गरीब विरोधी और जातिवादी मानसिकता न्याय दिलाने वाले वकीलों में भी कूट कूट के भरी है तो न्याय कैसे मिलेगा।इसका उदाहरण है गुड़गांव के रेयान स्कूल में हुए प्रद्युमन मर्डर के केस में जब एक बस कंडक्टर फंसा तो गुडगाँव कोर्ट के सारे वकील मिलकर उसका बॉयकॉट कर केस लेने से मना कर देते है, जबकि सीबीआई इन्क्वारी में अशोक को क्लीन चिट मिलती है।…दिलीप सी० मंडल

बहुजनो और गरीबों के खिलाफ सवर्ण जिस तरह एक होकर बहिष्कार करते हैं यही है ब्राह्मणवाद का सबसे बड़ा रक्षक और बहुजन जनता की दुर्दशा का कारन। सवर्णों की इस संगठित जिद्द के आगे प्रशाशन भी क्या मदत कर पता है जिसमे ज्यादातर यही सवर्ण लोग बैठे होते हैं , आप समझ सकते हैं गुड़गांव के रेयान स्कूल में हुए प्रद्युमन मर्डर के केस में जब एक बस कंडक्टर फंसता है या फंसाया जाता है तो गुडगाँव कोर्ट के सारे वकील मिलकर उसका बॉयकॉट करते है और उसका केस लेने से मना कर देते है.

अशोक का केस लड़ने के लिए एक भी वकील खड़ा नहीं होता.

इसी केस में, सीबीआई जब एक वकील के लड़के को इस केस में अरेस्ट करती है तो गुडगाँव कोर्ट के वही वकील उस लड़के के फेवर में खड़े हो जाते है, पक्ष में प्रदर्शन करते हैं क्योकि गिरफ्तार हुआ लड़का उनके साथी वकील का बेटा है.

इन वकीलों के पास ही तो हम न्याय के लिए जाते है.

कैसा गन्दा समाज बना रहे हैं हम, गरीब फंसता है तो सब ठीक, अमीर फंसता है तो इक्कठे होकर विरोध करते है.

हरियाणा एक बर्बर और कबीलाई राज्य है.
हरियाणा को नवजागरण यानी रेनेसां की सख्त जरूरत है!

गुड़गांव के रेयान स्कूल में हुए प्रद्युम्न मर्डर केस में सीबीआई गुड़गांव के पास सोहना के एक वकील के बेटे के खिलाफ सबूत जुटा चुकी है. अभियुक्त गिरफ्तार है.

लेकिन बहादुर हरियाणा पुलिस, सीबीआई के केस में हाथ डालने से पहले ही, बेहद तत्परता से वहां के गरीब बस कंडक्टर से हत्या का तथाकथित गुनाह कबूल भी करा चुकी थी.

गुनाह कैसे कबूल कराया जाता है, यह बताने की जरूरत नहीं है.

आप कल्पना कीजिए कि कंडक्टर को मालूम होगा कि हत्या का झूठा आरोप कबूल करने से उसको फांसी हो सकती है, इसके बावजूद किस दबाव और किन स्थितियों में उसने वह फर्जी आरोप कबूल किया होगा.

एक जरूरी जानकारी यह है कि जिस कंडक्टर को फंसाया गया था, वह अनुसूचित जाति का है. हरियाणा का ही है. सोहना के पास गांव है.

हरियाणा में अनुसूचित जाति के उत्पीड़न की लंबी लिस्ट यानी दुलीना, झझ्झर, मिर्चपुर, गोहाना, भगाना, फरीदाबाद में अब सोहना का नाम भी जुड़ गया है. सवाल उठता है कि ऐसे मामलों में फंसाने के लिए भी पुलिस को अनुसूचित जाति का ही बंदा मिलता है….वैसे हरियाणा वाले कहते हैं कि उनके सूबे में जातिवाद नहीं है. बस, जातियां हैं.

हरियाणा की लगभग चौथाई आबादी अनुसूचित जाति की है और बेतरह मार खाती है. एकता और चेतना की कमी है. विरोधी बेहद बर्बर और हिंसक हैं और सरकार ऐसे अपराधियों को शह भी खूब देती है.

हरियाणा का पूरा तंत्र भयंकर रूप से जातिवादी और हिंसक है.

24 कैरेट का शुद्ध दोगलापन.

गुड़गांव जिले के सोहना बार एसोसिएशन ने बैठक करके फैसला किया कि “प्रद्युम्न मर्डर केस में अभियुक्त का केस सोहना का कोई वकील नहीं लड़ेगा.”

