बौद्ध धम्म में सही गलत का फैसला कैसे करें ,कलमों सूत्र या सत्य की कसौटी क्या है?

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ईश्वर को देखे बिना मैं पूजा किसकी, कैसे और कहां करूं? जब ईश्वर को देखा ही नहीं तो पूजा करना ही क्यों? क्यों यह प्रश्न उठता है कि पूजा किसकी, कैसे और कहां करूं? यह तो अजीब बात हुई। यह तो वैसी बात हुई कि नंगा पूछे कि अगर नहाऊं तो फिर कपड़े कहां निचोडूं! और निचोड़ भी लूं तो फिर कपड़े सुखाऊं कहां!…OSHO

 ईश्वर को देखे बिना मैं पूजा किसकी, कैसे और कहां करूं? समझाने की अनुकंपा करें!_*

जागेश्वर,

जब ईश्वर को देखा ही नहीं तो पूजा करना ही क्यों? क्यों यह प्रश्न उठता है कि पूजा किसकी, कैसे और कहां करूं? यह तो अजीब बात हुई। यह तो वैसी बात हुई कि नंगा पूछे कि अगर नहाऊं तो फिर कपड़े कहां निचोडूं! और निचोड़ भी लूं तो फिर कपड़े सुखाऊं कहां!

जब तुम्हें ईश्वर का कोई बोध ही नहीं है, तो फिर पूजा कैसे करोगे? ईश्वर का बोध नहीं और आगे चले! यह तो शेखचिल्लीपन हुआ। लेकिन अक्सर शेखचिल्लीपन की बातें तत्वज्ञान मालूम होती हैं। तुमने जब पूछा होगा यह प्रश्न हो सोचा होगा तत्वज्ञान की बात पूछ रहे हो, बड़ी धार्मिक बात पूछ रहे हो! तुम बिलकुल ही व्यर्थ की बात पूछ रहे हो!

यह तो ऐसे ही जैसे कि मकान कभी बना ही नहीं, तो छप्पर पर क्या लगाना है–खपड़े लगाना कि एस्बेस्टस शीट चढ़ानी? और मकान बना ही नहीं, नींव भी रखी नहीं गई–और छप्पर का विचार कर रहे हो!

पूजा तो पीछे आएगी, पहले ईश्वर का बोध आना चाहिए। यह पूछो कि ईश्वर का बोध कैसे हो! अभी पूजा की बात ही क्यों उठाते हो? ईश्वर का बोध हो तो पूजा अपने आप आ जाती है, बच ही नहीं सकते। झुकना ही पड़ेगा।

मेरी उत्सुकता यहां तुम्हें पूजा सिखाने में नहीं है और न मैं कहता हूं–कैसे करो और कहां करो। कहां करोगे? जो भी करोगे, झूठ होगा। मंदिर जाओगे, झूठ; मस्जिद जाओगे, झूठ; गुरुद्वारा जाओगे, झूठ। ईश्वर का बोध पहले होना चाहिए, फिर मंदिर जाओ कि न जाओ, फिर जहां झुक जाओगे वहीं मंदिर है। फिर जहां मौन होकर उस परमात्मा का स्मरण करोगे, गदगद होओगे, भीगोगे–वहीं गुरुद्वारा! नहीं तो अभी तो सब गड़बड़ हो जाएगी।

कल मैं एक कविता पढ़ रहा था। तुमने कबीर का प्रसिद्ध सूत्र तो सुना ही है–गुरु गोविंद दोई खड़े, काके लागू पांव। बलिहारी गुरु आपकी गोविंद दियो बताए। इसको लोग दोहराते हैं। यह लोगों को कंठस्थ हो गया है। सूत्र प्यारा है। मगर यह मौका तुम्हें आता कहां कि गुरु गोविंद दोनों खड़े हों। पहले तो तुम किसी को गुरु ही स्वीकार नहीं करते, तो गोविंद के खड़े होने की तो बात ही दूर। मगर कल मैंने एक कविता पढ़ी, वह मुझे लगा कि ज्यादा समझदारी की है–

पत्नी प्रेयसी दोई खड़े काके लागूं पांव

बलिहारी गुरु आपकी दोइन दिए बताए।

यह मुझे ज्यादा जंचा कि यह बात ठीक है। यह जरा अनुभव की है। यह करीब-करीब सभी के अनुभव की है। कौन होगा अभागा, जिसको ऐसा अनुभव न हो, कि पति-पत्नी…सभी को यह अनुभव है। और फिर कोई मिल गए होंगे गुरुघंटाल, जिन्होंने कहा कि भैया दोनों ही के लग ले,जिसमें सार।

एक दिन मुल्ला नसरुद्दीन बहुत उदास बैठा था। मैंने पूछा, मामला क्या है? बड़े मियां, इतने उदास! क्या पत्नी ने फिर नौकरानी के साथ पकड़ लिया?

उसने कहा कि आज हद हो गई, आज बात और उलटी हो गई। मैंने कहा, क्या हुआ, इससे और क्या बुरा हो गया?

उसने कहा, आज नौकरानी ने पत्नी के साथ पकड़ लिया। और पत्नी तो फिर भी थोड़ी सुसंस्कृत है, नौकरानी तो नौकरानी है। उसने तो इतना हंगामा मचाया कि मुहल्ले भर को इकट्ठा कर दिया।

तुम पूछते हो जागेश्वर: “ईश्वर को देखे बिना मैं पूजा किसकी, कैसे और कहां करूं?’

