खोजो मत–पा लो। मांगो मत–पा लो। न कहीं जाना है, न खोजना है। वह परम धन तुम्हारे भीतर है। वह तुम्हारा स्वरूप है, एरनाल्ड ने बुद्ध पर जो अदभुत किताब लिखी है: लाइट ऑफ एशिया। ….OSHO

खोजो मत पा लो🌸🌷🍀🍁🍂🍃🌹🌺🌻🌼🌽🌾🌿
एरनाल्ड ने बुद्ध पर जो अदभुत किताब लिखी है: लाइट ऑफ एशिया। उसमें जो वर्णन है, रात्रि में बुद्ध का घर छोड़ने का, बहुत प्यारा है। देर तक पीना-पिलाना चलता रहा। देर तक नाच-गान चलता रहा। देर तक संगीत चला। फिर बुद्ध सो गए। लेकिन आधी रात अचानक नींद खुल गई। जो नर्तकियां नाचती रही थीं, वे भी थक कर अपने वाद्यों को वहीं पड़ा छोड़ कर फर्श पर ही सो गई हैं। पूरी चांद की रात है। खिड़कियों, द्वार-दरवाजों से चांद भीतर आ गया है।


बुद्ध चांद की रोशनी में ठीक से उन स्त्रियों को देख रहे हैं, जिनको वे बहुत सुंदर मानते रहे हैं। किसी के मुंह से लार टपक रही है, क्योंकि नींद लगी है। किसी की आंख में कीचड़ भरा है। किसी का चेहरा कुरूप हो गया है। कोई नींद में बड़बड़ा रही है। जिसके सुमधुर स्वर सुने थे सांझ, वह इस तरह बड़बड़ा रही है जैसे पागल हो! बुद्ध ने उन सारी सुंदर स्त्रियों की यह कुरूपता देखी और एक बोध हुआ कि जो मैं सोचता हूं, वह मेरी कल्पना है। यथार्थ यह है। आज नहीं कल देह मिट्टी हो जाएगी। आज नहीं कल देह चिता पर चढ़ेगी। इस देह के पीछे मैं कब तक दौड़ता रहूंगा? इन देहों में मैं कब तक उलझा रहूंगा?


यह आघात इतना गहरा था कि वे उसी रात घर छोड़ दिए। उनतीस वर्ष की उम्र कोई उम्र होती है! अभी युवा थे। मगर जीवन का यथार्थ दिखाई पड़ गया। जीवन बड़ा थोथा है। जीवन बिलकुल अस्थिपंजर है। हड्डी-मांस-मज्जा ऊपर से है, भीतर अस्थिपंजर है।
भाग निकले, जितने दूर जा सकते थे। जो सारथी उन्हें ले गया है छोड़ने स्वर्णरथ पर बिठा कर, वह बूढ़ा सारथी उन्हें समझाता है कि आप यह क्या कर रहे हैं? कहां जा रहे हैं? महल की याद करें! इतना सुंदर महल और कहां मिलेगा? यशोधरा की स्मृति करें! इतनी सुंदर स्त्री और कहां मिलेगी? इतना प्यारा राज्य, इतनी सुख-सुविधा, इतना वैभव-विलास–इस सब स्वर्ग को छोड़ कर कहां जाते हो? 


बुद्ध ने लौट कर पीछे की तरफ देखा। पूर्णिमा की रात में उनका संगमरमर का महल स्वप्न जैसा जगमगा रहा है। उस पर जले हुए दीये, जैसे आकाश में तारे टिमटिमाते हों। लेकिन उन्होंने सारथी को कहा, जाना होगा। मुझे जाना ही होगा। क्योंकि तुम जिसे कहते हो महल, मैं वहां सिवाय लपटों के और कुछ भी नहीं देखता हूं। मैं वहां चिंताएं जलती देख रहा हूं। आज नहीं कल, देर नहीं होगी, जल्दी ही सब राख हो जाएगा। 


