1 जनवरी, शौर्य दिवस की आप सबको बधाई|कोरेगांव की लडा़ई का गौरवशाली इतिहास,पुरखों द्वारा एक ऐसा घमासान युद्ध लड़ा गया, जिसमेेें बाप और बेटा एक साथ जंग लड़े और 500 महार सैनिकों ने 28000 पेशवाई फ़ौज को हराकर जंग जीती है।

वो जान हथेली पर रखकर मरने मारने पर उतारू थे, अपनी जान से ज्यादा उन्हें आने वाली पीढ़ी की चिंता थी !
वो नही चाहते थे आने वाली पीढ़ी जाति का दंश झेल कर ब्राह्मण पेशवायों की ग़ुलामी करे, जो वो लोग उस वक़्त तक कर रहे थे !
31 दिसंबर 1817 को शिरूर के ब्रिटिश कैंप से चलते हुए बिना कुछ खाए पिए 43 किलोमीटर निरंतर पैदल चलकर वो 500 महार योद्धा भीमा नदी के पास कोरेगांव के मैदान में जंग लड़ने के लिए पहुंचे !
उन्हें जंग के मैदान में पहुंचने तक तारीख और साल भी बदल चुका था, वो ऐतिहासिक दिन 1 जनवरी थी !
जी हां 1 जनवरी 1818 ब्रिटिश कमांडर एफ स्टॉनटन के नेतृत्व में 500 महार योद्धा इस तारीख को ऐतिहासिक  बनाने के लिए तैयार थे !
उनके सामने ब्राह्मण पेशवा की सबसे मजबूत सेना थी, 20,000 हज़ार घोड्सवार सैनिक और 8,000 पैदल सैनिक !
उनके आँखों में ब्राह्मणवाद से आज़ादी का सपना था, इतनी बड़ी सेना से वो डरे नही, वीरता और सहस का परिचय देते हुए वो लोग 12 घंटों तक लड़े !
500 अनार्य महार योद्धायों ने अपने समर्पित सहस और  स्थिरता से 1 जनवरी की तारीख को ऐतिहासिक बना दिया !
500 महार सैनिकों की वीरता के आगे ब्राह्मण पेशवा की सेना हार कर भाग खड़ी हुई और ब्राह्मण पेशवा साम्राज्य का अंत हुआ !
18 दसक से लगातर चले आ रहे सवर्ण राज के समाप्ती की पहली नींव पड़ी थी कोरेगांव युद्ध में !
वो सही मायने में नायक थे वो 500 थे लेकिन 50,000 के बराबर थे !
अपना नव वर्ष उन्हें याद करके मनाएं !

1 जनवरी, शौर्य दिवस की आप सबको बधाई।1818 को इसी दिन केवल 500 महार सैनिकों ने 29000 पेशवाई फ़ौज को हराकर भारत को जातिमुक्त और लोकतांत्रिक बनाने की दिशा में पहला ऐतिहासिक क़दम बढ़ाया

 

कोरेगांव की महार क्रांति
(1जनवरी 1818)
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संसार के इतिहास में पहली बार हमारे पुरखों द्वारा
एक ऐसा घमासान युद्ध लड़ा गया, जिसमेेें बाप और बेटा एक साथ जंग लड़े और जंग जीती है।

🎯 कोरेगांव का परिचय:

कोरेगांव महाराष्ट्र प्रदेश के अन्तर्गत पूना जनपद की शिरूर तहसील में पूना नगर रोड़ पर भीमा नदी के किनारे बसा हुआ एक छोटा सा गांव है, इस गांव को नदी के किनारे बसा होने के कारण ही इसको भीमाकोरे गांव कहते हैं।इस गांव से गुजरने वाली नदी को भीमा नदी कहते हैं। इस गांव की पूना शहर से दूरी 16 मील है।

🎯पेशवाई शासकों का अमानवीय अत्याचार:

इनके शासन में अछूतों पर अमानवीय अत्यारों की बाढ थी।
1: “पेशवाओं
( ब्राह्मणों) के शासन काल में यदि कोई सवर्ण हिन्दू सड़क पर चल रहा हो तो वहां अछूत को चलने की आज्ञा नहीं होती थी ताकि उसकी छाया से वह हिन्दू भ्रष्ट न हो जाय। अछूत को अपनी कलाई या गले में निशान के तौर पर एक काला डोरा बांधना पडंता था। ताकि हिन्दू भूल से स्पर्श न कर बैठे।”
2: “पेशवाओं की राजधानी पूना में अछूतों के लिए राजाज्ञा थी कि वे कमर में झाडू बांधकर चलें।चलने से भूमि पर उसके पैरों के जो चिन्ह बनें उनको उस झाडू से मिटाते जायें, ताकि कोई हिन्दू उन पद चिन्हों पर पैर रखने से अपवित्र न हो जाय। पूना में अछूतों को गले में मिट्टी की हाड़ी लटका कर चलना पड़ता था ताकि उसको थूकना हो तो उसमें थूके। क्योंकि भूमि पर थूकने से यदि उसके थूक से किसी हिन्दू का पांव पड़ गया तो वह अपवित्र हो जायेगा।”
पेशवाओं के घोर अत्याचारों के कारण महारों में अन्दर ही अन्दर असन्तोष व्याप्त था।वे पेशवाओं से इन जुल्मों का बदला लेने के लिए मौके की तलाश में थे।जब महारों का स्वाभिमान जागा,तब पूना के आस-पास के महार लोग पूना आकर अंग्रेजों की सेना में भर्ती हुए।इसी का प्रतिफल कोरेगांव की लडाई का गौरवशाली इतिहास है।

🎯कोरेगांव की लडा़ई का गौरवशाली इतिहास:
अंग्रेजों की बम्बई नेटिव इंफैंट्री
(महारों की पैदल फौज) फौज अपनी योजना के अनुसार 31दिसम्बर 1817 ई. की रात को कैप्टन स्टाटन शिरूर गांव से पूना के लिए अपनी फौज के साथ निकला। उस समय उनकी फौज “सेकेंड बटालियन फसर्ट रेजीमेंट” में मात्र 500 महार थे। 260 घुड़सवार और 25 तोप चालक थे। उन दिनों भयंकर सर्दियों के दिन थे। यह फौज 31दिसम्बर 1817 ई.की रात में 25 मील पैदल चलकर दूसरे दिन प्रात: 8 बजे कोरेगांव भीमा नदी के एक किनारे जा पहुंची।
1जनवरी सन 1818 ई.को बम्बई की नेटिव इंफैन्टरी फौज( पैदल सेना) अंग्रेज कैप्टन स्टाटन के नेत्रत्व में नदी के एक तरफ थी।
दूसरी तरफ बाजीराव की विशाल फौज दो सेनापतियों रावबाजी और बापू गोखले के नेत्रत्व लगभग 28 हजार सैनिकों के साथ जिसमें दो हजार अरब सैनिक भी थे,सभी नदी के दूसरे किनारे पार काफी दूर-दूर तक फैले हुए थे।”1जनवरी सन 1818को प्रात:9.30
बजे युद्ध शुरू हुआ।
भूखे-थके
महार अपने सम्मान के लिए बिजली की गति से लड़े। अपनी वीरता और बुद्धि बल से ‘करो या मरो’ का संकल्प के साथ समय-समय पर ब्यूह रचना बदल कर बड़ी कड़ाई के साथ उन्होंने पेशवा सेना का मुकाबला किया।युद्ध चल रहा था। कैप्टन स्टाटन ने पेशवाओं की विशाल सेना को देखते हुएअपनी सेना को पीछे हटने के लिए याचना की। महार सेना ने अपने कैप्टन के आदेश की कठोर शब्दों में भर्तसना करते हुए कहा हमारी सेना पेशवाओं से लड़कर ही मरेगी किन्तु उनके सामने आत्म समर्पण नहीं करेगी, न ही पीछे हटेगी,हम पेशवाओं को पराजित किए बिना नहीं हटेंगे।मर जायेंगे।यह महारों का आपसे वादा है।” महार सेना अल्पतम में होते हुए भी पेशवा सेनिकों पर टूट पड़े, तबाई मच गयी।लड़ाई निर्णायक मोड पर थी। पेशवा सेना एक-एक कदम पीछे हट रही थी। लगभग सांय 6 बजे महार सैनिक नदी के दूसरे किनारे पेशवाओं को खदेड़ते-खदेड़ते पहुंच गये और पेशवा फौज लगभग 9 बजे मैदान छोड़कर भागने लगी। इस लड़ाई में मुख्य सेनापति रावबाजी भी मैदान छोड़ कर भाग गया परन्तु दूसरा सेनापति बापू गोखले को भी मैदान छोड़कर भागते हुए को महारों ने पकड़ कर मार गिराया।इस प्रकार लड़ाई एक दिन और उसी रात लगभग 9.30 बजे लगातार 12 घंटे तक लड़ी गयी जिसमें महारों ने अपनी शूरता और वीरता का परिचय देकर विजय हांसिल की।महारों की इस विजय ने इतिहास में जुल्म करने वाले पेशवाओं के पेशवाई शासन का हमेशा के लिए खात्मा कर दिया। भारतीय इतिहास की यह घटना मूलनिवासियों के लिए एक अनूठी मिशाल बनकर हमेशा ऊर्जा प्रदान करती रहेगी।
🎯कोरेगांव का क्रान्ति स्तम्भ:
कोरेगांव के मैदान में जिन महार सैनिकों ने वीरता से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त किया।उनकी याद में अंग्रेजों ने उनके सम्मान में सन 1822 ई.में कोरेगांव में भीमा नदी के किनारे काले पत्थरों का क्रान्ति स्तम्भ का निर्माण किया। सन 1822 ई. में बना यह स्तम्भ आज भी महारों की वीरता की गौरव गाथा गा रहा है।महारों की वीरता के प्रतीक के रूप में अंग्रेजों ने जो विजय स्तम्भ बनवाया है, वहां उन्होंने महारों की वीरता के सम्बन्ध में अंग्रेजों ने स्तुति युक्त वाक्य लिखा-
“One of the pr0udest traimphs of the British Army in the eat “ब्रिटिश सेना को पूरब के देशों में जो कई प्रकार की जीत हांसिल हुई उनमें यह अदभुत जीत है।
इस स्तम्भ को हर साल 1 जनवरी को देश की सेना अभिवादन करने जाती थी। इसे सर्व प्रथम “महार स्तम्भ” के नाम से सम्बोधित किया जाता था। बाद में इसे विजय या फिर “जय स्तम्भ” के नाम से जाना गया।आज इसे क्रान्ति स्तम्भ के नाम से पुकारा जाता है, जो सही दृष्टि में ऐतिहासिक क्रान्ति स्तम्भ है।
यह स्तम्भ 25 गज लम्बे 6गज चौडे और 6गज ऊंचे एक प्लेट फार्म पर स्थापित 30 गज ऊंचा है तथा जैसे-जैसे ऊपर जायेगा ,उसकी चौड़ाई कम होती जायेगी। जिसको सुरक्षा की दृष्टि से लोहे की ग्रिल से कवर किया गया है।
इस लड़ाई में पेशवाओं की हार हुई और महार सैनिकों के दमखम की वजय से अंग्रेज विजयी हुए।कोरे गांव के युद्ध में 20 महार सैनिक और 5 अफसर शहीद हुए। शहीद हुए महारों के नाम, उनके सम्मान में बनाये गये स्मारक(स्तम्मभ) पर अंकित हैं। जो इस प्रकार हैं-
1:गोपनाक मोठेनाक
2:शमनाक येशनाक
3:भागनाक हरनाक
4:अबनाक काननाक
5:गननाक बालनाक
6:बालनाक घोंड़नाक
7:रूपनाक लखनाक
8:बीटनाक रामनाक
9:बटिनाक धाननाक
10:राजनाक गणनाक
11:बापनाक हबनाक
12:रेनाक जाननाक
13:सजनाक यसनाक
14:गणनाक धरमनाक
15:देवनाक अनाक
16:गोपालनाक बालनाक
17:हरनाक हरिनाक
18जेठनाक दीनाक
19:गननाक लखनाक
इस लड़ाई में महारों का नेत्रत्व करने वालों के नाम निम्न थे-
रतननाक
जाननाक
और भकनाक आदि
इनके नामों के आगे सूबेदार, जमादार, हवलदार और तोपखाना आदि उनके पदों का नाम लिखा है।
इस संग्राम में जख्मी हुए योद्धाओं के नाम निम्न प्रकार हैं-
1:जाननाक
2:हरिनाक
3:भीकनाक
4:रतननाक
5:धननाक
आज भी महार रेजीमेंट के सैनिकों बैरी कैप पर कोरेगांव की लड़ाई की याद में बनाए इस स्तम्भ की निशानी को अंकित किया गया है।
बाबासाहेब डा. आम्बेडकर हर साल 1जनवरी को अपने शहीद हुए पूर्वजों को श्रद्धार्पण करने कोरेगांव जाते थे। आज इस पवित्र स्मारक पर लाखों की संख्या में लोग अपने पुरखों को श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं।