करो ही मत पूजा। अभी करोगे भी कैसे? और जो भी करोगे झूठी होगी। इस पंचायत में पड़ना क्यों? अभी पूछो कि ईश्वर को कैसे जानो।

इसलिए मेरा जोर ध्यान पर है, पूजा पर नहीं। क्योंकि ध्यान से ईश्वर जाना जाता है। फिर ईश्वर की जरा भी पहचान हो जाए तो पूजा तो अपने आप आती है। आती है। न सीखनी पड़ती है, न सिखानी पड़ती है। जैसे बच्चा पैदा होता है तो जानता है कैसे दूध पीए मां का। कोई सिखाना पड़ता है? अगर छोटे-छोटे बच्चों को मां के पेट से पैदा हुए,पहले उनको सिखाओ कि बेटा ऐसे-ऐसे दूध पीना, ऐसे पीओगे तो ही बच पाओगे–तो बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाए। उनको समझाने में ही महीनों लग जाएं। उस बीच में उनका खात्मा ही हो जाए। वे तो जन्म के साथ ही दूध पीने की कला लेकर पैदा होते हैं। ऐसे ही ईश्वर के बोध के साथ पूजा अपने आप आती है। अनुग्रह का भाव आता है।

*प्रीतम छवि नैन बसी*

*ओशो*

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पत्रकार अपना अज्ञान दूर कर सकते हैं— आरक्षण वंचित समुदायो पर अहसान नहीं, संविधान में दर्ज उनसे किया गया वायदा है, जिसकी जड़ें गाँधी और डॉ.अंबेडकर के बीच 1932 में हुए पूना पैक्ट में है। अनुसूचित जाति को 22 नहीं महज़ 15 फ़ीसदी आरक्षण हासिल है। अनुसूचित जनजाति को 7.5% आरक्षण दिया जाता है। ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के संबंध में आरक्षण किन्हीं जातियों को नहीं, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को दिया जाता है।