सिचुएशन 1. – पुलिस बस कंडक्टर अशोक को पकड़ती है. उसे अभियुक्त बनाती है, सोहना का कोई वकील उसका केस नहीं लेता.

सिचुएशन 2. – सीबीआई एक वकील के बेटे को इस केस में पकड़ती है, उसे अभियुक्त बनाती है.. सोहना के वकील इसका केस लड़ते हैं. सोहना के वकील इस अभियुक्त के समर्थन में प्रदर्शन करते हैं.

आइये जानते हैं ब्राह्मणवाद कैसे हमारी विचारधारा का हिंसा बनता है कैसे हम उसे अपना खुद का विचार समझते हैं , जबकि वो हमारे बचपन के दिनों में किस्से कहानी टीवी मीडिया पढाई फिल्म नाटक अदि के जरिये हमारे व्यक्तित्व में ठूसे जाते हैं…Dilip C Mandal FB (जिस तरह साउथ इंडिया की हिंसक फिल्मे हिंदी में डब कर के दिन रात टीवी पर परोसने से एक हिंसक पीढ़ी तैयार हुई ये चिंता की बात है)

फेसबुक, सोशल मीडिया और वास्तविक जिंदगी में विचार बदलने की कोशिश का बड़ा खेल चलता है.

बहुत लोगों को भ्रम है कि वे दूसरों के विचारों को बदल सकते हैं. इसके लिए वे तर्क से लेकर अफवाह और तथ्य से लेकर झूठ तक का सहारा लेते हैं. लाखों लोग इस कोशिश में लगे रहते हैं, मैं भी अपवाद नहीं हूं.

लेकिन ठहरकर सोचूं तो मेरा मानना है कि हममें से ज्यादातर लोगों के विचार बचपन में ही फिक्स हो चुके होते हैं.

ऐसा बहुत कम होता है कि हम बड़े होने के बाद अपने विचार बदलते हैं. सामान्य स्थितियों में ऐसा ही होता है. विशेष क्रांतिकारी स्थितियों में या किसी ऐतिहासिक घटनाक्रम के समय ही बहुत बड़ी आबादी अपने विचार बदलती हैं.

तो मुद्दे की बात है कि हममें से लगभग हर आदमी बचपन में अपने विचार बना लेता हैं.

इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बचपन में बच्चा किस तरह की कहानियां सुनता है, कैसा सिनेमा देखता है, कैसे सीरियल देखता है, परिवार में उस पर कैसे बातचीत होती है, टीचर क्या सिखाता है, दोस्त क्या बताते हैं, लोग एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते है.

बचपन में अगर बच्चे ने यह सुना है कि गाय में देवता रहते हैं और नाना ने अगर सुनाया है कि मुसलमान लोग गाय खाते हैं और दोस्तों से अगर उसने सुना है कि मुसलमान बहुत क्रूर होते हैं और स्कूल में अगर उसने सुना है कि मुसलमानों की जिद की वजह से भारत के टुकड़े हुए, तो बड़े होने पर एक दिन अगर उसके गांव की मंदिर से घोषणा होता है कि अखलाक के घर में फ्रिज में गोमांस है, तो वह आदमी बाकी सौ लोगों के साथ अखलाक के घर पर हमला कर ही सकता है.

इसके हमारे ‘प्राइमरी सोशलाइजेशन’ का असर माना जाएगा. दरअसल गाय, गोमांस और मुसलमान के बारे में हमारी कहानी बचपन में लिखी जा चुकी है. अखलाक दो Dots के बीच का खाली स्पेस है, जिसे किसी भी समय भरा दिया जा सकता है.

इसे Stock of knowledge at hand भी कह सकते हैं. ऐसी चीजें दिमाग में जमती रहती हैं और यह नॉर्मल होता चला जाता है.

कई स्टीरियोटाइप्स ऐसे ही बनते हैं., जैसे कि भारत में सबसे हिंसक दंगा करने वाले बंगाली कमजोर और नर्मदिल मान लिए जा सकते हैं, यह मान लिया जाता है कि सारे “मद्रासी” इडली, डोसा और इमली खाते हैं, या कि बिहारी गंदे होते हैं या कि सिंधी शातिर होते हैं, या कि ठाकुर लोग साहसी होते हैं, ब्राह्मण समझदार होता है…यह सब सोच हमारे प्राइमरी सोशलाइजेशन से आती है.

भारत जैसे देश में कम से कम सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह बच्चों के अंदर लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और सेकुलर जीवन मूल्य स्थापित करने की कोशिश करेेगी. यह सरकार का संवैधानिक दायित्व है. नीति निर्देशक तत्वों के अध्याय में इसका बाकायदा जिक्र है.