ब्रामण पेशवा समाप्त होने बाद इंग्रज ने सभी भारत के लोगो को आज़ादी दि गयी
शिक्षा पहले सुरु की

सन्दर्भ: कोरेगांवकी महार क्रान्ति.

🌷 सबका मंगल हो 🌷

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भारत में नहीं थी जाति वाव्य्स्था और नहीं था कोई चाणक्य मेगास्थनीज़ की पुस्तक इंडिका से खुलासा ….जन उदय

जन उदय : भारत में जातिवाद पूर्ण रूप से ब्राह्मणों के षड्यंत्र के रूप में विकसित हुई क्योकि इसका विवरण भारत के पोरानिक इतिहास में कही नहीं मिलता बल्कि इसका प्रमाण ब्राह्मण अपने ग्रंथो में जो दिखाते है वह तकनिकी और वैज्ञानिक रूप से बोगस है और झूट है . अपने आपको सर्व्श्रेस्थ और भगवान् का प्रतिनिधि बना कर पेश करना और सबसे ज्यादा अधिकार अपने पास रखना और धार्मिक ग्रंथो की रचना कर उनके माध्यम से अपने आपको सभी लोगो पर अत्याचार करने का अधिकार खुद को ले लेना ये सब षड्यंत्र के रूप में ही सामने आये इनके द्वारा लिखे गए रामायण , महाभारत झूठे और काल्पनिक ग्रन्थ है

अब सवाल आता है भारत में एक वर्ग द्वारा फैलाई जा रही भ्रान्तियो के बारे में यानी रामायण और महाभारत कभी इस देश में हुए या नहीं या ये सिर्फ कोरी कल्पना है , इतिहास ने भी विज्ञान के नियमो को अपनाया है और इतिहास
का लेखन वास्तुनिष्ट सामग्री पर लेखन के लिए ही जो डाला गया है , और जब हम वास्तुनिष्ट सबूतों या सामग्री की बात करते है तो उस पर रामायण और महाभारत खरी नहीं उतरती , आइये देखे कैसे

कहानी रामयाण और महाभारत एक एपिक की तरह लिखे गए ज्सिका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक राजनितिक षड्यंत्र तय्यार करना था जिसका पहला उधाह्र्ण है

1.कोई भी वास्तु /शिल्प सबूत नहीं : हर राजा , महाराजा , अपने लिए महल बनवाता है , भवन बनवाता है , बाग़ बगीचे बनवाता है और इन इमारतो को वह कुछ ख़ास तरीके से बनवाता है यानी हम अगर सम्राट अशोक का इतिहास देखे तो हमें सभी प्रकार के सबूत मिलते है वास्तु भी शिल्प भी लेकिन रामायण और महाभारत के इन अभिनेताओं का कुछ भी नहीं मिलता , कुछ संघटनो का कहना है की मंदिर मिले है भगवान् के तो कोई इनसे पूछे क्या भगवान् इन्हों मंदिरों से शासन करते थे ??

2 . हर शासक , राजा , महाराजा अपने शासन काल में अपने सिक्के यानी व्यापार के लिए सिक्के ,मुद्रा चलवाता है , जो निश्चित तोर पर उसकी सीमा और विदेश सीमा यानी उसके शासन के बाहर भी खुदाई में मिलते है लेकिन रामायण , महाभारत काल का ऐसा कुछ भी नहीं मिलता

३. विदेशो से सम्बन्ध एक राजा के लिए बड़े जरूरी होते है , युद्ध भी होते है संधिया भी होती है लेकिन इन दोनों काल के यानी रामायण और महाभारत काल का ऐसा कुछ भी सबूत नहीं मिलता

४. विदेशो से व्यापार , यात्रिओ के लिए धर्मशाला , सुरक्षा वाव्य्स्था बाग़ बगीचे , सराय ये सब भी रहा बनवाता है लेकिन इन दोनों काल का कुछ भी नहीं मिलता

५. संस्कृति – कला ,किसी भी इतिहास में या शासन में अपनी कला और संस्कृति जन्म लेती है , लेखक ,कवी आदि जन्म लेते है लेकिन न तो किताबो के स्तर पर कुछ भी नहीं मिलता , शिल्प , पेंटिंग , नक्काशी , वाल राइटिंग, वाल कार्विंग , भित्ति चित्र आदि इस काल का कुछ भी नहीं मिलता

६. कालखंड . सबसे बड़ी बात होती है कि कोई भी घटना किसी कालखंड में ही होती है यानी उसका अपना एक समय होता है लेकिन इन ग्रंथो का कोई भी कालखंड नहीं है कहने को तो हर धार्मिक संघठन अपनी अपनी दलील देता रहता है , कोई कुछ काल बताता है तो कोई कुछ
इसके अलावा जो ग्रन्थ या किताबे मिली है उनकी भी कार्बन डेटिंग से कोई सबूत नहीं मिलता की ये ग्रन्थ बहुत पुराने है बल्कि इसमें भी घपला है
सो विज्ञान धारणा या कल्पना से शुरू हो सकता है लेकिन हमने उड़ने की कल्पना की लेकिन उड़े कैसे ? इसलिए विज्ञानिक कोई भी तत्थ्य आज तक नहीं है और न ही आयगा

खैर यहाँ पर बात चल रही है जातिवाद की तो हम यहाँ पर किसी भारतीय ग्रन्थ के माध्यम से नहीं बल्कि एक विदेशी सैलानी मेगास्थिज़ के माध्यम से ही सम्झंगे की भारत में जातिवाद या जाति का अस्तितिव ही नहीं था
मेगस्थनीज (Megasthenes, 350 ईसापूर्व – 290 ईसा पूर्व) यूनान का एक राजदूत था जो चन्द्रगुप्त के दरबार में आया था। यूनानी सामंत सिल्यूकस भारत में फिर राज्यविस्तार की इच्छा से 305 ई. पू. भारत पर आक्रमण किया था किंतु उसे संधि करने पर विवश होना पड़ा था। संधि के अनुसार मेगस्थनीज नाम का राजदूत चंद्रगुप्त के दरबार में आया था। वह कई वर्षों तक चंद्रगुप्त के दरबार में रहा। उसने जो कुछ भारत में देखा, उसका वर्णन उसने “इंडिका” नामक पुस्तक में किया है।

इंडिका में मेगास्थिज़ ने भारत में यानी चन्द्रगुप्त के समय में समाज में सात वर्ग बताये यह बात ध्यान में रहे मेगास्थिज़ ने सात वर्ग की बात की है , की जाति की इसमें उसने एक पुरोहित वर्ग बताया जो लोगो को पूजा कराता था और लोगो के पैसे से या समान से अपना जीवन चलाता था लेकिन वह सबसे उपर था ऐसा बिलकुल नहीं था , बल्कि इसको कार्य करने से रोका जा सकता था और वही आदमी फिर समान्य वग में आ जाता था
दूसरा वर्ग किसान का था जो खेती करते थे , तीसरा ग्वाले , का था जो लोग भेड़ बकरिया चराते थे चोथा वर्ग दुकानदार और शिल्पकारो का था जो दूकान चलाते थे ये लोग टेक्स पे करते थे

पांचवा वर्ग सैनिको का था और सबसे बड़े और इज्जतदार लोग यही होते थे ये लोग युद्ध करते थे और शांतिकाल में आराम करते थे

छटा वर्ग सुपरवाइजर का था जो देश समाज में हो रहे हर काम पर निगरानी रखते थे और इन कामो के बारे में राजा को जानकारी देते थे .

सातवा और अंतिम वर्ग मंत्रियो का था जो राज्य से सम्बन्धित हर कार्य में राजा से मंत्रणा करते थे और नीतिया बनाते थे . मेग्स्थिज़ ने एक ही परिवार और वंश में पैदा हुए लोगो को हर तरह के काम करते देखा यानी कोई भी वेग निश्चित और स्थाई नहीं था बल्कि योग्यता के अनुसार अपने वव्साय को चुन सकते थे
अब चूँकि मेगास्थिज़ ३०० बी सी में था और जाति नहीं थी तो ब्राह्मण कैसे कामयाब हो गए इस तरह के समाज का निर्माण करने में
और सबसे बड़ी बात की ब्राह्मण ग्रन्थ जिस किसी चाणक्य नाम के विद्वान की बात करते है और यह जताते है की मौर्य साम्राज्य की स्थापना में उसका बड़ा हाथ था , दरसल मेगास्थनीज ने जब दरबार का वर्णन किया उसमे भी चाणक्य नाम का कोई व्यक्ति नहीं है यानी यह भी एक काल्पनिक किरदार है

वैज्ञानिक रूप से यह बात प्रमाणित है की ब्राह्मण विदेशो से आय कार्य घुमन्तु लोग थे और यहाँ आकर इन्होने शरण मांगी जो इन्हें दे दी गई

इन्होने कई बार इस देश और समाज से गद्दारी करने की कोश्सी की लेकिन ये लोग कामयाब १८० बी सी में हो गए परशुराम / पुष्यमित्र शुंग इसे ब्राह्मण भगवान् भी मानते है क्योकि इसने मौर्य सम्राज्य को धोखे से समाप्त कर ब्राह्मण शासन स्थापित किया इसके अशोक के पोते व्रह्द्स्थ को धोखे से मार दिया था और लाखो बौध लोगो की ह्त्या की और चोरासी हजार बौध विहारों को तोड़ मंदिरों में बदल दिया यह बात सनद रहे कि इससे पहले मंदिर नहीं थे लेकिन लोगो के कुल देवी देवताओं के पूजा गृह थे

इसके बाद इन्होने इन्होने जातिवाद यानी अपने आपको सव्र्श्रेस्थ रखने के लिए ऐसे ग्रंथो की रचना की जिनके जरिये देश में असमानता , बर्बरता , आज भी बरकरार है , और इसी कारण देश का सबसे बड़ा वर्ग तरक्की नहीं कर पाया शिक्षित नहीं हो पाया और यही कारण देश की बदहाली के कारण ये ही लोग है