हे पत्रकारों ! आरक्षण के बारे में कुछ बुनियादी बातें पढ़ लो, ताकि मूर्ख न लगो !
इन दिनों ‘नंबर एक’ आज तक समेत कई न्यूज़ चैनल गुजरात चुनाव को ‘राष्ट्रवाद बनाम जातिवाद’ की लड़ाई बताने में लगे हैं। उनकी नज़र में बीजेपी बिना शक़ ‘राष्ट्रवादी’ है (जो देश के हित में है) और विपक्ष ‘जातिवादी’ क्योंकि वह हार्दिक पटेल के आरक्षण आंदोलन के साथ ख़ुद को जोड़ रहा है। अल्पेश और जिग्नेश भी उसकी नज़र में जातिवादी हैं क्योंकि वे क्रमश: पिछड़ी तथा दलित जातियों के हित की बात करते हैं !
आरक्षण का सवाल आते ही कई टीवी ऐंकरों और पत्रकारों के चेहरे पर अजीब सी घृणा टपकने लगती है (संयोग नहीं कि ये चेहरे ब्राह्मण हैं) और वे ऐसी बातें बोल जाते हैं जो किसी जानकार कि निगाह में नितांत मूर्खता होती है। ऐसा नहीं कि आरक्षण के पूरी तरह ख़िलाफ़ ही हैं, आर्थिक आधार पर आरक्षण के नाम पर उनके चेहरे खिल उठते हैं। लेकिन ग़रीबी से जुड़े आर्थिक प्रश्नों में उन्हें कोई रुचि नहीं है।
हम यहाँ कुछ बातें बिंदुवार रख रहे हैं जिन्हें पढ़कर ऐसे पत्रकार अपना अज्ञान दूर कर सकते हैं— आरक्षण वंचित समुदायो पर अहसान नहीं, संविधान में दर्ज उनसे किया गया वायदा है, जिसकी जड़ें गाँधी और डॉ.अंबेडकर के बीच 1932 में हुए पूना पैक्ट में है। अनुसूचित जाति को 22 नहीं महज़ 15 फ़ीसदी आरक्षण हासिल है। अनुसूचित जनजाति को 7.5% आरक्षण दिया जाता है। ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) के संबंध में आरक्षण किन्हीं जातियों को नहीं, सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को दिया जाता है। समृद्ध हो चुकी जातियों को इस सूची से निकाला जा सकता है।
आरक्षित वर्गों की केंद्रीय और राज्यस्तरीय सूची में फ़र्क होता है। एक राज्य में अनुसूचित कही जाने वाली कोई जाति दूसरे राज्य में पिछड़े वर्ग में शामिल मिल सकती है। कथित रूप से ऊँची कही जानी वाली जातियों को भी कहीं-कहीं आरक्षण का लाभ मिलता है। जैसे बिहार में पूरा वैश्य वर्ग ओबीसी में दर्ज है। कुछ पिछड़ी मुस्लिम जातियों को भी कहीं-कहीं ओबीसी में रखा गया है, वहाँ उन्हें आरक्षण का लाभ मिलता है। सामाजिक रूप से पिछड़े होने की वजह से कुछ ब्राह्मण जातियों को भी आरक्षण का लाभ मिलता है। जैसे- महाब्राह्मण या गोसाईं।
आरक्षण को न सिर्फ संसद से बल्कि सर्वोच्च न्यायालय से भी उचित ठहराया जा चुका है। सर्वोच्च न्यायालय ने आरक्षण की सीमा 50% निर्धारित की है, लेकिन विशेष स्थिति में इसे बढ़ाया भी जा सकता है जैसे तमिलनाडु में यह 69% है। आरक्षण को दस साल बाद ख़त्म करने की बात अफ़वाह है। राजनीतिक आरक्षण यानी विधायिका में आरक्षण की दस साल बाद समीक्षा की बात कही गई थी। हर दस साल बाद यह समीक्षा होती है और संसद अगले दस साल के लिए इसे बढ़ा देती है। नौकरियों और शिक्षा में आरक्षण के लिए ऐसी कोई बात नहीं थी। डॉ.अंबेडकर ने कभी नहीं कहा कि वे आरक्षण समाप्त करना चाहते हैं जैसे कि पिछले दिनों आजतक की अंजना ओम कश्यप, हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश के साथ बात करते हुए बता रही थीं। उन्होंने दस साल बाद विधायिका में आरक्षण के लाभ की समीक्षा की बात कही थी। आरक्षण लागू होने के दशकों बाद भी आरक्षित सीटों को भरा नहीं जा सका है।
आरक्षण को लेकर विचलित पत्रकारों को ये बातें भी पता होनी चाहिए— दुनिया भर में पिछड़े समुदायों को बराबरी का अवसर देना सभ्यता की कसौटी माना जाता है। अमरिका में भी ‘डावर्सिटी का सिद्धांत’ लागू है जिसके तहत अश्वेतों, महिलाओं, आदिवासियों से लेकर उन तमाम समुदायों को विशेष अवसर दिया जाता है जो पीछे रह गए हैं। यहाँ तक कि टीवी चैनल भी अश्वेत या एशियाई ऐंकर ज़रूर रखते हैं ताकि दर्शकों में बेगानापन न महसूस हो। भारत में वंचित समुदाय के लिए आरक्षण पहली बार 1902 में लागू किया गया। छत्रपति शाहू जी महाराज ने कोल्हापुर राज्य में इसे लागू किया। वैसे, मनुस्मृति आधारित समाज द्विज जातियों को सत्ता और संसाधन पर सौ फ़ीसदी आरक्षण के सिद्धांत पर चलता रहा है।
आरक्षण गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। इसका मक़सद सदियों से वंचित समुदायों को शासन-प्रशासन में हिस्सेदारी देकर उन्हें राष्ट्र का अंग होने का अहसास दिलाना है। डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि हम तब तक राष्ट्र नहीं बन सकते जब तक कि हमारे सुख-दुख साझा न हों। आरक्षण कथित रूप से ब्राह्मणो की बेरोज़गारी का कारण नहीं है। बेरोज़गारी का संबंध उन आर्थिक नीतियों से है जो रोज़गार सृजन में नाकाम रही हैं और रोज़गार विहीन विकास पर ज़ोर देती हैं।चूँकि रोज़गार मिल नहीं रहा है, इसलिए तमाम अनारक्षित तबकों में आरक्षण की माँग बढ़ रही है। यह फ़ौरी हल की तलाश है लेकिन मूल में बेरोज़गारी का दंश ही है जिसे ‘होना चाहिए या नहीं होना चाहिए’ या फिर ‘अयोग्यता-योग्यता’ जैसी बहसों से ढँकना या तो मूर्खता है या अज्ञानता।
अंतिम बात— आरक्षण समाप्त हो सकता है। सामाजिक बराबरी होने पर आरक्षण का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसलिए आरक्षण विरोधियों को समतामूलक समाज बनाने की बात सोचनी चाहिए। जाति का नाश इसके लिए सबसे ज़रूरी है। जाति पर गर्व और आरक्षण का विरोध पाखंड है जो ब्राह्मण पत्रकारों में प्रचुर मात्रा में दिखता है। ब्राह्मण पत्रकारो को सोचना चाहिए कि आरक्षण को लेकर उनके अंदर जैसी बेचैनी है, वैसी बेचैनी जाति व्यवस्था और बेरोज़गारी बढ़ाने वाली आर्थिक नीतियों को लेकर क्यों नहीं है ?
उम्मीद है कि वे आगे से टीवी पर आरक्षण को लेकर ग़लतबयानी से बचेंगे और अपनी बिरादरी को भी बदनामी से बचाएँगे। जब भी आरक्षण पर बहस की बात आती है, टीवी स्क्रीन अजब ढंग से ब्राह्मण चेतना से उबलने लगते हैं। उनके हेडर और टॉप बैंड तक इसकी गवाही देते हैं। वे आरक्षण को ‘अपराध’ बताते हुए भी बहस करा सकते हैं। यह न्यूज़ रूम में सामाजिक विविधिता की कमी का नतीजा भी है। यह आज से नहीं, अरसे से जारी है।
आप सरकारी नौकरी करने वाले जितने लोगों को जानते हो उनकी सूची बनाओ फिर उनमे से सेडुल कास्ट के लोगों को अलग कर उनकी प्रतिशत जानो , आप खुद जान जाओगे की सेडुल कास्ट के लोगों को बेहद कम सरकारी नौकरी मिलती है, जबकि आप पाओगे की उस लिस्ट में सभी ब्राह्मण बनिए भरे पड़े होंगे। जब आरक्षण के बाद ये हाल है तो बिना आरक्षण के क्या होगा, आप आरक्षण बंद करने की बात करते हो अरे पहले उसे लागू तो करो बैक लोग तो भरो , दिखावटी आरक्षण से क्या होगा।देश की तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं, इतने बड़े देश में सिर्फ चार जज ही सेडुल कास्ट के हैं ऐसा क्यों ? अब मेरिट का रोना मत रोने लगना, प्राइवेट और सरकारी स्कूल जैसी दो धाराएं चलते हो और फिर मेरिट या क्षमता का रोना रोते हो, हमारे जो चंद लोग प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वो अच्छा कर रहे हैं|