लेकिन हमारी सरकार करती क्या है?

करोड़ों बच्चों में जीवन मूल्य स्थापित करने का सबसे ताकतवर तरीका टेक्स्ट बुक हैं. लेकिन उनमें क्या पढ़ाया जा रहा है?

एक उदाहरण देखिए.

छठी क्लास में बच्चों को रामकथा पढ़ाई जा रही है., इसमें बच्चों को एक धार्मिक टेक्स्ट को इतिहास या तथ्य की तरह पढ़ाया जाता है.

इसमें राम का जन्म अगर अयोध्या में होने को तथ्य के तौर पर पढ़ाया जाता है, तो वह बच्चा क्यों नहीं कहेगा कि रामजन्मभूमि पर बनी बाबरी मस्जिद को तोड़ देना चाहिए.

इस किताब में शूर्पनखा की नाक काटी जाती है और तमाम मिथकीय कार्य किए जाते हैं. स्त्री के प्रति व्यवहार का पहला सबक बच्चा इस तरह सीख रहा है.

अब सवाल उठता है कि छठी के बच्चे को, जब उसके विचार बन रहे हैं, तब रामकथा की पूरी किताब पढ़ाई जाए और कबीर और नानक न पढ़ाया जाए, यह फैसला किसने किया?

सॉरी, आप अगर सोच रहे हैं कि यह काम किसी भाजपाई सरकार ने किया या किन्हीं सांप्रदायिक मास्टरों और विचारकों ने यह काम किया है, तो आप गलत हैं.

छठी के बच्चों को कबीर की जगह राम पढ़ाने का फैसला कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का है और इस किताब को लाने वाली कमेटी के चेयरमैन तथाकथित वामपंथी-सेकुलर नामवर सिंह हैं. पूरी कमेटी घनघोर सेकुलर लोगों से भरी पड़ी है.

बच्चों को बचाओ! उनके दिमाग पर हमला चौतरफा है.

 

चंद्रशेखर रावण और भीम आर्मी नाम तो याद होगा ना..चंद्रशेखर रावण की रिहाई के लिए खड़े होईए, बोलिए, लिखिए !* चंद्रशेखर रावण को रिहा करो! सवाल केवल यूपी का नहीं है !* *सवाल केवल चमार/बहुजन का नहीं है !* *सवाल लोकतंत्र के भविष्य का है ..एडवोकेट ब्रजवीर सिंह

चंद्रशेखर रावण और भीम आर्मी नाम तो याद होगा ना। रौबीली मूंछों वाला एक नौजवान जिसने चमार/बहुजन में ‘द ग्रेट चमार/बहुजन ’ लिखने का साहस जगाया। चमार/बहुजन को सम्मान से सर उठाकर जीना सिखाया। आज वो नौजवान जातिवाद के खिलाफ लड़ने की सजा काट रहा है।*

चमार/बहुजन ों के मान, सम्मान, स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहा ये योद्धा जेल में बीमारी से लड़ रहा है। *भूलिएगा मत इस रावण को वर्ना ये जातिवादी सरकारें और मनुवाद के पुरोधा उसको जेल में ही मरने पर विवश कर देंगे।*

चंद्रशेखर की एक तस्वीर वायरल हो रही है इस तस्वीर में चंद्रशेखर एक कमजोर आदमी की तरह दिख रहा है। रौब से चलने वाला ये नौजवान आज व्हीलचेयर पर है। इस तस्वीर को देखकर सोशल मीडिया पर सामाजिक न्याय के योद्धाओं ने सरकार की आलोचना शुरू कर दी। *वरिष्ठ पत्रकार व सामाजिक चिंतक दिलीप मंडल लिखते हैं कि-*
शंबूक तो हर युग में मारा जाएगा. अध्ययन करने की उसकी हिम्मत कसे हुई. एकलव्य का अंगूठा तो कटकर रहेगा. वह स्पोर्ट्स का चैंपियन कैसे बन सकता है. रोहित वेमुला को मरना ही होगा. पीएचडी एंट्रेंस का टॉपर होने की उसकी हिम्मत कैसे हुई.

ऊना के चमार/बहुजन ों की खाल तो खींची ही जाएगी, वे अपना काम करके पैसा कैसे कमा सकते हैं. मिर्चपुर में विकलांग लड़की सुमन को आग में जलकर मरना ही पड़ेगा, बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन पढ़ने की उसकी हिम्मत कैसे हुई….

