दलित क्रांति की पहली महिला ध्वजवाहक , भारत की महिला शिक्षिका और नारी मुक्ति की प्रणेता राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फूले की 187वीं जयंती के अवसर पर सभी को शुभकामनाएं …बुद्धकथाएँ


 

दलित क्रांति की पहली महिला ध्वजवाहक , भारत की महिला शिक्षिका और नारी मुक्ति की प्रणेता राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फूले की 187वीं जयंती के अवसर पर सभी को शुभकामनाएं –

इनका जन्‍म 3 जनवरी, 1831 में दलित परिवार में हुआ परिवार में हुआ था.
1840 में 9 साल की उम्र में सावित्रीबाई की शादी 13 साल के ज्‍योतिराव फुले से हुई.
ज्ञात हो माता सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिवाराव फुले जी देश की महिलाओं और दलितों को उनका हक दिलवाना चाहते थे । इसे देखते हुए उन्होंने नाई समाज के खिलाफ आंदोलन करना शुरू किया और विधवा महिलाओं को सर के बाल कटवाने से बचाया। उस समय महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा न होने की वजह से महिलाओं पर काफी अत्याचार किये जाते थे, जिसमे कही-कही पर तो घर के सदस्यों द्वारा ही महिलाओं पर शारीरिक शोषण किया जाता था।गर्भवती महिलाओं का कई बार गर्भपात किया जाता था, और बेटी पैदा होने के डर से बहुत सी महिलायें आत्महत्या करने लगती ।

एक बार ज्योतिवाराव फुले जी ने एक महिला को आत्महत्या करने से रोका, और उसे वादा करके यकीन दिलाया कि बच्चे का जन्म होते ही वह उसे अपना नाम दे देंगे । सावित्रीबाई फुले जी ने भी उस महिला और उसके बच्चे को अपने घर रहने की आज्ञा दे दी और उस गर्भवती महिला की सेवा भी की। सावित्रीबाई और ज्योतिवाराव फुले जी ने उस बच्चे को अपनाने के बाद उसे यशवंतराव नाम दिया ।
यशवंतराव बड़ा होकर डॉक्टर बना । महिलाओं पर हो रहे अत्याचारो को देखते हुए सावित्रीबाई फुले और ज्योतिवाराव फुले ने महिलाओ की सुरक्षा के लिये एक सेंटर की स्थापना की, और अपने सेंटर का नाम “बालहत्या प्रतिबंधक गृह” रखा । सावित्रीबाई फुले भी महिलाओ की जी जान से सेवा करती थी और चाहती थी की सभी बच्चे उन्ही के घर में जन्म ले ।

घर में सावित्रीबाई किसी प्रकार का रंगभेद या जातिभेद नही करती थी वह सभी गर्भवती महिलाओ का समान उपचार करती थी । सावित्रीबाई फुले 19 वीं शताब्दी की पहली भारतीय समाजसुधारक थी और भारत में महिलाओ के अधिकारो को विकसित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

सावित्रीबाई फुले और उनके दत्तक पुत्र यशवंतराव ने वैश्विक स्तर पर 1897 में मरीजो का इलाज करने के लिये अस्पताल खोल रखा था । उनका अस्पताल पुणे के हडपसर में सासने माला में स्थित है । उनका अस्पताल खुली प्राकृतिक जगह पर स्थित है। अपने अस्पताल में सावित्रीबाई खुद हर एक मरीज का ध्यान रखती, उन्हें विविध सुविधाये प्रदान करती । इस तरह मरीजो का इलाज करते-करते वह खुद एक दिन मरीज बन गयी । और इसी के चलते 10 मार्च 1897 को उनकी मृत्यु हो गयी थी ।
सावित्रीबाई पूरे देश की महानायिका हैं । हर जाति और धर्म के लिये उन्होंने काम किया । जब सावित्रीबाई फुले जी कन्याओं को पढ़ाने के लिए अपने स्कूल जाती थीं तो रास्ते में लोग उन पर गंदगी, कीचड़, गोबर तक फैंका करते थे । सावित्रीबाई फुले जी हमेशा ही एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुँच कर गंदी कर दी गई साड़ी बदल लेती थीं । और इस तरह से अपने पथ पर चलते रहने की प्रेरणा बहुत अच्छे से देती हैं ।

उनका पूरा जीवन समाज में वंचित तबके खासकर महिलाओं और दलितों के अधिकारों के लिए संघर्ष में बीता था । उनकी एक बहुत ही प्रसिद्ध कविता है जिसमें वह सबको पढ़ने लिखने की प्रेरणा देकर जाति तोड़ने की बात करती है ।
“जाओ जाकर पढ़ो-लिखो,
बनो आत्मनिर्भर,
बनो मेहनती काम करो,
ज्ञान और धन इकट्ठा करो ,
ज्ञान के बिना सब खो जाता है,
ज्ञान के बिना हम जानवर बन जाते है,
इसलिए खाली ना बैठो, जाओ,
जाकर शिक्षा लो ,
तुम्हारे पास सीखने का सुनहरा मौका है,
इसलिए सीखो और
जाति धर्म के बंधनों को तोड़ दो ।”

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