संविधान दिवस 26nov विशेष:- बाबासाहब डॉ. आंबेड़कर जी द्वारा *Making of Constitution and its Challenges from tri-varna* समझे बगैर हम संविधान का मजबुती से बचाव नही कर सकते ….राजिव महानंदा

संविधान दिन विशेष
एक तरफ संविधान दिन जोर-शोर से मनाया जा रहा है तो दुसरी तरफ संविधान को अर्थात समता, स्वतंत्रता, भाईंचारा एवं न्याय पर आधारीत समाज व्यवस्था को खत्म करने की पुरजोर सफल  कोशिश की जा रही है! संविधान को पढ़े और समजे बगैर उसके ऊपर हो रहें बलात्कार को समझ पाना मुश्किल हैं, अत: सभी समता, स्वतंत्रता, भाईंचारा एवं न्याय को माननेवाले महानुभावों से, बुध्दिजिवीयोंसे यह दरकार हैं कि, वह संविधान को बचाने की पुरजोर सफल कोशिश करें।
संविधान दिन को केवल उत्सव मानने वाले लोगों ने *समता, स्वतंत्रता, भाईंचारा एवं न्याय पर आधारीत बुध्दक्रांती को खत्म कर प्रतिक्रांती करने वालों का चरीत्र समझना जरूरी हैं।* तथा बाबासाहब डॉ. आंबेड़कर जी द्वारा *Making of Constitution and its Challenges from tri-varna* समझे बगैर हम संविधान का मजबुती से बचाव नही कर सकते, परिणामत: जितने जोर-शोर से हम संविधान दिन, संविधान बचाव का स्वांग इन्ही त्रि-वर्णों की छत्रछाया में मनाते रहेंगे उतने ही यह मानवता के दुश्मन मानवतावादी संविधान के तत्व को खोखला कर केवल मात्र पुजा करने के लिए *संविधान की किताब* रख देंगे।
हम पिछले 65-67 सालों से सवैंधानिक प्रावधानों का फायदा लेकर जश्न तो जरुर मना रहें है, लेकिन उसी संविधान को मजबुत और कायम रखने के लिए इमानदार प्रयास करने में चुंक गये। परिणामत: संवैधानिक *शिक्षा का अधिकार, LPG के द्वारा महंगी शिक्षा कर छिना गया, वैचारिक स्वतंत्रता छिनी गयी, धार्मिक आजादी, निती (Policy) बनाने वाले पदोंपर प्रतिनिधित्व नकारकर, समान रोजगार के अवसर, आधार लाकर एवं नियोजीत नोटबंदी कर आर्थिक आजादी, दहशत फैलाकर जिने की आजादी छिन ली गयी।*
इन सभी मौलिक अधिकारों के ऊपर अमल और उसका संरक्षण करने की जिम्मेवारी जिस चुनाव प्रक्रिया (Article 326, Section 62, Constitution & Representation of People’s Act, 1951) के द्वारा चुने हुए प्रतिनिधीयोंके उपर होती है, उस चुनाव प्रक्रिया को पहले जोर-जबरदस्ती के बल पर, बादमें शराब-शबाब के बल पर, पुरी प्रक्रिया को जानबुझकर महंगी कर और अभी *Gate way of our human (Social, Economical, Cultural, Religious, Political) rights* कही जानेवाली, जिसके द्वारा *Representative Parliamentary Democracy* में हम जनप्रतिनिधी भेजकर यह उम्मीद रखतें हैं की, यह जनप्रतिनिधी हमारे संवैधानिक अधिकारों के ऊपर अमल करेंगे और उसकी सुरक्षा करेंगे! उस मताधिकार के प्रणाली पर दिन-दहाडें *EVM के द्वारा बलात्कार* हो रहा हैं और हम न्यायप्रिय लोग तमाशबिन बने हैं। हमनें दिया हुआ *Vote* उसी उम्मिदवार को गया जिसको हम देना चाह रहे है, इस बात की गैरेंटी जब तक नहीं हो जाती तब तक नहीं कहां जा सकता, आपको कोई *Right of vote* हैं।
अत:  हम संगठ़ित तरीके से EVM बैन करा कर ही संविधान को बचा सकते हैं। भारत देश का संविधान गुरु ग्रंथसाहब का  मानवतावाद, कुरान का मसावाद, धम्मपद के न्यायपुर्ण चरित्र, बाईबल की ईन्सानियत तथा OBC, SC, ST और Minorities के सभी मौलिक अधिकारों की गैरेंटी हैं, इसलिए सभी महानुभावों की निजी जिम्मेंदारी है कि, वे संविधान दिन के जश्न के साथ-साथ संविधान बचाव आंदोलन का हिस्सा बनें।
याद रहें,
संविधान हैं तबतक हक़ और अधिकार हैं,
संविधान हैं तबतक दिन और दस्तूर भी हैं!!!
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
*राजिव महानंदा*

प्रश्न: भगवान बुद्ध ने कहा है: अपने दीए आप बनो। तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं है? गुरु तो बुद्ध जैसे व्यक्ति ही होते हैं, जो कहते हैं, अप्प दीपो भव! – ओशो

“अप्प दीपो भव:” – ओशो

प्रश्न: भगवान बुद्ध ने कहा है: अपने दीए आप बनो। तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं है?

यह जानने को भी तुम्हें बुद्ध के पास जाना पड़ेगा न!-अपने दीए आप बनो। इतनी ही जरूरत है गुरु की। गुरु तुम्हारी बैसाखी नहीं बनने वाला है। जो बैसाखी बन जाए तुम्हारी, वह तुम्हारा दुश्मन है, गुरु नहीं है। क्योंकि जो बैसाखी बन जाए तुम्हारी, वह तुम्हें सदा के लिए लंगड़ा कर देगा। और अगर बैसाखी पर तुम निर्भर रहने लगे, तो तुम अपने पैरों को कब खोजोगे? अपनी गति कब खोजोगे? अपनी ऊर्जा कब खोजोगे?

