गौतम बुद्ध और उनके धम्म पर बेहतरीन यूट्यूब हिंदी चैनल पर नया वीडियो : Short Documentary on Buddhist Shrine SANKISSA in HINDI संकिसा- उत्तर प्रदेश-फरुखाबाद में बौद्ध तीर्थ


 

संकिशा अथवा संकिसा भारतवर्ष के उत्तर प्रदेश राज्य के फ़र्रूख़ाबाद जिले के पखना रेलवे स्टेशन से सात मील और मैनपुरी के भोगाओं स्टेशन से १४ किलोमीटर है दूर काली नदी के तट पर, बौद्ध-धर्म स्थान है, इसका प्राचीन नाम संकाश्य है, कहते हैं बुद्ध भगवान स्वर्ग से उतर कर यहीं पर आये थे,हालाँकि स्वर्ग से उतरने वाली बात कहीं भी त्रिपिटक में नहीं लिखी है और जैसा की हम जानते हैं की बुद्ध ने स्वर्ग नर्ग की कल्पना को अस्वीकार कर दिया था तो ऐसे भी उनके स्वर्ग से उतरने वाली बात विरोधी मिलावट के अलावा और कुछ नहीं|

वर्तमान संकिशा एक टीले पर बसा छोटा सा गाँव है, टीला बहुत दूर तक फ़ैला हुआ है, और किला कहलाता है, किले के भीतर ईंटों के ढेर पर बिसहरी देवी का मन्दिर है, बिसहरी देवी गौतम बुद्ध की माँ का नाम था |पास ही अशोक स्तम्भ का शीर्ष है, जिस पर हाथी की मूर्ति निर्मित है, धम्म विरोधियों आताताइयों ने राजनैतिक प्रतिक्रांति में  ने हाथी की सूंड को तोड डाला है।

संकिसा उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद के निकट स्थित आधुनिक संकिस ग्राम से समीकृत किया जाता है हांलंकि भौगोलिक रूप से यह जनपद मैनपुरी  में आता है। कनिंघम ने अपनी कृति ‘द एनशॅंट जिऑग्राफी ऑफ़ इण्डिया’ में संकिसा का विस्तार से वर्णन किया है। संकिसा का उल्लेख महाभारत में किया गया है

उस समय यह नगर पांचाल की राजधानी कांपिल्य से अधिक दूर नहीं था। महाजनपद युग में संकिसा पांचाल जनपद का प्रसिद्ध नगर था। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार यह वही स्थान है, जहाँ बुद्ध, इन्द्र एवं ब्रह्मा सहित स्वर्ण अथवा रत्न की सीढ़ियों से त्रयस्तृन्सा स्वर्ग से पृथ्वी पर आये थे। इस प्रकार गौतम बुद्ध के समय में भी यह एक ख्याति प्राप्त नगर था।

महात्मा बुद्ध का आगमन इसी नगर में महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर यहाँ आये व संघ में स्त्रियों की प्रवृज्या पर लगायी गयी रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर बौद्ध संघ का द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिया गया था। बौद्ध ग्रंथों में इस नगर की गणना उस समय के बीस प्रमुख नगरों में की गयी है। प्राचीनकाल में यह नगर निश्चय ही काफ़ी बड़ा रहा होगा, क्योंकि इसकी नगर भित्ति के अवशेष, जो आज भी हैं, लगभग चार मील (लगभग 6.4 कि.मी.) की परिधि में हैं। चीनी यात्री फ़ाह्यान पाँचवीं शताब्दी के पहले दशक में यहाँ मथुरा से चलकर आया था और यहाँ से कान्यकुब्ज, श्रावस्ती आदि स्थानों पर गया था। उसने संकिसा का उल्लेख सेंग-क्यि-शी नाम से किया है। उसने यहाँ हीनयान और महायान सम्प्रदायों के एक हज़ार भिक्षुओं को देखा था। कनिंघम को यहाँ से स्कन्दगुप्त का एक चाँदी का सिक्का मिला था।

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