इसके पहले कि सब राख हो जाए, इसके पहले कि मेरी देह गिरे, मुझे जान लेना है उसको, जो शाश्वत है। यदि कुछ शाश्वत है, तो उससे पहचान कर लेनी है। मुझे सत्य से परिचय कर लेना है; सत्य का साक्षात्कार कर लेना है।
धर्मेंद्र, तुम कहते हो: जो भी मैंने चाहा, उसे पा न सका।


कौन पा सका है? कुछ पा सके, उन्होंने पाकर पाया कि व्यर्थ। कुछ नहीं पा सके, वे भरमते रहे, भटकते रहे। अच्छा ही है कि तुम्हें यह बात समझ में आ गई कि चाह में ही कुछ बुनियादी भूल है; कि चाहो, और पाना मुश्किल हो जाता है! और यह डर सार्थक है कि कहीं परमात्मा को चाहने लगूं, और ऐसा तो न होगा कि उसे भी न पा सकूं!
तुम चौंकोगे। तुमने अगर किसी और से पूछा होता, किन्हीं और तथाकथित संत-महात्माओं से पूछा होता, तो तुम्हें यह उत्तर न मिलता जो उत्तर तुम मुझसे पाओगे। तुम्हारे संत-महात्मा तो कहते, चाहो–परमात्मा को चाहो–जी भर कर चाहो; एकाग्र-चित्त होकर चाहो; जरूर पाओगे।
लेकिन मैं तुमसे कहता हूं, अगर परमात्मा को भी चाहा, तो बस, चूकोगे। चाह चुकाती है। चाह को छोड़ो। चाह को जाने दो। परमात्मा को पाने की विधि है: चाह से मुक्त हो जाना।


थोड़ी देर को, चौबीस घंटे में कम से कम इतना समय निकाल लो, जब कुछ भी न चाहो। उसी को मैं ध्यान कहता हूं। घंटे भर को, दो घंटे को, दिन में या रात, सुबह या सांझ, कभी वक्त निकाल लो। बंद करके द्वार-दरवाजे शांत बैठ जाओ। कुछ भी न चाहो। न कोई मांग, न कोई चाह। शून्यवत! जैसे हो ही नहीं। जैसे मर गए। जैसे मृत्यु घट गई।
ध्यान मृत्यु है–स्वेच्छा से बुलाई गई मृत्यु। ठीक है, श्वास चलती रहेगी, सो देखते रहना। और छाती धड़कती रहेगी, सो सुनते रहना। मगर और कुछ भी नहीं। श्वास चलती है, छाती धड़कती है, और तुम चुपचाप बैठे हो।
शुरू-शुरू में कठिन होगा। जन्मों-जन्मों से विचारों का तांता लगा रहा है, वह एकदम से बंद नहीं हो जाएगा। उसकी कतार बंधी है। क्यू बांधे खड़े हैं विचार। सच तो यह है, ऐसा मौका देख कर कि तुम अकेले बैठे हो, कोई भी नहीं, टूट पड़ेंगे तुम पर सारे विचार। ऐसा शुभ अवसर मुश्किल से ही मिलता है। तुम उलझे रहते हो–काम है, धाम है, हजार दुनिया के व्यवसाय हैं–विचार खड़े रहते हैं मौके की तलाश में कि कब मौका मिले, कब तुम पर झपटें!