जो तुम्हें हाथ पकड़कर चलाने लगे, वह गुरु तुम्हें अंधा रखेगा। जो कहे: मेरा तो दीया जला है; तुम्हें दीया जलाने की जरूरत क्या? देख लो मेरी रोशनी में। चले आओ मेरे साथ। उस पर भरोसा मत करना। क्योंकि आज नहीं कल रास्ते अलग हो जाएंगे। कब रास्ते अलग हो जाएंगे, कोई भी नहीं जानता। कब मौत आकर बीच में दीवाल बन जाएगी। कोई भी नहीं जानता। तब तुम एकदम घुप्प अंधेरे में छूट जाओगे। गुरु की रोशनी को अपनी रोशनी मत समझ लेना। ऐसी भूल अक्सर हो जाती है।

सूफियों की कहानी है कि दो आदमी एक रास्ते पर चल रहे हैं। एक आदमी के हाथ में लालटेन है। और एक आदमी के हाथ में लालटेन नहीं है। कुछ घंटों तक वे दोनों साथ-साथ चलते रहे हैं। आधी रात हो गयी। मगर जिसके हाथ में लालटेन नहीं है, उसे इस बात का खयाल भी पैदा नहीं होता कि मेरे हाथ में लालटेन नहीं है। जरूरत क्या है? दूसरे आदमी के हाथ में लालटेन है। और रोशनी पड़ रही है। और जितना जिसके हाथ में लालटेन है उसको रोशनी मिल रही है, उतनी उसको भी मिल रही है जिसके हाथ में लालटेन नहीं है। दोनों मजे से गपशप करते चले जाते हैं। फिर वह जगह आ गयी, जहां लालटेन वाले ने कहा: अब मेरा रास्ता तुमसे अलग होता है। अलविदा। फिर घुप्प अंधेरा हो गया।

आज नहीं कल गुरु से विदा हो जाना पड़ेगा। या गुरु विदा हो जाएगा। सदगुरु वही है, जो विदा होने के पहले तुम्हारा दीया जलाने के लिए तुम्हें सचेत करे। इसलिए बुद्ध ने कहा है: अप्प दीपो भव। अपने दीए खुद बनो। यह भी जिदंगीभर कहा, लेकिन नहीं सुना लोगों ने। जिन्होंने सुन लिया, उन्होंने तो अपने दीए जला लिए। लेकिन कुछ इसी मस्ती में रहे कि करना क्या है! बुद्ध तो हैं। आनंद से कही यह बात उन्होंने। आनंद भी उन्हीं नासमझों में एक था, जो बुद्ध की रोशनी में चालीस साल तक चलता रहा। स्वभावतः, चालीस साल तक रोशनी मिलती रहे, तो लोग भूल ही जाएंगे कि अपने पास रोशनी नहीं है; कि हम अंधे हैं। चालीस साल तक किसी जागे का साथ मिलता रहे, तो स्वभावतः भूल हो जाएगी। लोग यह भरोसा ही कर लेंगे कि हम भी पहुंच ही गए। रोशनी तो सदा रहती है। भूल-चूक होती नहीं। भटकते नहीं। गड्ढों में गिरते नहीं। और आनंद बुद्ध के सर्वाधिक निकट रहा। चालीस साल छाया की तरह साथ रहा। सुबह-सांझ, रात-दिन। चालीस साल में एक दिन भी बुद्ध को छोड़कर नहीं गया। बुद्ध भिक्षा मांगने जाएं, तो आनंद साथ जाएगा। बुद्ध सोएं, तो आनंद साथ सोएगा। बुद्ध उठें, तो आनंद साथ उठेगा। आनंद बिलकुल छाया था। भूल ही गया होगा। उसको हम क्षमा कर सकते हैं। चालीस साल रोशनी ही रोशनी! उठते-बैठते रोशनी। जागते-सोते रोशनी। भूल ही गया होगा। फिर बुद्ध का अंतिम दिन आ गया। रास्ते अलग हुए। और बुद्ध ने कहा कि अब मेरी आखिरी घड़ी आ गयी। अब मैं विदा लूंगा। भिक्षुओ! किसी को कुछ पूछना हो, तो पूछ लो। बस, आज मैं आखिरी सांस लूंगा।

जिन्होंने अपने दीए जला लिए थे, वे तो शांत अपने दीए जलाए बैठे रहे परम अनुग्रह से भरे हुए-कि न मिलता बुद्ध का साथ, तो शायद हमें याद भी न आती कि हमारे भीतर दीए के जलने की संभावना है, तो भी हमने न जलाया होता। हमें यह भी पता होता कि संभावना है, जल भी सकता है, तो विधि मालूम नहीं थी।
आखिर दीया बनाना हो, तो विधि भी तो होनी चाहिए! बाती बनानी आनी चाहिए। तेल भरना आना चाहिए। फिर दीया ऐसा होना चाहिए कि तेल बह न जाए। फिर दीए की सम्हाल भी करनी होती है। नहीं तो कभी बाती तेल में ही गिर जाएगी और दीया बुझ जाएगा। वह साज-सम्हाल भी आनी चाहिए; विधि भी आनी चाहिए। फिर चकमक पत्थर भी खोजने चाहिए। फिर आग पैदा करने की कला भी होनी चाहिए।

