[43] इनमें शामिल हैं(19 अ ) भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, (19 ब ) शांतिपूर्वक बिना हथियारों के एकत्रित होने और सभा करने की स्वतंत्रता , भारत के राज्यक्षेत्र में कहीं भी आने-जाने की स्वतंत्रतता, भारत के किसी भी भाग में बसने और निवास करने की स्वतंत्रता तथा कोई भी पेशा अपनाने की स्वतंत्रता। ये सभी स्वतंत्रताएं अनुच्छेद 19 में ही वर्णित कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन होती हैं, दिन्हें राज्य द्वारा उन पर लागू किया जा सकता है। किस स्वतंत्रता को प्रतिबंधित किया जाना प्रस्तावित है, इसके आधार पर प्रतिबंधों को लागू करने के आधार बदलते रहते हैं, इनमें शामिल हैं राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता और नैतिकता, न्यायालय की अवमानना, अपराधों को भड़काना और मानहानि। आम जनता के हित में किसी व्यापार, उद्योग या सेवा का नागरिकों के अपवर्जन के लिए राष्ट्रीयकरण करने के लिए राज्य को भी सशक्त किया गया है।[44]

अनुच्छेद 19 द्वारा गारंटीशुदा स्वतंत्रताओं की आगे अनुच्छेद 20-22 द्वारा रक्षा की जाती है।[45] इन अनुच्छेदों के विस्तार, विशेष रूप से निर्धारित प्रक्रिया के सिद्धांत के संबंध में, पर संविधान सभा में भारी बहस हुई थी। विशेष रूप से बेनेगल नरसिंह राव ने यह तर्क दिया कि ऐसे प्रावधान को लागू होने से सामाजिक कानूनों में बाधा आएगी तथा व्यवस्था बनाए रखने में प्रक्रियात्मक कठिनाइयां उत्पन्न होंगी, इसलिए इसे पूरी तरह संविधान से बाहर ही रखा जाए।[46] संविधान सभा ने 1948 में अंततः “निर्धारित प्रक्रिया” शब्दों को हटा दिया और उनके स्थान पर “कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया” को शामिल कर लिया।[47] परिणाम के रूप में एक, अनुच्छेद 21,यह जापान से लिया गया है। जो विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार होने वाली कार्यवाही को छोड़ कर, जीवन या व्यक्तिगत संवतंत्रता में राज्य के अतिक्रमण से बचाता है,[note 6] के अर्थ को 1978 तक कार्यकारी कार्यवाही तक सीमित समझा गया था। हालांकि, 1978 में, मेनका गांधी बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के संरक्षण को विधाई कार्यवाही तक बढ़ाते हुए निर्णय दिया कि किसी प्रक्रिया को निर्धारित करने वाला कानून उचित, निष्पक्ष और तर्कसंगत होना चाहिए,[48] और अनुच्छेद 21 में निर्धारित प्रक्रिया को प्रभावी ढंग से पढ़ा।[49] इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21 के अंतर्गत “जीवन” का अर्थ मात्र एक “जीव के अस्तित्व” से कहीं अधिक है; इसमें मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार तथा वे सब पहलू जो जीवन को “अर्थपूर्ण, पूर्ण तथा जीने योग्य” बनाते हैं, शामिल हैं।[50] इस के बाद की न्यायिक व्याख्याओं ने अनुच्छेद 21 के अंदर अनेक अधिकारों को शामिल करते हुए इसकी सीमा का विस्तार किया है जिनमें शामिल हैं आजीविका, स्वच्छ पर्यावरण, अच्छा स्वास्थ्य, अदालतों में तेवरित सुनवाई तथा कैद में मानवीय व्यवहार से संबंधित अधिकार। [51] प्राथमिक स्तर पर शिक्षा के अधिकार को 2002 के 86वें संवैधानिक संशोधन द्वारा अनुच्छेद 21ए में मूल अधिकार बनाया गया है।[52]