Source: http://januday.co.in/NewsDetail.aspx?Article=10449

Megasthene traveler visited India during the reign of Chandergupta , his account book Indika revealed that there was no caste system in India instead seven class of workers were there .
Later on caste was created by the Brahman / Aryan Invaders as a part of conspiracy against the aboriginals along with Ramayan , Mahbharat , Manusimriti and other fake scriptures .
Carbon dating of these books has confirmed these books age and are not ancient book but were written during the 180 BC to 230 AD
chankaya is also fake character which was not there in the court of Mourya

मनुस्‍मृति दहन (25 दिसम्‍बर, 1927) की 90वीं वर्षगांठ के मौके पर हमें क्‍या संकल्‍प लेना चाहिए? हमें आज एक ऐसे जाति उन्‍मूलन आन्‍दोलन की आवश्‍यकता है, जो कि सड़कों पर लड़ने की ताक़त रखता हो….. अखिल भारतीय जाति-विरोधी मंच

*मनुस्‍मृति दहन (25 दिसम्‍बर, 1927) की 90वीं वर्षगांठ पर*
*जाति उन्‍मूलन आन्‍दोलन को प्रतीकवाद, सुधारवाद और अर्जियां देने से आगे ले जाने का संकल्‍प लो!*
साथियो,
आज से 90 वर्ष पहले महाड़ में मेहनतकश दलितों ने एक बग़ावत शुरू की थी। इसकी शुरुआत 19-20 मार्च 1927 को बहिष्‍कृत सम्‍मेलन से हुई थी। लेकिन वास्‍तव में इस सम्‍मेलन का विचार आर. बी. मोरे ने मई 1924 में पेश किया, जिन्‍हें बाद में कॉमरेड आर. बी. मोरे के नाम से जाना गया। इस सम्‍मेलन में डा. अम्‍बेडकर को उनकी अकादमिक उप‍लब्धियों के लिए सम्‍मानित करने की योजना बनायी गयी थी। तीन वर्षों की तैयारी के बाद 19-20 मार्च 1927 को महाड़ में यह सम्‍मेलन हुआ और सम्मेलन की समाप्ति के ठीक पहले अनन्‍त विनायक भाई चित्रे के प्रस्‍ताव पर यह निर्णय लिया गया कि सभी एकत्र लोग साथ जाकर बोले प्रस्‍ताव को लागू करें और चावदार तालाब से पानी पियें। बोले प्रस्‍ताव को *महाड़ के नगरनिगम ने पास कर दिया था, जिसके अनुसार सभी सार्वजनिक जल भंडार दलितों के लिए खुले होंगे। 20 मार्च 1927 को दलितों ने चावदार तालाब से पानी लेकर पिया।* जुलूस की अगुवाई डा. भीमराव अम्‍बेडकर ने की। इसके बाद वापस लौटते दलितों पर जातिवादी ब्राह्मणवादी गुण्‍डा ताक़तों ने हमले किये। मेहनतकश और जुझारू दलित हज़ारों की तादाद में महाड़ में मौजूद थे और इन हमलों का जवाब देना चाहते थे। मगर *डा. अम्‍बेडकर ने उन्‍हें ऐसा करने से रोक दिया और कानून के दायरे में रहकर काम करने का निर्देश दिया।* इसके बाद 25 दिसम्‍बर 1927 को डा. अम्‍बेडकर के नेतृत्‍व में चावदार तालाब से फिर से पानी लेने के लिए सत्‍याग्रह आयोजित करने का प्रण लिया गया।
इस सत्‍याग्रह के लिए लम्‍बी तैयारियां की गयीं। इसी सत्‍याग्रह के लिए आयोजित सम्‍मेलन के पहले दिन (25 दिसम्‍बर 1927)  मनुस्‍मृति के चुने हुए हिस्‍सों को बापू सहस्रबुद्धे ने हवनकुण्‍ड की अग्नि के हवाले किया। डा. अम्‍बेडकर मनुस्‍मृति के उन हिस्‍सों को बापू सहस्रबुद्धे को सौंप रहे थे। *यह जाति उन्‍मूलन के लिए ब्राह्मणवादी विचारधारा पर चोट करने की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण प्रतीकात्‍मक कदम था। इस दिन का इस रूप में ऐतिहासिक महत्‍व है।* बाद में, महाड़ सत्‍याग्रह न हो सका क्‍योंकि ब्राह्मणवादी ताक़़तों ने ब्रिटिश कोर्ट से स्‍थगन आदेश ले लिया था और कलेक्‍टर ने स्‍वयं सम्‍मेलन में आकर एक भाषण दिया, जो वास्‍तव में कानून न तोड़ने की धमकी थी। इसके बावजूद सम्‍मेलन के बहुमत ने निर्णय लिया कि कानून तोड़कर भी सत्‍याग्रह किया जाय। लेकिन सम्‍मेलन के तीसरे दिन सुबह डा. अम्‍बेडकर के प्रस्‍ताव पर यह निर्णय लिया गया कि *ब्रिटिश सरकार व कानून के विरुद्ध नहीं जाना चाहिए।* सम्‍मेलन का समापन एक प्रतीकात्‍मक जुलूस के साथ हुआ। इसके बाद *करीब दस वर्ष तक डा. अम्‍बेडकर ब्रिटिश अदालत के फैसले के खिलाफ केस लड़ते रहे।* अन्‍त में बॉम्‍बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि दलितों को चावदार तालाब से पानी पीने का हक़ है क्‍योंकि वह सार्वजनिक तालाब है और केस में डा. अम्‍बेडकर की विजय हुई। मगर *तब तक वह महान विद्रोह समाप्‍त हो चुका था, जिसे ग़रीब मेहनतकश दलितों ने महाड़ में 1927 में शुरू किया था।*
इसके बावजूद, मनुस्‍मृति दहन का एक प्रतीकात्‍मक महत्‍व था और यह दूसरे महाड़ सम्‍मेलन की उपलब्धि था। इस प्रतीकात्‍मक घटना ने दलित आबादी के बीच एक आत्‍मविश्‍वास पैदा करने और दिमागी गुलामी की बेडि़यों को तोड़ने में एक भूमिका निभायी। उस दौर में, एक प्रतीकात्‍मक कदम का भी एक महत्‍व था, जो कि किसी भी दमित शोषित आबादी के आन्‍दोलन के शुरुआत में होता है।
लेकिन साथियो! *आज हम महज़ प्रतीकात्‍मक कदमों के दौर से बहुत आगे आ चुके हैं। दलित आबादी का 89 प्रतिशत कामगार है।* ये कामगार समझते हैं कि जहां सम्‍मान की लड़ाई को लड़ना जरूरी है, वहीं यह भी सच है कि अपने आर्थिक और राजनीतिक हक़ों को हासिल किये बिना सामाजिक सम्‍मान की लड़ाई भी अधूरी रहेगी। वे अपने भौतिक अधिकारों के लिए भी सड़कों पर उतरते रहे हैं। 1907 में महान अय्यंकली के विद्रोह से लेकर वाईकोम सत्‍याग्रह, तेलंगाना, तेभागा, पुनप्रा वायलार में खेतिहर दलित मज़दूरों के संघर्ष और फिर देश के अलग-अलग हिस्‍सों में 1960 और 1970 के दशक में सवर्ण जमीन्‍दारों के खिलाफ दलितों के जुझारू संघर्षों तक, जाति-उन्‍मूलन की लड़ाई ने एक लम्‍बा सफर तय किया है। इस लड़ाई में डा. भीमराव अम्‍बेडकर ने भी दलितों के बीच सम्‍मान और गरिमा का बोध स्‍थापित करने में महत्‍वपूर्ण योगदान किया और ब्रिटिश सरकार से कई कानूनी अधिकार व रियायतें हासिल कीं।
*आज हम जिस मुकाम पर खड़े हैं वहां केवल प्रतीकात्‍मक कदमों से काम नहीं चल सकता। आज दलितों के सम्‍मान के लिए भी सिर्फ अरजि़यां देने, मुकदमे लड़ने और सरकारों को ज्ञापन देने से ज्‍यादा कुछ नहीं होने वाला है और सड़कों पर उतरकर लड़ने की जरूरत है। क्‍या अदालतों में ग़रीब दलित आबादी के लिए न्‍याय है?* क्‍या बथानी टोला, लक्ष्‍मणपुर बाथे के हत्‍यारों को सज़ा मिली? क्‍या दलित विरोधी उत्‍पीड़न में कानूनों, मुकदमों और अर्जियों से कोई कमी आयी है? क्‍या अस्मितावादी राजनीति करने वाले तथाकथित दलित चुनावी और गैर-चुनावी दल वोट बैंक और प्रतीकात्‍मक मुद्दों से आगे जाते हैं? नहीं।
ऐसे में, मनुस्‍मृति दहन की वर्षगांठ के मौके पर हमें क्‍या संकल्‍प लेना चाहिए? हमें आज एक ऐसे जाति उन्‍मूलन आन्‍दोलन की आवश्‍यकता है, जो कि सड़कों पर लड़ने की ताक़त रखता हो; जो मेहनतकशों की वर्ग एकजुटता खड़ी कर सवर्णवादी पूंजीवादी ताक़तों से लड़ने की कूव्‍वत रखता हो; जो मेहनतकश आबादी में व्‍याप्‍त जातिगत पूर्वाग्रहों के विरुद्ध एक लम्‍बा प्रचार और शिक्षण चला सकता हो। *आज जो सत्‍ता में बैठा है वह है पूंजीवाद, ब्राह्मणवादी, जातिवादी अस्मितावाद का गठजोड़; आज जो लुट रहा है वह है मज़दूर-मेहनतकश, जिसका एक अच्‍छा-खासा हिस्‍सा है ग़रीब दलित आबादी, पिछड़ी जातियों की आबादी, स्त्रियां और आदिवासी। सत्‍ता में बैठे पूंजीवादी, ब्राह्मणवादी, जातिवादी अस्मितावादी अपने वर्ग हितों पर एकजुट हैं, लेकिन जो लुट रहे हैं, बरबाद हो रहे हैं, जिनके खिलाफ उत्‍पीड़न हो रहा है, वे बंटे हुए हैं। ऐसे में, हमें एक ऐसा जाति-विरोधी आन्‍दोलन खड़ा करना होगा जोकि वर्ग एकजुटता पर आधारित हो और जो कानून, अदालत, संवैधानिक व्‍यवस्‍था को लेकर किसी भ्रम का शिकार न हो; जो अर्जियां देने और प्रतीकात्‍मक मुद्दों से आगे जाता हो।* क्‍या पिछले कई दशकों से दलित मुक्ति और जाति-उन्‍मूलन के आन्‍दोलन के अस्मितावाद, प्रतीकवाद, सुधारवाद और कानूनवाद के गोल चक्‍कर में अटके रहने से पहले ही हम काफी नुकसान नहीं उठा चुके हैं? हमें इस गोल चक्‍कर से तत्‍काल निकलने की आवश्‍यकता है। आइये, आज के दिन एक जुझारू वर्ग आधारित जाति-उन्‍मूलन आन्‍दोलन खड़ा करने की शपथ लें।
ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद! जातिवाद मुर्दाबाद! अस्मितावाद मुर्दाबाद! पूंजीवाद मुर्दाबाद! सुधारवाद मुर्दाबाद!
समूची मेहनतकश आबादी की वर्ग एकता जिन्‍दाबाद!
🔴नौजवान भारत सभा
🔴अखिल भारतीय जाति-विरोधी मंच
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पिछले कुछ सालों से स्कूल कॉलेज के सिलेबस में दिखाई सुनाई देने वाली मनुस्मृति का एक पक्ष ये भी है की इसे डॉ आंबेडकर ने सार्वजानिक रूप से जलाया था और तबसे हर साल २५ दिसंबर को जलाया जाता है -आइये जाने की 25-Dec मनुस्मृति दहन दिवस को मनुस्मृति क्यों जलाई जाती है