लेकिन जब तुम शांत बैठोगे, ध्यान में बैठोगे, तो मिल जाएगा अवसर विचारों को। सारे विचार टूट पड़ेंगे, जैसे दुश्मनों ने हमला बोल दिया हो। कुरुक्षेत्र शुरू हो जाएगा। तरहत्तरह के विचार, संगत-असंगत विचार, मूढ़तापूर्ण विचार, सब एकदम तुम पर दौड़ पड़ेंगे। चारों तरफ से हमला हो जाएगा। उसको भी देखते रहना। लड़ना मत, झगड़ना मत, विचारों को हटाने की चेष्टा मत करना। बैठे रहना चुपचाप। जैसे अपना कुछ लेना-देना नहीं–निष्पक्ष, निरपेक्ष, असंग। जैसे राह के किनारे कोई राहगीर थक कर बैठ गया हो वृक्ष की छाया में, और रास्ते पर चलते लोगों को देखता हो। कभी कार गुजरती, कभी बस गुजरती, कभी ट्रक गुजरता, कभी लोग गुजरते, उसे क्या लेना-देना! कोई इस तरफ जा रहा, कोई उस तरफ जा रहा। जिसको जहां जाना है, जा रहा है। जिसको जो करना है, कर रहा है। राह के किनारे सुस्ताते हुए राहगीर को क्या प्रयोजन है! पापी जाए कि पुण्यात्मा; सफेद कपड़े पहने कोई जाए कि काले कपड़े पहने; स्त्री जाए कि पुरुष; जाने दो जो जा रहा है। रास्ता चलता ही रहता है। चलते रास्ते से राहगीर जो थक कर बैठ गया है, उसे क्या लेना है!


ऐसे ही तुम अपने चित्त के चलते हुए रास्ते के किनारे बैठ जाना, देखते रहना। कोई निर्णय नहीं। कोई पक्ष-विपक्ष नहीं। कोई चुनाव न करना। इस विचार को पकड़ लूं, उसको छोड़ दूं; यह आ जाए, यह मेरा हो जाए; यह न आए, यह कभी न आए–ऐसी कोई भावनाएं न उठने देना। और धीरे-धीरे, आहिस्ता-आहिस्ता एक दिन ऐसी घड़ी आएगी, जब रास्ता सूना होने लगेगा। कभी-कभी कोई भी न होगा रास्ते पर। सन्नाटा होगा। अंतराल आ जाएंगे। उन्हीं अंतरालों में पहली बार तुम्हें परमात्मा की झलक मिलेगी। क्योंकि न कोई चाह है, न कोई कल्पना, न कोई विचार।
परमात्मा की झलक मिलेगी–कहीं बाहर से नहीं; तुम्हारे भीतर ही बैठा है। विचारों की धुंध हट जाती है, तो दिखाई पड़ने लगता है।
जो तुमने प्रेम के अनुभव से जाना है, उस अनुभव को उपयोग कर लेना। जो तुमने अब तक संसार की प्रीति में सीखा है, उस पाठ को भूल मत जाना। चाहत करके तुमने जो देखा है, कि सदा हारे, वह एक बड़ी संपदा है। उस पाठ का अगर उपयोग कर लिया, तो परमात्मा के संबंध में असफल न होना पड़ेगा।
चाहो न–और परमात्मा पाया जा सकता है। लाओत्सू का प्रसिद्ध वचन है: खोजो मत–पा लो। मांगो मत–पा लो। न कहीं जाना है, न खोजना है। वह परम धन तुम्हारे भीतर है। वह तुम्हारा स्वरूप है
🍁 मृत्युार्मा अमृत गमय–प्रवचन-07🍁

गरीब, वंचितों और महिलाओं को आस्था के नाम पर अमानवीय शोषण से रोकने लिए,अंधविश्वास पर रोक के लिए जरूरत है केंद्रीय कानून की- प्रत्युष प्रशांत

अंधविश्वास पर रोक के लिए जरूरत है केंद्रीय कानून की- प्रत्युष प्रशांत

गरीब, वंचितों और महिलाओं को आस्था के नाम पर अमानवीय शोषण से रोकने लिए जरूरी है कि महाराष्ट्र और कर्नाटक के बाद पूरे देश में अंधश्रद्धा के विरोध में एक केंद्रीय कानून बने, जो जातिगत और जेडर आधारित भेदभाव को खत्म करने में नई शुरुआत हो।

