राक्षश और आप एक व्यंग लेख ।राक्षश के मार डाले जाने पर खुश होना अजीब बात क्यों है , राक्षश राजनैतिक रूप से पराजित जनता है, कोई आसमानी जादुई आफत नहीं

बैठक में टी॰वी॰ चल रहा था, जिस पर रामायण आ रही थी।
मेरे मित्र काफी गौर से रामायण देख रहे थे।
तभी रामायण में एक दृश्य ऐसा आता है जब रामायण के मुख्य पात्र राम किसी राक्षस को मारते हैं।
तभी मेरे दोस्त अशोक चौधरी मुझसे कहते हैं।
*लो हो गया इस दैत्य ‘राक्षस’ का भी काम तमाम*
अब इतना सुनते ही मैंने उनसे कहा श्रीमान इतना खुश होने की क्या आवश्यकता है?
तभी मेरे मित्र अशोक चौधरी बोलते हैं, मैं इसलिए खुश हो रहा हूँ की राम ने *राक्षस* का अंत किया।
तभी मैंने कहा ‘तो फिर इसमें खुश होने की क्या बात?
*राक्षस तो आप भी हो।*
अशोक जी थोड़े गुस्से में, *आपने हमें राक्षस क्यों कहा?*
हम राक्षस थोड़े ही हैं? *मैंने कहा अशोक जी आप राक्षस नही तो और क्या हो?*
*आप भी राक्षस और आपका बेटा भी राक्षस?*
तभी अशोक जी गुस्से से ‘लथपथ’ आग-बबुला होकर बोले, *हम आपकी इज्जत करते हैं इसका मतलब यह नही की आप हमारी सरेआम बेईजत्ती करेगो।*
हमें आपसे यह उम्मीद नही थी। मैंने कहा अशोक जी मैंने आपको गलत ही क्या बोला?
मैं तो अभी भी आपको और आपके बेटे को राक्षस कहुंगा चाहे आप मुझे कुछ भी कहो, या मेरे बारे में कुछ भी सोचो। आप कहो तो मैं यह साबित भी कर सकता हूँ की आप राक्षस हो।
तभी अशोक जी कहने लगे आप कैसे साबित करेगो?
*मैंने पूछा आपकी जाति क्या है?*
अशोक जी ने कहा हम *पवार पाटील’ हैं।*
मैंने कहा हिंदू धर्म में कितने वर्ण होते हैं।
अशोक जी ने कहा *चार*
मैंने कहा आप *ब्राह्मण* हो ?
अशोक जी का जवाब – *नही*
मैंने कहा आप *वैश्य* हो ?
अशोक जी का जवाब – *नही*
मैंने कहा आप *क्षत्रीय* हो ?
अशोक जी का जवाब – *नही*
मैंने कहा अब कौन सा वर्ण बचा?
*अशोक जी ने कहा ‘शुद्र’*
मैंने कहा तो फिर आप *शुद्र* हो।
अशोक जी गुमसुम हो गए, तभी उनकी पत्नी *श्रीमती जी’ चाय लेकर आईं, मैंने तुरंत उनकी पत्नी से कहा, भाभी जी आपके बेटे का अभी नामकरण हुआ था*, क्या आप मुझे अपने बेटे की *जन्मपत्रि-कुंडली* दिखा सकती हैं?
अशोक जी की पत्नी ने कहा, हाँ जरूर क्यों नही, आप चाय पीजिए मैं अभी लाती हूँ।
अब हम लोग चाय पीने लगे, *तभी उनकी पत्नी जन्मपत्रि-कुंडली लेकर आ गईं, मैंने जन्मपत्रि-कुंडली अपने हाथ में ना लेकर उनकी पत्नी से कहा, इसे अशोक जी को दीजिए।*
अशोक जी कहने लगे की मुझे क्यों?
*मैंने कहा अशोक जी जन्मपत्रि-कुंडली में सब कुछ लिखा होता है।*
अब आप अपने बेटे की जन्मपत्रि-कुंडली में देखकर यह बताइए की उसका *वर्ण* क्या लिखा है?
अशोक जी धीमी आवाज में बोले *शुद्र*
तभी मेरे चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई,
मैंने कहा, अशोक जी अब आप जन्मपत्रि-कुंडली में देखकर यह बताइए की आपके बेटे को किस *गण* में रखा गया है।
अशोक जी शांत मुद्रा में, बहुत देर तक कुछ नही बोलो, मैंने कहा अशोक जी क्या हुआ? आप तो शांत हो गए, क्या जन्मपत्रि- कुंडली में लिखा आपको समझ नही आ रहा?
लाईए मैं पढ़कर बताता हूँ, तभी वह बोले की *गण राक्षस*लिखा हुआ है।
दोस्तों अब मैं ठहाके मारकर हँसने लगा और बोला की अभी तो *आप राक्षस के मरने पर खुश हो रहे थे*, और इतनी जल्दी जन्मपत्रि-कुंडली में खुद के *बेटे को राक्षस देखकर शांत हो गए,*
ऐसा क्यों?
अशोक जी यह जन्मपत्रि-कुंडली मैंने या आपने नही बनाई, यह एक *ब्राह्मण* ने बनाई है।
जिस वर्ण ने *शुद्रोँ* को हमेशा राक्षस ही कहा है,
*अशोक जी जातिवाद-भेदभाव तो ‘शुद्र’ वर्ण के बच्चों को साथ जन्म से ही शुरू हो जाता है,*
आप *शुद्र-वर्ण* के अधीन आने वाली किसी भी जन्मपत्रि-कुंडली को उठाकर देख लीजिए *गण राक्षस ही मिलेगा।*
क्योंकि इस एक विशेष वर्ण ने *शुद्र वर्ण’ को हमेशा राक्षस-खलनायक* के रूप में ही दिखाया है। और स्वंय को *नायक* के रूप में प्रस्तुत किया है।
क्या आपको अभी भी खुद के राक्षस होने पर शक है?
*इतने उदाहरण देने के बाद भी समाज में अधिकतर लोग पाखंड के  दल दल में  फंसे हुए है। कब जागेगा हमारा समाज जय भीम नमो बोद्धाय