तो अनुग्रह से भरे थे। जिन्होने पा लिया था, वे तो शांत, चुपचाप बैठे रहे। गहन आनंद में, गहन अहोभाव में। आनंद दहाड़ मारकर रोने लगा। उसने कहा: यह आप क्या कह रहे हैं। यह कहो ही मत। मेरा क्या होगा? आ गया रास्ता अलग होने का क्षण। आज उसे पता चला कि ये चालीस साल मैं तो अंधा ही था। यह रोशनी उधार थी। यह रोशनी किसी और की थी। और यह विदाई का क्षण आ गया। और विदाई का क्षण आज नहीं कल, देर-अबेर आएगा ही। तब बुद्ध ने कहा था: आनंद! कितनी बार मैंने तुझसे कहा है, अप्प दीपो भव! अपना दीया बन। तू सुनता नहीं। अब तू समझ। चालीस साल निरंतर कहने पर तूने नहीं सुना, इसलिए रोना पड़ रहा है। देख उनको, जिन्होंने सुना। वे दीया बने शांत अपनी जगह बैठे हैं। बुद्ध के जाने से एक तरह का संवेग है। इस अपूर्व मनुष्य के साथ इतने दिन रहने का मौका मिला। आज अलग होने का क्षण आया। तो एक तरह की उदासी है। मगर दहाड़ मारकर नहीं रो रहे हैं। क्योंकि यह डर नहीं है कि अंधेरा हो जाएगा। अपना-अपना दीया उन्होंने जला लिया है।

तुम पूछते हो: ‘भगवान बुद्ध ने कहा, अपने दीए आप बनो, तो क्या सत्य की खोज में किसी भी सहारे की कोई जरूरत नहीं हैं?’

यह जरा नाजुक सवाल है। नाजुक इसलिए कि एक अर्थ में जरूरत है और एक अर्थ में जरूरत नहीं है। इस अर्थ में जरूरत है कि तुम अपने से तो शायद जाग ही न सकोगे; तुम्हारी नींद बड़ी गहरी है। कोई तुम्हें जगाए। लेकिन इस अर्थ में जरूरत नहीं है कि किसी दूसरे के जगाने से ही तुम जाग जाओगे। जब तक तुम ही न जागना चाहो, कोई तुम्हें जगा न सकेगा। और अगर तुम जागना चाहो, तो बिना किसी के जगाए भी जाग सकते हो, यह संभावना है। बिना गुरु के भी लोग पहुंचे हैं। मगर इसको जड़ सिद्धांत मत बना लेना कि बिना गुरु के कोई पहुँच गया, तो तुम भी पहुंच जाओगे।

मेरे पास लोग आ जाते हैं। वे कहते हैं: आपसे एक सलाह लेनी है। अगर गुरु न बनाएं, तो हम पहुंच सकेंगे कि नहीं? मैंने कहा कि तुम इतनी ही बात खुद नहीं सोच सकते; इसके लिए भी तुम मेरे पास आए! तुमने गुरु तो बना ही लिया! गुरु का मतलब क्या होता है? किसी और से पूछने गए; यह भी तुम खुद न खोज पाए!

मुझसे लोग आकर पूछते हैं कि आपका गुरु कौन था? हमने तो सुना कि आपका गुरु नहीं था! जब आपने बिना गुरु के पा लिया, तो हम क्यों न पा लेंगे? मैं उनसे कहता हूं: मैं कभी किसी से यह भी पूछने नहीं गया कि बिना गुरु के मिलेगा कि नही! तुम जब इतनी छोटी सी बात भी खुद निर्णय नहीं कर पाते हो, तो उस विराट सत्य के निर्णय में तुम कैसे सफल हो पाओगे?

तो एक अर्थ में गुरु की जरूरत है। और एक अर्थ में नहीं है। अगर तुम्हारी अभीप्सा प्रगाढ़ हो, तो कोई जरूरत नहीं है। लेकिन जरूरत या गैर-जरूरत, इसकी समस्या क्यों बनाते हो? जितना मिल सके किसी से ले लो। मगर इतना ध्यान रखो कि दूसरे से लिए हुए पर थोड़े दिन काम चल जाएगा। अंततः तो अपनी समृद्धि खुद ही खोजनी चाहिए। किसी के कंधे पर सवार होकर थोड़ी देर चल लो, अंततः तो अपने पैरों का बल निर्मित करना ही चाहिए। रास्ता सीधा-साफ है। प्रबल प्यास हो, तो अकेले भी पहुंच जाओगे। रास्ता इतना सीधा-साफ है कि इस पर किसी के भी साथ की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन अगर अकेले पहुंचने की हिम्मत न बनती हो, तो थोड़े दिन किसी का साथ बना लेना। लेकिन साथ को बंधन मत बना लेना। फिर ऐसा मत कहना कि बिना साथ के हम जाएंगे ही नहीं। नहीं तो तुम कभी न पहुंचोगे। क्योंकि सत्य तक तो अंततः अकेले ही पहुंचना होगा। एकांत में ही घटेगी घटना। उस एकांत में तुम्हारा गुरु भी तुम्हारे साथ मौजूद नहीं होगा।

गुरु तुम्हें संसार में मुक्त होने में सहयोगी हो सकता है। लेकिन परमात्मा से मिलने में सहयोगी नहीं हो सकता। संसार से छुड़ाने में सहयोगी हो जाएगा। संसार छूट जाए, तो फिर तुम्हें एकांत में परमात्मा से मिलना होगा। वह मिलन भीड़-भाड़ में नहीं होता।