PDF download of manusmriti Available in following link:

https://drive.google.com/file/d/0BxcTXJRxuCcVc2Q0SDNfY2J0cEE/view?pref=2&pli=1

इससे पहले की हम मनुस्मृति क्यों जलाई गयी को जाने, मनुस्मृति का मकसद जान लेते हैं, मनुस्मृति संविधान इसलिए लिखा गया था की हारे हुए बौद्ध/राक्षश/असुर/दलित  फिर दोबारा संगठित होकर सर न उठा पाएं, उनका परमानेंट गुलाम बनाने का ग्रन्थ है मनुस्मृति, आईये मनुस्मृति पर ओशो जी के विचार से शुरू करते हैं

 

“ गरीब आदमी तो क्रांति की कल्पना भी नहीं कर सकते क्योंकि उसको तो किसी भी प्रकार कि शिक्षा की अनुमति ही नहीं दी गई. उसे अपने से उपर के तीन वर्णों से किसी भी संपर्क से मना कर दिया गया वो शहर के बाहर रहता है वो शहर के अंदर नहीं रह सकता.गरीब लोगों के कुँए इतने गहरे नहीं हैं वे कुँए बनाने में ज्यादा पैसा नहीं डाल सकते हैं. व्यवसायियों के पास अपने बड़े और गहरे कुँए है और राजा के पास अपने कुँए है ही। अगर कभी बारिश नहीं आए और उसके कुँए सूख रहे होते हैं, तो भी शूद्र को अन्य किसी के कुएं से पानी लेने की अनुमति नहीं है उसको किसी नदी से पानी लाने के लिए दस मील दूर जाना पड़ सकता है. वो इतना भूखा है की दिन मे एक बार के भोजन का प्रबंधन करना भी मुश्किल है |उसको कोई पोषण नहीं मिलता,वे कैसे क्रांति के बारे में सोच सकते हैं? वह यह जानता है कि कि यही उसकी किस्मत है: पुजारी ने उनको यही बताया है यही उनकी मानसिकता में जड़ कर गया है|“इश्वर ने आप को अपने पर भरोसा दिखाने का मौका दे दिया है. यह गरीबी  कुछ भी नहीं है, यह कुछ वर्षों के लिए ही है,आप वफादार रह सकते हैं तो आपको महान फ़ल मिलेगा”| तो एक तरफ़ तो पुजारी किसी भी परिवर्तन के खिलाफ उन्हें ये उपदेश देता जाता है है, और दूसरी तरफ वे परिवर्तन कर भी नहीं सकते क्योकि वे कुपोषण का शिकार हैं. और आप के लिये एक बात समझने की है कि कुपोषित व्यक्ति बुद्धि बल खो देता है. बुद्धि बल वहीँ खिलता है जहाँ वो सब कुछ होता है है जिसकी शरीर को जरूरत है,इतना ही नहीं इसके साथ साथकुछ औरभी चाहिए. ये जोकुछ औरऔर है यही तो बुद्धि हो जाता है,बुद्धि एक लक्जरी है. एक दिन में केवल एक बार भोजन करने वाला व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं है, बुद्धि विकसित करने के लिए उस्के पास कोई ऊर्जा नहीं है. यह बुद्धिजीवी वर्ग है जो विचारों, नए दर्शन, जीवन के नए तरीके, भविष्य के लिए नए सपने बनाता है| लेकिन यहाँ बुद्धिजीवि तो शीर्ष पर पहले से ही है. वास्तव में भारत मे जबरदस्त महत्व का काम किया गया है विश्व का कोई अन्य देश इतना सक्षम नहीं है कि  इस तरह के किसी वैज्ञानिक तरीके से यथास्थिति बनाए रखें. और आप हैरान होंगे ये एक आदमी ने किया, वो मनु था. हजारों साल बाद उसके सूत्र अभी भी  वास्तव में वैसे के वैसे पालन किये जा रहे हैं|” … ओशो रजनीश. Book Title: The Last Testament, Vol. 2.       //  Chapter 6: The Intelligent Way

क्या आपको पता है पिछले कुछ सालों से मनुस्मृति का ज्यादा ही गुणगान हो रहा है यहाँ तक की स्कूल कालेजों के सिलेबस में भी अक्सर देखने को मिल रही है और परीक्षा में भी पुछा जा रही है, http://indianexpress.com/article/india/rss-outfit-wants-manusmriti-reworked-mahesh-sharma-culture-ministry-4654823/

जिस महापुरुष ने अपने ग्रंथों को रखने के लिए ‘राजगृह’ जैसा विशाल भवन बनवाया था, उसी ने २५ दिसंबर १९२७ के दिन एक पुस्तक जला दी थी. आखिर क्यों?

जिस महापुरुष के पास लगभग तीस हज़ार से भी अधिक मूल्य की निजी पुस्तकें थीं, उसी ने एक दिन एक पुस्तक जला दी थी. आखिर क्यों?

जिस महापुरुष का पुस्तक-प्रेम संसार के अनेक विद्वानों के लिए नहीं, अनेक पुस्तक-प्रकाशकों और विक्रेताओं तक के लिए आश्चर्य का विषय था, उसी ने एक दिन एक पुस्तक जला दी थी. आखिर क्यों?

उस पुस्तक का नाम क्या था?

उसका नाम था ‘मनु-स्मृति’. आइये हम जाने कि वह क्यों जलाई गयी?

इस पुस्तक में ऐसा हलाहल विष भरा है कि जिसके चलते इस देश में कभी राष्ट्रीय एकीकरण का पौधा कभी पुष्पित और पल्लवित नहीं हो सकता!

वैसे तों इस पुस्तक में सृष्टि की उत्पत्ति की जानकारी भी दी गयी है लेकिन असलियत यह सब अज्ञानी मन के तुतलाने से अधिक कुछ भी नहीं हैं.

मनु स्मृति की इतने बढ़-चढ कर ज्ञान की डींगे बघारी गयी है उसका असली उद्देश्य जातिवाद का निर्माण और स्त्री को निंदनीय तथा निम्न बताना भर है. इसमे निहित आदेश निर्लज्जता से ब्राह्मणों के हित में हैं.

कहने वाले तो कहते हैं कि मनुस्मृति और उसकी आज्ञाएं कब कि मर चुकी हैं, अब गड़े मुर्दे उखाडने से क्या फायदा?

लेकिन सच पूछे कि क्या वाकई मनुस्मृति मर चुकी है.

ऐसा नहीं हैं, आज भी विश्वविद्यालयों में मनुस्मृति पाठ्यपुस्तक के रूप में पढाई जाती है. जयपुर हाईकोर्ट के परिसर में आज भी मनु की मूर्ति भारत के संविधान को चिढ़ाते स्थित है.

यूँ तो आज नये नए कानून बन गए हैं परन्तु दुःख कि बात है कि आज भी वास्तव में हम मनु स्मृति से ही संचालित हो रहे हैं.न जाने हम कब इस कब्र से बाहर निकलेंगे.

प्रश्न है कि डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर ने आखिर यही पुस्तक क्यों जलाई?

इसका उत्तर साफ़ है कि जिस कारण महात्मा गाँधी ने अनगिनत विदेशी कपड़े जलवाये थे. धर्मशास्त्र माने जाने वाले इस कुकृत्य को नष्ट करने के लिए क्या इसे जलाना अनिवार्य नहीं था?

कहने वाले कहते हैं कि आज मनुस्मृति को कौन जानता और मानता है, इसलिए अब मनु स्मृति पर हाथ धो कर पड़ने से क्या फायदा- यह एक मरे हुए सांप को मारना है. हमारा कहना है कि कई सांप इतने जहरीले होते हैं कि उन्हें सिर्फ मारना ही पर्याप्त नहीं समझा जाता बल्कि उसके मृत शरीर से निकला जहर किसी को हानि न पहुंचा दे इसलिए उसे जलाना भी पड़ता है.

वैसे मनु स्मृति जैसी घटिया किताब कि तुलना बेचारे सांप से करना मुझे अच्छा नहीं लग रहा. बेचारे सांप तों यूँ ही बदनाम हैं, और अधिकाँश तों यूँ ही मार दिए जाते हैं. फिर भी सांप के काटने से एकाध आदमी ही मरता हैं जबकि मनु स्मृति जैसे ग्रन्थ तों दीर्घकाल तक पूरे समाज को डस लेते हैं. क्या ऐसे कृतियों की अंत्येष्टि यथासंभव किया जाना अनिवार्य नहीं हैं?

वैसे मनुस्मृति के अलावा भी हिंदुओं की तमाम स्मृतियाँ और ग्रन्थ में शूद्रों (आज के ओबीसी और दलित) तथा महिलाओं को हेय दृष्टि से देखते हुए उन्हें ताडन का अधिकारी बताती है. बाबासाहेब ने १९२७ में जो मनुस्मृति जलाई थी वह अकेली एक पुस्तक से घृणा होने के कारण नहीं, बल्कि इसे अन्य तमाम स्मृतियों और किताबों का प्रतिनिधि ग्रन्थ मानकर की थी. लेकिन आश्चर्य तो इस बात का है कि भारत सरकार आज तक इस राष्ट्र-विरोधी किताब पर प्रतिबन्ध लगाकर इसे जब्त नहीं कर रही.

 