आगरा के पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में रखी है बाबा साहेब की अस्थियां

आगरा के पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में रखी है बाबा साहेब की अस्थियां

– 13 फरवरी 1957 को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव अंबेडकर द्वारा उनकी अस्थियां आगरा लाई गईं और पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में स्थापित की गयी है ।भदंत ज्ञान रत्न महाथेरा ने बताया कि हर वर्ष छह दिसम्बर को डॉ. अंबेडकर के परिनिवार्ण दिवस पर डॉ. अंबेडकर की अस्थियां जनता के दर्शनार्थ बुद्ध विहार में रखी जाती हैं।

– पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार की ज़मीन रक्षा विभाग की है और वह इस इतिहासिक बौद्ध विहार को हटाने के लिए बार बार कहता है। भदंत ज्ञान रत्न महाथेरा भारत सरकार से अपील करते हुए कहते है की इस ज़मीन को रक्षा विभाग से ले कर हमे दिया जाये ताकि हम बाबा साहेब की याद में भव्य स्मारक का निर्माण यह करा सके। विहार के हालत अभी खस्ता है

-18 मार्च 1956 को रामलीला मैदान, आगरा में सभा करने के बाद बाबा साहब ने पूर्वोदय चक्कीपाट में तथागत महात्मा बुद्ध की प्रतिमा अपने हाथों से स्थापित की। मूर्ति आज भी पूर्वोदय बुद्ध विहार में देखी जा सकती है।

-जुलाई 1957 को बौद्ध भिक्षु कौडिन्य ने आगरा आकर विशाल बुद्ध विहार का निर्माण कराया। सन 1967 में इसकी देखभाल के लिए बुद्ध विहार प्रबंध समिति बनाई गई, जो वर्तमान में भी इसकी देखरेख का जिम्मा संभाल रही है।

-आगरा पड़ी थी धम्मचक्र परिवर्तन की नीव डॉ. अम्बेडकर ने 18 मार्च, 1956 को रामलीला मैदान में लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था- ‘अगर मैं आगरा के लोगों की भावनाओं को पहले समझ लेता तो बहुत पहले ही बौद्ध धर्म ग्रहण कर लेता लेकिन अभी भी देर नहीं हुई है। इस छुआछूत और जातिवाद के खात्मे को बौद्ध धर्म ग्रहण करूंगा…..’ आगरा से जाने के बाद उन्होंने नागपुर (महाराष्ट्र) में बौद्ध धर्म ग्रहण कर लिया। उन्होंने धर्म परिवर्तन की नींव आगरा डाली थी।

