भीमा कोरेगांव की 200वीं जयंती और नववर्ष की शुभकामनाएं।इस युद्ध से पहले महार सैनिक मराठाओं के पास पहुंचे थे कि वे उनके साथ आना चाहते हैं,लेकिन जातीय विषमता के कारण ठुकरा दिए गए। बाद में वे अंग्रेजों की ओर से कोरेगांव में लड़े।…. देवेश कल्याणी


कोरेगांव के काजल से उतारें लोकतंत्र की नजर
दरिटर्न आफ भीमा कोरेगांव का इंतजार अब भारतीय लोकतंत्र को सोशल वर्जन के रूप में है। 200 साल पुराना यह युद्ध आज की परिस्थितियों में फिर प्रासंगिक हो गया है। वंचित-दलितों को दिशाहीन और भ्रमित कर सत्ता भोगना ही सियासत है, इसे स्थापित सत्य माना जाता है, लेकिन अब इसके दिन पूरे हो रहे हैं। इसका संकेत है गुजरात  चुनाव। यहां के वंचित वर्गों की गोलबंदी ने सबसे बड़ी पार्टी को उसके सबसे मजबूत गढ़ में इस कदर झकझोरा है कि बहुत कम अंतर से हाथ में आई 16 सीटें न होती तो शायद सबसे लंबी सत्ता का तिलस्म टूट जाता।  इन नतीजों के बाद से ही  इलेक्शन कंपनीज (इन्हें पार्टी न कहें) 2018 में आठ राज्यों के विधानसभी और 2019 में लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुटी हैं। जिसमें फिर वोटरों को गिनी पिग की तरह फामूर्लों से गवर्न करने के हालात हैं। जो गरीब, वंचित-दलितों के साथ आम लोगों को वर्गों में विभक्त कर सत्ता दिलाऊ वोट बैंक बना देता है। दो घटनाएं विशेष उल्लेखनीय हैं। दलित शंभूलाल रैगर एक हत्या को हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के चादर में ढांकने की कोशिश करता है, वहीं मंत्री अनंत हेगड़े धर्मनिरपेक्षता और संविधान को औचित्यहीन बताने की कोशिश करता है। ये दोनों घटनाएं नए वर्गों और उसके स्वभाविक नायक बनने की होड़ का प्रतिनिधित्व करती है।
इतिहास गवाह है कि चतुर लोगों ने मूल्यों का नशा पिला कर कमाने और रक्षा करने वाले गुलाम पाले हैं, जो उनकी सल्तनतों के रक्षा कवच बनते हैं। इनसे ही वो पौध पनपती है जो सैनिक बने तो सरहद पर जान निसार कर दे या आत्मघाती आतंकी बने तो खुद को उड़ाने में भी गुरेज न करे। ऐसे ही हालात पार्टियों की जागीर की तरह फैलते वोटबैंक में शामिल लोगों के हैं। परिस्थितियां वंचित-दलित मध्यमवगिर्यों को सदियों की स्वैच्छिक गुलामी जैसी स्थिति में ले जा रही है। स्मृतिकाल से जड़ होते-होते 17 वीं शताब्दी में गुलाम और मालिक की खाई इतनी भीषण हो चुकी थी कि अछूत जैसे शब्द मनुष्यता से बड़े हो गए और वंचित समुदायों के गले में थूक की हांडी और कमर में झाड़ू नियती बन गई। इन्हें इससे बाहर निकालने में औपनेवेशिक सत्ता के डकैत अंग्रेज माध्यम बने। जिन्होंने फिजिकल-मेंटल पैरामीटर पर अछूतों को सेना में स्थान दिया और भारत में अपनी सत्ता का झंड़ा गाड़ने में सफल रहे। जिसके दो बड़े उदाहरण हैं, पहला 1757 में प्लासी के युद्ध, जिसमें नवाब सिराजुद्दौला की हार का महत्वपूर्ण कारण अंग्रेजों की ओर से लड़े अछूत दुसाध योद्धाओं की भूमिका, दूसरा 1818 का भीमा कोरेगांव का युद्ध। एक जनवरी को पूणे के पास हुए कोरेगांव युद्ध ने जन्म  और जातीय श्रेष्ठता के सारे मिथक तोड़ दिए।