मनुवादी व्यवस्था और शुद्र

मनुवादी अथवा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के अधीन रामचरित मानस , व्यास स्मृति और मनु स्मृति प्रमाणित करती है कि भारत का समस्त पिछड़ा वर्ग एवं अछूत वर्ग शूद्र और अतिशूद्र कहलाता है जैसे कि तेली , कुम्हार , चाण्डाल , भील , कोल , कल्हार , बढई , नाई , ग्वाल , बनिया , किरात , कायस्थ , भंगी , सुनार इत्यादि । मनुविधान अर्थात मनुस्मृति में उक्त शूद्रों के लिए मनु भगवान द्वारा उच्च संस्कारी कानून बनाये गए हैं जिनको पढ़ कर उनका अनुसरण करने से उक्त समाज के सभी लोगों का उद्धार हो जायेगा और हमारा भारत पुनः सोने की चिड़िया बन जायेगा । आपके समक्ष मनु भगवान के अमृतमयी क़ानूनी वचन पेश हैं –
-जिस देश का राजा शूद्र अर्थात पिछड़े वर्ग का हो , उस देश में ब्राह्मण निवास न करें क्योंकि शूद्रों को राजा बनने का अधिकार नही है ।
-राजा प्रातःकाल उठकर तीनों वेदों के ज्ञाता और विद्वान ब्राह्मणों की सेवा करें और उनके कहने के अनुसार कार्य करें ।
-जिस राजा के यहाँ शूद्र न्यायाधीश होता है उस राजा का देश कीचड़ में धँसी हुई गाय की भांति दुःख पाता है ।
-ब्राह्मण की सम्पत्ति राजा द्वारा कभी भी नही ली जानी चाहिए , यह एक निश्चित नियम है , मर्यादा है , लेकिन अन्य जाति के व्यक्तियों की सम्पत्ति उनके उत्तराधिकारियों के न रहने पर राजा ले सकता है ।
-नीच वर्ण का जो मनुष्य अपने से ऊँचे वर्ण के मनुष्य की वृत्ति को लोभवश ग्रहण कर जीविका – यापन करे तो राजा उसकी सब सम्पत्ति छीनकर उसे तत्काल निष्कासित कर दे ।
-ब्राह्मणों की सेवा करना ही शूद्रों का मुख्य कर्म कहा गया है । इसके अतिरक्त वह शूद्र जो कुछ करता है , उसका कर्म निष्फल होता है ।
-यदि कोई शूद्र किसी द्विज को गाली देता है तब उसकी जीभ काट देनी चाहिए , क्योंकि वह ब्रह्मा के निम्नतम अंग से पैदा हुआ है ।
-यदि शूद्र तिरस्कार पूर्वक उनके नाम और वर्ण का उच्चारण करता है , जैसे वह यह कहे देवदत्त तू नीच ब्राह्मण है , तब दश अंगुल लम्बी लोहे की छड़ उसके मुख में कील दी जाए ।
-निम्न कुल में पैदा कोई भी व्यक्ति यदि अपने से श्रेष्ठ वर्ण के व्यक्ति के साथ मारपीट करे और उसे क्षति पहुंचाए , तब उसका क्षति के अनुपात में अंग कटवा दिया जाए ।
-ब्रह्मा ने शूद्रों के लिए एक मात्र कर्म निश्चित किया है , वह है – गुणगान करते हुए ब्राह्मण , क्षत्रिय और वैश्य की सेवा करना ।
-शूद्र यदि ब्राह्मण के साथ एक आसन पर बैठे , तब राजा उसकी पीठ को तपाए गए लोहे से दगबा कर अपने राज्य से निष्कासित कर दे ।
-यदि शूद्र गर्व से ब्राह्मण पर थूक दे तब राजा दोनों ओंठों पर पेशाब कर दे तब उसके लिंग को और अगर उसकी ओर अपान वायु निकाले तब उसकी गुदा को कटवा दे ।
-यदि कोई शूद्र ब्राह्मण के विरुद्ध हाथ या लाठी उठाए , तब उसका हाथ कटवा दिया जाए और अगर शूद्र गुस्से में ब्राह्मण को लात से मारे , तब उसका पैर कटवा दिया जाए ।
-इस पृथ्वी पर ब्राह्मण – वध के समान दूसरा कोई बड़ा पाप नही है । अतः राजा ब्राह्मण के वध का विचार मन में भी लाए ।
-शूद्र यदि अहंकारवश ब्राह्मणों को धर्मोपदेश करे तो उस शूद्र के मुँह और कान में राजा गर्म तेल डलवा दें ।
-राजा बड़ी बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ करें और धर्म के लिए ब्राह्मणों को स्त्री , गृह शय्या , वाहन आदि भोग साधक पदार्थ तथा धन दे ।
-जानबूझ कर क्रोध से यदि शूद्र ब्राह्मण को एक तिनके से भी मारता है , वह 21 जन्मों तक कुत्ते बिल्ली आदि पापश्रेणियों में जन्म लेता है ।
-ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न होने से और वेद के धारण करने से धर्मानुसार ब्राह्मण ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी है ।
-शूद्र को भोजन के लिए झूठा अन्न , पहनने को पुराने वस्त्र , बिछाने के लिए धान का पुआल और फ़टे पुराने वस्त्र देना चाहिए ।
-बिल्ली , नेवला , नीलकण्ठ , मेंढक , कुत्ता , गोह , उल्लू , कौआ किसी एक की हिंसा का प्रायश्चित शूद्र की हत्या के प्रायश्चित के बराबर है अर्थात शूद्र की हत्या कुत्ता बिल्ली की हत्या के समान है ।
-शूद्र लोग बस्ती के बीच में मकान नही बना सकते । गांव या नगर के समीप किसी वृक्ष के नीचे अथवा श्मशान पहाड़ या उपवन के पास बसकर अपने कर्मों द्वारा जीविका चलावें ।
-ब्राह्मण को चाहिए कि वह शूद्र का धन बिना किसी संकोच के छीन लेवे क्योंकि शूद्र का उसका अपना कुछ नही है । उसका धन उसके मालिक ब्राह्मण को छीनने योग्य है ।
-धन संचय करने में समर्थ होता हुआ भी शूद्र धन का संग्रह न करें क्योंकि धन पाकर शूद्र ब्राह्मण को ही सताता है ।
-राजा वैश्यों और शूद्रों को अपना अपना कार्य करने के लिए बाध्य करने के बारे में सावधान रहें , क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्य से विचलित हो जाते हैं तब वे इस संसार को अव्यवस्थित कर देते हैं ।
-शूद्रों का धन कुत्ता और गदहा ही है । मुर्दों से उतरे हुए इनके वस्त्र हैं । शूद्र टूटे फूटे बर्तनों में भोजन करें । शूद्र महिलाएं लोहे के ही गहने पहने ।
-यदि यज्ञ अपूर्ण रह जाये तो वैश्य की असमर्थता में शूद्र का धन यज्ञ करने के लिए छीन लेना चाहिए ।
-दूसरे ग्रामवासी पुरुष जो पतित , चाण्डाल , मूर्ख , धोबी आदि अंत्यवासी हो उनके साथ द्विज न रहें । लोहार , निषाद , नट , गायक के अतिरिक्त सुनार और शस्त्र बेचने वाले का अन्न वर्जित है ।
-शूद्रों के समय कोई भी ब्राह्मण वेदाध्ययन में कोई सम्बन्ध नही रखें , चाहे उस पर विपत्ति ही क्यों न आ जाए ।
-स्त्रियों का वेद से कोई सरोकार नही होता । यह शास्त्र द्वारा निश्चित है । अतः जो स्त्रियां वेदाध्ययन करती हैं , वे पापयुक्त हैं और असत्य के समान अपवित्र हैं , यह शाश्वत नियम है ।
-अतिथि के रूप में वैश्य या शूद्र के आने पर ब्राह्मण उस पर दया प्रदर्शित करता हुआ अपने नौकरों के साथ भोज कराये ।
-शूद्रों को बुद्धि नही देना चाहिए अर्थात उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का अधिकार नही है । शूद्रों को धर्म और व्रत का उपदेश न करें ।
-जिस प्रकार शास्त्रविधि से स्थापित अग्नि और सामान्य अग्नि , दोनों ही श्रेष्ठ देवता हैं , उसी प्रकार ब्राह्मण चाहे वह मूर्ख हो या विद्वान दोनों ही रूपों में श्रेष्ठ देवता है ।
-शूद्र की उपस्थिति में वेद पाठ नही करना चाहिए । ब्राह्मण का नाम शुभ और आदर सूचक , क्षत्रिय का नाम वीरता सूचक , वैश्य का नाम सम्पत्ति सूचक और शूद्र का नाम तिरस्कार सूचक हो ।
-दस वर्ष के ब्राह्मण को 90 वर्ष का क्षत्रिय , वैश्य और शूद्र पिता समान समझ कर उसे प्रणाम करे ।
-मनु के उपवर्णित विधानों से अनुमान लगाया जा सकता है कि शूद्रों अतिशूद्रों पर किस प्रकार और कितने अमानवीय अत्याचार हुए हैं ।

 

इस प्रकार के क्रूर और –रोंगटे खड़े कर देने वाले विधान लिखे गए हैं । मनु के इन अमानवीय विधानों से भारत का हाथी जैसा मूल निवासी बहुसंख्यक समाज मानव होते हुए भी पशु के समान जीवन जीने को मजबूर हो गया । मनु के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण शूद्र और अतिशूद्र समाज मरे हुए जानवरों के सड़े से सड़े मांस को नोचकर खाने को मजबूर हो गए । मनु द्वारा ब्राह्मणों को दिए गए विशेषाधिकारों ने ब्राह्मणों में शूद्रों और अछूतों के प्रति निर्ममता और अमानवीयता का भाव भर दिया । मनुविधान में वर्णित मूर्ख , गवाँर और कुकर्मी ब्राह्मण भी मूल निवासियों पर आधिपत्य स्थापित कर उन्हें जीवन भर गुलाम बनाने के लिए उनको कई हजार जातियों में बांटा । ( शूद्र अर्थात पिछड़ी जातियां – 3742 और अतिशूद्र sc st 1500 और 1000 ) । ब्राह्मणों ने मूल निवासियों को न केवल जातियों में विभक्त किया बल्कि उनमें ऊँच – नीच का भेद – भाव भी पैदा किया ताकि इन जातियों में आपस में फ़ूट रहे और वे उन पर राज करते रहें । महामानव महान सामाजिक क्रांतिकारी ज्योतिराव फुले का कहना था, अंग्रेजों और मुसलमानों ने तो हमारे शरीर को ही गुलाम बनाया परन्तु ब्राह्मणों ने तो हमारी चेतना को ही गुलाम बना डाला ।
इस प्रकार मनु के विधान के फलस्वरुप समाज में जातिवाद , ऊंच – नीच , छुआछूत , पैतृक – पौरोहिताई , वर्णवाद , कर्मकाण्ड का वातावरण फ़ैल गया । इससे केवल ब्राह्मणों को ही लाभ हुआ तथा शूद्रों का घोर अहित हुआ । उनमें हीनता का भाव पनप गया । ब्राह्मणों द्वारा भाग्यवाद , पुनर्जन्मवाद और ईश्वरवाद के बिछाये जाल में फंस कर बहुजन अपने मान और सम्मान के प्रति संवेदना ही नष्ट कर बैठे । उनमें एक अच्छा इंसान बनने की चाहत समाप्त हो गई । यह सब मनु द्वारा रचित मनुस्मृति के कारण हुआ । मनुवाद विध्वंसक , अपराधिक प्रवृत्ति युक्त , असमानता पर आधारित , लालची एवं स्वार्थी मनोवृत्ति वाला , हिंसक एवं बेईमान , क्रूर , उत्पीड़क , निकम्मा तथा दूसरों का घातक शत्रु है । इस व्यवस्था ने इस देश के मूल निवासियों को शूद्र और अतिशूद्र बना कर उन्हें लम्बे अरसे तक जानवर की जिंदगी व्यतीत करने को मजबूर किया । मनुवाद हमेशा समाज को दिग्भ्रमित करता है तथा बहकाता है । यह बहुजनों और महिलाओं को हमेशा हतोत्साहित करता है । यह घोर भौतिकवादी और अवसरवादी है । बहुजन समाज की उन्नति और मुक्ति के लिए मनुवाद को पुनः दफनाने की जरूरत है । क्या हिन्दुवादी अर्थात ब्राह्मणवादी लोग ये बताने का कष्ट करेंगे कि उपरयुक्त् मनु के क्रूर विचारों और विधानों से क्या पिछड़े वर्ग के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत नही होती हैं ? क्या उनको अपने देश में एक सम्मान और मौलिक अधिकारों के साथ जीने का अधिकार नही है । क्या इससे हिन्दू धर्म की आस्था को ठेस नही पहुंचती है ? क्या विचार धारा से हिंदुओं में फ़ूट उत्पन्न नही होती है ?

http://teesrijungnews.com/literature/%E0%A4%AE%E0%A4%A8%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%80-%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%B5%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%A5%E0%A4%BE-%E0%A4%94%E0%A4%B0-%E0%A4%B6%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D/

संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की वजह से चुनकर आने वाले लगभग बारह सौ जनप्रतिनिधियों ने अपने समुदाय को लगातार निराश किया है. दलित और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि बेहद निकम्मे साबित हुए हैं. DILIP C MANDAL BBC

संसद और विधानसभाओं में आरक्षित सीटों की वजह से चुनकर आने वाले लगभग बारह सौ जनप्रतिनिधियों ने अपने समुदाय को लगातार निराश किया है. दलित और आदिवासी हितों के सवाल उठाने में ये जनप्रतिनिधि बेहद निकम्मे साबित हुए हैं.