-दलितों के मसीहा डॉ. भीमराव अंबेडकर की नजर में आगरा बहुत अहम था। वह मानते थे कि पंजाब, महाराष्ट्र के बाद आगरा दलितों का सबसे बड़ा गढ़ है। पहली बार आगरा आगमन में ही डॉ. अंबेडकर ने भांप लिया था कि आगरा दलित आन्दोलन में मील का पत्थर साबित होगा।

-आगरा में अपने ऐतिहासिक भाषण में बौद्ध धर्म को ग्रहण करने की इच्छा जताते डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि मैं जिस धर्म को आपको दे रहा हूं, उसका आधारा बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय है। इसमें आत्मा परमात्मा का बखेड़ा नहीं है, न ही खुदा का झगड़ा है, इसमें मानव मात्र का कल्याण है। इसमें समानता, भाईचारा, न्याय और मानवता की सेवा भावना भरी हुई है। इसका आधार असमानता नहीं है। बुद्ध का धम्म इसी भारत की पवित्र भूमि का है।

-पढ़े-लिखे लोगों ने दिया धोखा

डॉ. अंबेडकर के मन एक वेदना थी जो आगरा में बाहर निकलकर आई। उन्होंने रामलीला मैदान में अपना गुस्सा व्यक्त करते हुए कहा कि मैंने लोगों को पढ़ने-लिखने का अधिकार दिलाया। पढ़-लिखकर यह मेरा हाथ बंटाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मैं देख रहा हूं कि मेरे चारों तरफ पढ़े लिखे क्लर्कों की भीड़ इकट्ठी हो गई है, जो सिर्फ अपना पेट पालने में लगे हुए हैं। उन्होंने कहा था कि जिस समाज में एक आईएएस, दस डॉक्टर और बीस वकील होंगे, तो वह समाज खुद ब खुद सुधर जाएगा। मैंने आशा की थी कि मेरे दलित शिक्षित, अपने दबे कुचले भाइयों की सेवा करेंगे पर मुझे यहां बाबुओं की भीड़ देखकर निराशा हुई है। लेकिन आज जब आप ऊंची नौकरी पर जाएं तो अपने भाइयों को न भूलें।

-बम्बू को रखें मजबूत

डॉ. अंबेडकर ने कहा था कि मैंने संविधान का निर्माण कर पूरे देश की एकता तथा अखंडता को बनाए रखने का काम किया है। आप सभी अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत रहें। मैं लाठी लेकर आपके साथ सबसे आगे चलूंगा। उन्होंने समाज के कार्यकर्ताओं को झकझोरते हुए कहा कि इस समाज रूपी तम्बू में बम्बू का काम कर रहा हूं। अगर यह बम्बू गिर गया तो तम्बू की स्थिति स्वंय बिगड़ जाएगी इसलिए बम्बू को मजबूत बनाए रखना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा था कि राजनीति में आपके हिस्सा न लेने का सबसे दंड यह कि आयोग्य व्यक्ति आप पर शासन करेंगे।

गौतम बुद्ध द्वारा सुनाई एक कहानी- तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं-हमारे विचार ही हमारी दशा दिशा के कारन होते हैं …ओशो

बुद्ध अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। एक शिष्य ने पूछा- “कर्म क्या है?”

बुद्ध ने कहा- “मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”
एक राजा हाथी पर बैठकर अपने राज्य का भ्रमण कर रहा था।अचानक वह एक दुकान के सामने रुका और अपने मंत्री से कहा- “मुझे नहीं पता क्यों, पर मैं इस दुकान के स्वामी को फाँसी देना चाहता हूँ।”
यह सुनकर मंत्री को बहुत दु:ख हुआ। लेकिन जब तक वह राजा से कोई कारण पूछता, तब तक राजा आगे बढ़ गया।