किस कदर सीधा सहल साफ है यह रास्ता देखो
न किसी शाख का साया है, न दीवार की टेक
न किसी आंख की आहट, न किसी चेहरे का शोर 
न कोई दाग जहां बैठ के सुस्ताए कोई 
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं
चंद कदमों के निशां, हां, कभी मिलते हैं कहीं
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फकत चंद कदम 
और फिर टूट के गिरते हैं यह कहते हुए
अपनी तनहाई लिए आप चलो, तन्हा, अकेले 
साथ आए जो यहां कोई नहीं, कोई नहीं
किस कदर सीधा सहल साफ है यह रस्ता देखो

थोड़ी दूर किसी के कदम के साथ चल लो, ताकि चलना आ जाए। मंजिल नहीं आती इससे, सिर्फ चलने की कला आती है। थोड़ी दूर किसी के पग-चिन्हों पर चल लो, ताकि पैरों को चलने का अभ्यास हो जाए। इससे मंजिल नहीं आती; मंजिल तो तुम्हारे ही चलने से आएगी; किसी और के चलने से नहीं। मेरी आंख से तुम कैसे देखोगे? हां, थोड़ी देर को तुम मेरी आंख में झांक सकते हो। तुम मेरे हृदय से कैसे अनुभव करोगे? हां, थोड़ी देर किसी गहन भाव की दशा में तुम मेरे हृदय के साथ धड़क सकते हो। निश्चित ही किसी प्रेम की घटना में थोड़ी देर को तुम्हारा हृदय और मेरा हृदय एक ही लय में बद्ध हो सकते हैं। उस समय क्षणभर को तुम्हें रोशनी दिखेगी। उस समय क्षणभर को आकाश खुला दिखायी पड़ेगा; सब बादल हट जाएंगे। लेकिन यह थोड़ी ही देर को होगा। अंततः तुम्हें अपने हृदय का सरगम खोजना ही है।

अच्छा है कि तुम्हें परमात्मा तक अकेले ही पहुंचने की संभावना है। नहीं तो किसी पर निर्भर होना पड़ता। और निर्भरता से कभी कोई मुक्ति नहीं आती। निर्भरता तो गुलामी का ही एक अच्छा नाम है। निर्भरता तो दासता ही है। वह दासता की ही दास्तान है-नए ढंग से लिखी गयी; नए लफ़्ज़ों में, नए शब्दों में, नए रूप-रंग से; लेकिन बात वही है।

इसलिए कोई सदगुरु तुम्हें गुलाम नहीं बनाता। और जो गुलाम बना ले, वहां से भाग जाना। वहां क्षणभर मत रुकना। वहां रुकना खतरनाक है। जो तुम्हें कहे कि मेरे बिना तुम्हारा कुछ भी नहीं होगा; जो कहे कि मेरे बिना तुम कभी भी नहीं पहुंच सकोगे; जो कहे: मेरे पीछे ही चलते रहना, तो ही परमात्मा मिलेगा, नहीं तो चूक जाओगे-ऐसा जो कोई कहता हो, उससे बचना। उसे स्वयं भी अभी नहीं मिला है। क्योंकि यदि उसे स्वयं मिला होता, तो एक बात उसे साफ हो गयी होती कि परमात्मा जब मिलता है, एकांत में मिलता है; वहां कोई नहीं होता; कोई दूसरा नहीं होता। उसे परमात्मा तो मिला ही नहीं है; उसने लोगों के शोषण करने का नया ढंग, नयी तरकीब ईजाद कर ली है। उसने एक जाल ईजाद कर लिया है, जिसमें दूसरों की गरदनें फंस जाएंगी। ऐसा आदमी भीड़-भाड़ को अपने पीछे खड़ा करके अहंकार का रस लेना चाहता है। इस आदमी से सावधान रहना। इस आदमी से दूर-दूर रहना। इस आदमी के पास मत आना।

जो तुमसे कहे कि मेरे बिना परमात्मा नहीं मिलेगा, वह महान से महान असत्य बोल रहा है। क्योंकि परमात्मा उतना ही तुम्हारा है, जितना उसका। हां, यह हो सकता है कि तुम जरा लड़खड़ाते हो। वह कम लड़खड़ाता है। या उसकी लड़खड़ाहट मिट गयी है और वह तुम्हें चलने का ढंग, शैली सिखा सकता है। हां, यह हो सकता है कि उसे तैरना आ गया और तुम उसे देखकर तैरना सीख ले सकते हो। लेकिन उसके कंधों का सहारा मत लेना, अन्यथा दूसरा किनारा कभी न आएगा। उसके कंधों पर निर्भर मत हो जाना, नहीं तो वही तुम्हारी बर्बादी का कारण होगा।

इसी तरह तो यह देश बरबाद हुआ। यहां मिथ्या गुरुओं ने लोगों को गुलाम बना लिया। इस मुल्क को गुलामी की आदत पड़ गयी।इस मुल्क को निर्भर रहने की आदत पड़ गयी। यह जो हजार साल इस देश में गुलामी आयी, इसके पीछे और कोई कारण नहीं है। इसके पीछे न तो मुसलमान हैं, न मुगल हैं, न तुर्क हैं, न हूण हैं, न अंग्रेज हैं। इसके पीछे तुम्हारे मिथ्या गुरुओं का जाल है। मिथ्या गुरुओं ने तुम्हें सदियों से यह सिखाया है: निर्भर होना। उन्होंने इतना निर्भर होना सिखा दिया कि जब कोई राजनैतिक रूप से भी तुम्हारी छाती पर सवार हो गया, तुम उसी पर निर्भर हो गए। तुम जी-हुजूर उसी को कहने लगे। तुम उसी के सामने सिर झुकाकर खड़े हो गए। तुम्हें आजादी का रस ही नहीं लगा; स्वाद ही नहीं लगा।