*चंद्रशेखर रावण के साथ यह हो रहा है. देश में लाखों लोगों के साथ यह हो रहा है,* जिसकी हमें कई बार खबर तक नहीं होती. आप भी कहां तक बच लोगे. या तो खस्सी बन जाओ या मरो. रीढ़ की हड्डी निकाल लो, या फिर मरो.

यह ब्राह्मणवाद है. ये किसी को नहीं छोड़ते. कुचलकर मिटा देते हैं. ब्राह्मणवाद दुनिया की सबसे हिंसक विचारधारा है. ब्राह्मणवाद की ताकत यह है कि यह जिनको मारता है, उन लोगों को भी यह मीठा सा लगता है. बर्फ की छुरी की तरह यह कलेजे पर उतर जाती है और ठंडा सा एहसास होता है. फिर आप मर जाते हैं.ब्राह्मणवाद ही तय करेगा कि आप अपने आदमी को भी अपना आदमी मानेंगे या अपना दुश्मन मानेंगे. यह आपके शरीर को नहीं, दिमाग को कंट्रोल करता है. आप सहमति से ब्राह्मणवाद का शिकार बनते हैं.

चंद्रशेखर रावण जैसे चंद मामलों में ही ब्राह्मणवाद अपनी हिंसा दिखाता है. बाकी मामलों में तो उसका काम अपने आप हो जाता है.वहीं बिहार के सामाजिक साथी रिंकु यादव इस मुद्दे को जिंदा रखने की अपील करते हुए लिखते हैं कि-

भीम-आर्मी…
चंद्रशेखर रावण…
युवा-लोकतांत्रिक-चमार/बहुजन आवाज को खामोश करने की छूट कतई नहीं दे सकते !
लोकतंत्र को योगी-मोदी चोट दे रहा है,
भाजपा-आरएसएस निगल जाने को आगे बढ़ रहा है !
भाजपा विरोधी राजनीति का बड़ा रेंज है,
भाजपा को धूल चटाने के लिए मोर्चाबंदी का शोर है !
लेकिन चंद्रशेखर रावण की रिहाई की आवाज गुम है, क्यों?
क्या चंद्रशेखर की रिहाई के सवाल को भूलकर भाजपा को धूल चटाना है?
सवाल महज एक नौजवान का नहीं है !
*सवाल केवल यूपी का नहीं है !*
*सवाल केवल चमार/बहुजन का नहीं है !*
*सवाल लोकतंत्र के भविष्य का है !*
*सवाल केवल भाजपा को हटाने भर का नहीं है !*
देश में ‘जय भीम’ का नारा बुलंद करने वालों की भारी तादाद है !
‘जय भीम-लाल सलाम’ कहने वाले भी कम नहीं हैं!
क्या हम चुप रहेंगे?
कहीं से तो शुरुआत हो !
*🙏चंद्रशेखर रावण की रिहाई के लिए खड़े होईए, बोलिए, लिखिए !*
चंद्रशेखर रावण को रिहा करो!

मेरे प्यारे देशवासियो एव बाबा साहब के अनुयायियों भाई चन्दर शेखर आजाद के खिलाफ योगी सरकार और समस्त मनुवादी शक्तियाँ गहरी साजिश के तहत काम कर रही है ताकि कोई गरीब और बाबा साहब की विचारधारा को उठाने की कोशिश न करे ये मनुवादी लोग एक जुट होकर भाई चन्दर शेखर को जेल में ही मारना चाहती है उसके खिलाफ बहुत बड़ी साजिश का मुझे अहसास हो रहा है उसे इलाज के नाम पर पर ही मार सकती है यदि हम लोगो ने इस जुल्म और साजिश के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाई तो बहुत देर हो सकती है मैं पूछना चाहता हूँ की क्या अपने समाज पर हो रहे जुल्म के खिलाफ आवाज उठाना अपराध है आज वो लोग आज़ाद घूम रहे है जिन्होंने सहारनपुर में बेगुनहा लोगो का खून बहाया और अपने समाज के हक़ के लिए जिसने आवाज उठाई उसको झूठे मुक़दमे लगा कर जेल में डाल दिया जाता है। मेरी विनती है समाज के सभी भाई बहनो माताओ और खासकर युवाओ से इस मनुवादी सरकार के खिलाफ आवाज उठाकर पूरी ताकत के साथ भाई चंदरसेखर को आज़ाद कराये। हम कानून के दायरे में ही काम करेंगे क्योकि ये कानून हमारे बाबा साहब की दें है सबसे पहले हम देश भक्त है हम जय भीम के साथ जय भारत बोलने वाले लोग है। दोस्तों समय कम है इस मैसेज को ज्यादा से ज्यादा शेयर करे। आपका
ब्रजवीर सिंह, एडवोकेट