21वीं सदी के दूसरी दहाई में आधुनिकता के तरफ आगे बढ़ते हुए समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी बिल्ली के रास्ता काटने, दूध के उबल कर गिरने या छींक आने से कुछ सेकंड के लिए स्थिर हो जाता है। शुभ-अशुभ की धारणा हर समाज में बनी हुई है जिसके वजह से घर के बाहर हरी मिर्ची-नींबू या नजरबट्ट या लोहे का नाल लगाना आम चलन है। भीड़ का हर तीसरा व्यक्ति चाहे वो पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़ इन आस्थाओं के गिरफ्त में है। सामाजिक जीवन में इन मान्यताओं के प्रभाव को शिक्षित या अशिक्षित समाज में विभाजित नहीं किया जा सकता है क्योंकि सामाजिक परिवेश में यह समान रूप से हर मानव समुदाय पर हावी होती है, इससे मुक्त होने की तमाम कोशिश के बाद भी हम इससे मुक्त नहीं हो पाते है।

सामाजिक जीवन में शुभ-अशुभ व्यवहारों/आचारों से जुड़े हुए तर्को की कई व्याख्याएं है जो आधारहीन अधिक हैवैज्ञानिक कम। अपनी आधारहीन व्याख्याओं के बाद भी यह समाज में समान्य रूप से स्वीकार्य है। आस्थाओं के दुहाई के आड़ में समाज की प्रतिगामी ताकतों ने मानवीय गरिमाओं को कई बार तार-तार किया है और करती रहती है, विशेषकर महिलाओं को। शुभ-अशुभ की इन मान्यताओं का खमियाजा भारतीय समाज में महिलाओं सबसे अधिक भुगतना पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने कुछ सालों पहले एक रिपोर्ट पेश की थीजिसमें भारत में 1987 से2003 तक हजार 556 महिलाओं को डायन या चुड़ैल कह कर मार देने की बात कही गई थी। इस तरह हत्या करने के मामले झारखंड में सबसे आगे है। दूसरे पर ओड़िशा और तीसरे नंबर पर तमिलनाडु है। एक दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 2011 में 240, 2012 में 119, 2013 में 160 हत्याएं अंधविश्वास के नाम पर की गर्इं। अकेले 2001 से2016 तक पांच सौ महिलाओं की हत्या अंधविश्वास से प्रेरित होकर की गई।

मौजूदा समय में इन मान्यताओं के संदर्भ में यह समझना अधिक जरूरी है कि सामाजिक जीवन में शुभ-अशुभ से जुड़ी धारणाओं में धर्म से अधिक भेदभावपूर्ण व्यवहार का प्रभाव सबसे अधिक है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सामाजिक-सांस्कृतिक कुरितियों के साथ जाति और धर्म मूल की राजनीति का इतिहास बहुत पुराना रहा है। औपनिवेशिक देशकाल में भी तमाम प्रगतिगामी संगठन इन अंधविश्वास के विरुद्ध बन रहे कानूनों को विशेष धर्म विरोधी कह दिया जाता है, जबकि कानून का फोकस सभी धर्मो की अनैतिक प्रथाओं/आचारों पर होता है। अंधविश्वासी प्रथाओं/आचारों का विरोध धर्मविरोधी चरित्र के कारण नहीं भेदभाव भरे व्यवहार के कारण होता है।

इसलिए यह समझने की जरूरत है कि इन प्रथाओं/आचारों के विरुद्ध संघर्ष की लड़ाई को कानून के साथ-साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव से ही जीता जा सकता है। लोगों के मानसिकता में बदलाव की नियती ही इन प्रथाओं/आचारों के विरुद्ध खड़ी होकर कानून का इस्तेमाल ढ़ाल के रूप में कर सकेगी। जाहिर है कि कानून के साथ-साथ लोगों की मानसिकता में बदलाव के लिए मूलभूत कदम उठाने भी जरूरी हैं।