अनुच्छेद 20 अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण प्रदान करता है, जिनमें शामिल हैं पूर्वव्यापी कानून व दोहरे दंड के विरुद्ध अधिकार तथा आत्म-दोषारोपण से स्वतंत्रता प्रदान करता है।[53] अनुच्छेद 22 गिरफ्तार हुए और हिरासत में लिए गए लोगों को विशेष अधिकार प्रदान करता है, विशेष रूप से गिरफ्तारी के आधार सूचित किए जाने, अपनी पसंद के एक वकील से सलाह करने, गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर एक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने और मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना उस अवधि से अधिक हिरासत में न रखे जाने का अधिकार।[54] संविधान राज्य को भी अनुच्छेद 22 में उपलब्ध रक्षक उपायों के अधीन, निवारक निरोध के लिए कानून बनाने के लिए अधिकृत करता है।[55] निवारक निरोध से संबंधित प्रावधानों पर संशयवाद तथा आशंकाओं के साथ चर्चा करने के बाद संविधान सभा ने कुछ संशोधनों के साथ 1949 में अनिच्छा के साथ अनुमोदन किया था।[56] अनुच्छेद 22 में प्रावधान है कि जब एक व्यक्ति को निवारक निरोध के किसी भी कानून के तहत हिरासत में लिया गया है, ऐसे व्यक्ति को राज्य केवल तीन महीने के लिए परीक्षण के बिना गिरफ्तार कर सकता है, इससे लंबी अवधि के लिए किसी भी निरोध के लिए एक सलाहकार बोर्ड द्वारा अधिकृत किया जाना आवश्यक है। हिरासत में लिए गए व्यक्ति को भी अधिकार है कि उसे हिरासत के आधार के बारे में सूचित किया जाएगा और इसके विरुद्ध जितना जल्दी अवसर मिले अभ्यावेदन करने की अनुमति दी जाएगी।[57]

शोषण के खिलाफ अधिकार

राइट्स के अंतर्गत शोषण के खिलाफ बाल श्रम और भिक्षुक निषिद्ध हो गए।

शोषण के विरुद्ध अधिकार, अनुच्छेद 23-24 में निहित हैं, इनमें राज्य या व्यक्तियों द्वारा समाज के कमजोर वर्गों का शोषण रोकने के लिए कुछ प्रावधान किए गए हैं।[58] अनुच्छेद 23 के प्रावधान के अनुसार मानव तस्करी को प्रतिबन्धित है, इसे कानून द्वारा दंडनीय अपराध बनाया गया है, साथ ही बेगार या किसी व्यक्ति को पारिश्रमिक दिए बिना उसे काम करने के लिए मजबूर करना जहां कानूनन काम न करने के लिए या पारिश्रमिक प्राप्त करने के लिए हकदार है, भी प्रतिबंधित किया गया है। हालांकि, यह राज्य को सार्वजनिक प्रयोजन के लिए सेना में अनिवार्य भर्ती तथा सामुदायिक सेवा सहित, अनिवार्य सेवा लागू करने की अनुमति देता है।[59][60] बंधुआ श्रम व्यवस्था (उन्मूलन) अधिनियम, 1976, को इस अनुच्छेद में प्रभावी करने के लिए संसद द्वारा अधिनियमित किया गया है।[61] अनुच्छेद 24 कारखानों, खानों और अन्य खतरनाक नौकरियों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर प्रतिबंध लगाता है। संसद ने बाल श्रम (निषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986 अधिनियमित किया है, जिसमें उन्मूलन के लिए नियम प्रदान करने और बाल श्रमिक को रोजगार देने पर दंड के तथा पूर्व बाल श्रमिकों के पुनर्वास के लिए भी प्रावधान दिए गए हैं।[62]

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार

भारत एक धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र है

धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार अनुच्छेद 25-28 में निहित है, जो सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और भारत में धर्मनिरपेक्ष राज्य सुनिश्चित करता है। संविधान के अनुसार, यहां कोई आधिकारिक राज्य धर्म नहीं है और राज्य द्वारा सभी धर्मों के साथ निष्पक्षता और तटस्थता से व्यवहार किया जाना चाहिए।[63] अनुच्छेद 25 सभी लोगों को विवेक की स्वतंत्रता तथा अपनी पसंद के धर्म के उपदेश, अभ्यास और प्रचार की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। हालांकि, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा राज्य की सामाजिक कल्याण और सुधार के उपाय करने की शक्ति के अधीन होते हैं।[64] हालांकि, प्रचार के अधिकार में किसी अन्य व्यक्ति के धर्मांतरण का अधिकार शामिल नहीं है, क्योंकि इससे उस व्यक्ति के विवेक के अधिकार का हनन होता है।[65] अनुच्छेद 26 सभी धार्मिक संप्रदायों तथा पंथों को सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता तथा स्वास्थ्य के अधीन अपने धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन करने, अपने स्तर पर धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाएं स्थापित करने और कानून के अनुसार संपत्ति रखने, प्राप्त करने और उसका प्रबंधन करने के अधिकार की गारंटी देता है। ये प्रावधान राज्य की धार्मिक संप्रदायों से संबंधित संपत्ति का अधिग्रहण करने की शक्ति को कम नहीं करते।[66] राज्य को धार्मिक अनुसरण से जुड़ी किसी भी आर्थिक, राजनीतिक या अन्य धर्मनिरपेक्ष गतिविधि का विनियमन करने की शक्ति दी गई है।[63] अनुच्छेद 27 की गारंटी देता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म या धार्मिक संस्था को बढ़ावा देने के लिए टैक्स देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।[67] अनुच्छेद 28 पूर्णतः राज्य द्वारा वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है तथा राज्य से वित्तीय सहायता लेने वाली शैक्षिक संस्थाएं, अपने किसी सदस्य को उनकी (या उनके अभिभावकों की) स्वाकृति के बिना धार्मिक शिक्षा प्राप्त करने या धार्मिक पूजा में भाग लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं।[63]

सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार

अनुच्छेद 29 व 30 में दिए गए सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार, उन्हें अपनी विरासत का संरक्षण करने और उसे भेदभाव से बचाने के लिए सक्षम बनाते हुए सांस्कृतिक, भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा के उपाय हैं।[68] अनुच्छेद 29 अपनी विशिष्ट भाषा, लिपि और संस्कृति रखने वाले नागरिकों के किसी भी वर्ग को उनका संरक्षण और विकास करने का अधिकार प्रदान करता है, इस प्रकार राज्य को उन पर किसी बाह्य संस्कृति को थोपने से रोकता है।[68][69] यह राज्य द्वारा चलाई जा रही या वित्तपोषित शैक्षिक संस्थाओं को, प्रवेश देते समय किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, भाषा या इनमें से किसी के आधार पर भेदभाव करने से भी रोकता है। हालांकि, यह सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए राज्य द्वारा उचित संख्या में सीटों के आरक्षण तथा साथ ही एक अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा चलाई जा रही शैक्षिक संस्था में उस समुदाय से संबंधिक नागरिकों के लिए 50 प्रतिशत तक सीटों के आरक्षण के अधीन है।[70]

अनुच्छेद 30 सभी धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को अपनी स्वयं की संस्कृति को बनाए रखने और विकसित करने के लिए अपनी पसंद की शैक्षिक संस्थाएं स्थापित करने और चलाने का अधिकार प्रदान करता है और राज्य को, वित्तीय सहायता देते समय किसी भी संस्था के साथ इस आधार पर कि उसे एक धार्मिक या सांस्कृतिक अल्पसंख्यक द्वारा चलाया जा रहा है, भेदभाव करने से रोकता है।[69] हालांकि शब्द “अल्पसंख्यक” को संविधान में परिभाषित नहीं किया गया है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई व्याख्या के अनुसार इसका अर्थ है कोई भी समुदाय जिसके सदस्यों की संख्या, जिस राज्य में अनुच्छेद 30 के अंतर्गत अधिकार चाहिए, उस राज्य की जनसंख्या के 50 प्रतिशत से कम हो। इस अधिकार का दावा करने के लिए, यह जरूरी है कि शैक्षिक संस्था को किसी धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा स्थापित और प्रशासित किया गया हो। इसके अलावा, अनुच्छेद 30 के तहत अधिकार का लाभ उठाया जा सकता है, भले ही स्थापित की गई शैक्षिक संस्था स्वयं को केवल संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय के धर्म या भाषा के शिक्षण तक सीमित नहीं रखती, या उस संस्था के अधिसंख्य छात्र संबंधित अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध नहीं रखते हों।[71] यह अधिकार शैक्षिक मानकों, कर्मचारियों की सेवा की शर्तों, शुल्क संरचना और दी गई सहायता के उपयोग के संबंध में उचित विनियमन लागू करने की राज्य की शक्ति के अधीन है।[72]

संवैधानिक उपचारों का अधिकार

संवैधानिक उपचारों का अधिकार नागरिकों को अपने मूल अधिकारों के प्रवर्तन या उल्लंघन के विरुद्ध सुरक्षा के लिए भारत के सर्वोच्च न्यायालय में जाने की शक्ति देता है।[73] अनुच्छेद 32 स्वयं एक मूल अधिकार के रूप में, अन्य मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए गारंटी प्रदान करता है, संविधान द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को इन अधिकारों के रक्षक के रूप में नामित किया गया है।[74] सर्वोच्च न्यायालय को मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, उत्प्रेषण और अधिकार पृच्छा प्रादेश (रिट, writ) जारी करने का अधिकार दिया गया है, जबकि उच्च न्यायालयों को अनुच्छेद 226 – जो एक मैलिक अधिकार नहीं है – मूल अधिकारों का उल्लंघन न होने पर भी इन विशेषाधिकार प्रादेशों को जारी करने का अधिकार दिया गया है।[75] निजी संस्थाओं के खिलाफ भी मूल अधिकार को लागू करना तथा उल्लंघन के मामले में प्रभावित व्यक्ति को समुचित मुआवजे का आदेश जारी करना भी सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकार में है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वप्रेरणा से या जनहित याचिका के आधार पर अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है।[73] अनुच्छेद 359 के प्रावधानों जबकि आपातकाल लागू हो, को छोड़कर यह अधिकार कभी भी निलंबित नहीं किया जा सकता।[74]

https://india.gov.in/hi/my-government/constitution-india/constitution-india-full-text