लेकिन इसमें उनकी कोई ग़लती नहीं है उनका ऐसा करना एक संरचनात्मक मजबूरी है क्योंकि उनका चुना जाना उनके अपने समुदाय के वोटों पर निर्भर ही नहीं है.

मिसाल के तौर पर जिग्नेश मेवानी वडगाम सीट पर 15 प्रतिशत दलित वोटर की वजह से नहीं, 85 प्रतिशत ग़ैर-दलित वोटरों के समर्थन से चुने गए हैं. उस सीट के सारे दलित मिलकर भी कभी किसी को जिता नहीं सकते.

सुरक्षित सीटों पर कोई भी ऐसा जनप्रतिनिधि चुनकर नहीं आ सकता, जो दलित या आदिवासी हितों के लिए आक्रामक तरीके से संघर्ष करता हो, और ऐसा करने के क्रम में अन्य समुदायों को नाराज़ करता हो. रिज़र्व सीटें हमेशा दुर्बल जनप्रतिनिधि ही पैदा कर सकती हैं.

संसद और विधानसभा में सीटों के रिज़र्वेशन की व्यवस्था पर सवाल उठाने का समय आ गया है. बेहतर होगा कि ये सवाल ख़ुद अनुसूचित जाति और जनजाति के अंदर से आएं. इस सवाल पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए.

तो राज्यसभा में ये बोलते सांसद सचिन तेंदुलकर?

समुदाय के लिए करते क्या हैं?

2009 में भारतीय संसद ने हर दस साल पर होने वाली एक औपचारिकता फिर निभाई. वही औपचारिकता, अगर कोई ग़ज़ब न हुआ तो, 2019 में फिर निभाई जाएगी.

हर दस साल पर, संसद एक संविधान संशोधन विधेयक पारित करती है, जिसके तहत लोकसभा और विधानसभाओं में अनुसुचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण को दस साल के लिए बढ़ा दिया जाता है और फिर राष्ट्रपति इस विधेयक को अनुमोदित करते हैं. संविधान का अनुच्छेद 334, हर दस साल पर दस और साल जुड़कर बदल जाता है.

इसी प्रावधान की वजह से लोकसभा की 543 में से 79 सीटें अनुसूचित जाति और 41 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए रिज़र्व हो जाती हैं. वहीं, विधानसभाओं की 3,961 सीटों में से 543 सीटें अनुसूचित जाति और 527 सीटें जनजाति के लिए सुरक्षित हो जाती हैं. इन सीटों पर वोट तो सभी डालते हैं, लेकिन कैंडिडेट सिर्फ एससी या एसटी का होता है.

लोकसभा और विधानसभाओं में आज़ादी के समय से ही अनुसूचित जाति और जनजाति का उनकी आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व रहा है.

सवाल यह उठता है कि इतने सारे दलित और आदिवासी सांसद और विधायक अपने समुदाय के लिए करते क्या हैं?

नेशनल क्राइम रेकॉर्ड्स ब्यूरो के इस साल जारी आंकड़ों के मुताबिक इन समुदायों के उत्पीड़न के साल में 40,000 से ज़्यादा मुकदमे दर्ज हुए. यह आंकड़ा साल दर साल बढ़ रहा है. जाहिर है कि इन आंकड़ों के पीछे एक और आंकड़ा उन मामलों का होगा, जो कभी दर्ज ही नहीं होते हैं.

कई गुना अधिक असर होगा

क्या दलित उत्पीड़न की इन घटनाओं के ख़िलाफ़ दलित सांसदों या विधायकों ने कोई बड़ा, याद रहने वाला आंदोलन किया है? ऐसे सवालों पर, संसद कितने बार ठप की गई है और ऐसा रिज़र्व कैटेगरी के सांसदों ने कितनी बार किया है?

हमने देखा है कि तेलंगाना से आने वाले दसेक सांसदों ने कई हफ़्ते तक संसद की गतिविधियों को बाधित रखा. कोई वजह नहीं है कि लगभग सवा सौ एससी और एसटी सांसद अगर चाह लें तो संसद में इससे कई गुना ज़्यादा असर पैदा कर सकते हैं. लेकिन भारतीय संसद के इतिहास में ऐसा कभी हुआ नहीं है.

इसी तरह, सरकारी नौकरियों और शिक्षा में अनुसूचित जाति और जनजाति को आबादी के अनुपात में आरक्षण मिला हुआ है लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें अक्सर यह सूचना देती हैं कि इन जगहों पर कोटा पूरा नहीं हो रहा है. ख़ासतौर पर उच्च पदों पर, अनुसूचित जाति और जनजाति के कोटे का हाल बेहद बुरा है. जैसे कि हम देख सकते हैं कि देश की 43 सेंट्रल यूनिवर्सिटी में एक भी वाइस चांसलर अनुसूचित जाति का नहीं है या कि केंद्र सरकार में सेक्रेटरी स्तर के पदों पर अक्सर एससी या एसटी का कोई अफसर नहीं होता.

शासन के उच्च स्तरों पर अनुसूचित जाति और जनजाति की अनुपस्थिति क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों के लिए चिंता का विषय है? अगर वे इसके लिए चिंतित हैं, तो उन्होंने सरकार पर कितना दबाव बनाया है? क्या इस सवाल पर कभी संसद के अंदर कोई बड़ा आंदोलन या हंगामा हुआ? ज़ाहिर है कि ऐसा कुछ नहीं हुआ.

चूंकि सरकारी नौकरियों की संख्या लगातार घट रही है और हाल के वर्षों में निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग उठी है, लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों और विधायकों के लिए यह कोई मुद्दा है?

इसी तरह की एक मांग उच्च न्यायपालिका में आरक्षण की भी है. ख़ासकर संसद की कड़िया मुंडा कमेटी की रिपोर्ट में न्यायपालिका में सवर्ण वर्चस्व की बात आने के बाद से यह मांग मज़बूत हुई है. लेकिन क्या अनुसूचित जाति और जनजाति के सांसदों ने कभी इस मुद्दे पर संसद में पुरज़ोर तरीक़े से मांग उठाई है?

120 से ज़्यादा एससी और एसटी सांसदों के लिए किसी मुद्दे पर संसद में हंगामा करना और दबाव पैदा करना मुश्किल नहीं है. इन सांसदों का एक ग्रुप भी है और जो अक्सर मिलते भी हैं लेकिन देश ने कभी इन सांसदों को अपने समुदायों के ज़रूरी मुद्दों पर आंदोलन छेड़ते नहीं देखा है.

कैसे चुने जाते हैं ये सांसद?

अगर ये सांसद अपने समुदाय के सवालों को नहीं उठाते तो फिर वे चुने कैसे जाते हैं? क्या उन्हें हारने का भय नहीं होता?

यह वह सवाल है, जिसमें इन सांसदों और विधायकों की निष्क्रियता का राज छिपा है.

संविधान की व्यवस्था के मुताबिक, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए सीटें आरक्षित हैं, लेकिन वोटर तमाम लोग होते हैं. किसी भी आरक्षित लोकसभा सीट पर अगर मान लें कि 20 फीसदी अनुसूचित जाति के वोटर हैं, तो 80 फीसदी वोटर अन्य समूहों के हैं. अनुसूचित जाति के किसी नेता का सांसद चुना जाना इस बात से तय नहीं होगा कि अनुसूचित जाति के कितने लोगों ने उसे वोट दिया है.

अनुसूचित जनजाति की कुछ सीटों को छोड़ दें, जहां एसटी वोटर 50 फीसदी से ज़्यादा हैं तो ज़्यादातर आरक्षित सीटों की यही कहानी है. चुना वह जाएगा जो आरक्षित समूह से बाहर के ज़्यादातर वोट हासिल करेगा.

आरक्षित चुनाव क्षेत्रों के इस गणित का मतलब यह है कि अगर कोई नेता अनुसूचित जाति के आरक्षण को लेकर आंदोलन करेगा या निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग करेगा, तो दूसरे समुदायों की आंख में उसका खटकना तय है. यह उस नेता के लिए राजनीतिक आत्महत्या का रास्ता होगा.

यह पूरी तरह विवशता की स्थिति है. आप अनुसूचित जाति के सांसद हैं, पर अनुसूचित जाति के सवालों पर आप मुखर नहीं हो सकते. आप अनुसूचित जनजाति की सांसद हैं लेकिन अनुसूचित जनजाति के सवालों को उठाना आपके लिए आत्मघाती हो सकता है.

इसके अलावा एक और समस्या है. भारत में ज़्यादातर सांसद किसी न किसी दल से चुने जाते हैं. यह रिज़र्व सीटों से चुने जाने वाले सांसदों के लिए भी सच है. संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दलबदल कानून की वजह से ये सांसद दलीय अनुशासन से बंधे होते हैं, वरना उनकी सदस्यता छिन सकती है.

ऐसे में जब तक राजनीतिक दलों की नीतियां अनुसूचित जाति और जनजाति के पक्ष में न हों, तब तक रिज़र्व कैटेगरी से चुनकर आने वाले सांसदों और विधायकों के लिए करने को ख़ास कुछ नहीं होता है.

इसका सबसे अच्छा उदाहरण संसद की वह घटना है जब एससी और एसटी के लिए प्रमोशन में आरक्षण का विधेयक फाड़ने का दायित्व समाजवादी पार्टी ने एक एससी सांसद यशवीर सिंह को सौंपा और उन्होंने यह कर दिखाया. यशवीर सिंह उस समय उत्तर प्रदेश की नगीना लोकसभा सीट से सांसद थे.

‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ सिस्टम होना चाहिए

इस सीट पर एससी 21 फीसदी हैं और मुसलमान 53 फीसदी. नगीना रिज़र्व सीट से सांसद बनने के लिए एससी वोट से ज़्यादा महत्वपूर्ण मुसलमान और अन्य समूहों के वोट हैं इसलिए यशवीर सिंह ने एससी के हित के ऊपर समाजवादी पार्टी को रखा क्योंकि उनका गणित रहा होगा कि मुसलमान वोट उन्हें सपा में होने के कारण मिलेंगे इसलिए उनके लिए अनुसूचित जाति के हित से जुड़े एक विधेयक को फाड़ने में कोई दिक्कत नहीं आई.

एक उदाहरण बीजेपी सांसद उदित राज का भी है. आईआरएस की नौकरी छोड़कर उन्होंने अनुसूचित जाति और जनजाति का परिसंघ बनाया. इन समुदायों के हितों के सवाल पर वे सबसे ज़्यादा मुखर स्वर में से एक रहे. लेकिन जब तक वे यह करते रहे, तब तक अनुसूचित जाति ने भी उन्हें अपना नेता नहीं माना और वे कोई चुनाव नहीं जीत पाए. लेकिन बीजेपी में शामिल होते ही इन्हें सवा छह लाख से ज़्यादा वोट मिल गए. ज़ाहिर है कि अनुसूचित जाति के वोटर भी अपने हितैषी को नहीं, किसी पार्टी के कैंडिडेट को ही चुनते हैं. तो जीतने के बाद वह कैंडिडेट किसे ज्यादा महत्वपूर्ण मानेगा? यह एक सरल गणित है.