अगले दिन, मंत्री उस दुकानदार से मिलने के लिए एक साधारण नागरिक के वेष में उसकी दुकान पर पहुँचा। उसने दुकानदार से ऐसे ही पूछ लिया कि उसका व्यापार कैसा चल रहा है? दुकानदार चंदन की लकड़ी बेचता था। उसने बहुत दुखी होकर बताया कि मुश्किल से ही उसे कोई ग्राहक मिलता है। लोग उसकी दुकान पर आते हैं, चंदन को सूँघते हैं और चले जाते हैं। वे चंदन कि गुणवत्ता की प्रशंसा भी करते हैं, पर ख़रीदते कुछ नहीं। अब उसकी आशा केवल इस बात पर टिकी है कि राजा जल्दी ही मर जाएगा। उसकी अन्त्येष्टि के लिए बड़ी मात्रा में चंदन की लकड़ी खरीदी जाएगी। वह आसपास अकेला चंदन की लकड़ी का दुकानदार था, इसलिए उसे पक्का विश्वास था कि राजा के मरने पर उसके दिन बदलेंगे।
अब मंत्री की समझ में आ गया कि राजा उसकी दुकान के सामने क्यों रुका था और क्यों दुकानदार को मार डालने की इच्छा व्यक्त की थी। शायद दुकानदार के नकारात्मक विचारों की तरंगों ने राजा पर वैसा प्रभाव डाला था, जिसने उसके बदले में दुकानदार के प्रति अपने अन्दर उसी तरह के नकारात्मक विचारों का अनुभव किया था।

बुद्धिमान मंत्री ने इस विषय पर कुछ क्षण तक विचार किया। फिर उसने अपनी पहचान और पिछले दिन की घटना बताये बिना कुछ चन्दन की लकड़ी ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। दुकानदार बहुत खुश हुआ। उसने चंदन को अच्छी तरह कागज में लपेटकर मंत्री को दे दिया।
जब मंत्री महल में लौटा तो वह सीधा दरबार में गया जहाँ राजा बैठा हुआ था और सूचना दी कि चंदन की लकड़ी के दुकानदार ने उसे एक भेंट भेजी है। राजा को आश्चर्य हुआ। जब उसने बंडल को खोला तो उसमें सुनहरे रंग के श्रेष्ठ चंदन की लकड़ी और उसकी सुगंध को देखकर बहुत प्रसन्न हुआ। प्रसन्न होकर उसने चंदन के व्यापारी के लिए कुछ सोने के सिक्के भिजवा दिये। राजा को यह सोचकर अपने हृदय में बहुत खेद हुआ कि उसे दुकानदार को मारने का अवांछित विचार आया था।

जब दुकानदार को राजा से सोने के सिक्के प्राप्त हुए, तो वह भी आश्चर्यचकित हो गया। वह राजा के गुण गाने लगा जिसने सोने के सिक्के भेजकर उसे ग़रीबी के अभिशाप से बचा लिया था। कुछ समय बाद उसे अपने उन कलुषित विचारों की याद आयी जो वह राजा के प्रति सोचा करता था। उसे अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ऐसे नकारात्मक विचार करने पर बहुत पश्चात्ताप हुआ।

यदि हम दूसरे व्यक्तियों के प्रति अच्छे और दयालु विचार रखेंगे, तो वे सकारात्मक विचार हमारे पास अनुकूल रूप में ही लौटेंगे। लेकिन यदि हम बुरे विचारों को पालेंगे, तो वे विचार हमारे पास उसी रूप में लौटेंगे।
यह कहानी सुनाकर बुद्ध ने पूछा- “कर्म क्या है?” अनेक शिष्यों ने उत्तर दिया- “हमारे शब्द, हमारे कार्य, हमारी भावनायें, हमारी गतिविधियाँ…”
बुद्ध ने सिर हिलाया और कहा- *”तुम्हारे विचार ही तुम्हारे कर्म हैं।”*

“ओशो”

नोट : अच्छी बाते ,सोच और अच्छे कर्म केवल अच्छे लोगों पर ही असर करते हैं , क्रिमिनल दिमाग वाले ऐसे लोग जो किसी भी कीमत पर शाशन अपने हाथ में रखना चाहते हों उनके लिए ये सब केवल भाषण मात्र है

हाल ही में केंद्र सरकार ने अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए डॉक्टर अंबेडकर के नाम पर एक स्कीम लॉन्‍च की है. इसके तहत पति पत्नी में से कोई एक दलित हो तो केंद्र सरकार ढाई लाख रुपये देगी.