अगर कोई मुझसे पूछे, तो तुम्हारी गुलामी की कहानी के पीछे तुम्हारे गुरुओं का हाथ है। उन्होंने तुम्हें मुक्ति नहीं सिखायी, स्वतंत्रता नहीं सिखाई। काश! बुद्ध जैसे गुरुओं की तुमने सुनी होती, तो इस देश की गुलामी का कोई कारण नहीं था। काश! तुमने व्यक्तित्व सीखा होता, निजता सीखी होती; काश! तुमने यह सीखा होता कि मुझे मुझी होना है; मुझे किसी दूसरे की प्रतिलिपी नहीं होना है; और मुझे अपना दीया खुद बनना है, तो तुम बाहर के जगत में भी पैर जमाकर खड़े होते। यह अपमानजनक बात न घटती कि चालीस करोड़ का मुल्क मुट्ठीभर लोगों का गुलाम हो जाए! कोई भी आ जाए और यह मुल्क गुलाम हो जाए! जरूर इस मुल्क की आत्मा में गुलामी की गहरी छाप पड़ गयी। किसने डाली यह छाप? किसने यह जहर तुम्हारे खून में घोला? किसने विषाक्त की तुम्हारी आत्मा? किसने तुम्हें अंधेरे में रहने के लिए विधियां सिखायीं? तुम्हारे तथाकथित गुरुओं ने। वे गुरु नहीं थे।

गुरु तो बुद्ध जैसे व्यक्ति ही होते हैं, जो कहते हैं, अप्प दीपो भव!

– ओशो

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गौतम बुद्ध और उनके धम्म पर बेहतरीन यूट्यूब हिंदी चैनल पर नया वीडियो : Short Documentary on Buddhist Shrine SANKISSA in HINDI संकिसा- उत्तर प्रदेश-फरुखाबाद में बौद्ध तीर्थ

 

संकिशा अथवा संकिसा भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य के फ़र्रूख़ाबाद जिले के पखना रेलवे स्टेशन से सात मील और मैनपुरी के भोगाओं स्टेशन से १४ किलोमीटर है दूर काली नदी के तट पर, बौद्ध-धर्म स्थान है, इसका प्राचीन नाम संकाश्य है, कहते हैं बुद्ध भगवान स्वर्ग से उतर कर यहीं पर आये थे,हालाँकि स्वर्ग से उतरने वाली बात कहीं भी त्रिपिटक में नहीं लिखी है और जैसा की हम जानते हैं की बुद्ध ने स्वर्ग नर्ग की कल्पना को अस्वीकार कर दिया था तो ऐसे भी उनके स्वर्ग से उतरने वाली बात विरोधी मिलावट के अलावा और कुछ नहीं|

वर्तमान संकिशा एक टीले पर बसा छोटा सा गाँव है, टीला बहुत दूर तक फ़ैला हुआ है, और किला कहलाता है, किले के भीतर ईंटों के ढेर पर बिसहरी देवी का मन्दिर है, बिसहरी देवी गौतम बुद्ध की माँ का नाम था |पास ही अशोक स्तम्भ का शीर्ष है, जिस पर हाथी की मूर्ति निर्मित है, धम्म विरोधियों आताताइयों ने राजनैतिक प्रतिक्रांति में  ने हाथी की सूंड को तोड डाला है।

संकिसा उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद के निकट स्थित आधुनिक संकिस ग्राम से समीकृत किया जाता है हांलंकि भौगोलिक रूप से यह जनपद मैनपुरी  में आता है। कनिंघम ने अपनी कृति ‘द एनशॅंट जिऑग्राफी ऑफ़ इण्डिया’ में संकिसा का विस्तार से वर्णन किया है। संकिसा का उल्लेख महाभारत में किया गया है

उस समय यह नगर पांचाल की राजधानी कांपिल्य से अधिक दूर नहीं था। महाजनपद युग में संकिसा पांचाल जनपद का प्रसिद्ध नगर था। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार यह वही स्थान है, जहाँ बुद्ध, इन्द्र एवं ब्रह्मा सहित स्वर्ण अथवा रत्न की सीढ़ियों से त्रयस्तृन्सा स्वर्ग से पृथ्वी पर आये थे। इस प्रकार गौतम बुद्ध के समय में भी यह एक ख्याति प्राप्त नगर था।

महात्मा बुद्ध का आगमन इसी नगर में महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर यहाँ आये व संघ में स्त्रियों की प्रवृज्या पर लगायी गयी रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर बौद्ध संघ का द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिया गया था। बौद्ध ग्रंथों में इस नगर की गणना उस समय के बीस प्रमुख नगरों में की गयी है। प्राचीनकाल में यह नगर निश्चय ही काफ़ी बड़ा रहा होगा, क्योंकि इसकी नगर भित्ति के अवशेष, जो आज भी हैं, लगभग चार मील (लगभग 6.4 कि.मी.) की परिधि में हैं। चीनी यात्री फ़ाह्यान पाँचवीं शताब्दी के पहले दशक में यहाँ मथुरा से चलकर आया था और यहाँ से कान्यकुब्ज, श्रावस्ती आदि स्थानों पर गया था। उसने संकिसा का उल्लेख सेंग-क्यि-शी नाम से किया है। उसने यहाँ हीनयान और महायान सम्प्रदायों के एक हज़ार भिक्षुओं को देखा था। कनिंघम को यहाँ से स्कन्दगुप्त का एक चाँदी का सिक्का मिला था।