अब शायद समय आ गया है कि ऐतिहासिक पूना पैक्ट की वजह से चली आ रही सुरक्षित सीटों वाली इस व्यवस्था को ख़त्म करके वो सिस्टम लाया जाए जिसके हामी बाबा साहेब आंबेडकर थे. बाबा साहेब चाहते थे कि ‘सेपरेट इलेक्टोरेट’ यानी सिर्फ़ दलित और आदिवासी वोटर ही अपने प्रतिनिधि चुनें. उन सीटों पर दूसरा प्रतिनिधि भी हो, जिनका चुनाव बाकी लोग करें. गांधी के विरोध की वजह से अंग्रेज़ी शासन में ऐसा नहीं हो पाया था.

अब सब देख रहे हैं कि पूना पैक्ट की दुर्बल संतानें, यानी एससी और एसटी सीटों पर चुने गए जनप्रतिनिधि किस तरह बेअसर साबित हुए हैं.

http://www.bbc.com/hindi/india-42455275

आरक्षण आपका अधिकार ही नहीं राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम है….. दिलीप सी मंडल नवभारत टाइम्स

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आरक्षण पर चल रहे विवाद में नया मोड़ ला दिया है। उन्होंने कहा ‘जीवन में आगे बढ़ने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है। बिना आरक्षण भी सफलता पाई जा सकती है।’ इसे लेकर एक निरर्थक विवाद खड़ा हो गया है, जबकि राष्ट्रपति महोदय ने यह बात सदिच्छा से कही है और उनकी बात सही है। संविधान में आरक्षण का प्रावधान इसलिए नहीं किया गया कि वंचित समुदायों के लोग या कोई भी इसका लाभ उठाए और तरक्की करे। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण की कल्पना व्यक्तिगत उपलब्धियां हासिल करने के जरिए के तौर पर नहीं की थी। रिजर्वेशन का निजी तरक्की से कोई लेना-देना नहीं है। सरकारी क्षेत्र में इतनी नौकरियां और सरकारी शिक्षा संस्थानों में इतनी सीटें भी नहीं हैं कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश में इनके बल पर किसी समुदाय की तरक्की हो जाए।

भेदभाव का समाज
संविधान निर्माताओं ने आरक्षण को राष्ट्र निर्माण का कार्यक्रम माना था और ‘एक बनते हुए राष्ट्र’ के लिए जरूरी समझकर इसे संविधान में जगह दी थी। यही वजह है कि इसे मूल अधिकारों के अध्याय में रखा गया। संविधान निर्माता भारत को एक समावेशी देश बनाना चाहते थे, ताकि हर समूह और समुदाय को लगे कि वह भी राष्ट्र निर्माण में हिस्सेदार है। यह पूना पैक्ट के समय वंचित जातियों से किए गए वादे का पालन भी है। दलित, पिछड़े और आदिवासी मिलकर देश की तीन चौथाई से भी ज्यादा आबादी बनाते हैं। इतनी बड़ी आबादी को किनारे रखकर भला कोई देश कैसे बन सकता है? आरक्षण सबको साथ लेकर चलने का सिद्धांत है। इसे सिर्फ करियर और तरक्की से जोड़कर देखना सही नहीं है।

रिजर्वेशन ने वंचित समूहों के लिए तरक्की के अवसर खोले हैं। इतिहास में यह पहला मौका है जब भारत की इतनी बड़ी वंचित आबादी, खासकर एक समय अछूत मानी जाने वाली जातियों के लोग शिक्षा और राजकाज में योगदान कर रहे हैं। किसान, पशुपालक, कारीगर और कमेरा जातियों की भी राजकाज में हिस्सेदारी बढ़ी है, जिससे देश मजबूत हुआ है। आरक्षण विरोधी तर्कों के जवाब में सिर्फ इतना कहना जरूरी लगता है कि जीवन में आगे बढ़ने के लिए आरक्षण कतई जरूरी नहीं है, बशर्ते जन्म के आधार पर समाज में भेदभाव न हो। भारत में ऊंच-नीच को धार्मिक साहित्य में मान्यता प्राप्त है। इसलिए बाबा साहेब ने इन ग्रंथों को खारिज करने की बात ‘एनिहिलिशेन ऑफ कास्ट’ नामक किताब में प्रमुखता से की है। यहां हर आदमी एक वोट दे सकता है और हर वोट की बराबर कीमत है लेकिन समानता का यह चरम बिंदु है। हर आदमी की बराबर कीमत या औकात यहां नहीं है और यह हैसियत अक्सर जन्म के संयोग से तय होती है।

दूसरे, तरक्की के लिए भी आरक्षण जरूरी नहीं, बशर्ते हमारा समाज ऐसा हो, जिसमें किसी खास समुदाय में पैदा होना किसी एक की कामयाबी और दूसरे की नाकामी का कारण न बने। जैसे, काफी संभावना है कि कॉर्पोरेट सेक्टर में आपका जॉब इंटरव्यू कोई सवर्ण पुरुष ले रहा हो और आपके प्रमोशन का फैसला भी किसी सवर्ण हिंदू पुरुष के हाथ में हो। ऐसा इसलिए नहीं है कि आप जातिवादी हैं या इंटरव्यू लेने वाले जातिवादी हैं। यह भारतीय समाज की संचरना का नतीजा है। ऊपर के पदों पर खास जातियों का वर्चस्व एक सामाजिक सच्चाई है। यही सुविधा पिछड़े और दलितों को भी हासिल हो, तब कहा जा सकता है कि तरक्की करने के लिए आरक्षण की जरूरत नहीं है। अभी तो जन्म का संयोग जीवन में किसी के सफल या असफल होने में एक बड़ा फैक्टर है।

तीसरे, अगर तरक्की करने के लिए आरक्षण जरूरी न होता तो भारत में आजादी के बाद बना शहरी दलित-पिछड़ा मध्यवर्ग सरकारी नौकरियों के अलावा और क्षेत्रों से भी आता। आज लगभग सारा दलित मध्य वर्ग सरकारी नौकरियों में आरक्षण की वजह से तैयार हुआ है। अगर सब कुछ प्रतिभा और मेहनत से ही तय हो रहा है तो शिक्षा के क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन करने वाले दलित निजी क्षेत्र के शिखर पदों पर लापता क्यों हैं? कानून और न्याय के क्षेत्र में भी यह सच है। उच्च न्यायपालिका में आरक्षण नहीं है। नतीजा यह है कि सुप्रीम कोर्ट में आज एक भी दलित जज नहीं है, और तो और, कोई सीनियर एडवोकेट भी नहीं है।

चौथी बात। महामहिम राष्ट्रपति की बात का अर्थ यदि यह है कि आरक्षण से तरक्की के दरवाजे बेशक खुल जाते हैं, पर कामयाबी मेहनत से ही मिलती है, तो वह बिल्कुल वाजिब बात कह रहे हैं। किसी इंस्टिट्यूट में प्रवेश बेशक आरक्षण से मिल सकता है, पर सभी स्टूडेंट्स को एक ही परीक्षा एक ही मापदंड से पास करनी होती है। इसलिए जब स्टूडेंट पास होकर निकलता है, तो उसके पास बुनियादी क्वालिफिकेशन और काबिलियत जरूर होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसका ऐडमिशन कोटे से हुआ है या नहीं।

सपनों से दूर
भारत में तरक्की करना परीक्षा पास करने और नौकरी पा लेने का मामला नहीं है। उससे पहले वंचित समुदाय के व्यक्ति को, खुद से एक लंबी लड़ाई लड़नी पड़ती है। वह लड़ाई है महत्वाकांक्षा जगाने की। वंचित समुदाय के व्यक्ति के लिए अक्सर बड़े सपने देखना आसान नही होता। दरअसल सपने इस बात पर निर्भर करते हैं कि व्यक्ति के आसपास का वातावरण उन सपनों के अनुकूल है या नहीं, और उन सपनों की प्रतिष्ठा है या नहीं। कमजोर तबके अक्सर इस कल्चरल कैपिटल से वंचित होते हैं। प्रतिभा और मेहनत के बावजूद ऊंचे पद कई बार उनकी कल्पना में ही नहीं होते। इसलिए आरक्षण जरूरी है। किसी की निजी तरक्की के लिए नहीं, बेशक राष्ट्र निर्माण के लिए।

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

विश्वपुरूष बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर के बारे में 55 रोचक तथ्य••• जिसे आप शायद नहीं जानते…

