आइये जानते हैं ब्राह्मणवाद कैसे हमारी विचारधारा का हिंसा बनता है कैसे हम उसे अपना खुद का विचार समझते हैं , जबकि वो हमारे बचपन के दिनों में किस्से कहानी टीवी मीडिया पढाई फिल्म नाटक अदि के जरिये हमारे व्यक्तित्व में ठूसे जाते हैं…Dilip C Mandal FB (जिस तरह साउथ इंडिया की हिंसक फिल्मे हिंदी में डब कर के दिन रात टीवी पर परोसने से एक हिंसक पीढ़ी तैयार हुई ये चिंता की बात है)


फेसबुक, सोशल मीडिया और वास्तविक जिंदगी में विचार बदलने की कोशिश का बड़ा खेल चलता है.

बहुत लोगों को भ्रम है कि वे दूसरों के विचारों को बदल सकते हैं. इसके लिए वे तर्क से लेकर अफवाह और तथ्य से लेकर झूठ तक का सहारा लेते हैं. लाखों लोग इस कोशिश में लगे रहते हैं, मैं भी अपवाद नहीं हूं.

लेकिन ठहरकर सोचूं तो मेरा मानना है कि हममें से ज्यादातर लोगों के विचार बचपन में ही फिक्स हो चुके होते हैं.

ऐसा बहुत कम होता है कि हम बड़े होने के बाद अपने विचार बदलते हैं. सामान्य स्थितियों में ऐसा ही होता है. विशेष क्रांतिकारी स्थितियों में या किसी ऐतिहासिक घटनाक्रम के समय ही बहुत बड़ी आबादी अपने विचार बदलती हैं.

तो मुद्दे की बात है कि हममें से लगभग हर आदमी बचपन में अपने विचार बना लेता हैं.

इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि बचपन में बच्चा किस तरह की कहानियां सुनता है, कैसा सिनेमा देखता है, कैसे सीरियल देखता है, परिवार में उस पर कैसे बातचीत होती है, टीचर क्या सिखाता है, दोस्त क्या बताते हैं, लोग एक दूसरे के साथ कैसा व्यवहार करते है.

बचपन में अगर बच्चे ने यह सुना है कि गाय में देवता रहते हैं और नाना ने अगर सुनाया है कि मुसलमान लोग गाय खाते हैं और दोस्तों से अगर उसने सुना है कि मुसलमान बहुत क्रूर होते हैं और स्कूल में अगर उसने सुना है कि मुसलमानों की जिद की वजह से भारत के टुकड़े हुए, तो बड़े होने पर एक दिन अगर उसके गांव की मंदिर से घोषणा होता है कि अखलाक के घर में फ्रिज में गोमांस है, तो वह आदमी बाकी सौ लोगों के साथ अखलाक के घर पर हमला कर ही सकता है.

इसके हमारे ‘प्राइमरी सोशलाइजेशन’ का असर माना जाएगा. दरअसल गाय, गोमांस और मुसलमान के बारे में हमारी कहानी बचपन में लिखी जा चुकी है. अखलाक दो Dots के बीच का खाली स्पेस है, जिसे किसी भी समय भरा दिया जा सकता है.

इसे Stock of knowledge at hand भी कह सकते हैं. ऐसी चीजें दिमाग में जमती रहती हैं और यह नॉर्मल होता चला जाता है.

कई स्टीरियोटाइप्स ऐसे ही बनते हैं., जैसे कि भारत में सबसे हिंसक दंगा करने वाले बंगाली कमजोर और नर्मदिल मान लिए जा सकते हैं, यह मान लिया जाता है कि सारे “मद्रासी” इडली, डोसा और इमली खाते हैं, या कि बिहारी गंदे होते हैं या कि सिंधी शातिर होते हैं, या कि ठाकुर लोग साहसी होते हैं, ब्राह्मण समझदार होता है…यह सब सोच हमारे प्राइमरी सोशलाइजेशन से आती है.

भारत जैसे देश में कम से कम सरकार से उम्मीद की जाती है कि वह बच्चों के अंदर लोकतांत्रिक, वैज्ञानिक और सेकुलर जीवन मूल्य स्थापित करने की कोशिश करेेगी. यह सरकार का संवैधानिक दायित्व है. नीति निर्देशक तत्वों के अध्याय में इसका बाकायदा जिक्र है.

लेकिन हमारी सरकार करती क्या है?

करोड़ों बच्चों में जीवन मूल्य स्थापित करने का सबसे ताकतवर तरीका टेक्स्ट बुक हैं. लेकिन उनमें क्या पढ़ाया जा रहा है?

एक उदाहरण देखिए.

छठी क्लास में बच्चों को रामकथा पढ़ाई जा रही है., इसमें बच्चों को एक धार्मिक टेक्स्ट को इतिहास या तथ्य की तरह पढ़ाया जाता है.

इसमें राम का जन्म अगर अयोध्या में होने को तथ्य के तौर पर पढ़ाया जाता है, तो वह बच्चा क्यों नहीं कहेगा कि रामजन्मभूमि पर बनी बाबरी मस्जिद को तोड़ देना चाहिए.

इस किताब में शूर्पनखा की नाक काटी जाती है और तमाम मिथकीय कार्य किए जाते हैं. स्त्री के प्रति व्यवहार का पहला सबक बच्चा इस तरह सीख रहा है.

अब सवाल उठता है कि छठी के बच्चे को, जब उसके विचार बन रहे हैं, तब रामकथा की पूरी किताब पढ़ाई जाए और कबीर और नानक न पढ़ाया जाए, यह फैसला किसने किया?

सॉरी, आप अगर सोच रहे हैं कि यह काम किसी भाजपाई सरकार ने किया या किन्हीं सांप्रदायिक मास्टरों और विचारकों ने यह काम किया है, तो आप गलत हैं.

छठी के बच्चों को कबीर की जगह राम पढ़ाने का फैसला कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार का है और इस किताब को लाने वाली कमेटी के चेयरमैन तथाकथित वामपंथी-सेकुलर नामवर सिंह हैं. पूरी कमेटी घनघोर सेकुलर लोगों से भरी पड़ी है.

बच्चों को बचाओ! उनके दिमाग पर हमला चौतरफा है.

 

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