हाल ही में केंद्र सरकार ने अंतर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए डॉक्टर अंबेडकर के नाम पर एक स्कीम लॉन्‍च की है. इसके तहत पति पत्नी में से कोई एक दलित हो तो केंद्र सरकार ढाई लाख रुपये देगी. कायदे से इस योजना का हर सांसद को प्रचार करना चाहिए मगर ज़्यादातर बचेंगे ही. दो धर्मों के बीच शादी के लिए भी कानून है, उसका भी कोई प्रचार नहीं करता है. 1954 का स्पेशल मैरिज एक्ट क्यों हैं फिर. वैसे यह तो स्पेशल मैरिज एक्ट 1874 से चला आ रहा है तब उसमें एक धर्म से दूसरे धर्म में शादी करने पर धर्म का त्याग करना पड़ता था.

1954 का कानून यह कहता है कि दो धर्मों के लोग शादी कर सकते हैं और धर्म बदलने की ज़रूरत भी नहीं है. जब स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत दो धर्मों के लोग शादी करेंगे तब उन पर न तो हिन्दू मैरिज लॉ लगेगा न मुस्लिम पर्सनल लॉ. इंडियन सक्सेशन एक्ट लगेगा जिसके अनुसार बेटा बेटी को संपत्ति में बराबरी का हिस्सा मिलेगा.

आपने देखा कि स्पेशल मैरिज एक्ट दो धर्मों के बीच शादी को मान्यता देता है. इस लिहाज़ से दो धर्मों के लोग अगर आपस में शादी करते हैं तो कुछ गलत नहीं करते हैं बल्कि समान नागरिक संहिता का सामाजिक आधार बढ़ा देते हैं

राजस्थान के राजसमंद में शम्भो लाल रैगर ने लव जिहाद के लिए एक मुसलमान को बर्बरता से मार के उसका वीडियो बनाया ये घटना आजकल चर्चा में है,क्या आप सोच सकते हैं की अगर इस रैगर ने डॉ आंबेडकर और उनकी बाइस प्रतिज्ञा को समझता तो ऐसा करता। क्या आप सोच सकते हैं की रैगर जाती जो दिन रात ऊँची जाती वालों से पिटते अपमानित होते रहते है जिनके दूल्हे को घोड़े पर भी नहीं बैठने दिया जाता हो , या वो लोग हैं। रविश कुमार का प्राइम टाइम देखिये :-नफ़रत की मानसिकता के पीछे कौन ?

 

https://khabar.ndtv.com/news/blogs/in-the-name-of-love-jihad-who-is-inciting-violence-1786484

 

http://www.bbc.com/hindi/india-42321794?ocid=socialflow_facebook

महाराष्ट्र के एक महार युवक नितिन आगे की जातिवादी नफरत की कारन बेहद बर्बरता से अप्रैल २०१४ में हत्या की गयी थी , निचली अदालत ने सभी आरोपियों को, ज्यादातर गवाहों के पलट जाने के चलते छोड़ दिया है , इसी पर रविश कुमार की प्राइम टाइम रिपोर्ट Prime time:Ndtv:Ravish kumar 12 December 2017

 

https://navbharattimes.indiatimes.com/india/all-accused-acquitted-in-case-of-murder-of-dalit-youth/articleshow/61783067.cms

 

कला अक्षर भैस बराबर , आइये आपकी भैस से ही आपको सामंतवाद पूँजीवाद ब्राह्मणवाद मार्क्सवाद लोकतंत्र प्रजातंत्र जैसे कठिन शब्दों का मतलब समझाएं …अरुण कुमार मिश्र

सामंतवाद क्या है? – पड़ोसी लाठी लेकर आये और आपकी भैंस छीन ले जाए !

पूंजीवाद क्या है? – पूंजीवादी वो है लठैत/बल लेकर आये और आपकी भैंस का आपका दूहा दूध छीन ले जाए !