Fact 1: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपने माता-पिता की चौदहवीं और आखिरी संतान थे।
Fact 2: डॉ. अंबेडकर के पूर्वज काफी समय तक ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी में एम्प्लोयेड थे और उनके पिता ब्रिटिश इंडियन आर्मी में Mhow cantonment में तैनात थे। चुकी उस समय अछूतो को भारत के किसी भी नोकरी में कोई अधिकार नहीं था वही केवल अंग्रेज जात पात को नहीं मानते थे। इसलिए अंग्रेजी शाशन में अछूतो की भर्ती होती थी
Fact 3: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का मूल या ओरिजिनल सरनेम अंबावडेकर था। लेकिन उनके शिक्षक, महादेव आंबेडकर, जो उन्हें बहुत मानते थे, ने स्कूल रिकार्ड्स में उनका नाम अंबावडेकर से आंबेडकर कर दिया।
Fact 4: बाबासाहेब मुंबई के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज में दो साल तक प्रिंसिपल पद पर कार्यरत रहे।
Fact 5: बाबासाहेब डॉ. बी. आर आंबेडकर भारतीय संविधान की धारा 370, जो जम्मू और कश्मीर को विशेष दर्जा देता है के खिलाफ थे। किन्तु उनकी लाख कोशिश के बावजूद गाँधीजी और नेहरुजी ने धारा 370 को भारतीय संविधान में जुड़वा दिया ।
Fact 6: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विदेश जाकर अर्थशास्त्र डॉक्टरेट (PhD) की डिग्री हासिल करने वाले पहले भारतीय थे।
Fact 7: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अपने समय के सबसे जादा पढेलिखे नेता और भारत के सबसे अधिक बुद्धिमान व्यक्ति थे। उस समय दुनिया के शीर्ष 5 विद्वानो में डॉ. बाबा साहेब का भी नाम दर्ज है।
Fact 8: डॉ. आंबेडकर ही एक मात्र भारतीय हैं जिनकी portrait लन्दन संग्रहालय में कार्ल मार्क्स के साथ लगी हुई है।
Fact 9: इंडियन फ्लैग में “अशोक चक्र” को जगह देने का श्रेय भी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को जाता है। यह बात बोहत कम लोग जानते हैं की इंडियन फ्लैग में गाँधीजी का चरखा नहीं बल्कि अशोक चक्र लगा हुआ है।
Fact 10: डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर Labor Member of the Viceroy’s Executive Council के सदस्य थे और उन्ही की वजह से फैक्ट्रियों में कम से कम 12-14 घंटे काम करने का नियम बदल कर सिर्फ ” 8 घंटे ” कर दिया गया था। वरना आज प्रत्येक कर्मचारी को 14 घंटे काम करना पड़ता। वेतन भत्ते, बोनस, एच. आर. ए., ग्रेजुएटी, ओवर टाइम, ग्रेड पे सिस्टम, महंगाई भत्ता, ये सब उन्ही के देन है।
Fact 11: वो बाबासाहेब ही थे जिन्होंने महिला श्रमिकों के लिए सहायक Maternity Benefit for women Labor, Women Labor welfare fund, Women and Child, Labor Protection Act जैसे कानून बनाए।
Fact 12: अर्थशास्त्र का Nobel Prize जीत चुके अर्थशास्त्री प्रो. अमर्त्य सेन डॉ. बी. आर आंबेडकर को अर्थशास्त्र में अपना पिता मानते हैं।
Fact 13: बेहतर विकास के लिए 50 के दशक में ही बाबासाहेब ने मध्य प्रदेश और बिहार के विभाजन का प्रस्ताव रखा था, पर सन 2000 में जाकर ही इनका विभाजन कर छत्तीसगढ़ और झारखण्ड का गठन किया गया।
Fact 14: डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने कुल 53 किताबें लिखी है और वे भारतीय संविधान के लेखक भी है। उन्होंने विश्व के सभी प्रमुख देशो के संविधान की तुलनात्मक रूप से पढाई की तथा अपने देश के लिए विश्व के सभी संविधानो का निचोड़ लिखा तथा उनमे वो सुधार किये जो अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जापान, स्विट्ज़रलैंड, इंग्लैंड आदि देशो में भी नहीं है। और इस तरह से विश्व का सबसे बड़ा और सबसे अच्छा संविधान भारत देश का ही है। जो प्रत्येक भारतीय के लिए गर्व का विषय है।
Fact 15: बाबासाहेब के निजी ग्रंथालय “राजगृह” में 50,000 से भी अधिक उनकी किताबें थी और यह विश्व का सबसे बडा निजी ग्रंथालय था।
Fact 16: डॉ. बाबासाहेब ने लिखा हुआ  “waiting for a visa” यह आत्मचरित्र कोलंबिया विश्वविद्यालय में टेक्स्टबुक है।
Fact 17: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर बीसवी सदी में दुनिया के सबसे बुद्धिमान Jurist और Constitutionalist थे। जिनसे सलाह मशवरा लेने के लिए  सभी देशो के महान बुद्धिजीवी आया करते थे।
Fact 18: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर कुल 64 विषयों में मास्टर थे, केब्रिंज विश्वविद्यालय, इंग्लैड 2011 के अनुसार यह आकडे विश्व में सर्वाधिक है। इस विश्वविद्यालय ने बाबासाहेब को दुनिया के पहला सबसे बुद्धिमान व्यक्ति करार दिया है।
Fact 19: बाबासाहेब 9 भाषाए जानते थे_ हिंदी, पाली, संस्कृत, अंग्रेजी, फ्रेंच, जर्मन, मराठी, पर्शियन और गुजराती।
Fact 20: बाबासाहेब ने 21 साल तक विश्व के सभी धर्मों की तुलनात्मक रूप से पढाई की तथा इस निष्कर्ष पर पहुंचे की बौद्ध धर्म  “जाति व्यवस्था” और धार्मिक “कुरीतियों” का घोर विरोधी है। उन्होंने अपने अध्यन में यह भी पाया की हिन्दू धर्म में 10,000 से भी अधिक कुरीतियाँ  और जातिव्यवस्था है जिसके कारण समूचा भारत 6743 जातियों में बटा हुआ है। वे ब्राह्मणों के नहीं “ब्राह्मणवाद” के घोर विरोधी थे। किन्तु कुछ लोग अज्ञानता वश आज भी उन्हें ब्राह्मण विरोधी कहते हैं।
Fact 21: कोलंबिया विश्वविद्यालय ने 2004 में विश्व के TOP 100 विद्वानों की लिस्ट बनाई थी और उसमे पहला नाम डॉ. भीमराव आंबेडकर है। यह भारत के लिए गर्व का विषय है।
Fact 22: बाबासाहेब ने लंडन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स में 8 वर्ष समय लगनेवाली पढाई केवल 2 वर्ष 3 महिने में पूरी की थी इसके लिए उन्हें रोज 21-21 घंटो पढना पडा था।
Fact 23: 2012 में CNN IBN और History TV18 ने “The Greatest Indian” नामक सर्वे में “बाबासाहेब डॉ. बी.आर.आंबेडकर” “सबसे महानतम भारतीय” चूने गये है।
Fact 24:  बचपन में हुए भीषण जातिगत भेदभाव से उनके बालमानस पर गहरा आघात पंहुचा। जिसके कारण उन्होंने वर्णव्यवस्था पर जोरदार प्रहार किया। उन्होंने पूर्व में अथक प्रयास किये की हिन्दू धर्म से वर्ण व्यवस्था समाप्त हो सके और सभी को समान समझा जाए। ना कोई ऊँच हो ना कोई नीच। किन्तु उनके जाति व्यवस्था को लेकर सभी प्रयास विफल हुए। इसीलिए उन्होंने हिन्दू धर्म की वर्णव्यवस्था से तंग आकर हिन्दू धर्म को छोड़ने का पूरा मन बना लिया। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर की दीक्षा भूमि में डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने अपने 8,50,000 समर्थको के साथ हिन्दू धर्म का त्याग करके बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया तथा दीक्षा ली। उनका धर्मपरिवर्तन विश्व में एतिहासिक है क्योंकी यह विश्व का अब तक का सबसे बडा धर्मांतरण है।
Fact 25: बाबासाहेब को बौद्ध धर्म की दीक्षा देनेवाले महान बौद्ध भिक्षू महत्थवीर चंद्रमणी ने बाबासाहेब को “इस युग का आधुनिक बुद्ध”  और महान “युग प्रवर्तक” कहॉ था।
Fact 26: लंडन स्कूल ऑफ इकॉनॉमिक्स से “डॉक्टर ऑल सायन्स” यह अनमोल डॉक्टरेट पदवी प्राप्त करनेवाले बाबासाहेब विश्व के पहले और एकमात्र महापुरूष है। कई बुद्धिमान छात्रों ने प्रयास किये पर वे सफल नहीं हो सके।
Fact 27: बोधिसत्त्व डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की प्रसिद्ध किताब “दि बुद्ध अण्ड हिज् धम्म” भारतीय बौद्धों का “धर्मग्रंथ” है।
Fact 28: बाबासाहेब ने पाली भाषा का व्याकरण (Grammar) और शब्दकोश (Dictionary) भी लिखा है।
Fact 29: बाबासाहेब 500 ग्रज्यूएटों तथा हजारों विद्वानों से भी बुद्धिमान है यह गव्हर्नर लॉर्ड लिनलिथगो का मानना था। और आज भी वहां की जनता उन्हें वही मान सम्मान देती है।।
Fact 30: पीने के पाणी के लिए सत्याग्रह (महाड़ सत्याग्रह) करने वाले बाबासाहेब विश्व के प्रथम और एकमात्र सत्याग्रही है। जो गांधीजी ने भी आज तक नहीं किया।।
Fact 31: 1954 में नेपाल,काठमांडू में हो रही “जागतिक बौद्ध धर्म परिषद” में बौद्ध भिक्षुओं नें डॉ बाबासाहेब आंबेडकर को “बोधीसत्त्व” यह बौद्ध धर्म की सर्वोच्छ उपाधी प्रदान की है।
Fact 32: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भगवान बुद्ध , संत कबीर और महात्मा फुले इन तीनों महापुरूषों को अपना गुरू माना है। जो समानता समभाव में विश्वास रखते थे।
Fact 33: भारत में सबसे अधिक फोलोअर्स बाबासाहेब के ही है।
Fact 34: बाबासाहेब ने कुल 9 सत्याग्रह किये थे। और उन्होंने 5 News Papers का संपादन भी किया था।
Fact 35: Social Engineering का श्रेय बाबासाहेब को ही दिया जाता है।
Fact 36: दुनिया में सबसे अधिक Statue बाबासाहेब के ही है। उनकी जयंती भी पुरे विश्व में मनाई जाती है।
Fact 37: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर दुनिया के बहुत बडी आबादी के प्रेरणास्त्रोत है इसलिए उन्हें “विश्वभूषण” भी कहॉ जाता है।
Fact 38: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने कुल 32 डिग्रीयॉ हासिल की है। जो अपने आप में मिसाल है।
Fact 39: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर विश्व के सबसे महान युगप्रवर्तक है जिन्होंने महज 40 वर्षो में 5000 वर्षों का इतिहास बदल दिया।
Fact 40: किताबों के लिए “घर” बनानेवाले बाबासाहेब दुनिया के एकमात्र पस्तकप्रेमी थे।
Fact 41: बाबासाहेब पीछडी जाती के पहले वकिल थे।
Fact 42: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर खुद संस्कृत भाषापंडित भी थे, और उन्होंने यह भाषा वे लगनसे स्व-अध्ययन कर सिखे, अछूतो को संस्कृत भाषा सिकने का अधिकार नहीं था। सन 1930 से पहले निम्न वर्ग (sc st obc) के लोगो का वेद, पुराण, शास्त्रों आदि का उच्चारण करना, उनके लिए महापाप समझा जाता था तथा ऐसा करने पर उच्च वर्गों द्वारा घोर असहनीय दंड दिया जाता था। उनके प्रयासों के कारण ही आज प्रत्येक वर्ग वैद पुराण आदि कोई भी धार्मिक पुस्तक पढ़ सकता है।।
Fact 43: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने “The Makers of the Universe” नामक जागतिक सर्वेक्षण किया जिसमें पिछले 10 हजार वर्षो के  Top 100 मानवतावादी विश्वमानवों की लिस्ट बनाई और उसमें चौथा नाम डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का है।
Fact 44: बाबासाहेब दलितों के साथ-साथ गरीब ब्राह्मण छात्रों को भी खुलकर मदत करते थे।
Fact 45: बाबासाहेब ने Reserve Bank of India की स्थापना में बहुत अहम भूमिका निभाई। उनकी किताब The Problem of Rupee- Its Origin & its solution से इसके लिए कई सुझाव लिए गए।
Fact 46: यह बात बहुत कम लोग जानते हैं, जब ऑक्टोंबर 1947 में पाकिस्तानी सैनिकों ने काश्मिर पर हमला कर दिया तो बाबासाहेब ने काश्मिर बचाने के लिए महार बटालियन भेजने की सलाह दी और महार बटालियन ने पाकिस्तान सैनिकों को हराकर काश्मिर बचाया था। किन्तु कुछ कश्मीरी पंडितो ने इतहास से उनका नाम हटा दिया।
Fact 47: दामोदर घाटी परीयोजना , महानदी डॅंक, सोनघाटी बांध, दामोदर और हिंराकूड परीयोजना जैसे 15 बडे बांधों के निर्माण में बाबासाहेब ने अहम भूमिका बजाई और उन्हें पुरा कराया।
Fact 48: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के प्रेरणा से ही भारत के Finance commission याने वित्त आयोग की स्थापना हुई थी। तथा RBI की स्थापना में उनकी अहम्  भूमिका रही।
Fact 49: भारत में Employment Exchange की स्थापना डॉ बाबासाहेब के विचारों के वजह से ही हुई थी।
Fact 50: भारत के पानी और बीजली के Grid System की स्थापना में भी डॉ. आंबेडकर का अहम योगदान रहा है।
Fact 51: भारत को एक स्वतंत्र्य चूनाव आयोग भी डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की देण है।
Fact 52: डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने भारतीयों को मतदान का अधिकार दिया है, स्त्रीओं को मतदान का अधिकार देना बाबासाहेब की बडी जीत है।
Fact 53: विश्व में हर जगह बुद्ध की बंद आंखो वाली प्रतिमाए एवं पेंटिग्स दिखाई देती है लेकिन बाबासाहेब जो उत्तम चित्रकार भी थे उन्होंने सर्वप्रथम बुद्ध चित्र बनाया जिसमें बुद्ध की आंखे खूली थी।
Fact 54: विश्व में सबसे अधिक Songs और किताबें डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर इस महान नेता पर ही लिखी गई है।
Fact 55: बाबासाहेब का पहला Statue उनके जीवीत रहते ही 1950 बनवाया गया था, और यह Statue कोल्हापूर शहर है।
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❗❗❗❗दिल 💕 से जय भीम ❗❗❗❗