भारत के संविधान की धारा 51 ए मानवीयता एवं वैज्ञानिक चितंन को बढ़ावा देने में सरकार के प्रतिबद्ध रहने की बात करती हैजो अनुच्छेद राज्य सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी डालता है। मसलन, बच्चों को काटें पर फेंकना या महिला को नग्न करने घुमाना धारा 307 और 354 बी के तहत अपराध है, जो अधिक प्रभावी रूप से सक्रिय नहीं है। प्रत्येक राज्य अपने कानून और व्यवस्था को बनाने के आईपीसी में संसोधन करने के लिए स्वतंत्र है ताकि वह विशिष्ट आवश्यकताओं को पूरा कर सके। इन्हीं प्रयास में कर्नाटक सरकार ने पिछले दिनों ऐतिहासिक अंधविश्वास विरोध बिल प्रीवेंशन एंड इरेडिकेशन आफ इनहयूमन इविल प्रैकिट्सेस एंड ब्लैक मैजिक एक्ट 2017 (अमानवीय प्रथाओं और काला जादू पर रोक एवं उनकी समाप्ति के लिए विधेयक) को पास किया है।

प्रस्तावित कानून में किसी को सिद्धभुक्टी, माता, ओखली, मानव बली जैसी परंपरा जिसमें जान जाने का डर हो को प्रतिबंधित किया है, अंधविश्वासी बातों को फैलना, करतब से इंसानी चमत्कार दिखाना, आग पर चलने के लिए मजबूर करना, किसी के मुंह से लोहे के सलाखे निकालना, काला जादू के नाम पर पत्थर फेंकना, सांप या बिच्छु काटने से घायल व्यक्ति को चिकित्सकीय सहायता न देकर उसके लिए जादुई इलाज का इंतजाम करना, धार्मिक रस्म के नाम पर किसी को निर्वस्त्र करना, भूत के विचार को बढ़ावा देना, चमत्कार करने का दावा करना, अपने आप को घायल करने के विचार को बढ़ावा देना आदि प्रयासों को इस बिल के तहत अपराध के श्रेणी में रखा गया है। अंधविश्वास के लिए महिलाओं और बच्चों के उपयोग को कड़े अपराध की श्रेणी में रखा गया है।

इसके पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने भी इस तरह के प्रयास किये है, पर जरूरी है कि इस दिशा में पूरे देश में एक केंद्रीय कानून बने। महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकार का अंधविश्वास विरोधी बिल जाति और जेंडर आधारित अपमानजन व्यवहारों/आचारों पर सवाल उठाता है हालांकि इसतरह के बिल के मानवीय प्रावधान समस्या के निवारण को सुलझाने में इसके मूल कारण से भटक जाते है। कानून में सजा के प्रावधान समस्या से फौरी राहत के तरह ही है समस्या के मूल पर कोई चोट नहीं हो पाती है। फिर भी कई तरह के परंपरागत व्यवहारों/आचारों पर अंकुश लगाने के लिए सख्त कानून जरूरी है ताकि आस्था की नाम लोगों को बेवकूफ बनने से बचाया जा सके और समाज कोवैज्ञानिक दिशा की तरफ प्रेरित किया जा सके।

महाराष्ट्र और कर्नाटक सरकार का मौजूदा बिल इस दिशा में मील का पत्थर माना जा सकता है हालांकि इस बिल में कई तरह की उलझने है जिस दूर किया जाना जरूरी है। अपने अंदर की तमाम विसंगतियों के बावजूद इस तथ्य रेखांकित करना जरूरी है कि मौजूदा बिल भी सही दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम है। मौजूदा बिल की प्रासंगिकता को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय स्तर ऐस माहौल बनाए जाने की जरूरत है जिससे जाति और जेंडर आधारित भेदभाव को कम या खत्म किया जा सके।

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