पूंजीवाद का चरम ‘पूँजी’ के एकाधिकार और संकेंद्रीकरण में हैं – पहले घरेलू उद्योग उजाड़ दो, फिर छोटे उद्योग, कल-कारखाने हड़प लो, फिर मंझोले उद्योग चौपट करो और धीरे-धीरे केवल बड़े पूंजीपति रह जाएँ या केवल एक रह जाय सारी पूंजी और संपत्ति का मालिक – एक ही बड़ी मछली बचे, सारी छोटी मछलियों को खाकर … अपने आस-पास देखिये क्या ऐसा नहीं हो रहा है? – क्या छोटी-छोटी दुकानें धीरे-धीरे बंद नहीं हो रही हैं, छोटी-छोटी फैक्टरियां, घरेलू-उद्योग? …. क्या किसान खेत-खलियान बेचकर मज़दूर नहीं बन रह हैं – खेती के उत्पादन अब उतने लाभप्रद नहीं रह गए हैं? खेती की ज़मीन बेचने में किसान ज्यादा बेहतरी समझते हैं? …. क्या आपके आस-पास मज़दूरों की संख्या नहीं बढ़ी है? मज़दूर-मंडी में सुबह मज़दूर खरीद लिए जाने के बाद भी क्या बड़ी तादाद में मज़दूर बच नहीं जाते जिनके लिए कोई काम नहीं रह जाता?

ब्राह्मणवाद क्या है- अपने दिमाग में धर्म का ऐसा नशा भरे की आप खुद अपनी भैस ब्राह्मण को दे आये और भैस लेने ले लिए ब्राह्मण के पैर छु कर सदा आभारी रहे

मनुवाद क्या है – ऐसे विधान लिखे और पालन किये जाएँ जिससे राजा आपकी भैस छीन कर ब्राह्मण को दे दे और भैस रखने के लिए आपको कड़ी सजा दे

समाजवाद क्या है? – जब आपकी भैंस दूध न दे, तो पड़ोसी अपनी भैंस का आधा दूध आपको दे दे और जब पड़ोसी की भैंस दूध न दे, तब आप अपनी भैंस का आधा दूध उसे दे दें !

साम्यवाद क्या है? – जब सारी भैंसे पूरे गांव की हों, सारा दूध पूरे गांव में बराबर बांटा जाए !

जाती/वर्ग-संघर्ष क्या है?- जब दबंग जाती वाले लाठी ले कर आएं और आपकी भैंस खोल ले जाएँ या जबरदस्ती भैंस दुह ले जाएँ या दूहा हुआ दूध छीन ले जाएँ और आप उनके विरोध में अपनी भैस को और दूध को बचाने के लिए लाठी उठा लें और मुक़ाबला करें तो यही संघर्ष वर्ग-संघर्ष है !

‘बुर्ज़ुआ’ क्या है? जब कोई आपकी सारी गाय-भैंसे-बकरियां, ज़मीन-जायदाद, कपडे-लत्ते, खेत-खलियान, घर-आँगन, सब छीन ले जाए और आप के पास पहनने को न लंगोटी हो और न भीख मांगने को कटोरा और ज़िंदा रहने के लिए आपको मज़दूरी करनी पड़े और मज़दूरी के बदले में केवल वह आदमी आपको उतना ही खाने के लिए दे कि आप ज़िंदा रहकर उसके बेगारी और मज़दूरी कर सकें, और वह खुद कुछ भी मेहनत-मज़दूरी न करे, आपके बल पर ऐश करे, आपकी सारी संपत्ति हड़प ले, आप को गुलाम और बिना पैसे का नौकर बना ले, तो वह बुर्ज़ुआ है !

दक्षिण-पंथ क्या है? -१ अगर कोई आप पर धौंस जमाए और आपकी भैंस को अपनी भैंस बताये और उसे राजनैतिक या दबंगई से छीनने की कोशिश जारी रखे तो यह दक्षिण-पंथ है ! जिसके केंद्र में ईश्वर है, जो परलोक में विश्वास करता है, जो भेद-भाव में विश्वास करता है और पिछड़ेपन में विश्वास करता है और उसी के अनुरूप आचरण करता है ! ब्राह्मणवाद और दक्षिणपंथ भारत में काफी करीब है।

वाम-पंथ क्या है: अगर कोई अपनी भैंस को अपनी माने और आपकी भैंस को आपकी भैंस माने तो यह वाम-पंथ है !

अम्बेडकरवाद क्या है: कानून या संविधान के नज़र में सब बराबर हैं सबको न्याय पाने का और सुखी रहने का अधिकार है कोई किसी का मालिक नहीं,कोई किसी का शोषण नहीं कर सकता और ये सब केवल कोरी बाते न हों इनको कानून बनाकर लागू किया जाए।

बुद्धवाद क्या है :- है जो मानववाद में विश्वास करता है, जिसके केंद्र में मनुष्य है, जो इहलोक में विश्वास करता है, जो समता-समानता और प्रगति में विश्वास करता है और उसी के अनुरूप आचरण करता है !