दरअसल, इस युद्ध से पहले महार सैनिक मराठाओं के पास पहुंचे थे कि वे उनके साथ आना चाहते हैं,लेकिन जातीय विषमता के कारण ठुकरा दिए गए। बाद में वे अंग्रेजों की ओर से कोरेगांव में लड़े। केवल 450 महार योद्धाओं ने पेशवा की 28 हजार की सेना को गाजर-मूली की तरह काट कर हरा दिया था। इससे जातीय श्रेष्ठता के मिथक टूटे तो अंबेडकर जैसी प्रतिभा पल्लवित हो सकी। आज फिर कोरेगांव जैसे युद्ध के सोशल वर्जन जरूरी है जो सियासी जागीर बनते वर्गों को आजाद करा सके।
हरियाणा और राजस्थान में जाट, मीणा और गुर्जर आंदोलन के बाद महाराष्ट्र का मराठा तथा गुजरात में पटेल आंदोलन बड़े सामाजिक अध्ययन का विषय हैं, कि क्यों और कैसे मेहनतकश और वीर विजेता जातियां वंचितों की कतार में लग कर अवसर पाना चाहती हैं? क्या इसके लिए ये समुदाय पूरी तरह से तैयार हैं या कोई नेता या लॉबी उनकी भावनात्मक उपयोग अपनी सियासत चमकाने में कर रहे हैं। पिछले साल ही उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने 17 जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने का प्रस्ताव पास कर केंद्र सरकार को भेजा था। इससे पहले केंद्र की मोदी  सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग की सेंट्रल लिस्ट में15 नई जातियों को शामिल करने के साथ 13 अन्य जातियों के बदलाव की भी मंजूरी दी थी। सियासत का दावा है कि इससे इन वर्गों को सरकारी सेवा और शिक्षा आदि में आरक्षण का लाभ मिलेगा, लेकिन  वास्तविकता में यह झुनझुना है या वाकई कारगर है? इस व्यवस्था से आरक्षित समुदाय के आकार के अनुपात में कितने अवसर और संसाधन उपलब्ध होंगे? वे कभी एक फीसदी के भी 100वें हिस्से बराबर भी नहीं हो सकते। लेकिन यही झुनझुना उन्हें मानसिक गुलामी और कमतर होने के अहसास से जरूर जोड़ेगा और उनके वंचित होने के बोध से बाहर लाने में रुकावट साबित होगा।
दरअसल, इसे उस रणनीति के तौर पर देखना चाहिए जो बिना आंतरिक लोकतंत्र वाले सियासी दलों का हथियार है। जिसके चंद ताकतवर लोगों की टोली बड़े समुदायों को जीत, प्राप्ति, उपलब्धी और आत्ममुग्धता के नशे में डूबो कर उनके वोटों का खजाना हथियाने में जुटी रहती है। इन ताकतवर लोग की टोली के पीछे छिपे कलयुगी कुबेर उनसे वो ले सकते हैं जिसकी तुलना 16वीं और 17वीं शताब्दी के गुलामों से की जा सकती है। जो अपने मालिकों के लिए लड़ते थे, मरते थे और कमाते भी थे। सियासत ने बाजार ताकतों के सामने घुटने टेक बड़ी संख्या में अवसरों को सरकार के दायरे से बाहर कर दिया। नियुक्ति के अधिकार निजी क्षेत्र को सरेंडर होते ही सौदे की ताकत से रहित मध्यमवर्गी और वंचितों को गुलाम बनाने का रास्ता खुल गया है। जिसे भीमा कोरेगांव जैसे परिणाम देने वाले सामाजिक आंदोलन ही रोक सकेगा।
भीमा कोरेगांव की 200वीं जयंती और नववर्ष की शुभकामनाएं। दलित शौर्य की इस अद्भुत गाथा संभव हो शेयर जरूर करें।
देवेश कल्याणी
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