‘क्रांति’ क्या है? :- जब आपकी सारी गाय-भैंसे-बकरियां, ज़मीन-जायदाद, कपडे-लत्ते, खेत-खलियान, घर-आँगन, सब छीन लिए जाएँ और आप के पास पहनने को न लंगोटी हो और न भीख मांगने को कटोरा, आपको मज़दूरी करनी पड़े और मज़दूरी के बदले में केवल उतना मिले कि आप ज़िंदा रहकर मज़दूरी कर सकें, …. और आप मज़दूरी करने से मना कर दें और सचमुच किसी की मज़दूरी न करें, और इसके लिए वो किसी भी हद तक जाने को तैयार हों और सब लोग मिलकर एक साथ ऐसा करें, तो यह ‘क्रांति’ है … ऐसे हालत में आपको भिखारी और मज़दूर बनानेवाला खुद-ब-खुद ख़त्म हो जाएगा क्योंकि उसकी ज़िन्दगी आपकी मज़दूरी से चलती है !

मार्क्सवाद:- मजदूर को उसकी मजदूरी और हक़ दिलाने वाली विचारधारा है, ये दुनिया को मालिक और मजदूर दो भागों में देखती है ।विचार की मृत्यु नहीं होती, विचार कभी मरता नहीं, वह केवल अप्रांसगिक हो सकता है,मार्क्सवाद एक विचार है, अतः उसके मरने का सवाल ही नहीं उठता, और वह अप्रांसगिक भी नहीं हो सकता … क्योंकि उसका आधार विज्ञान है
…… यानि कि वह केवल तर्कों पर नहीं बल्कि तथ्य और प्रमाण पर आधारित है !!!

जनता क्या है :- जनता भैंस है जो मूलनिवासी है और अपने हिसाब से चलना चाहती है पर धर्म और मीडिया द्वारा उनकी राजनैतिक वफ़ादारी तय की जाती है ….. पेट भर खाने को मिल जाए उसी में खुश हो जाती है ….. खूब दूध देती है …. कई बार गाय के धोखे में खिला भी दी जाती है …. डिमांड में कम है ….. उसके ऊपर कौआ बैठे या बगुला उसे फर्क नहीं पड़ता ….. उत्पाती बच्चे कितना भी मारे-पीटें, चलती अपनी ही चाल से है, ज्यादा उत्पात किया तो पूँछ मार के गिरा दिया ज़मीन पर …. शेर तकको खदेड़ देती है – जैसे भैंस पानी में चली जाती है, वैसे ही व्यवस्था भी पानी में बैठ जाती है …

इतिहास क्या है :- आपकी भैस की पूर्वजों की ऐसी कहानी जिसे मान लेने के आलावा आपके पास दूसरा कोई चारा नहीं, क्योंकि इतिहास विजेता लिखवाता है और विजेता के शब्द ही इतिहास है सच चाहे जो भी हो ।

व्यस्था क्या है? :- व्यस्था भैंस की पूँछ है जो कौवों-बगुलों को भगा देती है, उत्पाती लडकों को गिरा देती है, और जब उठ जाती है तो व्यवस्था गोबर कर देती है – जिससे सब के चूल्हे जलते हैं और सबके खेतों में जिसकी खाद से सबसे अच्छी फसल होती है – सुख-समृद्धि-शांति आती है !

अगर आदिम साम्यवाद के बाद सामंतवाद और सामंतवाद के बाद पूँजीवाद आया है तो पूँजीवाद के बाद समाजवाद और समाजवाद के बाद साम्यवाद क्यों नहीं आ सकता?

डेमोक्रेसी या लोकतंत्र क्या है: ये युद्ध की जगह वोट द्वारा सर्कार चुनने का जनाधिकार है। लोकतंत्र वो ताकत है जिससे भैंस अपने मालिक को बदलने, मिटाने और हटाने का काम कर सकती है। सदियों की मानव शोषण की बीमारी पर शोध करने के अनुभव के बाद डेमोक्रेसी जैसी दवाई निकल कर आयी है जिसकी खो जाने के बाद आपकी खाल निकाल कर बाजार में आपके ही हाथों बिकवाई जायेगी।

साभार वाल पोस्टअरुण कुमार मिश्र